महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 281–290

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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नखतुण्डक्षताश्चैव सुस्रुवुः शोणितं बहु ॥ १५ ॥

गरुडसे पीड़ित और दूर फेंके गये देवता इधर- उधर भागने लगे । उनके नखों और चोंचसे क्षत - विक्षत हो वे अपने अंगोंसे बहुत - सा रक्त बहाने लगे ॥ १५ ॥

साध्याः प्राचीं सगन्धर्वा वसवो दक्षिणां दिशम् ।

प्रजग्मुः सहिता रुद्राः पतगेन्द्रप्रधर्षिताः ॥ १६ ॥

पक्षिराजसे पराजित हो साध्य और गन्धर्व पूर्व दिशाकी ओर भाग चले । वसुओं तथा रुद्रोंने दक्षिण दिशाकी शरण ली ॥ १६ ॥

दिशं प्रतीचीमादित्या नासत्यावुत्तरां दिशम् ।

मुहुर्मुहुः प्रेक्षमाणा युध्यमाना महौजसः ॥ १७ ॥

आदित्यगण पश्चिम दिशाकी ओर भागे तथा अश्विनीकुमारोंने उत्तर दिशाका आश्रय लिया । ये महा - पराक्रमी योद्धा बार- बार पीछे की ओर देखते हुए भाग रहे थे ॥ १७ ॥

अश्वक्रन्देन वीरेण रेणुकेन च पक्षिराट् ।

क्रथनेन च शूरेण तपनेन च खेचरः ॥ १८ ॥

उलूकश्वसनाभ्यां च निमेषेण च पक्षिराट् ।

प्ररुजेन च संग्रामं चकार पुलिनेन च ॥ १ ९ ॥

इसके बाद आकाशचारी पक्षिराज गरुडने वीर अश्वक्रन्द, रेणुक, शूरवीर क्रथन, तपन, उलूक, श्वसन, निमेष, प्ररुज तथा पुलिन– इन नौ यक्षोंके साथ युद्ध किया ॥ १८-१९ ॥

तान् पक्षनखतुण्डाग्रैरभिनद् विनतासुतः ।

युगान्तकाले संक्रुद्धः पिनाकीव परंतपः ॥ २० ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले विनताकुमारने प्रलय- कालमें कुपित हुए पिनाकधारी रुद्रकी भाँति क्रोधमें भरकर उन सबको पंखों, नखों और चोंचके अग्रभागसे विदीर्ण कर डाला ॥ २० ॥

महाबला महोत्साहास्तेन ते बहुधा क्षताः ।

रेजुरभ्रघनप्रख्या रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥ २१ ॥

वे सभी यक्ष बड़े बलवान् और अत्यन्त उत्साही थे; उस युद्धमें गरुडद्वारा बार- बार क्षत - विक्षत होकर वे सूनकी धारा बहाते हुए बादलोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ २१ ॥

तान् कृत्वा पतगश्रेष्ठः सर्वानुत्क्रान्तजीवितान् ।

अतिक्रान्तोऽमृतस्यार्थे सर्वतोऽग्निमपश्यत ॥ २२ ॥

पक्षिराज उन सबके प्राण लेकर जब अमृत उठानेके लिये आगे बढ़े, तब उसके चारों ओर उन्होंने आग जलती देखी ॥ २२ ॥

आवृण्वानं महाज्वालमर्चिर्भिः सर्वतोऽम्बरम् ।

दहन्तमिव तीक्ष्णांशुं चण्डवायुसमीरितम् ॥ २३ ॥

पृष्ठ 282

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वह आग अपनी लपटोंसे वहाँके समस्त आकाशको आवृत किये हुए थी । उससे बड़ी ऊँची ज्वालाएँ उठ रही थीं । वह सूर्यमण्डलकी भाँति दाह उत्पन्न करती और प्रचण्ड वायुसे प्रेरित हो अधिकाधिक प्रज्वलित होती रहती थी ॥ २३ ॥

ततो नवत्या नवतीर्मुखानां कृत्वा महात्मा गरुडस्तरस्वी । नदीः समापीय मुखैस्ततस्तैः सुशीघ्रमागम्य पुनर्जवेन ॥ २४ ॥

ज्वलन्तमग्निं तममित्रतापनः समास्तरत्पत्ररथो नदीभिः । ततः प्रचक्रे वपुरन्यदल्पं प्रवेष्टुकामोऽग्निमभिप्रशाम्य ॥ २५ ॥

तब वेगशाली महात्मा गरुडने अपने शरीरमें आठ हजार एक सौ मुख प्रकट करके उनके द्वारा नदियोंका जल पी लिया और पुनः बड़े वेगसे शीघ्रतापूर्वक वहाँ आकर उस जलती हुई आगपर वह सब जल उड़ेल दिया । इस प्रकार शत्रुओंको ताप देनेवाले पक्षवाहन गरुडने नदियोंके जलसे उस आगको बुझाकर अमृतके पास पहुँचनेकी इच्छासे एक दूसरा बहुत छोटा रूप धारण कर लिया ॥ २४-२५ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 283

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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः गरुडका अमृत लेकर लौटना, मार्गमें भगवान् विष्णुसे वर पाना एवं उनपर इन्द्रके द्वारा वज्र प्रहार सौतिरुवाच

जाम्बूनदमयो भूत्वा मरीचिनिकरोज्ज्वलः ।

प्रविवेश बलात् पक्षी वारिवेग इवार्णवम् ॥ १ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं — तदनन्तर जैसे जलका वेग समुद्रमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार पक्षिराज गरुड सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशमान सुवर्णमय स्वरूप धारण करके बलपूर्वक जहाँ अमृत था, उस स्थानमें घुस गये ॥ १ ॥

सचक्रं क्षुरपर्यन्तमपश्यदमृतान्तिके ।

परिभ्रमन्तमनिशं तीक्ष्णधारमयस्मयम् ॥ २ ॥

उन्होंने देखा, अमृतके निकट एक लोहेका चक्र घूम रहा है । उसके चारों ओर छुरे लगे हुए हैं । वह निरन्तर चलता रहता है और उसकी धार बड़ी तीखी है ॥ २ ॥

ज्वलनार्कप्रभं घोरं छेदनं सोमहारिणाम् ।

घोररूपं तदत्यर्थं यन्त्रं देवैः सुनिर्मितम् ॥ ३ ॥

वह घोर चक्र अग्नि और सूर्यके समान जाज्वल्यमान था। देवताओंने उस अत्यन्त भयंकर यन्त्रका निर्माण इसलिये किया था कि वह अमृत चुरानेके लिये आये हुए चोरोंके टुकड़े -टुकड़े कर डाले ॥ ३ ॥

तस्यान्तरं स दृष्ट्वैव पर्यवर्तत खेचरः ।

अरान्तरेणाभ्यपतत् संक्षिप्याङ्गं क्षणेन ह ॥ ४ ॥

पक्षी गरुड उसके भीतरका छिद्र- उसमें घुसनेका मार्ग देखते हुए खड़े रहे । फिर एक क्षणमें ही वे अपने शरीरको संकुचित करके उस चक्रके अरोंके बीचसे होकर भीतर घुस गये ॥ ४ ॥

अधश्चक्रस्य चैवात्र दीप्तानलसमद्युती ।

विद्युज्जिह्रौ महावीर्यौ दीप्तास्यौ दीप्तलोचनौ ॥ ५ ॥

चक्षुर्विषौ महाघोरौ नित्यं क्रुद्धौ तरस्विनौ ।

रक्षार्थमेवामृतस्य ददर्श भुजगोत्तमौ ॥ ६ ॥

वहाँ चक्रके नीचे अमृतकी रक्षाके लिये ही दो श्रेष्ठ सर्प नियुक्त किये गये थे । उनकी कान्ति प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ती थी । बिजलीके समान उनकी लपलपाती हुई जीभें, देदीप्यमान मुख और चमकती हुई आँखें थीं । वे दोनों सर्प बड़े पराक्रमी थे । उनके

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नेत्रोंमें ही विष भरा था । वे बड़े भयंकर, नित्य क्रोधी और अत्यन्त वेगशाली थे । गरुडने उन दोनोंको देखा ॥ ५-६ ॥

सदा संरब्धनयनौ सदा चानिमिषेक्षणौ ।

तयोरेकोऽपि यं पश्येत् स तूर्णं भस्मसाद् भवेत् ॥ ७ ॥

उनके नेत्रोंमें सदा क्रोध भरा रहता था । वे निरन्तर एकटक दृष्टिसे देखा करते थे ( उनकी आँखें कभी बंद नहीं होती थीं ) । उनमेंसे एक भी जिसे देख ले, वह तत्काल भस्म हो सकता था ॥ ७ ||

तयोश्चक्षूंषि रजसा सुपर्णः सहसावृणोत् ।

ताभ्यामदृष्टरूपोऽसौ सर्वतः समताडयत् ॥ ८ ॥

सुंदर पंखवाले गरुडजीने सहसा धूल झोंककर उनकी आँखें बंद कर दीं और उनसे अदृश्य रहकर ही वे सब ओरसे उन्हें मारने और कुचलने लगे ॥ ८ ॥

तयोरङ्गे समाक्रम्य वैनतेयोऽन्तरिक्षगः ।

आच्छिनत् तरसा मध्ये सोममभ्यद्रवत् ततः ॥ ९ ॥

समुत्पाट्यामृतं तत्र वैनतेयस्ततो बली ।

उत्पपात जवेनैव यन्त्रमुन्मथ्य वीर्यवान् ॥ १० ॥

आकाशमें विचरनेवाले महापराक्रमी विनता- कुमारने वेगपूर्वक आक्रमण करके उन दोनों सर्पोंके शरीरको बीचसे काट डाला; फिर वे अमृतकी ओर झपटे और चक्रको तोड़-फोड़कर अमृतके पात्रको उठाकर बड़ी तेजीके साथ वहाँसे उड़ चले ॥ ९ -१० ॥

अपीत्वैवामृतं पक्षी परिगृह्याशु निःसृतः ।

आगच्छदपरिश्रान्त आवार्यार्कप्रभां ततः ॥ ११ ॥

उन्होंने स्वयं अमृतको नहीं पीया, केवल उसे लेकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे निकल गये और सूर्यकी प्रभाका तिरस्कार करते हुए बिना थकावटके चले आये ॥ ११ ॥

विष्णुना च तदाकाशे वैनतेयः समेयिवान् ।

तस्य नारायणस्तुष्टस्तेनालौल्येन कर्मणा ॥ १२ ॥

उस समय आकाशमें विनतानन्दन गरुडकी भगवान् विष्णुसे भेंट हो गयी । भगवान् नारायण गरुडके लोलुपतारहित पराक्रमसे बहुत संतुष्ट हुए थे ॥ १२ ॥

तमुवाचाव्ययो देवो वरदोऽस्मीति खेचरम् ।

स वव्रे तव तिष्ठेयमुपरीत्यन्तरिक्षगः ॥ १३ ॥

अतः उन अविनाशी भगवान् विष्णुने आकाशचारी गरुडसे कहा - ' मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ । ' अन्तरिक्षमें विचरनेवाले गरुडने यह वर माँगा– ' प्रभो! मैं आपके ऊपर ( ध्वजमें ) स्थित होऊँ' ॥ १३ ॥

उवाच चैनं भूयोऽपि नारायणमिदं वचः ।

अजरश्चामरश्च स्याममृतेन विनाप्यहम् ॥ १४ ॥

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इतना कहकर वे भगवान् नारायणसे फिर यों बोले — ' भगवन्! मैं अमृत पीये बिना ही अजर - अमर हो जाऊँ' ॥ १४ ॥

एवमस्त्विति तं विष्णुरुवाच विनतासुतम् ।

प्रतिगृह्य वरौ तौ च गरुडो विष्णुमब्रवीत् ॥ १५ ॥

तब भगवान् विष्णुने विनतानन्दन गरुडसे कहा – ' एवमस्तु' – ऐसा ही हो । वे दोनों वर ग्रहण करके गरुडने भगवान् विष्णुसे कहा— ॥ १५ ॥

भवतेऽपि वरं दद्यां वृणोतु भगवानपि ।

तं वव्रे वाहनं विष्णुर्गरुत्मन्तं महाबलम् ॥ १६ ॥

‘ देव! मैं भी आपको वर देना चाहता हूँ। भगवान् भी कोई वर माँगें। ' तब श्रीहरिने महाबली गरुत्मान्से अपना वाहन होनेका वर माँगा ॥ १६ ॥

ध्वजं च चक्रे भगवानुपरि स्थास्यसीति तम् ।

एवमस्त्विति तं देवमुक्त्वा नारायणं खगः ॥ १७ ॥

वव्राज तरसा वेगाद् वायुं स्पर्धन् महाजवः ।

तं व्रजन्तं खगश्रेष्ठं वज्रेणेन्द्रोऽभ्यताडयत् ॥ १८ ॥

हरन्तममृतं रोषाद् गरुडं पक्षिणां वरम् । भगवान् विष्णुने गरुडको अपना ध्वज बना लिया - उन्हें ध्वजके ऊपर स्थान दिया और कहा — ' इस प्रकार तुम मेरे ऊपर रहोगे । ' तदनन्तर उन भगवान् नारायणसे ‘ एवमस्तु ’ कहकर पक्षी गरुड वहाँसे वेग- पूर्वक चले गये । महान् वेगशाली गरुड उस समय वायुसे होड़ लगाते चल रहे थे । पक्षियोंके सरदार उन खगश्रेष्ठ गरुडको अमृतका अपहरण करके लिये जाते देख इन्द्रने रोषमें भरकर उनके ऊपर वज्रसे आघात किया ॥ १७-१८३ ॥ तमुवाचेन्द्रमाक्रन्दे गरुडः पततां वरः ॥ १ ९ ॥

प्रहसश्लक्ष्णया वाचा तथा वज्रसमाहतः ।

ऋषेर्मानं करिष्यामि वज्रं यस्यास्थिसम्भवम् ॥ २० ॥

वज्रस्य च करिष्यामि तवैव च शतक्रतो ।

एतत् पत्रं त्यजाम्येकं यस्यान्तं नोपलप्स्यसे ॥ २१ ॥

विहंगप्रवर गरुडने उस युद्धमें वज्राहत होकर भी हँसते हुए मधुर वाणीमें इन्द्रसे कहा — ' देवराज! जिनकी हड्डीसे यह वज्र बना है, उन महर्षिका सम्मान मैं अवश्य करूँगा । शतक्रतो! ऋषिके साथ- साथ तुम्हारा और तुम्हारे वज्रका भी आदर करूँगा; इसीलिये मैं अपनी एक पाँख, जिसका तुम कहीं अन्त नहीं पा सकोगे, त्याग देता हूँ ॥ १ ९ –२१ ॥

न च वज्रनिपातेन रुजा मेऽस्तीह काचन ।

एवमुक्त्वा ततः पत्रमुत्ससर्ज स पक्षिराट् ॥ २२ ॥

' तुम्हारे वज्रके प्रहारसे मेरे शरीरमें कुछ भी पीड़ा नहीं हुई है । ' ऐसा कहकर पक्षिराजने अपना एक पंख गिरा दिया ॥ २२ ॥

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तदुत्सृष्टमभिप्रेक्ष्य तस्य पर्णमनुत्तमम् ।

हृष्टानि सर्वभूतानि नाम चक्रुर्गरुत्मतः ॥ २३ ॥

उस गिरे हुए परम उत्तम पंखको देखकर सब प्राणियोंको बड़ा हर्ष हुआ और उसीके आधारपर उन्होंने गरुडका नामकरण किया ॥ २३ ॥

सुरूपं पत्रमालक्ष्य सुपर्णोऽयं भवत्विति ।

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सहस्राक्षः पुरन्दरः ।

खगो महदिदं भूतमिति मत्वाभ्यभाषत ॥ २४ ॥

वह सुन्दर पाँख देखकर लोगोंने कहा- ' जिसका यह सुन्दर पर्ण ( पंख ) है, वह पक्षी सुपर्ण नामसे विख्यात हो । ' ( गरुडपर वज्र भी निष्फल हो गया ) यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्रने मन-ही- मन विचार किया - अहो! यह पक्षीरूपमें कोई महान् प्राणी है, ऐसा सोचकर उन्होंने कहा ॥ २४ ॥

शक्र उवाच

बलं विज्ञातुमिच्छामि यत् ते परमनुत्तमम् ।

सख्यं चानन्तमिच्छामि त्वया सह खगोत्तम ॥ २५ ॥

इन्द्रने कहा — विहंगप्रवर! मैं तुम्हारे सर्वोत्तम उत्कृष्ट बलको जानना चाहता हूँ और तुम्हारे साथ ऐसी मैत्री स्थापित करना चाहता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 287

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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः इन्द्र और गरुडकी मित्रता, गरुडका अमृत लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासीभावसे छुड़ाना तथा इन्द्रद्वारा अमृतका अपहरण गरुड उवाच

सख्यं मेऽस्तु त्वया देव यथेच्छसि पुरन्दर ।

बलं तु मम जानीहि महच्चासह्यमेव च ॥ १ ॥

गरुडने कहा — देव पुरन्दर! जैसी तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार तुम्हारे साथ ( मेरी ) मित्रता स्थापित हो । मेरा बल भी जान लो, वह महान् और असह्य है ॥ १ ॥

कामं नैतत् प्रशंसन्ति सन्तः स्वबलसंस्तवम् ।

गुणसंकीर्तनं चापि स्वयमेव शतक्रतो ॥ २ ॥

शतक्रतो! साधु पुरुष स्वेच्छासे अपने बलकी स्तुति और अपने ही मुखसे अपने गुणोंका बखान अच्छा नहीं मानते ॥ २ ॥

सखेति कृत्वा तु सखे पृष्टो वक्ष्याम्यहं त्वया ।

न ह्यात्मस्तवसंयुक्तं वक्तव्यमनिमित्ततः ॥ ३ ॥

किंतु सखे! तुमने मित्र मानकर पूछा है, इसलिये मैं बता रहा हूँ; क्योंकि अकारण ही अपनी प्रशंसासे भरी हुई बात नहीं कहनी चाहिये ( किंतु किसी मित्रके पूछनेपर सच्ची बात कहनेमें कोई हर्ज नहीं है । ) ॥ ३ ॥

सपर्वतवनामुर्वी ससागरजलामिमाम् ।

वहे पक्षेण वै शक्र त्वामप्यत्रावलम्बिनम् ॥ ४ ॥

इन्द्र! पर्वत, वन और समुद्रके जलसहित सारी पृथ्वीको तथा इसके ऊपर रहनेवाले आपको भी अपने एक पंखपर उठाकर मैं बिना परिश्रमके उड़ सकता हूँ ॥ ४ ॥

सर्वान् सम्पिण्डितान् वापि लोकान् सस्थाणुजङ्गमान् ।

वहेयमपरिश्रान्तो विद्धीदं मे महद् बलम् ॥ ५ ॥

अथवा सम्पूर्ण चराचर लोकोंको एकत्र करके यदि मेरे ऊपर रख दिया जाय तो मैं

सबको बिना परिश्रमके ढो सकता हूँ। इससे तुम मेरे महान् बलको समझ लो ॥ ५ ॥

सौतिरुवाच

इत्युक्तवचनं वीरं किरीटी श्रीमतां वरः ।

आह शौनक देवेन्द्रः सर्वलोकहितः प्रभुः ॥ ६ ॥

एवमेव यथात्थ त्वं सर्वं सम्भाव्यते त्वयि ।

पृष्ठ 288

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संगृह्यतामिदानीं मे सख्यमत्यन्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! वीरवर गरुडके इस प्रकार कहनेपर श्रीमानोंमें श्रेष्ठ किरीटधारी सर्वलोक-हितकारी भगवान् देवेन्द्रने कहा - ' मित्र! तुम जैसा कहते हो, वैसी ही बात है । तुममें सब कुछ सम्भव है । इस समय मेरी अत्यन्त उत्तम मित्रता स्वीकार करो ॥ ६-७ ॥

न कार्यं यदि सोमेन मम सोमः प्रदीयताम् ।

अस्मांस्ते हि प्रबाधेयुर्येभ्यो दद्याद् भवानिमम् ॥ ८ ॥

' यदि तुम्हें स्वयं अमृतकी आवश्यकता नहीं है तो वह मुझे वापस दे दो । तुम जिनको यह अमृत देना चाहते हो, वे इसे पीकर हमें कष्ट पहुँचावेंगे ' ॥ ८ ॥

गरुड उवाच

किंचित् कारणमुद्दिश्य सोमोऽयं नीयते मया ।

न दास्यामि समादातुं सोमं कस्मैचिदप्यहम् ॥ ९ ॥

यत्रेमं तु सहस्राक्ष निक्षिपेयमहं स्वयम् ।

त्वमादाय ततस्तूर्णं हरेथास्त्रिदिवेश्वर ॥ १० ॥

गरुडने कहा — स्वर्गके सम्राट् सहस्राक्ष! किसी कारणवश मैं यह अमृत ले जाता हूँ । इसे किसीको भी पीनेके लिये नहीं दूँगा । मैं स्वयं जहाँ इसे रख दूँ, वहाँसे तुरंत तुम उठा ले जा सकते हो ॥ ९ -१० ॥ शक्र उवाच

वाक्येनानेन तुष्टोऽहं यत् त्वयोक्तमिहाण्डज ।

यमिच्छसि वरं मत्तस्तं गृहाण खगोत्तम ॥ ११ ॥

इन्द्र बोले – पक्षिराज! तुमने यहाँ जो बात कही है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। खगश्रेष्ठ! तुम मुझसे जो चाहो, वर माँग लो ॥ ११ ॥

सौतिरुवाच

इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं कद्रूपुत्राननुस्मरन् ।

स्मृत्वा चैवोपधिकृतं मातुर्दास्यनिमित्ततः ॥ १२ ॥

ईशोऽहमपि सर्वस्य करिष्यामि तु तेऽर्थिताम् ।

भवेयुर्भुजगाः शक्र मम भक्ष्या महाबलाः ॥ १३ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— इन्द्रके ऐसा कहनेपर गरुडको कद्रूपुत्रोंकी दुष्टताका स्मरण हो आया । साथ ही उनके उस कपटपूर्ण बर्तावकी भी याद आ गयी, जो माताको दासी बनानेमें कारण था। अतः उन्होंने इन्द्रसे कहा–' इन्द्र! यद्यपि मैं सब कुछ करनेमें समर्थ हूँ, तो भी तुम्हारी इस याचनाको पूर्ण करूँगा कि अमृत दूसरोंको न दिया जाय । साथ ही तुम्हारे

पृष्ठ 289

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कथनानुसार यह वर भी माँगता हूँ कि महाबली सर्प मेरे भोजनकी सामग्री हो जायँ' ॥ १२-१३ ॥

तथेत्युक्त्वान्वगच्छत् तं ततो दानवसूदनः ।

देवदेवं महात्मानं योगिनामीश्वरं हरिम् ॥ १४ ॥

तब दानवशत्रु इन्द्र ‘ तथास्तु ' कहकर योगीश्वर देवाधिदेव परमात्मा श्रीहरिके पास गये ॥ १४ ॥

स चान्वमोदत् तं चार्थं यथोक्तं गरुडेन वै ।

इदं भूयो वचः प्राह भगवांस्त्रिदशेश्वरः ॥ १५ ॥

हरिष्यामि विनिक्षिप्तं सोममित्यनुभाष्य तम् ।

आजगाम ततस्तूर्णं सुपर्णो मातुरन्तिकम् ॥ १६ ॥

श्रीहरिने भी गरुडकी कही हुई बातका अनुमोदन किया । तदनन्तर स्वर्गलोकके स्वामी भगवान् इन्द्र पुनः गरुडको सम्बोधित करके इस प्रकार बोले- ' तुम जिस समय इस

अमृतको कहीं रख दोगे उसी समय मैं इसे हर ले आऊँगा' ( ऐसा कहकर इन्द्र चले गये ) ।

फिर सुन्दर पंखवाले गरुड तुरंत ही अपनी माताके समीप आ पहुँचे ॥ १५-१६ ॥

अथ सर्पानुवाचेदं सर्वान् परमहृष्टवत् ।

इदमानीतममृतं निक्षेप्स्यामि कुशेषु वः ॥ १७ ॥

स्नाता मंगलसंयुक्तास्ततः प्राश्नीत पन्नगाः ।

भवद्भिरिदमासीनैर्यदुक्तं तद्वचस्तदा ॥ १८ ॥

अदासी चैव मातेयमद्यप्रभृति चास्तु मे ।

यथोक्तं भवतामेतद् वचो मे प्रतिपादितम् ॥ १ ९ ॥

तदनन्तर अत्यन्त प्रसन्न - से होकर वे समस्त सर्पोंसे इस प्रकार बोले- ' पन्नगो! मैंने तुम्हारे लिये यह अमृत ला दिया है । इसे कुशोंपर रख देता हूँ । तुम सब लोग स्नान और मंगल - कर्म ( स्वस्ति - वाचन आदि) करके इस अमृतका पान करो । अमृतके लिये भेजते समय तुमने यहाँ बैठकर मुझसे जो बातें कही थीं, उनके अनुसार आजसे मेरी ये माता दासीपनसे मुक्त हो जायँ; क्योंकि तुमने मेरे लिये जो काम बताया था, उसे मैंने पूर्ण कर दिया है ' ॥ १७–१९ ॥

ततः स्नातुं गताः सर्पाः प्रत्युक्त्वा तं तथेत्युत ।

शक्रोऽप्यमृतमाक्षिप्य जगाम त्रिदिवं पुनः ॥ २० ॥

तब सर्पगण ‘ तथास्तु ' कहकर स्नानके लिये गये । इसी बीचमें इन्द्र वह अमृत लेकर पुनः स्वर्गलोकको चले गये ॥ २० ॥

अथागतास्तमुद्देशं सर्पाः सोमार्थिनस्तदा ।

स्नाताश्च कृतजप्याश्च प्रहृष्टाः कृतमंगलाः ॥ २१ ॥

यत्रैतदमृतं चापि स्थापितं कुशसंस्तरे ।

पृष्ठ 290

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तद् विज्ञाय हृतं सर्पाः प्रतिमायाकृतं च तत् ॥ २२ ॥

इसके अनन्तर अमृत पीनेकी इच्छावाले सर्प स्नान, जप और मंगल - कार्य करके प्रसन्नतापूर्वक उस स्थानपर आये, जहाँ कुशके आसनपर अमृत रखा गया था । आनेपर उन्हें मालूम हुआ कि कोई उसे हर ले गया । तब सर्पोंने यह सोचकर संतोष किया कि यह हमारे कपटपूर्ण बर्तावका बदला है ॥ २१-२२ ॥

सोमस्थानमिदं चेति दर्भास्ते लिलिहुस्तदा ।

ततो द्विधाकृता जिह्वाः सर्पाणां तेन कर्मणा ॥ २३ ॥

फिर यह समझकर कि यहाँ अमृत रखा गया था, इसलिये सम्भव है इसमें उसका कुछ अंश लगा हो, सर्पोंने उस समय कुशोंको चाटना शुरू किया । ऐसा करनेसे सर्पोंकी जीभके दो भाग हो गये ॥ २३ ॥

अभवंश्चामृतस्पर्शाद् दर्भास्तेऽथ पवित्रिणः ।

एवं तदमृतं तेन हतमाहृतमेव च ।

द्विजिह्वाश्च कृताः सर्पा गरुडेन महात्मना ॥ २४ ॥

तभीसे पवित्र अमृतका स्पर्श होनेके कारण कुशोंकी ' पवित्री ' संज्ञा हो गयी । इस प्रकार महात्मा गरुडने देवलोकसे अमृतका अपहरण किया और सर्पोंके समीपतक उसे पहुँचाया; साथ ही सर्पोंको द्विजिह्व ( दो जिह्वाओंसे युक्त) बना दिया ॥ २४ ॥

ततः सुपर्णः परमप्रहर्षवान्

विहृत्य मात्रा सह तत्र कानने ।

भुजङ्गभक्षः परमार्चितः खगै- रहीनकीर्तिर्विनतामनन्दयत् ॥ २५ ॥

उस दिनसे सुन्दर पंखवाले गरुड अत्यन्त प्रसन्न हो अपनी माताके साथ रहकर वहाँ वनमें इच्छानुसार घूमने - फिरने लगे । वे सर्पोंको खाते और पक्षियोंसे सादर सम्मानित होकर अपनी उज्ज्वल कीर्ति चारों ओर फैलाते हुए माता विनताको आनन्द देने लगे ॥ २५ ॥

इमां कथां यः शृणुयान्नरः सदा पठेत वा द्विजगणमुख्यसंसदि । असंशयं त्रिदिवमियात् स पुण्यभाक् महात्मनः पतगपतेः प्रकीर्तनात् ॥ २६ ॥

जो मनुष्य इस कथाको श्रेष्ठ द्विजोंकी उत्तम गोष्ठीमें सदा पढ़ता अथवा सुनता है, वह पक्षिराज महात्मा गरुडके गुणोंका गान करनेसे पुण्यका भागी होकर निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥