महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 961–970

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970

पृष्ठ 961

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उन्होंने कौरवोंको गदायुद्ध, खड्ग चलाने तथा तोमर, प्रास और शक्तियोंके प्रयोगकी कला एवं एक ही साथ अनेक शस्त्रोंके प्रयोग अथवा अकेले ही अनेक शत्रुओंसे युद्ध करनेकी शिक्षा दी ॥ २ ९ ॥

तस्य तत् कौशलं श्रुत्वा धनुर्वेदजिघृक्षवः ।

राजानो राजपुत्राश्च समाजग्मुः सहस्रशः ॥ ३० ॥

द्रोणाचार्यका वह अस्त्रकौशल सुनकर सहस्रों राजा और राजकुमार धनुर्वेदकी शिक्षा लेनेके लिये वहाँ एकत्रित हो गये ॥ ३० ॥

ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः ।

एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह ॥ ३१ ॥

महाराज! तदनन्तर निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र एकलव्य द्रोणके पास आया ॥ ३१ ॥

न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन् ।

शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया ॥ ३२ ॥

परंतु उसे निषादपुत्र समझकर धर्मज्ञ आचार्यने धनुर्विद्याविषयक शिष्य नहीं बनाया ।

कौरवोंकी ओर दृष्टि रखकर ही उन्होंने ऐसा किया ॥ ३२ ॥

स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परंतपः ।

अरण्यमनुसम्प्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम् ॥ ३३ ॥

तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा ।

इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः ॥ ३४ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले एकलव्यने द्रोणाचार्यके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और वनमें लौटकर उनकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी तथा उसीमें आचार्यकी परमोच्च भावना रखकर उसने धनुर्विद्याका अभ्यास प्रारम्भ किया । वह बड़े नियमके साथ रहता था ॥ ३३-३४ ॥

परया श्रद्धयोपेतो योगेन परमेण च ।

विमोक्षादानसंधाने लघुत्वं परमाप सः ॥ ३५ ॥

आचार्यमें उत्तम श्रद्धा रखकर उत्तम और भारी अभ्यासके बलसे उसने बाणोंके छोड़ने, लौटाने और संधान करनेमें बड़ी अच्छी फुर्ती प्राप्त कर ली ॥ ३५ ॥

अथ द्रोणाभ्यनुज्ञाताः कदाचित् कुरुपाण्डवाः ।

रथैर्विनिर्ययुः सर्वे मृगयामरिमर्दन ॥ ३६ ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! तदनन्तर एक दिन समस्त कौरव और पाण्डव आचार्य द्रोणकी अनुमतिसे रथोंपर बैठकर ( हिंसक पशुओंका ) शिकार खेलनेके लिये निकले ॥ ३६ ॥

तत्रोपकरणं गृह्य नरः कश्चिद् यदृच्छया ।

पृष्ठ 962

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राजन्ननुजगामैकः श्वानमादाय पाण्डवान् ॥ ३७ ॥

इस कार्यके लिये आवश्यक सामग्री लेकर कोई मनुष्य स्वेच्छानुसार अकेला ही उन

पाण्डवोंके पीछे - पीछे चला । उसने साथमें एक कुत्ता भी ले रखा था ॥ ३७ ॥

तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्मचिकीर्षया ।

श्वा चरन् स वने मूढो नैषादिं प्रति जग्मिवान् ॥ ३८ ॥

वे सब अपना - अपना काम पूरा करनेकी इच्छासे वनमें इधर- उधर विचर रहे थे । उनका वह मूढ़ कुत्ता वनमें घूमता- घामता निषादपुत्र एकलव्यके पास जा पहुँचा ॥ ३८ ॥

स कृष्णं मलदिग्धाङ्गं कृष्णाजिनजटाधरम् ।

नैषादिं श्वा समालक्ष्य भषंस्तस्थौ तदन्तिके ॥ ३ ९ ॥

एकलव्यके शरीरका रंग काला था । उसके अंगोंमें मैल जम गया था और उसने काला मृगचर्म एवं जटा धारण कर रखी थी । निषादपुत्रको इस रूपमें देखकर वह कुत्ता भौं- भौं करके भूँकता हुआ उसके पास खड़ा हो गया ॥ ३ ९ ॥

तदा तस्याथ भषतः शुनः सप्त शरान् मुखे ।

लाघवं दर्शयन्नस्त्रे मुमोच युगपद् यथा ॥ ४० ॥

यह देख भीलने अपने अस्त्रलाघवका परिचय देते हुए उस भूँकनेवाले कुत्तेके मुखमें मानो एक ही साथ सात बाण मारे ॥ ४० ॥

स तु श्वा शरपूर्णास्यः पाण्डवानाजगाम ह ।

तं दृष्ट्वा पाण्डवा वीराः परं विस्मयमागताः ॥ ४१ ॥

उसका मुँह बाणोंसे भर गया और वह उसी अवस्थामें पाण्डवोंके पास आया । उसे देखकर पाण्डव वीर बड़े विस्मयमें पड़े ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 963

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लाघवं शब्दवेधित्वं दृष्ट्वा तत् परमं तदा ।

प्रेक्ष्य तं व्रीडिताश्चासन् प्रशशंसुश्च सर्वशः ॥ ४२ ॥

वह हाथकी फुर्ती और शब्दके अनुसार लक्ष्य बेधनेकी उत्तम शक्ति देखकर उस समय सब राजकुमार उस कुत्तेकी ओर दृष्टि डालकर लज्जित हो गये और सब प्रकारसे बाण मारनेवालेकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४२ ॥

तं ततोऽन्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम् ।

ददृशुः पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान् ॥ ४३ ॥

राजन्! तत्पश्चात् पाण्डवोंने उस वनवासी वीरकी वनमें खोज करते हुए उसे निरन्तर बाण चलाते हुए देखा ॥ ४३ ॥

न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम् ।

अथैनं परिपप्रच्छुः को भवान् कस्य वेत्युत ॥ ४४ ॥

उस समय उसका रूप बदल गया था । पाण्डव उसे पहचान न सके; अतः पूछने लगे —' तुम कौन हो, किसके पुत्र हो? ' ॥ ४४ ॥

एकलव्य उवाच निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुषः सुतम् ।

पृष्ठ 964

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द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम् ॥ ४५ ॥

एकलव्यने कहा –वीरो! आपलोग मुझे निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र तथा

द्रोणाचार्यका शिष्य जानें। मैंने धनुर्वेदमें विशेष परिश्रम किया है ॥ ४५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ते तमाज्ञाय तत्त्वेन पुनरागम्य पाण्डवाः ।

यथावृत्तं वने सर्वं द्रोणायाचख्युरद्भुतम् ॥ ४६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! वे पाण्डवलोग उस निषादका यथार्थ परिचय पाकर लौट आये और वनमें जो अद्भुत घटना घटी थी, वह सब उन्होंने द्रोणाचार्यसे कह सुनायी ॥ ४६ ॥

कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन् ।

रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत् ॥ ४७ ॥

जनमेजय! कुन्तीनन्दन अर्जुन बार- बार एकलव्यका स्मरण करते हुए एकान्तमें द्रोणसे मिलकर प्रेमपूर्वक यों बोले ॥ ४७ ॥

अर्जुन उवाच

तदाहं परिरभ्यैकः प्रीतिपूर्वमिदं वचः ।

भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्विशिष्टो भविष्यति ॥ ४८ ॥

अर्जुनने कहा – आचार्य! उस दिन तो आपने मुझ अकेलेको हृदयसे लगाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ यह बात कही थी कि मेरा कोई भी शिष्य तुमसे बढ़कर नहीं होगा ॥ ४८ ॥

अथ कस्मान्मद्विशिष्टो लोकादपि च वीर्यवान् ।

अन्योऽस्ति भवतः शिष्यो निषादाधिपतेः सुतः ॥ ४ ९ ॥

फिर आपका यह अन्य शिष्य निषादराजका पुत्र अस्त्र - विद्यामें मुझसे बढ़कर कुशल और सम्पूर्ण लोकसे भी अधिक पराक्रमी कैसे हुआ? ॥ ४ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच

मुहूर्तमिव तं द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्चयम् ।

सव्यसाचिनमादाय नैषादिं प्रति जग्मिवान् ॥ ५० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! आचार्य द्रोण उस निषादपुत्रके विषयमें दो घड़ीतक मानो कुछ सोचते -विचारते रहे; फिर कुछ निश्चय करके वे सव्यसाची अर्जुनको साथ ले उसके पास गये ॥ ५० ॥

ददर्श मलदिग्धाङ्गं जटिलं चीरवाससम् ।

एकलव्यं धनुष्याणिमस्यन्तमनिशं शरान् ॥ ५१ ॥

पृष्ठ 965

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वहाँ पहुँचकर उन्होंने एकलव्यको देखा, जो हाथमें धनुष ले निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहा था । उसके शरीरपर मैल जम गया था । उसने सिरपर जटा धारण कर रखी थी और वस्त्रके स्थानपर चिथड़े लपेट रखे थे ॥ ५१ ॥

एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमायान्तमन्तिकात् ।

अभिगम्योपसंगृह्य जगाम शिरसा महीम् ॥ ५२ ॥

इधर एकलव्यने आचार्य द्रोणको समीप आते देख आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और उनके दोनों चरण पकड़कर पृथ्वीपर माथा टेक दिया ॥ ५२ ॥

पूजयित्वा ततो द्रोणं विधिवत् स निषादजः ।

निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः ॥ ५३ ॥

फिर उस निषादकुमारने अपनेको शिष्यरूपसे उनके चरणोंमें समर्पित करके गुरु द्रोणकी विधिपूर्वक पूजा की और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया ॥ ५३ ॥

ततो द्रोणोऽब्रवीद् राजन्नेकलव्यमिदं वचः ।

यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम ॥ ५४ ॥

एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीयमाणोऽब्रवीदिदम् । राजन्! तब द्रोणाचार्यने एकलव्यसे यह बात कही- ' वीर! यदि तुम मेरे शिष्य हो तो

मुझे गुरुदक्षिणा दो ' ।

यह सुनकर एकलव्य बहुत प्रसन्न हुआ और इस प्रकार बोला ॥ ५४३ ॥

एकलव्य उवाच किं प्रयच्छामि भगवन्नाज्ञापयतु मां गुरुः ॥ ५५ ॥

न हि किंचिददेयं मे गुरवे ब्रह्मवित्तम । एकलव्यने कहा — भगवन्! मैं आपको क्या दूँ? स्वयं गुरुदेव ही मुझे इसके लिये आज्ञा दें । ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य! मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो गुरुके लिये अदेय हो ॥ ५५३ ॥

वैशम्पायन उवाच तमब्रवीत् त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति ॥ ५६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब द्रोणाचार्यने उससे कहा- ' तुम मुझे दाहिने हाथका अँगूठा दे दो ' ॥ ५६ ॥

एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम् ।

प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन् सत्ये च नियतः सदा ॥ ५७ ॥

तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः ।

छित्त्वाविचार्य तं प्रादाद् द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः ॥ ५८ ॥

पृष्ठ 966

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द्रोणाचार्यका यह दारुण वचन सुनकर सदा सत्यपर अटल रहनेवाले एकलव्यने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए पहले की ही भाँति प्रसन्नमुख और उदारचित्त रहकर बिना कुछ सोच - विचार किये अपना दाहिना अँगूठा काटकर द्रोणाचार्यको दे दिया ॥ ५७-५८ ॥ ( स सत्यसंधं नैषादिं दृष्ट्वा प्रीतोऽब्रवीदिदम् । एवं कर्तव्यमिति वा एकलव्यमभाषत ॥ )

ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत ।

न तथा च स शीघ्रोऽभूद् यथा पूर्वं नराधिप ॥ ५ ९ ॥

द्रोणाचार्य निषादनन्दन एकलव्यको सत्यप्रतिज्ञ देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने संकेतसे उसे यह बता दिया कि तर्जनी और मध्यमाके संयोगसे बाण पकड़कर किस प्रकार धनुषकी डोरी खींचनी चाहिये । तबसे वह निषादकुमार अपनी अँगुलियोंद्वारा ही बाणोंका संधान करने लगा । राजन्! उस अवस्थामें वह उतनी शीघ्रतासे बाण नहीं चला पाता था, जैसे पहले चलाया करता था ॥ ५ ९ ॥

ततोऽर्जुनः प्रीतमना बभूव विगतज्वरः ।

द्रोणश्च सत्यवागासीन्नान्योऽभिभवितार्जुनम् ॥ ६० ॥

पृष्ठ 967

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इस घटनासे अर्जुनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई । उनकी भारी चिन्ता दूर हो गयी । द्रोणाचार्यका भी वह कथन सत्य हो गया कि अर्जुनको दूसरा कोई पराजित नहीं कर सकता ॥ ६० ॥

द्रोणस्य तु तदा शिष्यौ गदायोग्यौ बभूवतुः ।

दुर्योधनश्च भीमश्च सदा संरब्धमानसौ ॥ ६१ ॥

उस समय द्रोणके दो शिष्य गदायुद्धमें सुयोग्य निकले - दुर्योधन और भीमसेन । ये दोनों सदा एक- दूसरेके प्रति मनमें क्रोध ( स्पर्द्धा ) से भरे रहते थे ॥ ६१ ॥

अश्वत्थामा रहस्येषु सर्वेष्वभ्यधिकोऽभवत् ।

तथाति पुरुषानन्यान् त्सारुकौ यमजावुभौ ॥ ६२ ॥

अश्वत्थामा धनुर्वेदके रहस्योंकी जानकारीमें सबसे बढ़- चढ़कर हुआ । नकुल और सहदेव दोनों भाई तलवारकी मूठ पकड़कर युद्ध करनेमें अत्यन्त कुशल हुए । वे इस कलामें अन्य सब पुरुषोंसे बढ़ - चढ़कर थे ॥ ६२ ॥

युधिष्ठिरो रथश्रेष्ठः सर्वत्र तु धनंजयः ।

प्रथितः सागरान्तायां रथयूथपयूथपः ॥ ६३ ॥

युधिष्ठिर रथपर बैठकर युद्ध करनेमें श्रेष्ठ थे। परंतु अर्जुन सब प्रकारकी युद्ध- कलाओंमें सबसे बढ़कर थे । वे समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीमें रथयूथपतियोंके भी यूथपतिके रूपमें प्रसिद्ध थे ॥ ६३ ॥

बुद्धियोगबलोत्साहैः सर्वास्त्रेषु च निष्ठितः ।

अस्त्रे गुर्वनुरागे च विशिष्टोऽभवदर्जुनः ॥ ६४ ॥

बुद्धि, मनकी एकाग्रता, बल और उत्साहके कारण वे सम्पूर्ण अस्त्र - विद्याओंमें प्रवीण हुए । अस्त्रोंके अभ्यास तथा गुरुके प्रति अनुरागमें भी अर्जुनका स्थान सबसे ऊँचा था ॥ ६४ ॥

तुल्येष्वस्त्रोपदेशेषु सौष्ठवेन च वीर्यवान् ।

एकः सर्वकुमाराणां बभूवातिरथोऽर्जुनः ॥ ६५ ॥

यद्यपि सबको समानरूपसे अस्त्र -विद्याका उपदेश प्राप्त होता था तो भी पराक्रमी अर्जुन अपनी विशिष्ट प्रतिभाके कारण अकेले ही समस्त कुमारोंमें अतिरथी हुए ॥ ६५ ॥

प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनंजयम् ।

धार्तराष्ट्रा दुरात्मानो नामृष्यन्त परस्परम् ॥ ६६ ॥

धृतराष्ट्रके पुत्र बड़े दुरात्मा थे । वे भीमसेनको बलमें अधिक और अर्जुनको अस्त्रविद्यामें प्रवीण देखकर परस्पर सहन नहीं कर पाते थे ॥ ६६ ॥

तांस्तु सर्वान् समानीय सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान् ।

द्रोणः प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुषर्षभः ॥ ६७ ॥

पृष्ठ 968

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जब सम्पूर्ण धनुर्विद्या तथा अस्त्र- संचालनकी कलामें वे सभी कुमार सुशिक्षित हो गये, तब नरश्रेष्ठ द्रोणने उन सबको एकत्र करके उनके अस्त्रज्ञानकी परीक्षा लेनेका विचार किया ॥ ६७ ॥

कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभिः कृतम् ।

अविज्ञातं कुमाराणां लक्ष्यभूतमुपादिशत् ॥ ६८ ॥

उन्होंने कारीगरोंसे एक नकली गीध बनवाकर वृक्षके अग्रभागपर रखवा दिया । राजकुमारोंको इसका पता नहीं था । आचार्यने उसी गीधको बींधनेयोग्य लक्ष्य बताया ॥ ६८ ॥

द्रोणउवाच

शीघ्रं भवन्तः सर्वेऽपि धनूंष्यादाय सर्वशः ।

भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठध्वं संधितेषवः ॥ ६ ९ ॥

द्रोण बोले- तुम सब लोग इस गीधको बींधनेके लिये शीघ्र ही धनुष लेकर उसपर बाण चढ़ाकर खड़े हो जाओ ॥ ६ ९ ॥

मद्वाक्यसमकालं तु शिरोऽस्य विनिपात्यताम् ।

एकैकशो नियोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रकाः ॥ ७० ॥

फिर मेरी आज्ञा मिलनेके साथ ही इसका सिर काट गिराओ । पुत्रो! मैं एक-एकको बारी - बारीसे इस कार्यमें नियुक्त करूँगा; तुमलोग मेरे बताये अनुसार कार्य करो ॥ ७० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो युधिष्ठिरं पूर्वमुवाचाङ्गिरसां वरः ।

संधत्स्व बाणं दुर्धर्ष मद्वाक्यान्ते विमुञ्च तम् ॥ ७१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर अंगिरागोत्रवाले ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ आचार्य द्रोणने सबसे पहले युधिष्ठिरसे कहा – ' दुर्धर्ष वीर! तुम धनुषपर बाण चढ़ाओ और मेरी आज्ञा मिलते ही उसे छोड़ दो ' ॥ ७१ ॥

ततो युधिष्ठिरः पूर्वं धनुर्गृह्य परंतपः ।

तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ॥ ७२ ॥

तब शत्रुओंको संताप देनेवाले युधिष्ठिर गुरुकी आज्ञासे प्रेरित हो सबसे पहले धनुष लेकर गीधको बींधनेके लिये लक्ष्य बनाकर खड़े हो गये ॥ ७२ ॥

ततो विततधन्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम् ।

स मुहूर्तादुवाचेदं वचनं भरतर्षभ ॥ ७३ ॥

भरतश्रेष्ठ! तब धनुष तानकर खड़े हुए कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे दो घड़ी बाद आचार्य द्रोणने इस प्रकार कहा— ॥ ७३ ॥

पश्यैनं तं द्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज ।

पृष्ठ 969

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पश्यामीत्येवमाचार्यं प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ॥ ७४ ॥

‘ राजकुमार! वृक्षकी शिखापर बैठे हुए इस गीधको देखो । ' तब युधिष्ठिरने आचार्यको उत्तर दिया— ‘ भगवन्! मैं देख रहा हूँ' ॥ ७४ ॥

स मुहूर्तादिव पुनर्द्रोणस्तं प्रत्यभाषत ।

मानो दो घड़ी और बिताकर द्रोणाचार्य फिर उनसे बोले ॥ ७४३ ॥

द्रोणउवाच अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातॄन् वापि प्रपश्यसि ॥ ७५ ॥

द्रोणने कहा-क्या तुम इस वृक्षको, मुझको अथवा अपने भाइयोंको भी देखते हो? ॥ ७५ ॥

तमुवाच स कौन्तेयः पश्याम्येनं वनस्पतिम् ।

भवन्तं च तथा भ्रातॄन् भासं चेति पुनः पुनः ॥ ७६ ॥

यह सुनकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर उनसे इस प्रकार बोले- ' हाँ, मैं इस वृक्षको, आपको, अपने भाइयोंको तथा गीधको भी बारंबार देख रहा हूँ' ॥ ७६ ॥

तमुवाचापसर्पेति द्रोणोऽप्रीतमना इव ।

नैतच्छक्यं त्वया वेद्धुं लक्ष्यमित्येव कुत्सयन् ॥ ७७ ॥

उनका उत्तर सुनकर द्रोणाचार्य मन-ही-मन अप्रसन्न- से हो गये और उन्हें झिड़कते हुए बोले, ‘ हट जाओ यहाँसे, तुम इस लक्ष्यको नहीं बींध सकते ' ॥ ७७ ॥

ततो दुर्योधनादींस्तान् धार्तराष्ट्रान् महायशाः ।

तेनैव क्रमयोगेन जिज्ञासुः पर्यपृच्छत ॥ ७८ ॥

तदनन्तर महायशस्वी आचार्यने उसी क्रमसे दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंको भी उनकी परीक्षा लेनेके लिये बुलाया और उन सबसे उपर्युक्त बातें पूछीं ॥ ७८ ॥

अन्यांश्च शिष्यान् भीमादीन् राज्ञश्चैवान्यदेशजान् ।

तथा च सर्वे तत् सर्वं पश्याम इति कुत्सिताः ॥ ७ ९ ॥

उन्होंने भीम आदि अन्य शिष्यों तथा दूसरे देशके राजाओंसे भी, जो वहाँ शिक्षा पा रहे थे, वैसा ही प्रश्न किया । प्रश्नके उत्तरमें सभीने ( युधिष्ठिरकी भाँति ही ) कहा — ' हम सब कुछ देख रहे हैं । ' यह सुनकर आचार्यने उन सबको झिड़ककर हटा दिया ॥ ७९ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणशिष्यपरीक्षायामेकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आचार्यद्रोणके द्वाराशिष्योंकी परीक्षासे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ८० श्लोक हैं । )

पृष्ठ 970

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