श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 751–760
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760
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इत्युक्तः पुनरेवाथ तं दाशः प्रत्यभाषत ।
चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म राज्यार्थे भरतर्षभ ॥ ८८ ॥
भरतवंशावतंस जनमेजय! देवव्रतके ऐसा कहनेपर निषाद उनसे फिर बोला । वह राज्यके लिये उनसे कोई दुष्कर प्रतिज्ञा कराना चाहता था ॥ ८८ ॥
त्वमेव नाथः सम्प्राप्तः शान्तनोरमितद्युते ।
कन्यायाश्चैव धर्मात्मन् प्रभुर्दानाय चेश्वरः ॥ ८९ ॥
उसने कहा — ‘ अमित तेजस्वी युवराज! आप ही महाराज शान्तनुकी ओरसे मालिक बनकर यहाँ आये हैं। धर्मात्मन्! इस कन्यापर भी आपका पूरा अधिकार है । आप जिसे
चाहें, इसे दे सकते हैं । आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं ॥ ८ ९ ॥
इदं तु वचनं सौम्य कार्यं चैव निबोध मे ।
कौमारिकाणां शीलेन वक्ष्याम्यहमरिन्दम ॥ ९ ० ॥
‘ परंतु सौम्य! इस विषयमें मुझे आपसे कुछ और कहना है और वह आवश्यक कार्य है; अतः आप मेरे इस कथनको सुनिये । शत्रुदमन! कन्याओंके प्रति स्नेह रखनेवाले सगे-सम्बन्धियोंका जैसा स्वभाव होता है, उसीसे प्रेरित होकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगा ॥ ९० ॥
यत् त्वया सत्यवत्यर्थे सत्यधर्मपरायण ।
राजमध्ये प्रतिज्ञातमनुरूपं तवैव तत् ॥ ९ १ ॥
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‘ सत्यधर्मपरायण राजकुमार! आपने सत्यवतीके हितके लिये इन राजाओंके बीचमें जो प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही योग्य है ॥ ९ १ ॥
नान्यथा तन्महाबाहो संशयोऽत्र न कश्चन ।
तवापत्यं भवेद् यत् तु तत्र नः संशयो महान् ॥ ९ २ ॥
' महाबाहो! वह टल नहीं सकती; उसके विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है, परंतु आपका जो पुत्र होगा, वह शायद इस प्रतिज्ञापर दृढ़ न रहे, यही हमारे मनमें बड़ा भारी संशय है ' ॥ ९ २ ॥ वैशम्पायन उवाच
तस्यैतन्मतमाज्ञाय सत्यधर्मपरायणः ।
प्रत्यजानात् तदा राजन् पितुः प्रियचिकीर्षया ॥ ९ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! निषादराजके इस अभिप्रायको समझकर सत्यधर्ममें तत्पर रहनेवाले कुमार देवव्रतने उस समय पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे यह कठोर प्रतिज्ञा की ॥ ९ ३ ॥ गाङ्गेय उवाच दाशराज निबोधेदं वचनं मे नरोत्तम ।
(ऋषयो वाथवा देवा भूतान्यन्तर्हितानि च ।
यानि यानीह शृण्वन्तु नास्ति वक्ता हि मत्समः ॥
इदं वचनमादत्स्व सत्येन मम जल्पतः । ) शृण्वतां भूमिपालानां यद् ब्रवीमि पितुः कृते ॥ ९ ४ ॥ भीष्मने कहा- नरश्रेष्ठ निषादराज! मेरी यह बात सुनो । जो- जो ऋषि, देवता एवं अन्तरिक्षके प्राणी यहाँ हों, वे सब भी सुनें। मेरे समान वचन देनेवाला दूसरा नहीं है । निषाद! मैं सत्य कहता हूँ, पिताके हितके लिये सब भूमिपालोंके सुनते हुए मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरी इस बातको समझो ॥ ९ ४ ॥
राज्यं तावत् पूर्वमेव मया त्यक्तं नराधिपाः ।
अपत्यहेतोरपि च करिष्येऽद्य विनिश्चयम् ॥ ९ ५ ॥
राजाओ! राज्य तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है; अब संतानके लिये भी अटल निश्चय कर रहा हूँ ॥ ९ ५ ॥
अद्यप्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्यं भविष्यति ।
अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षया दिवि ॥ ९ ६ ॥
निषादराज! आजसे मेरा आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत चलता रहेगा । मेरे पुत्र न होनेपर भी स्वर्गमें मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे ॥ ९ ६ ॥ न हि जन्मप्रभृत्युक्तं मम किंचिदिहानृतम् ।
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यावत् प्राणा ध्रियन्ते वै मम देहं समाश्रिताः ॥
तावन्न जनयिष्यामि पित्रे कन्यां प्रयच्छ मे ।
परित्यजाम्बहं राज्यं मैथुनं चापि सर्वशः ॥
ऊर्ध्वरेता भविष्यामि दाश सत्यं ब्रवीमि ते । ) मैंने जन्मसे लेकर अबतक कोई झूठ बात नहीं कही है । जबतक मेरे शरीरमें प्राण रहेंगे, तबतक मैं संतान नहीं उत्पन्न करूँगा । तुम पिताजीके लिये अपनी कन्या दे दो । दाश! मैं राज्य तथा मैथुनका सर्वथा परित्याग करूँगा और ऊर्ध्वरेता ( नैष्ठिक ब्रह्मचारी ) होकर रहूँगा - यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ। वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।
ददानीत्येव तं दाशो धर्मात्मा प्रत्यभाषत ॥ ९ ७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - देवव्रतका यह वचन सुनकर धर्मात्मा निषादराजके रोंगटे खड़े हो गये । उसने तुरंत उत्तर दिया- ' मैं यह कन्या आपके पिताके लिये अवश्य देता हूँ' ॥ ९ ७ ॥
ततोऽन्तरिक्षेऽप्सरसो देवाः सर्षिगणास्तदा ।
अभ्यवर्षन्त कुसुमैर्भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ॥ ९ ८ ॥
उस समय अन्तरिक्षमें अप्सरा, देवता तथा ऋषिगण फूलोंकी वर्षा करने लगे और बोल उठे — ‘ ये भयंकर प्रतिज्ञा करनेवाले राजकुमार भीष्म हैं ( अर्थात् भीष्मके नामसे इनकी ख्याति होगी ) ' ॥ ९ ८ ॥
ततः स पितुरर्थाय तामुवाच यशस्विनीम् ।
अधिरोह रथं मातर्गच्छावः स्वगृहानिति ॥ ९९ ॥
तत्पश्चात् भीष्म पिताके मनोरथकी सिद्धिके लिये उस यशस्विनी निषादकन्यासे बोले
—‘माताजी! इस रथपर बैठिये । अब हमलोग अपने घर चलें ' ॥ ९९ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु भीष्मस्तां रथमारोप्य भाविनीम् ।
आगम्य हास्तिनपुरं शान्तनोः संन्यवेदयत् ॥ १०० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर भीष्मने उस भामिनीको रथपर बैठा लिया और हस्तिनापुर आकर उसे महाराज शान्तनुको सौंप दिया ॥ १०० ॥
तस्य तद् दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नराधिपाः ।
समेताश्च पृथक् चैव भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ॥ १०१ ॥
उनके इस दुष्कर कर्मकी सब राजालोग एकत्र होकर और अलग- अलग भी प्रशंसा करने लगे । सबने एक स्वरसे कहा, ' यह राजकुमार वास्तवमें भीष्म है ' ॥ १०१ ॥
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नच्छ्रुत्वा दुष्करं कर्म कृतं भीष्मेण शान्तनुः ।
स्वच्छन्दमरणं तुष्टो ददौ तस्मै महात्मने ॥ १०२ ॥
भीष्मके द्वारा किये हुए उस दुष्कर कर्मकी बात सुनकर राजा शान्तनु बहुत स् और उन्होंने उन महात्मा भीष्मको स्वच्छन्द मृत्युका वरदान दिया ॥ १०२ ॥
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देवव्रत ( भीष्म ) - की भीषण प्रतिज्ञा
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न ते मृत्युः प्रभविता यावज्जीवितुमिच्छसि ।
त्वत्तो ह्यनुज्ञां सम्प्राप्य मृत्युः प्रभवितानघ ॥ १०३ ॥
वे बोले – ' मेरे निष्पाप पुत्र! तुम जबतक यहाँ जीवित रहना चाहोगे, तबतक मृत्यु तुम्हारे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती । तुमसे आज्ञा लेकर ही मृत्यु तुमपर अपना प्रभाव प्रकट कर सकती है ' ॥ १०३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि सत्यवतीलाभोपाख्याने शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें सत्यवतीलाभोपाख्यानविषयक सौवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १०० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३३ श्लोक मिलाकर कुल ११६३ श्लोक हैं ) Fara O FURU
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एकाधिकशततमोऽध्यायः सत्यवतीके गर्भसे चित्रांगद और विचित्रवीर्यकी उत्पत्ति, शान्तनु और चित्रांगदका निधन तथा विचित्रवीर्यका राज्याभिषेक वैशम्पायन उवाच ( चेदिराजसुतां ज्ञात्वा दाशराजेन वर्धिताम् । विवाहं कारयामास शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ )
ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा शान्तनुर्नृपः ।
तां कन्यां रूपसम्पन्नां स्वगृहे संन्यवेशयत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - सत्यवती चेदिराज वसुकी पुत्री है और निषादराजने इसका पालन--पोषण किया है - यह जानकर राजा शान्तनुने उसके साथ शास्त्रीय विधिसे विवाह किया । तदनन्तर विवाह सम्पन्न हो जानेपर राजा शान्तनुने उस रूपवती कन्याको अपने महलमें रखा ॥ १ ॥
ततः शान्तनवो धीमान् सत्यवत्यामजायत ।
वीरश्चित्राङ्गदो नाम वीर्यवान् पुरुषेश्वरः ॥ २ ॥
कुछ कालके पश्चात् सत्यवतीके गर्भसे शान्तनुका बुद्धिमान् पुत्र वीर चित्रांगद उत्पन्न हुआ, जो बड़ा ही पराक्रमी तथा समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ था ॥ २ ॥
अथापरं महेष्वासं सत्यवत्यां सुतं प्रभुः ।
विचित्रवीर्यं राजानं जनयामास वीर्यवान् ॥ ३ ॥
इसके बाद महापराक्रमी और शक्तिशाली राजा शान्तनुने दूसरे पुत्र महान् धनुर्धर राजा विचित्रवीर्यको जन्म दिया ॥ ३ ॥
अप्राप्तवति तस्मिंस्तु यौवनं पुरुषर्षभे ।
स राजा शान्तनुर्धीमान् कालधर्ममुपेयिवान् ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ विचित्रवीर्य अभी यौवनको प्राप्त भी नहीं हुए थे कि बुद्धिमान् महाराज शान्तनुकी मृत्यु हो गयी ॥ ४ ॥
स्वर्गते शान्तनौ भीष्मश्चित्राङ्गदमरिंदमम् ।
स्थापयामास वै राज्ये सत्यवत्या मते स्थितः ॥ ५ ॥
शान्तनुके स्वर्गवासी हो जानेपर भीष्मने सत्यवतीकी सम्मतिसे शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर चित्रांगदको राज्यपर बिठाया ॥ ५ ॥
स तु चित्राङ्गदः शौर्यात् सर्वांश्चिक्षेप पार्थिवान् ।
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मनुष्यं न हि मेने स कञ्चित् सदृशमात्मनः ॥ ६ ॥
चित्रांगद अपने शौर्यके घमंडमें आकर सब राजाओंका तिरस्कार करने लगे । वे किसी भी मनुष्यको अपने समान नहीं मानते थे ॥ ६ ॥
तं क्षिपन्तं सुरांश्चैव मनुष्यानसुरांस्तथा ।
गन्धर्वराजो बलवांस्तुल्यनामाभ्ययात् तदा ॥ ७ ॥
मनुष्योंपर ही नहीं, वे देवताओं तथा असुरोंपर भी आक्षेप करते थे । तब एक दिन उन्हींके समान नामवाला महाबली गन्धर्वराज चित्रांगद उनके पास आया ॥ ७ ॥
(गन्धर्व उवाच
त्वं वै सदृशनामासि युद्धं देहि नृपात्मज ।
नाम चान्यत् प्रगृणीष्व यदि युद्धं न दास्यसि ॥
त्वयाहं युद्धमिच्छामि त्वत्सकाशात् तु नामतः । आगतोऽस्मि वृथाभाष्यो न गच्छेन्नामतो यथा ॥ ) गन्धर्वने कहा— राजकुमार! तुम मेरे सदृश नाम धारण करते हो, अतः मुझे युद्धका अवसर दो और यदि यह न कर सको तो अपना दूसरा नाम रख लो । मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ । नामकी एकताके कारण ही मैं तुम्हारे निकट आया हूँ । मेरे नामद्वारा व्यर्थ पुकारा जानेवाला मनुष्य मेरे सामनेसे सकुशल नहीं जा सकता । तेनास्य सुमहद् युद्धं कुरुक्षेत्रे बभूव ह ।
तयोर्बलवतोस्तत्र गन्धर्वकुरुमुख्ययोः ।
नद्यास्तीरे सरस्वत्याः समास्तिस्रोऽभवद् रणः ॥ ८ ॥
तस्मिन् विमर्दे तुमुले शस्त्रवर्षसमाकुले ।
मायाधिकोऽवधीद् वीरं गन्धर्वः कुरुसत्तमम् ॥ ९ ॥
तदनन्तर उसके साथ कुरुक्षेत्रमें राजा चित्रांगदका बड़ा भारी युद्ध हुआ। गन्धर्वराज और कुरुराज दोनों ही बड़े बलवान् थे । उनमें सरस्वती नदीके तटपर तीन वर्षोंतक युद्ध होता रहा । अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षासे व्याप्त उस घमासान युद्धमें मायामें बढ़े - चढ़े हुए गन्धर्वने कुरुश्रेष्ठ वीर चित्रांगदका वध कर डाला ॥ ८ - ९ ॥
स हत्वा तु नरश्रेष्ठं चित्राङ्गदमरिंदमम् ।
अन्ताय कृत्वा गन्धर्वो दिवमाचक्रमे ततः ॥ १० ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले नरश्रेष्ठ चित्रांगदको मारकर युद्ध समाप्त करके वह गन्धर्व स्वर्गलोकमें चला गया ॥ १० ॥
तस्मिन् पुरुषशार्दूले निहते भूरितेजसि ।
भीष्मः शान्तनवो राजा प्रेतकार्याण्यकारयत् ॥ ११ ॥
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उन महान् तेजस्वी पुरुषसिंह चित्रांगदके मारे जानेपर शान्तनुनन्दन भीष्मने उनके प्रेतकर्म करवाये ॥ ११ ॥
विचित्रवीर्यं च तदा बालमप्राप्तयौवनम् ।
कुरुराज्ये महाबाहुरभ्यषिञ्चदनन्तरम् ॥ १२ ॥
विचित्रवीर्य अभी बालक थे, युवावस्थामें नहीं पहुँचे थे तो भी महाबाहु भीष्मने उन्हें कुरुदेशके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १२ ॥
विचित्रवीर्यः स तदा भीष्मस्य वचने स्थितः ।
अन्वशासन्महाराज पितृपैतामहं पदम् ॥ १३ ॥
महाराज जनमेजय! तब विचित्रवीर्य भीष्मजीकी आज्ञाके अधीन रहकर अपने बाप-दादोंके राज्यका शासन करने लगे ॥ १३ ॥
स धर्मशास्त्रकुशलं भीष्मं शान्तनवं नृपः ।
पूजयामास धर्मेण स चैनं प्रत्यपालयत् ॥ १४ ॥
शान्तनुनन्दन भीष्म धर्म एवं राजनीति आदि शास्त्रोंमें कुशल थे; अतः राजा विचित्रवीर्य धर्मपूर्वक उनका सम्मान करते थे और भीष्मजी भी इन अल्पवयस्क नरेशकी सब प्रकारसे रक्षा करते थे ॥ १४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि चित्राङ्गदोपाख्याने एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें चित्रांगदोपाख्यानविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल १७ श्लोक हैं )
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द्वयधिकशततमोऽध्यायः भीष्मके द्वारा स्वयंवरसे काशिराजकी कन्याओंका हरण, युद्धमें सब राजाओं तथा शाल्वकी पराजय, अम्बिका और अम्बालिकाके साथ विचित्रवीर्यका विवाह तथा निधन वैशम्पायन उवाच
हते चित्राङ्गदे भीष्मो बाले भ्रातरि कौरव ।
पालयामास तद् राज्यं सत्यवत्या मते स्थितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! चित्रांगदके मारे जानेपर दूसरे भाई विचित्रवीर्य अभी बहुत छोटे थे, अतः सत्यवतीकी रायसे भीष्मजीने ही उस राज्यका पालन किया ॥ १ ॥
सम्प्राप्तयौवनं दृष्ट्वा भ्रातरं धीमतां वरः ।
भीष्मो विचित्रवीर्यस्य विवाहायाकरोन्मतिम् ॥ २ ॥
जब विचित्रवीर्य धीरे- धीरे युवावस्थामें पहुँचे, तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भीष्मजीने उनकी वह अवस्था देख विचित्रवीर्यके विवाहका विचार किया ॥ २ ॥
अथ काशिपतेर्भीष्मः कन्यास्तिस्रोऽप्सरोपमाः ।
शुश्राव सहिता राजन् वृण्वाना वै स्वयंवरम् ॥ ३ ॥
राजन्! उन दिनों काशिराजकी तीन कन्याएँ थीं, जो अप्सराओंके समान सुन्दर थीं । भीष्मजीने सुना, वे तीनों कन्याएँ साथ ही स्वयंवर-सभामें पतिका वरण करनेवाली हैं ॥ ३ ॥
ततः स रथिनां श्रेष्ठो रथेनैकेन शत्रुजित् ।
जगामानुमते मातुः पुरीं वाराणसीं प्रभुः ॥ ४ ॥
तब माता सत्यवतीकी आज्ञा ले रथियोंमें श्रेष्ठ शत्रुविजयी भीष्म एकमात्र रथके साथ वाराणसीपुरीको गये ॥ ४ ॥
तत्र राज्ञः समुदितान् सर्वतः समुपागतान् ।
ददर्श कन्यास्ताश्चैव भीष्मः शान्तनुनन्दनः ॥ ५ ॥
वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्मने देखा, सब ओरसे आये हुए राजाओंका समुदाय स्वयंवर-सभामें जुटा हुआ है और वे कन्याएँ भी स्वयंवरमें उपस्थित हैं ॥ ५ ॥
कीर्त्यमानेषु राज्ञां तु तदा नामसु सर्वशः ।
एकाकिनं तदा भीष्मं वृद्धं शान्तनुनन्दनम् ॥ ६ ॥
सोद्वेगा इव तं दृष्ट्वा कन्याः परमशोभनाः ।