मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 391–400

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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आठवां अध्याय | २५१

प्रणष्टस्वामिकं रिक्थं राजा त्र्यब्दं निधापयेत् ।

अर्वाक्यब्दाद्धरेत्स्वामी परेण नृपतिर्हरेत् ॥ ३० ॥

बालक के दायभाग का द्रव्य, तब तक राजा के अधीन ( कोर्ट श्रावार्डस ) में रहे जब तक वह समावर्तनवाला अर्थात् पढ़ लिखकर चतुर न हो श्रोर बालिग न होजाय । बन्ध्या स्त्री, श्रपुत्रा, सपिण्डरहित, पतिव्रता, विधवा और बहुत दिन की रोगी स्त्री का भी धन राजा की रक्षा में रहे । इन जीती हुई स्त्रियों का धन भाई बन्धु हर लेना चाहें तो उनको चोरदण्ड के मुवाफ़िक़ दण्ड देवे । जिसका स्वामी बे पता हो उस लावारिस धन को राजा तीन साल तक रक्खे, उसके भीतर आ जाय तो ले जाय, नहीं तो वह राजा का ही होजाता है । २७-३० ॥

ममेदमिति यो ब्रूयात्सोऽनुयोज्यो यथाविधि ।

" संवाद्य रूपसंख्यादीन् स्वामी तद्द्रव्यमर्हति ॥ ३१ ॥

वेदयानो नष्टस्य देशं कालं च तत्त्वतः ।

वर्णं रूपं प्रमाणं च तत्समं दण्डमर्हति ॥ ३२ ॥

प्राददीताथषड्भागं प्रणष्टाधिगतान्नृपः ।

दशमं द्वादशं वापि सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ३३ ॥

प्रणष्टाधिगतं द्रव्यं तिष्ठेद्युक्तैरधिष्ठितम् ।

यांस्तत्र चौरान् गृह्णीयात्तान् राजेभेन घातयेत्॥ ३४॥

ममायमिति यो ब्रूयान्निधिं सत्येन मानवः ।

तस्याददीत षड्भागं राजा द्वादशमेत्र वा ॥ ३५ ॥

अनृतं तु वदन् दण्ड्यः स्ववित्तस्यांशमष्टमम् ।

तस्यैव वा निधानस्य संख्यायाल्पीयसीं कलाम्॥३६ ॥

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२५२ मनुस्मृति | तीन वर्ष के भीतर उसका मालिक श्राकर कहै कि यह मेरा धन है, तब राजा उससे ठीक तौर से पूछे कि धन कैसा है? कितना है? जो वह रूप, रंग, संख्या बतला दे तो उसको दे देना चाहिए । अगर खोई वस्तु का पता ठीक न बता सके तो उस पर उतना ही धन जुर्माना करे । कोई खोई वस्तु उसके मा लिक को देते समय उसकी रक्षा के कारण उस धन का छठां दशवां या बारहवां भाग राजा ले लेवे । किसीकी कोई चीज़ गुम गई हो और मिले तो राजा उसे पहरे में रक्खे और वहां से चुरानेवाला पकड़ा जाय तो उसको हाथी से मरवा देवे । जो पुरुष सचाई से कहे कि ' यह निधि मेरा है ' उसके निधि से छठां वां वारहवां भाग राजा ग्रहण कर लेवे । यदि वह दूसरे का अपना लेने की इच्छा करे तो उस निधि का आठवां भाग अथवा निधि गिनकर उसका कुछ भाग दण्ड देवे ॥ ३१-३६ ॥

विद्वांस्तु ब्राह्मणो दृष्ट्वा पूर्वोपनिहितं निधिम् ।

प्रशेषतोऽप्याददीत सर्वस्याधिपतिर्हि सः ॥ ३७ ॥

यं तु पश्येन्निधिं राजा पुराणं निहितं क्षितौ ।

तस्माद् द्विजेभ्यो दत्त्वार्धमर्धं कोशे प्रवेशयेत् ॥ ३८ ॥

यदि विद्वान् ब्राह्मण पुराने जमाने की निधि पाजाय तो वह सब ले ले । क्योंकि ब्राह्मण सवका स्वामी है और जो भूमि में पुरानी निधि राजा पावे तो उसका आधा द्विजों को बाँट दें और आधा अपने खजाने में रखवा देवे ॥ ३७-३८ ॥

निधीनां तु पुराणानां धातूनामेव च क्षितौ ।

अर्धभाग्रक्षणाद्राजा भूमेरधिपतिर्हि सः ॥ ३६ ॥

दातव्यं सर्ववर्णेभ्यो राज्ञा चौरैर्हृतं धनम् ।

राजा तदुपयुञ्जनश्चौरस्याप्नोति किल्विषम् ॥ ४० ॥

भूमि में गड़ा हुआ पुराना धन ' निधि ' कहलाता है ।.

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आठवां अध्याय | २५३

जातिजानपदान्धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् ।

समीक्ष्य कुलधर्माश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ४१ ॥

स्वानि कर्माणि कुर्वाणा दूरे सन्तोऽपि मानवाः ।

प्रिया भवन्ति लोकस्य स्वे स्वे कर्मण्यवस्थिताः॥४२॥

नोत्पादयेत्स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्य पूरुषः ।

न च प्रापितमन्येन ग्रसेदर्थं कथञ्चन ॥ ४३ ॥

भूमि का स्वामी और रक्षक होने से राजा गड़ा धन और धातु की खानों के आधे भाग का अधिकारी है । चोरों का चुराया हुआ धन छीन कर जिस वर्ण का हो उन सब को दे देय । यदि आप ग्रहण करे तो चोर के पाप का स्वयं भागी होता है । जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म ( व्यापार ) और कुलधर्म के अनु सार अर्थात् रिवाज के अनुसार राजा राजधर्म को प्रचारित करे । जाति, देश और कुलधर्म और अपने कर्मों को करते लागे दूर रहते भी लोक में प्रिय होते हैं । राजा वा राजपुरुष जो नालिश न करता हो उससे खुद नालिश न करवावें और कोई झगड़ा पेश करे तो उसमें आनाकानी न करे ॥ ३६-४३ ॥

यथा नयत्यस्सृक्पातैर्मृगस्य मृगयुः पदम् ।

नयेत्तथानुमानेन धर्मस्य नृपतिः पदम् ॥ ४४ ॥

सत्यमर्थं च संपश्येदात्मानमथ साक्षिणः ।

देशं रूपं च कालं च व्यवहारविधौ स्थितः ॥ ४५ ॥

सद्भिराचरितं यत्स्याद्धार्मिकैश्च द्विजातिभिः ।

तद्देशकुलजातीनामविरुद्धं प्रकल्पयेत् ॥ ४६ ॥

जैसे वधक ज़मीन पर गिरे रुधिर के बूंदों से मारे हुए मृग का घर खोज लेता है । वैसे राजा श्रनुमान से. मामला की स

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.२५४ मनुस्मृति । लियत को खोज सेवे । सत्य का निर्णय करे, अन्याय से खुद डरे गवाहों केठ, सत्य का एवं देश, काल और मामला का विचार करे । सज्जन पुरुष और धार्मिक द्विज जैसा आचरण करते हो और देश, कुल, जाति के श्राचार से जो खिलाफ़ न हो वैसा फ़ैसला करे ॥ ४४-४६ ॥

अधमर्णार्थसिद्ध्यर्थमुत्तमर्णेन चोदितः ।

दापयेद्धनिकस्यार्थमधमर्णाद्विभावितम् ॥ ४७ ॥

चैर्यैरुपायैरथं स्वं प्राप्नुयादुत्तमर्णिकः ।

तैस्तैरुपायैः संगृह्य दापयेदधमर्णिकम् ॥ ४८ ॥

धर्मेण व्यवहारेण छलेनाचरितेन च ।

प्रयुक्तं साधयेदर्थं पञ्चमेन बलेन च ॥ ४६ ॥

यः स्वयं साधयेदर्थमुत्तमर्णोऽधमर्णिकात् ।

न स राज्ञाभियोक्लञ्यः स्वकं संसाधयन् धनम् ॥५० ॥

अर्थेऽपव्ययमानं तु करणेन विभावितम् ।

दापयेद्धनिकस्यार्थ दण्डलेशं च शक्तितः ॥ ५१ ॥

क़र्ज़ा का लेना-देना । श्रधमर्ण -क़र्ज़दार से अपना क़र्ज़ा मिलने के लिए उत्तम -महा- जन कहे तो उसका धन राजा साबूत लेकर दिला देय | जिन्द जिन उपायों से महाजन अपना रुपया पासके, उन उपायों से दिलाने की कोशिश करे । महाजन धर्म से, दावा से, कपट से, दबाव से और पाँचवें उचित बलात्कार से अपना धन वसूल करे । यदि महाजन ऋणी से खुद अपना धन वसूल करले तो उसपर राजा कोई अभियोग ( मुक़द्दमा ) न करे । धनी के धन को क़र्ज़दार न क़बूल करे और महाजन साक्षी -गवाह और लेख

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आठवां अध्याय । २५५ से साबित कर दे तो राजा उसको धन दिलांवे और ऋणी के ऊपर शक्ति के अनुसार दराडं भी करे ॥ ४७-५१ ॥

अपह्नवेऽधमर्णस्य देहीत्युक्तस्य संसदि ।

अभियोक्ता दिशेद्देश्यं करणं वान्यदुद्दिशेत् ॥ ५२ ॥

प्रदेश्यं यश्च दिशति निर्दिश्यापह्नुते च यः ।

यश्चाधरोत्तरानर्थान् विगीतान्नावबुध्यते ॥ ५३ ॥

अपदिश्यापदेश्यं च पुनर्यस्त्वपधावति ।

सम्यक् प्रणिहितं चार्थं पृष्टः सन्नाभिनन्दति ॥ ५४ ॥

राजसभा में ऋणी से कहा जाय -महाजन का क़र्ज़ा कर दो, तो भी वह इन्कार करे तो राजा साक्षी, दस्तावेज़ वगैरह " पेश करने की आशा दे । जो कंठ गवाह या काराज़ पत्र पेश करे, जो पेश करके इन्कार करे और जो पूर्वापर की कही बातों का ध्यान न रक्खे! या जो बात को उलटता है, क़बूल करके भी पूंछने पर इन्कार करता है ॥ ५२-५४ ॥

संभाष्ये साक्षिभिश्च देशे संभाषते मिथः ।

निरुच्यमानं प्रश्नं च नेच्छ्रेयश्चापि निष्पतेत् ॥ ५५

ब्रूहीत्युक्तश्च न ब्रूयादुक्तं च न विभावयेत् ।

न च पूर्वापरं विद्यात्तस्मादर्थात् स हीयते ॥ ५६ ॥

साक्षिणः सन्ति मेत्युक्त्वा दिशेत्युक्तो दिशेन्न यः ।

धर्मस्थः कारणैरेतैर्हीनं तमपि निर्दिशेत् ॥ ५७" ॥

अभियोक्ता न चेद्रूयाद्वध्यो दण्ड्यश्च धर्मतः ।. न चेत् त्रिपक्षात्प्रब्रूयाद्धर्मं प्रति पराजितः ॥ ५८ ॥

यो यावन्निवीतार्थं मिथ्या यावति वा वदेत् ।

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२५६ मनुस्मृति ।

तौ नृपेण ह्यधर्मज्ञौ दाप्यौ तद्विगुणं दमम् ॥ ५६ ॥

पृष्टोऽपव्ययमानस्तु कृतावस्थो धनैषिणा ।

त्र्यवरैः साक्षिभिर्भाव्यो नृपब्राह्मणसन्निधौ ॥ ६० ॥

और जो एकान्त में गवाहों के साथ बातचीत करें, जाने हुए प्रश्न का उत्तर न दें, पूंछने पर कुछ न कहें और जो कहें सो दृढ़ता से न कहे जो पूर्वापर बातों को न जानें । ऐसे पुरुष अपने अर्थ- "" धन से हार जाते हैं । मेरे साक्षी हाज़िर हैं, ऐसा कह कर जो मांगने पर हाज़िर न कर सके, न्यायाधीश उसको भी हरा देय । बादी अपने दावा को सिद्ध न कर सके तो वह धर्मानुसार शिक्षा और दण्ड दोनों का पात्र होता है और जो प्रतिवादी -मुद्दाअलेह डेढ़ महीना के भीतर झूठे दावे से हुई हानि की नालिश न कर सके तो वह भी हारा समझा जाय । प्रतिवादी जितने धन के लिए झूठ बोले और बादीजितने धन का झूठा दावा करे, राजा - उन दोनों अधर्मियों को उसका दूना दण्ड करे । अगर राजा- और ब्राह्मण के सामने पूछने पर ऋणी इन्कार करजाय तो तीन. गवाह देकर ऋण सत्य करावें ॥ ५५-६० ॥

याद्दशा धनिभिः कार्या व्यवहारेषु साक्षिणः ।

तादृशान् संप्रवक्ष्यामि यथा वाच्यमृतं च तैः ॥ ६१ ॥

गृहिणः पुत्रिणो मौलाः क्षत्रविट्शूद्रयोनयः ।

अर्युक्ताः साक्ष्यमर्हन्ति न ये केचिदनापदि ॥ ६२ ॥

अव धुनियों को और दूसरों को भी कैसे गवाह देने चाहिएं और वे कैसे सच्ची गवाही दें, यह सब कहाजाता है । साक्षी गवाह । कुटुम्बी, पुत्रवान, उसी देश का वासी, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्ध ये लोग.. जय वादी बुलावै तो गवाही दे सकते हैं, सब कोई नहीं ॥ ६१-६२ ॥

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आठवां अध्याय । २५७

श्रताः सर्वेषु वर्णेषु कार्याकार्येषु साक्षिणः ।

सर्वधर्मविदोऽलुब्धा विपरीतांस्तु वर्जयेत् ॥ ६३ ॥

नार्थसम्बन्धिनो नाता न सहाया न वैरिणः ।

न दृष्टदोषाः कर्त्तव्या न व्याध्यार्त्ता न दूषिताः ॥ ६४ ॥

साक्षी नृपतिः कार्यो न कारुककुशीलवौ ।

न श्रोत्रियो न लिङ्गस्थो न सङ्गेभ्यो विनिर्गतः ॥ ६५ ॥

नाध्यधीनो न वक्तव्यो न दक्ष्युर्न विकर्मकृत् ।

न वृद्धो न शिशुर्नैको नाऽन्त्यो न विकलेन्द्रियः॥६६ ॥

नातन मत्तो नोन्मत्तो न क्षुत्तृष्णोपपीडितः ।

नश्रमार्त्तो न कामाच न क्रुद्धो नापि तस्करः ॥ ६७॥

सब वर्गों से जो यथार्थ कहनेवाले और धर्मश हों, लोभी न हों उनको साक्षी करना चाहिए । दावा में न धनके सम्बन्धी को, न सगे सम्बन्धी को, न मित्र को, न शत्रु को, न भूंठ शपथ करने वाले को, न रोगी को, और न पहले किसी अपराध में शरीक हो उनको गवाही करना चाहिए । राजा को, कारीगर को नई को, वेदपाठी को, संन्यासी और त्यागी को पराधीनं को, कर को, श्रं- धर्मी को, बुड्ढे को चालक को, एकही मनुष्य को चाण्डाल -भङ्गी को, लूला -लंगड़ा को भी गवाह न करे । रोगों से दुखी, नशाचाज़और, उन्मत्त, भूख -प्यास से दुखी, थका, कामपीड़ित, क्रोधी चोर को भी गवाह न माने ॥ ६३-६७ ॥

स्त्रीणां साक्ष्यं स्त्रियः कुर्युर्द्विजानां सदृशा द्विजाः ।

शूद्राश्च सन्तः शूद्राणामन्त्यानामन्त्ययोनयः ॥ ६८ ॥

अनुभावी तु यः कश्चित्कुर्यात्साक्ष्यं विवादिनाम् ।

अन्तर्वेश्मन्यरण्ये वा शरीरस्यापि चात्यये ॥ ६६ ॥

३३

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२५८ मनुस्मृति ।

स्त्रियायसम्भवे कार्य बालेन स्थविरेण वा ।

शिष्येण बन्धुनावापि दासेन भृतकेन वा ॥ ७० ॥

7 स्त्रियों की गवाही स्त्रियां, द्विजों की गवाही समान वर्ण के द्विज, शूद्रों की गवाही शूद्र श्रौर भङ्गी आदि की गवाही भङ्गी देवें । घर के भीतर, वन में ओर शरीरान्त ( ख़ून ) में, कोई भी जानने वाला पुरुष गवाह हो सकता है । कोई योग्य गवाह न मिले तो स्त्री, वालक, वूढ़े, शिष्य, सम्बन्धी, दास और नौकर चाकर भी गवाह हो सकते हैं ॥ ६८-७० ॥

बालवृद्धातुराणां च साक्ष्येषु वदतां मृषा ।

जानीयादस्थिरां वाचमुत्क्रिमनसां तथा ॥ ७१ ॥

साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च ।

वाग्दण्डयोश्च पारुष्ये न परीक्षेत साक्षिणः ॥ ७२ ॥

बहुत्वं परिगृह्णीयात्साक्षिद्वैधे नराधिपः ।

समेषु तु गुणोत्कृष्टान् गुणिद्वैधे द्विजोत्तमान् ॥ ७३ ॥

-समक्षदर्शनात्साक्ष्यं श्रवणाचैव सिध्यति ।

तत्र सत्यं ब्रुवन् साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते ॥ ७४॥

साक्षी दृष्टश्रुतादन्यद्विनुवन्नार्यसंसदि ।

अवाङ्नरकमभ्येति प्रेत्य स्वर्गाच्च हीयते ॥ ७५ ॥

यत्रानिवद्धोऽपीक्षेत शृणुयाद्वापि किंचन ।

पृष्टस्तत्रापि तद्ब्रूयाद्यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ७६ ॥

एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद्वह्वयः शुध्योऽपि नस्त्रियः ।

स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वाच्च दोषैश्चान्येऽपि ये वृताः ॥ ७७ ॥

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आठवां अध्याय | २५६

स्वभावेनैव यद्ब्रूयुस्तद्ग्राह्यं व्यावहारिकम् ।

तो यदन्यद्विवयुर्धर्मार्थं तदपार्थकम् ॥ ७८ ॥

यालक, वूढ़े और रोगियों के मूंठ बोलने का संभव रहता है, इसलिए उनके कहने पर भरोसा न रक्खे और चंचल चित्त मनुष्य को भी विश्वासी न आने । संपूर्ण साहस के काम खून, डाका आग लगादेना और चोरी, व्यभिचार, गाली और मारपीट में सा-.क्षियों की अधिक परीक्षा-जांच न करे । दोनों तरफ़ के गवाहों में यदि एक दूसरे के विपरीत कहे तो जिसको अधिक लोग कहें वही बात मानी जाय । और जहां दोनों विपरीत कहनेवाले समान हो वहां जिधर के गवाह गुणवान् हो उधर की बात सही माने और दोनों ही तरफ़ गुणी हो तो धर्मात्मा द्विजों की गवाही ठीक करे | जिसने आँखों से देखा हो या, जिसने खुद कानों से सुना हो, उसकी गवाही मानी जाती हैं । उसमें सच बोलने वाला साक्षी धर्म, अर्थ से नहीं हारता । जो पुरुष श्रार्यसभा में देखे सुने के विरुद्ध गवाही देता है, वह उलटे शिर नरक में पड़ता है । स्वर्ग से रहित होजाता है । जिस मामले में गवाह न भी हो तो भी पूंछने पर जैसा देखा, सुना हो वही बयान करे । निर्लोभ एक भी पुरुष गवाह काफ़ी होता है, पर बहुतसी पवित्र स्त्रियां भी गवाह नहीं होसकतीं । क्योंकि-स्त्रीकी बुद्धि स्थिर नहीं होती ।. निर्णय के समय, गवाह स्वाभाविक रीति से जो कहे, उसको प्रमाण माने । और भय-लोभ आदि से जो विरुद्ध बात कहें, वह बिलकुल व्यर्थ है ॥ ७१-७८ ॥

सभान्तः साक्षिणः प्राप्तानर्थिप्रत्यर्थिसन्निधौ ।

प्राङ्घिवाको ऽनुयुञ्जीत विधिनानेन सान्त्वयन् ॥ ७६ ॥

यद्द्द्वयोरनयोर्वेत्थ कार्येऽस्मिन् चेष्टितं मिथः ।... " तद्भूत सर्वं सत्येन युष्माकं ह्यत्र साक्षिंता ॥ ८० ॥

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२६० मनुस्मृति । सत्यं साक्ष्ये ब्रुवन् साक्षी लोकानाप्नोति पुष्कलान् इह चानुत्तर्मा कीर्त्ति वागेषा ब्रह्मपूजिता ॥ ८१ ॥

साक्ष्येऽनृतं वदन् पाशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम् ।

विवशः शतमाजातीस्तस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्॥ ८२ ॥

सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते ।

तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ ८३ ॥

आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः ।

मावमंस्थाः स्वमात्मानं नृणां साक्षिणमुत्तमम्॥ ८४॥

सभा में गवाह था जाने पर न्यायकर्त्ता वादी, प्रतिवादी के सामने इसप्रकार कार्यारम्भ करे -- इस मामला में आपस में जो • कुछ हुआ है, वह जो तुम जानते हो सत्य कहो क्योंकि इस में तुम्हारी गवाही है | गवाह गवाही में सत्य बोलकर, उत्तम गति को पाता है और यहां कीर्त्ति पाता है, सत्यवाणी की वेद में प्रशंसा की है । गवाही में झूटवोलने वाला सौ जन्मतक वरुण के पाशों से बांधा जाता है । इसलिए साक्षी सत्य देनी चाहिए । साक्षी सत्य से पवित्र होता है । सत्य से धर्म बढ़ता है, इसकारण: सव जाति के गवाहों को सत्य बोलना चाहिए । अपना माही अपनासाक्षी है, श्रात्माही अपने को सद्गति देता है । इस लिए मनुष्यों के उत्तम साक्षी अपने श्रात्मा का झुंड साक्षी से अपमान न करे ॥ ७६-८४ ॥

मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चित्पश्यतीति नः ।

'तांस्तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुषः ॥ ८५ ॥

द्यौर्भूमिरापो हृदयं चन्द्रार्काग्नियमानिलाः ।

रात्रिः सन्ध्ये च धर्मश्च वृत्तज्ञाः सर्वदेहिनाम् ॥ ८६ ॥