श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 901–910
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910
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तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् ।
मां च कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः ॥ २८ ॥
अतः आप ही जीवित रहकर मेरे पुत्रोंका भी अपने पुत्रोंके समान ही पालन कीजियेगा । इसके सिवा ये महाराज मेरी ही कामना रखकर मृत्युके अधीन हुए हैं ॥ २८ ॥
वैशम्पायन उवाच
(ऋषयस्तान् समाश्वास्य पाण्डवान् सत्यविक्रमान् ।
ऊचुः कुन्तीं च माद्रीं च समाश्वास्य तपस्विनः ॥
सुभगे बालपुत्रे तु न मर्तव्यं कथंचन ।
पाण्डवांश्चापि नेष्यामः कुरुराष्ट्रं परंतपान् ॥
अधर्मेष्वर्थजातेषु धृतराष्ट्रश्च लोभवान् ।
स कदाचिन्न वर्तेत पाण्डवेषु यथाविधि ॥
कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च ।
माद्र्याश्च बलिनां श्रेष्ठः शल्यो भ्राता महारथः ॥
भर्त्रा तु मरणं सार्धं फलवन्नात्र संशयः ।
युवाभ्यां दुष्करं चैतद् वदन्ति द्विजपुङ्गवाः ॥
मृते भर्तरि या साध्वी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता ।
यमैश्च नियमैः श्रान्ता मनोवाक्कायजैः शुभैः ॥
व्रतोपवासनियमैः कृच्छ्रश्चान्द्रायणादिभिः ।
भूशय्यां क्षारलवणवर्जनं चैकभोजनम् ॥
येन केनापि विधिना देहशोषणतत्परा ।
देहपोषणसंयुक्ता विषयैर्हृतचेतना ॥
देहव्ययेन नरकं महदाप्नोत्यसंशयः ।
तस्मात्संशोषयेद् देहं विषया नाशमाप्नुयुः ॥
भर्तारं चिन्तयन्ती सा भर्तारं निस्तरेच्छुभा ।
तारितश्चापि भर्ता स्यादात्मा पुत्रस्तथैव च ॥
तस्माज्जीवितमेवैतद् युवयोर्विद्म शोभनम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -तदनन्तर तपस्वी ऋषियोंने सत्यपराक्रमी पाण्डवोंको धीरज बँधाकर कुन्ती और माद्रीको भी आश्वासन देते हुए कहा - ' सुभगे! तुम दोनोंके पुत्र अभी बालक हैं, अतः तुम्हें किसी प्रकार देह त्याग नहीं करना चाहिये । हमलोग शत्रुदमन पाण्डवोंको कौरव राष्ट्रकी राजधानीमें पहुँचा देंगे । राजा धृतराष्ट्र अधर्ममय धनके लिये लोभ रखता है, अतः वह कभी पाण्डवोंके साथ यथायोग्य बर्ताव नहीं कर सकता । कुन्तीके रक्षक एवं सहायक वृष्णिवंशी और राजा कुन्तिभोज हैं तथा माद्रीके बलवानोंमें श्रेष्ठ
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महारथी शल्य उसके भाई हैं । इसमें संदेह नहीं कि पतिके साथ मृत्यु स्वीकार करना पत्नीके लिये महान् फलदायक होता है; तथापि तुम दोनोंके लिये यह कार्य अत्यन्त कठोर है, यह बात सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण कहते हैं । जो स्त्री साध्वी होती है, वह अपने पतिकी मृत्यु हो जानेके बाद ब्रह्मचर्यके पालनमें अविचलभावसे लगी रहती है, यम और नियमोंके पालनका क्लेश सहन करती है और मन, वाणी एवं शरीरद्वारा किये जानेवाले शुभ कर्मों तथा कृच्छ्रचान्द्रायणादि व्रत, उपवास और नियमोंका अनुष्ठान करती है । वह क्षार ( पापड़ आदि) और लवणका त्याग करके एक बार ही भोजन करती और भूमिपर शयन करती है । वह जिस किसी प्रकारसे अपने शरीरको सुखानेके प्रयत्नमें लगी रहती है । किंतु विषयोंके द्वारा नष्ट हुई बुद्धिवाली जो नारी देहको पुष्ट करनेमें ही लगी रहती है, वह तो इस ( दुर्लभ मनुष्य- ) शरीरको व्यर्थ ही नष्ट करके निःसंदेह महान् नरकको प्राप्त होती है । अतः साध्वी स्त्रीको उचित है कि वह अपने शरीरको सुखाये, जिससे सम्पूर्ण विषय -कामनाएँ नष्ट हो जायँ । इस प्रकार उपर्युक्त धर्मका पालन करनेवाली जो शुभलक्षणा नारी अपने पतिदेवका चिन्तन करती रहती है, वह अपने पतिका भी उद्धार कर देती है । इस तरह वह स्वयं अपनेको, अपने पतिको एवं पुत्रको भी संसारसे तार देती है । अतः हमलोग तो यही अच्छा मानते हैं कि तुम दोनों जीवन धारण करो ' । कुन्त्युवाच
यथा पाण्डोश्च निर्देशस्तथा विप्रगणस्य च ।
आज्ञा शिरसि निक्षिप्ता करिष्यामि च तत् तथा ॥
यथाऽऽहुर्भगवन्तो हि तन्मन्ये शोभनं परम् ।
भर्तुश्च मम पुत्राणां मम चैव न संशयः ॥
कुन्ती बोली- महात्माओ! हमारे लिये महाराज पाण्डुकी आज्ञा जैसे शिरोधार्य है, उसी प्रकार आप सब ब्राह्मणोंकी भी है । आपका आदेश मैं सिर माथे रखती हूँ । आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूंगी । पूज्यपाद विप्रगण जैसा कहते हैं, उसीको मैं अपने पति, पुत्रों तथा अपने - आपके लिये भी परम कल्याणकारी समझती हूँ— इसमें तनिक भी संशय नहीं है । माद्र्युवाच
कुन्ती समर्था पुत्राणां योगक्षेमस्य धारणे ।
अस्या हि न समा बुद्ध्या यद्यपि स्यादरुन्धती ॥
कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च ।
नाहं त्वमिव पुत्राणां समर्था धारणे तथा ॥
साहं भर्तारमन्वेष्ये अतृप्ता नन्वहं तथा ।
भर्तृलोकस्य तु ज्येष्ठा देवी मामनुमन्यताम् ॥
धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य सत्यधर्मस्य धीमतः
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पादौ परिचरिष्यामि तदार्ये ह्यनुमन्यताम् ॥ माद्रीने कहा – कुन्तीदेवी सभी पुत्रोंके योग- क्षेमके निर्वाहमें – पालन - पोषणमें समर्थ हैं । कोई भी स्त्री, चाहे वह अरुन्धती ही क्यों न हो, बुद्धिमें इनकी समानता नहीं कर सकती । वृष्णिवंशके लोग तथा महाराज कुन्तिभोज भी कुन्तीके रक्षक एवं सहायक हैं । बहिन! पुत्रोंके पालन- पोषणकी शक्ति जैसी आपमें है, वैसी मुझमें नहीं है । अतः मैं पतिका ही अनुगमन करना चाहती हूँ । पतिके संयोग- सुखसे मेरी तृप्ति भी नहीं हुई है । अतः आप बड़ी महारानीसे मेरी प्रार्थना है कि मुझे पतिलोकमें जानेकी आज्ञा दें । मैं वहीं धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और बुद्धिमान् पतिके चरणोंकी सेवा करूँगी । आर्ये! आप मेरी इस इच्छाका अनुमोदन करें । वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा महाराज मद्रराजसुता शुभा ।
ददौ कुन्त्यै यमौ माद्री शिरसाभिप्रणम्य च ॥
अभिवाद्य ऋषीन् सर्वान् परिष्वज्य च पाण्डवान् ।
मूर्क्युपाघ्राय बहुशः पार्थानात्मसुतौ तथा ॥
हस्ते युधिष्ठिरं गृह्य माद्री वाक्यमभाषत ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! यों कहकर मद्रदेशकी राजकुमारी सती- साध्वी माद्रीने कुन्तीको प्रणाम करके अपने दोनों जुड़वें पुत्र उन्हींको सौंप दिये । तत्पश्चात् उसने महर्षियोंको मस्तक नवाकर पाण्डवोंको हृदयसे लगा लिया और बारंबार कुन्तीके तथा अपने पुत्रोंके मस्तक सूँघकर युधिष्ठिरका हाथ पकड़कर कहा । माद्र्युवाच
कुन्ती माता अहं धात्री युष्माकं तु पिता मृतः ।
युधिष्ठिरः पिता ज्येष्ठश्चतुर्णां धर्मतः सदा ॥
वृद्धानुशासने सक्ताः सत्यधर्मपरायणाः ।
तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ॥
तस्मात् सर्वे कुरुध्वं वै गुरुवृत्तिमतन्द्रिताः ॥
माद्री बोली- बच्चो! कुन्तीदेवी ही तुम सबोंकी असली माता हैं, मैं तो केवल दूध पिलानेवाली धाय थी । तुम्हारे पिता तो मर गये । अब बड़े भैया युधिष्ठिर ही धर्मतः तुम चारों भाइयोंके पिता हैं । तुम सब बड़े - बूढ़ों– गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहना और सत्य एवं धर्मके पालनसे कभी मुँह न मोड़ना । ऐसा करनेवाले लोग कभी नष्ट नहीं होते और न कभी उनकी पराजय ही होती है । अतः तुम सब भाई आलस्य छोड़कर गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहना । वैशम्पायन उवाच
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ऋषीणां च पृथायाश्च नमस्कृत्य पुनः पुनः ।
आयासकृपणा माद्री प्रत्युवाच पृथां तथा ॥
धन्या त्वमसि वार्ष्णेयि नास्ति स्त्री सदृशी त्वया ।
वीर्यं तेजश्च योगं च माहात्म्यं च यशस्विनाम् ॥
कुन्ति द्रक्ष्यसि पुत्राणां पञ्चानाममितौजसाम् ।
ऋषीणां संनिधावेषां मया वागभ्युदीरिता ॥
स्वर्गं दिदृक्षमाणाया ममैषा न वृथा भवेत् ।
आर्या चाप्यभिवाद्या च मम पूज्या च सर्वतः ॥
ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वं देवि भूषिता स्वगुणैः शुभैः ।
अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि त्वया यादवनन्दिनि ॥
धर्मं स्वर्गं च कीर्तिं च त्वत्कृतेऽहमवाप्नुयाम् ।
यथा तथा विधत्स्वेह मा च कार्षीर्विचारणाम् ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! तत्पश्चात् माद्रीने ऋषियों तथा कुन्तीको बारंबार नमस्कार करके, क्लेशसे क्लान्त होकर कुन्तीदेवीसे दीनतापूर्वक कहा ——वृष्णिकुलनन्दिनि! आप धन्य हैं । आपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है; क्योंकि आपको इन अमिततेजस्वी तथा यशस्वी पाँचों पुत्रोंके बल, पराक्रम, तेज, योगबल तथा माहात्म्य देखनेका सौभाग्य प्राप्त होगा । मैंने स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा रखकर इन महर्षियोंके समीप जो यह बात कही है, वह कदापि मिथ्या न हो । देवि! आप मेरी गुरु, वन्दनीया तथा पूजनीया हैं; अवस्थामें बड़ी तथा गुणोंमें भी श्रेष्ठ हैं । समस्त नैसर्गिक सद्गुण आपकी शोभा बढ़ाते हैं । यादवनन्दिनि! अब मैं आपकी आज्ञा चाहती हूँ। आपके प्रयत्नद्वारा जैसे भी मुझे धर्म, स्वर्ग तथा कीर्तिकी प्राप्ति हो, वैसा सहयोग आप इस
अवसरपर करें । मनमें किसी दूसरे विचारको स्थान न दें ’ ।
बाष्पसंदिग्धया वाचा कुन्त्युवाच यशस्विनी ॥
अनुज्ञातासि कल्याणि त्रिदिवे संगमोऽस्तु ते ।
भर्त्रा सह विशालाक्षि क्षिप्रमद्यैव भामिनि ॥
संगता स्वर्गलोके त्वं रमेथाः शाश्वतीः समाः ॥ )
राज्ञः शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् ।
दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदार्ये प्रियं कुरु ॥ २ ९ ॥
तब यशस्विनी कुन्तीने बाष्पगद्गद वाणीमें कहा – ' कल्याणि! मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी । विशाललोचने! तुम्हें आज ही स्वर्गलोकमें पतिका समागम प्राप्त हो । भामिनि! तुम स्वर्गमें पतिसे मिलकर अनन्त वर्षोंतक प्रसन्न रहो । ' माद्री बोली- ' मेरे इस शरीरको महाराजके शरीरके साथ ही अच्छी प्रकार ढँककर दग्ध कर देना चाहिये । बड़ी बहिन! आप मेरा यह प्रिय कार्य कर दें ॥ २ ९ ॥
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दारकेष्वप्रमत्ता च भवेथाश्च हिता मम ।
अतोऽन्यन्न प्रपश्यामि संदेष्टव्यं हि किंचन ॥ ३० ॥
' मेरे पुत्रोंका हित चाहती हुई सावधान रहकर उनका पालन- पोषण करें। इसके सिवा दूसरी कोई बात मुझे आपसे कहनेयोग्य नहीं जान पड़ती ' ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्षभम् ।
मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद् यशस्विनी ॥ ३१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कुन्तीसे यह कहकर पाण्डुकी यशस्विनी धर्मपत्नी माद्री चिताकी आगपर रखे हुए नरश्रेष्ठ पाण्डुके शवके साथ स्वयं भी चितापर जा बैठी ॥ ३१ ॥
( ततः पुरोहितः स्नात्वा प्रेतकर्मणि पारगः ।
हिरण्यशकलान्याज्यं तिलान् दधि च तण्डुलान् ॥
उदकुम्भं सपरशुं समानीय तपस्विभिः ।
अश्वमेधाग्निमाहृत्य यथान्यायं समन्ततः ॥
काश्यपः कारयामास पाण्डोः प्रेतस्य तां क्रियाम् ॥
तदनन्तर प्रेतकर्मके पारंगत विद्वान् पुरोहित काश्यपने स्नान करके सुवर्णखण्ड, घृत, तिल, दही, चावल, जलसे भरा घड़ा और फरसा आदि वस्तुओंको एकत्र करके तपस्वी मुनियोंद्वारा अश्वमेधकी अग्नि मँगवायी और उसे चारों ओरसे चितासे छुलाकर यथायोग्य शास्त्रीय विधिसे पाण्डुका दाह - संस्कार करवाया ।
अहताम्बरसंवीतो भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
उदकं कृतवांस्तत्र पुरोहितमते स्थितः ॥
अर्हतस्तस्य कृत्यानि शतशृङ्गनिवासिनः । तापसा विधिवच्चक्रुश्चारणा ऋषिभिः सह II ) भाइयोंसहित निष्पाप युधिष्ठिरने नूतन वस्त्र धारण करके पुरोहितकी आज्ञाके अनुसार जलांजलि देनेका कार्य पूरा किया । शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियों और चारणोंने आदरणीय राजा पाण्डुके परलोक- सम्बन्धी सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न किये । इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डूपरमे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके परलोकगमनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५० श्लोक मिलाकर कुल ८१३ श्लोक हैं )
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पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना वैशम्पायन उवाच
पाण्डोरुपरमं दृष्ट्वा देवकल्पा महर्षयः ।
ततो मन्त्रविदः सर्वे मन्त्रयांचक्रिरे मिथः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा पाण्डुकी मृत्यु हुई देख वहाँ रहनेवाले, देवताओंके समान तेजस्वी सम्पूर्ण मन्त्रज्ञ महर्षियोंने आपसमें सलाह की ॥ १ ॥
तापसाऊचुः
हित्वा राज्यं च राष्ट्रं च स महात्मा महायशाः ।
अस्मिन् स्थाने तपस्तप्त्वा तापसाञ्शरणं गतः ॥ २ ॥
तपस्वी बोले — महान् यशस्वी महात्मा राजा पाण्डु अपना राज्य तथा राष्ट्र छोड़कर इस स्थानपर तपस्या करते हुए तपस्वी मुनियोंकी शरणमें रहते थे ॥ २ ॥
स जातमात्रान् पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह ।
प्रादायोपनिधिं राजा पाण्डुः स्वर्गमितो गतः ॥ ३ ॥
वे राजा पाण्डु अपनी पत्नी और नवजात पुत्रोंको आपलोगोंके पास धरोहर रखकर यहाँसे स्वर्गलोक चले गये ॥ ३ ॥
तस्येमानात्मजान् देहं भार्यां च सुमहात्मनः ।
स्वराष्ट्रं गृह्य गच्छामो धर्म एष हि नः स्मृतः ॥ ४ ॥
उनके इन पुत्रोंको, पाण्डु और माद्रीके शरीरोंकी अस्थियोंको तथा उन महात्मा नरेशकी महारानी कुन्तीको लेकर हमलोग उनकी राजधानीमें चलें । इस समय हमारे लिये यही धर्म प्रतीत होता है ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ते परस्परमामन्त्र्य देवकल्पा महर्षयः ।
पाण्डोः पुत्रान् पुरस्कृत्य नगरं नागसाह्वयम् ॥ ५ ॥
उदारमनसः सिद्धा गमने चक्रिरे मनः ।
भीष्माय पाण्डवान् दातुं धृतराष्ट्राय चैव हि ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार परस्पर सलाह करके उन देवतुल्य उदारचेता सिद्ध महर्षियोंने पाण्डवोंको भीष्म एवं धृतराष्ट्रके हाथों सौंप देनेके लिये पाण्डुपुत्रोंको आगे करके हस्तिनापुर नगरमें जानेका विचार किया ॥ ५-६ ॥
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तस्मिन्नेव क्षणे सर्वे तानादाय प्रतस्थिरे ।
पाण्डोर्दारांश्च पुत्रांश्च शरीरे ते च तापसाः ॥ ७ ॥
उन सब तपस्वी मुनियोंने पाण्डुपत्नी कुन्ती, पाँचों पाण्डवों तथा पाण्डु और माद्रीके शरीरकी अस्थियोंको साथ लेकर उसी क्षण वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ७ ॥
सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला ।
प्रपन्ना दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तदमन्यत ॥ ८ ॥
पुत्रोंपर सदा स्नेह रखनेवाली कुन्ती पहले बहुत सुख भोग चुकी थी, परंतु अब विपत्तिमें पड़कर बहुत लंबे मार्गपर चल पड़ी; तो भी उसने स्वदेश जानेकी उत्कण्ठा अथवा महर्षियोंके योगजनित प्रभावसे उस मार्गको अल्प ही माना ॥ ८ ॥
सा त्वदीर्घेण कालेन सम्प्राप्ता कुरुजाङ्गलम् ।
वर्धमानपुरद्वारमाससाद यशस्विनी ॥ ९ ॥
यशस्विनी कुन्ती थोड़े ही समयमें कुरुजांगल देशमें जा पहुँची और नगरके वर्धमान नामक द्वारपर गयी ॥ ९ ॥
द्वारिणं तापसा ऊचू राजानं च प्रकाशय ।
ते तु गत्वा क्षणेनैव सभायां विनिवेदिताः ॥ १० ॥
तब तपस्वी मुनियोंने द्वारपालसे कहा – ' राजाको हमारे आनेकी सूचना दो! ' द्वारपालने सभामें जाकर क्षणभरमें समाचार दे दिया ॥ १० ॥
तं चारणसहस्राणां मुनीनामागमं तदा ।
श्रुत्वा नागपुरे नृणां विस्मयः समपद्यत ॥ ११ ॥
सहस्रों चारणोंसहित मुनियोंका हस्तिनापुरमें आगमन सुनकर उस समय वहाँके लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ११ ॥
मुहूर्तोदित आदित्ये सर्वे बालपुरस्कृताः ।
सदारास्तापसान् द्रष्टुं निर्ययुः पुरवासिनः ॥ १२ ॥
दो घड़ी दिन चढ़ते चढ़ते समस्त पुरवासी स्त्रियों और बालकोंको साथ लिये तपस्वी मुनियोंका दर्शन करनेके लिये नगरसे बाहर निकल आये ॥ १२ ॥
स्त्रीसङ्घाः क्षत्रसङ्घाश्च यानसङ्घसमास्थिताः ।
ब्राह्मणैः सह निर्जग्मुर्ब्राह्मणानां च योषितः ॥ १३ ॥
झुंड- की- झुंड स्त्रियाँ और क्षत्रियोंके समुदाय अनेक सवारियोंपर बैठकर बाहर निकले । ब्राह्मणोंके साथ उनकी स्त्रियाँ भी नगरसे बाहर निकलीं ॥ १३ ॥
तथा विट्शूद्रसङ्घानां महान् व्यतिकरोऽभवत् ।
न कश्चिदकरोदीर्ष्यामभवन् धर्मबुद्धयः ॥ १४ ॥
शूद्रों और वैश्योंके समुदायका बहुत बड़ा मेला जुट गया । किसीके मनमें ईर्ष्याका भाव नहीं था । सबकी बुद्धि धर्ममें लगी हुई थी ॥ १४ ॥
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तथा भीष्मः शान्तनवः सोमदत्तोऽथ बाह्लिकः ।
प्रज्ञाचक्षुश्च राजर्षिः क्षत्ता च विदुरः स्वयम् ॥ १५ ॥
इसी प्रकार शन्तनुनन्दन भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, प्रज्ञाचक्षु राजर्षि धृतराष्ट्र, संजय तथा स्वयं विदुरजी भी वहाँ आ गये ॥ १५ ॥
सा च सत्यवती देवी कौसल्या च यशस्विनी ।
राजदारैः परिवृता गान्धारी चापि निर्ययौ ॥ १६ ॥
देवी सत्यवती, काशिराजकुमारी यशस्विनी कौसल्या तथा राजघरानेकी स्त्रियोंसे घिरी हुई गान्धारी भी अन्तःपुरसे निकलकर वहाँ आयीं ॥ १६ ॥
धृतराष्ट्रस्य दायादा दुर्योधनपुरोगमाः ।
भूषिता भूषणैश्चित्रैः शतसंख्या विनिर्ययुः ॥ १७ ॥
धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि सौ पुत्र विचित्र आभूषणोंसे विभूषित हो नगरसे बाहर निकले ॥ १७ ॥
तान् महर्षिगणान् दृष्ट्वा शिरोभिरभिवाद्य च ।
उपोपविविशुः सर्वे कौरव्याः सपुरोहिताः ॥ १८ ॥
उन महर्षियोंका दर्शन करके सबने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया । फिर सभी कौरव पुरोहितके साथ उनके समीप बैठ गये ॥ १८ ॥
तथैव शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य च ।
उपोपविविशुः सर्वे पौरा जानपदा अपि ॥ १ ९ ॥
इसी प्रकार नगर तथा जनपदके सब लोग भी धरतीपर माथा टेककर सबको अभिवादन और प्रणाम करके आसपास बैठ गये ॥ १ ९ ॥
तमकूजमभिज्ञाय जनौघं सर्वशस्तदा ।
पूजयित्वा यथान्यायं पाद्येनार्घेण च प्रभो ॥ २० ॥
भीष्मो राज्यं च राष्ट्रं च महर्षिभ्यो न्यवेदयत् ।
तेषामथो वृद्धतमः प्रत्युत्थाय जटाजिनी ।
ऋषीणां मतमाज्ञाय महर्षिरिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥
राजन्! उस समय वहाँ आये हुए समस्त जनसमुदायको चुपचाप बैठे देख भीष्मजीने पाद्य- अर्घ्य आदिके द्वारा सब महर्षियोंकी यथोचित पूजा करके उन्हें अपने राज्य तथा राष्ट्रका कुशल- समाचार निवेदन किया । तब उन महर्षियोंमें जो सबसे अधिक वृद्ध थे, वे जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले मुनि अन्य सब ऋषियोंकी अनुमति लेकर इस प्रकार बोले – ॥ २०-२१ ॥
यः स कौरव्य दायादः पाण्डुर्नाम नराधिपः ।
कामभोगान् परित्यज्य शतशृङ्गमितो गतः ॥ २२ ॥
( स यथोक्तं तपस्तेपे तत्र मूलफलाशनः ॥
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पत्नीभ्यां सह धर्मात्मा कंचित् कालमतन्द्रितः । तेन वृत्तसमाचारैस्तपसा च तपस्विनः । तोषितास्तापसास्तत्र शतशृङ्गनिवासिनः ॥ )
ब्रह्मचर्यव्रतस्थस्य तस्य दिव्येन हेतुना ।
साक्षाद् धर्मादयं पुत्रस्तत्र जातो युधिष्ठिरः ॥ २३ ॥
' कुरुनन्दन भीष्मजी! वे जो आपके पुत्र महाराज पाण्डु विषयभोगोंका परित्याग करके यहाँसे शतशृंग पर्वतपर चले गये थे, उन धर्मात्माने वहाँ फल- मूल खाकर रहते हुए सावधान रहकर अपनी दोनों पत्नियोंके साथ कुछ कालतक शास्त्रोक्त विधिसे भारी तपस्या की । उन्होंने अपने उत्तम आचार- व्यवहार और तपस्यासे शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियोंको संतुष्ट कर लिया था । वहाँ नित्य ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए महाराज पाण्डुको किसी दिव्य हेतुसे साक्षात् धर्मराजद्वारा यह पुत्र प्राप्त हुआ है, जिसका नाम युधिष्ठिर है ॥ २२-२३ ॥
तथैनं बलिनां श्रेष्ठं तस्य राज्ञो महात्मनः ।
मातरिश्वा ददौ पुत्रं भीमं नाम महाबलम् ॥ २४ ॥
‘ उसी प्रकार उन महात्मा राजाको साक्षात् वायु देवताने यह महाबली भीम नामक पुत्र प्रदान किया है, जो समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ है ॥ २४ ॥
पुरुहूतादयं जज्ञे कुन्त्यामेव धनंजयः ।
यस्य कीर्तिर्महेष्वासान् सर्वानभिभविष्यति ॥ २५ ॥
‘ यह तीसरा पुत्र धनंजय है, जो इन्द्रके अंशसे कुन्तीके ही गर्भसे उत्पन्न हुआ है । इसकी कीर्ति समस्त बड़े - बड़े धनुर्धरोंको तिरस्कृत कर देगी ॥ २५ ॥
यौ तु माद्री महेष्वासावसूत पुरुषोनमौ ।
अश्विभ्यां पुरुषव्याघ्राविमौ तावपि पश्यत ॥ २६ ॥
‘ माद्रीदेवीने अश्विनीकुमारोंसे जिन दो पुरुषरत्नोंको उत्पन्न किया है, वे ये ही दोनों
महाधनुर्धर नरश्रेष्ठ हैं । इन्हें भी आपलोग देखें ॥ २६ ॥
(नकुलः सहदेवश्च तावप्यमिततेजसौ । पाण्डवौ नरशार्दूलाविमावप्यपराजितौ ॥ )
चरता धर्मनित्येन वनवासं यशस्विना ।
नष्टः पैतामहो वंशः पाण्डुना पुनरुद्धृतः ॥ २७ ॥
' इनके नाम हैं नकुल और सहदेव। ये दोनों भी अनन्त तेजसे सम्पन्न हैं । ये नरश्रेष्ठ पाण्डुकुमार भी किसीसे परास्त होनेवाले नहीं हैं । नित्य धर्ममें तत्पर रहनेवाले यशस्वी राजा पाण्डुने वनमें निवास करते हुए अपने पितामहके उच्छिन्न वंशका पुनः उद्धार किया ॥ २७ ॥
पुत्राणां जन्मवृद्धिं च वैदिकाध्ययनानि च ।