मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 241–250
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 241–250
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तीसरा अध्याय ब्राह्मण के हाथ में ही तीन आहुति देवे, हे ऋषियों का मत है ॥ २०६-२१२ ॥
अक्रोधनान् सुप्रसादान् वदन्त्येतान् पुरातनान्।
लोकस्याप्यायने युक्ताञ्छ्राद्धदेवान् द्विजोत्तमान्॥ २ ९ ३ ॥
अपसव्यमग्नौ कृत्वा सर्वमावृत्परिक्रमम् ।
अपसव्येन हस्तेन निर्वपेदुदकं भुवि ॥ २ ९ ४ ॥
त्रस्तु तस्माद्धविःशेषात्पिण्डान्कृत्वा समाहितः ।
दकेनैव विधिना निर्वपेद्दक्षिणामुखः ॥ २१५ ॥
क्रोधरहित, प्रसन्नचित्त, वृद्ध और लोक की वृद्धि में तत्पर, श्रेष्ठ ब्राह्मण श्राद्ध के पात्र होते हैं । अपसव्य होकर पितरों के निमित्त श्रग्नि में दो आहुति देकर श्रपसव्य ही पूर्व दिशा से दक्षिण को पिण्ड छोड़ने की भूमि पर जल छोड़े । हवन की बाक़ी सामग्रीके ऊपर कापिण्डतीनछोड़नापिण्ड चाहिएबनाकर ॥ दक्षिणमुख२१३-२१५ दाहने॥ हाथ- से कुश
न्युय पिडांस्ततस्तांस्तु प्रयतो विधिपूर्वकम्.....।
तेषु दर्भेषु तं हस्तं निमृज्याल्लेपभागिनाम्॥ २१६ ॥
आचम्यो परावृत्य त्रिरायम्य शनैरसून् ।
षड्ॠतूंश्च नमस्कुर्यात् पितृनेव च मन्त्रवित् ॥ २ ९ ७ ॥
उदकं निनयेच्छेषं शनैः पिण्डान्तिके पुनः ।
अवघेच तान्पिण्डान्यथान्युप्तान्समाहितः॥२१८॥
पिण्डेभ्यस्त्वल्पिक मात्रां समादायानुपूर्वशः ।
तानेव विप्रानासीनान् विधिवत्पूर्वमाशयेत् ॥ २१६ ॥
" पिण्डों के रखने के बाद वृद्ध प्रपितामह से लेकर ऊपरहाथके तीन लेपभागी पुरुषों की तृप्ति के लिए उन कुशों के पासहीधीरे से • धोवे । फिर उत्तराभिमुख आचमन और तीन प्राणायामे
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१०२ मनुस्मृति करके छ ऋतुओं को और पितरों को नमस्कार करें । फिर पिण्ड-दान के पात्र में शेष जल बचा हो उसको पिण्डों के पास धीरे. धीरे छोड़े और जिस क्रमसे पिण्डों को रक्खा था उसी क्रम से उठाकर सूंघे । पिण्डों में से थोड़ा थोड़ा भाग लेकर! प्रथम ब्राह्मणों को विधि से खिलावे अर्थात् जिस पिता के नि मित्त जो पिण्ड छोड़ा हो उस पिण्ड का भाग उसी पितर के. स्थान में बैठे हुए ब्राह्मण को खिलाना चाहिए ॥ २१६-२१६ ॥
प्रियमाणे तु पितरि पूर्वेषामेव निर्वपेत् ।
विप्रवद्वापि तं आहे स्वकं पितरमाशयेत् ॥ २२० ॥
पिता यस्य निवृत्तः स्याज्जीवेच्चापि पितामहः पितुः स नाम संकीर्त्य कीर्तयेत्प्रपितामहम् ॥ २२१ ॥
पितामहो वा तच्छ्राद्धं भुञ्जीतेत्यत्रवीन्मनुः ।
कामं वा समनुज्ञातः स्वयमेव समाचरेत् ॥ २२२ ॥
यदि पिता जीता हो तो श्राद्ध करनेवाला मरे हुए पितामह, श्रादि तीन पुरुषों का श्राद्ध करे या पितृ ब्राह्मण के स्थान में अपने पिता कोही भोजन करादे | जिसका पिता मरगया हो और 'पितामह जीता हो, वह पिता का नाम बोलकर प्रपितामह का... नाम वाले अर्थात् पिता और प्रपितामह दोनों का श्राद्ध करेः । या जीवित पितामह उस श्राद्ध का भोजन करे, यह मनुजी की आज्ञा 'है ' । अथवा श्राद्धकर्ता पितामह की आज्ञा से आपही प्रपितामह और वृद्धप्रपितामह का श्राद्ध करे ॥ २२०-२२२ ॥
तेषां दत्त्वा तु हस्तेषु सपवित्रं तिलोदकम् ।
तत्पिण्डाग्रं प्रयच्छेत स्वधैषामस्त्विति ब्रुवन् ॥ २२३
पाणिभ्यां तूपसंगृह्य स्वयमन्नस्य वर्द्धितम् ।
विप्रान्तिके पितॄन्ध्यायञ्छन कैरुपनिक्षिपेत् ॥ २२४
उभयोर्हस्तयोर्मुकं यदन्नमुपनीयते ।
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तीसरा अध्याय | १०३ तद्विप्रलुम्पन्त्यसुराः सहसा दुष्टचेतसः ॥ २२५ ॥
गुणांश्च सूपशाकाद्यान् पयो दधि घृतं मधु ।
विन्यसेत् प्रयतः पूर्वं भूमावेव समाहितः ॥ २२६ ॥
भक्ष्यं भोज्यं च विविधं मूलानि च फलानि च ।
हृद्यानि चैव मांसानि पानानि सुरभीणिच ॥ २२७ ॥
उपनीय तु तत्सर्वं शनकैः सुसमाहितः । तु परिवेषयेत प्रयतो गुणान्सर्वान् प्रचोदयन् ॥ २२८ ॥
उन निमन्त्रित ब्राह्मणों के हाथ में कुश और पिण्ड का भाग पिता श्रादि तीन ब्राह्मणों को ' पित्रेतिलोदकस्वधास्तुदेकर2 कहकर देवे । फिर अन्न का पात्र दोनों हाथ से उठाकरसेब्राह्मणोंअन्न न के पास लाकर धीरे से रख देवे । यदि दोनों लाया जाय तो दुष्ट राक्षस उसको हर लेते हैं - रसहाथोंचूसऔरलेते दूधहैं ।, श्राद्धकर्ता सावधानी से शाक, दाल आदि सब व्यञ्जनपर रखखे । दही, घी और मधु वगैरह पदार्थों कोफललाकर, मांस भूमि# और सुगन्धित भक्ष्य, भोज्य, भांति भांति के कंद,की प्रशंसा करके ब्राह्मणों को जल लाकर सब पदार्थों के गुणों परासे ॥ २२३-२२८ ॥
नास्त्रमापातयेज्जातु न कुप्येन्नानृतं वदेत् ।
न पादेन स्पृशेदन्नं न चैतदवधूनयेत् ॥ २२६ ॥
चाहिए । कोष न करे, श्राद्ध के दिन कभी आँसू न गिरानाछुवे और अन्न को उछालकर झूठ न बोले, पैर से अन्न२२६को ॥न भी न परोसना चाहिए ॥ एकदेशीमत है । शास की व्यवस्था * मांसपिण्ड की विधि वा निषेधसंसार में सब बातों को करनेवाले मौजूद हैं । सर्वदेशी है । प्रवृत्ति के अधीन होकर है । शास का रहस्य गहन है । इसलिए ऋषियों ने सब लिख दिया
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१०४ मनुस्मृति | अस्त्रं गमयति प्रेतान् कोपोऽननृतं शुनः । पादस्पर्शस्तु रक्षांसि दुष्कृतीनवधूननम् ॥ २३० ॥ '.
यद्यद्रोचेत विप्रेभ्यस्तत्तद्दद्यादमत्सरः ।
ब्रह्मोद्याच कथाः कुर्यात् पितृणामेतदीप्सितम् ॥२३१॥
स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्ये धर्मशास्त्राणि चैव हि ।
आख्यानानीतिहासांश्च पुराणान्यखिलानि च ॥ २३२॥
हर्षयेद्ब्राह्मणांस्तुष्टो भोजयेच्च शनैः शनैः ।
अन्नाद्येनासकृच्चैतान् गुणैश्च परिचोदयेत् ॥ २३३ ॥
आँसू गिराने से श्राद्धफल प्रेतों को होता है । कोप करने से शत्रुओं को, झूठ बोलने से कुत्तों को, पैर से ठोकर देने से राक्षसों को और उछालने से पापियों को फल पहुँचता है । जो जो पदार्थ ब्राह्मणों को प्रिय लगे उसको अच्छीतरह परोसे और ईश्वर सम्बन्धी कथाएं कहे, क्योंकि वह पितरों को प्रिय होती हैं । ब्रा- ह्मणों को वेद, धर्मशास्त्र, श्राख्यान, इतिहास, पुराण आदि सुनावे । खूब प्रसन्न करे, धीरे धीरे भोजन करावे और वारंवार पदार्थों के गुणवर्णन करके भोजन में उन लोगों को प्रवृत्त करे ॥ २३०-२३३ ॥
व्रतस्थमपि दौहित्रं श्राद्धे यत्नेन भोजयेत् ।
कुपतं चासने दद्यात्तिलैश्च विकिरेन्महीम् ॥ २३४ ॥
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः । त्रीणिप्रत्युष्णंचात्रसर्वमन्नंप्रशंसन्तिस्याद्भुञ्जरंस्तेशौचमक्रोधमत्वराम्च वाग्यताः॥ २३५। ॥: न च द्विजातयो ब्रूयुर्दात्रा प्रष्टा हविर्गुणान् ॥ २३६ ॥
दौहित्र --कन्या का पुत्र, ब्रह्मचर्य व्रत में भी हो, तोभी उसको. यत्न करके श्राद्ध मेंखिलावे । उसको बैठने के लिए कुपत लय के समीप का बना कम्बल देवे और श्राद्धभूमि में तिलछीट- हिमा-
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· तीसराअध्याय | १०५ देवे । श्राद्ध में दौहित्र, कुतप और तिल ये तीन पवित्र होते, पवित्रता क्रोध न करना और धीरज इन तीन बातों हैं । है । सब अन्न को खूब गरम रक्खे और उसको ब्राह्मणकी प्रशंसा होकर भोजन करें । यदि देनेवाला भोजन के गुण मौन ब्राह्मणों को न कहना चाहिए । अर्थात् भोजन के समयपूंछे तोव्यर्थ भी, चकवाद न करना चाहिए || २३४-२३६ ॥
यावदुष्णं भवत्यन्नं यावदश्नन्ति वाग्यताः ।
पितरस्तावदश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ २३७ ॥
यद्वेष्टितशिरा भुङ्क्ते यभुङ्क्ते दक्षिणामुखः ।
सोपानत्कश्च यद्भुङ्क्ते तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ २३८॥
चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च ।. रजस्वला च षण्ढश्च नेक्षेरन्नश्नतो द्विजान् ॥ २३६ ॥
होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते ।
दैवे कर्मणि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम् ॥ २४० ॥
घ्राणेन शूकरो हन्ति पक्षवातेन कुकुटः ॥
श्वा तु दृष्टिनिपातेन स्पर्शेनावरवर्णजः ॥ २४१ ॥
भोजनजबतककरतेअन्नहैं गरम भोजनरहता केहै गुणऔरनहींजबतकबयानमौनकिएहोकरजाते तबतकब्राह्मणही पितर अन्न ग्रहण करते हैं । जो शिर में वस्त्र बांधकर द क्षिणमुख होकर और जूता पहनकर खांता है, ऐसे भोजन का फल राक्षसों को पहुँचता है । चाण्डाल, शूकर, मुरग्रा, कुत्ता, रजस्वला स्त्री और नपुंसक ये लोग भोजन करते हुए ब्राह्मणों को नपितृकर्मदेखने मेंपावेंयदि। हवनचाण्डालमें, दानआदिमेंकी, ब्राह्मणभोजननज़र पड़े तोमेंवह, देवकर्मकर्म निष्फलमें से होजाता है । शकर सुंघने से, मुरगा पंख की हवा से, कुत्ता देखने और शुद्ध स्पर्श से श्राद्ध के न को दूषित करदेताहै । २३७-२४१॥ १४
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१०६ मनुस्मृति ।
खओ वा यदि वा कारण दातुः प्रेष्योऽपि वा भवेत् ।
हीनातिरिक्रगात्रो वा तमप्यपनयेत् पुनः ॥ २४२ ॥
ब्राह्मणं भिक्षुकं वापि भोजनार्थमुपस्थितम् ।
ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः शक्तितः प्रतिपूजयेत् ॥ २४३ ॥
श्राद्धकर्ता का सेवक भी यदि लूला, काना, या कम ज्यादा श्रङ्गवाला हो तो उसे भी ब्राह्मणभोजन के समय हटा देना चा- हिए । उस समय, यदि कोई ब्राह्मण वा भिक्षुक भोजन के लिए, श्रजाय तो ब्राह्मणों की श्राज्ञा से उसका भी भरशक श्रादर करना चाहिए ॥ २४२-२४३ ॥
सार्ववर्णिकमन्नाद्यं संनीयाप्लाव्य वारिणा ।
समुत्सृजेद्र्भुक्तवतामग्रतो विकिरेद्भुवि ॥ २४४ ॥
संस्कृतप्रमीतानां त्यागिनां कुलयोषिताम् । उच्छिष्टं भागधेयं स्याद्दर्भेषु विकिरश्च यः ॥ २४५ ॥ i उच्छेषणंदासवर्गस्यभूमिगतमजिह्मस्याशठस्यतत्पित्र्ये भागधेयं प्रचक्षतेच॥ । २४६ ॥
भोजन से बचा हुआ सब प्रकार का श्रन्न इकट्ठा करके जल से गीला करे और ब्राह्मणों के आगे रक्खे और थोड़ासा कुशों पर छीट देवे | यह कुर्शो पर विखेरा और जूँठा चचा अन्न विना सं- स्कार मृत वालक, त्यागी और कुलस्त्रियों का माना जाता है । श्राद्ध में भूमि पर पड़ा जूँठा अन सीधे सरल स्वभाव दासों को भाग है | २४४ - २४६ ॥
श्रसपिण्डक्रियाकर्म द्विजातेः संस्थितस्य तु ।
प्रदैवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत् ॥ २४७ ॥
स ह पिएडक्रियायां तु कृतायामस्य धर्मतः ।
मनयैवावृता कार्यं पिण्डनिर्वपरां सुतैः ॥ २४८ ॥
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•तीसरा अध्याय । . १०७
श्राद्धं भुक्त्वा य उच्छिष्टं वृषलाय प्रयच्छति ।
समूढो नरकं याति कालसूत्रमवाक्शिराः ॥ २४६ ॥
श्राद्धभुग्वृषलीतल्पं तदहर्योऽधिगच्छति ।
तस्याः पुरीषे तन्मासं पितरस्तस्य शेरते ॥ २५० ॥
द्विजातियों का जबतक सपिण्डीकरण न हो, तबतक उसका श्राद्ध वैश्वदेवरहित करे और उसमें एक ब्राह्मण को भोजन और एक पिण्ड देना चाहिए । मृत पुरुष का सपिण्डीकरण होजाने पर श्रमावास्या की श्राद्धविधि के अनुसार ही पुत्रों को पिण्डदान करना चाहिए । भोजन के बाद बच्चा जूँठा अन्न जो शुद्ध को देता है, वह मूर्ख नीचे शिर होकर कालसूत्र नरक को जाता है । जो श्राद्ध में भोजन करके उस दिन रात में स्त्रीसंग करता है, उसके पितर एक मालतक उसी स्त्री की विष्ठा में सोते हैं । २४७-२५० ॥
पृष्ट्वा स्वदितमित्येवं तृप्तानाचामयेत्ततः ।
आचान्तांश्चानुजानीयादभितोरम्यतामिति ॥ २५१ ॥
स्वास्त्वित्येव तं ब्रूयुर्ब्राह्मणास्तदनन्तरम् ।
स्वधाकारः पराह्याशीः सर्वेषु पितृकर्मसु ॥ २५२ ॥
ततो भुक्तवतां तेषामन्नशेषं निवेदयेत् । यथा ब्रूयुस्तथा कुर्यादनुज्ञातस्ततो द्विजैः ॥ २५३ ॥,
तृप्त हुए ब्राह्मणों से ' स्वदितम्' आपने खूब भोजन किया.? ऐसा पूंछे, फिर श्राचमन कराकर ' अभितो रम्यताम्' इच्छानु-सार पधारिए, यों कहकर विदा करे । उसके बाद ब्राह्मण C ' स्वधास्तु ' ऐसा कहें, क्योंकि सब पितृकमों में यह कहना परमबचा शीर्वाद मानाजाता है । भोजन किए ब्राह्मणों से जो अन्न हो उसको निवेदन करे और उन लोगों की आज्ञानुसार उसकी व्यवस्था करे ॥ २५१-२५३ ॥
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१०८ " मनुस्मृति ।
पित्र्ये स्वदितमित्येव वाच्यं गोष्टे तु सुश्रुतम् ।
संपन्नमित्यभ्युदये दैवे रुचितमित्यपि ॥ २५४ ॥
अपराह्णे तथा दर्भा वास्तुसंपादनं तिलाः ।
सृष्टिर्मृष्टिर्द्विजाश्चाग्रधाः श्राद्धकर्मसु संपदः ॥ २५५ ॥
'दर्भाः पवित्रं पूर्वाह्ने हविष्याणि च सर्वशः ।
पवित्रं यश्च पूर्वोक्तं विज्ञेया हव्यसंपदः ॥ २५६ ॥
मुन्यन्नानि पयः सोमो मांसं यच्चानुपस्कृतम् ।
अक्षारलवणं चैव प्रकृत्या हविरुच्यते ॥ २५७ ॥
माता पिताके एकोद्दिष्ट और पार्वणश्राद्ध में " स्वदितम्' 'गोष्टीश्राद्ध में ' सुश्रुतम्' वृद्धिश्राद्ध में ' सम्पन्नम् ' और देवकर्म में ' रुचितम्' ऐसा कहकर ब्राह्मणों से उनकी तृप्ति को पूंछ लेवे । अपराह्न काल, कुश, गोवर से लिपी भूमि, तिल, निःसंकोच भोजन देना, भोजन का स्वाद और पंक्तिपावन ब्राह्मण श्राद्ध कर्म में उत्तम गिना जाता है । कुश, वेदमंत्र, पूर्वाह्न काल, हवि का अन्न और पूर्वोक्त भूमि आदि की पवित्रता, ये सब देवकर्म की सम्पत्ति हैं । मुनियों का अन्न- नीवार श्रादि, दूध, सोमलता का रस, कंवा मांस, सेंधानमक, ये सब पदार्थ स्वभाव से ही हवि. कहलाते हैं ॥ २५४-१५७ ॥ विसृज्य ब्राह्मणांस्तांस्तु नियतो वाग्यतः शुचिः । • दक्षिणांदिशमाकाङ्क्षन्याचेतेमान्वरान्पितृन्॥ २५८॥
दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदाः संततिरेव च ।
श्रद्धाच नो मा व्यगमद्बहु देयं च नोऽस्त्विति ॥ २५६ ॥
एवं निर्वपणं कृत्वा पिण्डस्तांस्तदनन्तरम् ।
. गां विप्रमजमग्नि वा प्राशयेदप्सु वा क्षिपेत्॥ २६० ॥
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तीसरा अध्याय । उन निमन्त्रित ब्राह्मणों को विदा करके, सावधानी से स्नान करे और दक्षिण दिशा को खड़ा होकर, पितरों से इन घरों को • मांगे: -हमारे कुलं में दांता हों, वेदाभ्यास और सन्तान की वृद्धि हो, वैदिक कर्म से श्रद्धा दूर न हो और सुपात्रों को देने के लिए हमें बहुतसा धन मिले-इस प्रकार, श्राद्ध कर्म पूरा होने पर वह पिण्ड गौ, ब्राह्मण या चकरा को खिलादे, अथवा अग्नि या जल में डाल देवे ॥ २५८-२६० ॥:
पिण्डनिर्वणं केचित्पुरस्तादेव कुर्वते ।
वयोभिः खादयन्त्यन्ये प्रक्षिपन्त्यनलेऽप्सु वा ॥ २.६.१ ॥
पतिव्रता धर्मपत्नी पितृपूजनतत्परा ।
मध्यमं तु ततः पिण्डमंद्यात्सम्यक् सुतार्थिनी ॥२६२॥
आयुष्मन्तं सुतं सूते यशोमेधासमन्वितम् ।
तं प्रजावन्तं सात्विकं धार्मिकं तथा ॥ २६३ ॥
प्रक्षाल्य हस्तावाचम्यं ज्ञातिप्रायं प्रकल्पयेत् ।
:ज्ञातिभ्यः सत्कृतं दत्त्वा बान्धवानपि भोजयेत् ॥ २६४ ॥
कोई आचार्य ब्राह्मण भोजन के पहलेही पिण्डनिर्वपण कराते हैं, कोई पिण्ड पक्षियों को खिलाते हैं, कोई जल वा अग्नि में छोड़ "देते हैं । पतिव्रता स्त्री पुत्र की इच्छा से उन पिण्डों में से पितामह के मध्यम पिएंड को खा लेय । वह स्त्री श्रायुष्मान्धार्मिक, यशस्वीपुत्र को, बुद्धि-पैदा मान्, धनवान्, सन्तानवान्, सत्यगुणीबचाऔरहुआ न अपने जाति, करतीवालों कोहै ।औरफिरदूसरेदोनोंसम्बन्धियोंहाथ धोकरको भी खिलावे ॥ २६१-२६४ ॥ उच्छेषणंततो गृहबलिंतु तत्तिष्ठेद्यावद्विप्राकुर्यादिति धर्मो व्यवस्थितःविसर्जिताः ।॥ २६५ ॥
हविर्यच्चिरत्राय यच्चानन्त्याय कल्प्यते । ॥ पितृभ्यो विधिवदन्तं तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २६६
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* ११० मनुस्मृति ।
तिलैत्रीहियवैर्मापैरद्भिर्मूलफलेन वा ।
दत्तेन मासं तृप्यन्ति विधिवत् पितरो नृणाम् ॥ २६७॥
द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासान् हारिणेन तु ।
औरत्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै ॥ २६८ ॥
षण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेन च सप्त वै ।
अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवैव तु ॥ २६६ ॥
दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः । शशकूर्मयोस्तु मांसेन मासानेकादशैव तु ॥ २७० ॥: संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च । वाणस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥ २७ ९ ॥.
ब्राह्मणों को विदा करके उस स्थान से जूंठ उठाकर, फिर वैश्वदेव और भूतबलि आदि करे-यह धर्मव्यवस्था है । पितरों को विधि से हवि देने से जो चिरकालतक अक्षय तृप्ति होती है वह इस प्रकार है -तिल, धान्य, यव, उड़द, जव, मूल और फल विधिपूर्वक पितरों को देने से, एक मास तक तृप्ति होती है । मछली और मांस से दो मास हरिण के मांस से तीन मास, मेंढा के मांस से चार और भक्ष्य पक्षियों के मांस से पांच मास तक तृप्ति होती है । बकरा के मांस से छ. मास, चित्रमृग के मांस से सात मास, मृग से आठ मास और रु मृग से नव मास तक तृप्ति होती है । शुकर और महिष के मांस से दश मास, खरगोश और कछुआ से ग्यारह मास तक तृप्ति होती है । गौके दूध वा उसकी खीर से साल भर और लम्बे कान और नाकवाले बूढ़े बकरे के मांस '. ' से वारह वर्ष तक तृप्ति होती है ॥ २६५-२७१ ॥
कालशाकं महाशल्काः खड्गलोहामिषं मधु ।
आनन्त्यायैव कल्प्यन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ॥ २७२॥