श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1921–1930

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1921–1930

पृष्ठ 1921

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हत्वा कंसममित्रघ्नः सर्वेषां पश्यतां तदा ।

अभिषिच्योग्रसेनं तं पित्रोः पादमवन्दत ॥

फिर शत्रुनाशन श्रीकृष्णने सब लोगोंके सामने ही कंसको मारकर उग्रसेनको राजपदपर अभिषिक्त कर दिया और अपने माता - पिता देवकी - वसुदेवके चरणोंमें प्रणाम किया ।

एवमादीनि कर्माणि कृतवान् वै जनार्दनः ।

उवास कतिचित् तत्र दिनानि सहलायुधः ॥

इस प्रकार जनार्दनने कितने ही अद्भुत कार्य किये और कुछ दिनोंतक बलरामजीके साथ वे मथुरा में ही रहे ।

ततस्तौ जग्मतुस्तात गुरुं सान्दीपनिं पुनः ।

गुरुशुश्रूषया युक्तौ धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ ॥

तात युधिष्ठिर! तदनन्तर वे दोनों धर्मज्ञ भाई गुरु सान्दीपनिके यहाँ ( उज्जयिनीपुरीमें ) विद्याध्ययनके लिये गये । वहाँ वे गुरुसेवा- परायण हो सदा धर्मके ही अनुष्ठानमें लगे रहे ।

व्रतमुग्रं महात्मानौ विचरन्तावतिष्ठताम् ।

अहोरात्रचतुष्षष्ट्या षडङ्गं वेदमापतुः ॥

वे दोनों महात्मा कठोर व्रतका पालन करते हुए वहाँ रहते थे । उन्होंने चौंसठ दिन - रातमें ही छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लिया ।

लेख्यं च गणितं चोभौ प्राप्नुतां यदुनन्दनौ ।

गान्धर्ववेदं वैद्यं च सकलं समवापतुः ॥

पृष्ठ 1922

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इतना ही नहीं, उन यदुकुलकुमारोंने लेख्य ( चित्रकला ), गणित, गान्धर्ववेद तथा सारे वेदको भी उतने ही समयके भीतर जान लिया ।

हस्तिशिक्षामश्वशिक्षां द्वादशाहेन चापतुः ।

तावुभौ जग्मतुर्वीरौ गुरुं सान्दीपनिं पुनः ॥

धनुर्वेदचिकीर्षार्थं धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ । गजशिक्षा तथा अश्वशिक्षाको तो उन्होंने कुल बारह दिनोंमें ही प्राप्त कर लिया । इसके बाद वे दोनों धर्मज्ञ एवं धर्मपरायण वीर धनुर्वेद सीखनेके लिये पुनः सान्दीपनि मुनिके पास

गये ।

ताविष्वस्त्रवराचार्यमभिगम्य प्रणम्य च ॥

तेन तौ सत्कृतौ राजन् विचरन्ताववन्तिषु । राजन्! धनुर्वेदके श्रेष्ठ आचार्य सान्दीपनिके पास जाकर उन दोनोंने प्रणाम किया । सान्दीपनिने उन्हें सत्कारपूर्वक अपनाया एवं वे फिर अवन्तीमें विचरते हुए वहाँ रहने लगे । पञ्चाशद्भिरहोरात्रैर्दशाङ्गं सुप्रतिष्ठितम् ॥ सरहस्यं धनुर्वेदं सकलं ताववापतुः । पचास दिन - रातमें ही उन दोनोंने दस अंगोंसे युक्त, सुप्रतिष्ठित एवं रहस्यसहित सम्पूर्ण

धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया ।

दृष्ट्वा कृतास्त्रौ विप्रेन्द्रो गुर्वर्थे तावचोदयत् ॥

अयाचतार्थं गोविन्दं ततः सान्दीपनिर्विभुः । उन दोनों भाइयोंको अस्त्र - विद्यामें निपुण देखकर विप्रवर सान्दीपनिने उन्हें गुरुदक्षिणा देनेकी आज्ञा दी । सान्दीपनिजी सब विषयोंमें विद्वान् थे । उन्होंने श्रीकृष्णसे अपने अभीष्ट मनोरथकी याचना इस प्रकार की । सान्दीपनिरुवाच मम पुत्रः समुद्रेऽस्मिंस्तिमिना चापवाहितः ॥ पुत्रमानय भद्रं ते भक्षितं तिमिना मम । सान्दीपनिजी बोले- मेरा पुत्र इस समुद्रमें नहा रहा था, उस समय ‘ तिमि ' नामक जलजन्तु उसे पकड़कर भीतर ले गया और उसके शरीरको खा गया । तुम दोनोंका भला हो । मेरे उस मरे हुए पुत्रको जीवित करके यहाँ ला दो । भीष्म उवाच आर्ताय गुरवे तत्र प्रतिशुश्राव दुष्करम् ॥ अशक्यं त्रिषु लोकेषु कर्तुमन्येन केनचित् । भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इतना कहते - कहते गुरु सान्दीपनि पुत्रशोकसे आर्त हो गये । यद्यपि उनकी माँग बहुत कठिन थी, तीनों लोकोंमें दूसरे किसी पुरुषके लिये इस

पृष्ठ 1923

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कार्यका साधन करना असम्भव था, तो भी श्रीकृष्णने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली । यश्च सान्दीपनेः पुत्रं जघान भरतर्षभ ॥ सोऽसुरः समरे ताभ्यां समुद्रे विनिपातितः । भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपनिके पुत्रको मारा था, उस असुरको उन दोनों भाइयोंने युद्ध

करके समुद्रमें मार गिराया ।

ततः सान्दीपनेः पुत्रः प्रसादादमितौजसः ॥

दीर्घकालं गतः प्रेतं पुनरासीच्छरीरवान् । तदनन्तर अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके कृपाप्रसादसे सान्दीपनिका पुत्र, जो

दीर्घकालसे यमलोकमें जा चुका था, पुनः पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा ।

तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्ट्वा सुमहदद्भुतम् ॥

सर्वेषामेव भूतानां विस्मयः समजायत । वह अशक्य, अचिन्त्य और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियोंको बड़ा

आश्चर्य हुआ ।

ऐश्वर्याणि च सर्वाणि गवाश्वं च धनानि च ॥

सर्वं तदुपजहाते गुरवे रामकेशवौ ।

ततस्तं पुत्रमादाय ददौ च गुरवे प्रभुः ॥

बलराम और श्रीकृष्णने अपने गुरुको सब प्रकारके ऐश्वर्य, गाय, घोड़े और प्रचुर धन सब कुछ दिये । तत्पश्चात् गुरुपुत्रको लेकर भगवान्ने गुरुजीको सौंप दिया ।

तं दृष्ट्वा पुत्रमायान्तं सान्दीपनिपुरे जनाः ।

अशक्यमेतत् सर्वेषामचिन्त्यमिति मेनिरे ॥

कश्च नारायणादन्यश्चिन्तयेदिदमद्भुतम् । उस पुत्रको आया देख सान्दीपनिके नगरके लोग यह मान गये कि श्रीकृष्णके द्वारा यह ऐसा कार्य सम्पन्न हुआ है, जो अन्य सब लोगोंके लिये असम्भव और अचिन्त्य है । भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो इस अद्भुत कार्यको सोच भी सके ( करना

तो दूरकी बात है ) ।

गदापरिघयुद्धेषु सर्वास्त्रेषु च केशवः ॥

परमां मुख्यतां प्राप्तः सर्वलोकेषु विश्रुतः । भगवान् श्रीकृष्णने गदा और परिघके युद्धमें तथा सम्पूर्ण अस्त्र - शस्त्रोंके ज्ञानमें सबसे

श्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लिया । वे समस्त लोकोंमें विख्यात हो गये ।

भोजराजतनूजोऽपि कंसस्तात युधिष्ठिर ॥

अस्त्रज्ञाने बले वीर्ये कार्तवीर्यसमोऽभवत् । तात युधिष्ठिर! भोजराजकुमार कंस भी अस्त्रज्ञान, बल और पराक्रममें कार्तवीर्य अर्जुनकी समानता करता था ।

पृष्ठ 1924

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तस्य भोजपतेः पुत्राद् भोजराज्यविवर्धनात् ॥ उद्विजन्ते स्म राजानः सुपर्णादिव पन्नगाः । भोजवंशके राज्यकी वृद्धि करनेवाले भोजराजकुमार कंससे भूमण्डलके सब राजा

उसी प्रकार उद्विग्न रहते थे, जैसे गरुड़से सर्प ।

चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशविमलप्रासयोधिनः ॥

शतं शतसहस्राणि पादातास्तस्य भारत । भरतनन्दन! उसके यहाँ धनुष, खड्ग और चमचमाते हुए भाले लेकर विचित्र प्रकारसे

युद्ध करनेवाले एक करोड़ पैदल सैनिक थे ।

अष्टौ शतसहस्राणि शूराणामनिवर्तिनाम् ॥

अभवन् भोजराजस्य जाम्बूनदमयध्वजाः । भोजराजके रथी सैनिक, जिनके रथोंपर सुवर्णमय ध्वज फहराते रहते थे तथा जो शूरवीर होनेके साथ ही युद्धमें कभी पीठ दिखलानेवाले नहीं थे, आठ लाखकी संख्यामें थे । स्फुरत्काञ्चनकक्ष्यास्तु गजास्तस्य युधिष्ठिर ॥ तावन्त्येव सहस्राणि गजानामनिवर्तिनाम् । युधिष्ठिर! कंसके यहाँ युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले हाथीसवार भी आठ ही लाख थे ।

उनके हाथियोंकी पीठपर सुवर्णके चमकीले हौदे कसे होते थे ।

ते च पर्वतसङ्काशाश्चित्रध्वजपताकिनः ॥

बभूवुर्भोजराजस्य नित्यं प्रमुदिता गजाः । भोजराजके वे पर्वताकार गजराज विचित्र ध्वजा -पताकाओंसे सुशोभित होते थे और सदा संतुष्ट रहते थे ।

स्वलङ्कृतानां शीघ्राणां करेणूनां युधिष्ठिर ।

अभवद् भोजराजस्य द्विस्तावद्धि महद् बलम् ॥

युधिष्ठिर! भोजराज कंसके यहाँ आभूषणोंसे सजी हुई शीघ्रगामिनी हथिनियोंकी विशाल सेना गजराजोंकी अपेक्षा दूनी थी ।

षोडशाश्वसहस्राणि किंशुकाभानि तस्य वै ।

अपरस्तु महाव्यूहः किशोराणां युधिष्ठिर ॥

आरोहवरसम्पन्नो दुर्धर्षः केनचिद् बलात् ।

स च षोडशसाहस्रः कंसभ्रातृपुरस्सरः ॥

उसके यहाँ सोलह हजार घोड़े ऐसे थे, जिनका रंग पलासके फूलकी भाँति लाल था । राजन्! किशोर- अवस्थाके घोड़ोंका एक दूसरा दल भी मौजूद था, जिसकी संख्या सोलह हजार थी । इन अश्वोंके सवार भी बहुत अच्छे थे । इस अश्वसेनाको कोई भी बलपूर्वक दबा नहीं सकता था । कंसका भाई सुनामा इन सबका सरदार था । सुनामा सदृशस्तेन स कंसं पर्यपालयत् ।

पृष्ठ 1925

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वह भी कंसके ही समान बलवान् था एवं सदा कंसकी रक्षाके लिये तत्पर रहता था ।

य आसन् सर्ववर्णास्तु हयास्तस्य युधिष्ठिर ॥

स गणो मिश्रको नाम षष्टिसाहस्र उच्यते । युधिष्ठिर! कंसके यहाँ घोड़ोंका एक और भी बहुत बड़ा दल था, जिसमें सभी रंगके

घोड़े थे । उस दलका नाम था मिश्रक । मिश्रकोंकी संख्या साठ हजार बतलायी जाती है ।

कंसरोषमहावेगां ध्वजानूपमहाद्रुमाम् ॥

मत्तद्विपमहाग्राहां वैवस्वतवशानुगाम् । ( कंसके साथ होनेवाला महान् समर एक भयंकर नदीके समान था । ) कंसका रोष ही उस नदीका महान् वेग था । ऊँचे- ऊँचे ध्वज तटवर्ती वृक्षोंके समान जान पड़ते थे । मतवाले

हाथी बड़े - बड़े ग्राहोंके समान थे । वह नदी यमराजकी आज्ञाके अधीन होकर चलती थी ।

शस्त्रजालमहाफेनां सादिवेगमहाजलाम् ॥

गदापरिघपाठीनां नानाकवचशैवलाम् । अस्त्र- शस्त्रोंके समूह उसमें फेनका भ्रम उत्पन्न करते थे । सवारोंका वेग उसमें महान् जलप्रवाह -सा प्रतीत होता था । गदा और परिघ पाठीन नामक मछलियोंके सदृश जान

पड़ते थे । नाना प्रकारके कवच सेवारके समान थे ।

रथनागमहावर्तां नानारुधिरकर्दमाम् ॥

चित्रकार्मुककल्लोलां रथाश्वकलिलह्रदाम् । रथ और हाथी उसमें बड़ी- बड़ी भँवरोंका दृश्य उपस्थित करते थे । नाना प्रकारका रक्त ही कीचड़का काम करता था । विचित्र धनुष उठती हुई लहरोंके समान जान पड़ते थे । रथ

और अश्वोंका समूह ह्रदके समान था ।

महामृधनदीं घोरां योधावर्तननिःस्वनाम् ॥

को वा नारायणादन्यः कंसहन्ता युधिष्ठिर । योद्धाओंके इधर- उधर दौड़ने या बोलनेसे जो शब्द होता था, वही उस भयानक समर-सरिताका कलकल नाद था । युधिष्ठिर! भगवान् नारायणके सिवा ऐसे कंसको कौन मार सकता था? एष शक्ररथे तिष्ठंस्तान्यनीकानि भारत ॥ व्यधमद् भोजपुत्रस्य महाभ्राणीव मारुतः । भारत! जैसे हवा बड़े - बड़े बादलोंको छिन्न- भिन्न कर देती है, उसी प्रकार इन भगवान्

श्रीकृष्णने इन्द्रके रथमें बैठकर कंसकी उपर्युक्त सारी सेनाओंका संहार कर डाला ।

तं सभास्थं सहामात्यं हत्वा कंसं सहान्वयम् ॥

मानयामास मानार्हां देवकीं ससुहृद्गणाम् । सभामें विराजमान कंसको मन्त्रियों और परिवारके साथ मारकर श्रीकृष्णने सुहृदोंसहित सम्माननीय माता देवकीका समादर किया ।

पृष्ठ 1926

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यशोदां रोहिणीं चैव अभिवाद्य पुनः पुनः ॥

उग्रसेनं च राजानमभिषिच्य जनार्दनः ।

अर्चितो यदुमुख्यैश्च भगवान् वासवानुजः ॥

जनार्दनने यशोदा और रोहिणीको भी बारंबार प्रणाम करके उग्रसेनको राजाके पदपर अभिषिक्त किया । उस समय यदुकुलके प्रधान प्रधान पुरुषोंने इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीहरिका पूजन किया ।

ततः पार्थिवमायान्तं सहितं सर्वराजभिः ।

सरस्वत्यां जरासंधमजयत् पुरुषोत्तमः ॥

तदनन्तर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने समस्त राजाओंके सहित आक्रमण करनेवाले राजा जरासंधको सरोवरों या ह्रदोंसे सुशोभित यमुनाके तटपर परास्त किया । (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

पृष्ठ 1927

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[नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना ] भीष्मउवाच

शूरसेनपुरं त्यक्त्वा सर्वयादवनन्दनः ।

द्वारकां भगवान् कृष्णः प्रत्यपद्यत केशवः ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त यदुवंशियोंको आनन्दित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण शूरसेनपुरी मथुराको छोड़कर द्वारकामें चले गये ।

प्रत्यपद्यत यानानि रत्नानि च बहूनि च ।

यथार्ह पुण्डरीकाक्षो नैर्ऋतान् प्रतिपालयन् ॥

कमलनयन श्रीकृष्णने असुरोंको पराजित करके जो बहुत- से रत्न और वाहन प्राप्त किये थे, उनका वे द्वारकामें यथोचितरूपसे संरक्षण करते थे ।

तत्र विघ्नं चरन्ति स्म दैतेयाः सह दानवैः ।

ताञ्जघान महाबाहुः वरमत्तान् महासुरान् ॥

उनके इस कार्यमें दैत्य और दानव विघ्न डालने लगे । तब महाबाहु श्रीकृष्णने वरदानसे उन्मत्त हुए उन बड़े - बड़े असुरोंको मार डाला ।

स विघ्नमकरोत् तत्र नरको नाम नैर्ऋतः ।

त्रासनः सुरसंघानां विदितो वः प्रभावतः ॥

तत्पश्चात् नरक नामक राक्षसने भगवान्‌के कार्यमें विघ्न डालना आरम्भ किया । वह समस्त देवताओंको भयभीत करनेवाला था । राजन्! तुम्हें तो उसका प्रभाव विदित ही है ।

स भूम्यां मूर्तिलिङ्गस्थः सर्वदेवासुरान्तकः ।

मानुषाणामृषीणां च प्रतीपमकरोत् तदा ॥

समस्त देवताओंके लिये अन्तकरूप नरकासुर इस धरतीके भीतर मूर्तिलिंगमें* स्थित हो मनुष्यों और ऋषियोंके प्रतिकूल आचरण किया करता था ।

त्वष्टुर्दुहितरं भौमः कशेरुमगमत् तदा ।

गजरूपेण जग्राह रुचिराङ्गीं चतुर्दशीम् ॥

भूमिका पुत्र होनेसे नरकको भौमासुर भी कहते हैं । उसने हाथीका रूप धारण करके प्रजापति त्वष्टाकी पुत्री कशेरुके पास जाकर उसे पकड़ लिया। कशेरु बड़ी सुन्दरी और चौदह वर्षकी अवस्थावाली थी ।

प्रमथ्य च जहारैतां हृत्वा च नरकोऽब्रवीत् ।

नष्टशोकभयाबाधः प्राग्ज्योतिषपतिस्तदा ॥

पृष्ठ 1928

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नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका राजा था । उसके शोक, भय और बाधाएँ दूर हो गयी थीं । उसने कशेरुको मूर्च्छित करके हर लिया और अपने घर लाकर उससे इस प्रकार कहा । नरक उवाच

यानि देवमनुष्येषु रत्नानि विविधानि च ।

बिभर्ति च मही कृत्स्ना सागरेषु च यद् वसु ॥

अद्यप्रभृति तद् देवि सहिताः सर्वनैरृताः ।

तवैवोपहरिष्यन्ति दैत्याश्च सह दानवैः ॥

नरकासुर बोला — देवि! देवताओं और मनुष्योंके पास जो नाना प्रकारके रत्न हैं, सारी पृथ्वी जिन रत्नोंको धारण करती है तथा समुद्रोंमें जो रत्न संचित हैं, उन सबको आजसे सभी राक्षस ला- लाकर तुम्हें ही अर्पित किया करेंगे । दैत्य और दानव भी तुम्हें उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट देंगे । भीष्म उवाच

एवमुत्तमरत्नानि बहूनि विविधानि च ।

स जहार तदा भौमः स्त्रीरत्नानि च भारत ॥

भीष्मजी कहते हैं— भारत! इस प्रकार भौमासुरने नाना प्रकारके बहुत - से उत्तम रत्नों तथा स्त्री- रत्नोंका भी अपहरण किया ।

गन्धर्वाणां च याः कन्या जहार नरको बलात् ।

याश्च देवमनुष्याणां सप्त चाप्सरसां गणाः ॥

गन्धर्वोंकी जो कन्याएँ थीं, उन्हें भी नरकासुर बलपूर्वक हर लाया । देवताओं और मनुष्योंकी कन्याओं तथा अप्सराओंके सात समुदायोंका भी उसने अपहरण कर लिया ।

चतुर्दशसहस्राणां चैकविंशच्छतानि च ।

एकवेणीधराः सर्वाः सतां मार्गमनुव्रताः ॥

इस प्रकार सोलह हजार एक सौ सुन्दरी कुमारियाँ उसके घरमें एकत्र हो गयीं । वे सब-की- सब सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करके व्रत और नियमके पालनमें तत्पर हो एक वेणी धारण करती थीं । तासामन्तःपुरं भौमोऽकारयन्मणिपर्वते । औदकायामदीनात्मा मुरस्य विषयं प्रति । उत्साहयुक्त मनवाले भौमासुरने उनके रहनेके लिये मणिपर्वतपर अन्तःपुरका निर्माण कराया । उस स्थानका नाम था औदका (जलकी सुविधासे सम्पन्न भूमि ) । वह अन्तःपुर मुर नामक दैत्यके अधिकृत प्रदेशमें बना था ।

ताश्च प्राग्ज्योतिषो राजा मुरस्य दश चात्मजाः ।

नैर्ऋताश्च यथा मुख्याः पालयन्त उपासते ॥

पृष्ठ 1929

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प्राग्ज्योतिषपुरका राजा भौमासुर, मुरके दस पुत्र तथा प्रधान-प्रधान राक्षस उस अन्तःतःपुरकी रक्षा करते हुए सदा उसके समीप ही रहते थे ।

स एव तपसां पारे वरदत्तो महीसुतः ।

अदितिं धर्षयामास कुण्डलार्थं युधिष्ठिर ॥

युधिष्ठिर! पृथ्वीपुत्र भौमासुर तपस्याके अन्तमें वरदान पाकर इतना गर्वोन्मत्त हो गया था कि इसने कुण्डलके लिये देवमाता अदितितकका तिरस्कार कर दिया ।

न चासुरगणैः सर्वैः सहितैः कर्म तत् पुरा ।

कृतपूर्वं महाघोरं यदकार्षीन्महासुरः ॥

पूर्वकालमें समस्त महादैत्योंने एक साथ मिलकर भी वैसा अत्यन्त घोर पाप नहीं किया था, जैसा अकेले इस महान् असुरने कर डाला था ।

यं मही सुषुवे देवी यस्य प्राग्ज्योतिषं पुरम् ।

विषयान्तपालाश्चत्वारो यस्यासन् युद्धदुर्मदाः ॥

पृथ्वीदेवीने उसे उत्पन्न किया था, प्राग्ज्योतिषपुर उसकी राजधानी थी तथा चार युद्धोन्मत्त दैत्य उसके राज्यकी सीमाकी रक्षा करनेवाले थे ।

आदेवयानमावृत्य पन्थानं पर्यवस्थिताः ।

त्रासनाः सुरसङ्घानां विरूपै राक्षसैः सह ॥

वे पृथ्वीसे लेकर देवयानतकके मार्गको रोककर खड़े रहते थे । भयानक रूपवाले राक्षसोंके साथ रहकर वे देवसमुदायको भयभीत किया करते थे ।

हयग्रीवो निशुम्भश्च घोरः पञ्चजनस्तथा ।

मुरः पुत्रसहस्रैश्च वरदत्तो महासुरः ॥

उन चारों दैत्योंके नाम इस प्रकार हैं - हयग्रीव, निशुम्भ, भयंकर पंचजन तथा सहस्र पुत्रोंसहित महान् असुर मुर, जो वरदान प्राप्त कर चुका था ।

तद्वधार्थं महाबाहुरेष चक्रगदासिधृक् ।

जातो वृष्णिषु देवक्यां वासुदेवो जनार्दनः ॥

उसीके वधके लिये चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले ये महाबाहु श्रीकृष्ण वृष्णिकुलमें देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए हैं । वसुदेवजीके पुत्र होनेसे ये जनार्दन ‘ वासुदेव ’ कहलाते हैं ।

तस्यास्य पुरुषेन्द्रस्य लोकप्रथिततेजसः ।

निवासो द्वारका तात विदितो वः प्रधानतः ॥

तात युधिष्ठिर! इनका तेज सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है । इन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका निवासस्थान प्रधानतः द्वारका ही है, यह तुम सब लोग जानते हो ।

अतीव हि पुरी रम्या द्वारका वासवक्षयात् ।

अति वै राजते पृथ्व्यां प्रत्यक्षं ते युधिष्ठिर ॥

पृष्ठ 1930

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द्वारकापुरी इन्द्रके निवासस्थान अमरावती पुरीसे भी अत्यन्त रमणीय है । युधिष्ठिर! भूमण्डलमें द्वारकाकी शोभा सबसे अधिक है । यह तो तुम प्रत्यक्ष ही देख चुके हो।

तस्मिन् देवपुरप्रख्ये सा सभा वृष्ण्युपाश्रया ।

या दाशार्हीति विख्याता योजनायतविस्तृता ॥

देवपुरीके समान सुशोभित द्वारका नगरीमें वृष्णिवंशियोंके बैठनेके लिये एक सुन्दर सभा है, जो दाशार्हीके नामसे विख्यात है । उसकी लम्बाई और चौड़ाई एक- एक योजनकी है।

तत्र वृष्ण्यन्धकाः सर्वे रामकृष्णपुरोगमाः ।

लोकयात्रामिमां कृत्स्नां परिरक्षन्त आसते ॥

उसमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि वृष्णि और अन्धकवंशके सभी लोग बैठते हैं और सम्पूर्ण लोक- जीवनकी रक्षामें दत्तचित्त रहते हैं ।

तत्रासीनेषु सर्वेषु कदाचिद् भरतर्षभ ।

दिव्यगन्धा ववुर्वाताः कुसुमानां च वृष्टयः ॥

भरतश्रेष्ठ! एक दिनकी बात है; सभी यदुवंशी उस सभामें विराजमान थे । इतनेमें ही दिव्य सुगन्धसे भरी हुई वायु चलने लगी और दिव्य कुसुमोंकी वर्षा होने लगी ।

ततः सूर्यसहस्राभस्तेजोराशिर्महाद्भुतः ।

मुहूर्तमन्तरिक्षेऽभूत् ततो भूमौ प्रतिष्ठितः ॥

तदनन्तर दो ही घड़ीके अंदर आकाशमें सहस्रों सूर्योंके समान महान् एवं अद्भुत तेजोराशि प्रकट हुई । वह धीरे- धीरे पृथ्वीपर आकर खड़ी हो गयी ।

मध्ये तु तेजसस्तस्य पाण्डरं गजमास्थितः ।

वृतो देवगणैः सर्वैर्वासवः प्रत्यदृश्यत ॥

उस तेजोमण्डलके भीतर श्वेत हाथीपर बैठे हुए इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंसहित दिखायी दिये ।

रामकृष्णौ च राजा च वृष्ण्यन्धकगणैः सह ।

उत्पत्य सहसा तस्मै नमस्कारमकुर्वत ॥

बलराम, श्रीकृष्ण तथा राजा उग्रसेन वृष्णि और अन्धकवंशके अन्य लोगोंके साथ सहसा उठकर बाहर आये और सबने देवराज इन्द्रको नमस्कार किया ।

सोऽवतीर्य गजात् तूर्णं परिष्वज्य जनार्दनम् ।

सस्वजे बलदेवं च राजानं च तमाहुकम् ॥

इन्द्रने हाथीसे उतरकर शीघ्र ही भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया । फिर बलराम तथा राजा उग्रसेनसे भी उसी प्रकार मिले ।

उद्धवं वसुदेवं च विकद्रं च महामतिम् ।

प्रद्युम्नसाम्बनिशठाननिरुद्धं ससात्यकिम् ॥