श्रीगणेशाय नमः।

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 371–380

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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सातवां अध्याय । २३१

विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्रान् हियन्ते दस्युभिः प्रजाः ।

संपश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तुतु जीवति ॥ १४३ ॥

क्षत्रियस्य परोधर्मः प्रजानामेव पालनम्।

' निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ १४४ ॥

अपने सब कर्तव्यों को इस तरह पूरा कर के, प्रमाद-रहित और कार्यपरायण होकर अपनी प्रजा की रक्षा करे । राजा और उसके कर्मयों के देखते यदि चोर, लुटेरे प्रजा को लूट पॉट से दुःख 7 तो वह राजा मरा सा है, जीता नहीं है । प्रजा का करना ही क्षत्रिय का मुख्य धर्म है । इसलिए अपने धर्म ही से को फल भोग करना उचित है ॥ १४२-१४४ ॥ -...

पश्चिमे यामे कृतशौचः समाहितः ।

निर्ब्राह्मणांश्च प्रविशेत्सशुभां सभाम्॥ १४५ ॥

स्थितः प्रजाः सर्वाः प्रतिनन्द्य विसर्जयेत् । विसृज्य व प्रजाः सर्वा मन्त्रयेत्सह मन्त्रिभिः ॥ *१४६M ॥॥ गिरिपृष्ठं समारुह्य प्रासादं वा रहोगतः । अरण्ये निःशलाके वा मन्त्रयेदविभावितः ॥ १४७ ॥

यस्य मन्त्रं न जानन्ति समागम्य पृथग्जनाः ।

सक्कृत्स्नां पृथिवीं भुङ्क्ते कोशहीनोऽपि पार्थिवः॥ १४८॥

जडमूकान्धबधिरान्तिर्यग्योनान्वयोतिगान् ।

खीम्लेच्छ्व्याधितव्यङ्गान्मन्त्रकालेऽपसारयेत् ॥१४६ ॥

राजा बड़े तड़के उठकर, शौच से निपटकर, एकाग्र चित्त होकर श्रग्निहोत्र और ब्राह्मणसत्कार करके, राजसभा में प्रवेश करें । यहां दर्शकों को प्रीतिपूर्वक पहले बिदा करके फिर मन्त्रियों के साथ

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२३: मनुस्मृति राजकाज का विचार करे । पर्वत पर या महल में जाकर, एकान्त मैं वा वृक्षरहित वन में, जहाँ भेद लेनेवाले दूत न पहुँच सकें, वहाँ मन्त्री करे । जिस राजा के मन्त्र को दूसरे लोग मिले रहने पर भी नहीं जान सकते, वह धन-सम्पत्ति के न होते भी संपूर्ण पृथिवी को भोगता है । मूर्ख, गूँगा, अंधा, बहिरा, तोता-मैना श्रादि पक्षी, बूढ़े, स्त्री, म्लेच्छ, रोगी, और अङ्गहीनों को, सलाह के समय हटा देवे । प्रायः ये लोग गुप्त बातों को प्रकट कर दिया करते है ॥ १४५- १४६ ॥

भिन्दन्त्यत्रमतां मन्त्रं तिर्यग्योनास्तथैव च ।

स्त्रियश्चैव विशेषेण तस्मात्तत्रादृतो भवेत् ॥ १५० ॥।

मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे वा विश्रान्तो विगतक्लमः चिन्तयेद्धर्मकामार्थान् सार्धं तैरेक एव वा ॥ १५१ ॥

परस्परविरुद्धानां तेषां च समुपार्जनम् ।

कन्यानी संप्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् ॥ १५२ ॥

इतसंप्रेषणं चैव कार्यशेषं तथैव च ।

अन्तःपुरप्रचारं च प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥ ११३ ॥

कृत्स्न चाष्टविधं कर्म पञ्चवर्ग च तत्त्वतः ।

अनुरागापरागौ च प्रचारं मण्डलस्य च ॥ १५४ ॥

मध्यमस्य प्रचारं च विजिगीषोश्च चेष्टितम् ।

उदासीनप्रचार च शत्रोश्चैव प्रयत्नतः ॥ १५५ ॥

एताः प्रकृतयो मूल मण्डलस्य समासतः ।

अष्टौ वान्याः समाख्याताद्वादशैवतुताःस्मृताः ॥१५६ ॥

अमात्य राष्ट्रदुर्गार्थदण्डाख्याः पञ्च चापराः ।--

पृष्ठ 373

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सातवां अध्याय । २३३

प्रत्येकं कथिता हताः संक्षेपेण द्विसप्ततिः ॥ १५७ ॥

मूर्ख वगैरह, तोता, मैना और स्त्रियाँ प्रायः गुप्त सम्मति को प्रकाशित कर देती हैं इसलिए इन लोगों को धीरे से हटा देना चा-हिए । दोपहर या श्राधी रात को विश्राम करके, मन्त्रियों के साथ यालाही धर्म -अर्थ-काम का विचार करे । यदि धर्म, अर्थ, काम का परस्पर विरोध हो तो उनको मिटाकर अर्थोपार्जन, कन्यादान, दूत पुत्रों की रक्षा और शिक्षा की चिन्ता करे । परराज्य में भेजना, बाक़ी काम का, श्रन्तःपुर का और प्रतिनिधियों के काम का विचार करे । आठ प्रकार के सब काम और पञ्चवर्ग + का खूब विचार करे । मन्त्री आदि की प्रीति श्रप्रीति, शत्रु मित्र उदासीन आदि राजमण्डल पर विशेष ध्यान रक्खे | अपने से मध्यम बलवाले राजा के बर्ताव जीतने की इच्छा रखनेवाले की चेष्टा, उदासीन और शत्रु राजा के वृत्तान्तों को यत्न से जानता रहे । ये मध्यम आदि चार मिलकरप्रकृतियांबारहमण्डल काहोतीमूलहैंमानी। मंत्रीजाती, देशहैं, औरक़िलाजो, धनभण्डारश्रांठ हैं, वे, और दण्ड ये पांच प्रकृतियां और भी हैं । ये बारहों की अलग अलग होती हैं, यो सब मिलाकर संक्षेप में बहत्तर प्रकृतियां हुई। १५०-१५७॥ अनन्तरमरिं विद्यादरिसेविनमेव च । अरेरनन्तरं मित्रमुदासीनं तयोः परम् ॥ १५८ ॥.

तान् सर्वानभिसंदध्यात्सामादिभिरुपक्रमैः ।

व्यस्तैश्चैव समस्तैश्च पौरुषेण नयेन च ॥ १५६ ॥

* कर आदि की थाय, नौकरी में व्यय, नौकरों की चाल, विरुद्ध कार्यों को रोकना, मिथ्या व्यवहार रोकना, धर्मव्यवहार देखना, दण्ड देना, प्रायश्चित्त कराना, येाठ कर्म हैं । 1 + कापटिक, उदासीन, वैदेह, गृहपति, तापस, ये पाँच वर्ग हैं । + विजिगीषु, धरि, अरिसेवित, अरिमित्र, पाणिग्राह पाणिमाहासार, मित्र, मित्र का मित्र, श्राक्रन्द, आक्रन्दासार, मध्यम और उदासीन । ३०

पृष्ठ 374

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२३४ मनुस्मृति |

संधिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च ।

द्वैधीभावं संश्रयं च षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा ॥ १६० ॥

आसनं चैव यानं च संधिं विग्रहमेव च ।

कार्यं वीक्ष्य प्रयुञ्जीत द्वैधं संश्रयमेव च ॥ १६ ९ ॥

अपनी सीमा के पास रहनेवाले और शत्रु से मेल रखनेवाले राजा को शत्रु समझना चाहिए । शत्रु की सीमावाले राजा को मित्र और मित्र राजा की सीमावाले को उदासीन जाने । इन सब को सामादि उपायों से या एक ही से वा लव उपायों से अथवा पुरुषार्थ से, या राजनीति ही से वश में करे । मेल, लड़ाई, चढाई,... क़िले में रहना, अपनी सेना के दो भाग करना और अपने सेब राजा का आश्रय लेना, इन छः गुणों का नित्य विचार करे । झासन, यान, संधि, विग्रह, द्वैध और प्राय इन गुणों को अवसर देख कर जब जैसा मौक़ा श्रावे तव तैसा काम

करना चाहिए । १५८–१६१ ॥

संधिं तु द्विविधं विद्याद्राजा विग्रहमेव च ।

उभे यानासने चैव द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६२ ॥

समानयानकर्माच विपरीतस्तथैव च ।

तदा त्वायतिसंयुक्तः संधिर्ज्ञेयो द्विलक्षणः ॥ १६३ ॥

स्वयं कृतश्च कार्यार्थमकाले काल एव वा ।

मित्रस्य चैवापकृते द्विविधो विग्रहः स्मृतः ॥ १६४ ॥

एकाकिनश्चात्ययिके कार्ये प्राप्ते यदृच्छया ।

संहृतस्य च मित्रेण द्विविधं यानसुच्यते ॥ १६५ ॥

संधि, विग्रह दो दो प्रकार के हैं । श्रासन, यान संश्रय भी दो दो प्रकार के हैं । वर्तमान या भविष्य में लाभ के लिए, मित्र राजा

पृष्ठ 375

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सातवां अध्याय । २३५ से मिल कर दूसरे के ऊपर चढ़ाई का नाम ' समानकर्मा सन्धि ' है । हम इसके ऊपर चढ़ाई करेंगे, तुम दूसरे पर करो ऐसी राय को ' समानकर्मा सन्धि ' कहते हैं । शत्रुपराजय के लिए उचित या अनुचित काल में खुद लड़ाई करना एक अपने मित्र के अपकार होने से, उसकी रक्षा के लिए लड़ाई करना दूसरा, ये दो भांति के विग्रह होते हैं । दैवयोग से, बहुत आवश्यक पड़ जाने पर अकेले या मित्र से मिलकर, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करना ये दो प्रकार की चढाइयां कहलाती हैं ॥ १६२–१६५ ॥

क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात्पूर्वकृतेन वा ।

मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम् ॥ १६६ ॥

बलस्य स्वामिनश्चैव स्थितिः कार्यार्थसिद्धये ।

द्विविधं कीर्त्यते द्वैधं षाड्गुण्यगुणवेदिभिः ॥ १६७ ॥

अर्थसम्पादनार्थं च पीड्यमानस्य शत्रुभिः ।. साधुषु व्यपदेशार्थं द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६८ ॥

पूर्वजन्म के पाप से या यहीं के कुकर्मों से, धन आदि से होन राजा का चुप मार कर बैठना, अथवा सामर्थ्य होते भी किसी मित्र के कहने से चुपचाप बैठा रहना, ये दो श्रासन कहलाते हैं । कार्यसिद्धि के लिए कुछ सेना को एक जगह और कुछ सेना के साथ राजा क़िले में रहे, यह दो प्रकार का द्वैध, गुणज्ञों ने कहा है | शत्रु से पीड़ित राजा के संकट दूर करने के लिए अथवा सत्पुरुषों को जनाने के लिए बली राजा का आश्रय लेना, यह दो - प्रकार का संश्रय कहलाता है ॥ १६६-१६८ ॥

यदावगच्छेदायत्यामाधिक्यं ध्रुवमात्मनः ।

तदात्वे चाल्पिक पीडां तदा सन्धि समाश्रयेत् ॥ १६६ ॥

यदा प्रकृष्टामन्येत सर्वास्तु प्रकृतीभ्रंशम् ।

पृष्ठ 376

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२३६ मनुस्मृति ।

अत्युच्छ्रितं तथात्मानं तदा कुर्वीत विग्रहम् ॥ १७० ॥

यदा मन्येत भावेन हृष्ट पुष्टं वलं स्वकम् ।

परस्य विपरीतं च तदा यायाद्रिपुं प्रति ॥ १७१ ॥

यदा तु स्यात्परिक्षीणो वाहनेन बलेन च ।

तदासीत प्रयत्न शनकैः सान्त्वयन्नरीन् ॥ १७२ ॥

मन्येतारिं यदा राजा सर्वथा वलवत्तरम् ।

.तदा द्विधा वलं कृत्वा साधयेत् कार्यमात्मनः ॥ १७३ ॥

जब भविष्य में अपनी उन्नति की श्राशा हो तब शत्रु से कुछ पीड़ित होकर भी सन्धि कर लेवे । जब अपने राजमण्डल को खूब प्रसन्न जाने और अपनी शक्ति को पूर्ण देखे, तव वैरी के साथ युद्ध करे | जय अपनी सेना को मन से प्रसन्न, हृष्ट-पुष्ट समझे और शत्रु की सेना को साधारण दशा में जाने, तब युद्ध की तैयारी करे | जब हाथी, घोड़ा आदि वाहन और सेना से क्षीण हो तब यतपूर्वक शान्ति से, शत्रु को समझा कर शान्त होकर रहे श्रर्थात् : लड़ाई में न लगे । और जब राजा अपने शत्रु को सर्वथा बलवान् जाने तब आधी सेना लड़ाई पर भेज दे और श्रधी अपने साथ में रखकर कार्यसाधन में लगे ॥ १६६-१७३ ॥

यदा परबलानां तु गमनीयतमो भवेत् ।

तदा तु संश्रयेत्क्षितं धार्मिकं बलिनं नृपम् ॥ १७४ ॥

निग्रहं प्रकृतीनां च कुर्याद्योऽरिवलस्य च ।

उपसेवेत तं नित्यं सर्वयत्तैर्गुरुं यथा ॥ १७५ ॥

यदि तत्रापि संपश्येद्दोषं संश्रयकारितम् ।

सुयुद्धमेव तत्रापि निर्विशङ्कः समाचरेत् ॥ १७६ ॥

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सातवां अध्याय । २३७

सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः ।

यथास्याभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥ १७७ ॥

आयतिं सर्वकार्याणां तदात्वं न विचारयेत् ।

श्रायतीनां च सर्वेषां गुणदोषौ च तत्त्वतः ॥ १७८॥

प्रायत्यां गुणदोषज्ञस्तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः ।

अतीते कार्यशेषज्ञः शत्रुभिर्नाभिभूयते ॥ १७६ ॥

और जब कि शत्रु के आधीन अपने को होता देखे तब भट- पट धार्मिक और बलवान् राजा की शरण लेवे । जो दुष्ट मन्त्रि- मण्डल आदि और शत्रुसेना को दवा सकता हो उस राजा की, गुरु के समान, नित्य सेवा करे । और यदि उस श्राश्रयवाले राजा से धोखा जाने तो निडर होकर युद्ध ही करे । नीतिवेत्ता राजा को सब भांति से ऐसा वर्ताव करना चाहिए जिससे उसके मित्र, उदासीन और शत्रु राजा बलवान् न हो जावें । सम्पूर्ण कार्यों की वर्तमान, भूत और भविष्य स्थिति और उनके गुण-दोषों का विचार किया करे । जो राजा कार्यों के भविष्य शुभाशुभ परिणाम को जानता है, वर्तमान कार्य का शीघ्र निश्चय कर लेता है और बाक़ी कामों को जानता है, उसका शत्रु कुछ नहीं कर सकते ॥१७४-१७६॥

यथैनं नाभिसंदध्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ।

तथा सर्व संविदध्यादेष सामासिको नयः ॥ १८० ॥

यदा तु यानमातिष्ठेदरिराष्ट्रं प्रति प्रभुः ।

तदानेन विधानेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८१ ॥

जिस प्रकार मित्र, उदासीन और वैरी राजा अपने को पीड़ा न दे सकें वैसे उपायों को करता रहे, यह नीति है । और जब-किसी बैरी के देश पर चढ़ाई करनी हो तो नीचे लिखी विधि से धीरे धीरे यात्रा करे ॥ १८०-१८१ ॥

पृष्ठ 378

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२३८ मनुस्मृति ।

मार्गशीर्षे शुभे मासि यायाद्यात्रां महीपतिः ।

फाल्गुनं वाथ चैत्रं वा मासौ प्रति यथाबलम् ॥१८२॥

अन्येष्वपि तु कालेषु यदा पश्येद्ध्रुवं जयम् ।

तदा यायाद्विगृह्यैव व्यसने चोत्थिते रिपोः ॥ १८३ ॥

कृत्वा विधानं मूले तु यात्रिकं च यथाविधि ।

उपगृह्यास्पदं चैव चारान् सम्यं विधाय च ॥ १८४ ॥

संशोध्यं विविधं मार्ग षड्विधं च वलं स्वकम् ।

सांपरायिककल्पेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८५ ॥

शत्रुसेविनि मित्रे च गूढे युक्क्तरो भवेत् ।

गतप्रत्यागते चैव स हि कष्टतरो रिपुः ॥ १८६ ॥

राजा अपनी सेना के बलावल का विचार करके, शुभ अगहन या फागुन के महीने में या चैत में, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करे । इसके सिवा दूसरे समय में भी अगर अपनी जीत देखे तवं श्रथवा . जव शत्रु किसी विपत्ति में फँसा हो तब चढ़ाई करे । अपने नगर की रक्षा का प्रबन्ध करके, गुप्तदूतों को भेजकर, ऊंचा, नीचा और सम मार्ग को साफ़ कराकर छः प्रकार की सेना को ठीक करके सम्पूर्ण युद्ध-सामग्री को साथ लेकर, धीरे से शत्रु के नगर को जावे | जो मित्र छिप कर शत्रु से मिला हो, जो पहले छुड़ाया नौकर फिर आया हो, इनसे सावधान रहे, क्योंकि ये दोनों दुःखदायक वैरी हैं ॥ १८२-१८६ ॥ दण्डव्यूहेन तन्मार्ग यायात्तु शकटेन वा । * छः प्रकार के बलः -हासवार, घोड़ासवारः रथसवार, पैदल, खजाना: और नौकर चाकर!

पृष्ठ 379

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सातवां अध्याय । २३६

वराहमकराभ्यां वा सूच्या वा गरुडेन वा ॥ १८७ ॥

यतश्च भयमाशङ्केत्ततो विस्तारयेद्बलम् ।

पद्मेन चैव व्यूहेन निविशेत सदा स्वयम् ॥ १८८ ॥

सेनापतिबलाध्यक्षौ सर्वदिक्षु निवेशयेत् ।

यतश्च भयमाशङ्केत्प्राचीं तां कल्पयेद्दिशम्॥ १८६ ॥

राजा, दण्डव्यूह! से मार्ग में चले अथवा शक, वराह, मकर, सूई, गरुड़ के तुल्य थाकार वाले व्यूहों में, जहां जैसा देखे वैसी यात्रा करे । जिस तरफ़ डर जाने, उधर सेना बढ़ावे और खुद पद्माकार व्यूह में सदा रहे । सेनापति और सेनानायकों को सब दिशाओं में नियुक्त करे और जिस दिशा में भय समझे उसे पूर्वदिशा मान लेवे ॥ १८७-१८६ ॥

गुल्मांश्च स्थापयेदाप्तान् कृतसंज्ञान् समन्ततः ।

स्थानयुद्धे च कुशलानभीरूनविकारिणः ॥ १६० ॥

संहतान्योधयेदरूपान् कामं विस्तारयेद्बहुन् ।

सूच्या वज्रेण चैवैतान् व्यूहेन व्यूह्य येोधयेत् ॥ १६ ९॥

स्यन्दनाश्वैः समे युद्ध्येदनूपे नौद्दिपैस्तथा ।

वृक्षगुल्मावृते चापैरसिचर्मायुधैः स्थले ॥ १६२ ॥

कुरुक्षेत्रांश्च मत्स्यांश्च पञ्चालान् शूरसेनजान् ।

दीर्घा लघुश्चैव नरानग्रानीकेषु योजयेत् ॥ १६३ ॥

+ दण्डा के समान फ़ौज रखना, दण्डव्यूह ऐसे ही शकटव्यूह वगैरह । ऐसी व्यूहरचना में थागे सेनापति, बीच में राजा, पीछे, सेनापति, दोनों बगल हाथी, उनके पास घोड़े और उनके आसपास में पैदल, इस तरह लम्बा जमाव दण्डव्यूह कहा जाता है ।

पृष्ठ 380

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२४० मनुस्मृति |

प्रहर्षयेद्दलं व्यूह्य तांश्च सम्यक् परीक्षयेत् ।

चेष्टाश्चैव विजानीयादरीन् योधयतामपि ॥ १६४ ॥

उपरुध्यारिमासीत राष्ट्रं वास्योपपीडयेत् ।

दूषयेच्चास्य सततं यवसान्नोदकेन्धनम् ॥ १६५ ॥

भिन्द्याञ्चैव तडागानि प्राकारपरिखास्तथा ।

समवस्कन्दयेच्चैनं रात्रौ वित्रासयेत्तथा ॥ १६६ ॥

उपजप्यानुपजपेद् बुध्येतैव च तत्कृतम् ।

युक्ते च देवे युध्येत जयप्रेप्सुरपेतभीः ॥ १६७ ॥

कुछ सेना का हिस्सा, चतुर पुरुष की अध्यक्षता में चारों तरफ़ से नियत करे और उनमें बाजा वगैरह का संकेत कर ले जिसमें समय समय पर हालात मिला करें । योधा कमती हों तो इकट्ठे करके युद्ध करावे, अधिक हों तो मनमानी, चारों तरफ़ फैलाकर, सूई के आकार के व्यूह से लड़ावे । संमभूमि में स्थ घोड़ों से, जल में नावों से, हाथियों से, वृक्ष आदि की झाड़ियों मैं बाणों से और स्थल में, ढाल तलवार चौरह से युद्ध करे । कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पञ्चाल, शूरसेन आदि देशों के ऊंचे और लिंगने मनुष्यों को सेना के श्रागे रक्खे । सेना को किसी रचना से खड़ी करके उत्लाह दिलावे और क्या क्या करने से खुशी या नाखुश होंगे इन बातों की परीक्षा करे और शत्रुओं के मुक़ाबले दिल से लड़ते हैं या नहीं यह चेष्टात्रों से जान लेवे । शत्रु लड़े वा 'न लड़े पर उसके देश को नष्ट कर के वहाँ का, अन्न, जल, चारा, ईंधन आदि उजाड़ देवे । तालाब, क़िला, खाँइयों को तोड़ दे, शत्रु पर हमला करे और रात में अनेक श्रावाज़ों से 'उसको डरा देवे । उसके मन्त्री आदि जो फूट सकें उनको लालच देकर मिलाले, उनसे शत्रु की कुल हालतें जाने । और समय अनुकूल श्रावे, तो निडर होकर, युद्ध करे ॥ १६०-११७ ॥