महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1911–1920
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1911–1920
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भीष्मजी बोले – कुरुरत्न युधिष्ठिर! अब मैं वृष्णिवंशमें भगवान् नारायणके अवतार- ग्रहणका यथावत् वृत्तान्त कहूँगा ।
अजातशत्रो जातस्तु यथैष भुवि भूमिपः ।
कीर्त्यमानं मया तात निबोध भरतर्षभ ॥
भरतकुलभूषण तात अजातशत्रो! वसुधाकी रक्षा करनेवाले ये भगवान् यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए? यह मैं बतला रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो ।
सागराः समकम्पन्त मुदा चेलुश्च पर्वताः ।
जज्वलुश्चाग्नयः शान्ता जायमाने जनार्दने ॥
भगवान्के जन्मके समय आनन्दोद्रेकके कारण समुद्रमें उत्ताल तरंगें उठने लगीं, पर्वत हिलने लगे और बुझी हुई अग्नियाँ भी सहसा प्रज्वलित हो उठीं ।
शिवाः सम्प्रववुर्वाताः प्रशान्तमभवद् रजः ।
ज्योतींषि सम्प्रकाशन्ते जायमाने जनार्दने ॥
भगवान् जनार्दनके जन्मकालमें शीतल, मन्द एवं सुखद वायु चलने लगी । धरतीकी धूल शान्त हो गयी और नक्षत्र प्रकाशित होने लगे ।
देवदुन्दुभयश्चापि सस्वनुर्भृशमम्बरे ।
अभ्यवर्षस्तदाऽऽगम्य देवताः पुष्पवृष्टिभिः ॥
आकाशमें देवलोकके नगाड़े जोर- जोरसे बजने लगे और देवगण आ - आकर वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे ।
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिरस्तुवन् मधुसूदनम् ।
उपतस्थुस्तदा प्रीताः प्रादुर्भावे महर्षयः ॥
वे मंगलमयी वाणीद्वारा भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे । भगवान्के अवतारका समय जान महर्षिगण भी अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ आ पहुँचे ।
ततस्तानभिसम्प्रेक्ष्य नारदप्रमुखानृषीन् ।
उपानृत्यन्नुपजगुर्गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥
नारद आदि देवर्षियोंको उपस्थित देख गन्धर्व और अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं ।
उपतस्थे च गोविन्दं सहस्राक्षः शचीपतिः ।
अभ्यभाषत तेजस्वी महर्षीन् पूजयंस्तदा ॥
उस समय सहस्र नेत्रोंवाले शचीवल्लभ तेजस्वी इन्द्र भगवान् गोविन्दकी सेवामें उपस्थित हुए और महर्षियोंका आदर करते हुए बोले । इन्द्र उवाच
कृत्यानि देवकार्याणि कृत्वा लोकहिताय च ।
स्वलोकं लोककृद् देव पुनर्गच्छ स्वतेजसा ॥
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इन्द्रने कहा — देव! आप सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं । देवताओंके जो कर्तव्य कार्य हैं, उन सबको सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये सिद्ध करके आप अपने तेजसहित पुनः परमधामको पधारिये । भीष्म उवाच इत्युक्त्वा मुनिभिः सार्धं जगाम त्रिदिवेश्वरः । भीष्मजी कहते हैं- ऐसा कहकर स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र देवर्षियोंके साथ अपने लोकको चले गये ।
वसुदेवस्ततो जातं बालमादित्यसंनिभम् ।
नन्दगोपकुले राजन् भयात् प्राच्छादयद्धरिम् ॥
राजन्! तदनन्तर वसुदेवजीने कंसके भयसे सूर्यके समान तेजस्वी अपने नवजात बालक श्रीहरिको नन्दगोपके घरमें छिपा दिया ।
नन्दगोपकुले कृष्ण उवास बहुलाः समाः ।
ततः कदाचित् सुप्तं तं शकटस्य त्वधः शिशुम् ॥
यशोदा सम्परित्यज्य जगाम यमुनां नदीम् ।
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श्रीकृष्ण बहुत वर्षोंतक नन्दगोपके ही घरमें रहे । एक दिन वहाँ शिशु श्रीकृष्ण एक
छकड़ेके नीचे सोये थे । माता यशोदा उन्हें वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर चली गयीं ।
शिशुलीलां ततः कुर्वन् स्वहस्तचरणौ क्षिपन् ॥
रुरोद मधुरं कृष्णः पादावूर्ध्वं प्रसारयन् ।
पादाङ्गुष्ठेन शकटं धारयन्नथ केशवः ॥
तत्राथैकेन पादेन पातयित्वा तथा शिशुः । उस समय श्रीकृष्ण शिशुलीलाका प्रदर्शन करते हुए अपने हाथ - पैर फेंक- फेंककर मधुर स्वरमें रोने लगे । पैरोंको ऊपर फेंकते समय भगवान् केशवने अपने पैरके अंगूठेसे
छकड़ेको धक्का दे दिया और इस प्रकार एक ही पाँवसे छकड़ेको उलटकर गिरा दिया ।
न्युब्जः पयोधराकाङ्क्षी चकार च रुरोद च ॥
पातितं शकटं दृष्ट्वा भिन्नभाण्डघटीघटम् ।
जनास्ते शिशुना तेन विस्मयं परमं ययुः ॥
उसके बाद वे स्वयं औंधे मुँह हो गये और माताका स्तन पीनेकी इच्छासे जोर - जोरसे रोने लगे । शिशुके ही पदाघातसे छकड़ा उलटकर गिर गया तथा उसपर रखे हुए सभी मटके और घड़े आदि बर्तन चकनाचूर हो गये । यह देखकर सब लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ।
प्रत्यक्षं शूरसेनानां दृश्यते महदद्भुतम् ।
पूतना चापि निहता महाकाया महास्तनी ॥
पश्यतां सर्वदेवानां वासुदेवेन भारत । भरतनन्दन! शूरसेनदेश ( मथुरामण्डल) -के निवासियोंको यह अत्यन्त अद्भुत घटना प्रत्यक्ष दिखायी दी तथा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने ( आकाशमें स्थित) सब देवताओंके देखते-देखते महाकाय एवं विशाल स्तनोंवाली पूतनाको भी पहले मार डाला था । ततः काले'महाराज संसक्तौ रामकेशवौ ॥ विष्णुः सङ्कर्षणश्चोभौ रिङ्गिणौ समपद्यताम् । महाराज! तदनन्तर संकर्षण और विष्णुके स्वरूप बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाई
कुछ कालके अनन्तर एक साथ ही घुटनोंके बल रेंगने लगे ।
अन्योन्यकिरणग्रस्तौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥
विसर्पयेतां सर्वत्र सर्पभोगभुजौ तदा । जैसे चन्द्रमा और सूर्य एक- दूसरेकी किरणोंसे बँधकर आकाशमें एक साथ विचरते हों, उसी प्रकार बलराम और श्रीकृष्ण सर्वत्र एक साथ चलते - फिरते थे । उनकी भुजाएँ सर्पके
शरीरकी भाँति सुशोभित होती थीं ।
रेजतुः पांसुदिग्धाङ्गौ रामकृष्णौ तदा नृप ॥
क्वचिच्च जानुभिर्धृष्टौ क्रीडमानौ क्वचिद् वने ।
पिबन्तौ दधिकुल्याश्च मथ्यमाने च भारत ॥
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नरेश्वर! बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंके अंग धूलि धूसरित होकर बड़ी शोभा पाते । भारत! कभी वे दोनों भाई घुटनोंके बल चलते थे, जिससे उनमें घट्टे पड़ गये थे । कभी वे वनमें खेला करते और कभी मथते समय दहीकी घोल लेकर पीया करते थे ।
ततः स बालो गोविन्दो नवनीतं तदा क्षये ।
ग्रसमानस्तु तत्रायं गोपीभिर्ददृशेऽथ वै ॥
एक दिन बालक श्रीकृष्ण एकान्त गृहमें छिपकर माखन खा रहे थे । उस समय वहाँ उन्हें कुछ गोपियोंने देख लिया ।
दाम्नाथोलूखले कृष्णो गोपस्त्रीभिश्च बन्धितः ।
तदाथ शिशुना तेन राजंस्तावर्जुनावुभौ ॥
समूलविटपौ भग्नौ तदद्भुतमिवाभवत् । तब उन यशोदा आदि गोपांगनाओंने एक रस्सीसे श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया । राजन्! उस समय उन्होंने उस ऊखलको यमलार्जुन वृक्षोंके बीचमें अड़ाकर उन्हें जड़ और
शाखाओंसहित तोड़ डाला। वह एक अद्भुत -सी घटना घटित हुई ।
तत्रासुरौ महाकायौ गतप्राणौ बभूवतुः ॥
उन वृक्षोंपर दो विशालकाय असुर रहा करते थे । वे भी वृक्षोंके टूटनेके साथ ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे ।
ततस्तौ बाल्यमुत्तीर्णौ कृष्णसङ्कर्षणावुभौ ।
तस्मिन्नेव व्रजस्थाने सप्तवर्षौ बभूवतुः ॥
तदनन्तर वे दोनों भाई श्रीकृष्ण और बलराम बाल्यावस्थाकी सीमाको पार करके उस व्रजमण्डलमें ही सात वर्षकी अवस्थावाले हो गये ।
नीलपीताम्बरधरौ पतिश्वेतानुलेपनौ ।
बभूवतुर्वत्सपाली काकपक्षधरावुभौ ॥
बलराम नीले रंगके और श्रीकृष्ण पीले रंगके वस्त्र धारण करते थे । एकके श्रीअंगोंपर पीले रंगका अंगराग लगता था और दूसरेके श्वेत रंगका । दोनों भाई काकपक्ष ( सिरके पिछले भागमें बड़े - बड़े केश ) धारण किये बछड़े चराने लगे ।
पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयन्तौ वराननौ ।
शुशुभाते वनगतावुदीर्णाविव पन्नगौ ॥
उन दोनोंकी मुखच्छवि बड़ी मनोहारिणी थी । वे वनमें जाकर श्रवण- सुखद पर्णवाद्य ( पत्तोंके बाजे — पिपिहरी आदि) बजाया करते थे । वहाँ दो तरुण नागकुमारोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी ।
मयूराङ्गजकर्णौ तौ पल्लवापीडधारिणौ ।
वनमालापरिक्षिप्तौ सालपोताविवोद्गतौ ॥
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वे अपने कानोंमें मोरके पंख लगा लेते, मस्तकपर पल्लवोंके मुकुट धारण करते और गलेमें वनमाला डाल लेते थे । उस समय शालके नये पौधोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी ।
अरविन्दकृतापीडौ रज्जुयज्ञोपवीतिनौ ।
शिक्यतुम्बधरी वीरौ गोपवेणुप्रवादकी ॥
वे कभी कमलके फूलोंके शिरोभूषण धारण करते और कभी बछड़ोंकी रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति धारण कर लेते थे । वीरवर श्रीकृष्ण और बलराम छींके और तुम्बी लिये वनमें घूमते और गोपजनोचित वेणु बजाया करते थे ।
क्वचिद् वसन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ क्वचिद् वने ।
पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरैषिणी ॥
वे दोनों भाई कहीं ठहर जाते, कहीं वनमें एक- दूसरेके साथ खेलने लगते और कहीं पत्तोंकी शय्या बिछाकर सो जाते तथा नींद लेने लगते थे ।
तौ वत्सान् पालयन्तौ हि शोभयन्तौ महद् वनम् ।
चञ्चूर्यन्तौ रमन्तौ स्म राजन्नेवं तदा शुभौ ॥
राजन्! इस प्रकार वे मंगलमय बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ोंकी रक्षा करते तथा उस महान् वनकी शोभा बढ़ाते हुए सब ओर घूमते और भाँति- भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे ।
ततो वृन्दावनं गत्वा वसुदेवसुतावुभौ ।
गोव्रजं तत्र कौन्तेय चारयन्तौ विजहृतुः ॥
कुन्तीनन्दन! तदनन्तर वे दोनों वसुदेवपुत्र वृन्दावनमें जाकर गौएँ चराते हुए लीला-विहार करने लगे । (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
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[ कालियामर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना] भीष्मउवाच
ततः कदाचिद् गोविन्दो ज्येष्ठं सङ्कर्षणं विना ।
चचार तद् वनं रम्यं रम्यरूपो वराननः ॥
भीष्मजी कहते हैं – युधिष्ठिर! तदनन्तर एक दिन मनोहर रूप और सुन्दर मुखवाले भगवान् गोविन्द अपने बड़े भाई संकर्षणको साथ लिये बिना ही रमणीय वृन्दावनमें चले गये और वहाँ इधर - उधर भ्रमण करने लगे ।
काकपक्षधरः श्रीमाञ्छ्यामः पद्मनिभेक्षणः ।
श्रीवत्सेनोरसा युक्तः शशाङ्क इव लक्ष्मणा ॥
उन्होंने काकपक्ष धारण कर रखा था । वे परम शोभायमान, श्याम - वर्ण तथा कमलके समान सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित थे । जैसे चन्द्रमा कलंकसे युक्त होकर शोभा पाता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्न से शोभा पा रहा था ।
रज्जुयज्ञोपवीती स पीताम्बरधरो युवा ।
श्वेतगन्धेन लिप्ताङ्गो नीलकुञ्चितमूर्धजः ॥
राजता बर्हिपत्रेण मन्दमारुतकम्पिना ।
क्वचिद् गायन् क्वचित् क्रीडन् क्वचिन्नृत्यन् क्वचिद्धसन् ॥
गोपवेषः स मधुरं गायन् वेणुं च वादयन् ।
प्रह्लादनार्थं तु गवां क्वचिद् वनगतो युवा ॥
गोकुले मेघकाले तु चचार द्युतिमान् प्रभुः ।
बहुरम्येषु देशेषु वनस्य वनराजिषु ॥
तासु कृष्णो मुदं लेभे क्रीडया भरतर्षभ ।
स कदाचिद् वने तस्मिन् गोभिः सह परिव्रजन् ॥
उन्होंने रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति पहन रखा था । उनके श्रीअंगोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था । विभिन्न अंगोंमें श्वेत चन्दनका अनुलेप किया गया था । उनके मस्तकपर काले - घुँघराले केश सुशोभित थे । सिरपर मोरपंखका मुकुट शोभा पाता था, जो मन्द- मन्द वायुके झोंकोंसे लहरा रहा था । भगवान् कहीं गीत गाते, कहीं क्रीड़ा करते, कहीं नाचते और कहीं हँसते थे । इस प्रकार गोपालोचित वेष धारण किये मधुर गीत गाते और वेणु बजाते हुए तरुण श्रीकृष्ण गौओंको आनन्दित करनेके लिये कभी-कभी वनमें घूमते थे । अत्यन्त कान्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण वर्षाके समय गोकुलमें वहाँके अतिशय रमणीय प्रदेशों तथा
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वनश्रेणियोंमें विचरण करते थे । भरतश्रेष्ठ! उन वनश्रेणियोंमें भाँति - भाँतिके खेल करके श्यामसुन्दर बड़े प्रसन्न होते थे । एक दिन वे गौओंके साथ वनमें घूम रहे थे ।
भाण्डीरं नाम दृष्ट्वाथ न्यग्रोधं केशवो महान् ।
तच्छायायां निवासाय मतिं चक्रे तदा प्रभुः ॥
घूमते- घूमते महात्मा भगवान् केशवने भाण्डीर नामक वटवृक्ष देखा और उसकी छायामें बैठनेका विचार किया ।
स तत्र वयसा तुल्यैः वत्सपालैः सहानघ ।
रेमे स दिवसान् कृष्णः पुरा स्वर्गपुरे तथा ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! वहाँ श्रीकृष्ण समान अवस्थावाले दूसरे गोपबालकोंके साथ बछड़े चराते थे, दिनभर खेल -कूद करते थे और पहले दिव्य धाममें जिस प्रकार वे आनन्दित होते थे, उसी प्रकार वनमें आनन्दपूर्वक दिन बिताते थे ।
तं क्रीडमानं गोपालाः कृष्णं भाण्डीरवासिनः ।
रमयन्ति स्म बहवो मान्यैः क्रीडनकैस्तदा ॥
अन्ये स्म परिगायन्ति गोपा मुदितमानसाः ।
गोपालाः कृष्णमेवान्ये गायन्ति स्म वनप्रियाः ॥
भाण्डीरवनमें निवास करनेवाले बहुत से ग्वाले वहाँ क्रीड़ा करते हुए श्रीकृष्णको अच्छे - अच्छे खिलौनोंद्वारा प्रसन्न रखते थे । दूसरे प्रसन्नचित्त रहनेवाले गोप, जिन्हें वनमें घूमना प्रिय था, सदा श्रीकृष्णकी महिमाका गान किया करते थे ।
तेषां संगायतामेव वादयामास केशवः ।
पर्णवाद्यान्तरे वेणुं तुम्बं वीणां च तत्र वै ॥
एवं क्रीडान्तरैः कृष्णो गोपालैर्विजहार सः । जब वे गीत गाते, उस समय भगवान् श्रीकृष्ण पत्तोंके बाजोंके बीच -बीचमें वेणु, तुम्बी और वीणा बजाया करते थे । इस प्रकार विभिन्न लीलाओंद्वारा श्रीकृष्ण गोपबालकोंके साथ
खेलते थे ।
तेन बालेन कौन्तेय कृतं लोकहितं तदा ॥
पश्यतां सर्वभूतानां वासुदेवेन भारत । भरतनन्दन! उस समय बालक श्रीकृष्णने सम्पूर्ण भूतोंके देखते -देखते लोकहितके
अनेक कार्य किये ।
ह्रदे नीपवने तत्र क्रीडितं नागमूर्धनि ॥
कालियं शासयित्वा तु सर्वलोकस्य पश्यतः ।
विजहार ततः कृष्णो बलदेवसहायवान् ॥
वृन्दावनमें कदम्बवनके पास जो ह्रद ( कुण्ड ) था, उसमें प्रवेश करके उन्होंने कालियनागके मस्तक- पर नृत्यक्रीड़ा की थी । फिर सब लोगोंके सामने ही कालियनागको
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अन्यत्र जानेका आदेश देकर वे बलदेवजीके साथ वनमें इधर - उधर विचरण करने लगे ।
धेनुको दारुणो दैत्यो राजन् रासभविग्रहः ।
तदा तालवने राजन् बलदेवेन वै हतः ॥
राजन्! तालवनमें धेनुक नामक भयंकर दैत्य निवास करता था, जो गधेका रूप धारण करके रहता था । उस समय वह बलदेवजीके हाथसे मारा गया । ततः कदाचित् कौन्तेय रामकृष्णौ वनं गतौ । चारयन्तौ प्रवृद्धानि गोधनानि शुभाननौ । कुन्तीनन्दन! तदनन्तर किसी समय सुन्दर मुखवाले बलराम और श्रीकृष्ण अपने बढ़े हुए गोधनको चरानेके लिये वनमें गये ।
विहरन्तौ मुदा युक्तौ वीक्षमाणौ वनानि वै ।
क्ष्वेलयन्तौ प्रगायन्तौ विचिन्वन्तौ च पादपान् ॥
वहाँ वनकी शोभा निहारते हुए वे दोनों भाई घूमते, खेलते, गीत गाते और विभिन्न वृक्षोंकी खोज करते हुए बड़े प्रसन्न होते थे ।
नामभिर्व्याहरन्तौ च वत्सान् गाश्च परंतपौ ।
चेरतुर्लोकसिद्धाभिः क्रीडाभिरपराजितौ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों अजेय वीर वहाँ गौओं और बछड़ोंको नाम ले - लेकर बुलाते और लोकप्रचलित बालोचित क्रीड़ाएँ करते रहते थे । तौ देवौ मानुषीं दीक्षां वहन्तौ सुरपूजितौ ।
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तज्जातिगुणयुक्ताभिः क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम् ॥ वे दोनों देववन्दित देवता थे तो भी मानवी दीक्षा ग्रहण करनेके कारण मानव जातिके अनुरूप गुणोंवाली क्रीड़ाएँ करते हुए वनमें विचरते थे ।
ततः कृष्णो महातेजास्तदा गत्वा तु गोव्रजम् ।
गिरियज्ञं तमेवैष प्रकृतं गोपदारकैः ॥
बुभुजे पायसं शौरिरीश्वरः सर्वभूतकृत् । तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीकृष्ण गौओंके व्रजमें जाकर गोपबालकोंद्वारा किये जानेवाले गिरियज्ञमें सम्मिलित हो वहाँ सर्वभूतस्रष्टा ईश्वरके रूपमें अपनेको प्रकट करके ( गिरिराजके
लिये समर्पित ) खीरको स्वयं ही खाने लगे ।
तं दृष्ट्वा गोपकाः सर्वे कृष्णमेव समर्चयन् ॥
पूज्यमानस्ततो गोपैर्दिव्यं वपुरधारयत् । उन्हें देखकर सब गोप भगवदबुद्धिसे श्रीकृष्णके उस स्वरूपकी ही पूजा करने लगे ।
गोपालोंद्वारा पूजित श्रीकृष्णने दिव्य रूप धारण कर लिया ।
धृतो गोवर्धनो नाम सप्ताहं पर्वतस्तदा ॥
शिशुना वासुदेवेन गवार्थमरिमर्दन । शत्रुमर्दन युधिष्ठिर! ( जब इन्द्र वर्षा कर रहे थे, उस समय) बालक वासुदेवने गौओंकी
रक्षाके लिये एक सप्ताहतक गोवर्धन पर्वतको अपने हाथपर उठा रखा था ।
क्रीडमानस्तदा कृष्णः कृतवान् कर्म दुष्करम् ॥
तदद्भुतमिवात्रासीत् सर्वलोकस्य भारत । भरतनन्दन! उस समय श्रीकृष्णने खेल- खेल में ही अत्यन्त दुष्कर कर्म कर डाला, जो
सब लोगोंके लिये अत्यन्त अद्भुत - सा था ।
देवदेवः क्षितिं गत्वा कृष्णं दृष्ट्वा मुदान्वितः ॥
गोविन्द इति तं ह्युक्त्वा ह्यभ्यषिञ्चत् पुरंदरः । इत्युक्त्वाऽऽश्लिष्य गोविन्दं पुरुहूतोऽभ्ययाद् दिवम् । देवाधिदेव इन्द्रने भूतलपर जाकर जब श्रीकृष्णको ( गोवर्धन धारण किये ) देखा, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने श्रीकृष्णको ' गोविन्द ' नाम देकर उनका ( ' गवेन्द्र' पदपर) अभिषेक किया । देवराज इन्द्र गोविन्दको हृदयसे लगाकर उनकी अनुमति ले स्वर्गलोकको चले गये ।
अथारिष्ट इति ख्यातं दैत्यं वृषभविग्रहम् ।
जघान तरसा कृष्णः पशूनां हितकाम्यया ॥
तदनन्तर श्रीकृष्णने पशुओंके हितकी कामनासे वृषभरूपधारी अरिष्ट नामक दैत्यको वेगपूर्वक मार गिराया । केशिनं नाम दैतेयं राजन् वै हयविग्रहम् ।
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तथा वनगतं पार्थ गजायुतबलं हयम् ॥ प्रहितं भोजपुत्रेण जघान पुरुषोत्तमः । राजन्! व्रजमें केशी नामका एक दैत्य रहता था, जिसका शरीर घोड़ेके समान था । उसमें दस हजार हाथियोंका बल था । कुन्तीनन्दन! उस अश्वरूपधारी दैत्यको भोजकुलोत्पन्न कंसने भेजा था । वृन्दावनमें आनेपर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने उसे भी
अरिष्टासुरकी भाँति मार दिया ।
आन्ध्रं मल्लं च चाणूरं निजघान महासुरम् ॥
कंसके दरबारमें एक आन्ध्रदेशीय मल्ल था, जिसका नाम था चाणूर । वह एक महान् असुर था । श्रीकृष्णने उसे भी मार डाला ।
सुनामानममित्रघ्नं सर्वसैन्यपुरस्कृतम् ।
बालरूपेण गोविन्दो निजघान च भारत ॥
भरतनन्दन! ( कंसका भाई) शत्रुनाशक सुनामा कंसकी सारी सेनाका अगुआ— सेनापति था । गोविन्द अभी बालक थे, तो भी उन्होंने सुनामाको मार दिया । बलदेवेन चायत्तः समाजे मुष्टिको हतः । भारत! ( दंगल देखनेके लिये जुटे हुए) जनसमाजमें युद्धके लिये तैयार खड़े हुए मुष्टिक
नामक पहलवानको बलरामजीने अखाड़ेमें ही मार दिया ।
त्रासितश्च तदा कंसः स हि कृष्णेन भारत ॥
युधिष्ठिर! उस समय श्रीकृष्णने कंसके मनमें भारी भय उत्पन्न कर दिया ।
ऐरावतं युयुत्सन्तं मातङ्गानामिवर्षभम् ।
कृष्णः कुवलयापीडं हतवांस्तस्य पश्यतः ॥
हाथियोंमें श्रेष्ठ कुवलयापीडको, जो ऐरावतकुलमें उत्पन्न हुआ था और श्रीकृष्णको कुचल देना चाहता था, श्रीकृष्णने कंसके देखते - देखते ही मार गिराया ।