महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 981–990

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 981–990

पृष्ठ 981

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लाघवं सौष्ठवं शोभां स्थिरत्वं दृढमुष्टिताम् ।

ददृशुस्तत्र सर्वेषां प्रयोगं खड्गचर्मणोः ॥ ३१ ॥

दर्शकोंने उन सबके ढाल-तलवारके प्रयोगोंको देखा । उस कलामें उनकी फुर्ती, चतुरता, शोभा, स्थिरता और मुट्ठीकी दृढ़ताका अवलोकन किया ॥ ३१ ॥

अथ तौ नित्यसंहृष्टौ सुयोधनवृकोदरौ ।

अवतीर्णौ गदाहस्तावेकशृङ्गाविवाचलौ ॥ ३२ ॥

तदनन्तर सदा एक- दूसरेको जीतनेका उत्साह रखनेवाले दुर्योधन और भीमसेन हाथमें गदा लिये रंगभूमिमें उतरे । उस समय वे एक-एक शिखरवाले दो पर्वतोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३२ ॥

बद्धकक्षौ महाबाहू पौरुषे पर्यवस्थितौ ।

बृंहन्तौ वासिताहेतोः समदाविव कुञ्जरौ ॥ ३३ ॥

वे दोनों महाबाहु कमर कसकर पुरुषार्थ दिखानेके लिये आमने - सामने डटकर खड़े थे और गर्जना कर रहे थे, मानो दो मतवाले गजराज किसी हथिनीके लिये एक- दूसरेसे भिड़ना चाहते और चिग्घाड़ते हों ॥ ३३ ॥

तौ प्रदक्षिणसव्यानि मण्डलानि महाबलौ ।

चेरतुर्मण्डलगतौ समदाविव कुञ्जरौ ॥ ३४ ॥

वे दोनों महाबली योद्धा अपनी- अपनी गदाको दायें - बायें मण्डलाकार घुमाते हुए दो मदोन्मत्त हाथियोंकी भाँति मण्डलके भीतर विचरने लगे ॥ ३४ ॥

विदुरो धृतराष्ट्राय गान्धार्याः पाण्डवारणिः ।

न्यवेदयेतां तत् सर्वं कुमाराणां विचेष्टितम् ॥ ३५ ॥

विदुर धृतराष्ट्रको और पाण्डव जननी कुन्ती गान्धारीको उन राजकुमारोंकी सारी चेष्टाएँ बताती जाती थीं ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वण्यस्त्रदर्शने त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अस्त्र-कौशलदर्शनविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७३ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं ) * जो उत्सव या नाटक आदिको सुविधापूर्वक देखनेके उद्देश्यसे बनाया गया हो, उसे प्रेक्षागृह या प्रेक्षाभवन कहते हैं ।

पृष्ठ 982

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चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन, दुर्योधन तथा अर्जुनके द्वारा अस्त्र - कौशलका प्रदर्शन वैशम्पायन उवाच

कुरुराजे हि रङ्गस्थे भीमे च बलिनां वरे ।

पक्षपातकृतस्नेहः स द्विधेवाभवज्जनः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! जब कुरुराज दुर्योधन और बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन रंगभूमिमें उतरकर गदायुद्ध कर रहे थे, उस समय दर्शक जनता उनके प्रति पक्षपातपूर्ण स्नेह करनेके कारण मानो दो दलोंमें बँट गयी ॥ १ ॥

ही वीर कुरुराजेति ही भीम इति जल्पताम् ।

पुरुषाणां सुविपुलाः प्रणादाः सहसोत्थिताः ॥ २ ॥

कुछ कहते, ‘ अहो! वीर कुरुराज कैसा अद्भुत पराक्रम दिखा रहे हैं । ' दूसरे बोल उठते, ‘ वाह! भीमसेन तो गजबका हाथ मारते हैं । ' इस तरहकी बातें करनेवाले लोगोंकी भारी आवाजें वहाँ सहसा सब ओर गूँजने लगीं ॥ २ ॥

ततः क्षुब्धार्णवनिभं रंगमालोक्य बुद्धिमान् ।

भारद्वाजः प्रियं पुत्रमश्वत्थामानमब्रवीत् ॥ ३ ॥

फिर तो सारी रंगभूमिमें क्षुब्ध महासागरके समान हलचल मच गयी । यह देख बुद्धिमान् द्रोणाचार्यने अपने प्रिय पुत्र अश्वत्थामासे कहा ॥ ३ ॥

द्रोणउवाच

वारयैतौ महावीर्यौ कृतयोग्यावुभावपि ।

मा भूद् रङ्गप्रकोपोऽयं भीमदुर्योधनोद्भवः ॥। ४ ॥

द्रोण बोले- वत्स! ये दोनों महापराक्रमी वीर अस्त्र -विद्यामें अत्यन्त अभ्यस्त हैं । तुम इन दोनोंको युद्धसे रोको, जिससे भीमसेन और दुर्योधनको लेकर रंगभूमिमें सब ओर क्रोध न फैल जाय ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच ( तत उत्थाय वेगेन अश्वत्थामा न्यवारयत् । गुरोराज्ञा भीम इति गान्धारे गुरुशासनम् । अलं योग्यकृतं वेगमलं साहसमित्युत ॥ )

ततस्तावुद्यतगदौ गुरुपुत्रेण वारितौ ।

युगान्तानिलसंक्षुब्धौ महावेलाविवार्णवौ ॥ ५ ॥

पृष्ठ 983

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वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर अश्वत्थामाने बड़े वेगसे उठकर भीमसेन और दुर्योधनको रोकते हुए कहा-' भीम! तुम्हारे गुरुकी आज्ञा है, गान्धारीनन्दन! आचार्यका आदेश है, तुम दोनोंका युद्ध बंद होना चाहिये । तुम दोनों ही योग्य हो, तुम्हारा एक - दूसरेके प्रति वेगपूर्वक आक्रमण अवांछनीय है । तुम दोनोंका यह दुःसाहस अनुचित है । अतः इसे बंद करो । ' इस प्रकार कहकर प्रलयकालीन वायुसे विक्षुब्ध उत्ताल तरंगोंवाले दो समुद्रोंकी भाँति गदा उठाये हुए दुर्योधन और भीमसेनको गुरुपुत्र अश्वत्थामाने युद्धसे रोक दिया ॥ ५ ॥

ततो रङ्गाङ्गणगतो द्रोणो वचनमब्रवीत् ।

निवार्य वादित्रगणं महामेघनिभस्वनम् ॥ ६ ॥

तत्पश्चात् द्रोणाचार्यने महान् मेघोंके समान कोलाहल करनेवाले बाजोंको बंद कराकर रंगभूमिमें उपस्थित हो यह बात कही- ॥ ६ ॥

यो मे पुत्रात् प्रियतरः सर्वशस्त्रविशारदः ।

ऐन्द्रिरिन्द्रानुजसमः स पार्थो दृश्यतामिति ॥ ७ ॥

‘ दर्शकगण! जो मुझे पुत्रसे भी अधिक प्रिय है, जिसने सम्पूर्ण शस्त्रोंमें निपुणता प्राप्त की है तथा जो भगवान् नारायणके समान पराक्रमी है, उस इन्द्रकुमार कुन्तीपुत्र अर्जुनका कौशल आपलोग देखें ' ॥ ७ ॥

आचार्यवचनेनाथ कृतस्वस्त्ययनो युवा ।

बद्धगोधाङ्गुलित्राणः पूर्णतूणः सकार्मुकः ॥ ८ ॥

काञ्चनं कवचं बिभ्रत् प्रत्यदृश्यत फाल्गुनः ।

सार्कः सेन्द्रायुधतडित् ससंध्य इव तोयदः ॥ ९ ॥

तदनन्तर आचार्यके कहनेसे स्वस्तिवाचन कराकर तरुण वीर अर्जुन गोहके चमड़ेके बने हुए हाथके दस्ताने पहने, बाणोंसे भरा तरकस लिये धनुषसहित रंगभूमिमें दिखायी दिये । वे श्याम शरीरपर सोनेका कवच धारण किये ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो सूर्य, इन्द्रधनुष, विद्युत् और संध्याकालसे युक्त मेघ शोभा पाता हो ॥ ८ - ९ ॥

ततः सर्वस्य रङ्गस्य समुत्पिञ्जलकोऽभवत् ।

प्रावाद्यन्त च वाद्यानि सशङ्खानि समन्ततः ॥ १० ॥

फिर तो समूचे रंगमण्डपमें हर्षोल्लास छा गया । सब ओर भाँति- भाँतिके बाजे और शंख बजने लगे ॥ १० ॥

एष कुन्तीसुतः श्रीमानेष मध्यमपाण्डवः ।

एष पुत्रो महेन्द्रस्य कुरूणामेष रक्षिता ॥ ११ ॥

एषोऽस्त्रविदुषां श्रेष्ठ एष धर्मभृतां वरः ।

एष शीलवतां चापि शीलज्ञाननिधिः परः ॥ १२ ॥

इत्येवं तुमुला वाचः शृण्वत्याः प्रेक्षकेरिताः ।

पृष्ठ 984

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कुन्त्याः प्रस्रवसंयुक्तैरस्रैः क्लिन्नमुरोऽभवत् ॥ १३ ॥

' ये कुन्तीके तेजस्वी पुत्र हैं। ये ही पाण्डुके मझले बेटे हैं । ये देवराज इन्द्रकी संतान हैं । ये ही कुरुवंशके रक्षक हैं । अस्त्र - विद्याके विद्वानोंमें ये सबसे उत्तम हैं । ये धर्मात्माओं और शीलवानोंमें श्रेष्ठ हैं । शील और ज्ञानकी तो ये सर्वोत्तम निधि हैं । ' उस समय दर्शकोंके मुखसे तुमुल ध्वनिके साथ निकली हुई ये बातें सुनकर कुन्तीके स्तनोंसे दूध और नेत्रोंसे स्नेहके आँसू बहने लगे । उन दुग्धमिश्रित आँसुओंसे कुन्तीदेवीका वक्षःस्थल भीग गया ॥ ११– १३ ॥

तेन शब्देन महता पूर्णश्रुतिरथाब्रवीत् ।

धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठो विदुरं हृष्टमानसः ॥ १४ ॥

वह महान् कोलाहल धृतराष्ट्रके कानोंमें भी गूंज उठा । तब नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र प्रसन्नचित्त होकर विदुरसे पूछने लगे – ॥ १४ ॥

क्षत्तः क्षुब्धार्णवनिभः किमेष सुमहास्वनः ।

सहसैवोत्थितो रङ्गे भिन्दन्निव नभस्तलम् ॥ १५ ॥

' विदुर! विक्षुब्ध महासागरके समान यह कैसा महान् कोलाहल हो रहा है? यह शब्द मानो आकाशको विदीर्ण करता हुआ रंगभूमिमें सहसा व्यक्त हो उठा है ' ॥ १५ ॥

विदुरउवाच

एष पार्थो महाराज फाल्गुनः पाण्डुनन्दनः ।

अवतीर्णः सकवचस्तत्रैष सुमहास्वनः ॥ १६ ॥

विदुरने कहा – महाराज! ये पाण्डुनन्दन अर्जुन कवच बाँधकर रंगभूमिमें उतरे हैं ।

इसी कारण यह भारी आवाज हो रही है ॥ १६ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि रक्षितोऽस्मि महामते ।

पृथारणिसमुद्भूतैस्त्रिभिः पाण्डववह्निभिः ॥ १७ ॥

धृतराष्ट्र बोले- महामते! कुन्तीरूपी अरणिसे प्रकट हुए इन तीनों पाण्डवरूपी अग्नियोंसे मैं धन्य हो गया । इन तीनोंके द्वारा मैं सर्वथा अनुगृहीत और सुरक्षित हूँ ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् प्रमुदिते रङ्गे कथंचित् प्रत्युपस्थिते ।

दर्शयामास बीभत्सुराचार्यायास्त्रलाघवम् ॥ १८ ॥

आग्नेयेनासृजद् वह्निं वारुणेनासृजत् पयः ।

वायव्येनासृजद् वायुं पार्जन्येनासृजद् घनान् ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 985

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वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार आनन्दातिरेकसे मुखरित हुआ वह रंगमण्डप जब किसी तरह कुछ शान्त हुआ, तब अर्जुनने आचार्यको अपनी अस्त्र-संचालनकी फुर्ती दिखानी आरम्भ की । उन्होंने पहले आग्नेयास्त्रसे आग पैदा की, फिर वारुणास्त्रसे जल उत्पन्न करके उसे बुझा दिया । वायव्यास्त्रसे आँधी चला दी और पर्जन्यास्त्रसे बादल पैदा कर दिये ॥ १८-१९ ॥

भौमेन प्राविशद् भूमिं पार्वतेनासृजद् गिरीन् ।

अन्तर्धानेन चास्त्रेण पुनरन्तर्हितोऽभवत् ॥ २० ॥

उन्होंने भौमास्त्रसे पृथ्वी और पार्वतास्त्रसे पर्वतोंको उत्पन्न कर दिया; फिर अन्तर्धानास्त्रके द्वारा वे स्वयं अदृश्य हो गये ॥ २० ॥

क्षणात् प्रांशुः क्षणाद् ह्रस्वः क्षणाच्च रथधूर्गतः ।

क्षणेन रथमध्यस्थः क्षणेनावतरन्महीम् ॥ २१ ॥

वे क्षणभरमें बहुत लंबे हो जाते और क्षणभरमें ही बहुत छोटे बन जाते थे । एक क्षणमें रथके धुरेपर खड़े होते तो दूसरे क्षण रथके बीचमें दिखायी देते थे । फिर पलक मारते - मारते पृथ्वीपर उतरकर अस्त्र - कौशल दिखाने लगते थे ॥ २१ ॥

सुकुमारं च सूक्ष्मं च गुरुं चापि गुरुप्रियः ।

सौष्ठवेनाभिसंक्षिप्तः सोऽविध्यद् विविधैः शरैः ॥ २२ ॥

अपने गुरुके प्रिय शिष्य अर्जुनने बड़ी फुर्ती और खूबसूरतीके साथ सुकुमार, सूक्ष्म और भारी निशानेको भी बिना हिलाये - डुलाये नाना प्रकारके बाणोंद्वारा बींध दिया ॥ २२ ॥

भ्रमतश्च वराहस्य लोहस्य प्रमुखे समम् ।

पञ्च बाणानसंयुक्तान् सम्मुमोचैकबाणवत् ॥ २३ ॥

रंगभूमिमें लोहेका बना हुआ सूअर इस प्रकार रखा गया था कि वह सब ओर चक्कर लगा रहा था । उस घूमते हुए सूअरके मुखमें अर्जुनने एक ही साथ एक बाणकी भाँति पाँच बाण मारे । वे पाँचों बाण एक- दूसरे से सटे हुए नहीं थे ॥ २३ ॥

गव्ये विषाणकोषे च चले रज्ज्ववलम्बिनि ।

निचखान महावीर्यः सायकानेकविंशतिम् ॥ २४ ॥

एक जगह गायका सींग एक रस्सीमें लटकाया गया था, जो हिल रहा था । महापराक्रमी अर्जुनने उस सींगके छेदमें लगातार इक्कीस बाण गड़ा दिये ॥ २४ ॥

इत्येवमादि सुमहत् खड्गे धनुषि चानघ ।

गदायां शस्त्रकुशलो मण्डलानि ह्यदर्शयत् ॥ २५ ॥

निष्पाप जनमेजय! इस प्रकार उन्होंने बड़ा भारी अस्त्र - कौशल दिखाया । खड्ग, धनुष और गदा आदिके भी शस्त्र- कुशल अर्जुनने अनेक पैंतरे और हाथ दिखलाये ॥ २५ ॥

ततः समाप्तभूयिष्ठे तस्मिन् कर्मणि भारत ।

पृष्ठ 986

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मन्दीभूते समाजे च वादित्रस्य च निःस्वने ॥ २६ ॥

द्वारदेशात् समुद्भूतो माहात्म्यबलसूचकः ।

वज्रनिष्पेषसदृशः शुश्रुवे भुजनिःस्वनः ॥ २७ ॥

भारत! इस प्रकार अस्त्र - कौशल दिखानेका अधिकांश कार्य जब समाप्त हो चला, मनुष्योंका कोलाहल और बाजे- गाजेका शब्द जब शान्त होने लगा, उसी समय दरवाजेकी ओरसे किसीका अपनी भुजाओंपर ताल ठोंकनेका भारी शब्द सुनायी पड़ा; मानो वज्र आपसमें टकरा रहे हों । वह शब्द किसी वीरके माहात्म्य तथा बलका सूचक था ॥ २६-२७ ॥

दीर्यन्ते किं नु गिरयः किंस्विद् भूमिर्विदीर्यते ।

किंस्विदापूर्यते व्योम जलधाराघनैर्घनैः ॥ २८ ॥

उसे सुनकर लोग कहने लगे, ' कहीं पहाड़ तो नहीं फट गये! पृथ्वी तो नहीं विदीर्ण हो गयी! अथवा जलकी धारासे परिपूर्ण घनीभूत बादलोंकी गम्भीर गर्जनासे आकाशमण्डल तो नहीं गूँज रहा है? ' ॥ २८ ॥

रङ्गस्यैवं मतिरभूत् क्षणेन वसुधाधिप ।

द्वारं चाभिमुखाः सर्वे बभूवुः प्रेक्षकास्तदा ॥ २ ९ ॥

राजन्! उस रंगमण्डपमें बैठे हुए लोगोंके मनमें क्षणभरमें उपर्युक्त विचार आने लगे ।

उस समय सभी दर्शक दरवाजेकी ओर मुँह घुमाकर देखने लगे ॥ २ ९ ॥

पञ्चभिर्भ्रातृभिः पार्थेद्रणः परिवृतो बभौ ।

पञ्चतारेण संयुक्तः सावित्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ३० ॥

इधर कुन्तीकुमार पाँचों भाइयोंसे घिरे हुए आचार्य द्रोण पाँच तारोंवाले हस्त नक्षत्रसे संयुक्त चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३० ॥

अश्वत्थाम्ना च सहितं भ्रातॄणां शतमूर्जितम् ।

दुर्योधनममित्रघ्नमुत्थितं पर्यवारयत् ॥ ३१ ॥

स तैस्तदा भ्रातृभिरुद्यतायुधै- र्गदाग्रपाणिः समवस्थितैर्वृतः । बभौ यथा दानवसंक्षये पुरा पुरन्दरो देवगणैः समावृतः ॥ ३२ ॥

शत्रुहन्ता बलवान् दुर्योधन भी उठकर खड़ा हो गया । अश्वत्थामासहित उसके सौ भाइयोंने आकर उसे चारों ओरसे घेर लिया । हाथोंमें आयुध उठाये खड़े हुए अपने भाइयोंसे घिरा हुआ गदाधारी दुर्योधन पूर्वकालमें दानवसंहारके समय देवताओंसे घिरे देवराज इन्द्रके समान शोभा पाने लगा ॥ ३१-३२ ॥

पृष्ठ 987

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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अस्त्रदर्शने चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अस्त्रदर्शनविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३४ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ३३३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 988

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पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः कर्णका रंगभूमिमें प्रवेश तथा राज्याभिषेक वैशम्पायन उवाच

दत्तेऽवकाशे पुरुषैर्विस्मयोत्फुल्ललोचनैः ।

विवेश रङ्गं विस्तीर्णं कर्णः परपुरंजयः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! आश्चर्यसे आँखें फाड़- फाड़कर देखते हुए द्वारपालोंने जब भीतर जानेका मार्ग दे दिया, तब शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले कर्णने उस विशाल रंगमण्डपमें प्रवेश किया ॥ १ ॥

सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलोद्योतिताननः ।

सधनुर्बद्धनिस्त्रिंशः पादचारीव पर्वतः ॥ २ ॥

उसने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए दिव्य कवचको धारण कर रखा था । दोनों कानोंके कुण्डल उसके मुखको उद्भासित कर रहे थे । हाथमें धनुष लिये और कमरमें तलवार बाँधे वह वीर पैरोंसे चलनेवाले पर्वतकी भाँति सुशोभित हो रहा था ॥ २ ॥

कन्यागर्भः पृथुयशाः पृथायाः पृथुलोचनः ।

तीक्ष्णांशोर्भास्करस्यांशः कर्णोऽरिगणसूदनः ॥ ३ ॥

कुन्तीने कन्यावस्थामें ही उसे अपने गर्भमें धारण किया था । उसका यश सर्वत्र फैला हुआ था। उसके दोनों नेत्र बड़े - बड़े थे। शत्रुसमुदायका संहार करनेवाला कर्ण प्रचण्ड किरणोंवाले भगवान् भास्करका अंश था ॥ ३ ॥

सिंहर्षभगजेन्द्राणां बलवीर्यपराक्रमः ।

दीप्तिकान्तिद्युतिगुणैः सूर्येन्दुज्वलनोपमः ॥ ४ ॥

उसमें सिंहके समान बल, साँड़के समान वीर्य तथा गजराजके समान पराक्रम था, वह दीप्तिसे सूर्य, कान्तिसे चन्द्रमा तथा तेजरूपी गुणसे अग्निके समान जान पड़ता था ॥ ४ ॥

प्रांशुः कनकतालाभः सिंहसंहननो युवा ।

असंख्येयगुणः श्रीमान् भास्करस्यात्मसम्भवः ॥ ५ ॥

उसका शरीर बहुत ऊँचा था, अतः वह सुवर्णमय ताड़के वृक्ष-सा प्रतीत होता था । उसके अंगोंकी गठन सिंह-जैसी जान पड़ती थी । उसमें असंख्य गुण थे । उसकी तरुण अवस्था थी । वह साक्षात् भगवान् सूर्यसे उत्पन्न हुआ था, अतः ( उन्हींके समान ) दिव्य शोभासे सम्पन्न था ॥ ५ ॥

स निरीक्ष्य महाबाहुः सर्वतो रङ्गमण्डलम् ।

प्रणामं द्रोणकृपयोर्नात्यादृतमिवाकरोत् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 989

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उस समय महाबाहु कर्णने रंगमण्डपमें सब ओर दृष्टि डालकर द्रोणाचार्य और कृपाचार्यको इस प्रकार प्रणाम किया, मानो उनके प्रति उसके मनमें अधिक आदरका भाव न हो ॥ ६ ॥

स समाजजनः सर्वो निश्चलः स्थिरलोचनः ।

कोऽयमित्यागतक्षोभः कौतूहलपरोऽभवत् ॥ ७ ॥

रंगभूमिमें जितने लोग थे, वे सब निश्चल होकर एकटक दृष्टिसे देखने लगे । यह कौन है,

यह जाननेके लिये उनका चित्त चंचल हो उठा । वे सब- के - सब उत्कण्ठित हो गये ॥ ७ ॥

सोऽब्रवीन्मेघगम्भीरस्वरेण वदतां वरः ।

भ्राता भ्रातरमज्ञातं सावित्रः पाकशासनिम् ॥ ८ ॥

इतनेमें ही वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूर्यपुत्र कर्ण, जो पाण्डवोंका भाई लगता था, अपने अज्ञात भ्राता इन्द्रकुमार अर्जुनसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोला- ॥ ८ ॥

पार्थ यत् ते कृतं कर्म विशेषवदहं ततः ।

करिष्ये पश्यतां नृणां माऽऽत्मना विस्मयं गमः ॥ ९ ॥

‘ कुन्तीनन्दन! तुमने इन दर्शकोंके समक्ष जो कार्य किया है, मैं उससे भी अधिक अद्भुत कर्म कर दिखाऊँगा । अतः तुम अपने पराक्रमपर गर्व न करो ' ॥ ९ ॥

असमाप्ते ततस्तस्य वचने वदतां वर ।

यन्त्रोत्क्षिप्त इवोत्तस्थौ क्षिप्रं वै सर्वतो जनः ॥ १० ॥

वक्ताओंमें श्रेष्ठ जनमेजय! कर्णकी बात अभी पूरी ही न हो पायी थी कि सब ओरके मनुष्य तुरंत उठकर खड़े हो गये, मानो उन्हें किसी यन्त्रसे एक साथ उठा दिया गया हो ॥ १० ॥

प्रीतिश्च मनुजव्याघ्र दुर्योधनमुपाविशत् ।

ह्रीश्च क्रोधश्च बीभत्सुं क्षणेनान्वाविवेश ह ॥ ११ ॥

नरश्रेष्ठ! उस समय दुर्योधनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और अर्जुनके चित्तमें क्षणभरमें लज्जा और क्रोधका संचार हो आया ॥ ११ ॥

ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः कर्णः प्रियरणः सदा ।

यत् कृतं तत्र पार्थेन तच्चकार महाबलः ॥ १२ ॥

तब सदा युद्धसे ही प्रेम करनेवाले महाबली कर्णने द्रोणाचार्यकी आज्ञा लेकर, अर्जुनने वहाँ जो - जो अस्त्र -कौशल प्रकट किया था, वह सब कर दिखाया ॥ १२ ॥

अथ दुर्योधनस्तत्र भ्रातृभिः सह भारत ।

कर्णं परिष्वज्य मुदा ततो वचनमब्रवीत् ॥ १३ ॥

भारत! तदनन्तर भाइयोंसहित दुर्योधनने वहाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ कर्णको हृदयसे लगाकर कहा ॥ १३ ॥

दुर्योधन उवाच

पृष्ठ 990

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स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद ।

अहं च कुरुराज्यं च यथेष्टमुपभुज्यताम् ॥ १४ ॥

दुर्योधन बोला – महाबाहो! तुम्हारा स्वागत है । मानद! तुम यहाँ पधारे, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है । मैं तथा कौरवोंका यह राज्य सब तुम्हारे हैं। तुम इनका यथेष्ट उपभोग करो ॥ १४ ॥

कर्णउवाच

कृतं सर्वमहं मन्ये सखित्वं च त्वया वृणे ।

द्वन्द्वयुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ १५ ॥

कर्णने कहा — प्रभो! आपने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा कर दिया, ऐसा मेरा विश्वास है । मैं आपके साथ मित्रता चाहता हूँ और अर्जुनके साथ मेरी द्वन्द्व- युद्ध करनेकी इच्छा है ॥ १५ ॥

दुर्योधन उवाच

भुङ्क्ष्व भोगान् मया सार्धं बन्धूनां पियकृद् भव ।

दुर्हृदां कुरु सर्वेषां मूर्ध्नि पादमरिंदम ॥ १६ ॥

दुर्योधन बोला— शत्रुदमन! तुम मेरे साथ उत्तम भोग भोगो । अपने भाई- बन्धुओंका प्रिय करो और समस्त शत्रुओंके मस्तकपर पैर रखो ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः क्षिप्तमिवात्मानं मत्वा पार्थोऽभ्यभाषत ।

कर्णं भ्रातृसमूहस्य मध्येऽचलमिव स्थितम् ॥ १७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय अर्जुनने अपने -आपको कर्णद्वारा तिरस्कृत- सा मानकर दुर्योधन आदि सौ भाइयोंके बीचमें अविचल से खड़े हुए कर्णको सम्बोधित करके कहा ॥ १७ ॥

अर्जुनउवाच

अनाहूतोपसृष्टानामनाहूतोपजल्पिनाम् ।

ये लोकास्तान् हतः कर्ण मया त्वं प्रतिपत्स्यसे ॥ १८ ॥

अर्जुन बोले- कर्ण! बिना बुलाये आनेवालों और बिना बुलाये बोलनेवालोंको जो ( निन्दनीय) लोक प्राप्त होते हैं, मेरे द्वारा मारे जानेपर तुम उन्हीं लोकोंमें जाओगे ॥ १८ ॥

कर्णउवाच

रङ्गोऽयं सर्वसामान्यः किमत्र तव फाल्गुन ।

वीर्यश्रेष्ठाश्च राजानो बलं धर्मोऽनुवर्तते ॥ १ ९ ॥