मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 381–390
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 381–390
पृष्ठ 381
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सातवां अध्याय । २४१
साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक् ।
विजेतुं प्रयतेतारीन् नं युद्धेन कदाचन ॥ ९ ६८ ॥
अनित्यो विजये यस्माद्दश्यते युध्यमानयोः ।
पराजयश्च संग्रामे तस्माद्युद्धं विवर्जयेत् ॥ १६६ ॥
त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्तानामसम्भवे ।
तथा युद्धयेत संपन्नो विजयेत रिपून् यथा ॥ २०० ॥
जित्वा संपूजयेदेवान् ब्राह्मणांश्चैव धार्मिकान् ।
प्रदद्यात्परिहारांश्च ख्यापयेदभयानि च ॥ २० ९ ॥
सर्वेषां तु विदित्वैषां समासेन चिकीर्षितम् ।
स्थापयेत्तत्र तद्वश्यं कुर्याच्च समयक्रियाम् ॥ २०२ ॥
प्रमाणानि च कुर्वीत तेषां धर्मान् यथोदितान् ।
रत्नेश्च पूजयेदेनं प्रधानपुरुषैः सह ॥ २०३ ॥
आदानमप्रियकरं दानं च प्रियकारकम् ।: भीप्सितानामर्थानां काले युक्तं प्रशस्यते ॥ २०४ ॥
. सर्व कर्मेदमादत्तं विधाने देवमानुषे ।
तयोर्देवमचिन्त्यं तु मानुषे विद्यते क्रिया ॥ २०५ ॥
राजा साम, दान और भेद इन तीनों से या एकही किसी से शत्रु के जीतने का उपाय करे । पर जहांतक होसके युद्ध का उद्योग -न करे । युद्ध में लड़नेवालों की हार वा जीत कोई निश्चित नहीं देखने में श्राती, कभी कोई कभी कोई, इसलिए युद्ध न करे । जब तीनों उपायों से शत्रु को जीतने का भरोसा न हो तभी युद्ध का. उपाय. पूरीतौर से करना उचित है जिसमें वह अधीन होजाय । 'युद्ध में विजय पाने पर देवता, ब्राह्मणों की पूजा करे । जीती ३१
पृष्ठ 382
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२४२ मृत | प्रजा का भूमि कर कम करें और यह ढिढोरा पिटावे कि जिन्होंने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया है उन्हें भी अभय दिया गया । जीते राजा और मंत्री का अभिप्राय जानकर, उसी के वंशवाले' को गद्दी देकर अपनी शर्तें पक्की कर लेवे । और उनके धर्मों को--रिवाजों को माने, रनों से मंत्री आदि के साथ उसका सत्कार करे श्रर्थात् खिलत देवे । यद्यपि किसी की प्रियं वस्तु ले लेना प्रिय और देना प्रिय होता है तौभी समयानुसार लेना और देना दोनों अच्छा माना जाता है । ये सब कर्म देव और मनुष्य के पुरुषार्थ के अधीन हैं । इन में देव का निर्णय अशक्य . है परन्तु पुरुषार्थ से कार्य किया जाता है । अर्थात् मनुष्य- साध्य- कार्य में पुरुषार्थ प्रधान माना जाता है ॥ १६८- २०५ ॥
सह वापि व्रजेद्युक्तः संधिं कृत्वा प्रयत्नतः ।
मित्रं हिरण्यं भूमिं वा संपश्यस्त्रिविधं फलम् ॥ २०६॥
पाणिग्राह च संप्रेक्ष्य तथाक्रन्दं च मण्डले ।
मित्रादथाप्यमित्राद्वा यात्राफलमवाप्नुयात् ॥ २०७ ॥
हिरण्यभूमिसंप्राप्त्या पार्थिवो न तथैधते ।
यथा मित्रं ध्रुवं लब्ध्वा कृशमप्यायतिक्षमम्॥ २०८ ॥
" अथवा राजा मित्रता या कुछ द्रव्य या भूमि शत्रु से पाकर सुलह करके लौट आवे अर्थात् इन पदार्थों को देना शत्रु मंजूर करे: तो लेकर सुलह कर ले । जो विजयं करते हुए राजा के पीछे दूसरा राजा दबाकर चढ़ आवे उसको ' पाणिग्राह " कहते हैं और जो उसको इस काम से रोके उसे ' क्रन्द ' कहते हैं । इन दोनों को देखकर, मित्र या श्रमित्र से यात्रा का फल ग्रहण करे । ( ऐसा न करे जिसमें ये दोनों विगड़ जायें ) राजा सुवर्ण और भूमि को पाकर वैसा नहीं बढ़ता, जैसा दुर्बल भी स्थिर मित्र को पाकर बढ़ता है | २०६ - २०८ ॥
धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च ।
अनुरक्तं स्थिरारम्भं लघुमित्रं प्रशस्यते ॥ २०६ ॥
पृष्ठ 383
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सातवां अध्याय । २४३
प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च ।
कृतज्ञं धृतिमन्तं च कष्टमाहुररिं बुधाः ॥ २ ९ ० ॥
'आता पुरुषज्ञानं शौर्य करुणवेदिता । स्थौललक्ष्यं च सततमुदासीनगुणोदयः ॥ २१ ९ ॥ + क्षेम्य सस्यप्रद नित्यं पशुवृद्धिकरीमपि । परित्यजेन्नृपो भूमिमात्मार्थमविचारयन् ॥ २१२ ॥
आपदर्थं धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि ।
श्रात्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ २ ९ ३ ॥
धर्मज्ञ, कृतज्ञ, प्रसन्नचित्त, प्रीति करनेवाला, स्थिर कार्य का श्ररम्भ करनेवाला, छोटा मित्र अच्छा होता है । वुद्धिमान, कुलीन, शूर, चतुर, दाता, कृतज्ञ और धैर्यवान् शत्रु को लोग कठिन कहते हैं । सभ्यता, पुरुषों की पहिचान, शूरता, दयालुता और उदारता ये सब उदासीन राजा के गुण हैं। कल्याण करनेवाली, संपूर्ण धान्यों को देनेवाली और पशुवृद्धि करनेवाली भूमि को भी राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए विना विचार किये छोड़ देवे । आपत्ति दूर करने के लिए धन की,,. करे धन से स्त्रियों की रक्षा करे और धन स्त्री से५॥भी २२६ ॥ अपने शरीर की रक्षा करे ॥ २०६--२१३ ॥ सह सर्वाः समुत्पन्नाः प्रसमीक्ष्यापदो नयां संहितायां. संयुक्तांश्च वियुक्तांश्च सर्वोपायान्स्रुः॥ उपेतारमुपेयं च सर्वोपायांश्च कृत्स अपना नित्यकर्म कायथावतस्वयं संपूर्ण राज्यकार्यों एतत्रयं समाश्रित्य प्रयतेतार्थसिद्ध राजाय तोअपने अधिका- एवं सर्वमिदं राजा सह संमन्त्र्य (२५-- २२६ ॥ ·व्यायम्यात्यमध्याह्नेभोकुमन्तः पूरा हुआ ।
पृष्ठ 384
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२४४ मनुस्मृति । तत्रात्मभूतैः कालज्ञैरहार्यैः परिचारकैः । सुपरीक्षितमन्नाद्यमद्यान्मन्त्रैर्विषापदैः ॥ २१७ ॥.
विषघ्न्नैरगदैश्चास्य सर्वद्रव्याणि योजयेत् ।
विषघ्नानि च रत्नानि नियतो धारयेत्सदा ॥ २९ ८ ॥
सब आपत्तियों को एक साथ थाती देख पढे तो बुद्धिमान् राजा सामान आदि उपायों कमल उपाय करनेवाले को, एकउपायसाथके साधनवा अलगयोग्य और उपाय इन तीनों को ठीक ठीक श्राश्रय करके अर्धसिद्धि के लिए उपाय करे | उक्त प्रकार से संपूर्ण राजकार्यों का मन्त्रियों के साथ विचार करे | स्नान और व्यायाम ( कसरत ) करके दोपहर में भोजनार्थ अन्तःपुर में प्रवेश करे । वहीं भक्त, भोजन- काल को जाननेवाला, शत्रु के बहकाने में न आनेवाला, रसोइयां के तैयार किये, परीक्षित और विपनिवारक मन्त्रों से शुद्ध भोजन को करे । राजा के सर्व खानेवाले पदार्थों में दिषनाशक दवा डाले और विषनाशक रत्नों को राजा सदा धारण करे ॥ २१४-२१८ ॥
परीक्षितांत्रियश्चैनं व्यजनादेकधूपनैः ।
तो लेभरणसंशुद्धाः स्पृशेयुः सुसमाहिताः ॥ २१६ ॥
राजा दवा उसको इस कुर्वीत यानशय्यासनाशने । -देखकर, मित्र या "ले चैव सर्वालङ्कारकेषु च ॥ २२० ॥
करे जिसमें ये दोनों प- भूषणों से सजी धजी पाकर वैसा नहीं बढ्दव-गन्ध से राजा की सेवा स्त्रियांकरें ।, एकाग्रमन 1,,,बढ़ता है ॥ २०६–२०६या आसन भोजन स्नान इसी भांति धर्मज्ञं च कृतज्ञं चक्षा आदि कर्म होना चाहिए, उबर्टन॥ २१६–२२०और सब॥ अनुरक्तं स्थिरारम्भं स्त्रीभिरन्तःपुरे सह । तं पुनः कार्याणि चिन्तयेत् ॥ २२ ९ ॥ ·
पृष्ठ 385
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सातवां अध्याय । २४५
अलङ्कृतश्च संपश्येदायुधीयं पुनर्जनम् ।
वाहनानि च सर्वाणि शस्त्र्याण्याभरणानि च ॥ २२२॥
सन्ध्यां चोपास्य शृणुयादन्तर्वेश्मनि शस्त्रभृत् ।
रहस्याख्यायिनां चैव प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥ २२३॥
गत्वा कक्षान्तरं त्वन्यत्समनुज्ञाप्य तं जनम् ।
प्रविशेोजनार्थं च स्त्रीतोऽन्तःपुरं पुनः ॥ २२४ ॥
'भोजन करने के बाद, उसी अन्तःपुर में स्त्रियों के साथ कुछ देर टहले, फिर यथासमय अपने राजकाज का विचार करे । • फिर शस्त्र, भूषण से सजकर सवार, सिपाही, घोड़ा वगैरह और राजकीय आभूषणों की देखभाल करे । उसके अनन्तर सायंसंध्या करके, एकान्त में दूत और प्रतिनिधियों के समा- 'चार और कामों को सुने । उन लोगों को विदा करके दूसरे कमरे मैं जाकर स्त्रियों के साथ भोजनार्थ अन्तःपुर को गमनं करे । वहां यथावत् भोजन करके थोड़ा गाना, वाजा से चित्त को प्रसन्न करके और समय पर निद्रा करे ॥ २२१-२२४ ॥
तत्र भुक्त्वा पुनः किंचित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः ।
' संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्चं गतक्लमः ॥ २२५ ॥
एतद्विधानमातिष्ठेदरोगः पृथिवीपतिः ।
अस्वस्थः सर्वमेतत्तु भृत्येषु विनियोजयेत् ॥ २२६ ॥
. इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्कायां संहितायां ' सप्तमोऽध्यायः ॥ प्रातःकाल कुछ सवेरे उठकर फिर अपना नित्यकर्म यथावत करें । इस प्रकार से नीरोग राजा संपूर्ण राज्यकार्यों का स्वयं ' संपादन करे | यदि शरीर में कोई क्लेश होजाय तो अपने अधिका- रियों से सब कामों को करावे ॥ २२५ -२२६ ॥ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।
पृष्ठ 386
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
'२४६ मनुस्मृति अष्टमोऽध्यायः ।
व्यवहारान् दिदृक्षुस्तु ब्राह्मणैः सह पार्थिवः ।
मन्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिश्चैव विनीतः प्रविशेत् सभाम् ॥ १ ॥
तत्रासीनः स्थितो वापि पाणिमुद्यम्य दक्षिणम् ।
विनीतवेषाभरणः पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ २ ॥
प्रत्यहं देशदृष्टैश्च शास्त्रदृष्टैश्च हेतुभिः ।
अष्टादशसु मार्गेषु निबद्धानि पृथक् पृथक् ॥ ३ ॥
तेषामाद्यमृणादानं निक्षेपोऽस्वामिविक्रयः ।
संभूय च समुत्थानं दत्तस्यानपकर्म च ॥ ४ ॥
वेतनस्यैव चादानं संविदश्च व्यतिक्रमः ।... क्रयविक्रयानुशयो विवादः स्वामिपालयोः ॥ ५ ॥
सीमाविवाद धर्मश्च पारुष्ये दण्डवाचिके ।
स्तेयं च साहसं चैव स्त्रीसंग्रहणमेव च ॥ ६
स्त्रीपुंधर्मो विभागश्च द्यूतमाह्वय एव च ।
पदान्यष्टादशैतानि व्यवहारस्थिताविह ॥ ७ ॥
आठवाँ अध्याय । व्यवहार निर्णय – मुक़द्दमा आदि । राजा विद्वान् ब्राह्मण और राजनीति चतुर मन्त्रियों के साथ -वादी और प्रतिवादियों के विचारार्थ नम्रता से राजसभा में प्रवेश करे । वहां जाकर, दाहना हाथ उठाकर बैठकर या खढ़ेही..
पृष्ठ 387
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आठवां अध्याय | २४७ (जैसा कार्य हो ) कामवालों के कामों को देखे । और वंश, जाति आदि देशव्यवहार और शास्त्रोक्त साक्षी, शपथ आदि के अनुसार अठारह प्रकार के विवाद झगड़ों का अलग अलग विचार-फ़ैसला करे | उन अठारह विवादों का नाम इस प्रकार है- ( १ ) ऋण लेकर न देना ( २ ) धरोहर ( ३ ) दूसरे की वस्तुको बेचना ( ४ ) साझे का व्यापार ( ५ ) दान दिया हुआ लीट लेना ( ६ ) नौकरी न देना ( ७ ) प्रतिज्ञा भंग करना ( ८ ) खरीद चेंच का झगड़ा ( ६ ) पशु स्वामी और चरवाहे .का झगड़ा ( १० ) सरहद्द की लड़ाई ( ११ ) बड़ी बात कहना ( १२ ) मार पीट ( १३ ) चोरी ( १४ ) ज़ोर-जुलम ( १५ ) पर स्त्री का ले लेना ( १६ ) स्त्री और पुरुष के धर्म की व्यवस्थाका ( १७ ) जुत्राखोरी ( १ ) जानवरों की लड़ाई में हार जीत ॥ दाँव करना । इस संसार में ये १८ दावा होने के कारण हैं ॥१–७
एषु स्थानेषु भूयिष्ठं विवादं चरतां नृणाम् ।
धर्मं शाश्वतमाश्रित्य कुर्यात् कार्यविनिर्णयम् ॥ ८॥
यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम् । तदा नियुज्याद्विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥ ६ ॥ "
सोऽस्य कार्याणि संपश्येत् सभ्यैरेव त्रिभिर्वृतः ।
सभामेव प्रविश्याययामासीनः स्थित एव वा ॥ १० ॥
यस्मिन् देशे निषीदन्ति विप्रावेदविदस्त्रयः । राज्ञश्चाधिकृतो विद्वान् ब्रह्मणस्तां सभां विदुः ॥११ ॥ P
.धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते ।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्वास्तत्र सभासदः ॥ १२॥
भवन प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम् । ॥
अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्बिषी ॥ १३
पृष्ठ 388
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२४८ मनुस्मृति ।
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्वं यन्त्रानृतेन च ।
हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ १४ ॥
इन विषयों में झगड़ा 'करनेवालों का फ़ैसला राजा को सनातन- धर्म के अनुसार करना चाहिए । जब श्राप कारणवश न काम देख सके तो विद्वान् ब्राह्मण को सौंप देवे । वह ब्राह्मण तीन सभासदों के साथ सभा में बैठकर या खड़े ही राजा के खास कामों को देखे । जिस देश में वेदविशारद तीन ब्राह्मण राजसभा में निर्णे- यार्थ बैठते हैं और राजा का अधिकार पाया हुआ एक विद्वान् ब्राह्मण रहता है वह ब्रह्मा की सभा मानी जाती है । जिस सभा में धर्म, अधर्म से चोंका जाता है और उस चुमे काँटे को सभा- सद् धर्मशरीर से नहीं निकालते तो वे सभासद् पापभागी होते । या तो सभा में न जाना, जाना तो सत्यवचन कहना । और जो जानकर भी कुछ न कहे या झूठ कहे तो वह पातकी होता है । जिस सभामें अधर्म से धर्म कीऔर असत्य से सत्य की हत्या होती है उस संभा के सभासद् नष्ट होजाते हैं ॥ ८-१४ ॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । ' तस्मादसों न हन्तव्यो मानो धर्मों हतोऽवधीत् ॥ १५ ॥
वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ॥ १६ ॥
एक एव सुहृद्ध निधनेऽप्यनुयाति यः ।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥ १७ ॥
धर्म का लोप करदेने से वह उस पुरुष को नष्ट करदेता है और धर्म की रक्षा करने से वह भी रक्षा करता है । इसलिए धर्म का दाश न करना चाहिए जिसमें नष्ट धर्म हमारा नाश न करे । भगवान् धर्म को ' वृष ' कहते हैं और जो उसका नाश करता है उसको देवता ' वृषल ' कहते हैं । इस कारण मनुष्य को धर्म }
पृष्ठ 389
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आठवां अध्याय | २४६ का लोप न करना चाहिए । मृत्युसमय में भी एकमात्र मित्र धर्म ही पीछे चलता है और सब शरीर के साथ ही नाश को
प्राप्त होजाता है । १५-१७ ॥
पादोऽधर्मस्य कर्तारं पादः साक्षिणमृच्छति ।
पादः सभासदः सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥ १८ ॥
राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः ।
एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्द्यते ॥ १६ ॥
जातिमात्रोपजीवी वा कामं स्याद् ब्राह्मणब्रुवः ।
धर्मप्रवक्ता नृपतेर्न तु शूद्रः कथञ्चन ॥ २० ॥
यस्य शूद्रस्तु कुरुते राज्ञो धर्मविवेचनम् ।
तस्य सीदति तद्राष्ट्रं पङ्के गौरिव पश्यतः ॥ २१ ॥
यद्राष्ट्रं शूद्रभूयिष्ठं नास्तिकाक्रान्तमद्विजम् ।
विनश्यत्याशु तत्कृत्स्नं दुर्भिक्षव्याधिपीडितम्॥ २२ ॥
न्याय करते समय उसका एक चौथाई धर्म अन्याय करने वाले को, एक चौथाई झूठे गवाह को, एक चौथाई सभासद् और एक चौथाई राजा को अधर्म लगता है । जिस सभा में अन्यायी पुरुष की ठीक ठीक निन्दा कीजाती है, वहां राजा और सभा-सदू दोष से छूट जाते हैं । और उस श्रधर्मी को ही पाप लगता है । जिसकी जातिमात्र से जीविका है कुछ विद्या, योग्यता से नहीं वही चाहे न्यायकर्ता नियुक्त किया जाय, पर शूद्र को कभी अधिकार न देवे । 'जिस राजा का न्यायाधीश शूद्र होता है । उसका राज्य कीचड़ में गौ की भांति फँसकर पीड़ा पाता है । जिस राज्य में शूद्र और नास्तिक, अधिक हों, द्विज न हों वह सम्पूर्ण राज्य दुर्भिक्ष और व्याधि से पीड़ित होकर शीघ्रही नष्ट होजाता है ॥ १८-२२ ॥ ३२
पृष्ठ 390
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२५० मनुस्मृति |
धर्मासनमधिष्ठाय संवीताङ्गः समाहितः ।
प्रणम्य लोकपालेभ्यः कार्यदर्शनमारभेत् ॥ २३ ॥
प्रर्थानर्थावुभौ बुद्ध्वा धर्माधर्मौ च केवलौ ।
वर्णक्रमेण सर्वाणि पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम्॥२४ ॥
बाधैर्विभावयेल्लिङ्गैर्भावमन्तर्गतं नृणाम् ।
स्वरवर्णेङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च ॥ २५ ॥
प्राकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च ।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ २६ ॥
राजा न्यायासन पर वस्त्र वगैरह पहन कर बैठे और ठ लोकपालों को प्रणाम करके सावधानी से विचारकार्य का आरम्भ करे । प्रजा की लाभ और हानि को, धर्म और अधर्म को सोचकर वादियों के दावों को ब्राह्मणादि वर्ग के क्रम से देखना शुरू करे । मनुष्यों के बाहरी लक्षण, स्वर (आवाज़ ) शरीर का वर्ण, नीचे ऊपर देखना, श्राकार रोमांच होना आदि, आँख, हाथ, पैर की चेष्टा वगैरह से भीतरी हाल पहचानना । श्राकार, नीचे ऊपर देखना, गति, चेष्टा, बोली, आँख, मुँह के विकार से मन का भाव- जाना जाता है || २३-२६ ॥
बालदायादिकं रिक्थं तावद्राजानुपालयेत् । 5
यावत्स स्यात्समावृत्तो यावच्चातीतशैशवः ॥ २७ ॥
वशाऽपुत्रासु चैव स्याद्रक्षणं निष्कुलासु च ।
पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्त्रातुरासु च ॥ २८ ॥
जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयुः स्वधान्धवाः ।
ताञ्छिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः ॥ २६ ॥