महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 871–880

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880

पृष्ठ 871

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' उस ब्राह्मणकी बात सत्य ही होगी । उसके उपयोगका यह अवसर आ गया है ।

महाराज! आपकी आज्ञा होनेपर मैं उस मन्त्रद्वारा किसी देवताका आवाहन कर सकती हूँ ।

जिससे राजर्षे! हम दोनोंके लिये हितकर संतान प्राप्त हो ॥ १५ ॥

( यां मे विद्यां महाराज अददात् स महायशाः ।

तयाहूतः सुरः पुत्रं प्रदास्यति सुरोपमम् ।

अनपत्यकृतं यस्ते शोकं हि व्यपनेष्यति ॥

अपत्यकाम एवं स्यान्ममापत्यं भवेदिति । ) ‘ महाराज! उन महायशस्वी महर्षिने जो विद्या मुझे दी थी, उसके द्वारा आवाहन करनेपर कोई भी देवता आकर देवोपम पुत्र प्रदान करेगा, जो आपके संतानहीनताजनित शोकको दूर कर देगा; इस प्रकार मुझे संतान प्राप्त होगी और आपकी पुत्रकामना सफल हो जायगी ।

आवाहयामि कं देवं ब्रूहि सत्यवतां वर ।

त्वत्तोऽनुज्ञाप्रतीक्षां मां विद्ध्यस्मिन् कर्मणि स्थिताम् ॥ १६ ॥

‘ सत्यवानोंमें श्रेष्ठ नरेश! बताइये, मैं किस देवताका आवाहन करूं । आप समझ लें, मैं ( आपके संतोषार्थ ) इस कार्यके लिये तैयार हूँ । केवल आपसे आज्ञा मिलनेकी प्रतीक्षामें हूँ' ॥ १६ ॥

पाण्डुरुवाच

( धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि त्वं नो धात्री कुलस्य हि ।

नमो महर्षये तस्मै येन दत्तो वरस्तव ॥

न चाधर्मेण धर्मज्ञे शक्याः पालयितुं प्रजाः ॥ )

अद्यैव त्वं वरारोहे प्रयतस्व यथाविधि ।

धर्ममावाहय शुभे स हि लोकेषु पुण्यभाक् ॥ १७ ॥

पाण्डु बोले- प्रिये! मैं धन्य हूँ, तुमने मुझपर महान् अनुग्रह किया । तुम्हीं मेरे कुलको धारण करनेवाली हो । उन महर्षिको नमस्कार है, जिन्होंने तुम्हें वैसा वर दिया । धर्मज्ञे! अधर्मसे प्रजाका पालन नहीं हो सकता । इसलिये वरारोहे! तुम आज ही विधिपूर्वक इसके लिये प्रयत्न करो । शुभे! सबसे पहले धर्मका आवाहन करो, क्योंकि वे ही सम्पूर्ण लोकोंमें धर्मात्मा हैं ॥ १७ ॥

अधर्मेण न नो धर्मः संयुज्यति कथंचन ।

लोकश्चायं वरारोहे धर्मोऽयमिति मन्यते ॥ १८ ॥

धार्मिकश्च कुरूणां स भविष्यति न संशयः ।

धर्मेण चापि दत्तस्य नाधर्मे रंस्यते मनः ॥ १ ९ ॥

तस्माद् धर्मं पुरस्कृत्य नियता त्वं शुचिस्मिते ।

पृष्ठ 872

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उपचाराभिचाराभ्यां धर्ममावाहयस्व वै ॥ २० ॥

(इस प्रकार करनेपर) हमारा धर्म कभी किसी तरह अधर्मसे संयुक्त नहीं हो सकता । वरारोहे! लोक भी उनको साक्षात् धर्मका स्वरूप मानता है । धर्मसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र कुरुवंशियोंमें सबसे अधिक धर्मात्मा होगा- इसमें संशय नहीं है । धर्मके द्वारा दिया हुआ जो पुत्र होगा, उसका मन अधर्ममें नहीं लगेगा । अतः शुचिस्मिते! तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर धर्मको भी सामने रखते हुए उपचार ( पूजा ) और अभिचार ( प्रयोगविधि ) -के द्वारा धर्मदेवताका आवाहन करो ॥ १८-२० ॥ वैशम्पायन उवाच

सा तथोक्ता तथेत्युक्त्वा तेन भर्त्रा वराङ्गना ।

अभिवाद्याभ्यनुज्ञाता प्रदक्षिणमवर्तत ॥ २१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! अपने पति पाण्डुके यों कहनेपर नारियोंमें श्रेष्ठ कुन्तीने ' तथास्तु ' कहकर उन्हें प्रणाम किया और आज्ञा लेकर उनकी परिक्रमा की ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कुन्तीपुत्रोत्पत्त्यनुज्ञाने एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कुन्तीको पुत्रोत्पत्तिके लिये आदेशविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥

Papa

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द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनकी उत्पत्ति वैशम्पायन उवाच

संवत्सरधृते गर्भे गान्धार्या जनमेजय ।

आह्वयामास वै कुन्ती गर्भार्थे धर्ममच्युतम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब गान्धारीको गर्भ धारण किये एक वर्ष बीत गया, उस समय कुन्तीने गर्भ धारण करनेके लिये अच्युतस्वरूप भगवान् धर्मका आवाहन किया ॥ १ ॥

सा बलिं त्वरिता देवी धर्मायोपजहार ह ।

जजाप विधिवज्जप्यं दत्तं दुर्वाससा पुरा ॥ २ ॥

देवी कुन्तीने बड़ी उतावलीके साथ धर्मदेवताके लिये पूजाके उपहार अर्पित किये । तत्पश्चात् पूर्वकालमें महर्षि दुर्वासाने जो मन्त्र दिया था, उसका विधिपूर्वक जप किया ॥ २ ॥

आजगाम ततो देवो धर्मो मन्त्रबलात् ततः ।

विमाने सूर्यसंकाशे कुन्ती यत्र जपस्थिता ॥ ३ ॥

तब मन्त्रबलसे आकृष्ट हो भगवान् धर्म सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर बैठकर उस स्थानपर आये, जहाँ कुन्तीदेवी जपमें लगी हुई थीं ॥ ३ ॥

विहस्य तां ततो ब्रूयाः कुन्ति किं ते ददाम्यहम् ।

सा तं विहस्यमानापि पुत्रं देह्यब्रवीदिदम् ॥ ४ ॥

तब धर्मने हँसकर कहा - ' कुन्ती! बोलो, तुम्हें क्या दूँ? ' धर्मके द्वारा हास्यपूर्वक इस प्रकार पूछनेपर कुन्ती बोली- ' मुझे पुत्र दीजिये ' ॥ ४ ॥

संयुक्ता सा हि धर्मेण योगमूर्तिधरेण ह ।

लेभे पुत्रं वरारोहा सर्वप्राणभृतां हितम् ॥ ५ ॥

तदनन्तर योगमूर्ति धारण किये हुए धर्मके साथ समागम करके सुन्दरांगी कुन्तीने एक ऐसा पुत्र प्राप्त किया, जो समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला था ॥ ५ ॥

ऐन्द्रे चन्द्रसमायुक्ते मुहूर्तेऽभिजितेऽष्टमे ।

दिवामध्यगते सूर्ये तिथौ पूर्णेऽतिपूजिते ॥ ६ ॥

समृद्धयशसं कुन्ती सुषाव प्रवरं सुतम् ।

जातमात्रे सुते तस्मिन् वागुवाचाशरीरिणी ॥ ७ ॥

तदनन्तर जब चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्रपर थे, सूर्य तुला राशिपर विराजमान थे, शुक्ल पक्षकी ‘ पूर्णा ' नामवाली पञ्चमी तिथि थी और अत्यन्त श्रेष्ठ अभिजित् नामक आठवाँ

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मुहूर्त विद्यमान था; उस समय कुन्तीदेवीने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया, जो महान् यशस्वी था । उस पुत्रके जन्म लेते ही आकाशवाणी हुई— ॥ ६-७ ॥

एष धर्मभृतां श्रेष्ठो भविष्यति नरोत्तमः ।

विक्रान्तः सत्यवाक् त्वेव राजा पृथ्व्यां भविष्यति ॥ ८ ॥

युधिष्ठिर इति ख्यातः पाण्डोः प्रथमजः सुतः ।

भविता प्रथितो राजा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ ९ ॥

यशसा तेजसा चैव वृत्तेन च समन्वितः । ‘ यह श्रेष्ठ पुरुष धर्मात्माओंमें अग्रगण्य होगा और इस पृथ्वीपर पराक्रमी एवं सत्यवादी राजा होगा। पाण्डुका यह प्रथम पुत्र ' युधिष्ठिर' नामसे विख्यात हो तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि एवं ख्याति प्राप्त करेगा; यह यशस्वी, तेजस्वी तथा सदाचारी होगा' ॥ ८ - ९ ३ ॥ धार्मिकं तं सुतं लब्ध्वा पाण्डुस्तां पुनरब्रवीत् ॥ १० ॥

उस धर्मात्मा पुत्रको पाकर राजा पाण्डुने पुनः ( आग्रहपूर्वक ) कुन्तीसे कहा - ॥ १० ॥

प्राहुः क्षत्रं बलज्येष्ठं बलज्येष्ठं सुतं वृणु ।

(अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिश्श्रेष्ठो दिवाकरः ।

ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठ बलश्रेष्ठस्तु मारुतः ॥

मारुतं मरुतां श्रेष्ठं सर्वप्राणिभिरीडितम् ।

आवाहय त्वं नियमात् पुत्रार्थं वरवर्णिनि ॥

स नो यं दास्यति सुतं स प्राणबलवान् नृषु । ) ततस्तथोक्ता भर्त्रा तु वायुमेवाजुहाव सा ॥ ११ ॥

‘ प्रिये! क्षत्रियको बलसे ही बड़ा कहा गया है । अतः एक ऐसे पुत्रका वरण करो, जो बलमें सबसे श्रेष्ठ हो । जैसे अश्वमेध सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ है, सूर्यदेव सम्पूर्ण प्रकाश करनेवालोंमें प्रधान हैं और ब्राह्मण मनुष्योंमें श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वायुदेव बलमें सबसे बढ़ - चढ़कर हैं । अतः सुन्दरी! अबकी बार तुम पुत्र -प्राप्तिके उद्देश्यसे समस्त प्राणियोंद्वारा प्रशंसित देवश्रेष्ठ वायुका विधिपूर्वक आवाहन करो। वे हमलोगोंके लिये जो पुत्र देंगे, वह मनुष्योंमें सबसे अधिक प्राणशक्तिसे सम्पन्न और बलवान् होगा । ' स्वामीके इस प्रकार कहनेपर कुन्तीने तब वायुदेवका ही आवाहन किया ॥ ११ ॥

ततस्तामागतो वायुर्मृगारूढो महाबलः ।

किं ते कुन्ति ददाम्यद्य ब्रूहि यत् ते हृदि स्थितम् ॥ १२ ॥

तब महाबली वायु मृगपर आरूढ़ हो कुन्तीके पास आये और यों बोले— ' कुन्ती!

तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, वह कहो । मैं तुम्हें क्या दूँ? ' ॥ १२ ॥

सा सलज्जा विहस्याह पुत्रं देहि सुरोत्तम ।

बलवन्तं महाकायं सर्वदर्पप्रभञ्जनम् ॥ १३ ॥

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कुन्तीने लज्जित होकर मुसकराते हुए कहा - ' सुरश्रेष्ठ! मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिये, जो महाबली और विशालकाय होनेके साथ ही सबके घमंडको चूर करनेवाला हो' ॥ १३ ॥

तस्माज्जज्ञे महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः ।

तमप्यतिबलं जातं वागुवाचाशरीरिणी ॥ १४ ॥

सर्वेषां बलिनां श्रेष्ठो जातोऽयमिति भारत ।

इदमत्यद्भुतं चासीज्जातमात्रे वृकोदरे ॥ १५ ॥

यदङ्कात् पतितो मातुः शिलां गात्रैर्व्यचूर्णयत् ।

( कुन्ती तु सह पुत्रेण यात्वा सुरुचिरं सरः ।

स्नात्वा तु सुतमादाय दशमेऽहनि यादवी ॥

दैवतान्यर्चयिष्यन्ती निर्जगामाश्रमात् पृथा ।

शैलाभ्याशेन गच्छन्त्यास्तदा भरतसत्तम ॥

निश्चक्राम महान् व्याघ्रो जिघांसन् गिरिगह्वरात् ॥

तमापतन्तं शार्दूलं विकृष्याथ कुरूत्तमः ।

निर्बिभेद शरैः पाण्डुस्त्रिभिस्त्रिदशविक्रमः ॥

नादेन महता तां तु पूरयन्तं गिरेर्गुहाम् । ) कुन्ती व्याघ्रभयोद्विग्ना सहसोत्पतिता किल ॥ १६ ॥

वायुदेवसे भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीमका जन्म हुआ । जनमेजय! उस महाबली पुत्रको लक्ष्य करके आकाशवाणीने कहा – ' यह कुमार समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ है । ' भीमसेनके जन्म लेते ही एक अद्भुत घटना यह हुई कि अपनी माताकी गोदसे गिरनेपर उन्होंने अपने अंगोंसे एक पर्वतकी चट्टानको चूर- चूर कर दिया। बात यह थी कि यदुकुलनन्दिनी कुन्ती प्रसवके दसवें दिन पुत्रको गोदमें लिये उसके साथ एक सुन्दर सरोवरके निकट गयी और स्नान करके लौटकर देवताओंकी पूजा करनेके लिये कुटियासे बाहर निकली । भरतनन्दन! वह पर्वतके समीप होकर जा रही थी कि इतनेमें ही उसको मार डालनेकी इच्छासे एक बहुत बड़ा व्याघ्र उस पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकल आया । देवताओंके समान पराक्रमी कुरुश्रेष्ठ पाण्डुने उस व्याघ्रको दौड़कर आते देख धनुष खींच लिया और तीन बाणोंसे मारकर उसे विदीर्ण कर दिया । उस समय वह अपनी विकट गर्जनासे पर्वतकी सारी गुफाको प्रतिध्वनित कर रहा था । कुन्ती बाघके भयसे सहसा उछल पड़ी ॥ १४–१६ ॥

नान्वबुध्यत संसुप्तमुत्सङ्गे स्वे वृकोदरम् ।

ततः स वज्रसंघातः कुमारो न्यपतद् गिरौ ॥ १७ ॥

उस समय उसे इस बातका ध्यान नहीं रहा कि मेरी गोदमें भीमसेन सोया हुआ है ।

उतावलीमें वह वज्रके समान शरीरवाला कुमार पर्वतके शिखरपर गिर पड़ा ॥ १७ ॥

पृष्ठ 876

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पतता तेन शतधा शिला गात्रैर्विचूर्णिता ।

तां शिलां चूर्णितां दृष्ट्वा पाण्डुर्विस्मयमागतः ॥ १८ ॥

गिरते समय उसने अपने अंगोंसे उस पर्वतकी शिलाको चूर्ण-विचूर्ण कर दिया।

पत्थरकी चट्टानको चूर-चूर हुआ देख महाराज पाण्डु बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ॥ १८ ॥

( मघे चन्द्रमसा युक्ते सिंहे चाभ्युदिते गुरौ ।

दिवामध्यगते सूर्ये तिथौ पुण्ये त्रयोदशे ॥

मैत्रे मुहूर्ते सा कुन्ती सुषुवे भीममच्युतम् ॥ )

यस्मिन्नहनि भीमस्तु जज्ञे भरतसत्तम ।

दुर्योधनोऽपि तत्रैव प्रजज्ञे वसुधाधिप ॥ १ ९ ॥

जब चन्द्रमा मघा नक्षत्रपर विराजमान थे, बृहस्पति सिंह लग्नमें सुशोभित थे, सूर्यदेव दोपहरके समय आकाशके मध्यभागमें तप रहे थे, उस समय पुण्यमयी त्रयोदशी तिथिको मैत्र मुहूर्तमें कुन्तीदेवीने अविचल शक्तिवाले भीमसेनको जन्म दिया था । भरतश्रेष्ठ भूपाल! जिस दिन भीमसेनका जन्म हुआ था, उसी दिन हस्तिनापुरमें दुर्योधनकी भी उत्पत्ति हुई ॥ १ ९ ॥

जाते वृकोदरे पाण्डुरिदं भूयोऽन्वचिन्तयत् ।

कथं नु मे वरः पुत्रो लोकश्रेष्ठो भवेदिति ॥ २० ॥

भीमसेनके जन्म लेनेपर पाण्डुने फिर इस प्रकार विचार किया कि मैं कौन- सा उपाय करूँ, जिससे मुझे सब लोगोंसे श्रेष्ठ उत्तम पुत्र प्राप्त हो ॥ २० ॥

दैवे पुरुषकारे च लोकोऽयं सम्प्रतिष्ठितः ।

तत्र दैवं तु विधिना कालयुक्तेन लभ्यते ॥ २१ ॥

यह संसार दैव तथा पुरुषार्थपर अवलम्बित है । इनमें दैव तभी सुलभ ( सफल ) होता है, जब समयपर उद्योग किया जाय ॥ २१ ॥

इन्द्रो हि राजा देवानां प्रधान इति नः श्रुतम् ।

अप्रमेयबलोत्साहो वीर्यवानमितद्युतिः ॥ २२ ॥

तं तोषयित्वा तपसा पुत्रं लप्स्ये महाबलम् ।

यं दास्यति स मे पुत्रं स वरीयान् भविष्यति ॥ २३ ॥

अमानुषान् मानुषांश्च संग्रामे स हनिष्यति ।

कर्मणा मनसा वाचा तस्मात् तप्स्ये महत् तपः ॥ २४ ॥

मैंने सुना है कि देवराज इन्द्र ही सब देवताओंमें प्रधान हैं, उनमें अथाह बल और उत्साह है । वे बड़े पराक्रमी एवं अपार तेजस्वी हैं । मैं तपस्याद्वारा उन्हींको संतुष्ट करके महाबली पुत्र प्राप्त करूँगा । वे मुझे जो पुत्र देंगे, वह निश्चय ही सबसे श्रेष्ठ होगा तथा संग्राममें अपना सामना करनेवाले मनुष्यों तथा मनुष्येतर प्राणियों ( दैत्य - दानव आदि) -को

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भी मारनेमें समर्थ होगा । अतः मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा बड़ी भारी करूँगा ॥ २२–२४ ॥

पृष्ठ 878

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B.K.Mi बालक भीमके शरीरकी चोटसे चट्टान टूट गयी

पृष्ठ 879

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ततः पाण्डुर्महाराजो मन्त्रयित्वा महर्षिभिः ।

दिदेश कुन्त्याः कौरव्यो व्रतं सांवत्सरं शुभम् ॥ २५ ॥

ऐसा निश्चय करके कुरुनन्दन महाराज पाण्डुने महर्षियोंसे सलाह लेकर कुन्तीको शुभदायक सांवत्सर व्रतका उपदेश दिया ॥ २५ ॥

आत्मना च महाबाहुरेकपादस्थितोऽभवत् ।

उग्रं स तप आस्थाय परमेण समाधिना ॥ २६ ॥

आरिराधयिषुर्देवं त्रिदशानां तमीश्वरम् ।

सूर्येण सह धर्मात्मा पर्यतप्यत भारत ॥ २७ ॥

तं तु कालेन महता वासवः प्रत्यपद्यत । और भारत! वे महाबाहु धर्मात्मा पाण्डु स्वयं देवताओंके ईश्वर इन्द्रदेवकी आराधना करनेके लिये चित्तवृत्तियोंको अत्यन्त एकाग्र करके एक पैरसे खड़े हो सूर्यके साथ- साथ उग्र तप करने लगे अर्थात् सूर्योदय होनेके समय एक पैरसे खड़े होते और सूर्यास्ततक उसी रूपमें खड़े रहते । इस तरह दीर्घकाल व्यतीत हो जानेपर इन्द्रदेव उनपर प्रसन्न हो उनके समीप आये और इस प्रकार बोले— ॥ २६-२७ ॥ शक्र उवाच पुत्रं तव प्रदास्यामि त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ २८ ॥

इन्द्रने कहा— राजन्! मैं तुम्हें ऐसा पुत्र दूँगा, जो तीनों लोकोंमें विख्यात होगा ॥ २८ ॥

ब्राह्मणानां गवां चैव सुहृदां चार्थसाधकम् ।

दुर्हृदां शोकजननं सर्वबान्धवनन्दनम् ॥ २ ९ ॥

सुतं तेऽग्रयं प्रदास्यामि सर्वामित्रविनाशनम् । वह ब्राह्मणों, गौओं तथा सुहृदोंके अभीष्ट मनोरथकी पूर्ति करनेवाला, शत्रुओंको शोक देनेवाला और समस्त बन्धु- बान्धवोंको आनन्दित करनेवाला होगा, मैं तुम्हें सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला सर्वश्रेष्ठ पुत्र प्रदान करूँगा ॥ २ ९ ३ ॥ इत्युक्तः कौरवो राजा वासवेन महात्मना ॥ ३० ॥

उवाच कुन्तीं धर्मात्मा देवराजवचः स्मरन् ।

उदर्कस्तव कल्याणि तुष्टो देवगणेश्वरः ॥ ३१ ॥

दातुमिच्छति ते पुत्रं यथा संकल्पितं त्वया ।

अतिमानुषकर्माणं यशस्विनमरिंदमम् ॥ ३२ ॥

नीतिमन्तं महात्मानमादित्यसमतेजसम् ।

दुराधर्ष क्रियावन्तमतीवाद्भुतदर्शनम् ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 880

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महात्मा इन्द्रके यों कहनेपर धर्मात्मा कुरुनन्दन महाराज पाण्डु बड़े प्रसन्न हुए और देवराजके वचनोंका स्मरण करते हुए कुन्तीदेवीसे बोले– ' कल्याणि! तुम्हारे व्रतका भावी परिणाम मंगलमय है । देवताओंके स्वामी इन्द्र हमलोगोंपर संतुष्ट हैं और तुम्हें तुम्हारे संकल्पके अनुसार श्रेष्ठ पुत्र देना चाहते हैं । वह अलौकिक कर्म करनेवाला, यशस्वी, शत्रुदमन, नीतिज्ञ, महामना, सूर्यके समान तेजस्वी, दुर्धर्ष, कर्मठ तथा देखनेमें अत्यन्त अद्भुत होगा ॥ ३०–३३ ॥

पुत्रं जनय सुश्रोणि धाम क्षत्रियतेजसाम् ।

लब्धः प्रसादो देवेन्द्रात् तमाह्वय शुचिस्मिते ॥ ३४ ॥

' सुश्रोणि! अब ऐसे पुत्रको जन्म दो, जो क्षत्रियोचित तेजका भंडार हो । पवित्र मुसकानवाली कुन्ती! मैंने देवेन्द्रकी कृपा प्राप्त कर ली है। अब तुम उन्हींका आवाहन करो ' ॥ ३४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ता ततः शक्रमाजुहाव यशस्विनी ।

अथाजगाम देवेन्द्रो जनयामास चार्जुनम् ॥ ३५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज पाण्डुके यों कहने - पर यशस्विनी कुन्तीने इन्द्रका आवाहन किया । तदनन्तर देवराज इन्द्र आये और उन्होंने अर्जुनको जन्म दिया ॥ ३५ ॥