महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 41–50

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50

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उग्रश्रवाजी कहते हैं - यह भारत एक वृक्ष है । इसके स्वादु, पवित्र, सरस एवं अविनाशी पुष्प तथा फल हैं - धर्म और मोक्ष । उन्हें देवता भी इस वृक्षसे अलग नहीं कर सकते; अब मैं उन्हींका वर्णन करूँगा ॥ ९ ३ ॥

मातुर्नियोगाद् धर्मात्मा गाङ्गेयस्य च धीमतः ।

क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य कृष्णद्वैपायनः पुरा ॥ ९ ४ ॥

त्रीनग्नीनिव कौरव्यान् जनयामास वीर्यवान् ।

उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च ॥ ९ ५ ॥

पहलेकी बात है — शक्तिशाली, धर्मात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन ( व्यास) ने अपनी माता सत्यवती और परमज्ञानी गंगापुत्र भीष्मपितामहकी आज्ञासे विचित्रवीर्यकी पत्नी अम्बिका आदिके गर्भसे तीन अग्नियोंके समान तेजस्वी तीन कुरुवंशी पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम हैं - धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर ॥ ९ ४- ९ ५ ॥

जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति ।

तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् ॥ ९ ६ ॥

अब्रवीद्भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः ।

जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥ ९७ ॥

शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके ।

ससदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥ ९ ८ ॥

कर्मान्तरेषु यज्ञस्य चोद्यमानः पुनः पुनः । इन तीन पुत्रोंको जन्म देकर परम ज्ञानी व्यासजी फिर अपने आश्रमपर चले गये । जब वे तीनों पुत्र वृद्ध हो परम गतिको प्राप्त हुए, तब महर्षि व्यासजीने इस मनुष्यलोकमें महाभारतका प्रवचन किया। जनमेजय और हजारों ब्राह्मणोंके प्रश्न करनेपर व्यासजीने पास ही बैठे अपने शिष्य वैशम्पायनको आज्ञा दी कि तुम इन लोगोंको महाभारत सुनाओ । वैशम्पायन याज्ञिक सदस्योंके साथ ही बैठे थे, अतः जब यज्ञकर्ममें बीच - बीचमें अवकाश मिलता, तब यजमान आदिके बार-बार आग्रह करनेपर वे उन्हें महाभारत सुनाया करते थे ॥ ९ ६- ९ ८ ॥ विस्तरं कुरुवंशस्य गान्धार्या धर्मशीलताम् ॥ ९९ ॥

क्षत्तुः प्रज्ञां धृतिं कृन्त्याः सम्यग् द्वैपायनोऽब्रवीत् ।

वासुदेवस्य माहात्म्यं पाण्डवानां च सत्यताम् ॥ १०० ॥

दुर्वृत्तं धार्तराष्ट्राणामुक्तवान् भगवानृषिः ।

इदं शतसहस्रं तु लोकानां पुण्यकर्मणाम् ॥ १०१ ॥

उपाख्यानैः सह ज्ञेयमाद्यं भारतमुत्तमम् ।

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इस महाभारत - ग्रन्थमें व्यासजीने कुरुवंशके विस्तार, गान्धारीकी धर्मशीलता, विदुरकी उत्तम प्रज्ञा और कुन्तीदेवीके धैर्यका भलीभाँति वर्णन किया है । महर्षि भगवान् व्यासने इसमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके माहात्म्य, पाण्डवोंकी सत्यपरायणता तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन आदिके दुर्व्यवहारोंका स्पष्ट उल्लेख किया है। पुण्यकर्मा मानवोंके उपाख्यानोंसहित एक लाख श्लोकोंके इस उत्तम ग्रन्थको आद्यभारत ( महाभारत) जानना चाहिये ॥ ९९ –१०१ ॥ चतुर्विंशतिसाहस्रीं चक्रे भारतसंहिताम् ॥ १०२ ॥

उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः ।

ततोऽप्यर्धशतं भूयः संक्षेपं कृतवानृषिः ॥ १०३ ॥

अनुक्रमणिकाध्यायं वृत्तान्तं सर्वपर्वणाम् ।

इदं द्वैपायनः पूर्वं पुत्रमध्यापयच्छुकम् ॥ १०४ ॥

तदनन्तर व्यासजीने उपाख्यानभागको छोड़कर चौबीस हजार श्लोकोंकी भारतसंहिता बनायी; जिसे विद्वान् पुरुष भारत कहते हैं । इसके पश्चात् महर्षिने पुनः पर्वसहित ग्रन्थमें वर्णित वृत्तान्तोंकी अनुक्रमणिका ( सूची) -का एक संक्षिप्त अध्याय बनाया, जिसमें केवल डेढ़ सौ श्लोक हैं । व्यासजीने सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेवजीको इस महाभारत -ग्रन्थका अध्ययन कराया ॥ १०२–१०४ ॥

ततोऽन्येभ्योऽनुरूपेभ्यः शिष्येभ्यः प्रददौ विभुः ।

षष्टिं शतसहस्राणि चकारान्यां स संहिताम् ॥ १०५ ॥

तदनन्तर उन्होंने दूसरे - दूसरे सुयोग्य ( अधिकारी एवं अनुगत) शिष्योंको इसका उपदेश दिया। तत्पश्चात् भगवान् व्यासने साठ लाख श्लोकोंकी एक दूसरी संहिता बनायी ॥ १०५ । |

त्रिंशच्छतसहस्रं च देवलोके प्रतिष्ठितम् ।

पित्र्ये पञ्चदश प्रोक्तं गन्धर्वेषु चतुर्दश ॥ १०६ ॥

उसके तीस लाख श्लोक देवलोकमें समादृत हो रहे हैं, पितृलोकमें पंद्रह लाख तथा गन्धर्वलोकमें चौदह लाख श्लोकोंका पाठ होता है ॥ १०६ ॥

एकं शतसहस्रं तु मानुषेषु प्रतिष्ठितम् ।

नारदोऽश्रावयद् देवानसितो देवलः पितॄन् ॥ १०७ ॥

इस मनुष्यलोकमें एक लाख श्लोकोंका आद्यभारत ( महाभारत ) प्रतिष्ठित है । देवर्षि नारदने देवताओंको और असित देवलने पितरोंको इसका श्रवण कराया है ॥ १०७ ॥

गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः ।

अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् ॥ १०८ ॥

शिष्यो व्यासस्य धर्मात्मा सर्ववेदविदां वरः ।

एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै निबोधत ॥ १० ९ ॥

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शुकदेवजीने गन्धर्व, यक्ष तथा राक्षसोंको महाभारतकी कथा सुनायी है; परंतु इस मनुष्यलोकमें सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंके शिरोमणि व्यास- शिष्य धर्मात्मा वैशम्पायनजीने इसका प्रवचन किया है । मुनिवरो! वही एक लाख श्लोकोंका महाभारत आपलोग मुझसे श्रवण कीजिये ॥ १०८-१०९ ॥ दुर्योधनो मन्युमयो महाद्रुमः स्कन्धः कर्णः शकुनिस्तस्य शाखाः । दुःशासनः पुष्पफले समृद्धे मूलं राजा धृतराष्ट्रोऽमनीषी ॥ ११० ॥

दुर्योधन क्रोधमय विशाल वृक्षके समान है । कर्ण स्कन्ध, शकुनि शाखा और दुःशासन समृद्ध फल - पुष्प है । अज्ञानी राजा धृतराष्ट्र ही इसके मूल हैं * ॥ ११० ॥

युधिष्ठिरो धर्ममयो महाद्रुमः स्कन्धोऽर्जुनो भीमसेनोऽस्य शाखाः । माद्रीसुतौ पुष्पफले समृद्धे मूलं कृष्णो ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च ॥ १११ ॥

युधिष्ठिर धर्ममय विशाल वृक्ष हैं । अर्जुन स्कन्ध, भीमसेन शाखा और माद्रीनन्दन इसके समृद्ध फल - पुष्प हैं । श्रीकृष्ण, वेद और ब्राह्मण ही इस वृक्षके मूल (जड़ ) हैं * ॥ १११ ॥

पाण्डुर्जित्वा बहून् देशान् बुद्धया विक्रमणेन च ।

अरण्ये मृगयाशीलो न्यवसन्मुनिभिः सह ॥ ११२ ॥

महाराज पाण्डु अपनी बुद्धि और पराक्रमसे अनेक देशोंपर विजय पाकर ( हिंसक ) मृगोंको मारनेके स्वभाववाले होनेके कारण ऋषि- मुनियोंके साथ वनमें ही निवास करते थे ॥ ११२ ॥

मृगव्यवायनिधनात् कृच्छ्रां प्राप स आपदम् ।

जन्मप्रभृति पार्थानां तत्राचारविधिक्रमः ॥ ११३ ॥

एक दिन उन्होंने मृगरूपधारी महर्षिको मैथुनकालमें मार डाला । इससे वे बड़े भारी संकटमें पड़ गये (ऋषिने यह शाप दे दिया कि स्त्री- सहवास करनेपर तुम्हारी मृत्यु हो जायगी ), यह संकट होते हुए भी युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंके जन्मसे लेकर जातकर्म आदि सब संस्कार वनमें ही हुए और वहीं उन्हें शील एवं सदाचारकी रक्षाका उपदेश हुआ ॥ ११३ ॥

मात्रोरभ्युपपत्तिश्च धर्मोपनिषदं प्रति ।

धर्मस्य वायोः शक्रस्य देवयोश्च तथाश्विनोः ॥ ११४ ॥

( पूर्वोक्त शाप होनेपर भी संतान होनेका कारण यह था कि ) कुल- धर्मकी रक्षाके लिये दुर्वासाद्वारा प्राप्त हुई विद्याका आश्रय लेनेके कारण पाण्डवोंकी दोनों माताओं कुन्ती और

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माद्रीके समीप क्रमशः धर्म, वायु, इन्द्र तथा दोनों अश्विनीकुमार – इन देवताओंका आगमन सम्भव हो सका ( इन्हींकी कृपासे युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन एवं नकुल सहदेवकी उत्पत्ति हुई) ॥ ११४ ॥

( ततो धर्मोपनिषदः श्रुत्वा भर्तुः प्रिया पृथा । धर्मानिलेन्द्रान् स्तुतिभिर्जुहाव सुतवाञ्छया । तद्दत्तोपनिषन्माद्री चाश्विनावाजुहाव च । )

तापसैः सह संवृद्धा मातृभ्यां परिरक्षिताः ।

मेध्यारण्येषु पुण्येषु महतामाश्रमेषु च ॥ ११५ ॥

पतिप्रिया कुन्तीने पतिके मुखसे धर्म -रहस्यकी बातें सुनकर पुत्र पानेकी इच्छासे मन्त्र-जपपूर्वक स्तुतिद्वारा धर्म, वायु और इन्द्र देवताका आवाहन किया । कुन्तीके उपदेश देनेपर माद्री भी उस मन्त्र -विद्याको जान गयी और उसने संतानके लिये दोनों अश्विनीकुमारोंका आवाहन किया । इस प्रकार इन पाँचों देवताओंसे पाण्डवोंकी उत्पत्ति हुई । पाँचों पाण्डव अपनी दोनों माताओंद्वारा ही पाले- पोसे गये । वे वनोंमें और महात्माओंके परम पुण्य आश्रमोंमें ही तपस्वी लोगोंके साथ दिनोदिन बढ़ने लगे ॥ ११५ ॥

ऋषिभिर्यत्तदाऽऽनीता धार्तराष्ट्रान् प्रति स्वयम् ।

शिशवश्चाभिरूपाश्च जटिला ब्रह्मचारिणः ॥ ११६ ॥

( पाण्डुकी मृत्यु होनेके पश्चात्) बड़े - बड़े ऋषि- मुनि स्वयं ही पाण्डवोंको लेकर धृतराष्ट्र एवं उनके पुत्रोंके पास आये । उस समय पाण्डव नन्हे -नन्हे शिशुके रूपमें बड़े ही सुन्दर लगते थे । वे सिरपर जटा धारण किये ब्रह्मचारीके वेशमें थे ॥ ११६ ॥

पुत्राश्च भ्रातरश्चेमे शिष्याश्च सुहृदश्च वः ।

पाण्डवा एत इत्युक्त्वा मुनयोऽन्तर्हितास्ततः ॥ ११७ ॥

ऋषियोंने वहाँ जाकर धृतराष्ट्र एवं उनके पुत्रोंसे कहा- ' ये तुम्हारे पुत्र, भाई, शिष्य और सुहृद् हैं । ये सभी महाराज पाण्डुके ही पुत्र हैं । ' इतना कहकर वे मुनि वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ११७ ॥

तांस्तैर्निवेदितान् दृष्ट्वा पाण्डवान् कौरवास्तदा ।

शिष्टाश्च वर्णाः पौरा ये ते हर्षाच्चुक्रुशुर्भृशम् ॥ ११८ ॥

ऋषियोंद्वारा लाये हुए उन पाण्डवोंको देखकर सभी कौरव और नगरनिवासी, शिष्ट तथा वर्णाश्रमी हर्षसे भरकर अत्यन्त कोलाहल करने लगे ॥ ११८ ॥

आहुः केचिन्न तस्यैते तस्यैत इति चापरे ।

यदा चिरमृतः पाण्डुः कथं तस्येति चापरे ॥ ११ ९ ॥

कोई कहते, ‘ ये पाण्डुके पुत्र नहीं हैं । ' दूसरे कहते, ' अजी! ये उन्हींके हैं । ' कुछ लोग कहते, ‘ जब पाण्डुको मरे इतने दिन हो गये, तब ये उनके पुत्र कैसे हो सकते हैं? ' ॥ स्वागतं सर्वथा दिष्ट्या पाण्डोः पश्याम संततिम् ।

पृष्ठ 45

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उच्यतां स्वागतमिति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ॥ १२० ॥

फिर सब लोग कहने लगे, ' हम तो सर्वथा इनका स्वागत करते हैं । हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज हम महाराज पाण्डुकी संतानको अपनी आँखोंसे देख रहे हैं । ' फिर तो सब ओरसे स्वागत बोलनेवालोंकी ही बातें सुनायी देने लगीं ॥ १२० ॥

तस्मिन्नुपरते शब्दे दिशः सर्वा निनादयन् ।

अन्तर्हितानां भूतानां निःस्वनस्तुमुलोऽभवत् ॥ १२१ ॥

दर्शकोंका वह तुमुल शब्द बन्द होनेपर सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करती हुई अदृश्य भूतों — देवताओंकी यह सम्मिलित आवाज ( आकाशवाणी ) गूँज उठी — ‘ ये पाण्डव ही हैं ' ॥ १२१ ॥

पुष्पवृष्टिः शुभा गन्धाः शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनाः ।

आसन् प्रवेशे पार्थानां तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १२२ ॥

जिस समय पाण्डवोंने नगरमें प्रवेश किया, उसी समय फूलोंकी वर्षा होने लगी, सब ओर सुगन्ध छा गयी तथा शंख और दुन्दुभियोंके मांगलिक शब्द सुनायी देने लगे । यह एक अद्भुत चमत्कारकी - सी बात हुई ॥ १२२ ॥

तत्प्रीत्या चैव सर्वेषां पौराणां हर्षसम्भवः ।

शब्द आसीन्महांस्तत्र दिवः स्पृक्कीर्तिवर्धनः ॥ १२३ ॥

सभी नागरिक पाण्डवोंके प्रेमसे आनन्दमें भरकर ऊँचे स्वरसे अभिनन्दन - ध्वनि करने लगे । उनका वह महान् शब्द स्वर्गलोकतक गूँज उठा जो पाण्डवोंकी कीर्ति बढ़ानेवाला था ॥ १२३ ॥

तेऽधीत्य निखिलान् वेदाञ्छास्त्राणि विविधानि च ।

न्यवसन् पाण्डवास्तत्र पूजिता अकुतोभयाः ॥ १२४ ॥

वे सम्पूर्ण वेद एवं विविध शास्त्रोंका अध्ययन करके वहीं निवास करने लगे । सभी उनका आदर करते थे और उन्हें किसीसे भय नहीं था ॥ १२४ ॥

युधिष्ठिरस्य शौचेन प्रीताः प्रकृतयोऽभवन् ।

धृत्या च भीमसेनस्य विक्रमेणार्जुनस्य च ॥ १२५ ॥

गुरुशुश्रूषया क्षान्त्या यमयोर्विनयेन च ।

तुतोष लोकः सकलस्तेषां शौर्यगुणेन च ॥ १२६ ॥

राष्ट्रकी सम्पूर्ण प्रजा युधिष्ठिरके शौचाचार, भीमसेनकी धृति, अर्जुनके विक्रम तथा नकुल- सहदेवकी गुरुशुश्रूषा, क्षमाशीलता और विनयसे बहुत ही प्रसन्न होती थी । सब लोग पाण्डवोंके शौर्यगुणसे संतोषका अनुभव करते थे * ॥

समवाये ततो राज्ञां कन्यां भर्तृस्वयंवराम् ।

प्राप्तवानर्जुनः कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १२७ ॥

पृष्ठ 46

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तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् राजाओंके समुदायमें अर्जुनने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके स्वयं ही पति चुननेवाली द्रुपदकन्या कृष्णाको प्राप्त किया ॥ १२७ ॥

ततः प्रभृति लोकेऽस्मिन् पूज्यः सर्वधनुष्मताम् ।

आदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यः समरेष्वपि चाभवत् ॥ १२८ ॥

तभीसे वे इस लोकमें सम्पूर्ण धनुर्धारियोंके पूजनीय ( आदरणीय ) हो गये और समरांगणमें प्रचण्ड मार्तण्डकी भाँति प्रतापी अर्जुनकी ओर किसीके लिये आँख उठाकर देखना भी कठिन हो गया ॥ १२८ ॥

स सर्वान् पार्थिवाञ् जित्वा सर्वांश्च महतो गणान् ।

आजहारार्जुनो राज्ञो राजसूयं महाक्रतुम् ॥ १२ ९ ॥

उन्होंने पृथक् - पृथक् तथा महान् संघ बनाकर आये हुए सब राजाओंको जीतकर महाराज युधिष्ठिरके राजसूय नामक महायज्ञको सम्पन्न कराया ॥ १२ ९ ॥

अन्नवान् दक्षिणावांश्च सर्वैः समुदितो गुणैः ।

युधिष्ठिरेण सम्प्राप्तो राजसूयो महाक्रतुः ॥ १३० ॥

सुनयाद् वासुदेवस्य भीमार्जुनबलेन च ।

घातयित्वा जरासन्धं चैद्यं च बलगर्वितम् ॥। १३१ ॥

भगवान् श्रीकृष्णकी सुन्दर नीति और भीमसेन तथा अर्जुनकी शक्तिसे बलके घमण्डमें चूर रहनेवाले जरासन्ध और चेदिराज शिशुपालको मरवाकर धर्मराज युधिष्ठिरने महायज्ञ राजसूयका सम्पादन किया । वह यज्ञ सभी उत्तम- गुणोंसे सम्पन्न था । उसमें प्रचुर अन्न और पर्याप्त दक्षिणाका वितरण किया गया था ॥ १३०-१३१ ॥

दुर्योधनं समागच्छन्नर्हणानि ततस्ततः ।

मणिकाञ्चनरत्नानि गोहस्त्यश्वधनानि च ॥ १३२ ॥

विचित्राणि च वासांसि प्रावारावरणानि च ।

कम्बलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च ॥ १३३ ॥

उस समय इधर - उधर विभिन्न देशों तथा नृपतियोंके यहाँसे मणि, सुवर्ण, रत्न, गाय, हाथी, घोड़े, धन - सम्पत्ति, विचित्र वस्त्र, तम्बू, कनात, परदे, उत्तम कम्बल, श्रेष्ठ मृगचर्म तथा रंकुनामक मृगके बालोंसे बने हुए कोमल बिछौने आदि जो उपहारकी बहुमूल्य वस्तुएँ आतीं, वे दुर्योधनके हाथमें दी जातीं - उसीकी देख - रेख में रखी जाती थीं ॥ १३२-१३३ ॥

समृद्धां तां तथा दृष्ट्वा पाण्डवानां तदा श्रियम् ।

ईर्ष्यासमुत्थः सुमहांस्तस्य मन्युरजायत ॥ १३४ ॥

उस समय पाण्डवोंकी वह बढ़ी चढ़ी समृद्धि-सम्पत्ति देखकर दुर्योधनके मनमें ईर्ष्याजनित महान् रोष एवं दुःखका उदय हुआ ॥ १३४ ॥

विमानप्रतिमां तत्र मयेन सुकृतां सभाम् ।

पाण्डवानामुपहृतां स दृष्ट्वा पर्यतप्यत ॥ १३५ ॥

पृष्ठ 47

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उस अवसरपर मयदानवने पाण्डवोंको एक सभाभवन भेंटमें दिया था, जिसकी रूपरेखा विमानके समान थी । वह भवन उसके शिल्पकौशलका एक अच्छा नमूना था । उसे देखकर दुर्योधनको और अधिक संताप हुआ ॥ १३५ ॥

तत्रावहसितश्चासीत् प्रस्कन्दन्निव सम्भ्रमात् ।

प्रत्यक्षं वासुदेवस्य भीमेनानभिजातवत् ॥ १३६ ॥

उसी सभाभवनमें जब सम्भ्रम (जलमें स्थल और स्थलमें जलका भ्रम ) होनेके कारण दुर्योधनके पाँव फिसलने - से लगे, तब भगवान् श्रीकृष्णके सामने ही भीमसेनने उसे गँवार-सा सिद्ध करते हुए उसकी हँसी उड़ायी थी ॥ १३६ ॥

स भोगान् विविधान् भुञ्जन् रत्नानि विविधानि च ।

कथितो धृतराष्ट्रस्य विवर्णो हरिणः कृशः ॥ १३७ ॥

दुर्योधन नाना प्रकारके भोग तथा भाँति- भाँतिके रत्नोंका उपयोग करते रहनेपर भी दिनोदिन दुबला रहने लगा। उसका रंग फीका पड़ गया । इसकी सूचना कर्मचारियोंने महाराज धृतराष्ट्रको दी ॥ १३७ ॥

अन्वजानात् ततो द्यूतं धृतराष्ट्रः सुतप्रियः ।

तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य कोपः समभवन्महान् ॥ १३८ ॥

धृतराष्ट्र अपने उस पुत्रके प्रति अधिक आसक्त थे, अतः उसकी इच्छा जानकर उन्होंने उसे पाण्डवोंके साथ जूआ खेलनेकी आज्ञा दे दी । जब भगवान् श्रीकृष्णने यह समाचार सुना, तब उन्हें धृतराष्ट्रपर बड़ा क्रोध आया ॥ १३८ ॥

नातिप्रीतमनाश्चासीद् विवादांश्चान्वमोदत ।

द्यूतादीननयान् घोरान् विविधांश्चाप्युपैक्षत ॥ १३ ९ ॥

यद्यपि उनके मनमें कलहकी सम्भावनाके कारण कुछ विशेष प्रसन्नता नहीं हुई, तथापि उन्होंने ( मौन रहकर) इन विवादोंका अनुमोदन ही किया और भिन्न- भिन्न प्रकारके भयंकर अन्याय, द्यूत आदिको देखकर भी उनकी उपेक्षा कर दी ॥ १३ ९ ॥

निरस्य विदुरं भीष्मं द्रोणं शारद्वतं कृपम् ।

विग्रहे तुमुले तस्मिन् दहन् क्षत्रं परस्परम् ॥ १४० ॥

( इस अनुमोदन या उपेक्षाका कारण यह था कि वे धर्मनाशक दुष्ट राजाओंका संहार चाहते थे । अतः उन्हें विश्वास था कि) इस विग्रहजनित महान् युद्धमें विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य तथा कृपाचार्यकी अवहेलना करके सभी दुष्ट क्षत्रिय एक- दूसरेको अपनी क्रोधाग्निमें भस्म कर डालेंगे ॥ १४० ॥

जयत्सु पाण्डुपुत्रेषु श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ।

दुर्योधनमतं ज्ञात्वा कर्णस्य शकुनेस्तथा ॥ १४१ ॥

धृतराष्ट्रश्चिरं ध्यात्वा संजयं वाक्यमब्रवीत् ।

शृणु संजय सर्वं मे न चासूयितुमर्हसि ॥ १४२ ॥

पृष्ठ 48

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श्रुतवानसि मेधावी बुद्धिमान् प्राज्ञसम्मतः ।

न विग्रहे मम मतिर्न च प्रीये कुलक्षये ॥ १४३ ॥

जब युद्धमें पाण्डवोंकी जीत होती गयी, तब यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर तथा दुर्योधन, कर्ण और शकुनिके दुराग्रहपूर्ण निश्चित विचार जानकर धृतराष्ट्र बहुत देरतक चिन्तामें पड़े रहे । फिर उन्होंने संजयसे कहा – ' संजय! मेरी सब बातें सुन लो । फिर इस युद्ध या विनाशके लिये मुझे दोष न दे सकोगे । तुम विद्वान्, मेधावी, बुद्धिमान् और पण्डितके लिये भी आदरणीय हो । इस युद्धमें मेरी सम्मति बिलकुल नहीं थी और यह जो हमारे कुलका विनाश हो गया है, इससे मुझे तनिक भी प्रसन्नता नहीं हुई है ॥ १४१– १४३ ॥

न मे विशेषः पुत्रेषु स्वेषु पाण्डुसुतेषु वा ।

वृद्धं मामभ्यसूयन्ति पुत्रा मन्युपरायणाः ॥ १४४ ॥

मेरे लिये अपने पुत्रों और पाण्डवोंमें कोई भेद नहीं था । किंतु क्या करूँ? मेरे पुत्र क्रोधके वशीभूत हो मुझपर ही दोषारोपण करते थे और मेरी बात नहीं मानते थे ॥ १४४ ॥

अहं त्वचक्षुः कार्पण्यात् पुत्रप्रीत्या सहामि तत् ।

मुह्यन्तं चानुमुह्यामि दुर्योधनमचेतनम् ॥ १४५ ॥

मैं अंधा हूँ, अतः कुछ दीनताके कारण और कुछ पुत्रोंके प्रति अधिक आसक्ति होनेसे भी वह सब अन्याय सहता आ रहा हूँ । मन्दबुद्धि दुर्योधन जब मोहवश दुःखी होता था, तब मैं भी उसके साथ दुःखी हो जाता था ॥ १४५ ॥

राजसूये श्रियं दृष्ट्वा पाण्डवस्य महौजसः ।

तच्चावहसनं प्राप्य सभारोहणदर्शने ॥ १४६ ॥

अमर्षणः स्वयं जेतुमशक्तः पाण्डवान् रणे ।

निरुत्साहश्च सम्प्राप्तुं सुश्रियं क्षत्रियोऽपि सन् ॥ १४७ ॥

गान्धारराजसहितश्छद्मद्यूतममन्त्रयत् ।

तत्र यद् यद् यथा ज्ञातं मया संजय तच्छृणु ॥ १४८ ॥

राजसूय-यज्ञमें महापराक्रमी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी सर्वोपरि समृद्धि - सम्पत्ति देखकर तथा सभाभवनकी सीढ़ियोंपर चढ़ते और उस भवनको देखते समय भीमसेनके द्वारा उपहास पाकर दुर्योधन भारी अमर्षमें भर गया था । युद्धमें पाण्डवोंको हरानेकी शक्ति तो उसमें थी नहीं; अतः क्षत्रिय होते हुए भी वह युद्धके लिये उत्साह नहीं दिखा सका । परंतु पाण्डवोंकी उस उत्तम सम्पत्तिको हथियानेके लिये उसने गान्धारराज शकुनिको साथ लेकर कपटपूर्ण द्यूत खेलनेका ही निश्चय किया । संजय! इस प्रकार जुआ खेलनेका निश्चय हो जानेपर उसके पहले और पीछे जो- जो घटनाएँ घटित हुई हैं उन सबका विचार करते हुए मैंने समय- समयपर विजयकी आशाके विपरीत जो- जो अनुभव किया है उसे कहता हूँ, सुनो – ॥ १४६-१४८ ॥

पृष्ठ 49

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श्रुत्वा तु मम वाक्यानि बुद्धियुक्तानि तत्त्वतः ।

ततो ज्ञास्यसि मां सौते प्रज्ञाचक्षुषमित्युत ॥ १४ ९ ॥

सूतनन्दन! मेरे उन बुद्धिमत्तापूर्ण वचनोंको सुनकर तुम ठीक- ठीक समझ लोगे कि मैं कितना प्रज्ञाचक्षु हूँ ॥ १४९ ॥

यदाश्रौषं धनुरायम्य चित्रं विद्धं लक्ष्यं पातितं वै पृथिव्याम् । कृष्णां हृतां प्रेक्षतां सर्वराज्ञां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५० ॥

संजय! जब मैंने सुना कि अर्जुनने धनुषपर बाण चढ़ाकर अद्भुत लक्ष्य बेध दिया और उसे धरतीपर गिरा दिया । साथ ही सब राजाओंके सामने, जबकि वे टुकुर-टुकुर देखते ही रह गये, बलपूर्वक द्रौपदीको ले आया, तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी थी ॥ १५० ॥

यदाश्रौषं द्वारकायां सुभद्रां प्रसह्योढां माधवीमर्जुनेन । इन्द्रप्रस्थं वृष्णिवीरौ च यातौ तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५१ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि अर्जुनने द्वारकामें मधुवंशकी राजकुमारी ( और श्रीकृष्णकी बहिन ) सुभद्राको बलपूर्वक हरण कर लिया और श्रीकृष्ण एवं बलराम ( इस घटनाका विरोध न कर) दहेज लेकर इन्द्रप्रस्थमें आये, तभी समझ लिया था कि मेरी विजय नहीं हो सकती ॥ १५१ ॥

यदाश्रौषं देवराजं प्रविष्टं शरैर्दिव्यैर्वारितं चार्जुनेन । अग्निं तथा तर्पितं खाण्डवे च तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५२ ॥

जब मैंने सुना कि खाण्डवदाहके समय देवराज इन्द्र तो वर्षा करके आग बुझाना चाहते थे और अर्जुनने उसे अपने दिव्य बाणोंसे रोक दिया तथा अग्निदेवको तृप्त किया, संजय! तभी मैंने समझ लिया कि अब मेरी विजय नहीं हो सकती ॥ १५२ ॥

यदाश्रौषं जातुषाद् वेश्मनस्तान् मुक्तान् पार्थान् पञ्च कुन्त्या समेतान् । युक्तं चैषां विदुरं स्वार्थसिद्धी तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५३ ॥

जब मैंने सुना कि लाक्षाभवनसे अपनी मातासहित पाँचों पाण्डव बच गये हैं और स्वयं विदुर उनकी स्वार्थसिद्धिके प्रयत्नमें तत्पर हैं, संजय! तभी मैंने विजयकी आशा छोड़ दी थी ॥ १५३ ॥

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यदाश्रौषं द्रौपदीं रङ्गमध्ये

लक्ष्यं भित्त्वा निर्जितामर्जुनेन ।

शूरान् पञ्चालान् पाण्डवेयांश्च युक्तां - स्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५४ ॥

जब मैंने सुना कि रंगभूमिमें लक्ष्यवेध करके अर्जुनने द्रौपदी प्राप्त कर ली है और पांचाल वीर तथा पाण्डव वीर परस्पर सम्बद्ध हो गये हैं, संजय! उसी समय मैंने विजयकी आशा छोड़ दी ॥ १५४ ॥

यदाश्रौषं मागधानां वरिष्ठं जरासन्धं क्षत्रमध्ये ज्वलन्तम् । दोर्भ्यां हतं भीमसेनेन गत्वा तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५५ ॥

जब मैंने सुना कि मगधराज- शिरोमणि, क्षत्रियजातिके जाज्वल्यमान रत्न जरासन्धको भीमसेनने उसकी राजधानीमें जाकर बिना अस्त्र-त्र- शस्त्रके हाथोंसे ही चीर दिया । संजय! मेरी जीतकी आशा तो तभी टूट गयी ॥ १५५ ॥

यदाश्रौषं दिग्विजये पाण्डुपुत्रै- र्वशीकृतान् भूमिपालान् प्रसह्य । महाक्रतुं राजसूयं कृतं च तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५६ ॥

जब मैंने सुना कि दिग्विजयके समय पाण्डवोंने बलपूर्वक बड़े - बड़े भूमिपतियोंको अपने अधीन कर लिया और महायज्ञ राजसूय सम्पन्न कर दिया । संजय! तभी मैंने समझ लिया कि मेरी विजयकी कोई आशा नहीं है ॥ १५६ ॥

यदाश्रौषं द्रौपदीमश्रुकण्ठीं सभां नीतां दुःखितामेकवस्त्राम् । रजस्वलां नाथवतीमनाथवत् तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५७ ॥

संजय! जब मैंने सुना कि दुःखिता द्रौपदी रजस्वलावस्थामें आँखोंमें आँसू भरे केवल एक वस्त्र पहने वीर पतियोंके रहते हुए भी अनाथके समान भरी सभामें घसीटकर लायी गयी है, तभी मैंने समझ लिया था कि अब मेरी विजय नहीं हो सकती ॥ १५७ ॥

यदाश्रौषं वाससां तत्र राशि समाक्षिपत् कितवो मन्दबुद्धिः । दुःशासनो गतवान् नैव चान्तं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५८ ॥