मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 401–410
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 401–410
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| आठवां अध्याय २६१ पापी लोग जानते हैं कि- पाप करते हमको कोई देखता नहीं, परन्तु उनको देवता और अन्तरात्मा देखता है । श्राकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, रात्रि, सन्ध्या और धर्म इन सब के अधिष्ठात्री देवता सब प्राणियों के भले बुरे आचरणों को देखते हैंहैं ॥॥ ८५-८६ ॥
देवब्राह्मणसान्निध्ये साक्ष्यं पृच्छेतं द्विजान् ।
उदङ्मुखान्प्राङ्मुखान्वा पूर्ववैशुचिःशुचीन् ॥८७॥
'; ब्रूहीति ब्राह्मणं पृच्छेत्सत्यं ब्रूहीति पार्थिवम् ।
गोबीजकाञ्चनैर्वैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ ८८ ॥
ब्रह्मनो ये स्मृता लोका ये च स्त्रीबालघातिनः ।
मित्रगृहः कृतघ्नस्य ते ते स्युर्ध्रुवतो मृषा ॥ ८६ ॥
जन्मप्रभृति यत्किञ्चित्पुण्यं भद्र त्वया कृतम् ।
तत्ते सर्वं शुनो गच्छेद्यदि ब्रूयास्त्वमन्यथा ॥ ६० ॥
raiserस्मीत्यात्मानं यत्त्वं कल्याण मन्यसे ।
नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता सुनिः ॥ ६१ ॥
मो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदि स्थितः । 1
तेन वेदविवादस्ते मा गङ्गां मा कुरून् गमः ॥ ६२ ॥
लग्नो मुण्डः कपालेन भिक्षार्थी क्षुत्पिपासितः । · अन्धः शत्रुकुलं गच्छेद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ ६३ ॥
अवाक्शिरास्तमस्यन्धे किल्बिषी नरकं व्रजेत् ।
त्यः प्रश्नं वितथं ब्रूयात्पृष्टः सन् धर्मनिश्वयैः ॥ ६४ ॥
न्यायाधीश स्नानादि से पवित्र होकर देवता और ब्राह्मण के समीप में पवित्र द्विजातियों को पूर्व या उत्तरमुख" कराकर
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२६२ मनुस्मृति | प्रातःकाल सच लच वृत्तान्त पूँछे । ब्राह्मण से ' कहो ' ऐसा पूंछे । J क्षत्रिय से ' सच बोलो ' इस भांति पूंछे । और ' गौ, वीज, सोना चुराने का पातक तुमको होगा ' ऐसा कहकर वैश्यों से पूंछे । L'सब पाप तुमको लगेगा ' यो कहकर शुद्र से साक्षी लेवे । ब्राह्मण, स्त्री, चालक को मारनेवाले को और मित्रद्रोही, कृतघ्न को जो जो लोक मिलते हैं वेही लोक मूंठ बोलनेवाले को मिलते हैं । भद्र पुरुष! जन्म से लेकर तूने जो कुछ पुण्य किया है, वह सव झुंडी गवाही देगा तो, कुत्ते को पहुँचेगा । हे भद्र! तूयह जो मानता है कि, मैं अकेला जीवात्मा हूं सो न मान । क्योंकि-पुण्य, पाप को देखनेवाला अन्तर्यामी नित्य हृदय में ही स्थित है । मरूप वैवस्वत देव हृदय में स्थित हैं, उसमें विश्वास रखने से गङ्गा और कुरुक्षेत्र जाने की ज़रूरत नहीं है । जो मूंडी गवाही देता है -उसको नङ्गा, शिर मुड़ाकर, भूखा प्यासा और अंधा होकर हाथ में ठीकरा लेकर शत्रु के घर भीख मांगने जाना पड़ता है । जो मूंड साक्षी पूंछने पर देता है । वह पापी नीचे शिर होकर, अँधरे नरक में पढ़ता है ॥ ८७-९४ ॥
अन्धो मत्स्यानिवाश्नन्ति स नरः कण्टकैः सह ।
यो भाषतेऽर्थवैकल्यमप्रत्यक्षं सभां गतः ॥ ६५ ॥
यस्य विद्वान् हि वदतः क्षेत्रज्ञो नाभिशङ्कते ।
तस्मान्न देवाः श्रेयांसं लोकेऽन्यं पुरुषं विदुः ॥ ६६ ॥
यावतो बान्धवान् यस्मिन् हन्ति साक्ष्येऽनृतं वदन् ।
तावतः संख्यया तस्मिन् शृणु सौम्यानुपूर्वशः॥६७॥
पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते ।
शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते ॥ ६८ ॥
हन्ति जातानजातश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन् ।
सर्व भूम्यनृते हन्ति मास्म, भूम्यनृतं वदीः ॥ ६६ ॥
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[आठवां अध्याय । २६३
अप्सु भूमिवदित्याहुः स्त्रीणां भोगे च मैथुने ।
जेषु चैव रत्नेषु सर्वेष्वश्ममयेषु च ॥ १०० ॥
जो सभा में विना देखी वात बनाकर बोलता है वह अंधा होकर sia सहित मछली खाता है । साक्षी के समय जिसकी जीवात्मा सत्य की शङ्का नहीं करता, उससे अच्छा देवगण दूसरे को नहीं मानते । हे सौम्य! जिस साक्षी में भूंठ बोलनेवाला जितने बान्धवों के मारने का फल पाता है वह यों है -- पशु के बारे में झूठ बोलने से पांच बान्धवों की हत्या का पातक होता है । गौके विषय मैं दश घोड़ा के सौ और पुरुष के लिए हज़ार की हत्या का पातक लगता है । सुवर्ण के लिए बोलने से पैदा हुए या होनेवालों की हत्या को पाता है और भूमि के लिए कहने से संपूर्ण प्राणियों के ध को करता है । इसलिए भूमि के बारे में कभी झूठी साक्षी न दे । सरोवर के जल, स्त्रीसंभोग, जल से पैदा मोती और नीलम आदि रत्नों के लिए झूठी गवाही देने से भूमि का सा दोष होता है ॥ ६५-१०० ||
'एतान् दोषानवेक्ष्य त्वं सर्वाननृतभाषणे ।
यथाश्रुतं यदादृष्टं सर्वमेवाञ्जसा वद् ॥ १०१ ॥
गोरक्षकान् वाणिजिकांस्तथा कारुकुशीलवान् ।
प्रेष्यान् वार्धुषिकांचैव विप्रान् शूद्रवदाचरेत्॥ १०२ ॥
इन सब पातकों को समझकर, जैसा देखा या सुना है वही ठीक ठीक कहो । गोपालक, बनियां, बढ़ई, लोहार, गाने बजाने का काम करनेवाले, नौकरी पेशा और व्याजखोर ब्राह्मणों से ॥गवाही लेते समय शुद्र के समान प्रश्न- सवाल करे ॥ १०१-१०२:
तद्वंदन् धर्मतोऽर्थेषु जानन्नप्यन्यथा नरः ।
न स्वर्गाच्च्यवते लोकादेवीं वाचं वदन्ति ताम्॥ १०३॥
शूद्रविट्क्षत्रविप्राणां यत्रार्तोक्तौ भवेद्वधः ।
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२६४ मनुस्मृति ।
तत्र वक्तव्यमनृतं तद्धिं सत्याद्विशिष्यते ॥ १०४ ॥
वाग्दैवत्यैश्च चरुभिर्यजेरंस्ते लरस्वतीम् ।
अनृतस्यैनसस्तस्य कुर्वाणा निष्कृतिं पराम् ॥ १०५ ॥
कूष्माण्डैर्वापि जुहुयाद्घृतमग्नौ यथाविधि ।
उदित्यृचा वा वारुण्या ऋचेनाब्दैवतेन वा ॥ १०६ ॥
त्रिपक्षादब्रुवन् साक्ष्यमृणादिषु नरोऽगदः ।
तदृणं प्राप्नुयात्सर्वं दशवन्धं च सर्वतः ॥ १०७ ॥
यस्य दृश्येत सप्ताहादुक्रवाक्यस्य साक्षिणः ।
रोगोऽग्निर्ज्ञातिमरणमृणं दाप्यो दमं च सः ॥ १०८ ॥
साक्षिकेषु त्वर्थेषु मिथो विवदमानयोः ।
अविन्दंस्तत्त्वतः सत्यं शपथेनापि लम्भयेत् ॥ १०६ ॥
महर्षिभिश्च देवैश्च कार्यार्थ शपथाः कृताः ।
वशिष्ठश्चापि शपथं शेपे पैजवने नृपे ॥ ११० ॥
जो मनुष्य जानता हुआ भी धर्मवश मूंड वोले तो वह स्वर्गलोकसे पतित नहीं होता क्योंकि उस सत्य को देववाणी कहते हैं । जिस मामला में शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के प्राण जाते हों वहाँ साक्षी झुंड बोले-वह झुंड भी सत्य से श्रेष्ठ है | कंठे गवाहों को उस पाप से छुटकारा पानेके लिए वाणी देवता के लिए चरु बनाकर सरस्वतीदेवी का पूजन करना चाहिए । अथवा कूष्माण्ड मन्त्रों ( यद्देवा देवहेडनम् यजु० २० । १४ ) से हवन करे । या वरुण देवता के (उदुत्तमं वरुणपाशम् यजु ० १२ । १२ ) मन्त्रसे अथवा जलदेवता के मन्त्र ( श्रापो हिष्ठां यजु० ११ । ५० ) से हवन करे । क़र्ज़ाके बारेमें साक्षी नीरोग होनेपर तीनदिनतक न आवे तो महां- जन अपना सब ॠण पावे और धन का दशांश गवाहपर दण्ड
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आठवां अध्याय | २६५ करे । गवाह को सात दिन के भीतर रोग, अग्नि, स्त्री पुत्रादि के मृत्यु की आपत्ति होजाय तो उसको दण्ड न करे । जिन वादी श्री प्रतिवादियों के गवाह न हों, उनका ठीक तत्त्व समझ में न श्रवे वो शपथ-क़सम से भी निर्णय करलेवे । महर्षि और देवताओं ने भी शपथ की थी । विश्वामित्रने वशिष्ठपर हत्या लगाई, थी तब उन्होंने रांजा पेजवमके समीप शपथ कीथी ॥१०३-११० ॥
न वृथा शपथं कुर्यात्स्वल्पेऽप्यर्थे नरो बुधः ।
वृथा हि शपथं कुर्वन् प्रेत्य चेह च नश्यति ॥ १११ ॥
कामिनीषु विवाहेषु गवां भक्ष्ये तथेन्धने ।
ब्राह्मणाभ्युपपत्तौ च शपथे नास्ति पातकम् ॥ ११२ ॥
सत्येन शापयेद्विप्रं क्षत्रियं वाहनायुधैः ।
गोवीजकाञ्चनैवैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ ११३ ॥
अग्निं वाहारयेदेनमप्सु चैनं निमज्जयेत् ।
पुत्रदारस्य वाप्येनं शिरांसि स्पर्शयेत् पृथक् ॥ ११४ ॥
मो नं दहत्यग्निरापो नोन्मजयन्ति च ।
न चार्तिमृच्छति क्षिप्रं स ज्ञेयः शपथे शुचिः ॥ ११५ ॥
बुद्धिमान पुरुष थोड़ी बात के लिए शपथ न करे । वृथा शपथ से लोक - परलोक दोनों बिगड़ते हैं । स्त्रियों में, विवाह में, गौवों 'के कुछ नुक़सान करने में यज्ञार्थ काष्ठसंग्रह में और ब्राह्मण की पति मैं भूँठा शपथ करने से पाप नहीं लगता । ब्राह्मण को सत्य की शपथ दे, क्षत्रिय को सवारी और शस्त्र की देय, वैश्य को गौ, अन्न और सुवर्ण की और शूद्र को सब पातक लगने की शपथ देय | अथवा शुद्र से शपथ में अग्नि उठवावे, जल में सोता लगवाये और उसके पुत्र या स्त्री के ऊपर हाथ रखवाचे । जिसको ३४
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२६६ मनुस्मृति । श्रग्नि न जलावे, जल में न डूबे और अचानक शिर पर आपत्ति न पड़जाय उसको शपथ में पवित्र जानना ॥ १११-११५ ॥ `
वत्सस्य ह्यभिशस्तस्य पुरा भ्रात्रा यवीयसाः।
नाग्निर्ददाह रोमापि सत्येन जगतः स्पृशः ॥ ११६ ॥
यस्मिन्यस्मिन् विवादे तु कौटसाक्ष्यं कृतं भवेत् ।
तत्तत्कार्य निवर्त्तेत कृतं चाप्यकृतं भवेत् ॥ ११७ ॥
लोभान्मोहाद्भयान्मैत्रात्कामात्क्रोधात्तथैव च ।
अज्ञानाद्बालभावाच्च साक्ष्यं वितथमुच्यते ॥ ११८॥
पूर्व काल में वत्सॠषि के ऊपर उनके छोटे भाई ने कलङ्क लगाया था कि तू शुद्रा के गर्भ का है । तव वत्स ने अग्नि में प्रवेश किया था, पर सत्यवश अग्नि ने उनका एक रोम भी नहीं जलाया । जिन जिन मुक़द्दमों में झूठी गवाही दी ऐसा निं- श्चय हो-उनको फिर से उलट कर परीक्षा करें । लोभ, मोह, भय, मित्रता, काम, क्रोध, अज्ञान और लड़कपन से गवाही झूठी
कही जाती है । ९९६-९९८ ॥
एषामन्यतमे स्थाने यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ।
तस्य दण्डविशेषस्तु प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ११६ ॥
लोभात्सहस्रं दण्ड्यस्तु मोहात्पूर्वं तु साहसम् ।
hist मध्यम दण्डौं मैत्रात्पूर्वं चतुर्गुणम्॥ १२० ॥
कामाद्दशगुणं पूर्वं क्रोधान्तु त्रिगुणं परम् ।
अज्ञानाद द्वे शते पूर्णे बालिश्याच्छतमेव तु ॥ १२१
एतानाहुः कौटसाक्ष्ये प्रोक्तान्दण्डान्मनीषिभिः ।
धर्मस्याव्यभिचारार्थमधर्मनियमाय च ॥ १२२ ॥
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आठवां अध्याय । २६७.
कौटसाक्ष्यं तु कुर्वाणांस्त्रीन्वर्णान् धार्मिको नृपः ।
प्रवासयेद्दण्डयित्वा ब्राह्मणं तु विवासयेत् ॥ १२३ ॥
दश स्थानानि दण्डस्य मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।
त्रिषु वर्णेषु यानि स्युरक्षतो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥ १२४ ॥
इनमें किसी एक कारण से जो भूंठी गवाही उसके दण्डों का निर्धार-क्रम से इस प्रकार है: -लोभ से झूठी गवाही देने पर हज़ार पण दण्ड, मोहले कहनेवाले पर प्रथम साहस अर्थात् २५० पण, भय से देनेपर मध्यम साहस का दूना और मित्रता के कारण से प्रथम साहस का चौगुना --१००० पण दण्ड देय । काम से दशगुना पूर्व साहस, क्रोध से तिगुना मध्यम साहस, श्रज्ञान से पूरे २०० प और मूर्खता से झूठ कहने पर १०० पण दुरांड-जु- ना करे । सत्य धर्म की रक्षा और अधर्म को रोकने के लिए ऋ-पियों ने इन दण्डों को कहा है । धार्मिक राजा झूठी गवाही देने वाले तीनों वर्णों को अपराध के अनुसार दण्ड देकर देश से निकाल और ब्राह्मण को दण्ड न देकर देशनिकाला ही करे । स्वायम्भूमनुं ने दण्ड देने के दश स्थान कहे हैं पर ब्राह्मण को देशनिकाले की ही सज़ा है ॥ ११६-१२४ ॥
उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम् ।
चक्षुर्नासा च कर्णौच धनं देहस्तथैव च ॥ १२५ ॥
अनुबन्धं परिज्ञाय देशकालौ च तत्त्वतः ।
सारापराधौ चालोक्य दण्डं दण्ड्येषु पातयेत् ॥ १२६ ॥
. लिङ्ग, पेट, जीभ, हाथ, पैर और आँख, नाक, कान, धन और शरीर ये दश दण्ड देने के स्थान हैं । अपराध और दण्ड सहनेकी शक्ति और देश, कालका विचार करके अपराधियों को दण्ड देवै ॥ १२५-१२६ ॥
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२६८ मनुस्मृति ।
अधर्मदंण्डनं लोके यशोघ्नं कीर्तिनाशनम्।
अस्वर्ग्यं च परत्रापि तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ १२७ ॥
अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् ।
यशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥ १२८ ॥
वाग्दण्डं प्रथमं कुर्याद्धिग्दण्डं तदनन्तरम् ।
तृतीयं धनदण्डं तु वधदण्डमतः परम् ॥ १२६ ॥
•वधेनापि यदा त्वेतान्निग्रहीतुं न शक्नुयात् ।
तदैषु सर्वमप्येतत्प्रयुञ्जीत चतुष्टयम् ॥ १३० ॥
अन्याय से दड देना, इस लोक में यश और कीर्ति का नाशक है । परलोक का बाधक है । निरपराधियों को दण्ड और अपरा- धियों को दण्ड़ न देने से राजा की बड़ी अकीर्ति होती है । श्रयश मिलता है और नरक में पड़ता है । प्रथम अपराध में वाग्दण्ड -स- 1 मझा देय, फिर अपराध करे तो धिक्कार-लानंत दे । उसके बाद करे तो जुर्माना करे । फिर भी करे तो शरीर दण्डं देवे । जब देहं दण्ड से भी अपराधियों को वश में न कर सके तो इन चारों दण्डों का प्रयोग करे ॥ १२७-१३० ॥
लोकसंव्यवहारार्थं याः संज्ञाः प्रथिता भुवि ।
ताम्ररूप्यसुवर्णानां ताः प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥
जालान्तरगते भानौं यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः ।
प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते ॥ १३२ ॥
लोक में व्यवहार के लिये सोना, चांदी आदि की जो संज्ञा माप -तौल प्रसिद्ध है वह यहां कहीं जाती है:- मकान के झरोखे से आनेवाली सूर्यकिरणों में जो छोटे छोटे धूल के कण दिखलाई देते.. हैं वह प्रथम मान है उसको त्रसरेणु कहते हैं ॥ १३१-१३२ ॥
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आठवां अध्याय । · २६६ त्रसरेणवोऽष्टौ विज्ञेया लिक्षैका परिमाणतः ता राजसर्षपस्तिस्ते त्रयो गौरसर्षपः ॥ १३३ ॥
सर्षपाः षट्यवो मव्यस्त्रियवं त्वेककृष्णलम् ।
पञ्चकृष्णलको माषस्ते सुवर्णस्तु षोडश ॥ १३४ ॥
पलं सुवर्णाश्चत्वारः पलानि धरणं दश ।
हे कृष्णले समधृते विज्ञेयो रौप्यमाषकः ॥ १३५ ॥
ते षोडश स्याद्धरणं पुराणश्चैव राजतः ।
कार्षापणस्तु विज्ञेयस्तात्रिकः कार्षिकः पणः ॥ १३६ ॥
धरणानि दश ज्ञेयः शतमानस्तु राजतः ।
चतुःसौवर्सिको निष्को विज्ञेयस्तु प्रमाणतः ॥ १३७ ॥
पणानां द्वे शते सार्धे प्रथमः साहसः स्मृतः ।
मध्यमः पञ्च विज्ञेयः सहस्रं त्वेव चोत्तमः ॥ १३८ ॥
मंत्रसरेणु = १ लिक्षा । ३ लिक्षा = १ राई । ३ राई = १ सफ़ेद सरसों । ६ सरसों = १ मध्यमथव । ३ मध्यमयव = १ कृष्णल । ५ कृष्णल = १ माष । १६ भाष = १ सुवर्ण । ४ सुवर्ण = १ पल । १० पल = १ धरण । २ कृष्णल = १ चांदी का भाषा । १६ चांदी मापा = १ धरण, वा चांदी का पुराण | तांबा के कर्ष- भर के पण पैसा को कार्षापण कहते हैं । १० धरण = १ चांदी का शतमान । ४ सुवर्ण = १ धरण । २५० पण = प्रथम साहस । ( साधारण दण्ड )
५०० पण = मध्यम साहस ।
१००० पण = उत्तम साहस ॥ १३३- १३८ ॥
ऋणे देये प्रतिज्ञाते पञ्चकं शतमर्हति ।
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२७० मनुस्मृति | अपह्नवे तद्विगुणं तन्मनोरनुशासनम् ॥ १३६ ॥
वशिष्ठविहितां वृद्धिं सृजेद्दित्तविवर्धिनीम् ।
प्रशीतिभागं गृह्णीयान्मासाद्वार्धुषिकः शते ॥ १४० ॥
द्विकं शतं वा गृह्णीयात्लतां धर्ममनुस्मरन् ।
द्विकं शतं हि गृह्णानो न भवत्यर्थकिल्विषी ॥ १४१ ॥
द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पञ्चकं च शतं समम् ।
मासस्य वृद्धिं गृह्णीयाद्वर्णानामनुपूर्वशः ॥ १४२ ॥
यदि ऋणो सभा में महाजन का रुपया देना क़बूल करे तो सैकड़े पांच दण्ड देने योग्य है । और इन्कार करे तो सैकड़े दश दण्ड देवे । वशिष्ठ के नियमानुसार सैकड़े का अस्सीवां भाग ( सवा रुपया सैकड़ा ) व्याज लेबे | श्रथवा दो रुपया सैकड़ा व्याज़ लेवे । दो रुपया सैकड़ा व्याज लेने से दोष नहीं होता । ब्राह्मण आदि चारों वर्षों से क्रम से दो, तीन, चार और पांच रुपये सैकड़ा माहवारी व्याज ग्रहण करे ॥ १३६-१४२ ॥
न त्वेवाधौ सोपकारे कौसीदीं वृद्धिमाप्नुयात् ।
न चाधेः कालसंरोधान्निसर्गोऽस्ति न विक्रयः ॥ १४३ ॥
न भोक्तव्यो बलादाधिर्भुञ्जानो वृद्धिमुत्सृजेत् ।
मूल्येन तोषये चैनमाधिस्तेनोऽन्यथा भवेत् ॥ १४४ ॥
आधिश्चोपनिधिश्चोभौ न कालात्ययमर्हतः ।. अवहार्यौ भवतां तौ दर्घिकालमवस्थितौ ॥ १४५ ॥
संप्रीत्या भुज्यमानानि न नश्यन्ति कदाचन ।
धेनुरूष्ट्रो वहन्नश्वो यश्च दृम्यः प्रयुज्यते ॥ १४६ ॥