श्रीगणेशाय नमः।
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 361–370
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 361–370
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सातवां अध्याय । २२१ गुरुकुल से विद्या पढ़कर लौटे हुए ब्राह्मणों का पूजन करे, क्योंकि इससे राजाओं को अक्षय ब्रह्म प्राप्ति होती है ॥ ७६-८३ ॥
न स्कन्दते न व्यथते न विनश्यति कर्हिचित् ।
वरिष्ठमग्निहोत्रेभ्यो ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् ॥ ८४ ॥
सममब्राह्मणे दानं द्विगुणं ब्राह्मणबुवे ।
प्राधीते शतसाहस्रमनन्तं वेदपारगे ॥ ८५ ॥
पात्रस्य हि विशेषेण श्रद्दधानतयैव च ।
अल्पं वा वहु वा प्रेक्ष्य दानस्यावाप्यते फलम् ॥ ८६ ॥
इस श्रक्षय निधि को चोर नहीं चुराते, शत्रु नहीं छीन सकते । खोया नहीं जासकता । इसलिए राजा, ब्राह्मणों में उस अक्षयनिधि' का स्थापन करे । श्रग्नि में जो हवन किया जाता है वह कभी गिर जाता है, कभी सूख जाता है, कभी नष्ट होजाता है; पर गुरु- कुल से श्राये ब्राह्मण के मुख में जो हवन किया जाता है वह श्रग्नि- होत्रादि से भी श्रेष्ठ है । ब्राह्मण के सिवा दूसरी जाति को दिया दान, मध्यम फलदायक होता है । जो अपने को ब्राह्मण कहता है उसको दिया दान दोगुना फल, पठित ब्राह्मण को दिया लाखगुना, और वेदविशारद ब्राह्मण को दिया दान अनन्त फलदायक होता है । पात्र की योग्यता और श्रद्धा की न्यूनाधिकता के अनुसार दाता को दान का फल मिलता है ॥ ८४-८६ ॥
समोत्तमाधमै राजा वाहूतः पालयम् प्रजाः ।
ननिवर्तेत संग्रामात्क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् ॥ ८७ ॥
संग्रामेष्वनिवर्तित्वं प्रजानां चैव पालनम् ।
शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञां श्रेयस्करं परम् ॥ ६८ ॥
आहवेषु मिथोऽन्योन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ।
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२२२ मनुस्मृति ।
युध्यमानाः परं शक्त्यास्वर्ग यान्त्यपराङ्मुखाः ॥ ८६ ॥
न कूटैरायुधैर्हन्याद्युध्यमानो रणे रिपून् ।
न कर्णभिर्नापि दिग्धैर्नाग्निज्वलिततेजनैः ॥ ६० ॥
न व हन्यात्स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् ।
न मुक्तकेशं नासीनं न तवास्मीति वादिनम् ॥ ६१ ॥
न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम् ।
नायुध्यमानं पश्यन्तं न परेण समागतम् ॥ ६२ ॥
अपने समान, उत्तम, या श्रधम राजा यदि रण -निमन्त्रण देवे तो क्षत्रियधर्म के अनुसार राजा को पीछे पैर न रखना चाहिए । संग्राम से न हटना, प्रजापालन, ब्राह्मणों की सेवा ये सब राजाओं.. "" का परम कल्याण करनेवाला है । जो राजा संग्राम में आपस में खूब युद्ध करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं । रण में, कूट-छिपे अस्त्रों से,कण वारा जो चुभ जानेपर नहीं निकलता, जहर के बुझे और आग के जत्रों से शत्रु को न मारें । ज़मीन में खड़े हुए शत्रु "को, हाथ जोड़ने वाले को न मारे । खुले बालोंवाले को, बैठे को, और जो कहे-' मैं तुम्हारा हूं ' उसको न मारे । सोते हुए को, टूडे कवचवाले को, नंगे को, शस्त्रहीन को, युद्ध न करनेवाले को, संग्राम देखते हुए को और दूसरे शत्रु से लड़ते हुए को न मारे ॥ ६७-६२॥
नायुधव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम् ।
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ६३ ॥
यस्तु भीतः परावृत्तः संग्रामे हन्यते परैः ।
भर्तुर्यदुष्कृतं किञ्चित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ ६४ ॥
टूटे शस्त्रवाले को, पुत्रादि शोक से दुःखी को, बहुत घाववाले को डरपोक को, भागनेवाले को भी न मारना । जो युद्ध से डरकर
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सातवां अध्याय । २२३ पीछे भगता है और शत्रु उसको मार डालते हैं, वह अपने राजा का सच पाप पाता है ॥ ६३-६४ ॥
यच्चास्य सुकृतं किंचिदमुत्रार्थमुपार्जितम् ।
भर्ता तत्सर्वमादत्ते परावृत्तहतस्य तु ॥ ६५ ॥
रथाश्वं हस्तिनं छत्रं धनं धान्यं पशून्स्त्रियः ।
सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ॥६६ ॥
राज्ञश्च दद्युरुद्वारमित्येषा वैदिकी श्रुतिः ।
राज्ञा च सर्वयोधेभ्यो दातव्यमपृथग्जितम् ॥ ६७ ॥
एषोऽनुपस्कृतः प्रोक्तो योधधर्मः सनातनः ।
अस्माद्धर्मान्न च्यवेत क्षत्रियो नन् रणे रिपून् ॥ ६८ ॥
जो लड़ाई से भगा हुआ मारा जाता है, उसके पुण्य का भाग सब स्वामी को मिलता है । युद्ध में रथ, घोड़ा, हाथी, छत्र, धन, धान्य, पशु, स्त्री और सब भांति के पदार्थ जो जिसको जीते, वह उसका है । जीते पदार्थों में सोना, चांदी आदि उत्तम पदार्थ राजा को अर्पण करे- ऐसी वेद की श्रुति है । और साथ में जीती वस्तु, हिस्सा माफ़िक़, राजा सब योधाओं को बांट देवे । यह सनातन, अनिन्दित, शुद्ध योधाओं का धर्म कहा गया है । संग्राम में क्षत्रिय को इन धर्मों से च्युत न होना चाहिए ॥ ६५-६८ ॥
अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः ।
रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत् ॥ ६६ ॥
एतच्चतुर्विधं विद्यात्पुरुषार्थप्रयोजनम् ।
अस्य नित्यमनुष्ठानं सम्यक्कुर्यादतन्द्रितः ॥ १०० ॥
अलब्धमिच्छेद्दण्डेन लब्धं रक्षेदवेक्षया ।
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२२४ - मनुस्मृति | रक्षितं वर्धयेदृया वृद्धं दानेन निक्षिपेत् ॥ १०१ ॥
नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः ।
नित्यं संवृतसर्वार्थो नित्यं छिद्रानुसार्यरेः ॥ १०२ ॥
जो पदार्थ नहीं मिला है उसके लेने की इच्छा, मिले हुए की रक्षा करे । जो रक्षित है, उसको बढ़ावे और बढे पदार्थ सुपात्रों को देय । यह चार प्रकार का पुरुषार्थ है । आलस्य छोड़ कर, नित्य भली भांति इसका अनुष्ठान किया करे । जो नहीं प्राप्त है, उसको दण्ड- सेना से जीतने की इच्छा करे, प्राप्त वस्तु की देख भाल से रक्षा करे, रक्षित का व्यापार-उद्यम से वृद्धि करे और बढ़ी वस्तु शास्त्रा-" नुसार, सुपात्र को देवे । राजा अपराधियों के लिए दण्ड उद्यत रक्खे, पुरुषार्थ को ठीक रक्खे, अपने श्रधों को गुप्त रक्खे और शत्रु के छिद्रों को देखा करे ॥ ६६–१०२ ॥
नित्यमुद्यतदण्डस्य कृत्स्नमुद्विजते जगत् ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधेयत् ॥ १०३०३ ॥
माययैव वर्तेत न कथंचन मायया ।
बुध्येतारिप्रयुक्तां च मायां नित्यं स्वसंवृतः ॥ १०४ ॥
नास्य परो विद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु ।
हेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥ १०५ ॥
बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत् ।
बृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत् ॥ १०६ ॥
सदा उद्यत दण्डवाले राजा से, सारा जगत् डरता है । इसलिए दण्ड ही से सब प्राणियों को स्वाधीन रक्खे | छल से कोई व्यवहार न करे । अपनी रक्षा करता रहे और शत्रु के छलों को जानता रहे । ऐसा उपाय करे जिसमें अपना छिद्र-दोष शत्रु न जाने । परन्तु शत्रु
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सातवां अध्याय । २२५ के छिद्रों को खुद जाने । राजा, कछवे के समाने राजकीय अङ्ग को छिपा रक्खे,जिससे अपना छिद्र न ज़ाहिर होवे । बगला की भांति एकचित्त होकर, राजकार्यों का विचार करे । सिंह के समान शत्रुओं से पराक्रम रक्खे, भेड़िये के समान मौका पाकर शत्रुक्षय करे । और खरगोश के समान, आपत्तियों से भाग जावे ॥ १०३-१०६ ॥
एवं विजयमानस्य येऽस्य स्युः परिपन्थिनः ।
तीनानयेद्वशं सर्वान्सामादिभिरुपक्रमैः ॥ १०७ ॥
यदि ते तु न तिष्ठेयुरुपायैः प्रथमैखिभिः ।
दण्डेनैव प्रसह्यैताञ्छ्नकैर्वशमानयेत् ॥ १०८ ॥
सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः ।
सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ॥ १०६ ॥
रति निर्दाता. कक्षं धान्यं च रक्षति । " तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याचे परिपन्थिनः ॥ ११० ॥
इस प्रकार विजय करनेवाले राजा के जो शत्रु हो उनको साम-दाम-भेद से अपने वश में करे । यदि पहले तीन उपायों से शत्रु वशं मैं न हो तो, उनको दण्ड द्वारा, धीरे धीरे अधीन करे । विचार-वान् पुरुष साम, दाम, भेद, दण्ड इन चार उपाय में, राज्यवृद्धि के लिए सामं और दण्ड की प्रशंसा करते हैं । जैसे खेत निराने घाला घास उखाड़ कर अन्न की रक्षा करता है, वैसे, राजा चोर, लुटेरों का नाश करे, राष्ट्र की रक्षा करें ॥ १०७-११० ॥ मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया । " सोऽचिराद् भ्रश्यते राज्याज्जीविताच सबान्धवः॥ १११॥
शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा ।.. तथा राज्ञामपि प्राणाः श्रीयन्ते राष्ट्रकर्षणात् ॥ ११२॥
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२२६३ · 1:मनुस्मृति ।...
राष्ट्रस्य संग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत् ।
सुसंगृहीतराष्ट्रो हि पार्थिवः सुखमेधते ॥ ११३ ॥
जो राजा, अज्ञानवश विना विचार, अपने राज्य को दुःख देता है वह शीघ्र ही राज्य, जीवन और बान्धवों से भ्रष्ट होजाता है । जैसे शरीर के शोषण से प्राणियों के प्राण घटते हैं, वैसे, राष्ट्र को दुःख देने से, राजाओं के भी प्राण घटते है । राजा देश की रक्षा के लिए, ऊपर कहे उपायों को करे क्योंकि-राज्यरक्षा से राजा की सुखवृद्धि होती है ॥ १११-११३ ॥
द्वयोस्त्रयाणां पञ्चानां मध्ये गुल्ममधिष्ठितम् ।
तथा ग्रामशतानां च कुर्याद्राष्ट्रस्य संग्रहम् ॥ ११४ ॥
ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामपतिं तथा ।
विंशतीशं शतेशं च सहस्रपतिमेव च ॥ ११५ ॥
ग्रामदोषान् समुत्पन्नान् ग्रामिकः शनकैः स्वयम् ।
शंसेद्द्यामदशेशाय दशेशो विंशतीशिने ॥ ११६ ॥
विंशतीशस्तु तत्सर्वं शतेशाय निवेदयेत् ।
शंसेग्रामशतेशस्तु सहस्रपतये स्वयम्॥ ११७ ॥
यानि राजप्रदेयानि प्रत्यहं ग्रामवासिभिः ।
अन्नपानेन्धनादीनि ग्रामिकस्तान्यवाप्नुयात्॥ ११८ ॥
दो, तीन, पांच या सौ ग्रामों के बीच में, रक्षा करनेवाले पुरुषों का एक महकमा क्क़ायम करें । एक गाँव का, दश का, बीस का सौ का और हज़ार गांव का एक एक अधिपति नियतं करे । गाँव का मालिक गाँव के बखेड़ों को धीरे से जानकर उसका फ़ैसला करदे, या दश गाँव के मालिक को सूचित करदे, या वह बीस गाँव के मालिक को इत्तला करदे इत्यादि । जो अन्न, ईंधन वगैरह राजा को देनेवाले
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सातवां अध्याय । २२७ पदार्थ हैं उनको वहां नियुक्त राजपुरुष ग्रहण करे ॥ अर्थात् सब वस्तुओं का संग्रह करके राजस्थानको पहुँचाया करें ॥ ११४- ११८ ॥
दशी कुलं तु भुञ्जीत विंशी पञ्चकुलानि च ।
• ग्रामं ग्रामशताध्यक्षः सहस्राधिपतिः पुरम् ॥ ११६ ॥
तेषां ग्राम्याणि कार्याणि पृथक्कार्याणि चैव हि ।
राज्ञोऽन्यः सचिवःस्निग्धस्तानि पश्येदतन्द्रितः ॥ १२० ॥
नगरे नगरे चैकं कुर्यात्सर्वार्थचिन्तकम् ।
उच्चैः स्थानं घोररूपं नक्षत्राणामिव ग्रहम् ॥ १२१ ॥
ताननुपरिक्रामेत्सर्वानेव सदा स्वयंम् ।
तेषां वृत्तं परिणयेत्सम्यग्राष्ट्रेषु तच्चरैः ॥ १२२ ॥
राज्ञेो हि रक्षाधिकृताः परस्वादायिनः शठाः ।
भृत्या भवन्ति प्रायेण तेभ्यो रक्षेदिमाः प्रजाः ॥ १२३ ।
दश गाँव का अधिपति एक कुल दो हल से जोतने योग्य ज़मीन, अपने निर्वाह के लिए काम में लावें । बीस गाँव का पाँच कुल, सौ गाँव का एक साधारण गाँव और हज़ार गाँव का मालिक एक नगर को अपनी जीविका में भोगे । राजा के गाँवों के कार्य 'और दूसरे कार्यों को भी, एक मन्त्री, जो सर्वप्रिय । वह निरालस · होकर देखे । प्रत्येक नगर में एक एक अध्यक्ष जो बड़े पद पर हो, तेजस्वी हो, उसको क़ायम करे । वह सदा ग्रामाधिपतियों के कार्यों को जाँच और दूतों से उनके आचरणों को भी जान रक्खे । क्योंकि रक्षाधिकारी राजपुरुष, प्रायः दूसरों के धन हरनेवाले, वञ्चक होते हैं । राजा उनसे प्रजा की रक्षा करें ॥। ११६ - १२३ ॥ कार्यकेभ्योऽर्थमेव गृह्णीयुः पापचेतसः ।: तेषां सर्वस्वमादाय राजा कुर्यात्प्रवासनम् ॥ १२४ ॥
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२२८ मनुस्मृति ।:
राजाः कर्मसु युक्तानां स्त्रीणां प्रेष्यजनस्य च ।
प्रत्यहं कल्पयेत्तं स्थानकर्मानुरूपतः ॥ १२५ ॥
पणो देयोऽवकृष्टस्थ षडुत्कृष्टस्य वेतनम् ॥
षाएमालिकस्तथाच्छादोधान्यद्रोणस्तु मासिकः १२६ ॥
और जो पापी पुरुष, रिशवत आदि ही लिया करते हैं उनको; सब कुछ छीनकर, राजा देश से निकाल देवे । कार्यों में लगे खी और पुरुषों को उनके कर्म के अनुसार सदा वृत्ति नियत करे अर्थात्- कभी तनवाह बढ़ावे कभी घटावे । निकृष्ट नौकर को एक परा देवें और छ महीने में दो कंपड़े और एक महीने में द्वारा भर अन्न देवे । उत्तम कार्यवालों को गुना देवे । मध्यम नौकर को मध्यम श्रेणि का सब पदार्थ देवे ॥ १२४-१२६ ॥
क्रयविक्रयमध्वानं भक्तं च सपरिव्ययम् ।
योगक्षेमं च संप्रेक्ष्य वणिजो दापयेत्करान् ॥ १२७ ॥
यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम् ।
तथावेक्ष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत्सततं करान् ॥ १२८ ॥
यथाल्पाल्पमदन्त्याद्यं वार्थोकोवत्सषट्पदाः ।... तथाल्पाल्पो ग्रहीतव्यो राष्ट्राद्राज्ञाव्दिकः करः ॥ १२६॥
पञ्चाशद्भाग प्रदेयो राज्ञा पशुहिरण्ययोः धान्यानामष्टमी भागः षष्टो द्वादश एव वा ॥ १३०॥
प्राददीताथ षड्भागं द्रुमांसमधुसर्पिषाम् ।
गन्धौषधिरसानां च पुष्पमूलफलस्य च ॥ १३१. ॥॥
पत्रशाकतृणानां च चर्मणो वै दलस्य च ।
मृन्मयानां च भाण्डानां सर्वस्याश्ममग्रस्य च ॥ १३२ ॥
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सातवां अध्याय । २२६ बेचना, खरीदना, रास्ता का खर्च, रक्षा का खर्च और उनके नि- वह को देखकर राजा, व्यापारियों से कर ( टैक्स ) लेवे ।उद्यमियों को और राज्य को जिससे नफ़ा पहुँचे ऐसा विचारकर, कर लगाना उचित है । जैसे जॉक, बछड़ा और भौंरा धीरे धीरे अपनी खुराक को खींचते हैं वैसे राजा भी राष्ट्र से थोड़ा थोड़ा सालाना करलेय । पशु और सोना के लाभ का पचासवां भाग; श्रन्नों के लाभ से छठां, आठवाँ या चारहवाँ भाग कर लेवे । वृक्ष, मांस, शहद, घी, गन्ध, औषध, रस, फूल, मूल, फल, पत्र, शाक, तृण, चमड़ा,कांस, मिट्टी, पत्थर के पात्र, इन सबके लाभों में से छठा भाग कर लेय ॥ १२७- १३२॥
म्रियमाणोऽप्याददीत न राजा श्रोत्रियात्करम् ।
न च क्षुधास्य संसीदेच्छ्रोत्रियो विषये वसन्॥ १३३॥
यस्य राज्ञस्तु विषये श्रोत्रियः सीदति क्षुधा ।
तस्यापि तत्क्षुधा राष्ट्रमचिरेणैव सीदति ॥ १३४ ॥
राजा धन की कमी से दुःखी भी हो तो भी श्रोत्रिय ब्राह्मण से कर न लेय और उसके राज्य में श्रोत्रिय ब्राह्मणं भूखौ न मरना चाहिए । श्रर्थात् उसकी परवरिश रहा करे । जिस राजा के राज्य मैं श्रोत्रिय ब्राह्मण क्षुधा से पीड़ित होता है, उस राजा का राज्य थोड़े ही दिनों में उसकी भूख से नष्ट होजाता है ॥ १३३-१३४॥ः श्रुतवृत्ते विदित्वास्य वृत्तिं धर्म्यं प्रकल्पयेत्! संरक्षेत्सर्वतश्चैनं पिता पुत्रमिवोरसम् ॥ १३.५ ॥ संरक्ष्यमाणो राज्ञा यं कुरुते धर्ममन्वहम् । नायुर्वर्धते राज्ञो द्रविणं राष्ट्रमेव च ॥ १३६ "॥:. यत्किंचिदपि वर्षस्य दापयेत् करसंज्ञितम् ॥.. व्यवहारेण जीवन्तं राजा राष्ट्रे पृथग्जनम् ॥ १३७ ॥
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.२३० मनुस्मृति
कारुकारिछल्पिनश्चैव शूद्रश्चात्मोपजीविनः ।
एकैक कारयेत्कर्म मालि मासि महीपतिः ॥ १३८ ॥
नोन्यादात्मनो मूलं परेषां चातितृष्णया ।
उच्छिन्दन्यात्मनोमूलमात्मानंतश्चपीडयेत्॥१३६ ॥
तीक्ष्णश्चैव मृदुश्च स्यात्कार्य वीक्ष्य महीपतिः ।
तीक्ष्णश्चैव मृदुश्चैव राजा भवति संमतः ॥ १४० ॥
राजा, इस श्रोत्रिय के वेदाध्ययन और सदाचार को जानकर कोई धर्मविषय की जीविका बाँध दे और पिता जैसे पुत्र की रक्षा करता है वैसे ही रक्षा करे । क्योंकि राजा से रक्षित श्रोत्रिय के धर्म- पालन से राजा का आयुर्बल, द्रव्य और राज्य बढ़ता है । अपने राज्य में, व्यापारवाले से भी कुछ सालाना कर दिलावे । लोहार, बढ़ई, आदि और दासों से महीने में एक एक दिन बेगार में काम करावे । प्रजा के स्नेह से अपना कर न लेना अपना मूलच्छेद करना और लोभ से ज्यादा कर लेना प्रजाको सताना है, इसलिए राजा ऐसा काम कभी न करे जिसमे राज्य और प्रजा दोनों को कष्ट उठाना पड़े । राजाको कभी तीखा और कभी सीधा स्वभाव रखने से उसकी सब मानते हैं ॥ १३५-१४० ॥
अमात्यमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्गतम् ।
स्थापयेदासने तस्मिन्खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम्॥ १४१ ॥
राजा खुद, राज्य के कार्यों को और दूसरे के कामों को देखने में किसी कारण से असमर्थ हो, तो, चतुर, धर्मात्मा, कुलीन प्रधान मन्त्री को अपने न्यायासन पर काम देखने के लिए नियुक्त - कर देवे ॥ १४१ ॥
एवं सर्वं विधायेदमितिकर्त्तव्यमात्मनः ।
'युक्तश्चैवाप्रमत्तश्च परिरक्षेदिमाः प्रजाः ॥ १४२ ॥