महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1891–1900
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1891–1900
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दैत्यं सोऽतिबलं दृष्ट्वा क्रुद्धशार्दूलविक्रमम् ।
दीप्तैर्दैत्यगणैर्गुप्तं खरैर्नखमुखैरुत ॥
ततः कृत्वा तु युद्धं वै तेन दैत्येन वै हरिः । कुपित सिंहके समान पराक्रमी उस अत्यन्त बलशाली, दर्पयुक्त एवं दैत्यगणोंसे सुरक्षित दैत्यको सामने आया देख महातेजस्वी भगवान् नृसिंहने नखोंके तीखे अग्रभागोंके
द्वारा उस दैत्यके साथ घोर युद्ध किया ।
संध्याकाले महातेजाः प्रघाणे च त्वरान्वितः ॥
ऊरौ निधाय दैत्येन्द्रं निर्बिभेद नखैर्हि तम् । फिर संध्याकाल आनेपर बड़ी उतावलीके साथ उसे पकड़कर वे राजभवनकी देहलीपर बैठ गये । तदनन्तर उन्होंने अपनी जाँघोंपर दैत्यराजको रखकर नखोंसे उसका
वक्षःस्थल विदीर्ण कर डाला ।
महाबलं महावीर्यं वरदानेन दर्पितम् ॥
दैत्यश्रेष्ठं सुरश्रेष्ठो जघान तरसा हरिः । सुरश्रेष्ठ श्रीहरिने वरदानसे घमंडमें भरे हुए महाबली महापराक्रमी दैत्यराजको बड़े
वेगसे मार डाला ।
हिरण्यकशिपुं हत्वा सर्वदैत्यांश्च वै तदा ॥
विबुधानां प्रजानां च हितं कृत्वा महाद्युतिः ।
प्रमुमोद हरिर्देवः स्थाप्य धर्मं तदा भुवि ॥
इस प्रकार हिरण्यकशिपु तथा उसके अनुयायी सब दैत्योंका संहार करके महातेजस्वी भगवान् श्रीहरिने देवताओं तथा प्रजाजनोंका हितसाधन किया और इस पृथ्वीपर धर्मकी स्थापना करके वे बड़े प्रसन्न हुए ।
एष ते नारसिंहोऽत्र कथितः पाण्डुनन्दन ।
शृणु त्वं वामनं नाम प्रादुर्भावं महात्मनः ॥
पाण्डुनन्दन! यह मैंने तुम्हें संक्षेपसे नृसिंहावतारकी कथा सुनायी है । अब तुम परमात्मा श्रीहरिके वामन अवतारका वृत्तान्त सुनो । पुरा त्रेतायुगे राजन् बलिर्वैरोचनोऽभवत् । दैत्यानां पार्थिवो वीरो बलेनाप्रतिमो बली । राजन्! प्राचीन त्रेतायुगकी बात है; विरोचनकुमार बलि दैत्योंके राजा थे । बलमें उनके समान दूसरा कोई नहीं था । बलि अत्यन्त बलवान् होनेके साथ ही महान् वीर भी थे ।
तदा बलिर्महाराज दैत्यसङ्घैः समावृतः ।
विजित्य तरसा शक्रमिन्द्रस्थानमवाप सः ॥
महाराज! दैत्यसमूहसे घिरे हुए बलिने बड़े वेगसे इन्द्रपर आक्रमण किया और उन्हें जीतकर इन्द्रलोकपर अधिकार प्राप्त कर लिया ।
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तेन वित्रासिता देवा बलिनाऽऽखण्डलादयः ।
ब्रह्माणं तु पुरस्कृत्य गत्वा क्षीरोदधिं तदा ॥
तुष्टुवुः सहिताः सर्वे देवं नारायणं प्रभुम् । राजा बलिके आक्रमणसे अत्यन्त त्रस्त हुए इन्द्र आदि देवता ब्रह्माजीको आगे करके
क्षीरसागरके तटपर गये और सबने मिलकर देवाधिदेव भगवान् नारायणका स्तवन किया ।
स तेषां दर्शनं चक्रे विबुधानां हरिः स्तुतः ॥
प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्यां जन्म चोच्यते । देवताओंके स्तुति करनेपर श्रीहरिने उन्हें दर्शन दिया और कहा जाता है, उनपर
कृपाप्रसाद करनेके फलस्वरूप भगवान्का अदितिके गर्भसे प्रादुर्भाव हुआ ।
अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दनः ॥
एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजोऽभवत् । जो इस समय यदुकुलको आनन्दित कर रहे हैं, ये ही भगवान् श्रीकृष्ण पहले अदितिके
पुत्र होकर इन्द्रके छोटे भाई विष्णु ( या उपेन्द्र) - के नामसे विख्यात हुए ।
तस्मिन्नेव च काले तु दैत्येन्द्रो वीर्यवान् बलिः ॥
अश्वमेधं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे । उन्हीं दिनों महापराक्रमी दैत्यराज बलिने क्रतुश्रेष्ठ अश्वमेधके अनुष्ठानकी तैयारी
आरम्भ की ।
वर्तमाने तदा यज्ञे दैत्येन्द्रस्य युधिष्ठिर ॥
स विष्णुर्वामनो भूत्वा प्रच्छन्नो ब्रह्मवेषधृक् ।
मुण्डो यज्ञोपवीती च कृष्णाजिनधरः शिखी ॥
पलाशदण्डं संगृह्य वामनोऽद्भुतदर्शनः ।
प्रविश्य स बलेर्यज्ञे वर्तमाने तु दक्षिणाम् ॥
देहीत्युवाच दैत्येन्द्रं विक्रमांस्त्रीन् ममैव ह । युधिष्ठिर! जब दैत्यराजका यज्ञ आरम्भ हो गया, उस समय भगवान् विष्णु ब्राह्मणवेषधारी वामन ब्रह्मचारीके रूपमें अपनेको छिपाकर सिर मुँड़ाये, यज्ञोपवीत, काला मृगचर्म और शिखा धारण किये, हाथमें पलाशका डंडा लिये उस यज्ञमें गये । उस समय भगवान् वामनकी अद्भुत शोभा दिखायी देती थी । बलिके वर्तमान यज्ञमें प्रवेश करके उन्होंने दैत्यराजसे कहा- ' मुझे तीन पग भूमि दक्षिणारूपमें दीजिये । ' दीयतां त्रिपदीमात्रमित्ययाचन्महासुरम् ॥ स तथेति प्रतिश्रुत्य प्रददौ विष्णवे तदा । ' केवल तीन पग भूमि मुझे दे दीजिये । ' ऐसा कहकर उन्होंने महान् असुर बलिसे याचना की । बलिने भी ‘ तथास्तु' कहकर श्रीविष्णुको भूमि दे दी । तेन लब्ध्वा हरिर्भूमिं जृम्भयामास वै भृशम् ।
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स शिशुः सदिवं खं च पृथिवीं च विशाम्पते ॥
त्रिभिर्विक्रमणैरेतत् सर्वमाक्रमताभिभूः ।
बलेर्बलवतो यज्ञे बलिना विष्णुना पुरा ॥
विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्याः क्षोभितास्ते महासुराः । बलिसे वह भूमि पाकर भगवान् विष्णु बड़े वेगसे बढ़ने लगे । राजन्! वे पहले तो बालक- जैसे लगते थे; किंतु उन्होंने बढ़कर तीन ही पगोंमें स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी– सबको माप लिया । इस प्रकार बलवान् राजा बलिके यज्ञमें जब महाबली भगवान् विष्णुने केवल तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नाप लिया, तब किसीसे भी क्षुब्ध न किये जा सकनेवाले
महान् असुर क्षुब्ध हो उठे ।
विप्रचित्तिमुखाः क्रुद्धा दैत्यसङ्घा महाबलाः ॥
नानावक्त्रा महाकाया नानावेषधरा नृप । राजन्! उनमें विप्रचित्ति आदि दानव प्रधान थे । क्रोधमें भरे हुए उन महाबली दैत्योंके समुदाय अनेक प्रकारके वेष धारण किये वहाँ उपस्थित थे । उनके मुख अनेक प्रकारके
दिखायी देते थे । वे सब - के - सब विशालकाय थे ।
नानाप्रहरणा रौद्रा नानामाल्यानुलेपनाः ॥
स्वान्यायुधानि संगृह्य प्रदीप्ता इव तेजसा ।
क्रममाणं हरिं तत्र उपावर्तन्त भारत ॥
उनके हाथोंमें भाँति- भाँतिके अस्त्र - शस्त्र थे । उन्होंने विविध प्रकारकी मालाएँ तथा चन्दन धारण कर रखे थे । वे देखनेमें बड़े भयंकर थे और तेजसे मानो प्रज्वलित हो रहे थे । भरतनन्दन! जब भगवान् विष्णुने तीनों लोकोंको मापना आरम्भ किया, उस समय सभी दैत्य अपने - अपने आयुध लेकर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।
प्रमथ्य सर्वान् दैतेयान् पादहस्ततलैस्तु तान् ।
रूपं कृत्वा महाभीमं जहाराशु स मेदिनीम् ॥
सम्प्राप्य पादमाकाशमादित्यसदने स्थितः ।
अत्यरोचत'भूतात्मा भास्करं स्वेन तेजसा ॥
भगवान्ने महाभयंकर रूप धारण करके उन सब दैत्योंको लातों थप्पड़ोंसे मारकर भूमण्डलका सारा राज्य उनसे शीघ्र छीन लिया । उनका एक पैर आकाशमें पहुँचकर आदित्य - मण्डलमें स्थित हो गया । भूतात्मा भगवान् श्रीहरि उस समय अपने तेजसे सूर्यकी अपेक्षा बहुत बढ़ - चढ़कर प्रकाशित हो रहे थे ।
प्रकाशयन् दिशः सर्वाः प्रदिशश्च महाबलः ।
शुशुभे स महाबाहुः सर्वलोकान् प्रकाशयन् ॥
तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे ।
नभः प्रक्रममाणस्य नाभ्यां किल तदा स्थितौ ॥
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महाबली महाबाहु भगवान् विष्णु सम्पूर्ण दिशाओं- विदिशाओं तथा समस्त लोकोंको प्रकाशित करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे । जिस समय वे वसुधाको अपने पैरोंसे माप रहे थे, उस समय वे इतने बढ़े कि चन्द्रमा और सूर्य उनकी छातीके सामने आ गये थे । जब वे
आकाशको लाँघने लगे, तब वे ही चन्द्रमा और सूर्य उनके नाभिदेशमें आ गये ।
परमाक्रममाणस्य जानुभ्यां तौ व्यवस्थितौ ॥
विष्णोरमितवीर्यस्य वदन्त्येवं द्विजातयः ।
अथासाद्य कपालं स अण्डस्य तु युधिष्ठिर ॥
तच्छिद्रात् स्यन्दिनी तस्य पादाद् भ्रष्टा तु निम्नगा ।
ससार सागरं साऽऽशु पावनी सागरङ्गमा ॥
जब वे आकाश या स्वर्गलोकसे भी ऊपरको पैर बढ़ाने लगे, उस समय उनका रूप इतना विशाल हो गया कि सूर्य और चन्द्रमा उनके घुटनोंमें स्थित दिखायी देने लगे । इस प्रकार ब्राह्मणलोग अमितपराक्रमी भगवान् विष्णुके उस विशाल रूपका वर्णन करते हैं । युधिष्ठिर! भगवान्का पैर ब्रह्माण्डकपालतक पहुँच गया और उसके आघातसे कपालमें छिद्र हो गया, जिससे झर- झर करके एक नदी प्रकट हो गयी, जो शीघ्र ही नीचे उतरकर समुद्रमें जा मिली । सागरमें मिलनेवाली वह पावन सरिता ही गंगा है ।
जहार मेदिनीं सर्वां हत्वा दानवपुङ्गवान् ।
आसुरीं श्रियमाहृत्य त्रींल्लोकान् स जनार्दनः ॥
सपुत्रदारानसुरान् पाताले तानपातयत् ।
नमुचिः शम्बरश्चैव प्रह्लादश्च महामनाः ॥
पादपाताभिनिर्धूताः पाताले विनिपातिताः ।
महाभूतानि भूतात्मा स विशेषेण वै हरिः ॥
कालं च सकलं राजन् गात्रभूतान्यदर्शयत् । भगवान् श्रीहरिने बड़े - बड़े दानवोंको मारकर सारी पृथ्वी उनके अधिकारसे छीन ली और तीनों लोकोंके साथ सारी आसुरी- सम्पदाका अपहरण करके उन असुरोंको स्त्री-पुत्रोंसहित पातालमें भेज दिया । नमुचि, शम्बर और महामना प्रह्लाद भगवान्के चरणोंके स्पर्शसे पवित्र हो गये । भगवान्ने उनको भी पातालमें भेज दिया । राजन्! भूतात्मा भगवान् श्रीहरिने अपने श्रीअंगोंमें विशेषरूपसे पंचमहाभूतों तथा भूत, भविष्य और वर्तमान — सभी
कालोंका दर्शन कराया ।
तस्य गात्रे जगत् सर्वमानीतमिव दृश्यते ॥
न किंचिदस्ति लोकेषु यदव्याप्तं महात्मना । तद्धि रूपं महेशस्य देवदानवमानवाः । दृष्ट्वा तं मुमुहुः सर्वे विष्णुतेजोऽभिपीडिताः ।
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उनके शरीरमें सारा संसार इस प्रकार दिखायी देता था, मानो उसमें लाकर रख दिया गया हो । संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो उन परमात्मासे व्याप्त न हो । परमेश्वर भगवान् विष्णुके उस रूपको देखकर उनके तेजसे तिरस्कृत हो देवता, दानव और मानव
सभी मोहित हो गये ।
बलिर्बद्धोऽभिमानी च यज्ञवाटे महात्मना ॥
विरोचनकुलं सर्वं पाताले विनिपातितम् ॥
अभिमानी राजा बलिको भगवान्ने यज्ञमण्डपमें ही बाँध लिया और विरोचनके समस्त कुलको स्वर्गसे पातालमें भेज दिया ।
एवंविधानि कर्माणि कृत्वा गरुडवाहनः ।
न विस्मयमुपागच्छत् पारमेष्ठ्येन तेजसा ॥
गरुडवाहन भगवान् विष्णुको अपने परमेश्वरीय तेजसे उपर्युक्त कर्म करके भी अहंकार नहीं हुआ ।
स सर्वममरैश्वर्यं सम्प्रदाय शचीपतेः ।
त्रैलोक्यं च ददौ शक्रे विष्णुर्दानवसूदनः ॥
दानवसूदन श्रीविष्णुने शचीपति इन्द्रको समस्त देवताओंका आधिपत्य देकर त्रिलोकीका राज्य भी उन्हें दे दिया ।
एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मनः ।
वेदविद्भिर्द्विजैरेतत् कथ्यते वैष्णवं यशः ॥
मानुषेषु यथा विष्णोः प्रादुर्भावं तथा शृणु ॥
इस प्रकार परमात्मा श्रीहरिके वामन अवतारका वृत्तान्त संक्षेपसे तुम्हें बताया गया । वेदवेत्ता ब्राह्मण भगवान् विष्णुके इस सुयशका वर्णन करते हैं । युधिष्ठिर! अब तुम मनुष्योंमें श्रीहरिके जो अवतार हुए हैं, उनका वृत्तान्त सुनो ।
विष्णोः पुनर्महाराज प्रादुर्भावो महात्मनः ।
दत्तात्रेय इति ख्यात ऋषिरासीन्महायशाः ॥
महाराज! अब मैं पुनः भगवान् विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन करता हूँ । दत्तात्रेयजी महान् यशस्वी महर्षि थे ।
तेन नष्टेषु वेदेषु क्रियासु च मखेषु च ।
चातुर्वर्ण्ये च संकीर्णे धर्मे शिथिलतां गते ॥
अभिवर्धति चाधर्मे सत्ये नष्टे स्थितेऽनृते ।
प्रजासु क्षीयमाणासु धर्मे चाकुलतां गते ॥
सयज्ञाः सक्रिया वेदाः प्रत्यानीताश्च तेन वै ।
चातुर्वर्ण्यमसंकीर्णं कृतं तेन महात्मना ॥
स एव वै यदा प्रादाद्धैहयाधिपतेर्वरम् ।
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तं हैहयानामधिपस्त्वर्जुनोऽभिप्रसादयत् ॥ एक समयकी बात है, सारे वेद नष्ट- से हो गये । वैदिक कर्मों और यज्ञ- यागादिकोंका लोप हो गया । चारों वर्ण एकमें मिल गये और सर्वत्र वर्णसंकरता फैल गयी । धर्म शिथिल हो गया एवं अधर्म दिनोदिन बढ़ने लगा । सत्य दब गया और सब ओर असत्यने सिक्का जमा लिया । प्रजा क्षीण होने लगी और धर्मको अधर्मद्वारा हर तरहसे पीड़ा ( हानि ) पहुँचने लगी । ऐसे समयमें महात्मा दत्तात्रेयने यज्ञ और कर्मानुष्ठानकी विधिसहित सम्पूर्ण वेदोंका पुनरुद्धार किया और पुनः चारों वर्णोंको पृथक् पृथक् अपनी- अपनी मर्यादामें स्थापित किया । इन्होंने ही हैहयराज अर्जुनको वर प्रदान किया था । हैहयराज अर्जुनने अपनी सेवाओंद्वारा दत्तात्रेयजीको प्रसन्न कर लिया था ।
वने पर्यचरत् सम्यक् शुश्रूषुरनसूयकः ।
निर्ममो निरहंकारो दीर्घकालमतोषयत् ॥
आराध्य दत्तात्रेयं हि अगृह्णात् स वरानिमान् ।
आप्तादाप्ततराद् विप्राद् विद्वान् विद्वन्निषेवितात् ॥
ऋतेऽमरत्वं विप्रेण दत्तात्रेयेण धीमता ।
वरैश्चतुर्भिः प्रवृत इमांस्तत्राभ्यनन्दत ॥
वह अच्छी तरह सेवामें संलग्न हो वनमें मुनिवर दत्तात्रेयकी परिचर्यामें लगा रहता था । उसने दूसरोंका दोष देखना छोड़ दिया था । वह ममता और अहंकारसे रहित था । उसने दीर्घकालतक दत्तात्रेयजीकी आराधना करके उन्हें संतुष्ट किया। दत्तात्रेयजी आप्त पुरुषोंसे भी बढ़कर आप्त पुरुष थे । बड़े -बड़े विद्वान् उनकी सेवामें रहते थे । विद्वान् सहस्रबाहु अर्जुनने उन ब्रह्मर्षिसे ये निम्नांकित वर प्राप्त किये । अमरत्व छोड़कर उसके माँगे हुए सभी वर विद्वान् ब्राह्मण दत्तात्रेयजीने दे दिये । उसने चार वरोंके लिये महर्षिसे प्रार्थना की थी और उन चारोंका ही महर्षिने अभिनन्दन किया था ।
श्रीमान् मनस्वी बलवान् सत्यवागनसूयकः ।
सहस्रबाहुर्भूयासमेष मे प्रथमो वरः ॥
जरायुजाण्डजं सर्वं सर्वं चैव चराचरम् ।
प्रशास्तुमिच्छे धर्मेण द्वितीयस्त्वेष मे वरः ॥
( वे वर इस प्रकार हैं- हैहयराज बोला — ) ' मैं श्रीमान्, मनस्वी, बलवान्, सत्यवादी, अदोषदर्शी तथा सहस्रभुजाओंसे विभूषित होऊँ, यह मेरे लिये पहला वर है । ' मैं जरायुज और अण्डज जीवोंके साथ - साथ समस्त चराचर जगत्का धर्मपूर्वक शासन करना चाहता हूँ' – मेरे लिये दूसरा वर यही हो ।
पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् यजेयं विपुलैर्मखैः ।
अमित्रान् निशितैर्बाणैर्घातयेयं रणाजिरे ॥
दत्तात्रेयेह भगवंस्तृतीयो वर एष मे ।
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यस्य नासीन्न भविता न चास्ति सदृशः पुमान् ॥ इह वा दिवि वा लोके स मे हन्ता भवेदिति ॥ ‘ मैं अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा ब्राह्मण अतिथियोंका यजन करूँ और जो लोग मेरे शत्रु हैं, उन्हें समरांगणमें तीखे बाणोंद्वारा मारकर यमलोक पहुँचा दूँ । ' भगवन् दत्तात्रेय! मेरे लिये यही तीसरा वर हो। 'जिसके समान इहलोक या स्वर्गलोकमें कोई पुरुष न था, न है और न होगा ही, वही मेरा वध करनेवाला हो ' ( यह मेरे लिये चौथा वर हो ) ।
सोऽर्जुनः कृतवीर्यस्य वरः पुत्रोऽभवद् युधि ।
स सहस्रं सहस्राणां माहिष्मत्यामवर्धत ॥
वह अर्जुन राजा कृतवीर्यका ज्येष्ठ पुत्र था और युद्धमें महान् शौर्यका परिचय देता था । उसने माहिष्मती नगरीमें दस लाख वर्षोंतक निरन्तर अभ्युदयशील होकर राज्य किया ।
पृथिवीमखिलां जित्वा द्वीपांश्चापि समुद्रिणः ।
नभसीव ज्वलन् सूर्यः पुण्यैः कर्मभिरर्जुनः ॥
जैसे आकाशमें सूर्यदेव सदा प्रकाशमान होते हैं, उसी प्रकार कार्तवीर्य अर्जुन सारी पृथ्वी और समुद्री द्वीपोंको जीतकर इस भूतलपर अपने पुण्यकर्मोंसे प्रकाशित हो रहा था ।
इन्द्रद्वीपं कशेरुं च ताम्रद्वीपं गभस्तिमत् ।
गान्धर्वं वारुणं द्वीपं सौम्याक्षमिति च प्रभुः ॥
पूर्वैरजितपूर्वांश्च द्वीपानजयदर्जुनः ॥
सौवर्णं सर्वमप्यासीद् विमानवरमुत्तमम् ।
चतुर्धाव्यभजद् राष्ट्रं तद् विभज्यान्वपालयत् ॥
शक्तिशाली सहस्रबाहुने इन्द्रद्वीप, कशेरुद्वीप, ताम्रद्वीप, गभस्तिमान् द्वीप, गन्धर्वद्वीप, वरुणद्वीप और सौम्याक्षद्वीपको, जिन्हें उसके पूर्वजोंने भी नहीं जीता था, जीतकर अपने अधिकारमें कर लिया । उसका श्रेष्ठ राजभवन बहुत ही सुन्दर और सारा - का- सारा सुवर्णमय था । उसने अपने राज्यकी आयको चार भागोंमें बाँट रखा था और इस विभाजनके अनुसार ही वह प्रजाका पालन करता था ।
एकांशेनाहरत् सेनामेकांशेनावसद् गृहान् ।
यस्तु तस्य तृतीयांशो राजाऽऽसीज्जनसंग्रहे ॥
आप्तः परमकल्याणस्तेन यज्ञानकल्पयत् ॥
वह उस आयके एक अंशके द्वारा सेनाका संग्रह और संरक्षण करता था, दूसरे अंशके द्वारा गृहस्थीका खर्च चलाता था तथा उसका जो तीसरा अंश था, उसके द्वारा राजा अर्जुन प्रजाजनोंकी भलाईके लिये यज्ञोंका अनुष्ठान करता था । वह सबका विश्वासपात्र और परम कल्याणकारी था । ये दस्यवो ग्रामचरा अरण्ये च वसन्ति ये ।
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चतुर्थेन च सोंऽशेन तान् सर्वान् प्रत्यषेधयत् ॥
सर्वेभ्यश्चान्तवासिभ्यः कार्तवीर्योऽहरद् बलिम् ।
आहृतं स्वबलैर्यत् तदर्जुनश्चाभिमन्यते ॥
काको वा मूषिको वापि तं तमेव न्यबर्हयत् ।
द्वाराणि नापिधीयन्ते राष्ट्रेषु नगरेषु च ॥
वह राजकीय आयके चौथे अंशके द्वारा गाँवों और जंगलोंमें डाकुओं और लुटेरोंको शासनपूर्वक रोकता था । कृतवीर्यकुमार अर्जुन उसी धनको अच्छा मानता था, जिसे उसने अपने बल - पराक्रमद्वारा प्राप्त किया हो । काक या मूषकवृत्तिसे जो लोग प्रजाके धनका अपहरण करते थे, उन सबको वह नष्ट कर देता था । उसके राज्यके भीतर गाँवों तथा नगरोंमें घरके दरवाजे बंद नहीं किये जाते थे ।
स एव राष्ट्रपालोऽभूत् स्त्रीपालोऽभवदर्जुनः ।
स एवासीदजापालः स गोपालो विशाम्पते ॥
राजन्! कार्तवीर्य अर्जुन ही समूचे राष्ट्रका पोषक, स्त्रियोंका संरक्षक, बकरियोंकी रक्षा करनेवाला तथा गौओंका पालक था ।
स स्मारण्ये मनुष्याणां राजा क्षेत्राणि रक्षति ।
इदं तु कार्तवीर्यस्य बभूवासदृशं जनैः ॥
वही जंगलोंमें मनुष्योंके खेतोंकी रक्षा करता था । यह है कार्तवीर्यका अद्भुत कार्य, जिसकी मनुष्योंसे तुलना नहीं हो सकती ।
न पूर्वे नापरे तस्य गमिष्यन्ति गतिं नृपाः ।
यदर्णवे प्रयातस्य वस्त्रं न परिषिच्यते ॥
शतं वर्षसहस्राणामनुशिष्यार्जुनो महीम् ।
दत्तात्रेयप्रसादेन एवं राज्यं चकार सः ॥
न पहलेका कोई राजा कार्तवीर्यकी किसी महत्ताको प्राप्त कर सका और न भविष्यमें ही कोई प्राप्त कर सकेगा । वह जब समुद्रमें चलता था, तब उसका वस्त्र नहीं भीगता था । राजा अर्जुन दत्तात्रेयजीके कृपाप्रसादसे लाखों वर्षतक पृथ्वीपर शासन करते हुए इस प्रकार राज्यका पालन करता रहा ।
एवं बहूनि कर्माणि चक्रे लोकहिताय सः ।
दत्तात्रेय इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥
कथितो भरतश्रेष्ठ शृणु भूयो महात्मनः ॥
यदा भृगुकुले जन्म यदर्थं च महात्मनः ।
जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णवः ॥
इस प्रकार उसने लोकहितके लिये बहुत से कार्य किये । भरतश्रेष्ठ! यह मैंने भगवान् विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन किया । अब पुनः उन महात्माके अन्य अवतारका
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वर्णन सुनो । भगवान्का वह अवतार जामदग्न्य ( परशुराम ) - के नामसे विख्यात है । उन्होंने किसलिये और कब भृगुकुलमें अवतार ग्रहण किया, वह प्रसंग बतलाता हूँ; सुनो ।
जगदग्निसुतो राजन् रामो नाम स वीर्यवान् ।
हैहयान्तकरो राजन् स रामो बलिनां वरः ॥
कार्तवीर्यो महावीर्यो बलेनाप्रतिमस्तथा ।
रामेण जामदग्न्येन हतो विषममाचरन् ॥
महाराज युधिष्ठिर! महर्षि जमदग्निके पुत्र परशुराम बड़े पराक्रमी हुए हैं । बलवानोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने ही हैहयवंशका संहार किया था । महापराक्रमी कार्तवीर्य अर्जुन बलमें अपना सानी नहीं रखता था; किंतु अपने अनुचित बर्तावके कारण जमदग्निनन्दन परशुरामके द्वारा मारा गया ।
तं कार्तवीर्यं राजानं हैहयानामरिंदमम् ।
रथस्थं पार्थिवं रामः पातयित्वावधीद् रणे ॥
शत्रुसूदन हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन रथपर बैठा था, परंतु युद्धमें परशुरामजीने उसे नीचे गिराकर मार डाला ।
जम्भस्य मूर्ध्नि भेत्ता च हन्ता च शतदुन्दुभेः ।
स एष कृष्णो गोविन्दो जातो भृगुषु वीर्यवान् ॥
सहस्रबाहुमुद्धर्तुं सहस्रजितमाहवे ॥
क्षत्रियाणां चतुष्षष्टिमयुतानां महायशाः ।
सरस्वत्यां समेतानि एष वै धनुषाजयत् ॥
ब्रह्मद्विषां वधे तस्मिन् सहस्राणि चतुर्दश ।
पुनर्जग्राह शूराणामन्तं चक्रे नरर्षभः ॥
ततो दशसहस्रस्य हन्ता पूर्वमरिंदमः ।
सहस्रं मुसलेनाहन् सहस्रमुदकृन्तत ॥
ये भगवान् गोविन्द ही पराक्रमी परशुरामरूपसे भृगुवंशमें अवतीर्ण हुए । ये ही जम्भासुरका मस्तक विदीर्ण करनेवाले तथा शतदुन्दुभिके घातक हैं । इन्होंने सहस्रोंपर विजय पानेवाले सहस्रबाहु अर्जुनका युद्धमें संहार करनेके लिये ही अवतार लिया था । महायशस्वी परशुरामने केवल धनुषकी सहायतासे सरस्वती नदीके तटपर एकत्रित हुए छ: लाख चालीस हजार क्षत्रियोंपर विजय पायी थी । वे सभी क्षत्रिय ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले थे । उनका वध करते समय नरश्रेष्ठ परशुरामने और भी चौदह हजार शूरवीरोंका अन्त कर डाला । तदनन्तर शत्रुदमन रामने दस हजार क्षत्रियोंका और वध किया। इसके बाद उन्होंने हजारों वीरोंको मूसलसे मारकर यमलोक पहुँचा दिया तथा सहस्रोंको फरसेसे काट डाला ।
चतुर्दश सहस्राणि क्षणमात्रमपातयत् ।
शिष्टान् ब्रह्मद्विषश्छित्त्वा ततोऽस्नायत भार्गवः ॥
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राम रामेत्यभिक्रुष्टो ब्राह्मणैः क्षत्रियार्दितैः ।
न्यघ्नद् दशसहस्राणि रामः परशुनाभिभूः ॥
भृगुनन्दन परशुरामने चौदह हजार क्षत्रियोंको क्षणमात्रमें मार गिराया तथा शेष ब्रह्मद्रोहियोंका भी मूलोच्छेद करके स्नान किया । क्षत्रियोंसे पीड़ित होकर ब्राह्मणोंने ‘ राम-राम' कहकर आर्तनाद किया था, इसीलिये सर्वविजयी परशुरामने पुनः फरसेसे दस हजार क्षत्रियोंका अन्त किया ।
नामृष्यत तां वाचमार्तेर्भृशमुदीरिताम् ।
भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजातयः ॥
जिस समय द्विजलोग ' भृगुनन्दन परशुराम! दौड़ो, बचाओ ' इत्यादि बातें कहकर करुणक्रन्दन करते, उस समय उन पीड़ितोंद्वारा कही हुई वह आर्तवाणी परशुरामजी नहीं सहन कर सके ।
काश्मीरान् दरदान् कुन्तीन् क्षुद्रकान् मालवाञ्छकान् ।
चेदिकाशिकरूषांश्च ऋषिकान् क्रथकैशिकान् ॥
अङ्गान् बङ्गान् कलिङ्गांश्च मागधान् काशिकोसलान् ।
रात्रायणान् वीतिहोत्रान् किरातान् मार्तिकावतान् ॥
एतानन्यांश्च राजेन्द्रान् देशे देशे सहस्रशः ।
निकृत्त्य निशितैर्बाणैः सम्प्रदाय विवस्वते ॥
उन्होंने काश्मीर, दरद, कुन्तिभोज, क्षुद्रक, मालव, शक, चेदि, काशि, करूष, ऋषिक, क्रथ, कैशिक, अंग, वंग, कलिंग, मागध, काशी, कोसल, रात्रायण, वीतिहोत्र, किरात तथा मार्तिकावत — इनको तथा अन्य सहस्रों राजेश्वरोंको प्रत्येक देशमें तीखे बाणोंसे मारकर यमराजके भेंट कर दिया ।
कीर्णा क्षत्रियकोटीभिः मेरुमन्दरभूषणा ।
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥
मेरु और मन्दर पर्वत जिसके आभूषण हैं, वह पृथ्वी करोड़ों क्षत्रियोंकी लाशोंसे पट गयी । एक- दो बार नहीं, इक्कीस बार परशुरामने यह पृथ्वी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी ।
एवमिष्ट्वा महाबाहुः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
अन्यद् वर्षशतं रामः सौभे शाल्वमयोधयत् ॥
ततः स भृगुशार्दूलस्तं सौभं योधयन् प्रभुः ।
सुबन्धुरं रथं राजन्नास्थाय भरतर्षभ ॥
नग्निकानां कुमारीणां गायन्तीनामुपाशृणोत् । तदनन्तर महाबाहु परशुरामने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके सौ वर्षोंतक सौभ नामक विमानपर बैठे हुए राजा शाल्वके साथ युद्ध किया । भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर!