महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 291–300
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
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इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक चं अध्याय पूराहुआ ॥ ३४ ॥
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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः मुख्य- मुख्य नागोंके नाम शौनक उवाच
भुजङ्गमानां शापस्य मात्रा चैव सुतेन च ।
विनतायास्त्वया प्रोक्तं कारणं सूतनन्दन ॥ १ ॥
शौनकजीने कहा – सूतनन्दन! सर्पोंको उनकी मातासे और विनता देवीको उनके पुत्रसे जो शाप प्राप्त हुआ था, उसका कारण आपने बता दिया ॥ १ ॥
वरप्रदानं भर्त्रा च कद्रूविनतयोस्तथा ।
नामनी चैव ते प्रोक्ते पक्षिणोर्वैनतेययोः ॥ २ ॥
कद्रू और विनताको उनके पति कश्यपजीसे जो वर मिले थे, वह कथा भी कह सुनायी तथा विनताके जो दोनों पुत्र पक्षीरूपमें प्रकट हुए थे, उनके नाम भी आपने बताये हैं ॥ २ ॥
पन्नगानां तु नामानि न कीर्तयसि सूतज ।
प्राधान्येनापि नामानि श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ ३ ॥
किंतु सूतपुत्र! आप सर्पोंके नाम नहीं बता रहे हैं । यदि सबका नाम बताना सम्भव न हो, तो उनमें जो मुख्य- मुख्य सर्प हैं, उन्हींके नाम हम सुनना चाहते हैं ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
बहुत्वान्नामधेयानि पन्नगानां तपोधन ।
न कीर्तयिष्ये सर्वेषां प्राधान्येन तु मे शृणु ॥ ४ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा — तपोधन! सर्पोंकी संख्या बहुत है; अतः उन सबके नाम तो नहीं कहूँगा, किंतु उनमें जो मुख्य- मुख्य सर्प हैं, उनके नाम मुझसे सुनिये ॥ ४ ॥
शेषः प्रथमतो जातो वासुकिस्तदनन्तरम् ।
ऐरावतस्तक्षकश्च कर्कोटकधनंजयौ ॥ ५ ॥
कालियो मणिनागश्च नागश्चापूरणस्तथा ।
नागस्तथा पिञ्जरक एलापत्रोऽथ वामनः ॥ ६ ॥
नीलानीलौ तथा नागौ कल्माषशबलौ तथा ।
आर्यकश्चोग्रकश्चैव नागः कलशपोतकः ॥ ७ ॥
सुमनाख्यो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः ।
आप्तः कर्कोटकश्चैव शङ्खो वालिशिखस्तथा ॥ ८ ॥
निष्टानको हेमगुहो नहुषः पिङ्गलस्तथा ।
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बाह्यकर्णो हस्तिपदस्तथा मुद्गरपिण्डकः ॥ ९ ॥
कम्बलाश्वतरौ चापि नागः कालीयकस्तथा ।
वृत्तसंवर्तकौ नागौ द्वौ च पद्माविति श्रुतौ ॥ १० ॥
नागः शङ्खमुखश्चैव तथा कूष्माण्डकोऽपरः ।
क्षेमकश्च तथा नागो नागः पिण्डारकस्तथा ॥ ११ ॥
करवीरः पुष्पदंष्ट्रो बिल्वको बिल्वपाण्डुरः ।
मूषकादः शङ्खशिराः पूर्णभद्रो हरिद्रकः ॥ १२ ॥
अपराजितो ज्योतिकश्च पन्नगः श्रीवहस्तथा ।
कौरव्यो धृतराष्ट्रश्च शङ्खपिण्डश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥
विरजाश्च सुबाहुश्च शालिपिण्डश्च वीर्यवान् ।
हस्तिपिण्डः पिठरकः सुमुखः कौणपाशनः ॥ १४ ॥
कुठरः कुञ्जरश्चैव तथा नागः प्रभाकरः ।
कुमुदः कुमुदाक्षश्च तित्तिरिर्हलिकस्तथा ॥ १५ ॥
कर्दमश्च महानागो नागश्च बहुमूलकः ।
कर्कराकर्करौ नागौ कुण्डोदरमहोदरौ ॥ १६ ॥
नागोंमें सबसे पहले शेषजी प्रकट हुए हैं । तदनन्तर वासुकि, ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, मणिनाग, आपूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनील, कल्माष, शबल, आर्यक, उग्रक, कलशपोतक, सुमनाख्य, दधिमुख, विमलपिण्डक, आप्त, कर्कोटक (द्वितीय ), शंख, वालिशिख, निष्टानक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, बाह्यकर्ण, हस्तिपद, मुद्गरपिण्डक, कम्बल, अश्वतर, कालीयक, वृत्त, संवर्तक, पद्म ( प्रथम), पद्म ( द्वितीय ), शंखमुख, कूष्माण्डक, क्षेमक, पिण्डारक, करवीर, पुष्पदंष्ट्र, बिल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूषकाद, शंखशिरा, पूर्णभद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, पराक्रमी शंखपिण्ड, विरजा, सुबाहु, वीर्यवान् शालिपिण्ड, हस्तिपिण्ड, पिठरक, सुमुख, कौणपाशन, कुठर, कुंजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्तिरि, हलिक, महानाग कर्दम, बहुमूलक, कर्कर, अकर्कर, कुण्डोदर और महोदर – ये नाग उत्पन्न हुए ॥ ५–१६ ॥
एते प्राधान्यतो नागाः कीर्तिता द्विजसत्तम ।
बहुत्वान्नामधेयानामितरे नानुकीर्तिताः ॥ १७ ॥
द्विजश्रेष्ठ! ये मुख्य-मुख्य नाग यहाँ बताये गये हैं । सर्पोंकी संख्या अधिक होनेसे उनके नाम भी बहुत हैं । अतः अन्य अप्रधान नागोंके नाम यहाँ नहीं कहे गये हैं ॥ १७ ॥
एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च संततिः ।
असंख्येयेति मत्वा तान् न ब्रवीमि तपोधन ॥ १८ ॥
तपोधन! इन नागोंकी संतान तथा उन संतानोंकी भी संतति असंख्य हैं । ऐसा समझकर उनके नाम मैं नहीं कहता हूँ ॥ १८ ॥
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बहूनीह सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
अशक्यान्येव संख्यातुं पन्नगानां तपोधन ॥ १ ९ ॥
तपस्वी शौनकजी! नागोंकी संख्या यहाँ कई हजारोंसे लेकर लाखों- अरबोंतक पहुँच जाती है । अतः उनकी गणना नहीं की जा सकती है ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पनामकथने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पनामकथनविषयक पैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
Fard
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षट्त्रिंशोऽध्यायः शेषनागकी तपस्या, ब्रह्माजीसे वर प्राप्ति तथा पृथ्वीको सिरपर धारण करना शौनक उवाच
आख्याता भुजगास्तात वीर्यवन्तो दुरासदाः ।
शापं तं तेऽभिविज्ञाय कृतवन्तः किमुत्तरम् ॥ १ ॥
शौनकजीने पूछा — तात सूतनन्दन! आपने महापराक्रमी और दुर्धर्ष नागोंका वर्णन किया । अब यह बताइये कि माता कद्रूके उस शापकी बात मालूम हो जानेपर उन्होंने उसके निवारणके लिये आगे चलकर कौन - सा कार्य किया? ॥ १ ॥
सौतिरुवाच
तेषां तु भगवाञ्च्छेषः कद्रं त्यक्त्वा महायशाः ।
उग्रं तपः समातस्थे वायुभक्षो यतव्रतः ॥ २ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा— शौनक! उन नागोंमेंसे महा- यशस्वी भगवान् शेषनागने कद्रूका साथ छोड़कर कठोर तपस्या प्रारम्भ की । वे केवल वायु पीकर रहते और संयमपूर्वक व्रतका पालन करते थे ॥ २ ॥
गन्धमादनमासाद्य बदर्यां च तपोरतः ।
गोकर्णे पुष्करारण्ये तथा हिमवतस्तटे ॥ ३ ॥
तेषु तेषु च पुण्येषु तीर्थेष्वायतनेषु च ।
एकान्तशीलो नियतः सततं विजितेन्द्रियः ॥ ४ ॥
अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके सदा नियमपूर्वक रहते हुए शेषजी गन्धमादन पर्वतपर जाकर बदरिकाश्रम तीर्थमें तप करने लगे । तत्पश्चात् गोकर्ण, पुष्कर, हिमालयके तटवर्ती प्रदेश तथा भिन्न-भिन्न पुण्य- तीर्थों और देवालयोंमें जा- जाकर संयम- नियमके साथ एकान्तवास करने लगे ॥ ३-४ ॥
तप्यमानं तपो घोरं तं ददर्श पितामहः ।
संशुष्कमांसत्वक्स्नायुं जटाचीरधरं मुनिम् ॥ ५ ॥
तमब्रवीत् सत्यधृतिं तप्यमानं पितामहः ।
किमिदं कुरुषे शेष प्रजानां स्वस्ति वै कुरु ॥ ६ ॥
ब्रह्माजीने देखा, शेषनाग घोर तप कर रहे हैं । उनके शरीरका मांस, त्वचा और नाड़ियाँ सूख गयी हैं । वे सिरपर जटा और शरीरपर वल्कल वस्त्र धारण किये मुनिवृत्तिसे रहते हैं ।
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उनमें सच्चा धैर्य है और वे निरन्तर तपमें संलग्न हैं । यह सब देखकर ब्रह्माजी उनके पास आये और बोले— ' शेष! तुम यह क्या कर रहे हो? समस्त प्रजाका कल्याण करो ॥ ५-६ ॥
त्वं हि तीव्रेण तपसा प्रजास्तापयसेऽनघ ।
ब्रूहि कामं च मे शेष यस्ते हृदि व्यवस्थितः ॥ ७ ॥
‘ अनघ! इस तीव्र तपस्याके द्वारा तुम सम्पूर्ण प्रजावर्गको संतप्त कर रहे हो । शेषनाग! तुम्हारे हृदयमें जो कामना हो वह मुझसे कहो ' ॥ ७ ॥
शेष उवाच
सोदर्या मम सर्वे हि भ्रातरो मन्दचेतसः ।
सह तैर्नोत्सहे वस्तुं तद् भवाननुमन्यताम् ॥ ८ ॥
शेषनाग बोले- भगवन्! मेरे सब सहोदर भाई बड़े मन्दबुद्धि हैं, अतः मैं उनके साथ नहीं रहना चाहता । आप मेरी इस इच्छाका अनुमोदन करें ॥ ८ ॥
अभ्यसूयन्ति सततं परस्परममित्रवत् ।
ततोऽहं तप आतिष्ठं नैतान् पश्येयमित्युत ॥ ९ ॥
वे सदा परस्पर शत्रुकी भाँति एक- दूसरेके दोष निकाला करते हैं । इससे ऊबकर मैं तपस्यामें लग गया हूँ; जिससे मैं उन्हें देख न सकूँ ॥ ९ ॥
न मर्षयन्ति ससुतां सततं विनतां च ते ।I अस्माकं चापरो भ्राता वैनतेयोऽन्तरिक्षगः ॥ १० ॥
वे विनता और उसके पुत्रोंसे डाह रखते हैं, इसलिये उनकी सुख- सुविधा सहन नहीं कर पाते । आकाशमें विचरने वाले विनतापुत्र गरुड भी हमारे दूसरे भाई ही हैं ॥ १० ॥
तं च द्विषन्ति सततं स चापि बलवत्तरः ।
वरप्रदानात् स पितुः कश्यपस्य महात्मनः ॥ ११ ॥
किंतु वे नाग उनसे भी सदा द्वेष रखते हैं । मेरे पिता महात्मा कश्यपजीके वरदानसे गरुड भी बड़े ही बलवान् हैं ॥ ११ ॥
सोऽहं तपः समास्थाय मोक्ष्यामीदं कलेवरम् ।
कथं मे प्रेत्यभावेऽपि न तैः स्यात् सह संगमः ॥ १२ ॥
इन सब कारणोंसे मैंने यही निश्चय किया है कि तपस्या करके मैं इस शरीरको त्याग दूँगा, जिससे मरनेके बाद भी किसी तरह उन दुष्टोंके साथ मेरा समागम न हो ॥ १२ ॥
तमेवंवादिनं शेषं पितामह उवाच ह ।
जानामि शेष सर्वेषां भ्रातॄणां ते विचेष्टितम् ॥ १३ ॥
ऐसी बातें करनेवाले शेषनागसे पितामह ब्रह्माजीने कहा - ' शेष! मैं तुम्हारे सब भाइयोंकी कुचेष्टा जानता हूँ' ॥ १३ ॥
मातुश्चाप्यपराधाद् वै भ्रातॄणां ते महद् भयम् ।
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कृतोऽत्र परिहारश्च पूर्वमेव भुजङ्गम ॥ १४ ॥
‘ माताका अपराध करनेके कारण निश्चय ही तुम्हारे उन सभी भाइयोंके लिये महान् भय उपस्थित हो गया है; परंतु भुजंगम! इस विषयमें जो परिहार अपेक्षित है, उसकी व्यवस्था मैंने पहलेसे ही कर रखी है ॥ १४ ॥
भ्रातॄणां तव सर्वेषां न शोकं कर्तुमर्हसि ।
वृणीष्व च वरं मत्तः शेष यत् तेऽभिकाङ्क्षितम् ॥ १५ ॥
‘ अतः अपने सम्पूर्ण भाइयोंके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये । शेष! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर मुझसे माँग लो ॥ १५ ॥
दास्यामि हि वरं तेऽद्य प्रीतिर्मे परमा त्वयि ।
दिष्ट्या बुद्धिश्च ते धर्मे निविष्टा पन्नगोत्तम ।
भूयो भूयश्च ते बुद्धिर्धर्मे भवतु सुस्थिरा ॥ १६ ॥
' तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा प्रेम है; अतः आज मैं तुम्हें अवश्य वर दूँगा । पन्नगोत्तम! यह सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारी बुद्धि धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगी हुई है । मैं भी आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारी बुद्धि उत्तरोत्तर धर्ममें स्थिर रहे ' ॥ १६ ॥
शेष उवाच
एष एव वरो देव काङ्क्षितो मे पितामह ।
धर्मे मे रमतां बुद्धिः शमे तपसि चेश्वर ॥ १७ ॥
शेषजीने कहा – देव! पितामह! परमेश्वर! मेरे लिये यही अभीष्ट वर है कि मेरी बुद्धि सदा धर्म, मनोनिग्रह तथा तपस्यामें लगी रहे ॥ १७ ॥
ब्रह्मोवाच
प्रीतोऽस्म्यनेन ते शेष दमेन च शमेन च ।
त्वया त्विदं वचः कार्यं मन्नियोगात् प्रजाहितम् ॥ १८ ॥
ब्रह्माजी बोले – शेष! तुम्हारे इस इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ । अब मेरी आज्ञासे प्रजाके हितके लिये यह कार्य, जिसे मैं बता रहा हूँ, तुम्हें करना चाहिये ॥ १८ ॥
इमां महीं शैलवनोपपन्नां ससागरग्रामविहारपत्तनाम् । त्वं शेष सम्यक् चलितां यथावत् संगृह्य तिष्ठस्व यथाचला स्यात् ॥ १ ९ ॥ शेषनाग! पर्वत, वन, सागर, ग्राम, विहार और नगरोंसहित यह समूची पृथ्वी प्रायः हिलती - डुलती रहती है । तुम इसे भलीभाँति धारण करके इस प्रकार स्थित रहो, जिससे यह पूर्णतः अचल हो जाय ॥ १ ९ ॥
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Gary ब्रह्माजीने शेषजीको वरदान तथा पृथ्वी धारण करनेकी आज्ञा दी
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शेष उवाच यथाह देवो वरदः प्रजापति- र्महीपतिर्भूतपतिर्जगत्पतिः । तथा महीं धारयितास्मि निश्चलां प्रयच्छतां मे शिरसि प्रजापते ॥ २० ॥
शेषनागने कहा — प्रजापते! आप वरदायक देवता, समस्त प्रजाके पालक, पृथ्वीके रक्षक, भूत-प्राणियोंके स्वामी और सम्पूर्ण जगत्के अधिपति हैं । आप जैसी आज्ञा देते हैं, उसके अनुसार मैं इस पृथ्वीको इस तरह धारण करूँगा, जिससे यह हिले - डुले नहीं । आप इसे मेरे सिरपर रख दें ॥ २० ॥
ब्रह्मोवाच अधो महीं गच्छ भुजङ्गमोत्तम स्वयं तवैषा विवरं प्रदास्यति । इमां धरां धारयता त्वया हि मे महत् प्रियं शेष कृतं भविष्यति ॥ २१ ॥
ब्रह्माजीने कहा – नागराज शेष! तुम पृथ्वीके नीचे चले जाओ । यह स्वयं तुम्हें वहाँ जानेके लिये मार्ग दे देगी । इस पृथ्वीको धारण कर लेनेपर तुम्हारे द्वारा मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायगा ॥ २१ ॥
सौतिरुवाच तथैव कृत्वा विवरं प्रविश्य स प्रभुर्भुवो भुजगवराग्रजः स्थितः । बिभर्ति देवीं शिरसा महीमिमां समुद्रनेमिं परिगृह्य सर्वतः ॥ २२ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं - नागराज वासुकिके बड़े भाई सर्वसमर्थ भगवान् शेषने ' बहुत अच्छा ' कहकर ब्रह्माजीकी आज्ञा शिरोधार्य की और पृथ्वीके विवरमें प्रवेश करके समुद्रसे घिरी हुई इस वसुधा- देवीको उन्होंने सब ओरसे पकड़कर सिरपर धारण कर लिया ( तभीसे यह पृथ्वी स्थिर हो गयी ) ॥ २२ ॥
ब्रह्मोवाच शेषोऽसि नागोत्तम धर्मदेवो महीमिमां धारयसे यदेकः । अनन्तभोगैः परिगृह्य सर्वां यथाहमेवं बलभिद् यथा वा ॥ २३ ॥
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तदनन्तर ब्रह्माजी बोले - नागोत्तम! तुम शेष हो, धर्म ही तुम्हारा आराध्यदेव है, तुम अकेले अपने अनन्त फणोंसे इस सारी पृथ्वीको पकड़कर उसी प्रकार धारण करते हो, जैसे मैं अथवा इन्द्र ॥ २३ ॥
सौतिरुवाच
अधोभूमौ वसत्येवं नागोऽनन्तः प्रतापवान् ।
धारयन् वसुधामेकः शासनाद् ब्रह्मणो विभुः ॥ २४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! इस प्रकार प्रतापी नाग भगवान् अनन्त अकेले ही ब्रह्माजीके आदेशसे इस सारी पृथ्वीको धारण करते हुए भूमिके नीचे पाताल- लोकमें निवास करते हैं ॥ २४ ॥
सुपर्णं च सहायं वै भगवानमरोत्तमः ।
प्रादादनन्ताय तदा वैनतेयं पितामहः ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् देवताओंमें श्रेष्ठ भगवान् पितामहने शेषनागके लिये विनतानन्दन गरुडको सहायक बना दिया ॥ २५ ॥
( अनन्ते च प्रयाते तु वासुकिः सुमहाबलः । अभ्यषिच्यत नागैस्तु दैवतैरिव वासवः ॥ ) अनन्त नागके चले जानेपर नागोंने महाबली वासुकिका नागराजके पदपर उसी प्रकार
अभिषेक किया, जैसे देवताओंने इन्द्रका देवराजके पदपर अभिषेक किया था ।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि शेषवृत्तकथने षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥
३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें शेषनागवृत्तान्त-कथनविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं )