महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 761–770
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770
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अपाक्रामन्त ताः सर्वा वृद्ध इत्येव चिन्तया ॥ ७ ॥
उस समय सब ओर राजाओंके नाम ले - लेकर उन सबका परिचय दिया जा रहा था । इतनेमें ही शान्तनुनन्दन भीष्म, जो अब वृद्ध हो चले थे, वहाँ अकेले ही आ पहुँचे । उन्हें देखकर वे सब परम सुन्दरी कन्याएँ उद्विग्न- सी होकर, ये बूढ़े हैं, ऐसा सोचती हुई वहाँसे दूर भाग गयीं ॥ ६-७ ॥
वृद्धः परमधर्मात्मा वलीपलितधारणः ।
किं कारणमिहायातो निर्लज्जो भरतर्षभः ॥ ८ ॥
मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यति भारत ।
ब्रह्मचारीति भीष्मो हि वृथैव प्रथितो भुवि ॥ ९ ॥
इत्येवं प्रब्रुवन्तस्ते हसन्ति स्म नृपाधमाः । वहाँ जो नीच स्वभावके नरेश एकत्र थे, वे आपसमें ये बातें कहते हुए उनकी हँसी उड़ाने लगे — ‘ भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ भीष्म तो बड़े धर्मात्मा सुने जाते थे । ये बूढ़े हो गये हैं, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, सिरके बाल सफेद हो चुके हैं; फिर क्या कारण है कि यहाँ आये हैं? ये तो बड़े निर्लज्ज जान पड़ते हैं । अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके ये लोगोंमें क्या कहेंगे— कैसे मुँह दिखायेंगे? भूमण्डलमें व्यर्थ ही यह बात फैल गयी है कि भीष्मजी ब्रह्मचारी हैं' ॥ ८- ९ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच क्षत्रियाणां वचः श्रुत्वा भीष्मश्चक्रोध भारत ॥ १० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! क्षत्रियोंकी ये बातें सुनकर भीष्म अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ १० ॥
भीष्मस्तदा स्वयं कन्या वरयामास ताः प्रभुः ।
उवाच च महीपालान् राजञ्जलदनिःस्वनः ॥ ११ ॥
रथमारोप्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः ।
आहूय दानं कन्यानां गुणवद्भ्यः स्मृतं बुधः ॥ १२ ॥
अलंकृत्य यथाशक्ति प्रदाय च धनान्यपि ।
प्रयच्छन्त्यपरे कन्या मिथुनेन गवामपि ॥ १३ ॥
राजन्! वे शक्तिशाली तो थे ही, उन्होंने उस समय स्वयं ही समस्त कन्याओंका वरण किया । इतना ही नहीं, प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ वीरवर भीष्मने उन कन्याओंको उठाकर रथपर चढ़ा लिया और समस्त राजाओंको ललकारते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा – ' विद्वानोंने कन्याको यथाशक्ति वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके गुणवान् वरको बुलाकर उसे कुछ धन देनेके साथ ही कन्यादान करना उत्तम (ब्राह्म विवाह ) बताया है । कुछ लोग एक जोड़ा गाय और बैल लेकर कन्यादान करते हैं ( यह आर्ष विवाह है ) ॥ ११–१३ ॥
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वित्तेन कथितेनान्ये बलेनान्येऽनुमान्य च ।
प्रमत्तामुपयन्त्यन्ये स्वयमन्ये च विन्दते ॥ १४ ॥
' कितने ही मनुष्य नियत धन लेकर कन्यादान करते हैं ( यह आसुर विवाह है ) । कुछ लोग बलसे कन्याका हरण करते हैं ( यह राक्षस विवाह है ) । दूसरे लोग वर और कन्याकी परस्पर अनुमति होनेपर विवाह करते हैं ( यह गान्धर्व विवाह है) । कुछ लोग अचेत अवस्थामें पड़ी हुई कन्याको उठा ले जाते हैं ( यह पैशाच विवाह है ) । कुछ लोग वर और कन्याको एकत्र करके स्वयं ही उनसे प्रतिज्ञा कराते हैं कि हम दोनों गार्हस्थ्य धर्मका पालन करेंगे; फिर कन्यापिता दोनोंकी पूजा करके अलंकारयुक्त कन्याका वरके लिये दान करता है; इस प्रकार विवाहित होनेवाले (प्राजापत्य विवाहकी रीतिसे ) पत्नीकी उपलब्धि करते हैं ॥ १४ ॥
आर्षं विधिं पुरस्कृत्य दारान् विन्दन्ति चापरे ।
अष्टमं तमथो वित्त विवाहं कविभिर्वृतम् ॥ १५ ॥
'कुछ लोग आर्ष विधि ( यज्ञ) करके ऋत्विजको कन्या देते हैं । इस प्रकार विवाहित होनेवाले ( दैव विवाहकी रीतिसे ) पत्नी प्राप्त करते हैं । इस तरह विद्वानोंने यह विवाहका
आठवाँ प्रकार माना है । इन सबको तुमलोग समझो ॥ १५ ॥
स्वयंवरं तु राजन्याः प्रशंसन्त्युपयान्ति च ।
प्रमथ्य तु हृतामाहुर्ज्यायसीं धर्मवादिनः ॥ १६ ॥
‘ क्षत्रिय स्वयंवरकी प्रशंसा करते और उसमें जाते हैं; परंतु उसमें भी समस्त राजाओंको परास्त करके जिस कन्याका अपहरण किया जाता है, धर्मवादी विद्वान् क्षत्रियके लिये उसे सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ॥ १६ ॥
ता इमाः पृथिवीपाला जिहीर्षामि बलादितः ।
ते यतध्वं परं शक्त्या विजयायेतराय वा ॥ १७ ॥
‘ अतः भूमिपालो! मैं इन कन्याओंको यहाँसे बलपूर्वक हर ले जाना चाहता हूँ । तुमलोग अपनी सारी शक्ति लगाकर विजय अथवा पराजयके लिये मुझे रोकनेका प्रयत्न करो ॥ १७ ॥
स्थितोऽहं पृथिवीपाला युद्धाय कृतनिश्चयः ।
एवमुक्त्वा महीपालान् काशिराजं च वीर्यवान् ॥ १८ ॥
सर्वाः कन्याः स कौरव्यो रथमारोप्य च स्वकम् ।
आमन्त्र्य च स तान् प्रायाच्छीघ्रं कन्याः प्रगृह्य ताः ॥ १ ९ ॥
‘ राजाओ! मैं युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके यहाँ डटा हुआ हूँ। ' परम पराक्रमी कुरुकुलश्रेष्ठ भीष्मजी उन महीपालों तथा काशिराजसे उपर्युक्त बातें कहकर उन समस्त कन्याओंको, जिन्हें वे उठाकर अपने रथपर बिठा चुके थे, साथ लेकर सबको ललकारते हुए वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल दिये ॥ १८-१९ ॥
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ततस्ते पार्थिवाः सर्वे समुत्पेतुरमर्षिताः ।
संस्पृशन्तः स्वकान् बाहून् दशन्तो दशनच्छदान् ॥ २० ॥
फिर तो समस्त राजा इस अपमानको न सह सके; वे अपनी भुजाओंका स्पर्श करते ( ताल ठोकते ) और दाँतोंसे ओठ चबाते हुए अपनी जगहसे उछल पड़े ॥ २० ॥
तेषामाभरणान्याशु त्वरितानां विमुञ्चताम् ।
आमुञ्चतां च वर्माणि सम्भ्रमः सुमहानभूत् ॥ २१ ॥
सब लोग जल्दी - जल्दी अपने आभूषण उतारकर कवच पहनने लगे । उस समय बड़ा भारी कोलाहल मच गया ॥ २१ ॥
ताराणामिव सम्पातो बभूव जनमेजय ।
भूषणानां च सर्वेषां कवचानां च सर्वशः ॥ २२ ॥
सवर्मभिर्भूणैश्च प्रकीर्यद्भिरितस्ततः ।
सक्रोधामर्षजिह्मभ्रूकषायीकृतलोचनाः ॥ २३ ॥
सूतोपक्लृप्तान् रुचिरान् सदश्चैरुपकल्पितान् ।
रथानास्थाय ते वीराः सर्वप्रहरणान्विताः ॥ २४ ॥
प्रयान्तमथ कौरव्यमनुसस्रुरुदायुधाः । ततः समभवद् युद्धं तेषां तस्य च भारत ।
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एकस्य च बहूनां च तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ २५ ॥
जनमेजय! जल्दबाजीके कारण उन सबके आभूषण और कवच इधर- उधर गिर पड़ते थे । उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमण्डलसे तारे टूट -टूटकर गिर रहे हों । कितने ही योद्धाओंके कवच और गहने इधर- उधर बिखर गये । क्रोध और अमर्षके कारण उनकी भौंहें टेढ़ी और आँखें लाल हो गयी थीं । सारथियोंने सुन्दर रथ सजाकर उनमें सुन्दर अश्व जोत दिये थे । उन रथोंपर बैठकर सब प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंसे सम्पन्न हो हथियार उठाये हुए उन वीरोंने जाते हुए कुरुनन्दन भीष्मजीका पीछा किया । जनमेजय! तदनन्तर
उन राजाओं और भीष्मजीका घोर संग्राम हुआ । भीष्मजी अकेले थे और राजालोग बहुत ।
उनमें रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर संग्राम छिड़ गया ॥ २२–२५ ॥
ते त्विषून् साहस्रांस्तस्मिन् युगपदाक्षिपन् ।
अप्राप्तांश्चैव तानाशु भीष्मः सर्वांस्तथान्तरा ॥ २६ ॥
अच्छिनच्छरवर्षेण महता लोमवाहिना ।
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे सर्वतः परिवार्य तम् ॥ २७ ॥
ववृषुः शरवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्बुदाः ।
सतं बाणमयं वर्षं शरैरावार्य सर्वतः ॥ २८ ॥
ततः सर्वान् महीपालान् पर्यविध्यात् त्रिभिस्त्रिभिः ।
एकैकस्तु ततो भीष्मं राजन् विव्याध पञ्चभिः ॥ २ ९ ॥
राजन्! उन नरेशोंने भीष्मजीपर एक ही साथ दस हजार बाण चलाये; परंतु भीष्मजीने उन सबको अपने ऊपर आनेसे पहले बीचमें ही विशाल पंखयुक्त बाणोंकी बौछार करके शीघ्रतापूर्वक काट गिराया । तब वे सब राजा उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनके ऊपर उसी प्रकार बाणोंकी झड़ी लगाने लगे, जैसे बादल पर्वतपर पानीकी धारा बरसाते हैं । भीष्मजीने सब ओरसे उस बाण -वर्षाको रोककर उन सभी राजाओंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया । तब उनमेंसे प्रत्येकने भीष्मजीको पाँच - पाँच बाण मारे ॥ २६–२९ ॥
स च तान् प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमन् ।
तद् युद्धमासीत् तुमुलं घोरं देवासुरोपमम् ॥ ३० ॥
पश्यतां लोकवीराणां शरशक्तिसमाकुलम् ।
स धनूंषि ध्वजाग्राणि वर्माणि च शिरांसि च ॥ ३१ ॥
चिच्छेद समरे भीष्मः शतशोऽथ सहस्रशः ।
तस्याति पुरुषानन्याँल्लाघवं रथचारिणः ॥ ३२ ॥
रक्षणं चात्मनः संख्ये शत्रवोऽप्यभ्यपूजयन् ।
तान् विनिर्जित्य तु रणे सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ३३ ॥
कन्याभिः सहितः प्रायाद् भारतो भारतान् प्रति ।
ततस्तं पृष्ठतो राजञ्छाल्वराजो महारथः ॥ ३४ ॥
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अभ्यगच्छदमेयात्मा भीष्मं शान्तनवं रणे ।
वारणं जघने भिन्दन् दन्ताभ्यामपरो यथा ॥ ३५ ॥
वासितामनुसम्प्राप्तो यूथपो बलिनां वरः ।
स्त्रीकामस्तिष्ठ तिष्ठेति भीष्ममाह स पार्थिवः ॥ ३६ ॥
शाल्वराजो महाबाहुरमर्षेण प्रचोदितः ।
ततः सः पुरुषव्याघ्रो भीष्मः परबलार्दनः ॥ ३७ ॥
तद्वाक्याकुलितः क्रोधाद् विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।
विततेषुधनुष्याणिर्विकुञ्चितललाटभृत् ॥ ३८ ॥
फिर भीष्मजीने भी अपना पराक्रम प्रकट करते हुए प्रत्येक योद्धाको दो -दो बाणोंसे बींध डाला । बाणों और शक्तियोंसे व्याप्त उनका वह तुमुल युद्ध देवासुर- संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था । उस समरांगणमें भीष्मने लोकविख्यात वीरोंके देखते - देखते उनके धनुष, ध्वजाके अग्रभाग, कवच और मस्तक सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें काट गिराये । युद्धमें रथसे विचरनेवाले भीष्मजीकी दूसरे वीरोंसे बढ़कर हाथकी फुर्ती और आत्मरक्षा आदिकी शत्रुओंने भी सराहना की । सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भरतकुलभूषण भीष्मजीने उन सब योद्धाओंको जीतकर कन्याओंको साथ ले भरतवंशियोंकी राजधानी हस्तिनापुरको प्रस्थान किया । राजन्! तब महारथी शाल्वराजने पीछेसे आकर युद्धके लिये शान्तनुनन्दन भीष्मपर आक्रमण किया । शाल्वके शारीरिक बलकी कोई सीमा नहीं थी । जैसे हथिनीके पीछे लगे हुए एक गजराजके पृष्ठभागमें उसीका पीछा करनेवाला दूसरा यूथपति दाँतोंसे प्रहार करके उसे विदीर्ण करना चाहता है, उसी प्रकार बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु शाल्वराज स्त्रीको पानेकी इच्छासे ईर्ष्या और क्रोधके वशीभूत हो भीष्मका पीछा करते हुए उनसे बोला — ‘ अरे ओ! खड़ा रह, खड़ा रह । ' तब शत्रुसेनाका संहार करनेवाले पुरुषसिंह भीष्म उसके वचनोंको सुनकर क्रोधसे व्याकुल हो धूमरहित अग्निके समान जलने लगे और
हाथमें धनुष- बाण लेकर खड़े हो गये । उनके ललाटमें सिकुड़न आ गयी ॥ ३०–३८ ॥
क्षत्रधर्मं समास्थाय व्यपेतभयसम्भ्रमः ।
निवर्तयामास रथं शाल्वं प्रति महारथः ॥ ३ ९ ॥
महारथी भीष्मने क्षत्रिय - धर्मका आश्रय ले भय और घबराहट छोड़कर शाल्वकी ओर अपना रथ लौटाया ॥ ३ ९ ॥
निवर्तमानं तं दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते ।
प्रेक्षकाः समपद्यन्त भीष्मशाल्वसमागमे ॥ ४० ॥
उन्हें लौटते देख सब राजा भीष्म और शाल्वके युद्धमें कुछ भाग न लेकर केवल दर्शक बन गये ॥ ४० ॥
तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे ।
अन्योन्यमभ्यवर्तेतां बलविक्रमशालिनौ ॥ ४१ ॥
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ये दोनों बलवान् वीर मैथुनकी इच्छावाली गौके लिये आपसमें लड़नेवाले दो साँड़ोंकी तरह हुंकार करते हुए एक- दूसरेसे भिड़ गये । दोनों ही बल और पराक्रमसे सुशोभित थे ॥ ४१ ॥
ततो भीष्मं शान्तनवं शरैः शतसहस्रशः ।
शाल्वराजो नरश्रेष्ठः समवाकिरदाशुगैः ॥ ४२ ॥
तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजा शाल्व शान्तनुनन्दन भीष्मपर सैकड़ों और हजारों शीघ्रगामी बाणोंकी बौछार करने लगा ॥ ४२ ॥
पूर्वमभ्यर्दितं दृष्ट्वा भीष्मं शाल्वेन ते नृपाः ।
विस्मिताः समपद्यन्त साधु साध्विति चाब्रुवन् ॥ ४३ ॥
शाल्वने पहले ही भीष्मको पीड़ित कर दिया । यह देखकर सभी राजा आश्चर्यचकित हो गये और ' वाह- वाह ' करने लगे ॥ ४३ ॥
लाघवं तस्य ते दृष्ट्वा समरे सर्वपार्थिवाः ।
अपूजयन्त संहृष्टा वाग्भिः शाल्वं नराधिपम् ॥ ४४ ॥
युद्धमें उसकी फुर्ती देख सब राजा बड़े प्रसन्न हुए और अपनी वाणीद्वारा शाल्वनरेशकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४४ ॥
क्षत्रियाणां ततो वाचः श्रुत्वा परपुरंजयः ।
क्रुद्धः शान्तनवो भीष्मस्तिष्ठ तिष्ठेत्यभाषत ॥ ४५ ॥
शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने क्षत्रियोंकी वे बातें सुनकर कुपित हो शाल्वसे कहा — ' खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ ४५ ॥
सारथिं चाब्रवीत् क्रुद्धो याहि यत्रैष पार्थिवः ।
यावदेनं निहन्म्यद्य भुजङ्गमिव पक्षिराट् ॥ ४६ ॥
फिर सारथिसे कहा- 'जहाँ यह राजा शाल्व है, उधर ही रथ ले चलो । जैसे पक्षिराज गरुड सर्पको दबोच लेते हैं, उसी प्रकार मैं इसे अभी मार डालता हूँ' ॥ ४६ ॥
ततोऽस्त्रं वारुणं सम्यग् योजयामास कौरवः ।
तेनाश्वांश्चतुरोऽमृद्नाच्छाल्वराजस्य भूपते ॥ ४७ ॥
जनमेजय! तदनन्तर कुरुनन्दन भीष्मने धनुषपर उचित रीतिसे वारुणास्त्रका संधान किया और उसके द्वारा शाल्वराजके चारों घोड़ोंको रौंद डाला ॥ ४७ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य शाल्वराजस्य कौरवः ।
भीष्मो नृपतिशार्दूल न्यवधीत् तस्य सारथिम् ॥ ४८ ॥
नृपश्रेष्ठ! फिर अपने अस्त्रोंसे राजा शाल्वके अस्त्रोंका निवारण करके कुरुवंशी भीष्मने उसके सारथिको भी मार डाला ॥ ४८ ॥
अस्त्रेण चास्याथैन्द्रेण न्यवधीत् तुरगोत्तमान् ।
कन्याहेतोर्नरश्रेष्ठ भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ४ ९ ॥
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जित्वा विसर्जयामास जीवन्तं नृपसत्तमम् ।
ततः शाल्वः स्वनगरं प्रययौ भरतर्षभ ॥ ५० ॥
स्वराज्यमन्वशाच्चैव धर्मेण नृपतिस्तदा ।
राजानो ये च तत्रासन् स्वयंवरदिदृक्षवः ॥ ५१ ॥
स्वान्येव तेऽपि राष्ट्राणि जग्मुः परपुरंजयाः ।
एवं विजित्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः ॥ ५२ ॥
प्रययौ हास्तिनपुरं यत्र राजा स कौरवः ।
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा प्रशास्ति वसुधामिमाम् ॥ ५३ ॥
तत्पश्चात् ऐन्द्रास्त्रद्वारा उसके उत्तम अश्वोंको यमलोक पहुँचा दिया । नरश्रेष्ठ! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने कन्याओंके लिये युद्ध करके शाल्वको जीत लिया और नृपश्रेष्ठ शाल्वका भी केवल प्राणमात्र छोड़ दिया । जनमेजय! उस समय शाल्व अपनी राजधानीको लौट गया और धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगा । इसी प्रकार शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले जो - जो राजा वहाँ स्वयंवर देखनेकी इच्छासे आये थे, वे भी अपने - अपने देशको चले गये । प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म उन कन्याओंको जीतकर हस्तिनापुरको चल दिये; जहाँ रहकर धर्मात्मा कुरुवंशी राजा विचित्रवीर्य इस पृथ्वीका शासन करते थे ॥ ४ ९ –५३ ॥
यथा पितास्य कौरव्यः शान्तनुर्नृपसत्तमः ।
सोऽचिरेणैव कालेन अत्यक्रामन्नराधिप ॥ ५४ ॥
वनानि सरितश्चैव शैलांश्च विविधान् द्रुमान् ।
अक्षतः क्षपयित्वारीन् संख्येऽसंख्येयविक्रमः ॥ ५५ ॥
उनके पिता कुरुश्रेष्ठ नृपशिरोमणि शान्तनु जिस प्रकार राज्य करते थे, वैसा ही वे भी करते थे । जनमेजय! भीष्मजी थोड़े ही समयमें वन, नदी, पर्वतोंको लाँघते और नाना प्रकारके वृक्षोंको लाँघते और पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ गये । युद्धमें उनका पराक्रम अवर्णनीय था । उन्होंने स्वयं अक्षत रहकर शत्रुओंको ही क्षति पहुँचायी थी ॥ ५४-५५ ॥
आनयामास काश्यस्य सुताः सागरगासुतः ।
स्नुषा इव स धर्मात्मा भगिनीरिव चानुजाः ॥ ५६ ॥
यथा दुहितरश्चैव परिगृह्य ययौ कुरून् ।
आनिन्ये स महाबाहुर्भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥ ५७ ॥
धर्मात्मा गंगानन्दन भीष्म काशिराजकी कन्याओंको पुत्रवधू, छोटी बहिन एवं पुत्रीकी भाँति साथ रखकर कुरुदेशमें ले आये । वे महाबाहु अपने भाई विचित्रवीर्यका प्रिय करनेकी इच्छासे उन सबको लाये थे ॥ ५६-५७ ॥
ताः सर्वगुणसम्पन्ना भ्राता भ्रात्रे यवीयसे ।
भीष्मो विचित्रवीर्याय प्रददौ विक्रमाहृताः ॥ ५८ ॥
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भाई भीष्मने अपने पराक्रमद्वारा हरकर लायी हुई उन सर्वसद्गुणसम्पन्न कन्याओंको अपने छोटे भाई विचित्रवीर्यके हाथमें दे दिया ॥ ५८ ॥
एवं धर्मेण धर्मज्ञः कृत्वा कर्मातिमानुषम् ।
भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य विवाहायोपचक्रमे ॥ ५ ९ ॥
सत्यवत्या सह मिथः कृत्वा निश्चयमात्मवान् ।
विवाहं कारयिष्यन्तं भीष्मं काशिपतेः सुता ।
ज्येष्ठा तासामिदं वाक्यमब्रवीद्धसती तदा ॥ ६० ॥
धर्मज्ञ एवं जितात्मा भीष्मजी इस प्रकार धर्मपूर्वक अलौकिक पराक्रम करके माता सत्यवतीसे सलाह ले एक निश्चयपर पहुँचकर भाई विचित्रवीर्यके विवाहकी तैयारी करने लगे । काशिराजकी उन कन्याओंमें जो सबसे बड़ी थी, वह बड़ी सती- साध्वी थी । उसने जब सुना कि भीष्मजी मेरा विवाह अपने छोटे भाईके साथ करेंगे, तब वह उनसे हँसती हुई इस प्रकार बोली- ॥ ५ ९ -६० ॥
मया सौभपतिः पूर्वं मनसा हि वृतः पतिः ।
तेन चास्मि वृता पूर्वमेष कामश्च मे पितुः ॥ ६१ ॥
‘ धर्मात्मन्! मैंने पहलेसे ही मन-ही-मन सौभ नामक विमानके अधिपति राजा शाल्वको पतिरूपमें वरण कर लिया था । उन्होंने भी पूर्वकालमें मेरा वरण किया था । मेरे पिताजीकी भी यही इच्छा थी कि मेरा विवाह शाल्वके साथ हो ॥ ६१ ॥
मया वरयितव्योऽभूच्छाल्वस्तस्मिन् स्वयंवरे ।
एतद् विज्ञाय धर्मज्ञ धर्मतत्त्वं समाचर ॥ ६२ ॥
‘ उस स्वयंवरमें मुझे राजा शाल्वका ही वरण करना था। धर्मज्ञ! इन सब बातोंको सोच-समझकर जो धर्मका सार प्रतीत हो, वही कार्य कीजिये ' ॥ ६२ ॥
एवमुक्तस्तया भीष्मः कन्यया विप्रसंसदि ।
चिन्तामभ्यगमद् वीरो युक्तां तस्यैव कर्मणः ॥ ६३ ॥
जब उस कन्याने ब्राह्मणमण्डलीके बीच वीरवर भीष्मजीसे इस प्रकार कहा, तब वे उस वैवाहिक कर्मके विषयमें युक्तियुक्त विचार करने लगे ॥ ६३ ॥
विनिश्चित्य स धर्मज्ञो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
अनुजने तदा ज्येष्ठामम्बां काशिपतेः सुताम् ॥ ६४ ॥
वे स्वयं भी धर्मके ज्ञाता थे, फिर भी वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ भलीभाँति विचार करके उन्होंने काशिराजकी ज्येष्ठ पुत्री अम्बाको उस समय शाल्वके यहाँ जानेकी अनुमति दे दी ॥ ६४ ॥
अम्बिकाम्बालिके भार्ये प्रादाद् भ्रात्रे यवीयसे ।
भीष्मो विचित्रवीर्याय विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ६५ ॥
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शेष दो कन्याओंका नाम अम्बिका और अम्बालिका था । उन्हें भीष्मजीने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार छोटे भाई विचित्रवीर्यको पत्नीरूपमें प्रदान किया ॥ ६५ ॥
तो: पाणी गृहीत्वा तु रूपयौवनदर्पितः ।
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कामात्मा समपद्यत ॥ ६६ ॥
उन दोनोंका पाणिग्रहण करके रूप और यौवनके अभिमानसे भरे हुए धर्मात्मा विचित्रवीर्य कामात्मा बन गये ॥ ६६ ॥
ते चापि बृहती श्यामे नीलकुञ्चितमूर्धजे ।
रक्ततुङ्गनखोपेते पीनश्रोणिपयोधरे ॥ ६७ ॥
उनकी वे दोनों पत्नियाँ सयानी थीं । उनकी अवस्था सोलह वर्षकी हो चुकी थी । उनके केश नीले और घुँघराले थे; हाथ - पैरोंके नख लाल और ऊँचे थे; नितम्ब और उरोज स्थूल और उभरे हुए थे ॥ ६७ ||
आत्मनः प्रतिरूपोऽसौ लब्धः पतिरिति स्थिते ।
विचित्रवीर्यं कल्याण्यौ पूजयामासतुः शुभे ॥ ६८ ॥
वे यह जानकर संतुष्ट थीं कि हम दोनोंको अपने अनुरूप पति मिले हैं; अतः वे दोनों कल्याणमयी देवियाँ विचित्रवीर्यकी बड़ी सेवा - पूजा करने लगीं ॥ ६८ ॥
स चाश्विरूपसदृशो देवतुल्यपराक्रमः ।
सर्वासामेव नारीणां चित्तप्रमथनो रहः ॥ ६ ९ ॥
विचित्रवीर्यका रूप अश्विनीकुमारोंके समान था । वे देवताओंके समान पराक्रमी थे ।
एकान्तमें वे सभी नारियोंके मनको मोह लेनेकी शक्ति रखते थे ॥ ६९ ॥
ताभ्यां सह समाः सप्त विहरन् पृथिवीपतिः ।
विचित्रवीर्यस्तरुणो यक्ष्मणा समगृह्यत ॥ ७० ॥
राजा विचित्रवीर्यने उन दोनों पत्नियोंके साथ सात वर्षोंतक निरन्तर विहार किया; अतः उस असंयमके परिणामस्वरूप वे युवावस्थामें ही राजयक्ष्माके शिकार हो गये ॥ ७० ॥
सुहृदां यतमानानामाप्तैः सह चिकित्सकैः ।
जगामास्तमिवादित्यः कौरव्यो यमसादनम् ॥ ७१ ॥
उनके हितैषी सगे - सम्बन्धियोंने नामी और विश्वसनीय चिकित्सकोंके साथ उनके रोग-निवारणकी पूरी चेष्टा की, तो भी जैसे सूर्य अस्ताचलको चले जाते हैं, उसी प्रकार वे कौरवनरेश यमलोकको चले गये ॥ ७१ ॥
धर्मात्मा स तु गाङ्गेयश्चिन्ताशोकपरायणः ।
प्रेतकार्याणि सर्वाणि तस्य सम्यगकारयत् ॥ ७२ ॥
राज्ञो विचित्रवीर्यस्य सत्यवत्या मते स्थितः ।
ऋत्विग्भिः सहितो भीष्मः सर्वैश्च कुरुपुङ्गवैः ॥ ७३ ॥
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धर्मात्मा गंगानन्दन भीष्मजी भाईकी मृत्युसे चिन्ता और शोकमें डूब गये । फिर माता सत्यवतीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले उन भीष्मजीने ऋत्विजों तथा कुरुकुलके समस्त श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ राजा विचित्रवीर्यके सभी प्रेतकार्य अच्छी तरह कराये ॥ ७२-७३ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि विचित्रवीर्योपरमे द्वयधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें विचित्रवीर्यका निधनविषयक एक सौ दोवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १०२ ॥
Paca