महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 891–900

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900

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दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है । अतः राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये । मैं आपसे यही वर माँगती हूँ। ' इस प्रकार पाण्डुके देवताओंके दिये हुए पाँच महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो यशस्वी होनेके साथ ही कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे । चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्रिय लगता था ॥ २७–२९ ॥

सिंहदर्पा महेष्वासाः सिंहविक्रान्तगामिनः ।

सिंहग्रीवा मनुष्येन्द्रा ववृधुर्देवविक्रमाः ॥ ३० ॥

विवर्धमानास्ते तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ ।

विस्मयं जनयामासुर्महर्षीणां समेयुषाम् ॥ ३१ ॥

उनका अभिमान सिंहके समान था, वे बड़े -बड़े धनुष धारण करते थे । उनकी चाल-ढाल भी सिंहके ही समान थी । देवताओंके समान पराक्रमी तथा सिंहकी - सी गर्दनवाले वे नरश्रेष्ठ बढ़ने लगे । उस पुण्यमय हिमालयके शिखरपर पलते और पुष्ट होते हुए वे पाण्डुपुत्र वहाँ एकत्र होनेवाले महर्षियोंको आश्चर्यचकित कर देते थे ॥ ३०-३१ ॥

(जातमात्रानुपादाय शतशृङ्गनिवासिनः ।

पाण्डोः पुत्रानमन्यन्त तापसाः स्वानिवात्मजान् ॥

ततस्तु वृष्णयः सर्वे वसुदेवपुरोगमाः ।

पाण्डुः शापभयाद् भीतः शतशृङ्गमुपेयिवान् ।

तत्रैव मुनिभिः सार्धं तापसोऽभूत् तपश्चरन् ॥

शाकमूलफलाहारस्तपस्वी नियतेन्द्रियः ।

ध्यानयोगपरो राजा बभूवेति च वादकाः ॥

प्रब्रुवन्ति स्म बहवस्तच्छ्रुत्वा शोककर्शिताः ।

पाण्डोः प्रीतिसमायुक्ताः कदा श्रोष्याम सत्कथाः ॥

इत्येवं कथयन्तस्ते वृष्णयः सह बान्धवैः ।

पाण्डोः पुत्रागमं श्रुत्वा सर्वे हर्षसमन्विताः ॥

सभाजयन्तस्तेऽन्योन्यं वसुदेवं वचोऽब्रुवन् । शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनि पाण्डुके पुत्रोंको जन्मकालसे ही संरक्षणमें लेकर अपने औरस पुत्रोंकी भाँति उनका लाड़- प्यार करते थे । उधर द्वारकामें वसुदेव आदि सब वृष्णिवंशी राजा पाण्डुके विषयमें इस प्रकार विचार कर रहे थे — ' अहो! राजा पाण्डु किंदम मुनिके शापसे भयभीत हो शतशृंग पर्वतपर चले गये हैं और वहीं ऋषि - मुनियोंके साथ तपस्यामें तत्पर हो पूरे तपस्वी बन गये हैं । वे शाक, मूल और फल भोजन करते हैं, तपमें लगे रहते हैं, इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं और सदा ध्यानयोगका ही साधन करते हैं । ये बातें बहुत- से संदेशवाहक मनुष्य बता रहे थे । ' यह समाचार सुनकर प्रायः सभी यदुवंशी उनके प्रेमी होनेके नाते शोकमग्न रहते थे । वे सोचते थे — ' कब हमें महाराज पाण्डुका शुभ संवाद

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सुननेको मिलेगा । ' एक दिन अपने भाई- बन्धुओंके साथ बैठकर सब वृष्णिवंशी जब इस प्रकार पाण्डुके विषयमें कुछ बातें कर रहे थे, उसी समय उन्होंने पाण्डुके पुत्र होनेका समाचार सुना । सुनते ही सब- के - सब हर्षविभोर हो उठे और परस्पर सद्भाव प्रकट करते हुए वसुदेवजीसे इस प्रकार बोले— वृष्णय ऊचुः

न भवेरन् क्रियाहीनाः पाण्डोः पुत्रा महायशः ।

पाण्डोः प्रियहितान्वेषी प्रेषय त्वं पुरोहितम् ॥

वृष्णियोंने कहा – महायशस्वी वसुदेवजी! हम चाहते हैं कि राजा पाण्डुके पुत्र संस्कारहीन न हों; अतः आप पाण्डुके प्रिय और हितकी इच्छा रखकर उनके पास किसी पुरोहितको भेजिये । वैशम्पायन उवाच

वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा विससर्ज पुरोहितम् ।

युक्तानि च कुमाराणां पारिबर्हाण्यनेकशः ॥

कुन्तीं माद्रीं च संदिश्य दासीदासपरिच्छदम् ।

गाश्च रौप्यं हिरण्यं च प्रेषयामास भारत ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर वसुदेवजीने पुरोहितको भेजा; साथ ही उन कुमारोंके लिये उपयोगी अनेक प्रकारकी वस्त्राभूषण-सामग्री भी भेजी । कुन्ती और माद्रीके लिये भी दासी, दास, वस्त्राभूषण आदि आवश्यक सामान, गौएँ, चाँदी और सुवर्ण भिजवाये ।

तानि सर्वाणि संगृह्य प्रययौ स पुरोहितः ।

तमागतं द्विजश्रेष्ठं काश्यपं वै पुरोहितम् ॥

पूजयामास विधिवत् पाण्डुः परपुरञ्जयः ।

पृथा माद्री च संहृष्टे वसुदेवं प्रशंसताम् ॥

उन सब सामग्रियोंको एकत्र करके अपने साथ ले पुरोहितने वनको प्रस्थान किया । शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले राजा पाण्डुने पुरोहित द्विजश्रेष्ठ काश्यपके आनेपर उनका विधिपूर्वक पूजन किया । कुन्ती और माद्रीने प्रसन्न होकर वसुदेवजीकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ।

ततः पाण्डुः क्रियाः सर्वाः पाण्डवानामकारयत् ।

गर्भाधानादिकृत्यानि चौलोपनयनानि च ॥

काश्यपः कृतवान् सर्वमुपाकर्म च भारत ।

चौलोपनयनादूर्ध्वमृषभाक्षा यशस्विनः ॥

वैदिकाध्ययने सर्वे समपद्यन्त पारगाः ।

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तब पाण्डुने अपने पुत्रोंके गर्भाधानसे लेकर चूडाकरण और उपनयनतक सभी संस्कार- कर्म करवाये । भारत! पुरोहित काश्यपने उनके सब संस्कार सम्पन्न किये । बैलोंके समान बड़े - बड़े नेत्रोंवाले वे यशस्वी पाण्डव चूडाकरण और उपनयनके पश्चात् उपाकर्म

करके वेदाध्ययनमें लगे और उसमें पारंगत हो गये ।

शर्यातेः पृषतः पुत्रः शुको नाम परंतपः ॥

येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ।

अश्वमेधशतैरिष्ट्वा स महात्मा महामखैः ॥

आराध्य देवताः सर्वाः पितॄनपि महामतिः ।

शतशृङ्गे तपस्तेपे शाकमूलफलाशनः ॥

तेनोपकरणश्रेष्ठैः शिक्षया चोपबृंहिताः ।

तत्प्रसादाद् धनुर्वेदे समपद्यन्त पारगाः ॥

भारत! शर्यातिवंशजके एक पुत्र पृषत् थे, जिनका नाम था शुक । वे अपने पराक्रमसे शत्रुओंको संतप्त करनेवाले थे । उन शुकने किसी समय अपने धनुषके बलसे जीतकर समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर अधिकार कर लिया था । अश्वमेध जैसे सौ बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान एवं सम्पूर्ण देवताओं तथा पितरोंकी आराधना करके परम बुद्धिमान् महात्मा राजा शुक शतशृंग पर्वतपर आकर शाक और फल- मूलका आहार करते हुए तपस्या करने लगे । उन्हीं तपस्वी नरेशने श्रेष्ठ उपकरणों और शिक्षाके द्वारा पाण्डवोंकी योग्यता बढ़ायी । राजर्षि शुकके कृपा-प्रसादसे सभी पाण्डव धनुर्वेदमें पारंगत हो गये ।

गदायां पारगो भीमस्तोमरेषु युधिष्ठिरः ।

असिचर्मणि निष्णातौ यमौ सत्त्ववतां वरौ ॥

धनुर्वेदे गतः पारं सव्यसाची परंतपः ।

शुकेन समनुज्ञातो मत्समोऽयमिति प्रभो ।

अनुज्ञाय ततो राजा शक्तिं खड्गं तथा शरान् ॥

धनुश्च ददतां श्रेष्ठस्तालमात्रं महाप्रभम् ।

विपाठक्षुरनाराचान् गृध्रपत्रानलंकृतान् ॥

ददौ पार्थाय संहृष्टो महोरगसमप्रभान् ।

अवाप्य सर्वशस्त्राणि मुदितो वासवात्मजः ॥

मेने सर्वान् महीपालान् अपर्याप्तान् स्वतेजसः । भीमसेन गदा - संचालनमें पारंगत हुए और युधिष्ठिर तोमर फेंकनेमें । धैर्यवान् और शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ दोनों माद्रीपुत्र ढाल-तलवार चलानेकी कलामें निपुण हुए । परंतप सव्यसाची अर्जुन धनुर्वेदके पारगामी विद्वान् हुए । राजन्! जब दाताओंमें श्रेष्ठ शुकने जान लिया कि अर्जुन मेरे समान धनुर्वेदके ज्ञाता हो गये, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर शक्ति, खड्ग, बाण, ताड़के समान विशाल अत्यन्त चमकीला धनुष तथा विपाठ, क्षुर एवं नाराच

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अर्जुनको दिये । विपाठ आदि सभी प्रकारके बाण गीधकी पाँखोंसे युक्त तथा अलंकृत थे । वे देखनेमें बड़े - बड़े सर्पोंके समान जान पड़ते थे । इन सब अस्त्र - शस्त्रोंको पाकर इन्द्रपुत्र अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे यह अनुभव करने लगे कि भूमण्डलके कोई भी नरेश तेजमें मेरी समानता नहीं कर सकते । (एकवर्षान्तरास्त्वेवं परस्परमरिंदमाः । अन्ववर्धन्त पार्थाश्च माद्रीपुत्रौ तथैव च ॥ ) शत्रुदमन पाण्डवोंकी आयुमें परस्पर एक-एक वर्षका अन्तर था । कुन्ती और माद्री दोनों देवियोंके पुत्र दिन - दिन बढ़ने लगे ।

ते च पञ्च शतं चैव कुरुवंशविवर्धनाः ।

सर्वे ववृधुरल्पेन कालेनाप्स्विव नीरजाः ॥ ३२ ॥

फिर तो जैसे जलमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले जो एक सौ पाँच बालक हुए थे, वे सब थोड़े ही समयमें बढ़कर सयाने हो गये ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डवोत्पत्तौ त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डवोंकी उत्पत्तिविषयक एक सौ तेईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं )

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चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा पाण्डुकी मृत्यु और माद्रीका उनके साथ चितारोहण वैशम्पायन उवाच

दर्शनीयांस्ततः पुत्रान् पाण्डुः पञ्च महावने ।

तान् पश्यन् पर्वते रम्ये स्वबाहुबलमाश्रितः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस महान् वनमें रमणीय पर्वत -शिखरपर महाराज पाण्डु उन पाँचों दर्शनीय पुत्रोंको देखते हुए अपने बाहुबलके सहारे प्रसन्नतापूर्वक निवास करने लगे ॥ १ ॥

( पूर्णे चतुर्दशे वर्षे फाल्गुनस्य च धीमतः ।

तदा उत्तरफल्गुन्यां प्रवृत्ते स्वस्तिवाचने ॥

रक्ष विस्मृता कुन्ती व्यग्रा ब्राह्मणभोजने ।

पुरोहितेन सहिता ब्राह्मणान् पर्यवेषयत् ॥

तस्मिन् काले समाहूय माद्रीं मदनमोहितः । )

सुपुष्पितवने काले कदाचिन्मधुमाधवे ।

भूतसम्मोहने राजा सभार्यो व्यचरद् वनम् ॥२ ॥

एक दिनकी बात है, बुद्धिमान् अर्जुनका चौदहवाँ वर्ष पूरा हुआ था । उनकी जन्म-तिथिको उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें ब्राह्मणलोगोंने स्वस्तिवाचन प्रारम्भ किया । उस समय कुन्तीदेवीको महाराज पाण्डुकी देखभालका ध्यान न रहा । वे ब्राह्मणोंको भोजन करानेमें लग गयीं । पुरोहितके साथ स्वयं ही उनको रसोई परोसने लगीं । इसी समय काममोहित पाण्डु माद्रीको बुलाकर अपने साथ ले गये । उस समय चैत्र और वैशाखके महीनोंकी संधिका समय था, समूचा वन भाँति- भाँतिके सुन्दर पुष्पोंसे अलंकृत हो अपनी अनुपम शोभासे समस्त प्राणियोंको मोहित कर रहा था, राजा पाण्डु अपनी छोटी रानीके साथ वनमें विचरने लगे ॥ २ ॥

पलाशैस्तिलकैश्चतैश्चम्पकैः पारिभद्रकैः ।

अन्यैश्च बहुभिर्वृक्षैः फलपुष्पसमृद्धिभिः ॥ ३ ॥

जलस्थानैश्च विविधैः पद्मिनीभिश्च शोभितम् ।

पाण्डोर्वनं तत् सम्प्रेक्ष्य प्रजज्ञे हृदि मन्मथः ॥ ४ ॥

पलाश, तिलक, आम, चम्पा, पारिभद्रक तथा और भी बहुत-से वृक्ष फल-फूलोंकी समृद्धिसे भरे हुए थे, जो उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे । नाना प्रकारके जलाशयों तथा कमलोंसे सुशोभित उस वनकी मनोहर छटा देखकर राजा पाण्डुके मनमें कामका संचार हो गया ॥ ३-४ ॥

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प्रहृष्टमनसं तत्र विचरन्तं यथामरम् ।

तं माद्र्यनुजगामैका वसनं बिभ्रती शुभम् ॥ ५ ॥

वे मनमें हर्षोल्लास भरकर देवताकी भाँति वहाँ विचर रहे थे । उस समय माद्री सुन्दर वस्त्र पहने अकेली उनके पीछे - पीछे जा रही थी ॥ ५ ॥

समीक्षमाणः स तु तां वयःस्थां तनुवाससम् ।

तस्य कामः प्रववृधे गहनेऽग्निरिवोद्गतः ॥ ६ ॥

वह युवावस्थासे युक्त थी और उसके शरीरपर झीनी- झीनी साड़ी सुशोभित थी । उसकी ओर देखते ही पाण्डुके मनमें कामनाकी आग जल उठी, मानो घने वनमें दावाग्नि प्रज्वलित हो उठी हो ॥ ६ ॥

रहस्येकां तु तां दृष्ट्वा राजा राजीवलोचनाम् ।

न शशाक नियन्तुं तं कामं कामवशीकृतः ॥ ७ ॥

एकान्त प्रदेशमें कमलनयनी माद्रीको अकेली देखकर राजा कामका वेग रोक न सके, वे पूर्णतः कामदेवके अधीन हो गये थे ॥ ७ ॥

तत एनां बलाद् राजा निजग्राह रहो गताम् ।

वार्यमाणस्तया देव्या विस्फुरन्त्या यथाबलम् ॥ ८ ॥

अतः एकान्तमें मिली हुई माद्रीको महाराज पाण्डुने बलपूर्वक पकड़ लिया । देवी माद्री राजाकी पकड़से छूटनेके लिये यथाशक्ति चेष्टा करती हुई उन्हें बार- बार रोक रही थी ॥ ८ ॥

स तु कामपरीतात्मा तं शापं नान्वबुध्यत ।

माद्रीं मैथुनधर्मेण सोऽन्वगच्छद् बलादिव ॥ ९ ॥

जीवितान्ताय कौरव्य मन्मथस्य वशं गतः ।

शापजं भयमुत्सृज्य विधिना सम्प्रचोदितः ॥ १० ॥

परंतु उनके मनपर तो कामका वेग सवार था; अतः उन्होंने मृगरूपधारी मुनिसे प्राप्त हुए शापका विचार नहीं किया । कुरुनन्दन जनमेजय! वे कामके वशमें हो गये थे, इसलिये प्रारब्धसे प्रेरित हो शापके भयकी अवहेलना करके स्वयं ही अपने जीवनका अन्त करनेके लिये बलपूर्वक मैथुन करनेकी इच्छा रखकर माद्रीसे लिपट गये ॥ ९ -१० ॥

तस्य कामात्मनो बुद्धिः साक्षात् कालेन मोहिता ।

सम्प्रमथ्येन्द्रियग्रामं प्रणष्टा सह चेतसा ॥ ११ ॥

साक्षात् कालने कामात्मा पाण्डुकी बुद्धि मोह ली थी । उनकी बुद्धि सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मथकर विचार- शक्तिके साथ - साथ स्वयं भी नष्ट हो गयी थी ॥ ११ ॥

स तया सह संगम्य भार्यया कुरुनन्दनः ।

पाण्डुः परमधर्मात्मा युयुजे कालधर्मणा ॥ १२ ॥

पृष्ठ 897

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कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले परम धर्मात्मा महाराज पाण्डु इस प्रकार अपनी धर्मपत्नी माद्रीसे समागम करके कालके गालमें पड़ गये ॥ १२ ॥

ततो माद्री समालिङ्गय राजानं गतचेतसम् ।

मुमोच दुःखजं शब्दं पुनः पुनरतीव हि ॥ १३ ॥

तब माद्री राजाके शवसे लिपटकर बार- बार अत्यन्त दुःखभरी वाणीमें विलाप करने लगी ॥ १३ ॥

सह पुत्रैस्ततः कुन्ती माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।

आजग्मुः सहितास्तत्र यत्र राजा तथागतः ॥ १४ ॥

इतनेमें ही पुत्रोंसहित कुन्ती और दोनों पाण्डुनन्दन माद्रीकुमार एक साथ उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ राजा पाण्डु मृतकावस्थामें पड़े थे ॥ १४ ॥

ततो माद्रयब्रवीद् राजन्नार्ता कुन्तीमिदं वचः ।

एकैव त्वमिहागच्छ तिष्ठन्त्वत्रैव दारकाः ॥ १५ ॥

जनमेजय! यह देख शोकातुर माद्रीने कुन्तीसे कहा- ' बहिन! आप अकेली ही यहाँ आयें । बच्चोंको वहीं रहने दें ' ॥ १५ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्यास्तत्रैवाधाय दारकान् ।

हताहमिति विक्रुश्य सहसैवाजगाम सा ॥ १६ ॥

माद्रीका यह वचन सुनकर कुन्तीने सब बालकोंको वहीं रोक दिया और ' हाय! मैं मारी गयी' इस प्रकार आर्तनाद करती हुई सहसा माद्रीके पास आ पहुँची ॥ १६ ॥

दृष्ट्वा पाण्डुं च माद्रीं च शयानौ धरणीतले ।

कुन्ती शोकपरीताङ्गी विललाप सुदुःखिता ॥ १७ ॥

आकर उसने देखा, पाण्डु और माद्री धरतीपर पड़े हुए हैं । यह देख कुन्तीके सम्पूर्ण शरीरमें शोकाग्नि व्याप्त हो गयी और वह अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी - ॥ १७ ॥

रक्ष्यमाणो मया नित्यं वीरः सततमात्मवान् ।

कथं त्वामत्यतिक्रान्तः शापं जानन् वनौकसः ॥ १८ ॥

‘ माद्री! मैं सदा वीर एवं जितेन्द्रिय महाराजकी रक्षा करती आ रही थी । उन्होंने मृगके शापकी बात जानते हुए भी तुम्हारे साथ बलपूर्वक समागम कैसे किया? ॥ १८ ॥

ननु नाम त्वया माद्रि रक्षितव्यो नराधिपः ।

सा कथं लोभितवती विजने त्वं नराधिपम् ॥ १ ९ ॥

‘ माद्री! तुम्हें तो महाराजकी रक्षा करनी चाहिये थी । तुमने एकान्तमें उन्हें लुभाया क्यों? ॥ १ ९ ॥

कथं दीनस्य सततं त्वामासाद्य रहोगताम् ।

तं विचिन्तयतः शापं प्रहर्षः समजायत ॥ २० ॥

पृष्ठ 898

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‘ वे तो उस शापका चिन्तन करते हुए सदा दीन और उदास बने रहते थे, फिर तुझको एकान्तमें पाकर उनके मनमें कामजनित हर्ष कैसे उत्पन्न हुआ? ॥ २० ॥

धन्या त्वमसि बाह्लीकि मत्तो भाग्यतरा तथा ।

दृष्टवत्यसि यद् वक्त्रं प्रहृष्टस्य महीपतेः ॥ २१ ॥

'बाह्लीकराजकुमारी! तुम धन्य हो, मुझसे बड़भागिनी हो; क्योंकि तुमने हर्षोल्लाससे भरे हुए महाराजके मुखचन्द्रका दर्शन किया है ' ॥ २१ ॥

माद्र्युवाच

विलपन्त्या मया देवि वार्यमाणेन चासकृत् ।

आत्मा न वारितोऽनेन सत्यं दिष्टं चिकीर्षुणा ॥ २२ ॥

माद्री बोली - महारानी! मैंने रोते - बिलखते बार- बार महाराजको रोकनेकी चेष्टा की; परंतु वे तो उस शापजनित दुर्भाग्यको मोहके कारण मानो सत्य करना चाहते थे, इसलिये अपने - आपको रोक न सके ॥ २२ ॥

वैशम्पायन उवाच

( तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कुन्ती शोकाग्नितापिता ।

पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥

निश्चेष्टा पतिता भूमौ मोहान्नैव चचाल सा ॥

कुन्तीमुत्थाप्य माद्री च मोहेनाविष्टचेतनाम् ।

एह्येहीति तां कुन्तीं दर्शयामास कौरवम् ॥

पादयोः पतिता कुन्ती पुनरुत्थाय भूमिपम् ।

सस्मितेन तु वक्त्रेण गदन्तमिव भारत ।

परिरभ्य तदा मोहाद् विललापाकुलेन्द्रिया ॥

माद्री चापि समालिङ्गय राजानं विललाप सा ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! माद्रीका यह वचन सुनकर कुन्ती शोकाग्निसे संतप्त हो जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी और गिरते ही मूर्च्छा आ जानेके कारण निश्चेष्ट पड़ी रही, हिल- डुल भी न सकी । वह मूर्च्छावश अचेत हो गयी थी । माद्रीने उसे उठाया और कहा – ' बहिन! आइये, आइये! ' यों कहकर उसने कुन्तीको कुरुराज पाण्डुका दर्शन कराया । कुन्ती उठकर पुनः महाराज पाण्डुके चरणोंमें गिर पड़ी । महाराजके मुखपर मुसकराहट थी और ऐसा जान पड़ता था मानो वे अभी - अभी कोई बात कहने जा रहे हैं । उस समय मोहवश उन्हें हृदयसे लगाकर कुन्ती विलाप करने लगी । उसकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयी थीं । इसी प्रकार माद्री भी राजाका आलिंगन करके करुण विलाप करने लगी । तं तथाधिगतं पाण्डुमृषयः सह चारणैः ।

पृष्ठ 899

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अभ्येत्य सहिताः सर्वे शोकादश्रूण्यवर्तयन् ॥

अस्तं गतमिवादित्यं सुशुष्कमिव सागरम् ।

दृष्ट्वा पाण्डुं नरव्याघ्रं शोचन्ति स्म महर्षयः ॥

समानशोका ऋषयः पाण्डवाश्च बभूविरे ।

ते समाश्वासिते विप्रैः विलेपतुरनिन्दिते ॥

इस प्रकार मृत्यु - शय्यापर पड़े हुए पाण्डुके पास चारणोंसहित सभी ऋषि- मुनि जुट आये और शोकवश आँसू बहाने लगे । अस्ताचलको पहुँचे हुए सूर्य तथा एकदम सूखे हुए समुद्रकी भाँति नरश्रेष्ठ पाण्डुको देखकर सभी महर्षि शोकमग्न हो गये । उस समय ऋषियोंको तथा पाण्डुपुत्रोंको समानरूपसे शोकका अनुभव हो रहा था । ब्राह्मणोंने पाण्डुकी दोनों सती - साध्वी रानियोंको समझा- बुझाकर बहुत आश्वासन दिया, तो भी उनका विलाप बंद नहीं हुआ । कुन्त्युवाच हा राजन् कस्य नौ हित्वा गच्छसि त्रिदशालयम् ॥

हा राजन् मम मन्दायाः कथं माद्रीं समेत्य वै ।

निधनं प्राप्तवान् राजन् मद्भाग्यपरिसंक्षयात् ॥

युधिष्ठिरं भीमसेनमर्जुनं च यमावुभौ ।

कस्य हित्वा प्रियान् पुत्रान् प्रयातोऽसि विशाम्पते ॥

नूनं त्वां त्रिदशा देवाः प्रतिनन्दन्ति भारत । यथा हि तप उग्रं ते चरितं विप्रसंसदि ।

आवाभ्यां सहितो राजन् गमिष्यसि दिवं शुभम् ।

आजमीढाजमीढानां कर्मणा चरितां गतिम् ॥

कुन्ती बोली- हा! महाराज! आप हम दोनोंको किसे सौंपकर स्वर्गलोकमें जा रहे हैं । हाय! मैं कितनी भाग्यहीना हूँ । मेरे राजा! आप किसलिये अकेली माद्रीसे मिलकर सहसा कालके गालमें चले गये । मेरा भाग्य नष्ट हो जानेके कारण ही आज यह दिन देखना पड़ा है । प्रजानाथ! युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल सहदेव – इन प्यारे पुत्रोंको किसके जिम्मे छोड़कर आप चले गये? भारत! निश्चय ही देवता आपका अभिनन्दन करते होंगे; क्योंकि आपने ब्राह्मणोंकी मण्डलीमें रहकर कठोर तपस्या की है । अजमीढकुलनन्दन! आपके पूर्वजोंने पुण्य- कर्मोंद्वारा जिस गतिको प्राप्त किया है, उसी शुभ स्वर्गीय गतिको आप हम दोनों पत्नियोंके साथ प्राप्त करेंगे । वैशम्पायन उवाच ( विलपित्वा भृशं त्वेवं निःसंज्ञे पतिते भुवि । युधिष्ठिरमुखाः सर्वे पाण्डवा वेदपारगाः ।

पृष्ठ 900

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तेऽप्यागत्य पितुर्मूले निःसंज्ञाः पतिता भुवि ॥ पाण्डोः पादौ परिष्वज्य विलपन्ति स्म पाण्डवाः ॥ ) वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार अत्यन्त विलाप करके कुन्ती और माद्री दोनों अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं । युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डव वेदविद्यामें पारंगत हो चुके थे, वे भी पिताके समीप आकर संज्ञाशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े । सभी पाण्डव पाण्डुके चरणोंको हृदयसे लगाकर विलाप करने लगे । कुन्त्युवाच

अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम ।

अवश्यम्भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय ॥ २३ ॥

अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम् ।

उत्तिष्ठ त्वं विसृज्यैनमिमान् पालय दारकान् ॥ २४ ॥

अवाप्य पुत्राँल्लब्धात्मा वीरपत्नीत्वमर्थये । कुन्तीने कहा- माद्री! मैं इनकी ज्येष्ठ धर्मपत्नी हूँ, अतः धर्मके ज्येष्ठ फलपर भी मेरा ही अधिकार है । जो अवश्यम्भावी बात है, उससे मुझे मत रोको । मैं मृत्युके वशमें पड़े हुए अपने स्वामीका अनुगमन करूँगी । अब तुम इन्हें छोड़कर उठो और इन बच्चोंका पालन करो । पुत्रोंको पाकर मेरा लौकिक मनोरथ पूर्ण हो चुका है; अब मैं पतिके साथ दग्ध होकर वीरपत्नीका पद पाना चाहती हूँ ॥ २३-२४ ॥ माद्र्युवाच

अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम् ।

न हि तृप्तास्मि कामानां ज्येष्ठा मामनुमन्यताम् ॥ २५ ॥

माद्री बोली- रणभूमिसे कभी पीठ न दिखानेवाले अपने पतिदेवके साथ मैं ही जाऊँगी; क्योंकि उनके साथ होनेवाले कामभोगसे मैं तृप्त नहीं हो सकी हूँ । आप बड़ी बहिन हैं, इसलिये मुझे आपको आज्ञा प्रदान करनी चाहिये ॥ २५ ॥

मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद् भरतसत्तमः ।

तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने ॥ २६ ॥

ये भरतश्रेष्ठ मेरे प्रति आसक्त हो मुझसे समागम करके मृत्युको प्राप्त हुए हैं; अतः मुझे किसी प्रकार परलोकमें पहुँचकर उनकी उस कामवासनाकी निवृत्ति करनी चाहिये ॥ २६ ॥

न चाप्यहं वर्तयन्ती निर्विशेषं सुनेषु ते ।

वृत्तिमार्ये चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा च माम् ॥ २७ ॥

आर्ये! मैं आपके पुत्रोंके साथ अपने सगे पुत्रोंकी भाँति बर्ताव नहीं कर सकूँगी । उस दशामें मुझे पाप लगेगा ॥ २७ ॥