महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 311–320

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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‘ देवेश्वर! नागराज वासुकि हमारे हितैषी हैं और सदा हमलोगोंके प्रिय कार्यमें लगे रहते हैं; अतः आप इनपर कृपा करें और इनके मनमें जो चिन्ताकी आग जल रही है, उसे बुझा दें ' ॥ ७ ॥

ब्रह्मोवाच

मयैव तद् वितीर्णं वै वचनं मनसामराः ।

एलापत्रेण नागेन यदस्याभिहितं पुरा ॥ ८ ॥

ब्रह्माजीने कहा — ' देवताओ! एलापत्र नागने वासुकिके समक्ष पहले जो बात कही थी, वह मैंने ही मानसिक संकल्पद्वारा उसे दी थी ( मेरी ही प्रेरणासे एलापत्रने वे बातें वासुकि आदि नागोंके सम्मुख कही थीं ) ॥ ८ ॥

तत् करोत्वेष नागेन्द्रः प्राप्तकालं वचः स्वयम् ।

विनशिष्यन्ति ये पापा न तु ये धर्मचारिणः ॥ ९ ॥

ये नागराज समय आनेपर स्वयं तदनुसार ही कार्य करें। जनमेजयके यज्ञमें पापी सर्प ही नष्ट होंगे, किंतु जो धर्मात्मा हैं वे नहीं ॥ ९ ॥

उत्पन्नः स जरत्कारुस्तपस्युग्रे रतो द्विजः ।

तस्यैष भगिनीं काले जरत्कारुं प्रयच्छतु ॥ १० ॥

अब जरत्कारु ब्राह्मण उत्पन्न होकर उग्र तपस्यामें लगे हैं । अवसर देखकर ये वासुकि अपनी बहिन जरत्कारुको उन महर्षिकी सेवामें समर्पित कर दें ॥ १० ॥

एलापत्रेण यत् प्रोक्तं वचनं भुजगेन ह ।

पन्नगानां हितं देवास्तत् तथा न तदन्यथा ॥ ११ ॥

देवताओ! एलापत्र नागने जो बात कही है, वही सर्पोंके लिये हितकर है । वही बात होनेवाली है । उससे विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता ॥ ११ ॥

सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा तु नागेन्द्रः पितामहवचस्तदा ।

संदिश्य पन्नगान् सर्वान् वासुकिः शापमोहितः ॥ १२ ॥

स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृषिं प्रति ।

सर्पान् बहूञ्जरत्कारौ नित्ययुक्तान् समादधत् ॥ १३ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— ब्रह्माजीकी बात सुनकर शापसे मोहित हुए नागराज वासुकिने सब सर्पोंको यह संदेश दे दिया कि मुझे अपनी बहिनका विवाह जरत्कारु मुनिके साथ करना है । फिर उन्होंने जरत्कारु मुनिकी खोजके लिये नित्य आज्ञामें रहनेवाले बहुत - से सर्पोंको नियुक्त कर दिया ॥ १२-१३ ॥ जरत्कारुर्यदा भार्यामिच्छेद् वरयितुं प्रभुः शीघ्रमेत्य तदाख्येयं तन्नः श्रेयो भविष्यति ॥ १४ ॥

पृष्ठ 312

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और यह कहा — ‘ सामर्थ्यशाली जरत्कारु मुनि जब पत्नीका वरण करना चाहें, उस समय शीघ्र आकर यह बात मुझे सूचित करनी चाहिये । उसीसे हमलोगोंका कल्याण होगा' ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कार्वन्वेषणे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जरत्कारु मुनिका अन्वेषणविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥

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चत्वारिंशोऽध्यायः जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित्का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दुःखी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना शौनक उवाच

जरत्कारुरिति ख्यातो यस्त्वया सूतनन्दन ।

इच्छामि तदहं श्रोतुं ऋषेस्तस्य महात्मनः ॥ १ ॥

किं कारणं जरत्कारोर्नामैतत् प्रथितं भुवि ।

जरत्कारुनिरुक्तिं त्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥

शौनकजीने पूछा — सूतनन्दन! आपने जिन जरत्कारु ऋषिका नाम लिया है, उन महात्मा मुनिके सम्बन्धमें मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पृथ्वीपर उनका जरत्कारु नाम क्यों प्रसिद्ध हुआ? जरत्कारु शब्दकी व्युत्पत्ति क्या है? यह आप ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें ॥ १-२ ॥ सौतिरुवाच

जरेति क्षयमाहुर्वै दारुणं कारुसंज्ञितम् ।

शरीरं कारु तस्यासीत्तत् स धीमाञ्छनैः शनैः ॥ ३ ॥

क्षपयामास तीव्रेण तपसेत्यत उच्यते ।

जरत्कारुरिति ब्रह्मन् वासुकेर्भगिनी तथा ॥ ४ ॥

उग्रश्रवाजीने कहा— शौनकजी! जरा कहते हैं क्षयको और कारु शब्द दारुणका वाचक है । पहले उनका शरीर कारु अर्थात् खूब हट्टा- कट्टा था । उसे परम बुद्धिमान् महर्षिने धीरे - धीरे तीव्र तपस्याद्वारा क्षीण बना दिया । ब्रह्मन्! इसलिये उनका नाम जरत्कारु पड़ा । वासुकिकी बहिनके भी जरत्कारु नाम पड़नेका यही कारण था ॥ ३-४ ॥

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा शौनकः प्राहसत् तदा ।

उग्रश्रवासमामन्त्र्य उपपन्नमिति ब्रुवन् ॥ ५ ॥

उग्रश्रवाजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा शौनक उस समय खिलखिलाकर हँस पड़े और फिर उग्रश्रवाजीको सम्बोधित करके बोले — ' तुम्हारी बात उचित है ' ॥ ५ ॥

शौनक उवाच उक्तं नाम यथापूर्वं सर्वं तच्छ्रुमतवानहम् । यथा तु जातो ह्यास्तीक एतदिच्छामि वेदितुम् ।

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तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सौतिः प्रोवाच शास्त्रतः ॥ ६ ॥

शौनकजी बोले – सूतपुत्र! आपने पहले जो जरत्कारु नामकी व्युत्पत्ति बतायी है, वह सब मैंने सुन ली । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आस्तीक मुनिका जन्म किस प्रकार हुआ? शौनकजीका यह वचन सुनकर उग्रश्रवाजीने पुराणशास्त्रके अनुसार आस्तीकके जन्मका वृत्तान्त बताया ॥ ६ ॥

सौतिरुवाच

संदिश्य पन्नगान् सर्वान् वासुकिः सुसमाहितः ।

स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृषिं प्रति ॥ ७ ॥

उग्रश्रवाजी बोले – नागराज वासुकिने एकाग्रचित्त हो खूब सोच- समझकर सब सर्पोंको यह संदेश दे दिया- ' मुझे अपनी बहिनका विवाह जरत्कारु मुनिके साथ करना है ' ॥ ७ ॥

अथ कालस्य महतः स मुनिः संशितव्रतः ।

तपस्यभिरतो धीमान् स दारान् नाभ्यकाङ्क्षत ॥ ८ ॥

तदनन्तर दीर्घकाल बीत जानेपर भी कठोर व्रतका पालन करनेवाले परम बुद्धिमान् जरत्कारु मुनि केवल तपमें ही लगे रहे । उन्होंने स्त्रीसंग्रहकी इच्छा नहीं की ॥ ८ ॥

स तूर्ध्वरेतास्तपसि प्रसक्तः स्वाध्यायवान् वीतभयः कृतात्मा । चचार सर्वां पृथिवीं महात्मा न चापि दारान् मनसाध्यकाङ्क्षत ॥ ९ ॥

वे ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी थे । तपस्यामें संलग्न रहते थे । नित्य नियमपूर्वक वेदोंका स्वाध्याय करते थे । उन्हें कहींसे कोई भय नहीं था । वे मन और इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखते थे । महात्मा जरत्कारु सारी पृथ्वीपर घूम आये; किंतु उन्होंने मनसे कभी स्त्रीकी अभिलाषा नहीं की ॥ ९ ॥

ततोऽपरस्मिन् सम्प्राप्ते काले कस्मिंश्चिदेव तु ।

परिक्षिन्नाम राजासीद् ब्रह्मन् कौरववंशजः ॥ १० ॥

ब्रह्मन्! तदनन्तर किसी दूसरे समयमें इस पृथ्वीपर कौरववंशी राजा परीक्षित् राज्य करने लगे ॥ १० ॥

यथा पाण्डुर्महाबाहुर्धनुर्धरवरो युधि ।

बभूव मृगयाशीलः पुरास्य प्रपितामहः ॥ ११ ॥

युद्धमें समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ उनके प्रपितामह महाबाहु पाण्डु जिस प्रकार पूर्वकालमें शिकार खेलनेके शौकीन हुए थे, उसी प्रकार राजा परीक्षित् भी थे ॥ ११ ॥

मृगान् विध्यन् वराहांश्च तरक्षून् महिषांस्तथा ।

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अन्यांश्च विविधान् वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः ॥ १२ ॥

महाराज परीक्षित् वराह, तरक्षु ( व्याघ्रविशेष), महिष तथा दूसरे दूसरे नाना प्रकारके वनके हिंसक पशुओंका शिकार खेलते हुए वनमें घूमते रहते थे ॥ १२ ॥

स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा ।

पृष्ठतो धनुरादाय ससार गहने वने ॥ १३ ॥

एक दिन उन्होंने गहन वनमें धनुष लेकर झुकी हुई गाँठवाले बाणसे एक हिंसक पशुको बींध डाला और भागनेपर बहुत दूरतक उसका पीछा किया ॥ १३ ॥

यथैव भगवान् रुद्रो विद्ध्वा यज्ञमृगं दिवि ।

अन्वगच्छद् धनुष्पाणिः पर्यन्वेष्टुमितस्ततः ॥ १४ ॥

जैसे भगवान् रुद्र आकाशमें मृगशिरा नक्षत्रको बींध- कर उसे खोजनेके लिये धनुष हाथमें लिये इधर- उधर घूमते फिरे, उसी प्रकार परीक्षित् भी घूम रहे थे ॥ १४ ॥

न हि तेन मृगो विद्धो जीवन् गच्छति वै वने ।

पूर्वरूपं तु तत्तूर्णं सोऽगात् स्वर्गगतिं प्रति ॥ १५ ॥

परिक्षितो नरेन्द्रस्य विद्धो यन्नष्टवान् मृगः ।

दूरं चापहृतस्तेन मृगेण स महीपतिः ॥ १६ ॥

उनके द्वारा घायल किया हुआ मृग कभी वनमें जीवित बचकर नहीं जाता था; परंतु आज जो महाराज परीक्षित्का घायल किया हुआ मृग तत्काल अदृश्य हो गया था, वह वास्तवमें उनके स्वर्गवासका मूर्तिमान् कारण था। उस मृगके साथ राजा परीक्षित् बहुत दूरतक खिंचे चले गये ॥ १५-१६ ॥

परिश्रान्तः पिपासार्त आससाद मुनिं वने ।

गवां प्रचारेष्वासीनं वत्सानां मुखनिःसृतम् ॥ १७ ॥

भूयिष्ठमुपयुञ्जानं फेनमापिबतां पयः ।

तमभिद्रुत्य वेगेन स राजा संशितव्रतम् ॥ १८ ॥

अपृच्छद् धनुरुद्यम्य तं मुनिं क्षुच्छ्रमान्वितः ।

भो भो ब्रह्मन्नहं राजा परीक्षिदभिमन्युजः ॥ १ ९ ॥

मया विद्धो मृगो नष्टः कच्चित् तं दृष्टवानसि ।

स मुनिस्तं तु नोवाच किंचिन्मौनव्रते स्थितः ॥ २० ॥

उन्हें बड़ी थकावट आ गयी । वे प्याससे व्याकुल हो उठे और इसी दशामें वनमें शमीक मुनिके पास आये । वे मुनि गौओंके रहनेके स्थानमें आसनपर बैठे थे और गौओंका दूध पीते समय बछड़ोंके मुखसे जो बहुत-सा फेन निकलता, उसीको खा-पीकर तपस्या करते थे । राजा परीक्षित्ने कठोर व्रतका पालन करनेवाले उन महर्षिके पास बड़े वेगसे आकर पूछा । पूछते समय वे भूख और थकावटसे बहुत आतुर हो रहे थे और धनुषको उन्होंने ऊपर उठा रखा था । वे बोले — ' ब्रह्मन्! मैं अभिमन्युका पुत्र राजा परीक्षित् हूँ । मेरे बाणोंसे विद्ध होकर

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एक मृग कहीं भाग निकला है । क्या आपने उसे देखा है? ' मुनि मौन व्रतका पालन कर रहे थे, अतः उन्होंने राजाको कुछ भी उत्तर नहीं दिया ॥ १७–२० ॥

तस्य स्कन्धे मृतं सर्पं क्रुद्धो राजा समासजत् ।

समुत्क्षिप्य धनुष्कोट्या स चैनं समुपैक्षत ॥ २१ ॥

तब राजाने कुपित हो धनुषकी नोकसे एक मरे हुए साँपको उठाकर उनके कंधेपर रख दिया, तो भी मुनिने उनकी उपेक्षा कर दी ॥ २१ ॥

न स किंचिदुवाचैनं शुभं वा यदि वाशुभम् ।

स राजा क्रोधमुत्सृज्य व्यथितस्तं तथागतम् ।

दृष्ट्वा जगाम नगरमृषिस्त्वासीत् तथैव सः ॥ २२ ॥

उन्होंने राजासे भला या बुरा कुछ भी नहीं कहा । उन्हें इस अवस्थामें देख राजा परीक्षित्ने क्रोध त्याग दिया और मन- ही- मन व्यथित हो पश्चात्ताप करते हुए वे अपनी राजधानीको चले गये । वे महर्षि ज्यों- कें - त्यों बैठे रहे ॥ २२ ॥

न हि तं राजशार्दूलं क्षमाशीलो महामुनिः ।

स्वधर्मनिरतं भूपं समाक्षिप्तोऽप्यधर्षयत् ॥ २३ ॥

राजाओंमें श्रेष्ठ भूपाल परीक्षित् अपने धर्मके पालनमें तत्पर रहते थे, अतः उस समय उनके द्वारा तिरस्कृत होनेपर भी क्षमाशील महामुनिने उन्हें अपमानित नहीं किया ॥ २३ ॥

न हि तं राजशार्दूलस्तथा धर्मपरायणम् ।

जानाति भरतश्रेष्ठस्तत एनमधर्षयत् ॥ २४ ॥

भरतवंशशिरोमणि नृपश्रेष्ठ परीक्षित् उन धर्मपरायण मुनिको यथार्थरूपमें नहीं जानते थे; इसीलिये उन्होंने महर्षिका अपमान किया ॥ २४ ॥

तरुणस्तस्य पुत्रोऽभूत् तिग्मतेजा महातपाः ।

शृङ्गी नाम महाक्रोधो दुष्प्रसादो महाव्रतः ॥ २५ ॥

मुनिके शृंगी नामक एक पुत्र था, जिसकी अभी तरुणावस्था थी । वह महान् तपस्वी, दुःसह तेजसे सम्पन्न और महान् व्रतधारी था । उसमें क्रोधकी मात्रा बहुत अधिक थी; अतः उसे प्रसन्न करना अत्यन्त कठिन था ॥ २५ ॥

स देवं परमासीनं सर्वभूतहिते रतम् ।

ब्रह्माणमुपतस्थे वै काले काले सुसंयतः ॥ २६ ॥

वह समय- समयपर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले, उत्तम आसनपर विराजमान आचार्यदेवकी सेवामें उपस्थित हुआ करता था ॥ २६ ॥

स तेन समनुज्ञातो ब्रह्मणा गृहमेयिवान् ।

सख्योक्तः क्रीडमानेन स तत्र हसता किल ॥ २७ ॥

संरम्भात् कोपनोऽतीव विषकल्पो मुनेः सुतः ।

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उद्दिश्य पितरं तस्य यच्छ्रुत्वा रोषमाहरत् ।

ऋषिपुत्रेण धर्मार्थे कृशेन द्विजसत्तम ॥ २८ ॥

शृंगी उस दिन आचार्यकी आज्ञा लेकर घरको लौट रहा था । रास्तेमें उसका मित्र ऋषिकुमार कृश, जो धर्मके लिये कष्ट उठानेके कारण सदा ही कृश ( दुर्बल ) रहा करता था, खेलता मिला । उसने हँसते - हँसते शृंगी ऋषिको उसके पिताके सम्बन्धमें ऐसी बात बतायी, जिसे सुनते ही वह रोषमें भर गया। द्विजश्रेष्ठ! मुनिकुमार शृंगी क्रोधके आवेशमें आनेपर अत्यन्त तीक्ष्ण ( कठोर) एवं विषके समान विनाशकारी हो जाता था ॥ २७-२८ ॥ कृशउवाच

तेजस्विनस्तव पिता तथैव च तपस्विनः ।

शवं स्कन्धेन वहति मा शृंगिन् गर्वितो भव ॥ २ ९ ॥

कृशने कहा— शृंगिन्! तुम बड़े तपस्वी और तेजस्वी बनते हो, किंतु तुम्हारे पिता

अपने कंधेपर मुर्दा सर्प ढो रहे हैं । अब कभी अपनी तपस्यापर गर्व न करना ॥ २ ९ ॥

व्याहरत्स्वृषिपुत्रेषु मा स्म किंचिद् वचो वद ।

अस्मद्विधेषु सिद्धेषु ब्रह्मवित्सु तपस्विषु ॥ ३० ॥

हम - जैसे सिद्ध, ब्रह्मवेत्ता तथा तपस्वी ऋषिपुत्र जब कभी बातें करते हों, उस समय तुम वहाँ कुछ न बोलना ॥ ३० ॥

क्व ते पुरुषमानित्वं क्व ते वाचस्तथाविधाः ।

दर्पजाः पितरं द्रष्टा यस्त्वं शवधरं तथा ॥ ३१ ॥

कहाँ है तुम्हारा पौरुषका अभिमान, कहाँ गयीं तुम्हारी वे दर्पभरी बातें? जब तुम अपने पिताको मुर्दा ढोते चुपचाप देख रहे हो! ॥ ३१ ॥

पित्रा च तव तत् कर्म नानुरूपमिवात्मनः ।

कृतं मुनिजनश्रेष्ठ येनाहं भृशदुःखितः ॥ ३२ ॥

मुनिजनशिरोमणे! तुम्हारे पिताके द्वारा कोई अनुचित कर्म नहीं बना था; इसलिये जैसे मेरे ही पिताका अपमान हुआ हो उस प्रकार तुम्हारे पिताके तिरस्कारसे मैं अत्यन्त दुःखी हो रहा हूँ ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिदुपाख्याने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-उपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥

पृष्ठ 318

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एकचत्वारिंशोऽध्यायः शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित्‌को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना सौतिरुवाच

एवमुक्तः स तेजस्वी शृङ्गी कोपसमन्वितः ।

मृतधारं गुरुं श्रुत्वा पर्यतप्यत मन्युना ॥ १ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनकजी! कृशके ऐसा कहनेपर तेजस्वी शृंगी ऋषिको बड़ा क्रोध हुआ । अपने पिताके कंधेपर मृतक ( सर्प) रखे जानेकी बात सुनकर वह रोष और शोकसे संतप्त हो उठा ॥ १ ॥

स तं कृशमभिप्रेक्ष्य सूनृतां वाचमुत्सृजन् ।

अपृच्छत् तं कथं तातः स मेऽद्य मृतधारकः ॥ २ ॥

उसने कृशकी ओर देखकर मधुर वाणीमें पूछा — ' भैया! बताओ तो, आज मेरे पिता अपने कंधेपर मृतक कैसे धारण कर रहे हैं? ' ॥ २ ॥

कृशउवाच

राज्ञा परिक्षिता तात मृगयां परिधावता ।

अवसक्तः पितुस्तेऽद्य मृतः स्कन्धे भुजङ्गमः ॥ ३ ॥

कृशने कहा — तात! आज राजा परीक्षित् अपने शिकारके पीछे दौड़ते हुए आये थे ।

उन्होंने तुम्हारे पिताके कंधेपर मृतक साँप रख दिया है ॥ ३ ॥

शृंग्युवाच

किं मे पित्रा कृतं तस्य राज्ञोऽनिष्टं दुरात्मनः ।

ब्रूहि तत् कृश तत्त्वेन पश्य मे तपसो बलम् ॥ ४ ॥

शृंगी बोला- कृश! ठीक - ठीक बताओ, मेरे पिताने उस दुरात्मा राजाका क्या अपराध किया था? फिर मेरी तपस्याका बल देखना ॥ ४ ॥

कृशउवाच

स राजा मृगयां यातः परिक्षिदभिमन्युजः ।

ससार मृगमेकाकी विद्ध्वा बाणेन शीघ्रगम् ॥ ५ ॥

न चापश्यन्मृगं राजा चरंस्तस्मिन् महावने ।

पितरं ते स दृष्ट्वैव पप्रच्छानभिभाषिणम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 319

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कृशने कहा- अभिमन्युपुत्र राजा परीक्षित् अकेले शिकार खेलने आये थे । उन्होंने एक शीघ्रगामी हिंसक मृग ( पशु ) -को बाणसे बींध डाला; किंतु उस विशाल वनमें विचरते हुए राजाको वह मृग कहीं दिखायी न दिया । फिर उन्होंने तुम्हारे मौनी पिताको देखकर उसके विषयमें पूछा ॥ ५-६ ॥

तं स्थाणुभूतं तिष्ठन्तं क्षुत्पिपासाश्रमातुरः ।

पुनः पुनर्मृगं नष्टं पप्रच्छ पितरं तव ॥ ७ ॥

स च मौनव्रतोपेतो नैव तं प्रत्यभाषत ।

तस्य राजा धनुष्कोट्या सर्पं स्कन्धे समासजत् ॥ ८ ॥

राजा भूख- प्यास और थकावटसे व्याकुल थे । इधर तुम्हारे पिता काठकी भाँति अविचल भावसे बैठे थे । राजाने बार- बार तुम्हारे पितासे उस भागे हुए मृगके विषयमें प्रश्न किया, परंतु मौन- व्रतावलम्बी होनेके कारण उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया । तब राजाने धनुषकी नोकसे एक मरा हुआ साँप उठाकर उनके कंधेपर डाल दिया ॥ ७-८ ॥

शृङ्गिस्तव पिता सोऽपि तथैवास्ते यतव्रतः ।

सोऽपि राजा स्वनगरं प्रस्थितो गजसाह्वयम् ॥ ९ ॥

शृंगिन्! संयमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तुम्हारे पिता अभी उसी अवस्थामें बैठे हैं और वे राजा परीक्षित् अपनी राजधानी हस्तिनापुरको चले गये हैं ॥ ९ ॥

सौतिरुवाच

श्रुत्वैवमृषिपुत्रस्तु शवं कन्धे प्रतिष्ठितम् ।

कोपसंरक्तनयनः प्रज्वलन्निव मन्युना ॥ १० ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं- शौनकजी! इस प्रकार अपने पिताके कंधेपर मृतक सर्पके रखे जानेका समाचार सुनकर ऋषिकुमार शृंगी क्रोधसे जल उठा । कोपसे उसकी आँखें लाल हो गयीं ॥ १० ॥

आविष्टः स हि कोपेन शशाप नृपतिं तदा ।

वार्युपस्पृश्य तेजस्वी क्रोधवेगबलात्कृतः ॥ ११ ॥

वह तेजस्वी बालक रोषके आवेशमें आकर प्रचण्ड क्रोधके वेगसे युक्त हो गया था । उसने जलसे आचमन करके हाथमें जल लेकर उस समय राजा परीक्षित्को इस प्रकार शाप दिया ॥ ११ ॥

शृंग्युवाच

योऽसौ वृद्धस्य तातस्य तथा कृच्छ्रगतस्य ह ।

स्कन्धे मृतं समास्राक्षीत् पन्नगं राजकिल्बिषी ॥ १२ ॥

तं पापमतिसंक्रुद्धस्तक्षकः पन्नगेश्वरः ।

आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 320

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सप्तरात्रादितो नेता यमस्य सदनं प्रति ।

द्विजानामवमन्तारं कुरूणामयशस्करम् ॥ १४ ॥

शृंगी बोला - जिस पापात्मा नरेशने वैसे धर्म- संकटमें पड़े हुए मेरे बूढ़े पिताके कंधेपर मरा साँप रख दिया है, ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाले उस कुरुकुलकलंक पापी परीक्षित्को आजसे सात रातके बाद प्रचण्ड तेजस्वी पन्नगोत्तम तक्षक नामक विषैला नाग अत्यन्त कोपमें भरकर मेरे वाक्यबलसे प्रेरित हो यमलोक पहुँचा देगा ॥ १२–१४ ॥ सौतिरुवाच

इति शप्त्वातिसंक्रुद्धः शृंगी पितरमभ्यगात् ।

आसीनं गोव्रजे तस्मिन् वहन्तं शवपन्नगम् ॥ १५ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— इस प्रकार अत्यन्त क्रोधपूर्वक शाप देकर शृंगी अपने पिताके पास आया, जो उस गोष्ठमें कंधेपर मृतक सर्प धारण किये बैठे थे ॥ १५ ॥

स तमालक्ष्य पितरं शृङ्गी स्कन्धगतेन वै ।

शवेन भुजगेनासीद् भूयः क्रोधसमाकुलः ॥ १६ ॥

कंधेपर रखे हुए मुर्दे साँपसे संयुक्त पिताको देखकर शृंगी पुनः क्रोधसे व्याकुल हो उठा ॥ १६ ॥

दुःखाच्चाश्रूणि मुमुचे पितरं चेदमब्रवीत् ।

श्रुत्वेमां धर्षणां तात तव तेन दुरात्मना ॥ १७ ॥

राज्ञा परिक्षिता कोपादशपं तमहं नृपम् ।

यथार्हति स एवोग्रं शापं कुरुकुलाधमः ।

सप्तमेऽहनि तं पापं तक्षकः पन्नगोत्तमः ॥ १८ ॥

वैवस्वतस्य सदनं नेता परमदारुणम् ।

तमब्रवीत् पिता ब्रह्मंस्तथा कोपसमन्वितम् ॥ १ ९ ॥

वह दुःखसे आँसू बहाने लगा । उसने पितासे कहा — ' तात! उस दुरात्मा राजा परीक्षित्के द्वारा आपके इस अपमानकी बात सुनकर मैंने उसे क्रोधपूर्वक जैसा शाप दिया है, वह कुरुकुलाधम वैसे ही भयंकर शापके योग्य है । आजके सातवें दिन नागराज तक्षक उस पापीको अत्यन्त भयंकर यमलोकमें पहुँचा देगा । ' ब्रह्मन्! इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए पुत्रसे उसके पिता शमीकने कहा ॥ १७–१९ ॥ शमीक उवाच

न मे प्रियं कृतं तात नैष धर्मस्तपस्विनाम् ।

वयं तस्य नरेन्द्रस्य विषये निवसामहे ॥ २० ॥

न्यायतो रक्षितास्तेन तस्य शापं न रोचये ।

सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञो ह्यस्मद्विधैः सदा ॥ २१ ॥