श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1881–1890
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1881–1890
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प्रायश्चित्तनखो धीरः पशुजानुर्महावृषः । धर्म और सत्य उनका स्वरूप था, वे अलौकिक तेजसे सम्पन्न थे । वे विभिन्न कर्मरूपी विक्रमसे सुशोभित हो रहे थे, प्रायश्चित्त उनके नख थे, वे धीर स्वभावसे युक्त थे, पशु उनके
घुटनोंके स्थानमें थे और महान् वृषभ ( धर्म ) ही उनका श्रीविग्रह था ।
औद्गात्रहोमलिङ्गोऽसौ फलबीजमहौषधिः ॥
बाह्यान्तरात्मा मन्त्रास्थिविकृतः सौम्यदर्शनः । उद्गाताका होमरूप कर्म उनका लिंग था, फल और बीज ही उनके लिये महान् औषध थे, वे बाह्य और आभ्यन्तर जगत्के आत्मा थे, वैदिक मन्त्र ही उनके शारीरिक
अस्थिविकार थे । देखनेमें उनका स्वरूप बड़ा ही सौम्य था ।
वेदिस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यादिवेगवान् ॥
प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिराचितः । यज्ञकी वेदी ही उनके कंधे, हविष्य सुगन्ध और हव्य - कव्य आदि उनके वेग थे । प्राग्वंश ( यजमानगृह एवं पत्नीशाला ) उनका शरीर कहा गया है । वे महान् तेजस्वी और अनेक
प्रकारकी दीक्षाओंसे व्याप्त थे ।
दक्षिणाहृदयो योगी महाशास्त्रमयो महान् ॥
उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः । दक्षिणा उनके हृदयके स्थानमें थीं, वे महान् योगी और महान् शास्त्रस्वरूप थे ।
प्रीतिकारक उपाकर्म उनके ओष्ठ और प्रवर्ग्य कर्म ही उनके रत्नोंके आभूषण थे ।
छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः ॥
एवं यज्ञवराहो वै भूत्वा विष्णुः सनातनः ।
महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ॥
एकार्णवजले भ्रष्टामेकार्णवगतः प्रभुः ।
मज्जितां सलिले तस्मिन् स्वदेवीं पृथिवीं तदा ॥
उज्जहार विषाणेन मार्कण्डेयस्य पश्यतः । जलमें पड़नेवाली छाया ( परछाईं) ही पत्नीकी भाँति उनकी सहायिका थी । वे मणिमय पर्वत -शिखरकी भाँति ऊँचे जान पड़ते थे । इस प्रकार यज्ञमय वराहरूप धारण करके एकार्णवके जलमें प्रविष्ट हो सर्वशक्तिमान् सनातन भगवान् विष्णुने उस जलमें गिरकर डूबी हुई पर्वत, वन और समुद्रोंसहित अपनी महारानी भूदेवीका ( दाढ़ या) सींगकी सहायतासे
मार्कण्डेय मुनिके देखते - देखते उद्धार किया ।
शृङ्गेणेमां समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया ॥
सहस्रशीर्षो देवो हि निर्ममे जगतीं प्रभुः । सहस्रों मस्तकोंसे सुशोभित होनेवाले उन भगवान्ने सींग ( या दाढ़ ) के द्वारा सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये इस पृथ्वीका उद्धार करके उसे जगत्का एक सुदृढ़ आश्रय बना दिया ।
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एवं यज्ञवराहेण भूतभव्यभवात्मना ॥
उद्धृता पृथिवी देवी सागराम्बुधरा पुरा ।
निहता दानवाः सर्वे देवदेवेन विष्णुना ॥
इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमानस्वरूप भगवान् यज्ञवराहने समुद्रका जल हरण करनेवाली भूदेवीका पूर्वकालमें उद्धार किया था । उस समय उन देवाधिदेव विष्णुने समस्त दानवोंका संहार किया था ।
वाराहः कथितो ह्येष नारसिंहमथो शृणु ।
यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥
यह वराह अवतारका वृत्तान्त बतलाया गया । अब नृसिंहावतारका वर्णन सुनो, जिसमें नरसिंहरूप धारण करके भगवान्ने हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वध किया था ।
दैत्येन्द्रो बलवान् राजन् सुरारिर्बलगर्वितः ।
हिरण्यकशिपुर्नाम आसीत् त्रैलोक्यकण्टकः ॥
राजन्! प्राचीन कालमें देवताओंका शत्रु हिरण्यकशिपु समस्त दैत्योंका राजा था । वह बलवान् तो था ही, उसे अपने बलका घमंड भी बहुत था । वह तीनों लोकोंके लिये कण्टकरूप हो रहा था ।
दैत्यानामादिपुरुषो वीर्यवान् धृतिमान् बली ।
प्रविश्य स वनं राजंश्चकार तप उत्तमम् ॥
पराक्रमी हिरण्यकशिपु धीर और बलवान् था। दैत्यकुलका आदिपुरुष वही था । राजन्! उसने वनमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की ।
दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च ।
जपोपवासैस्तस्यासीत् स्थाणुर्मौनव्रतो दृढः ॥
साढ़े ग्यारह हजार वर्षोंतक पूर्वोक्त तपस्याके हेतुभूत जप और उपवासमें संलग्न रहनेसे वह ठूंठे काठके समान अविचल और दृढ़तापूर्वक मौनव्रतका पालन करनेवाला हो गया ।
ततो दमशमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चानघ ।
ब्रह्मा प्रीतमनास्तस्य तपसा नियमेन च ॥
निष्पाप नरेश! उसके इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या तथा शौच - संतोषादि नियमोंके पालनसे ब्रह्माजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई ।
ततः स्वयम्भूर्भगवान् स्वयमागम्य भूपते ।
विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ॥
भूपाल! तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा हंस जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा स्वयं वहाँ पधारे । आदित्यैर्वसुभिः साध्यैः मरुद्भिर्दैवतैः सह ।
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रुद्रैर्विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥
दिशाभिर्विदिशाभिश्च नदीभिः सागरैस्तथा ।
नक्षत्रैश्च मुहूर्तेश्च खेचरैश्चापरैर्ग्रहैः ॥
देवर्षिभिस्तपोयुक्तैः सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा ।
राजर्षिभिः पुण्यतमैर्गन्धर्वैरप्सरोगणैः ॥
उनके साथ आदित्य, वसु, साध्य, मरुद्गण, देवगण, रुद्रगण, विश्वेदेव, यक्ष, राक्षस, किन्नर, दिशा, विदिशा, नदी, समुद्र, नक्षत्र, मुहूर्त, अन्यान्य आकाशचारी ग्रह, तपस्वी देवर्षि, सिद्ध, सप्तर्षि, पुण्यात्मा राजर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी थीं ।
चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वसुरैस्तथा ।
ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यमागम्य चाब्रवीत् ॥
सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यके पास आकर बोले । ब्रह्मोवाच
प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत ।
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि ॥
ब्रह्माजीने कहा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दैत्यराज! तुम मेरे भक्त हो । तुम्हारी इस तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ । तुम्हारा भला हो । तुम कोई वर माँगो और मनोवांछित वस्तु प्राप्त करो । हिरण्यकशिपुरुवाच
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ।
न मानुषाः पिशाचाश्च हन्युर्मां देवसत्तम ॥
हिरण्यकशिपु बोला – सुरश्रेष्ठ! मुझे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच— कोई भी न मार सके ।
ऋषयो वा न मां शापैः क्रुद्धा लोकपितामह ।
शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया ॥
लोकपितामह! तपस्वी ऋषि- महर्षि कुपित होकर मुझे शाप भी न दें यही वर मैंने माँगा है ।
न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन च ।
न शुष्केण न चाद्रेण स्यान्न वान्येन मे वधः ॥
न शस्त्रसे, न अस्त्रसे, न पर्वतसे, न वृक्षसे, न सूखेसे, न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो । नाकाशे वा न भूमौ वा रात्रौ वा दिवसेऽपि वा ।
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नान्तर्वा न बहिर्वापि स्याद् वधो मे पितामह ॥ पितामह! न आकाशमें, न पृथ्वीपर, न रातमें, न दिनमें तथा न बाहर और न भीतर ही मेरा वध हो सके ।
पशुभिर्वा मृगैर्न स्यात् पक्षिभिर्वा सरीसृपैः ।
ददासि चेद् वरानेतान् देवदेव वृणोम्यहम् ॥
पशु या मृग, पक्षी अथवा सरीसृप ( सर्प- बिच्छू) आदिसे भी मेरी मृत्यु न हो । देवदेव! यदि आप वर दे रहे हैं तो मैं इन्हीं वरोंको लेना चाहता हूँ । ब्रह्मोवाच
एते देव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः ।
सर्वकामान् वरांस्तात प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥
ब्रह्माजीने कहा — तात! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दे दिये । वत्स! इसमें संशय नहीं कि सम्पूर्ण कामनाओंसहित इन मनोवांछित वरोंको तुम अवश्य प्राप्त कर लोगे । भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स भगवानाकाशेन जगाम ह ।
रराज ब्रह्मलोके स ब्रह्मर्षिगणसेवितः ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमार्गसे चले गये और ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित होकर अत्यन्त शोभा पाने लगे ।
ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनयस्तथा ।
वरप्रदानं श्रुत्वा ते ब्रह्माणमुपतस्थिरे ॥
तदनन्तर देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि उस वरदानका समाचार सुनकर ब्रह्माजीकी सभामें उपस्थित हुए । देवा ऊचुः
वरेणानेन भगवन् बाधिष्यति स नोऽसुरः ।
तत् प्रसीदस्व भगवत् वधोऽस्य प्रविचिन्त्यताम् ॥
देवता बोले — भगवन्! इस वरके प्रभावसे वह असुर हमलोगोंको बहुत कष्ट देगा, अतः आप प्रसन्न होइये और उसके वधका कोई उपाय सोचिये ।
भवान् हि सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः ।
स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥
क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य- कव्यके निर्माता तथा अव्यक्त प्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं । भीष्म उवाच
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ततो लोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः ।
प्रोवाच भगवान् वाक्यं सर्वदेवगणांस्तदा ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर देवताओंका यह लोकहितकारी वचन सुनकर दिव्यशक्तिसम्पन्न भगवान् प्रजापतिने उन सब देवगणोंसे इस प्रकार कहा । ब्रह्मोवाच
अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् ।
तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् वधं कृष्णः करिष्यति ॥
ब्रह्माजीने कहा – देवताओ! उस असुरको अपनी तपस्याका फल अवश्य प्राप्त होगा । फलभोगके द्वारा जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब भगवान् विष्णु स्वयं ही उसका वध करेंगे । भीष्म उवाच
एकच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे ब्रह्मणा तस्य वै वधम् ।
स्वानि स्थानानि दिव्यानि जग्मुस्ते वै मुदान्विताः ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार उसके वधकी बात सुनकर सब देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने दिव्य धामको चले गये ।
लब्धमात्रे वरे चापि सर्वास्ता बाधते प्रजाः ।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥
दैत्य हिरण्यकशिपु ब्रह्माजीका वर पाते ही समस्त प्रजाको कष्ट पहुँचाने लगा । वरदानसे उसका घमण्ड बहुत बढ़ गया था ।
राज्यं चकार दैत्येन्द्रो दैत्यसङ्घैः समावृतः ।
सप्त द्वीपान्वशे चक्रे लोकान् लोकान्तरान् बलात् ॥
वह दैत्योंका राजा होकर राज्य भोगने लगा । झुंड - के - झुंड दैत्य उसे घेरे रहते थे । उसने सातों द्वीपों और अनेक लोक- लोकान्तरोंको बलपूर्वक अपने वशमें कर लिया ।
दिव्यलोकान् समस्तान् वै भोगान् दिव्यानवाप सः ।
देवांस्त्रिभुवनस्थांस्तान् पराजित्य महासुरः ॥
उस महान् असुरने तीनों लोकोंमें रहनेवाले समस्त देवताओंको जीतकर सम्पूर्ण दिव्य लोकों और वहाँके दिव्य भोगोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया ।
त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ।
यदा वरमदोन्मत्तो न्यवसद् दानवो दिवि ॥
इस प्रकार तीनों लोकोंको अपने अधीन करके वह दैत्य स्वर्गलोकमें निवास करने लगा । वरदानके मदसे उन्मत्त हो दानव हिरण्यकशिपु देवलोकका निवासी बन बैठा । अथ लोकान् समस्तांश्च विजित्य स महासुरः ।
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भवेयमहमेवेन्द्रः सोमोऽग्निर्मारुतो रविः ॥
सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश ।
अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वसवोऽर्यमा ॥
धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किम्पुरुषाधिपः ।
एते भवेयमित्युक्त्वा स्वयं भूत्वा बलात् स च ॥
तदनन्तर वह महान् असुर अन्य समस्त लोकोंको जीतकर यह सोचने लगा कि मैं ही इन्द्र हो जाऊँ, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, सूर्य, जल, आकाश, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, क्रोध, काम, वरुण, वसुगण, अर्यमा, धन देनेवाले धनाध्यक्ष, यक्ष और किम्पुरुषोंका स्वामी – ये सब मैं ही हो जाऊँ । ऐसा सोचकर उसने स्वयं ही बलपूर्वक उन- उन पदोंपर अधिकार जमा लिया ।
तेषां गृहीत्वा स्थानानि तेषां कार्याण्यवाप सः ।
इज्यश्चासीन्मखवरैः स तैर्देवर्षिसत्तमैः ॥
नरकस्थान् समानीय स्वर्गस्थांस्तांश्चकार सः ।
एवमादीनि कर्माणि कृत्वा दैत्यपतिर्बली ॥
आश्रमेषु महाभागान् मुनीन् वै संशितव्रतान् ।
सत्यधर्मपरान् दान्तान् पुरा धर्षितवांश्च सः ॥
उनके स्थान ग्रहण करके उन सबके कार्य वह स्वयं देखने लगा । उत्तम देवर्षिगण श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा जिन देवताओंका यजन करते थे, उन सबके स्थानपर वह स्वयं ही यज्ञभागका अधिकारी बन बैठा । नरकमें पड़े हुए सब जीवोंको वहाँसे निकालकर उसने स्वर्गका निवासी बना दिया । बलवान् दैत्यराजने ये सब कार्य करके मुनियोंके आश्रमोंपर धावा किया और कठोर व्रतका पालन करनेवाले सत्यधर्मपरायण एवं जितेन्द्रिय महाभाग मुनियोंको सताना आरम्भ किया ।
यज्ञीयान् कृतवान् दैत्यानयज्ञीयांश्च देवताः ।
यत्र यत्र सुरा जग्मुस्तत्र तत्र व्रजत्युत ॥
स्थानानि देवतानां तु हृत्वा राज्यमपालयत् । उसने दैत्योंको यज्ञका अधिकारी बनाया और देवताओंको उस अधिकारसे वंचित कर दिया । जहाँ - जहाँ देवता जाते थे, वहाँ- वहाँ वह उनका पीछा करता था । देवताओंके सारे
स्थान हड़पकर वह स्वयं ही त्रिलोकीके राज्यका पालन करने लगा ।
पञ्च कोट्यश्च वर्षाणि नियुतान्येकषष्टि च ॥
षष्टिश्चैव सहस्राणां जग्मुस्तस्य दुरात्मनः ।
एतद् वर्षं स दैत्येन्द्रो भोगैश्वर्यमवाप सः ॥
उस दुरात्माके राज्य करते पाँच करोड़ इकसठ लाख साठ हजार वर्ष व्यतीत हो गये । इतने वर्षोंतक दैत्यराज हिरण्यकशिपुने दिव्य भोगों और ऐश्वर्यका उपभोग किया ।
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तेनातिबाध्यमानास्ते दैत्येन्द्रेण बलीयसा ।
ब्रह्मलोकं सुरा जग्मुः सर्वे शक्रपुरोगमाः ॥
पितामहं समासाद्य खिन्नाः प्राञ्जलयोऽब्रुवन् । महाबली दैत्यराज हिरण्यकशिपुके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हो इन्द्र आदि सब देवता ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीके पास पहुँचकर खेदग्रस्त हो हाथ जोड़कर बोले । देवा ऊचुः
भगवन् भूतभव्येश नस्त्रायस्व इहागतान् ।
भयं दितिसुताद् घोरं भवत्यद्य दिवानिशम् ॥
देवताओंने कहा – भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवान् पितामह! हम यहाँ आपकी शरणमें आये हैं! आप हमारी रक्षा कीजिये । अब हमें उस दैत्यसे दिन - रात घोर भयकी प्राप्ति हो रही है ।
भगवन् सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद् विभुः ।
स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥
भगवन्! आप सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्यकव्योंके निर्माता, अव्यक्त प्रकृति एवं नित्यस्वरूप हैं । ब्रह्मोवाच
श्रूयतामापदेवं हि दुर्विज्ञेया मयापि च ।
नारायणस्तु पुरुषो विश्वरूपो महाद्युतिः ॥
अव्यक्तः सर्वभूतानामचिन्त्यो विभुरव्ययः । ब्रह्माजी बोले- देवताओ! सुनो, ऐसी विपत्तिको समझना मेरे लिये भी अत्यन्त कठिन है । अन्तर्यामी भगवान् नारायण ही हमारी सहायता कर सकते हैं । वे विश्वरूप, महातेजस्वी, अव्यक्तस्वरूप, सर्वव्यापी, अविनाशी तथा सम्पूर्ण भूतोंके लिये अचिन्त्य हैं। ममापि स तु युष्माकं व्यसने परमा गतिः ॥ नारायणः परोऽव्यक्तादहमव्यक्तसम्भवः । संकटकालमें मेरे और तुम्हारे वे ही परम गति हैं । भगवान् नारायण अव्यक्तसे परे हैं
और मेरा आविर्भाव अव्यक्तसे हुआ है ।
मत्तो जज्ञुः प्रजा लोकाः सर्वे देवासुराश्च ते ॥
देवा यथाहं युष्माकं तथा नारायणो मम ।
पितामहोऽहं सर्वस्य स विष्णुः प्रपितामहः ॥
तमिमं विबुधा दैत्यं स विष्णुः संहरिष्यति ।
तस्य नास्ति ह्यशक्यं च तस्माद् व्रजत मा चिरम् ॥
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मुझसे समस्त प्रजा, सम्पूर्ण लोक तथा देवता और असुर भी उत्पन्न हुए हैं। देवताओ! जैसे मैं तुमलोगोंका जनक हूँ, उसी प्रकार भगवान् नारायण मेरे जनक हैं । मैं सबका पितामह हूँ और वे भगवान् विष्णु प्रपितामह हैं। देवताओ! इस हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वे विष्णु ही संहार करेंगे । उनके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है, अतः सब लोग उन्हींकी शरणमें जाओ, विलम्ब न करो । भीष्मउवाच
पितामहवचः श्रुत्वा सर्वे ते भरतर्षभ ।
विबुधा ब्रह्मणा सार्धं जग्मुः क्षीरोदधिं प्रति ॥
भीष्मजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! पितामह ब्रह्माका यह वचन सुनकर सब देवता उनके साथ ही क्षीरसमुद्रके तटपर गये ।
आदित्या मरुतः साध्या विश्वे च वसवस्तथा ।
रुद्रा महर्षयश्चैव अश्विनौ च सुरूपिणौ ॥
अन्ये च दिव्या ये राजंस्ते सर्वे सगणाः सुराः ।
चतुर्मुखं पुरस्कृत्य श्वेतद्वीपमुपस्थिताः ॥
आदित्य, मरुद्गण, साध्य, विश्वेदेव, वसु, रुद्र, महर्षि, सुन्दर रूपवाले अश्विनीकुमार तथा अन्यान्य जो दिव्य योनिके पुरुष हैं, वे सब अर्थात् अपने गणोंसहित समस्त देवता चतुर्मुख ब्रह्माजीको आगे करके श्वेतद्वीपमें उपस्थित हुए ।
गत्वा क्षीरसमुद्रं तं शाश्वतीं परमां गतिम् ।
अनन्तशयनं देवमनन्तं दीप्ततेजसम् ॥
शरण्यं त्रिदशा विष्णुमुपतस्थुः सनातनम् ।
देवं ब्रह्ममयं यज्ञं ब्रह्मदेवं महाबलम् ॥
भूतं भव्यं भविष्यच्च प्रभुं लोकनमस्कृतम् ।
नारायणं विभुं देवं शरण्यं शरणं गताः ॥
क्षीरसमुद्रके तटपर पहुँचकर सब देवता अनन्त नामक शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले अनन्त एवं उद्दीप्त तेजसे प्रकाशमान उन शरणागतवत्सल सनातन देवता श्रीविष्णुके सम्मुख उपस्थित हुए, जो सबके सनातन परम गति हैं । वे प्रभु देवस्वरूप, वेदमय, यज्ञरूप, ब्राह्मणको देवता माननेवाले, महान् बल और पराक्रमके आश्रय, भूत, वर्तमान और भविष्यरूप, सर्वसमर्थ, विश्ववन्दित, सर्वव्यापी, दिव्यशक्तिसम्पन्न तथा शरणागतरक्षक हैं । वे सब देवता उन्हीं भगवान् नारायणकी शरणमें गये । देवा ऊचुः
त्रायस्व नोऽद्य देवेश हिरण्यकशिपोर्वधात् ।
त्वं हि नः परमो धाता ब्रह्मादीनां सुरोत्तम ॥
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देवता बोले – देवेश्वर! आज आप हिरण्यकशिपुका वध करके हमारी रक्षा कीजिये । सुरश्रेष्ठ! आप ही हमारे और ब्रह्मा आदिके भी धारण- पोषण करनेवाले परमेश्वर हैं ।
उत्फुल्लपद्मपत्राक्ष शत्रुपक्षभयङ्कर ।
क्षयाय दितिवंशस्य शरण्यस्त्वं भवाद्य नः ॥
खिले हुए कमलदलके समान नेत्रोंवाले नारायण! आप शत्रुपक्षको भय प्रदान करनेवाले हैं । प्रभो! आज आप दैत्योंका विनाश करनेके लिये उद्यत हो हमारे शरणदाता भीष्म उवाच
देवानां वचनं श्रुत्वा तदा विष्णुः शुचिश्रवाः ।
अदृश्यः सर्वभूतानां वक्तुमेवोपचक्रमे ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! देवताओंकी यह बात सुनकर पवित्र कीर्तिवाले भगवान् विष्णुने उस समय सम्पूर्ण भूतोंसे अदृश्य रहकर बोलना आरम्भ किया । श्रीभगवानुवाच
भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ।
तदेवं त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम् ॥
श्रीभगवान् बोले – देवताओ! भय छोड़ दो । मैं तुम्हें अभय देता हूँ । देवगण! तुमलोग अविलम्ब स्वर्गलोकमें जाओ और पहलेकी ही भाँति वहाँ निर्भय होकर रहो ।
एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ।
अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ॥
मैं वरदान पाकर घमंडमें भरे हुए दानवराज हिरण्यकशिपुको, जो देवेश्वरोंके लिये भी अवध्य हो रहा है, सेवकोंसहित अभी मार डालता हूँ । ब्रह्मोवाच
भगवन् भूतभव्येश खिन्ना ह्येते भृशं सुराः ।
तस्मात् त्वं जहि दैत्येन्द्रं क्षिप्रं कालोऽस्य मा चिरम् ॥
ब्रह्माजीने कहा – भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी नारायण! ये देवता बहुत दुःखी हो गये हैं, अतः आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको शीघ्र मार डालिये। उसकी मृत्युका समय आ गया है, इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये । श्रीभगवानुवाच
क्षिप्रं देवाः करिष्यामि त्वरया दैत्यनाशनम् ।
तस्मात् त्वं विबुधाश्चैव प्रतिपद्यत वै दिवम् ॥
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श्रीभगवान् बोले – ब्रह्मा तथा देवताओ! मैं शीघ्र ही उस दैत्यका नाश करूँगा, अतः तुम सब लोग अपने - अपने दिव्यलोकमें जाओ । भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदिवेश्वरान् ।
नरस्यार्धतनुं कृत्वा सिंहस्यार्धतनुं तथा ॥
नारसिंहेन वपुषा पाणिं निष्पिष्य पाणिना ।
भीमरूपो महातेजा व्यादितास्य इवान्तकः ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने देवेश्वरोंको विदा करके आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका-सा बनाकर नरसिंहविग्रह धारण करके एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए बड़ा भयंकर रूप बना लिया । वे महातेजस्वी नरसिंह मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ते थे ।
हिरण्यकशिपुं राजन् जगाम हरिरीश्वरः ।
दैत्यास्तमागतं दृष्ट्वा नारसिंहं महाबलम् ॥
ववर्षुः शस्त्रवर्षैस्ते सुसंक्रुद्धास्तदा हरिम् । राजन्! तदनन्तर भगवान् विष्णु हिरण्यकशिपुके पास गये । नृसिंहरूपधारी महाबली भगवान् श्रीहरिको आया देख दैत्योंने कुपित होकर उनपर अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ की । तैर्विसृष्टानि शस्त्राणि भक्षयामास वै हरिः ॥ जघान च रणे दैत्यान् सहस्राणि बहून्यपि । उनके द्वारा चलाये हुए सभी शस्त्रोंको भगवान् खा गये, साथ ही उन्होंने उस युद्धमें कई
हजार दैत्योंका संहार कर डाला ।
तान् निहत्य च दैत्येन्द्रान् सर्वान् क्रुद्धान् महाबलान् ॥
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो दैत्येन्द्रं बलगर्वितम् । क्रोधमें भरे हुए उन सभी महाबलवान्, दैत्येश्वरोंका विनाश करके अत्यन्त कुपित हो
भगवान्ने बलोन्मत्त दैत्यराज हिरण्यकशिपुपर धावा किया ।
जीमूतघनसंकाशो जीमूतघननिःस्वनः ॥
जीमूत इव दीप्तौजा जीमूत इव वेगवान् । भगवान् नृसिंहकी अंगकान्ति मेघोंकी घटाके समान श्याम थी । वे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान दहाड़ रहे थे । उनका उद्दीप्त तेज भी मेघोंके ही समान शोभा पाता था और
वे मेघोंके ही समान महान् वेगशाली थे ।
देवारिर्दितिजो दुष्टो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥
भगवान् नृसिंहको आया देख देवताओंसे द्वेष रखनेवाला दुष्ट दैत्य हिरण्यकशिपु उनकी ओर दौड़ा ।