महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 971–980
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980
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द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति वैशम्पायन उवाच
ततो धनंजयं द्रोणः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
त्वयेदानीं प्रहर्तव्यमेतल्लक्ष्यं विलोक्यताम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर द्रोणाचार्यने अर्जुनसे मुसकराते हुए
कहा — ‘ अब तुम्हें इस लक्ष्यका वेध करना है । इसे अच्छी तरह देख लो ' ॥ १ ॥
मद्वाक्यसमकालं ते मोक्तव्योऽत्र भवेच्छरः ।
वितत्य कार्मुकं पुत्र तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ॥ २ ॥
‘ मेरी आज्ञा मिलनेके साथ ही तुम्हें इसपर बाण छोड़ना होगा। बेटा! धनुष तानकर खड़े हो जाओ और दो घड़ी मेरे आदेशकी प्रतीक्षा करो' ॥ २ ॥
एवमुक्तः सव्यसाची मण्डलीकृतकार्मुकः ।
तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ॥ ३ ॥
उनके ऐसा कहनेपर अर्जुनने धनुषको इस प्रकार खींचा कि वह मण्डलाकार ( गोल ) प्रतीत होने लगा । फिर वे गुरुकी आज्ञासे प्रेरित हो गीधकी ओर लक्ष्य करके खड़े हो गये ॥ ३ ॥
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मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत ।
पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि चार्जुन ॥ ४ ॥
मानो दो घड़ी बाद द्रोणाचार्यने उनसे भी उसी प्रकार प्रश्न किया- ' अर्जुन! क्या तुम उस वृक्षपर बैठे हुए गीधको, वृक्षको और मुझे भी देखते हो? ' ॥ ४ ॥
पश्याम्येकं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत ।
न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत ॥ ५ ॥
जनमेजय! यह प्रश्न सुनकर अर्जुनने द्रोणाचार्य से कहा- ' मैं केवल गीधको देखता हूँ । वृक्षको अथवा आपको नहीं देखता ' ॥ ५ ॥
ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः ।
प्रत्यभाषत दुर्धर्षः पाण्डवानां महारथम् ॥ ६ ॥
इस उत्तरसे द्रोणका मन प्रसन्न हो गया । मानो दो घड़ी बाद दुर्धर्ष द्रोणाचार्यने पाण्डव-महारथी अर्जुनसे फिर पूछा— ॥ ६ ॥
भासं पश्यसि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः ।
शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥
‘ वत्स! यदि तुम इस गीधको देखते हो तो फिर बताओ, उसके अंग कैसे हैं? ' अर्जुन बोले — ‘ मैं गीधका मस्तकभर देख रहा हूँ, उसके सम्पूर्ण शरीरको नहीं ' ॥ ७ ॥
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अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः ।
मुञ्चस्वेत्यब्रवीत् पार्थं स मुमोचाविचारयन् ॥ ८ ॥
अर्जुनके यों कहनेपर द्रोणाचार्यके शरीरमें ( हर्षातिरेकसे) रोमांच हो आया और वे अर्जुनसे बोले, ‘ चलाओ बाण '! अर्जुनने बिना सोचे - विचारे बाण छोड़ दिया ॥ ८ ॥
ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन च ।
शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः ॥ ९ ॥
फिर तो पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने चलाये हुए तीखे क्षुर नामक बाणसे वृक्षपर बैठे हुए उस गीधका मस्तक वेगपूर्वक काट गिराया ॥ ९ ॥
तस्मिन् कर्मणि संसिद्धे पर्यष्वजत पाण्डवम् ।
मेने च द्रुपदं संख्ये सानुबन्धं पराजितम् ॥ १० ॥
इस कार्यमें सफलता प्राप्त होनेपर आचार्यने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उन्हें यह विश्वास हो गया कि राजा द्रुपद युद्धमें अर्जुनद्वारा अपने भाई- बन्धुओंसहित अवश्य पराजित हो जायँगे ॥ १० ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः ।
जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर किसी समय आंगिरसवंशियोंमें उत्तम आचार्य द्रोण अपने शिष्योंके साथ गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये ॥ ११ ॥
अवगाढमथो द्रोणं सलिले सलिलेचरः ।
ग्राहो जग्राह बलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः ॥ १२ ॥
वहाँ जलमें गोता लगाते समय कालसे प्रेरित हो एक बलवान् जलजन्तु ग्राहने द्रोणाचार्यकी पिंडली पकड़ ली ॥ १२ ॥
स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान् सर्वानचोदयत् ।
ग्राहं हत्वा मोक्षयध्वं मामिति त्वरयन्निव ॥ १३ ॥
वे अपनेको छुड़ानेमें समर्थ होते हुए भी मानो हड़बड़ाये हुए अपने सभी शिष्योंसे बोले -' इस ग्राहको मारकर मुझे बचाओ ' ॥ १३ ॥
तद्वाक्यसमकालं तु बीभत्सुर्निशितैः शरैः ।
अवार्यैः पञ्चभिर्ग्राहं मग्नमम्भस्यताडयत् ॥ १४ ॥
उनके इस आदेशके साथ ही बीभत्सु ( अर्जुन ) ने पाँच अमोघ एवं तीखे बाणोंद्वारा पानीमें डूबे हुए उस ग्राहपर प्रहार किया ॥ १४ ॥
इतरे त्वथ सम्मूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे ।
तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् ॥ १५ ॥
विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत् तदा ।
स पार्थबाणैर्बहुधा खण्डशः परिकल्पितः ॥ १६ ॥
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ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः ।
अथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् ॥ १७ ॥
परंतु दूसरे राजकुमार हक्के -बक्के से होकर अपने - अपने स्थानपर ही खड़े रह गये । अर्जुनको तत्काल कार्यमें तत्पर देख द्रोणाचार्यने उन्हें अपने सब शिष्योंसे बढ़कर माना और उस समय वे उनपर बहुत प्रसन्न हुए । अर्जुनके बाणोंसे ग्राहके टुकड़े - टुकड़े हो गये और वह महात्मा द्रोणकी पिंडली छोड़कर मर गया । तब द्रोणाचार्यने महारथी महात्मा अर्जुनसे कहा— ॥ १५–१७ ॥
गृहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम् ॥ १८ ॥
‘ महाबाहो! यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र मैं तुम्हें प्रयोग और उपसंहारके साथ बता रहा हूँ। यह सब अस्त्रोंसे बढ़कर है तथा इसे धारण करना भी अत्यन्त कठिन है । तुम इसे ग्रहण करो ' ॥ १८ ॥
न च ते मानुषेष्वेतत् प्रयोक्तव्यं कथंचन ।
जगद् विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ॥ १ ९ ॥
‘ मनुष्योंपर तुम्हें इस अस्त्रका प्रयोग किसी भी दशामें नहीं करना चाहिये । यदि किसी अल्प तेजवाले पुरुषपर इसे चलाया गया तो यह उसके साथ ही समस्त संसारको भस्म कर सकता है ॥ १ ९ ॥
असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते ।
तद् धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम ॥ २० ॥
‘ तात! यह अस्त्र तीनों लोकोंमें असाधारण बताया गया है । तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर इस अस्त्रको धारण करो और मेरी यह बात सुनो ॥ २० ॥
बाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन ।
तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे ॥ २१ ॥
' वीर! यदि कोई अमानव शत्रु तुम्हें युद्धमें पीड़ा देने लगे तो तुम उसका वध करनेके लिये इस अस्त्रका प्रयोग कर सकते हो ' ॥ २१ ॥
तथेति सम्प्रतिश्रुत्य बीभत्सुः स कृताञ्जलिः ।
जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः ।
भविता त्वत्समो नान्यः पुमाँल्लोके धनुर्धरः ॥ २२ ॥
तब अर्जुनने ‘ तथास्तु ' कहकर वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्रको ग्रहण किया । उस समय गुरु द्रोणने अर्जुनसे पुनः यह बात कही — ' संसारमें दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान धनुर्धर न होगा ' ॥ २२ ॥
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणग्राहमोक्षणे द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणाचार्यका ग्राहसे छुटकारा नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥
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त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः राजकुमारोंका रंगभूमिमें अस्त्र- कौशल दिखाना वैशम्पायन उवाच
कृतास्त्रान् धार्तराष्ट्रांश्च पाण्डुपुत्रांश्च भारत ।
दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद् राजन् धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ १ ॥
कृपस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः ।
गाङ्गेयस्य च सांनिध्ये व्यासस्य विदुरस्य च ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! जब द्रोणने देखा कि धृतराष्ट्रके पुत्र तथा पाण्डव अस्त्र- विद्याकी शिक्षा समाप्त कर चुके, तब उन्होंने कृपाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान् बाह्लीक, गंगानन्दन भीष्म, महर्षि व्यास तथा विदुरजीके निकट राजा धृतराष्ट्रसे कहा- ॥ १-२ ॥
राजन् सम्प्राप्तविद्यास्ते कुमाराः कुरुसत्तम ।
ते दर्शयेयुः स्वां शिक्षां राजन्ननुमते तव ॥ ३ ॥
ततोऽब्रवीन्महाराजः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । ‘ राजन्! आपके कुमार अस्त्र - विद्याकी शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं । कुरुश्रेष्ठ! यदि आपकी
अनुमति हो तो वे अपनी सीखी हुई अस्त्र - संचालनकी कलाका प्रदर्शन करें' ।
यह सुनकर महाराज धृतराष्ट्र अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे बोले ॥ ३३ ॥
धृतराष्ट्रउवाच भारद्वाज महत् कर्म कृतं ते द्विजसत्तम ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – द्विजश्रेष्ठ भरद्वाजनन्दन! आपने ( राजकुमारोंको अस्त्रकी शिक्षा देकर) बहुत बड़ा कार्य किया है ॥ ४ ॥
यदानुमन्यसे कालं यस्मिन् देशे यथा यथा ।
तथा तथा विधानाय स्वयमाज्ञापयस्व माम् ॥ ५ ॥
आप कुमारोंकी अस्त्र- शिक्षाके प्रदर्शनके लिये जब जो समय ठीक समझें, जिस स्थानपर जिस - जिस प्रकारका प्रबन्ध आवश्यक मानें, उस-उस तरहकी तैयारी करनेके लिये स्वयं ही मुझे आज्ञा दें ॥ ५ ॥
स्पृहयाम्यद्य निर्वेदात् पुरुषाणां सचक्षुषाम् ।
अस्त्रहेतोः पराक्रान्तान् ये मे द्रक्ष्यन्ति पुत्रकान् ॥ ६ ॥
आज मैं नेत्रहीन होनेके कारण दुःखी होकर, जिनके पास आँखें हैं, उन मनुष्योंके सुख और सौभाग्यको पानेके लिये तरस रहा हूँ; क्योंकि वे अस्त्र- कौशलका प्रदर्शन करनेके लिये भाँति- भाँतिके पराक्रम करनेवाले मेरे पुत्रोंको देखेंगे ॥ ६ ॥
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क्षत्तर्यद् गुरुराचार्यो ब्रवीति कुरु तत् तथा ।
न हीदृशं प्रियं मन्ये भविता धर्मवत्सल ॥ ७ ॥
( आचार्यसे इतना कहकर राजा धृतराष्ट्र विदुरसे बोले – ) ' धर्मवत्सल! विदुर! गुरु द्रोणाचार्य जो काम जैसे कहते हैं, उसी प्रकार उसे करो । मेरी रायमें इसके समान प्रिय कार्य दूसरा नहीं होगा' ॥ ७ ॥
ततो राजानमामन्त्र्य निर्गतो विदुरो बहिः ।
भारद्वाजो महाप्राज्ञो मापयामास मेदिनीम् ॥ ८ ॥
तदनन्तर राजाकी आज्ञा लेकर विदुरजी ( आचार्य द्रोणके साथ) बाहर निकले । महाबुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोणने रंगमण्डपके लिये एक भूमि पसंद की और उसका माप करवाया ॥ ८ ॥
समामवृक्षां निर्गुल्मामुदक्प्रस्रवणान्विताम् ।
तस्यां भूमौ बलिं चक्रे तिथौ नक्षत्रपूजिते ॥ ९ ॥
अवघुष्टे समाजे च तदर्थं वदतां वरः ।
रङ्गभूमौ सुविपुलं शास्त्रदृष्टं यथाविधि ॥ १० ॥
प्रेक्षागारं सुविहितं चक्रुस्ते तस्य शिल्पिनः ।
राज्ञः सर्वायुधोपेतं स्त्रीणां चैव नरर्षभ ॥ ११ ॥
मञ्चांश्च कारयामासुस्तत्र जानपदा जनाः ।
विपुलानुच्छ्रयोपेतान् शिबिकाश्च महाधनाः ॥ १२ ॥
वह भूमि समतल थी । उसमें वृक्ष या झाड़- झंखाड़ नहीं थे । वह उत्तरदिशाकी ओर नीची थी । वक्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणने वास्तुपूजन देखनेके लिये डिण्डिम- घोष कराके वीरसमुदायको आमन्त्रित किया और उत्तम नक्षत्रसे युक्त तिथिमें उस भूमिपर वास्तुपूजन किया । तत्पश्चात् उनके शिल्पियोंने उस रंगभूमिमें वास्तु- शास्त्र के अनुसार विधिपूर्वक एक अति विशाल प्रेक्षागृहकी* नींव डाली तथा राजा और राजघरानेकी स्त्रियोंके बैठनेके लिये वहाँ सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंसे सम्पन्न बहुत सुन्दर भवन बनाया । जनपदके लोगोंने अपने बैठनेके लिये वहाँ ऊँचे और विशाल मंच बनवाये तथा (स्त्रियोंको लानेके लिये ) बहुमूल्य शिबिकाएँ तैयार करायीं ॥ ९ –१२ ॥
तस्मिंस्ततोऽहनि प्राप्ते राजा ससचिवस्तदा ।
भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा कृपं चाचार्यसत्तमम् ॥ १३ ॥
( बाह्लीकं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च । कुरूनन्यांश्च सचिवानादाय नगराद् बहिः ॥ )
मुक्ताजालपरिक्षिप्तं वैदूर्यमणिशोभितम् ।
शातकुम्भमयं दिव्यं प्रेक्षागारमुपागमत् ॥ १४ ॥
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तत्पश्चात् जब निश्चित दिन आया, तब मन्त्रियोंसहित राजा धृतराष्ट्र भीष्मजी तथा आचार्यप्रवर कृपको आगे करके बाह्लीक, सोमदत्त, भूरिश्रवा तथा अन्यान्य कौरवों और मन्त्रियोंको साथ ले नगरसे बाहर उस दिव्य प्रेक्षागृहमें आये । उसमें मोतियोंकी झालरें लगी थीं, वैदूर्यमणियोंसे उस भवनको सजाया गया था तथा उसकी दीवारोंमें स्वर्णखण्ड मढ़े गये थे ॥ १३-१४ ॥
गान्धारी च महाभागा कुन्ती च जयतां वर ।
स्त्रियश्च राज्ञः सर्वास्ताः सप्रेष्याः सपरिच्छदाः ॥ १५ ॥
हर्षादारुरुहुर्मञ्चान् मेरुं देवस्त्रियो यथा ।
ब्राह्मणक्षत्रियाद्यं च चातुर्वर्ण्यं पुराद् द्रुतम् ॥ १६ ॥
दर्शनेप्सु समभ्यागात् कुमाराणां कृतास्त्रताम् ।
क्षणेनैकस्थतां तत्र दर्शनेप्सु जगाम ह ॥ १७ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! परम सौभाग्यशालिनी गान्धारी, कुन्ती तथा राजभवनकी सभी स्त्रियाँ वस्त्राभूषणोंसे सज- धजकर दास- दासियों और आवश्यक सामग्रियोंके साथ उस भवनमें आयीं तथा जैसे देवांगनाएँ मेरुपर्वतपर चढ़ती हैं, उसी प्रकार वे हर्षपूर्वक मंचोंपर चढ़ गयीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि चारों वर्णोंके लोग कुमारोंका अस्त्र-कौशल देखनेकी इच्छासे तुरंत नगरसे निकलकर आ गये । क्षणभरमें वहाँ विशाल जनसमुदाय एकत्र हो गया ॥ १५–१७ ॥
प्रवादितैश्च वादित्रैर्जनकौतूहलेन च ।
महार्णव इव क्षुब्धः समाजः सोऽभवत् तदा ॥ १८ ॥
अनेक प्रकारके बाजोंके बजनेसे तथा मनुष्योंके बढ़ते हुए कौतूहलसे वह जनसमूह उस समय क्षुब्ध महासागरके समान जान पड़ता था ॥ १८ ॥
ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लयज्ञोपवीतवान् ।
शुक्लकेशः सितश्मश्रुः शुक्लमाल्यानुलेपनः ॥ १ ९ ॥
रंगमध्यं तदाऽऽचार्यः सपुत्रः प्रविवेश ह ।
नभो जलधरैर्हीनं साङ्गारक इवांशुमान् ॥ २० ॥
तदनन्तर श्वेत वस्त्र और श्वेत यज्ञोपवीत धारण किये आचार्य द्रोणने अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ रंगभूमिमें प्रवेश किया; मानो मेघरहित आकाशमें चन्द्रमाने मंगलके साथ पदार्पण किया हो । आचार्यके सिर और दाढ़ी - मूँछके बाल सफेद हो गये थे । वे श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत चन्दनसे सुशोभित हो रहे थे ॥ १ ९-२० ॥
स यथासमयं चक्रे बलिं बलवतां वरः ।
ब्राह्मणांस्तु सुमन्त्रज्ञान् कारयामास मङ्गलम् ॥ २१ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ द्रोणने यथासमय देवपूजा की और श्रेष्ठ मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंसे मंगलपाठ करवाया ॥ २१ ॥
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( सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राणि विविधानि च । प्रददौ दक्षिणां राजा द्रोणस्य च कृपस्य च || )
सुखपुण्यार्हघोषस्य पुण्यस्य समनन्तरम् ।
विविशुर्विविधं गृह्य शस्त्रोपकरणं नराः ॥ २२ ॥
उस समय राजा धृतराष्ट्रने सुवर्ण, मणि, रत्न तथा नाना प्रकारके वस्त्र आचार्य द्रोण और कृपको दक्षिणारूपमें दिये । फिर सुखमय पुण्याहवाचन तथा दान-होम आदि पुण्यकर्मोंके अनन्तर नाना प्रकारकी शस्त्र - सामग्री लेकर बहुत- से मनुष्योंने उस रंगमण्डपमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥
ततो बद्धाङ्गुलित्राणा बद्धकक्षा महारथाः ।
बद्धतूणाः सधनुषो विविशुर्भरतर्षभाः ॥ २३ ॥
उसके बाद भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ वे वीर राजकुमार बड़े - बड़े रथोंके साथ दस्ताने पहने, कमर कसे, पीठपर तूणीर बाँधे और धनुष लिये हुए उस रंगमण्डपके भीतर आये ॥ २३ ॥
अनुज्येष्ठं तु ते तत्र युधिष्ठिरपुरोगमाः ।
(रणमध्ये स्थितं द्रोणमभिवाद्य नरर्षभाः ।
पूजां चक्रुर्यथान्यायं द्रोणस्य च कृपस्य च ॥
नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि उन राजकुमारोंने जेठे -छोटेके क्रमसे स्थित हो उस रंगभूमिके मध्यभागमें बैठे हुए आचार्य द्रोणको प्रणाम करके द्रोण और कृप दोनों आचार्योंकी पूजायथोचित की ।
आशीर्भिश्च प्रयुक्ताभिः सर्वे संहृष्टमानसाः ।
अभिवाद्य पुनः शस्त्रान् बलिपुष्पैः समन्वितान् ॥
रक्तचन्दनसम्मिश्रैः स्वयमार्चन्त कौरवाः ।
रक्तचन्दनदिग्धाश्च रक्तमाल्यानुधारिणः ॥
सर्वे रक्तपताकाश्च सर्वे रक्तान्तलोचनाः ।
द्रोणेन समनुज्ञाता गृह्य शस्त्रं परंतपाः ॥
धनूंषि पूर्वं संगृह्य तप्तकाञ्चनभूषिताः ।
सज्यानि विविधाकारैः शरैः संधाय कौरवाः ॥
ज्याघोषं तलघोषं च कृत्वा भूतान्यपूजयन् । ) चक्रुरस्त्रं महावीर्याः कुमाराः परमाद्भुतम् ॥ २४ ॥
फिर उनसे आशीर्वाद पाकर उन सबका मन प्रसन्न हो गया । तत्पश्चात् पूजाके पुष्पोंसे आच्छादित अस्त्र- शस्त्रोंको प्रणाम करके कौरवोंने रक्त चन्दन और फूलोंद्वारा पुनः स्वयं उनका पूजन किया । वे सब- के - सब लाल चन्दनसे चर्चित तथा लाल रंगकी मालाओंसे विभूषित थे । सबके रथोंपर लाल रंगकी पताकाएँ थीं । सभीके नेत्रोंके कोने लाल रंगके थे । तदनन्तर तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित एवं शत्रुओंको संताप देनेवाले कौरव
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राजकुमारोंने आचार्य द्रोणकी आज्ञा पाकर पहले अपने अस्त्र एवं धनुष लेकर डोरी चढ़ायी और उसपर भाँति - भाँतिकी आकृतिके बाणोंका संधान करके प्रत्यंचाका टंकार करते और ताल ठोंकते हुए समस्त प्राणियोंका आदर किया । तत्पश्चात् वे महापराक्रमी राजकुमार वहाँ परम अद्भुत अस्त्र - कौशल प्रकट करने लगे ॥ २४ ॥
केचिच्छराक्षेपभयाच्छिरांस्यवननामिरे ।
मनुजा धृष्टमपरे वीक्षाञ्चक्रुः सुविस्मिताः ॥ २५ ॥
कितने ही मनुष्य बाण लग जानेके डरसे अपना मस्तक झुका देते थे । दूसरे लोग अत्यन्त विस्मित होकर बिना किसी भयके सब कुछ देखते थे ॥ २५ ॥
ते स्म लक्ष्याणि बिभिदुर्बाणैर्नामाङ्कशोभितैः ।
विविधैर्लाघवोत्सृष्टैरुह्यन्तो वाजिभिर्द्रुतम् ॥ २६ ॥
वे राजकुमार घोड़ोंपर सवार हो अपने नामके अक्षरोंसे सुशोभित और बड़ी फुर्तीके साथ छोड़े हुए नाना प्रकारके बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यवेध करने लगे ॥ २६ ॥
तत् कुमारबलं तत्र गृहीतशरकार्मुकम् ।
गन्धर्वनगराकारं प्रेक्ष्य ते विस्मिताभवन् ॥ २७ ॥
धनुष- बाण लिये हुए राजकुमारोंके उस समुदायको गन्धर्वनगरके समान अद्भुत देख वहाँ समस्त दर्शक आश्चर्यचकित हो गये ॥ २७ ॥
सहसा चुक्रुशुश्चान्ये नराः शतसहस्रशः ।
विस्मयोत्फुल्लनयनाः साधु साध्विति भारत ॥ २८ ॥
जनमेजय! सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें एक-एक जगह बैठे हुए लोग आश्चर्यचकित नेत्रोंसे देखते हुए सहसा ' साधु- साधु ( वाह -वाह) ' कहकर कोलाहल मचा देते थे ॥ २८ ॥
कृत्वा धनुषि ते मार्गान् रथचर्यासु चासकृत् ।
गजपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च नियुद्धे च महाबलः ॥ २ ९ ॥
उन महाबली राजकुमारोंने पहले धनुष - बाणके पैंतरे दिखाये । तदनन्तर रथ - संचालनके विविध मार्गों ( शीघ्र ले जाना, लौटा लाना, दायें, बायें और मण्डलाकार चलाना आदि ) -का अवलोकन कराया । फिर कुश्ती लड़ने तथा हाथी और घोड़ेकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेकी चातुरीका परिचय दिया ॥ २ ९ ॥
गृहीतखड्गचर्माणस्ततो भूयः प्रहारिणः ।
त्सरुमार्गान् यथोद्दिष्टांश्चेरुः सर्वासु भूमिषु ॥ ३० ॥
इसके बाद वे ढाल और तलवार लेकर एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए खड्ग चलानेके शास्त्रोक्त मार्ग ( ऊपर- नीचे और अगल- बगलमें घुमानेकी कला ) -का प्रदर्शन करने लगे । उन्होंने रथ, हाथी, घोड़े और भूमि – इन सभी भूमियोंपर यह युद्ध - कौशल दिखाया ॥ ३० ॥