श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 881–890
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890
पृष्ठ 881
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
(उत्तराभ्यां तु पूर्वाभ्यां फल्गुनीभ्यां ततो दिवा । जातस्तु फाल्गुने मासि तेनासौ फाल्गुनः स्मृतः ॥ ) वह फाल्गुन मासमें दिनके समय पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रोंके संधिकालमें उत्पन्न हुआ। फाल्गुनमास और फाल्गुनी नक्षत्रमें जन्म लेनेके कारण उस बालकका नाम ‘ फाल्गुन' हुआ ।
जातमात्रे कुमारे तु वागुवाचाशरीरिणी ।
महागम्भीरनिर्घोषा नभो नादयती तदा ॥ ३६ ॥
शृण्वतां सर्वभूतानां तेषां चाश्रमवासिनाम् ।
कुन्तीमाभाष्य विस्पष्टमुवाचेदं शुचिस्मिताम् ॥ ३७ ॥
कुमार अर्जुनके जन्म लेते ही अत्यन्त गम्भीर नादसे समूचे आकाशको गुँजाती हुई आकाशवाणीने पवित्र मुसकानवाली कुन्तीदेवीको सम्बोधित करके समस्त प्राणियों और आश्रमवासियोंके सुनते हुए अत्यन्त स्पष्ट भाषामें इस प्रकार कहा– ॥ ३६-३७ ॥
कार्तवीर्यसमः कुन्ति शिवतुल्यपराक्रमः ।
एष शक्र इवाजय्यो यशस्ते प्रथयिष्यति ॥ ३८ ॥
अदित्या विष्णुना प्रीतिर्यथाभूदभिवर्धिता ।
तथा विष्णुसमः प्रीतिं वर्धयिष्यति तेऽर्जुनः ॥ ३ ९ ॥
' कुन्तिभोजकुमारी! यह बालक कार्तवीर्य अर्जुनके समान तेजस्वी, भगवान् शिवके समान पराक्रमी और देवराज इन्द्रके समान अजेय होकर तुम्हारे यशका विस्तार करेगा । जैसे भगवान् विष्णुने वामनरूपमें प्रकट होकर देवमाता अदितिके हर्षको बढ़ाया था, उसी प्रकार यह विष्णुतुल्य अर्जुन तुम्हारी प्रसन्नताको बढ़ायेगा ॥ ३८-३९ ॥
एष मद्रान् वशे कृत्वा कुरूंश्च सह सोमकैः ।
चेदिकाशिकरूषांश्च कुरुलक्ष्मीं वहिष्यति ॥ ४० ॥
'तुम्हारा यह वीर पुत्र मद्र, कुरु, सोमक, चेदि, काशि तथा करूष नामक देशोंको वशमें करके कुरुवंशकी लक्ष्मीका पालन करेगा ॥ ४० ॥
( गत्वोत्तरदिशं वीरो विजित्य युधि पार्थिवान् । धनरत्नौघममितमानयिष्यति पाण्डवः ॥ )
एतस्य भुजवीर्येण खाण्डवे हव्यवाहनः ।
मेदसा सर्वभूतानां तृप्तिं यास्यति वै पराम् ॥ ४१ ॥
' वीर अर्जुन उत्तर दिशामें जाकर वहाँके राजाओंको युद्धमें जीतकर असंख्य धन-रत्नोंकी राशि ले आयेगा । इसके बाहुबलसे खाण्डववनमें अग्निदेव समस्त प्राणियोंके मेदका आस्वादन करके पूर्ण तृप्ति लाभ करेंगे ॥ ४१ ॥
ग्रामणीश्च महीपालानेष जित्वा महाबलः ।
भ्रातृभिः सहितो वीरस्त्रीन् मेधानाहरिष्यति ॥ ४२ ॥
पृष्ठ 882
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' यह महाबली श्रेष्ठ वीर बालक समस्त क्षत्रियसमूहका नायक होगा और युद्धमें भूमिपालोंको जीतकर भाइयोंके साथ तीन अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करेगा ॥ ४२ ॥
जामदग्न्यसमः कुन्ति विष्णुतुल्यपराक्रमः ।
एष वीर्यवतां श्रेष्ठो भविष्यति महायशाः ॥ ४३ ॥
' कुन्ती! यह परशुरामके समान वीर योद्धा, भगवान् विष्णुके समान पराक्रमी, बलवानोंमें श्रेष्ठ और महान् यशस्वी होगा ॥ ४३ ॥
एष युद्धे महादेवं तोषयिष्यति शंकरम् ।
अस्त्रं पाशुपतं नाम तस्मात् तुष्टादवाप्स्यति ॥ ४४ ॥
निवातकवचा नाम दैत्या विबुधविद्विषः ।
शक्राज्ञया महाबाहुस्तान् वधिष्यति ते सुतः ॥ ४५ ॥
' यह युद्धमें देवाधिदेव भगवान् शंकरको संतुष्ट करेगा और संतुष्ट हुए उन महेश्वरसे पाशुपत नामक अस्त्र प्राप्त करेगा । निवातकवच नामक दैत्य देवताओंसे सदा द्वेष रखते हैं । तुम्हारा यह महाबाहु पुत्र इन्द्रकी आज्ञासे उन सब दैत्योंका संहार कर डालेगा ॥ ४४-४५ ॥
तथा दिव्यानि चास्त्राणि निखिलेनाहरिष्यति ।
विप्रणष्टां श्रियं चायमाहर्ता पुरुषर्षभः ॥ ४६ ॥
‘ तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ यह अर्जुन सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंका पूर्ण रूपसे ज्ञान प्राप्त करेगा और अपनी खोयी हुई सम्पत्तिको पुनः वापस ले आयेगा' ॥ ४६ ॥
एतामत्यद्भुतां वाचं कुन्ती शुश्राव सूतके ।
वाचमुच्चारितामुच्चैस्तां निशम्य तपस्विनाम् ॥ ४७ ॥
बभूव परमो हर्षः शतशृङ्गनिवासिनाम् ।
तथा देवनिकायानां सेन्द्राणां च दिवौकसाम् ॥ ४८ ॥
कुन्तीने सौरीमेंसे ही यह अत्यन्त अद्भुत बात सुनी । उच्चस्वरमें उच्चारित वह आकाशवाणी सुनकर शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियों तथा विमानोंपर स्थित इन्द्र आदि देवसमूहोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ ४७-४८ ॥
आकाशे दुन्दुभीनां च बभूव तुमुलः स्वनः ।
उदतिष्ठन्महाघोषः पुष्पवृष्टिभिरावृतः ॥ ४९ ॥
तदनन्तर आकाशमें फूलोंकी वर्षाके साथ देव - दुन्दुभियोंका तुमुल नाद बड़े जोरसे गूँज उठा ॥ ४ ९ ॥ समवेत्य च देवानां गणाः पार्थमपूजयन् ।
काद्रवेया वैनतेया गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
प्रजानां पतयः सर्वे सप्त चैव महर्षयः ॥ ५० ॥
भरद्वाजः कश्यपो गौतमश्च विश्वामित्रो जमदग्निर्वसिष्ठः ।
पृष्ठ 883
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
यश्चोदितो भास्करेऽभूत् प्रणष्टे सोऽप्यत्रात्रिर्भगवानाजगाम ॥ ५१ ॥
फिर झुंड- के - झुंड देवता वहाँ एकत्र होकर अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे । कद्रूके पुत्र (नाग ), विनताके पुत्र ( गरुड पक्षी ), गन्धर्व, अप्सराएँ, प्रजापति, सप्तर्षिगण- भरद्वाज, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ तथा जो नक्षत्रके रूपमें सूर्यास्त होनेके पश्चात् उदित होते हैं, वे भगवान् अत्रि भी वहाँ आये ॥ ५०-५१ ॥
मरीचिरङ्गिराश्चैव पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
दक्षः प्रजापतिश्चैव गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ५२ ॥
मरीचि और अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु एवं प्रजापति दक्ष, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी आयीं ॥ ५२ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधराः सर्वालंकारभूषिताः ।
उपगायन्ति बीभत्सुं नृत्यन्तेऽप्सरसां गणाः ॥ ५३ ॥
उन सबने दिव्य हार और दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे । वे सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे । अप्सराओंका पूरा दल वहाँ जुट गया था । वे सभी अर्जुनके गुण गाने और नृत्य करने लगीं ॥ ५३ ॥
तथा महर्षयश्चापि जेपुस्तत्र समन्ततः ।
गन्धर्वैः सहितः श्रीमान् प्रागायत च तुम्बुरुः ॥ ५४ ॥
महर्षि भी वहाँ सब ओर खड़े होकर मांगलिक मन्त्रोंका जप करने लगे । गन्धर्वोंके साथ श्रीमान् तुम्बुरुने मधुर स्वरसे गीत गाना प्रारम्भ किया ॥ ५४ ॥
भीमसेनोग्रसेनौ च ऊर्णायुरनघस्तथा ।
गोपतिर्धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चास्तथाष्टमः ॥ ५५ ॥
युगपस्तृणपः कार्ष्णिर्नन्दिश्चित्ररथस्तथा ।
त्रयोदशः शालिशिराः पर्जन्यश्च चतुर्दशः ॥ ५६ ॥
कलिः पञ्चदशश्चैव नारदश्चात्र षोडशः ।
ऋत्वा बृहत्त्वा बृहकः करालश्च महामनाः ॥ ५७ ॥
ब्रह्मचारी बहुगुणः सुवर्णश्चेति विश्रुतः ।
विश्वावसुर्भुमन्युश्च सुचन्द्रश्च शरुस्तथा ॥ ५८ ॥
गीतमाधुर्यसम्पन्नौ विख्यातौ च हहाहुहू ।
इत्येते देवगन्धर्वा जग्मुस्तत्र नराधिप ॥ ५ ९ ॥
भीमसेन तथा उग्रसेन, ऊर्णायु और अनघ, गोपति एवं धृतराष्ट्र, सूर्यवर्चा तथा आठवें युगप, तृणप, कार्ष्णि, नन्दि एवं चित्ररथ, तेरहवें शालिशिरा और चौदहवें पर्जन्य, पंद्रहवें कलि और सोलहवें नारद, ऋत्वा और बृहत्त्वा, बृहक एवं महामना कराल, ब्रह्मचारी तथा
पृष्ठ 884
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विख्यात गुणवान् सुवर्ण, विश्वावसु एवं भुमन्यु, सुचन्द्र और शरु तथा गीतमाधुर्यसे सम्पन्न सुविख्यात हाहा और हूहू– राजन्! ये सब देवगन्धर्व वहाँ पधारे थे ॥ ५५–५९ ॥
तथैवाप्सरसो हृष्टाः सर्वालंकारभूषिताः ।
ननृतुर्वै महाभागा जगुश्चायतलोचनाः ॥ ६० ॥
इसी प्रकार समस्त आभूषणोंसे विभूषित बड़े -बड़े नेत्रोंवाली परम सौभाग्यशालिनी अप्सराएँ भी हर्षोल्लासमें भरकर वहाँ नृत्य करने लगीं ॥ ६० ॥
अनूचानानवद्या च गुणमुख्या गुणावरा ।
अद्रिका च तथा सोमा मिश्रकेशी त्वलम्बुषा ॥ ६१ ॥
मरीचिः शुचिका चैव विद्युत्पर्णा तिलोत्तमा ।
अम्बिका लक्षणा क्षेमा देवी रम्भा मनोरमा ॥ ६२ ॥
असिता च सुबाहुश्च सुप्रिया च वपुस्तथा ।
पुण्डरीका सुगन्धा च सुरसा च प्रमाथिनी ॥ ६३ ॥
काम्या शारद्वती चैव ननृतुस्तत्र सङ्घशः ।
मेनका सहजन्या च कर्णिका पुञ्जिकस्थला ॥ ६४ ॥
ऋतुस्थला घृताची च विश्वाची पूर्वचित्त्यपि ।
उम्लोचेति च विख्याता प्रम्लोचेति च ता दश ॥ ६५ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं - अनूचाना और अनवद्या, गुणमुख्या एवं गुणावरा, अद्रिका तथा सोमा, मिश्रकेशी और अलम्बुषा, मरीचि और शुचिका, विद्युत्पर्णा, तिलोत्तमा, अम्बिका, लक्षणा, क्षेमा, देवी, रम्भा, मनोरमा, असिता और सुबाहु, सुप्रिया एवं वपु, पुण्डरीका एवं सुगन्धा, सुरसा और प्रमाथिनी, काम्या तथा शारद्वती आदि । ये झुंड- की- झुंड अप्सराएँ नाचने लगीं । इनमें मेनका, सहजन्या, कर्णिका और पुंजिकस्थला, ऋतुस्थला एवं घृताची, विश्वाची और पूर्वचित्ति, उम्लोचा और प्रम्लोचा-ये दस विख्यात हैं ॥ ६१— ६५ ॥
उर्वश्येकादशी तासां जगुश्चायतलोचनाः ।
धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोंऽशो भगस्तथा ॥ ६६ ॥
इन्द्रो विवस्वान् पूषा च त्वष्टा च सविता तथा ।
पर्जन्यश्चैव विष्णुश्च आदित्या द्वादश स्मृताः ।
महिमानं पाण्डवस्य वर्धयन्तोऽम्बरे स्थिताः ॥ ६७ ॥
इन्हीं प्रधान अप्सराओंकी श्रेणीमें ग्यारहवीं उर्वशी है । ये सभी विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियाँ वहाँ गीत गाने लगीं । धाता और अर्यमा, मित्र और वरुण, अंश एवं भग, इन्द्र, विवस्वान् और पूषा, त्वष्टा एवं सविता, पर्जन्य तथा विष्णु - ये बारह आदित्य * माने गये हैं । ये सभी पाण्डुनन्दन अर्जुनका महत्त्व बढ़ाते हुए आकाशमें खड़े थे ॥ ६६-६७ ॥ मृगव्याधश्च सर्पश्च निरृतिश्च महायशाः ।
पृष्ठ 885
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परंतप ॥ ६८ ॥
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशाम्पते ।
स्थाणुर्भगश्च भगवान् रुद्रास्तत्रावतस्थिरे ॥ ६ ९ ॥
शत्रुदमन महाराज! मृगव्याध और सर्प, महा- यशस्वी निर्ऋति एवं अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य और पिनाकी, दहन तथा ईश्वर, कपाली एवं स्थाणु तथा भगवान् भग — ये ग्यारह रुद्र भी वहाँ आकाशमें आकर खड़े थे ॥ ६८-६९ ॥
अश्विनौ वसवश्चाष्टौ मरुतश्च महाबलाः ।
विश्वेदेवास्तथा साध्यास्तत्रासन् परितः स्थिताः ॥ ७० ॥
दोनों अश्विनीकुमार तथा आठों वसु, महाबली मरुद्गण एवं विश्वेदेवगण तथा साध्यगण वहाँ सब ओर विद्यमान थे ॥ ७० ॥
कर्कोटकोऽथ सर्पश्च वासुकिश्च भुजङ्गमः ।
कश्यपश्चाथ कुण्डश्च तक्षकश्च महोरगः ॥ ७१ ॥
आययुस्तपसा युक्ता महाक्रोधा महाबलाः ।
एते चान्ये च बहवस्तत्र नागा व्यवस्थिताः ॥ ७२ ॥
कर्कोटक सर्प तथा वासुकि नाग कश्यप और कुण्ड, महानाग और तक्षक— ये तथा और भी बहुत - से महाबली, महाक्रोधी और तपस्वी नाग वहाँ आकर खड़े थे ॥ ७१-७२ ॥
तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्चासितध्वजः ।
अरुणश्चारुणिश्चैव वैनतेया व्यवस्थिताः ॥ ७३ ॥
तार्क्ष्य और अरिष्टनेमि, गरुड एवं असितध्वज, अरुण तथा आरुणि- विनताके ये पुत्र भी उस उत्सवमें उपस्थित थे ॥ ७३ ॥
तांश्च देवगणान् सर्वांस्तपःसिद्धा महर्षयः ।
विमानगिर्यग्रगतान् ददृशुर्नेतरे जनाः ॥ ७४ ॥
वे सब देवगण विमान और पर्वतके शिखरपर खड़े थे । उन्हें तपःसिद्ध महर्षि ही देख पाते थे, दूसरे लोग नहीं ॥ ७४ ॥
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता मुनिसत्तमाः ।
अधिकां स्म ततो वृत्तिमवर्तन् पाण्डवान् प्रति ॥ ७५ ॥
वह महान् आश्चर्य देखकर वे श्रेष्ठ मुनिगण बड़े विस्मयमें पड़े । तबसे पाण्डवोंके प्रति उनमें अधिक प्रेम और आदरका भाव पैदा हो गया ॥ ७५ ॥
पाण्डुस्तु पुनरेवैनां पुत्रलोभान्महायशाः ।
वक्तुमैच्छद् धर्मपत्नीं कुन्ती त्वेनमथाब्रवीत् ॥ ७६ ॥
तदनन्तर महायशस्वी राजा पाण्डु पुत्र- लोभसे आकृष्ट हो अपनी धर्मपत्नी कुन्तीसे फिर कुछ कहना चाहते थे, किंतु कुन्ती उन्हें रोकती हुई बोली- ॥ ७६ ॥
नातश्चतुर्थं प्रसवमापत्स्वपि वदन्त्युत ।
पृष्ठ 886
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अतः परं स्वैरिणी स्याद् बन्धकी पञ्चमे भवेत् ॥ ७७ ॥
‘ आर्यपुत्र! आपत्तिकालमें भी तीनसे अधिक चौथी संतान उत्पन्न करनेकी आज्ञा शास्त्रोंने नहीं दी है । इस विधिके द्वारा तीनसे अधिक चौथी संतान चाहनेवाली स्त्री स्वैरिणी होती है और पाँचवें पुत्रके उत्पन्न होनेपर तो वह कुलटा समझी जाती है ॥ ७७ ॥
स त्वं विद्वन् धर्ममिममधिगम्य कथं नु माम् ।
अपत्यार्थं समुत्क्रम्य प्रमादादिव भाषसे ॥ ७८ ॥
‘ विद्वन्! आप धर्मको जानते हुए भी प्रमादसे कहनेवालेके समान धर्मका लोप करके अब फिर मुझे संतानोत्पत्तिके लिये क्यों प्रेरित कर रहे हैं ' ॥ ७८ ॥
(पाण्डुरुवाच एवमेतद् धर्मशास्त्रं यथा वदसि तत् तथा । ) पाण्डुने कहा — प्रिये! वास्तवमें धर्मशास्त्रका ऐसा ही मत है । तुम जो कुछ कहती हो, वह ठीक है । इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डवोत्पत्तौ द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डवोंकी उत्पत्तिविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२२ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०३ श्लोक मिलाकर कुल ८८३ श्लोक हैं ) * यहाँ आदित्योंके तेरह नाम हैं । जान पड़ता है, बारह महीनोंके बारह आदित्य और अधिमास या मलमासके प्रकाशक तेरहवें विष्णु हैं । इसीलिये उसे पुरुषोत्तममास कहते हैं। अधिमासकी पृथक् गणना न होनेसे बारह मासोंके प्रकाशक आदित्य बारह ही कहे गये हैं ।
पृष्ठ 887
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु पुत्रोंके नामकरण - संस्कार वैशम्पायन उवाच
कुन्तीपुत्रेषु जातेषु धृतराष्ट्रात्मजेषु च ।
मद्रराजसुता पाण्डुं रहो वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! जब कुन्तीके तीन पुत्र उत्पन्न हो गये और धृतराष्ट्रके भी सौ पुत्र हो गये, तब माद्रीने पाण्डुसे एकान्तमें कहा– ॥ १ ॥
न मेऽस्ति त्वयि संतापो विगुणेऽपि परंतप ।
नावरत्वे वरार्हायाः स्थित्वा चानघ नित्यदा ॥ २ ॥
गान्धार्याश्चैव नृपते जातं पुत्रशतं तथा ।
श्रुत्वा न मे तथा दुःखमभवत् कुरुनन्दन ॥ ३ ॥
‘ शत्रुओंको संताप देनेवाले निष्पाप कुरुनन्दन! आप संतान उत्पन्न करनेकी शक्तिसे रहित हो गये, आपकी इस न्यूनता या दुर्बलताको लेकर मेरे मनमें कोई संताप नहीं है । यद्यपि मैं सदा कुन्तीदेवीकी अपेक्षा श्रेष्ठ होनेके कारण पटरानीके पदपर बैठनेकी अधिकारिणी थी, तो भी जो सदा मुझे छोटी बनकर रहना पड़ता है, इसके लिये भी मुझे कोई दुःख नहीं है । राजन्! गान्धारी तथा राजा धृतराष्ट्रके जो सौ पुत्र हुए हैं, वह समाचार सुनकर भी मुझे वैसा दुःख नहीं हुआ था ॥ २-३ ॥
इदं तु मे महद् दुःखं तुल्यतायामपुत्रता ।
दिष्ट्या त्विदानीं भर्तुर्मे कुन्त्यामप्यस्ति संततिः ॥ ४ ॥
' परंतु इस बातका मेरे मनमें बहुत दुःख है कि मैं और कुन्तीदेवी दोनों समानरूपसे आपकी पत्नियाँ हैं, तो भी उन्हें तो पुत्र हुआ और मैं संतानहीन ही रह गयी । यह सौभाग्यकी बात है कि इस समय मेरे प्राणनाथको कुन्तीके गर्भसे पुत्रकी प्राप्ति हो गयी है ॥ ४ ॥
यदि त्वपत्यसंतानं कुन्तिराजसुता मयि ।
कुर्यादनुग्रहो मे स्यात् तव चापि हितं भवेत् ॥ ५ ॥
‘ यदि कुन्तिराजकुमारी मेरे गर्भसे भी कोई संतान उत्पन्न करा सकें, तो यह उनका मेरे ऊपर महान् अनुग्रह होगा और इससे आपका भी हित हो सकता है ॥ ५ ॥
संरम्भो हि सपत्नीत्वाद् वक्तुं कुन्तिसुतां प्रति ।
यदि तु त्वं प्रसन्नो मे स्वयमेनां प्रचोदय ॥ ६ ॥
पृष्ठ 888
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ सौत होनेके कारण मेरे मनमें एक अभिमान है, जो कुन्तीदेवीसे कुछ निवेदन करनेमें बाधक हो रहा है; अतः यदि आप मुझपर प्रसन्न हों तो आप स्वयं ही मेरे लिये कुन्तीदेवीको प्रेरित कीजिये ' ॥ ६ ॥
पाण्डुरुवाच
ममाप्येष सदा माद्रि हृद्यर्थः परिवर्तते ।
न तु त्वां प्रसहे वक्तुमिष्टानिष्टविवक्षया ॥ ७ ॥
- पाण्डु बोले – माद्री! यह बात मेरे मनमें भी निरन्तर घूमती रहती है, किंतु इस विषयमें तुमसे कुछ कहनेका साहस नहीं होता था; क्योंकि पता नहीं, तुम यह प्रस्ताव सुनकर प्रसन्न
होओगी या बुरा मान जाओगी । यह संदेह बराबर बना रहता था ॥ ७ ॥
तव त्विदं मतं मत्वा प्रयतिष्याम्यतः परम् ।
मन्ये ध्रुवं मयोक्ता सा वचनं प्रतिपत्स्यते ॥ ८ ॥
परंतु आज इस विषयमें तुम्हारी सम्मति जानकर अब मैं इसके लिये प्रयत्न करूँगा ।
मुझे विश्वास है, मेरे कहनेपर कुन्तीदेवी निश्चय ही मेरी बात मान लेंगी ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः कुन्तीं पुनः पाण्डुर्विविक्त इदमब्रवीत् ।
कुलस्य मम संतानं लोकस्य च कुरु प्रियम् ॥ ९ ॥
मम चापिण्डनाशाय पूर्वेषामपि चात्मनः ।
मत्प्रियार्थं च कल्याणि कुरु कल्याणमुत्तमम् ॥ १० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब राजा पाण्डुने एकान्तमें कुन्तीसे यह बात कही — ‘ कल्याणि! मेरी कुलपरम्पराका विच्छेद न हो और सम्पूर्ण जगत्का प्रिय हो, ऐसा कार्य करो । मेरे तथा अपने पूर्वजोंके लिये पिण्डका अभाव न हो और मेरा भी प्रिय हो, इसके लिये तुम परम उत्तम कल्याणमय कार्य करो ॥ ९ -१० ॥
यशसोऽर्थाय चैव त्वं कुरु कर्म सुदुष्करम् ।
प्राप्याधिपत्यमिन्द्रेण यज्ञैरिष्टं यशोऽर्थिना ॥ ११ ॥
‘ अपने यशका विस्तार करनेके लिये तुम अत्यन्त दुष्कर कर्म करो, जैसे इन्द्रने स्वर्गका साम्राज्य प्राप्त कर लेनेके बाद भी केवल यशकी कामनासे अनेकानेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ ११ ॥
तथा मन्त्रविदो विप्रास्तपस्तप्त्वा सुदुष्करम् ।
गुरूनभ्युपगच्छन्ति यशसोऽर्थाय भाविनि ॥ १२ ॥
‘ भामिनि! मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण अत्यन्त कठोर तपस्या करके भी यशके लिये गुरुजनोंकी शरण ग्रहण करते हैं ॥ १२ ॥
तथा राजर्षयः सर्वे ब्राह्मणाश्च तपोधनाः ।
पृष्ठ 889
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चक्रुरुच्चावचं कर्म यशसोऽर्थाय दुष्करम् ॥ १३ ॥
‘ सम्पूर्ण राजर्षियों तथा तपस्वी ब्राह्मणोंने भी यशके लिये छोटे - बड़े कठिन कर्म किये हैं ॥ १३ ॥
सा त्वं माद्रीं प्लवेनैव तारयैनामनिन्दिते ।
अपत्यसंविभागेन परां कीर्तिमवाप्नुहि ॥ १४ ॥
‘ अनिन्दिते! इसी प्रकार तुम भी इस माद्रीको नौकापर बिठाकर पार लगा दो; इसे भी संतति देकर उत्तम यश प्राप्त करो ' ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वाब्रवीन्माद्रीं सकृच्चिन्तय दैवतम् ।
तस्मात् ते भवितापत्यमनुरूपमसंशयम् ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! महाराज पाण्डुके यों कहनेपर कुन्तीने माद्रीसे कहा — ' तुम एक बार किसी देवताका चिन्तन करो, उससे तुम्हें योग्य संतानकी प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है ' ॥ १५ ॥
ततो माद्री विचार्यैवं जगाम मनसाश्विनौ ।
तावागम्य सुतौ तस्यां जनयामासतुर्यमौ ॥ १६ ॥
तब माद्रीने मन-ही- मन कुछ विचार करके दोनों अश्विनीकुमारोंका स्मरण किया । तब उन दोनोंने आकर माद्रीके गर्भसे दो जुड़वें पुत्र उत्पन्न किये ॥ १६ ॥
नकुलं सहदेवं च रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
तथैव तावपि यमौ वागुवाचाशरीरिणी ॥ १७ ॥
उनमेंसे एकका नाम नकुल था और दूसरेका सहदेव । पृथ्वीपर सुन्दर रूपमें उन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था । पहलेकी तरह उन दोनों यमल संतानोंके विषयमें भी आकाशवाणीने कहा- ॥ १७ ॥
सत्त्वरूपगुणोपेती भवतोऽत्यश्विनाविति ।
भासतस्तेजसात्यर्थं रूपद्रविणसम्पदा ॥ १८ ॥
' ये दोनों बालक अश्विनीकुमारोंसे भी बढ़कर बुद्धि, रूप और गुणोंसे सम्पन्न होंगे । अपने तेज तथा बढ़ी- चढ़ी रूप- सम्पत्तिके द्वारा ये दोनों सदा प्रकाशित रहेंगे ' ॥ १८ ॥
नामानि चक्रिरे तेषां शतशृङ्गनिवासिनः ।
भक्त्या च कर्मणा चैव तथाशीर्भिर्विशाम्पते ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर शतशृंगनिवासी ऋषियोंने उन सबके नामकरण संस्कार किये । उन्हें आशीर्वाद देते हुए उनकी भक्ति और कर्मके अनुसार उनके नाम रखे ॥ १ ९ ॥
ज्येष्ठं युधिष्ठिरेत्येवं भीमसेनेति मध्यमम् ।
अर्जुनेति तृतीयं च कुन्तीपुत्रानकल्पयन् ॥ २० ॥
पृष्ठ 890
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्रका नाम युधिष्ठिर, मझलेका नाम भीमसेन और तीसरेका नाम अर्जुन रखा गया ॥ २० ॥
पूर्वजं नकुलेत्येवं सहदेवेति चापरम् ।
माद्रीपुत्रावकथयंस्ते विप्राः प्रीतमानसाः ॥ २१ ॥
उन प्रसन्नचित्त ब्राह्मणोंने माद्रीपुत्रोंमेंसे जो पहले उत्पन्न हुआ, उसका नाम नकुल और दूसरेका सहदेव निश्चित किया ॥ २१ ॥
अनुसंवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमाः ।
पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्च संवत्सरा इव ॥ २२ ॥
वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डवगण प्रतिवर्ष एक- एक करके उत्पन्न हुए थे, तो भी देवस्वरूप होनेके कारण पाँच संवत्सरोंकी भाँति एक - से सुशोभित हो रहे थे ॥ २२ ॥
महासत्त्वा महावीर्या महाबलपराक्रमाः ।
पाण्डुर्दृष्ट्वा सुतांस्तांस्तु देवरूपान् महौजसः ॥ २३ ॥
मुदं परमिकां लेभे ननन्द च नराधिपः ।
ऋषीणामपि सर्वेषां शतशृङ्गनिवासिनाम् ॥ २४ ॥
प्रिया बभूवुस्तासां च तथैव मुनियोषिताम् ।
कुन्तीमथ पुनः पाण्डुर्माद्र्यर्थे समचोदयत् ॥ २५ ॥
वे सभी महान् धैर्यशाली, अधिक वीर्यवान्, महाबली और पराक्रमी थे । उन देवस्वरूप महान् तेजस्वी पुत्रोंको देखकर महाराज पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे आनन्दमें मग्न हो गये । वे सभी बालक शतशृंगनिवासी समस्त मुनियों और मुनिपत्नियोंके प्रिय थे । तदनन्तर पाण्डुने माद्रीसे संतानकी उत्पत्ति करानेके लिये कुन्तीको पुनः प्रेरित किया ॥ २३–२५ ॥
तमुवाच पृथा राजन् रहस्युक्ता तदा सती ।
उक्ता सकृद् द्वन्द्वमेषा लेभे तेनास्मि वञ्चिता ॥ २६ ॥
राजन्! जब एकान्तमें पाण्डुने कुन्तीसे वह बात कही, तब सती कुन्ती पाण्डुसे इस प्रकार बोली - ' महाराज! मैंने इसे एक पुत्रके लिये नियुक्त किया था, किंतु इसने दो पा लिये । इससे मैं ठगी गयी ॥ २६ ॥
बिभेम्यस्याः परिभवात् कुस्त्रीणां गतिरीदृशी ।
नाज्ञासिषमहं मूढा द्वन्द्वाह्वाने फलद्वयम् ॥ २७ ॥
तस्मान्नाहं नियोक्तव्या त्वयैषोऽस्तु वरो मम ।
एवं पाण्डोः सुताः पञ्च देवदत्ता महाबलाः ॥ २८ ॥
सम्भूताः कीर्तिमन्तश्च कुरुवंशविवर्धनाः ।
शुभलक्षणसम्पन्नाः सोमवत् प्रियदर्शनाः ॥ २ ९ ॥
‘ अब तो मैं इसके द्वारा मेरा तिरस्कार न हो जाय, इस बातके लिये डरती हूँ। खोटी स्त्रियोंकी ऐसी ही गति होती है । मैं ऐसी मूर्खा हूँ कि मेरी समझमें यह बात नहीं आयी कि