श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 861–870
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 861–870
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१. बन्धु शब्दका अर्थ संस्कृत - शब्दार्थकौस्तुभमें आत्मबन्धु, पितृबन्धु, मातृबन्धु माना गया है, इसलिये बन्धुका अर्थ कुटुम्बी किया है । दायादका अर्थ उसी कोषमें ' उत्तराधिकारी ' है । इसीलिये बन्धुदायादका अर्थ ' कुटुम्बी ' होनेसे ‘ उत्तराधिकारी’ किया है । इसके विपरीत, अबन्धुदायादका अर्थ अबन्धु यानी कुटुम्बी न होनेपर उत्तराधिकारी किया है । २. ‘ पौनर्भव’का अर्थ पद्मचन्द्रकोषके अनुसार दूसरी बार ब्याही हुई स्त्रीसे उत्पन्न पुत्र लिया गया है । ३. कानीन — यह अर्थ नीलकण्ठजीने अपनी टीकामें किया है ।
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विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः कुन्तीका पाण्डुको व्युषिताश्वके मृत शरीरसे उसकी पतिव्रता पत्नी भद्राके द्वारा पुत्र-प्राप्तिका कथन वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता महाराज कुन्ती पाण्डुमभाषत ।
कुरूणामृषभं वीरं तदा भूमिपतिं पतिम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज जनमेजय! इस प्रकार कहे जानेपर कुन्ती अपने पति कुरुश्रेष्ठ वीरवर राजा पाण्डुसे इस प्रकार बोली— ॥ १ ॥
न मामर्हसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं कथंचन ।
धर्मपत्नीमभिरतां त्वयि राजीवलोचने ॥ २ ॥
‘ धर्मज्ञ! आप मुझसे किसी तरह ऐसी बात न कहें; मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ और कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले आपमें ही अनुराग रखती हूँ ॥ २ ॥
त्वमेव तु महाबाहो मय्यपत्यानि भारत ।
वीर वीर्योपपन्नानि धर्मतो जनयिष्यसि ॥ ३ ॥
' महाबाहु वीर भारत! आप ही मेरे गर्भसे धर्मपूर्वक अनेक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करेंगे ॥ ३ ॥
स्वर्गं मनुजशार्दूल गच्छेयं सहिता त्वया ।
अपत्याय च मां गच्छ त्वमेव कुरुनन्दन ॥ ४ ॥
‘नरश्रेष्ठ! मैं आपके साथ ही स्वर्गलोकमें चलूँगी । कुरुनन्दन! पुत्रकी उत्पत्तिके लिये आप ही मेरे साथ समागम कीजिये ॥ ४ ॥
न ह्यहं मनसाप्यन्यं गच्छेयं त्वदृते नरम् ।
त्वत्तः प्रतिविशिष्टश्च कोऽन्योऽस्ति भुवि मानवः ॥ ५ ॥
‘ मैं आपके सिवा किसी दूसरे पुरुषसे समागम करनेकी बात मनमें भी नहीं ला सकती ।
फिर इस पृथ्वीपर आपसे श्रेष्ठ दूसरा मनुष्य है भी कौन ॥ ५ ॥
इमां च तावद् धर्मात्मन् पौराणीं शृणु मे कथाम् ।
परिश्रुतां विशालाक्ष कीर्तयिष्यामि यामहम् ॥ ६ ॥
‘ धर्मात्मन्! पहले आप मेरे मुँहसे यह पौराणिक कथा सुन लीजिये । विशालाक्ष! यह जो कथा मैं कहने जा रही हूँ, सर्वत्र विख्यात है ॥ ६ ॥
व्युषिताश्व इति ख्यातो बभूव किल पार्थिवः ।
पुरा परमधर्मिष्ठः पूरोर्वंशविवर्धनः ॥ ७ ॥
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'कहते हैं, पूर्वकालमें एक परम धर्मात्मा राजा हो गये हैं। उनका नाम था व्युषिताश्व । वे पूरुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे ॥ ७ ॥
तस्मिंश्च यजमाने वै धर्मात्मनि महाभुजे ।
उपागमंस्ततो देवाः सेन्द्रा देवर्षिभिः सह ॥ ८ ॥
‘ एक समय वे महाबाहु धर्मात्मा नरेश जब यज्ञ करने लगे, उस समय इन्द्र आदि देवता देवर्षियोंके साथ उस यज्ञमें पधारे थे ॥ ८ ॥
अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ।
व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मनः ॥ ९ ॥
देवा ब्रह्मर्षयश्चैव चक्रुः कर्म स्वयं तदा ।
व्युषिताश्वस्ततो राजन्नति मर्त्यान् व्यरोचत ॥ १० ॥
‘ उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे थे तथा ब्राह्मणलोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्षसे फूल उठे थे । महामना राजर्षि व्युषिताश्वके यज्ञमें उस समय देवता और ब्रह्मर्षि स्वयं सब कार्य कर रहे थे । राजन्! इससे व्युषिताश्व सब मनुष्योंसे ऊँची स्थितिमें पहुँचकर बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ९ -१० ॥
सर्वभूतान् प्रति यथा तपनः शिशिरात्यये ।
स विजित्य गृहीत्वा च नृपतीन् राजसत्तमः ॥ ११ ॥
प्राच्यानुदीच्यान् पाश्चात्त्यान् दाक्षिणात्यानकालयत् ।
अश्वमेधे महायज्ञे व्युषिताश्वः प्रतापवान् ॥ १२ ॥
‘ राजा व्युषिताश्व समस्त भूतोंके प्रीतिपात्र थे । राजाओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्युषिताश्वने अश्वमेध नामक महान् यज्ञमें पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण– चारों दिशाओंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया- ठीक जिस प्रकार शिशिरकालके अन्तमें भगवान् सूर्य-देव सभी प्राणियोंपर विजय कर लेते हैं - सबको तपाने लगते हैं ॥ ११-१२ ॥
बभूव स हि राजेन्द्रो दशनागबलान्वितः ।
अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ॥ १३ ॥
व्युषिताश्वे यशोवृद्धे मनुष्येन्द्रे कुरूत्तम ।
व्युषिताश्वः समुद्रान्तां विजित्येमां वसुंधराम् ॥ १४ ॥
अपालयत् सर्ववर्णान् पिता पुत्रानिवौरसान् ।
यजमानो महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ ॥ १५ ॥
'उन महाराजमें दस हाथियोंका बल था । कुरुश्रेष्ठ! पुराणवेत्ता विद्वान् यशमें बढ़े- चढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्वके विषयमें यह यशोगाथा गाते हैं - ' राजा व्युषिताश्व समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीको जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्णके लोगोंका पालन करते थे । उन्होंने बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया ॥ १३–१५ ॥
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अनन्तरत्नान्यादाय स जहार महाक्रतून् ।
सुषाव च बहून् सोमान् सोमसंस्थास्ततान च ॥ १६ ॥
‘ अनन्त रत्नोंकी भेंट लेकर उन्होंने बड़े- बड़े यज्ञ किये । अनेक सोमयागोंका आयोजन करके उनमें बहुत- सा सोमरस संग्रह करके अग्निष्टोम अत्यग्निष्टोम आदि सात प्रकारकी सोमयाग- संस्थाओंका भी अनुष्ठान किया ॥ १६ ॥
आसीत् काक्षीवती चास्य भार्या परमसम्मता ।
भद्रा नाम मनुष्येन्द्र रूपेणासदृशी भुवि ॥ १७ ॥
‘नरेन्द्र! राजा कक्षीवान्की पुत्री भद्रा उनकी अत्यन्त प्यारी पत्नी थी । उन दिनों इस पृथ्वीपर उसके रूपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री न थी ॥ १७ ॥
कामयामासतुस्तौ च परस्परमिति श्रुतम् ।
स तस्यां कामसम्पन्नो यक्ष्मणा समपद्यत ॥ १८ ॥
‘ मैंने सुना है, वे दोनों पति-पत्नी एक- दूसरेको बहुत चाहते थे । पत्नीके प्रति अत्यन्त कामासक्त होनेके कारण राजा व्युषिताश्व राजयक्ष्माके शिकार हो गये ॥ १८ ॥
तेनाचिरेण कालेन जगामास्तमिवांशुमान् ।
तस्मिन् प्रेते मनुष्येन्द्रे भार्यास्य भृशदुःखिता ॥ १ ९ ॥
‘ इस कारण वे थोड़े ही समयमें सूर्यकी भाँति अस्त हो गये । उन महाराजके परलोकवासी हो जानेपर उनकी पत्नीको बड़ा दुःख हुआ ॥ १ ९ ॥
अपुत्रा पुरुषव्याघ्र विललापेति नः श्रुतम् ।
भद्रा परमदुःखार्ता तन्निबोध जनाधिप ॥ २० ॥
‘ नरव्याघ्र जनेश्वर! हमने सुना है कि भद्राके तबतक कोई पुत्र नहीं हुआ था । इस कारण वह अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर विलाप करने लगी; वह विलाप सुनिये ' ॥ २० ॥
भद्रोवाच
नारी परमधर्मज्ञ सर्वा भर्तृविनाकृता ।
पतिं विना जीवति या न सा जीवति दुःखिता ॥ २१ ॥
भद्रा बोली- परमधर्मज्ञ महाराज! जो कोई भी विधवा स्त्री पतिके बिना जीवन धारण करती है, वह निरन्तर दुःखमें डूबी रहनेके कारण वास्तवमें जीती नहीं, अपितु मृततुल्या है ॥ २१ ॥
पतिं विना मृतं श्रेयो नार्याः क्षत्रियपुङ्गव ।
त्वद्गतिं गन्तुमिच्छामि प्रसीदस्व नयस्व माम् ॥ २२ ॥
त्वया हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे ।
प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्णं नयस्व माम् ॥ २३ ॥
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क्षत्रियशिरोमणे! पतिके न रहनेपर नारीकी मृत्यु हो जाय, इसीमें उसका कल्याण है । अतः मैं भी आपके ही मार्गपर चलना चाहती हूँ, प्रसन्न होइये और मुझे अपने साथ ले चलिये । आपके बिना एक क्षण भी जीवित रहनेका मुझमें उत्साह नहीं है । राजन्! कृपा कीजिये और यहाँसे शीघ्र मुझे ले चलिये ॥ २२-२३ ॥
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि समेषु विषमेषु च ।
त्वामहं नरशार्दूल गच्छन्तमनिवर्तितुम् ॥ २४ ॥
नरश्रेष्ठ! आप जहाँ कभी न लौटनेके लिये गये हैं, वहाँका मार्ग समतल हो या विषम, मैं आपके पीछे - पीछे अवश्य चली चलूँगी ॥ २४ ॥
छायेवानुगता राजन् सततं वशवर्तिनी ।
भविष्यामि नरव्याघ्र नित्यं प्रियहिते रता ॥ २५ ॥
राजन्! मैं छायाकी भाँति आपके पीछे लगी रहूँगी एवं सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहूँगी । नरव्याघ्र! मैं सदा आपके प्रिय और हितमें लगी रहूँगी ॥ २५ ॥
अद्यप्रभृति मां राजन् कष्टा हृदयशोषणाः ।
आधयोऽभिभविष्यन्ति त्वामृते पुष्करेक्षण ॥ २६ ॥
कमलके समान नेत्रोंवाले महाराज! आपके बिना आजसे हृदयको सुखा देनेवाले कष्ट और मानसिक चिन्ताएँ मुझे सताती रहेंगी ॥ २६ ॥
अभाग्यया मया नूनं वियुक्ताः सहचारिणः ।
तेन मे विप्रयोगोऽयमुपपन्नस्त्वया सह ॥ २७ ॥
मुझ अभागिनीने निश्चय ही कितने ही जीवनसंगियों ( स्त्री- पुरुषों) में विछोह कराया होगा । इसीलिये आज आपके साथ मेरा वियोग घटित हुआ है ॥ २७ ॥
विप्रयुक्ता तु या पत्या मुहूर्तमपि जीवति ।
दुःखं जीवति सा पापा नरकस्थेव पार्थिव ॥ २८ ॥
महाराज! जो स्त्री पतिसे बिछुड़ जानेपर दो घड़ी भी जीवन धारण करती है, वह पापिनी नरकमें पड़ी हुई- सी दुःखमय जीवन बिताती है ॥ २८ ॥
संयुक्ता विप्रयुक्ताश्च पूर्वदेहे कृता मया ।
तदिदं कर्मभिः पापैः पूर्वदेहेषु संचितम् ॥ २ ९ ॥
दुःखं मामनुसम्प्राप्तं राजंस्त्वद्विप्रयोगजम् ।
अद्यप्रभृत्यहं राजन् कुशसंस्तरशायिनी ।
भविष्याम्यसुखाविष्टा त्वद्दर्शनपरायणा ॥ ३० ॥
राजन्! पूर्वजन्मके शरीरमें स्थित रहकर मैंने एक साथ रहनेवाले कुछ स्त्री- पुरुषोंमें अवश्य वियोग कराया है । उन्हीं पापकर्मोंद्वारा मेरे पूर्वशरीरोंमें जो बीजरूपसे संचित हो रहा था, वही यह आपके वियोगका दुःख आज मुझे प्राप्त हुआ है । महाराज! मैं दुःखमें डूबी हुई हूँ, अतः आजसे आपके दर्शनकी इच्छा रखकर मैं कुशके बिछौनेपर सोऊँगी ॥ २ ९ -३० ॥
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दर्शयस्व नरव्याघ्र शाधि मामसुखान्विताम् ।
कृपणां चाथ करुणं विलपन्तीं नरेश्वर ॥ ३१ ॥
नरश्रेष्ठ नरेश्वर! करुण विलाप करती हुई मुझ दीन- दुःखिया अबलाको आज अपना दर्शन और कर्तव्यका आदेश दीजिये ॥ ३१ ॥
कुन्त्युवाच
एवं बहुविधं तस्यां विलपन्त्यां पुनः पुनः ।
तं शवं सम्परिष्वज्य वाक् किलान्तर्हिताब्रवीत् ॥ ३२ ॥
कुन्तीने कहा - महाराज! इस प्रकार जब राजाके शवका आलिंगन करके वह बार-बार अनेक प्रकारसे विलाप करने लगी, तब आकाशवाणी बोली- ॥ ३२ ॥
उत्तिष्ठ भद्रे गच्छ त्वं ददानीह वरं तव ।
जनयिष्याम्यपत्यानि त्वय्यहं चारुहासिनि ॥ ३३ ॥
' भद्रे! उठो और जाओ, इस समय मैं तुम्हें वर देता हूँ । चारुहासिनि! मैं तुम्हारे गर्भसे कई पुत्रोंको जन्म दूँगा ॥ ३३ ॥
आत्मकीये वरारोहे शयनीये चतुर्दशीम् ।
अष्टमीं वा ऋतुस्नाता संविशेथा मया सह ॥ ३४ ॥
‘ वरारोहे! तुम ऋतुस्नाता होनेपर चतुर्दशी या अष्टमीकी रातमें अपनी शय्यापर मेरे इस शवके साथ सो जाना' ॥ ३४ ॥
एवमुक्ता तु सा देवी तथा चक्रे पतिव्रता ।
यथोक्तमेव तद्वाक्यं भद्रा पुत्रार्थिनी तदा ॥ ३५ ॥
आकाशवाणीके यों कहनेपर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली पतिव्रता भद्रादेवीने पतिकी पूर्वोक्त आज्ञाका अक्षरशः पालन किया ॥ ३५ ॥
सा तेन सुषुवे देवी शवेन भरतर्षभ ।
त्रीन् शाल्वांश्चतुरो मद्रान् सुतान् भरतसत्तम ॥ ३६ ॥
भरतश्रेष्ठ! रानी भद्राने उस शवके द्वारा सात पुत्र उत्पन्न किये, जिनमें तीन शाल्वदेशके और चार मद्रदेशके शासक हुए ॥ ३६ ॥
तथा त्वमपि मय्येवं मनसा भरतर्षभ ।
शक्तो जनयितुं पुत्रांस्तपोयोगबलान्वितः ॥ ३७ ॥
भरतवंशशिरोमणे! इसी प्रकार आप भी मेरे गर्भसे मानसिक संकल्पद्वारा अनेक पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं; क्योंकि आप तपस्या और योगबलसे सम्पन्न हैं ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि व्युषिताश्वोपाख्याने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥
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इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें व्युषिताश्वोपाख्यानविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥
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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डुका कुन्तीको समझाना और कुन्तीका पतिकी आज्ञासे पुत्रोत्पत्तिके लिये धर्मदेवताका आवाहन करनेके लिये उद्यत होना वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तया राजा तां देवीं पुनरब्रवीत् ।
धर्मविद् धर्मसंयुक्तमिदं वचनमुत्तमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कुन्तीके यों कहनेपर धर्मज्ञ राजा पाण्डुने देवी कुन्तीसे पुनः यह धर्मयुक्त बात कही ॥ १ ॥
पाण्डुरुवाच
एवमेतत् पुरा कुन्ति व्युषिताश्वश्चकार ह ।
यथा त्वयोक्तं कल्याणि स ह्यासीदमरोपमः ॥ २ ॥
पाण्डु बोले — कुन्ती! तुम्हारा कहना ठीक है । पूर्वकालमें राजा व्युषिताश्वने जैसा
तुमने कहा है, वैसा ही किया था । कल्याणी! वे देवताओंके समान तेजस्वी थे ॥ २ ॥
अथ त्विदं प्रवक्ष्यामि धर्मतत्त्वं निबोध मे ।
पुराणमृषिभिर्दृष्टं धर्मविद्भिर्महात्मभिः ॥ ३ ॥
अब मैं तुम्हें यह धर्मका तत्त्व बतलाता हूँ, सुनो । यह पुरातन धर्मतत्त्व धर्मज्ञ महात्मा ऋषियोंने प्रत्यक्ष किया है ॥ ३ ॥
धर्ममेवं जनाः सन्तः पुराणं परिचक्षते ।
भर्ता भार्यां राजपुत्रि धर्म्यं वाधर्म्यमेव वा ॥ ४ ॥
यद् ब्रूयात् तत् तथा कार्यमिति वेदविदो विदुः ।
विशेषतः पुत्रगृध्यी हीनः प्रजननात् स्वयम् ॥ ५ ॥
यथाहमनवद्याङ्गि पुत्रदर्शनलालसः ।
तथा रक्ताङ्गुलितलः पद्मपत्रनिभः शुभे ॥ ६ ॥
प्रसादार्थं मया तेऽयं शिरस्यभ्युद्यतोऽञ्जलिः ।
मन्नियोगात् सुकेशान्ते द्विजातेस्तपसाधिकात् ॥ ७ ॥
पुत्रान् गुणसमायुक्तानुत्पादयितुमर्हसि ।
त्वत्कृतेऽहं पृथुश्रोणि गच्छेयं पुत्रिणां गतिम् ॥ ८ ॥
साधु पुरुष इसीको प्राचीन धर्म कहते हैं । राजकन्ये! पति अपनी पत्नीसे जो बात कहे, वह धर्मके अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसे अवश्य पूर्ण करना चाहिये - ऐसा वेदज्ञ पुरुषोंका
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कथन है । विशेषतः ऐसा पति, जो पुत्रकी अभिलाषा रखता हो और स्वयं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो, जो बात कहे, वह अवश्य माननी चाहिये । निर्दोष अंगोंवाली शुभलक्षणे! मैं चूँकि पुत्रका मुँह देखनेके लिये लालायित हूँ, अतएव तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मस्तकके समीप यह अंजलि धारण करता हूँ, जो लाल-लाल अंगुलियोंसे युक्त तथा कमलदलके समान सुशोभित है । सुन्दर केशोंवाली प्रिये! तुम मेरे आदेशसे तपस्यामें बढ़े -चढ़े हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके साथ समागम करके गुणवान् पुत्र उत्पन्न करो । सुश्रोणि! तुम्हारे प्रयत्नसे मैं पुत्रवानोंकी गति प्राप्त करूँ, ऐसी मेरी अभिलाषा है ॥ ४–८ ॥ वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता ततः कुन्ती पाण्डुं परपुरंजयम् ।
प्रत्युवाच वरारोहा भर्तुः प्रियहिते रता ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार कही जानेपर पतिके प्रिय और हितमें लगी रहनेवाली सुन्दरांगी कुन्ती शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महाराज पाण्डुसे इस प्रकार बोली-I ॥ ९ ॥
( अधर्मः सुमहानेष स्त्रीणां भरतसत्तम ।
यत् प्रसादयते भर्ता प्रसाद्यः क्षत्रियर्षभ ॥
भृणु चेदं महाबाहो मम प्रीतिकरं वचः II ) ‘ भरतश्रेष्ठ! क्षत्रियशिरोमणे! स्त्रियोंके लिये यह बड़े अधर्मकी बात है कि पति ही उनसे प्रसन्न होनेके लिये बार- बार अनुरोध करे; क्योंकि नारीका ही यह कर्तव्य है कि वह पतिको प्रसन्न रखे । महाबाहो! आप मेरी यह बात सुनिये । इससे आपको बड़ी प्रसन्नता होगी ।
पितृवेश्मन्यहं बाला नियुक्तातिथिपूजने ।
उग्रं पर्यचरं तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ १० ॥
निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः ।
तमहं संशितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयम् ॥ ११ ॥
‘ बाल्यावस्थामें जब मैं पिताके घर थी, मुझे अतिथियोंके सत्कारका काम सौंपा गया था । वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले एक उग्रस्वभावके ब्राह्मणकी, जिनका धर्मके विषयमें निश्चय दूसरोंको अज्ञात है तथा जिन्हें लोग दुर्वासा कहते हैं, मैंने बड़ी सेवा- शुश्रूषा की । अपने मनको संयममें रखनेवाले उन महात्माको मैंने सब प्रकारके यत्नोंद्वारा संतुष्ट किया ॥ १०-११ ॥
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स मेऽभिचारसंयुक्तमाचष्ट भगवान् वरम् ।
मन्त्रं त्विमं च मे प्रादादब्रवीच्चैव मामिदम् ॥ १२ ॥
‘ तब भगवान् दुर्वासाने वरदानके रूपमें मुझे प्रयोगविधिसहित एक मन्त्रका उपदेश दिया और मुझसे इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि ।
अकामो वा सकामो वा वशं ते समुपैष्यति ॥ १३ ॥
‘ तुम इस मन्त्रसे जिस - जिस देवताका आवाहन करोगी, वह निष्काम हो या सकाम, निश्चय ही तुम्हारे अधीन हो जायगा ॥ १३ ॥
तस्य तस्य प्रसादात् ते राज्ञि पुत्रो भविष्यति ।
इत्युक्ताहं तदानेन पितृवेश्मनि भारत ॥ १४ ॥
‘ राजकुमारी! उस देवताके प्रसादसे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा । ' भारत! इस प्रकार मेरे पिताके घरमें उस ब्राह्मणने उस समय मुझसे यह बात कही थी ॥ १४ ॥
ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तस्य कालोऽयमागतः ।
अनुज्ञाता त्वया देवमाह्वयेयमहं नृप ।
तेन मन्त्रेण राजर्षे यथास्यान्नौ प्रजा हिता ॥ १५ ॥