श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1901–1910

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1901–1910

पृष्ठ 1901

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तदनन्तर सुन्दर रथपर बैठकर सौभ विमानके साथ युद्ध करनेवाले शक्तिशाली वीर भृगुश्रेष्ठ परशुरामने गीत गाती हुई नग्निका- कुमारियोंके मुखसे यह सुना- राम राम महाबाहो भृगूणां कीर्तिवर्धन | त्यज शस्त्राणि सर्वाणि न त्वं सौभं वधिष्यसि ॥

चक्रहस्तो गदापाणिर्भीतानामभयंकरः ।

युधि प्रद्युम्नसाम्बाभ्यां कृष्णः सौभं वधिष्यति ॥

‘ राम! राम! महाबाहो! तुम भृगुवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाले हो; अपने सारे अस्त्र - शस्त्र नीचे डाल दो । तुम सौभ विमानका नाश नहीं कर सकोगे । भयभीतोंको अभय देनेवाले चक्रधारी गदापाणि भगवान् श्रीविष्णु प्रद्युम्न और साम्बको साथ लेकर युद्धमें सौभ विमानका नाश करेंगे' ।

तच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रस्तत एव वनं ययौ ।

न्यस्य सर्वाणि शस्त्राणि कालकाङ्क्षी महायशाः ॥

रथं वर्मायुधं चैव शरान् परशुमेव च ।

धनूंष्यप्सु प्रतिष्ठाप्य राजंस्तेपे परं तपः ॥

यह सुनकर पुरुषसिंह परशुराम उसी समय वनको चल दिये । राजन्! वे महायशस्वी मुनि कृष्णावतारके समयकी प्रतीक्षा करते हुए अपने सारे अस्त्र- शस्त्र, रथ, कवच, आयुध बाण, परशु और धनुष जलमें डालकर बड़ी भारी तपस्यामें लग गये ।

ह्रियं प्रज्ञां श्रियं कीर्तिं लक्ष्मीं चामित्रकर्शनः ।

पञ्चाधिष्ठाय धर्मात्मा तं रथं विससर्ज ह ॥

शत्रुओंका नाश करनेवाले धर्मात्मा परशुरामने लज्जा, प्रज्ञा, श्री, कीर्ति और लक्ष्मी– इन पाँचोंका आश्रय लेकर अपने पूर्वोक्त रथको त्याग दिया ।

आदिकाले प्रवृत्तं हि विभजन् कालमीश्वरः ।

नाहनच्छ्रद्धया सौभं न ह्यशक्तो महायशाः ॥

जामदग्न्य इति ख्यातो यस्त्वसौ भगवानृषिः ।

सोऽस्य भागस्तपस्तेपे भार्गवो लोकविश्रुतः ॥

शृणु राजंस्तथा विष्णोः प्रादुर्भावं महात्मनः ।

चतुर्विशे युगे चापि विश्वामित्रपुरःसरः ॥

आदिकालमें जिसकी प्रवृत्ति हुई थी, उस कालका विभाग करके भगवान् परशुरामने कुमारियोंकी बातपर श्रद्धा होनेके कारण ही सौभ विमानका नाश नहीं किया, असमर्थताके कारण नहीं । जमदग्निनन्दन परशुरामके नामसे विख्यात वे महर्षि, जो विश्वविदित ऐश्वर्यशाली महर्षि हैं, वे इन्हीं श्रीकृष्णके अंश हैं, जो इस समय तपस्या कर रहे हैं । राजन्! अब महात्मा भगवान् विष्णुके साक्षात् स्वरूप श्रीरामके अवतारका वर्णन सुनो, जो विश्वामित्र मुनिको आगे करके चलनेवाले थे ।

पृष्ठ 1902

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तिथौ नावमिके जज्ञे तथा दशरथादपि ।

कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा विष्णुरव्ययः ॥

चैत्रमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको अविनाशी भगवान् महाबाहु विष्णुने अपने-आपको चार स्वरूपोंमें विभक्त करके महाराज दशरथके सकाशसे अवतार ग्रहण किया था ।

लोके राम इति ख्यातस्तेजसा भास्करोपमः ।

प्रसादनार्थं लोकस्य विष्णुस्तस्य सनातनः ॥

धर्मार्थमेव कौन्तेय जज्ञे तत्र महायशाः । वे भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी राजकुमार लोकमें श्रीरामके नामसे विख्यात हुए । कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! जगत्‌को प्रसन्न करने तथा धर्मकी स्थापनाके लिये ही महायशस्वी

सनातन भगवान् विष्णु वहाँ प्रकट हुए थे ।

तमप्याहुर्मनुष्येन्द्रं सर्वभूतपतेस्तनुम् ॥

यज्ञविघ्नं तदा कृत्वा विश्वामित्रस्य भारत ।

सुबाहुर्निहतस्तेन मारीचस्ताडितो भृशम् ॥

मनुष्योंके स्वामी भगवान् श्रीरामको साक्षात् सर्वभूतपति श्रीहरिका ही स्वरूप बतलाया जाता है । भारत! उस समय विश्वामित्रके यज्ञमें विघ्न डालनेके कारण राक्षस सुबाहु श्रीरामचन्द्रजीके हाथों मारा गया और मारीच नामक राक्षसको भी बड़ी चोट पहुँची ।

तस्मै दत्तानि शस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता ।

वधार्थं देवशत्रूणां दुर्वाराणि सुरैरपि ॥

परम बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनिने देवशत्रु राक्षसोंका वध करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीको ऐसे - ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनका निवारण करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था ।

वर्तमाने तदा यज्ञे जनकस्य महात्मनः ।

भग्नं माहेश्वरं चापं क्रीडता लीलया परम् ॥

ततो विवाहं सीतायाः कृत्वा स रघुवल्लभः ।

नगरीं पुनरासाद्य मुमुदे तत्र सीतया ॥

उन्हीं दिनों महात्मा जनकके यहाँ धनुषयज्ञ हो रहा था, उसमें श्रीरामने भगवान् शंकरके महान् धनुषको खेल- खेलमें ही तोड़ डाला। तदनन्तर सीताजीके साथ विवाह करके रघुनाथजी अयोध्यापुरीमें लौट आये और वहाँ सीताजीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ।

कस्यचित् त्वथ कालस्य पित्रा तत्राभिचोदितः ।

कैकेय्याः प्रियमन्विच्छन् वनमभ्यवपद्यत ॥

पृष्ठ 1903

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कुछ कालके पश्चात् पिताकी आज्ञा पाकर वे अपनी विमाता महारानी कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे वनमें चले गये ।

यः समाः सर्वधर्मज्ञश्चतुर्दश वने वसन् ।

लक्ष्मणानुचरो रामः सर्वभूतहिते रतः ॥

चतुर्दश वने तप्त्वा तपो वर्षाणि भारत ।

रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेत्यभिहिता जनैः ॥

वहाँ सब धर्मोंके ज्ञाता और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणके साथ चौदह वर्षोंतक वनमें निवास किया । भरतवंशी राजन्! चौदह वर्षोंतक उन्होंने वनमें तपस्यापूर्वक जीवन बिताया । उनके साथ उनकी अत्यन्त रूपवती धर्मपत्नी भी थीं, जिन्हें लोग सीता कहते थे ।

पूर्वोचितत्वात् सा लक्ष्मीर्भर्तारमनुगच्छति ।

जनस्थाने वसन् कार्यं त्रिदशानां चकार सः ॥

मारीचं दूषणं हत्वा खरं त्रिशिरसं तथा ।

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां घोरकर्मणाम् ॥

जघान रामो धर्मात्मा प्रजानां हितकाम्यया । अवतारके पहले श्रीविष्णुरूपमें रहते समय भगवान्के साथ उनकी जो योग्यतमा भार्या लक्ष्मी रहा करती हैं, उन्होंने ही उपयुक्त होनेके कारण श्रीरामावतारके समय सीताके रूपमें अवतीर्ण हो अपने पतिदेवका अनुसरण किया था । भगवान् श्रीराम जनस्थानमें रहकर देवताओंके कार्य सिद्ध करते थे । धर्मात्मा श्रीरामने प्रजाजनोंके हितकी कामनासे भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंका वध किया । जिनमें मारीच, खर-दूषण और त्रिशिरा

आदि प्रधान थे ।

विराधं च कबन्धं च राक्षसौ क्रूरकर्मिणौ ॥

जघान च तदा रामो गन्धर्वो शापविक्षतौ ॥

उन्हीं दिनों दो शापग्रस्त गन्धर्व क्रूरकर्मा राक्षसोंके रूपमें वहाँ रहते थे, जिनके नाम विराध और कबन्ध थे । श्रीरामने उन दोनोंका भी संहार कर डाला ।

स रावणस्य भगिनीनासाच्छेदं चकार ह ।

भार्यावियोगं तं प्राप्य मृगयन् व्यचरद् वनम् ॥

ततस्तमृष्यमूकं स गत्वा पम्पामतीत्य च ।

सुग्रीवं मारुतिं दृष्ट्वा चक्रे मैत्रीं तयोः स वै ॥

उन्होंने रावणकी बहिन शूर्पणखाकी नाक भी लक्ष्मणके द्वारा कटवा दी; इसीके कारण ( राक्षसोंके षड्यन्त्रसे ) उन्हें पत्नीका वियोग देखना पड़ा। तब वे सीताकी खोज करते हुए वनमें विचरने लगे । तदनन्तर ऋष्यमूक पर्वतपर जा पम्पासरोवरको लाँघकर श्रीरामजी सुग्रीव और हनुमान्जीसे मिले और उन दोनोंके साथ उन्होंने मैत्री स्थापित कर ली ।

पृष्ठ 1904

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अथ गत्वा स किष्किन्धां सुग्रीवेण तदा सह ।

निहत्य वालिनं युद्धे वानरेन्द्रं महाबलम् ॥

अभ्यषिञ्चत् तदा रामः सुग्रीवं वानरेश्वरम् ।

ततः स वीर्यवान् राजंस्त्वरयन् वै समुत्सुकः ।

विचित्य वायुपुत्रेण लङ्कादेशं निवेदितम् ॥

तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवके साथ किष्किन्धामें जाकर महाबली वानरराज बालीको युद्धमें मारा और सुग्रीवको वानरोंके राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया । राजन्! तदनन्तर पराक्रमी श्रीराम सीताजीके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ उनकी खोज कराने लगे । वायुपुत्र हनुमानजीने पता लगाकर यह बतलाया कि सीताजी लंकामें हैं ।

सेतुं बद्ध्वा समुद्रस्य वानरैः सहितस्तदा ।

सीतायाः पदमन्विच्छन् रामो लङ्कां विवेश ह ॥

तब समुद्रपर पुल बाँधकर वानरोंसहित श्रीरामने सीताजीके स्थानका पता लगाते हुए लंकामें प्रवेश किया ।

देवोरगगणानां हि यक्षराक्षसपक्षिणाम् ।

तत्रावध्यं राक्षसेन्द्रं रावणं युधि दुर्जयम् ॥

युक्तं राक्षसकोटीभिर्भिन्नाञ्जनचयोपमम् । वहाँ देवता, नागगण, यक्ष, राक्षस तथा पक्षियोंके लिये अवध्य और युद्धमें दुर्जय राक्षसराज रावण करोड़ों राक्षसोंके साथ रहता था । वह देखनेमें खानसे खोदकर निकाले हुए कोयलेके ढेरके समान जान पड़ता था । दुर्निरीक्ष्यं सुरगणैर्वरदानेन दर्पितम् ।

जघान सचिवैः सार्धं सान्वयं रावणं रणे ।

त्रैलोक्यकण्टकं वीरं महाकायं महाबलम् ॥

रावणं सगणं हत्वा रामो भूतपतिः पुरा ॥

लङ्कायां तं महात्मानं राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।

अभिषिच्य च तत्रैव अमरत्वं ददौ तदा ॥

देवताओंके लिये उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी कठिन था । ब्रह्माजीसे वरदान मिलनेसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया था । श्रीरामने त्रिलोकीके लिये कण्टकरूप महाबली विशालकाय वीर रावणको उसके मन्त्रियों और वंशजोंसहित युद्धमें मार डाला । इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीरघुनाथजीने प्राचीन कालमें रावणको सेवकोंसहित मारकर लंकाके राज्यपर राक्षसपति महात्मा विभीषणका अभिषेक करके उन्हें वहीं अमरत्व प्रदान किया ।

आरुह्य पुष्पकं रामः सीतामादाय पाण्डव ।

सबलः स्वपुरं गत्वा धर्मराज्यमपालयत् ॥

पृष्ठ 1905

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दानवो लवणो नाम मधोः पुत्रो महाबलः ।

शत्रुघ्नेन हतो राजंस्ततो रामस्य शासनात् ॥

पाण्डुनन्दन! तत्पश्चात् श्रीरामने पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो सीताको साथ ले दलबलसहित अपनी राजधानीमें जाकर धर्मपूर्वक राज्यका पालन किया । राजन्! उन्हीं दिनों मथुरामें मधुका पुत्र लवण नामक दानव राज्य करता था, जिसे रामचन्द्रजीकी आज्ञासे शत्रुघ्नने मार डाला ।

एवं बहूनि कर्माणि कृत्वा लोकहिताय सः ।

राज्यं चकार विधिवद् रामो धर्मभृतां वरः ॥

इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने लोकहितके लिये बहुत से कार्य करके

विधिपूर्वक राज्यका पालन किया ।

दशाश्वमेधानाजह्रे जारुधिस्थान् निरर्गलान् ॥

नाश्रूयन्ताशुभा वाचो नात्ययः प्राणिनां तदा ।

न वित्तजं भयं चासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥

प्राणिनां च भयं नासीज्जलानलविधानजम् ।

पर्यदेवन्न विधवा नानाथाः काश्चनाभवन् ॥

उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया और सरयूतटके जारुधिप्रदेशको विघ्न-बाधाओंसे रहित कर दिया । श्रीरामचन्द्रजीके शासनकालमें कभी कोई अमंगल की बात नहीं सुनी गयी । उस समय प्राणियोंकी अकालमृत्यु नहीं होती थी और किसीको भी धनकी रक्षा आदिके निमित्त भय नहीं प्राप्त होता था । संसारके जीवोंको जल और अग्नि आदिसे भी भय नहीं होता था । विधवाओंका करुण क्रन्दन नहीं सुना जाता था तथा स्त्रियाँ अनाथ नहीं होती थीं ।

सर्वमासीत् तदा तृप्तं रामे राज्यं प्रशासति ।

न संकरकरा वर्णा नाकृष्टकरकृज्जनः ॥

श्रीरामचन्द्रजीके राज्यशासनकालमें सम्पूर्ण जगत् संतुष्ट था । किसी भी वर्णके लोग वर्णसंकर संतान नहीं उत्पन्न करते थे । कोई भी मनुष्य ऐसी जमीनके लिये कर नहीं देता

था, जो जोतने - बोनेके काममें न आती हो ।

न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥

विशः पर्यचरन् क्षत्रं क्षत्रं नापीडयद् विशः ।

नरा नात्यचरन् भार्या भार्या नात्यचरन् पतीन् ॥

नासीदल्पकृषिर्लोके रामे राज्यं प्रशासति ।

आसन् वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः ।

अरोगाः प्राणिनोऽप्यासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥

पृष्ठ 1906

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बूढ़ेलोग बालकोंका अन्त्येष्टि- संस्कार नहीं करते थे ( उनके सामने ऐसा अवसर ही नहीं आता था ) । वैश्यलोग क्षत्रियोंकी परिचर्या करते थे और क्षत्रियलोग भी वैश्योंको कष्ट नहीं होने देते थे । पुरुष अपनी पत्नियोंकी अवहेलना नहीं करते थे और पत्नियाँ भी पतियोंकी अवहेलना नहीं करती थीं । श्रीरामचन्द्रजीके राज्य शासन करते समय लोकमें खेतीकी उपज कम नहीं होती थी । लोग सहस्र पुत्रोंसे युक्त होकर सहस्रों वर्षोंतक जीवित रहते थे । श्रीरामके राज्य - शासनकालमें सब प्राणी नीरोग थे ।

ऋषीणां देवतानां च मनुष्याणां तथैव च ।

पृथिव्यां सहवासोऽभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥

सर्वे ह्यासंस्तृप्तरूपास्तदा तस्मिन् विशाम्पते ।

धर्मेण पृथिवीं सर्वामनुशासति भूमिपे ॥

श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें इस पृथ्वीपर ऋषि, देवता और मनुष्य साथ-साथ रहते थे । राजन्! भूमिपाल श्रीरघुनाथजी जिन दिनों सारी पृथ्वीका शासन करते थे, उस समय उनके राज्यमें सब लोग पूर्णतः तृप्तिका अनुभव करते थे ।

तपस्येवाभवन् सर्वे सर्वे धर्ममनुव्रताः ।

पृथिव्यां धार्मिके तस्मिन् रामे राज्यं प्रशासति ॥

धर्मात्मा राजा रामके राज्यमें पृथ्वीपर सब लोग तपस्यामें ही लगे रहते थे और सब - के-सब धर्मानुरागी थे ।

नाधर्मिष्ठो नरः कश्चिद् बभूव प्राणिनां क्वचित् ।

प्राणापानौ समावास्तां रामे राज्यं प्रशासति ॥

श्रीरामके राज्य- शासनकालमें कोई भी मनुष्य अधर्ममें प्रवृत्त नहीं होता था । सबके प्राण और अपान समवृत्तिमें स्थित थे ।

गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ।

श्यामो'युवा लोहिताक्षो मातङ्गानामिवर्षभः ॥

आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाबलः ।

दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च ॥

राज्यं भोगं च सम्प्राप्य शशास पृथिवीमिमाम् । जो पुराणवेत्ता विद्वान् हैं, वे इस विषयमें निम्नांकित गाथा गाया करते हैं — ‘ भगवान् श्रीरामकी अंगकान्ति श्याम है, युवावस्था है, उनके नेत्रोंमें कुछ- कुछ लाली है । वे गजराज-जैसे पराक्रमी हैं । उनकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी हैं । मुख बहुत सुन्दर है । कंधे सिंहके समान हैं और वे महान् बलशाली हैं । उन्होंने राज्य और भोग पाकर ग्यारह हजार वर्षोंतक इस

पृथ्वीका शासन किया ।

रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः ॥

रामभूतं जगदिदं रामे राज्यं प्रशासति ।

पृष्ठ 1907

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ऋग्यजुःसामहीनाश्च न तदासन् द्विजातयः ॥ प्रजाजनोंमें ‘ राम राम राम ' इस प्रकार केवल रामकी ही चर्चा होती थी । रामके राज्य-शासनकालमें यह सारा जगत् राममय हो रहा था । उस समयके द्विज ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके ज्ञानसे शून्य नहीं थे ।

उषित्वा दण्डके कार्यं त्रिदशानां चकार सः ।

पूर्वापकारिणं संख्ये पौलस्त्यं मनुजर्षभः ॥

देवगन्धर्वनागानामरिं स निजघान ह ।

सत्त्ववान् गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा ॥

एवमेव महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलवर्धनः ॥

इस प्रकार मनुष्योंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें निवास करके देवताओंका कार्य सिद्ध किया और पहलेके अपराधी पुलस्त्यनन्दन रावणको, जो देवताओं, गन्धर्वों और नागोंका शत्रु था, युद्धमें मार गिराया । इक्ष्वाकुकुलका अभ्युदय करनेवाले महाबाहु श्रीराम महान् पराक्रमी, सर्वगुणसम्पन्न और अपने तेजसे देदीप्यमान थे । रावणं सगणं हत्वा दिवमाक्रमताभिभूः इति दाशरथेः ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥ वे इसी प्रकार सेवकोंसहित रावणका वध करके राज्यपालनके पश्चात् साकेतलोकमें पधारे । इस प्रकार परमात्मा दशरथनन्दन श्रीरामके अवतारका वर्णन किया गया ।

पृष्ठ 1908

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(कृष्णावतारः)

ततः कृष्णो महाबाहुर्भीतानामभयङ्करः ।

अष्टाविंशे युगे राजन् जज्ञे श्रीवत्सलक्षणः ॥

राजन्! तदनन्तर अब अट्ठाईसवें द्वापरमें भय- भीतोंको अभय देनेवाले श्रीवत्सविभूषित महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णके रूपमें श्रीविष्णुका अवतार हुआ है ।

पेशलश्च वदान्यश्च लोके बहुमतो नृषु ।

स्मृतिमान् देशकालज्ञः शङ्खचक्रगदासिधृक् ॥

ये इस लोकमें परम सुन्दर, उदार, मनुष्योंमें अत्यन्त सम्मानित, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न, देशकालके ज्ञाता एवं शंख, चक्र, गदा और खड्ग आदि आयुध धारण करनेवाले हैं ।

वासुदेव इति ख्यातो लोकानां हितकृत् सदा ।

वृष्णीनां च कुले जातो भूमेः प्रियचिकीर्षया ॥

वासुदेवके नामसे इनकी प्रसिद्धि है । ये सदा सब लोगोंके हितमें संलग्न रहते हैं । भूदेवीका प्रिय कार्य करनेकी इच्छासे इन्होंने वृष्णिवंशमें अवतार ग्रहण किया है ।

स नृणामभयं दाता मधुहेति स विश्रुतः ।

शकटार्जुनरामाणां किल स्थानान्यसूदयत् ॥

ये ही मनुष्योंको अभयदान करनेवाले हैं । इन्हींकी मधुसूदन नामसे प्रसिद्धि है । इन्होंने ही शकटासुर, यमलार्जुन और पूतनाके मर्मस्थानोंमें आघात करके उनका संहार किया है ।

कंसादीन् निजघानाजौ दैत्यान् मानुषविग्रहान् ।

अयं लोकहितार्थाय प्रादुर्भावो महात्मनः ॥

मनुष्य- शरीरमें प्रकट हुए कंस आदि दैत्योंको युद्धमें मार गिराया । परमात्माका यह अवतार भी लोकहितके लिये ही हुआ है ।

पृष्ठ 1909

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(कल्क्यवतारः )

कल्की विष्णुयशा नाम भूयश्चोत्पत्स्यते हरिः ।

कलेर्युगान्ते सम्प्राप्ते धर्मे शिथिलतां गते ॥

पाखण्डिनां गणानां हि वधार्थं भरतर्षभः ।

धर्मस्य च विवृद्धयर्थं विप्राणां हितकाम्यया ॥

कलियुगके अन्तमें जब धर्म शिथिल हो जायगा, उस समय भगवान् श्रीहरि पाखण्डियोंके वध तथा धर्मकी वृद्धिके लिये और ब्राह्मणोंके हितकी कामनासे पुनः अवतार लेंगे । उनके उस अवतारका नाम होगा ' कल्कि विष्णुयशा' ।

एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगणैर्युताः ।

प्रादुर्भावाः पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥

भगवान्‌के ये तथा और भी बहुत से दिव्य अवतार देवगणोंके साथ होते हैं, जिनका ब्रह्मवादी पुरुष पुराणोंमें वर्णन करते हैं । (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त ) 0 IPL

पृष्ठ 1910

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[श्रीकृष्णका प्राकट्य तथा श्रीकृष्ण - बलरामकी बाललीलाओंका वर्णन ] वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तोऽथ कौन्तेयस्ततः पौरवनन्दनः ।

आबभाषे पुनर्भीष्मं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भीष्मजीके इस प्रकार कहनेपर पूरुवंशको आनन्दित करनेवाले कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः उनसे कहा । युधिष्ठिर उवाच

भूय एव मनुष्येन्द्र उपेन्द्रस्य यशस्विनः ।

जन्म वृष्णिषु विज्ञातुमिच्छामि वदतां वर ॥

युधिष्ठिर बोले- वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेन्द्र! मैं यशस्वी भगवान् विष्णुके वृष्णिवंशमें अवतार ग्रहण करनेका वृत्तान्त पुनः ( विस्तारपूर्वक ) जानना चाहता हूँ ।

यथैव भगवाञ्जातः क्षिताविह जनार्दनः ।

माधवेषु महाबुद्धिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

पितामह! परम बुद्धिमान् भगवान् जनार्दन इस पृथ्वीपर मधुवंशमें जिस प्रकार उत्पन्न हुए, वह सब प्रसंग मुझसे कहिये ।

यदर्थं च महातेजा गास्तु गोवृषभेक्षणः ।

ररक्ष कंसस्य वधाल्लोकानामभिरक्षिता ॥

बैलके समान विशाल नेत्रोंवाले लोकरक्षक महा - तेजस्वी श्रीकृष्णने किसलिये कंसका वध करके गौओंकी रक्षा की?

क्रीडता चैव यद् बाल्ये गोविन्देन विचेष्टितम् ।

तदा मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पितामह! उस समय बाल्यावस्थामें बालकोचित क्रीड़ाएँ करते समय भगवान् गोविन्दने क्या- क्या लीलाएँ कीं? यह सब मुझे बताइये । वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्ततो भीष्मः केशवस्य महात्मनः ।

माधवेषु तदा जन्म कथयामास वीर्यवान् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर महापराक्रमी भीष्मने मधुवंशमें भगवान् केशवके अवतार लेनेकी कथा कहनी प्रारम्भ की । भीष्म उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर यथातथम् ।

यतो नारायणस्येह जन्म वृष्णिषु कौरव ॥