मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 411–420
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 411–420
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आठवां अध्याय | II )
चिदशवर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी ।
भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ॥ १४७ ॥
भूमि, गौ, धन आदि भोग के पदार्थ यदि श्राधि-गिरवी महा-जन के रकसे तो महाजन को व्याज न मिले और नियमित समय मैं ऋणी छुड़ा न सके तो उसको महाजन वैच या किसीको दे नहीं सकता । श्राधि- गिरवी की वस्तु को ऋणी की शाशा विना न वर्ते यदि काम में लावे तो व्याज छोड़ देय और टूट फूटजाय तो ऋणको उसका बदला धन श्रादि देकर खुशकरे नहीं तो चोर माना जाता है । श्राधि-गिरवी और उपनिधि-अमानत के पदार्थ बहुत दिन पड़े रहें तो भी अवधि नहीं बीत जाती । जब मालिक चाहे 'तभी ले सकता है । गौ.ऊँट, घोड़ा वगैरह किसीने प्रेम से बर्तने को दिप हो और वह वर्तता हो तो भी उसके मालिक का हक़ बना रहता है । यदि किसी वस्तु को दूसरे लोग दश वर्षे तक ' वर्तते रहें और उसका मालिक चुपचाप देखाकरे, तो फिर वह उसको नहीं पालकता ॥ १४३-१४७ ॥
जडश्चेदपौगण्डो विषये चास्य भुज्यते ।
भग्नं तद्व्यवहारेण भोक्ता तद्द्रव्यमर्हति ॥ १४८ ॥
आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिः स्त्रियः ।
राजस्वं श्रोत्रियस्वं च न भोगेन प्रणश्यति ॥ १४६ ॥
यः स्वामिनाऽननुज्ञातंमाधिं भुङ्क्ते विचक्षणः ।
तेनार्धवृद्धिर्भोक्तव्या तस्य भोगस्य निष्कृतिः ॥ १५० ॥
वस्तु का स्वामी पागल न हो और नादान न हो पर उसका वस्तु दूसरा भोगता रहे तो न्याय से उसका अधिकार नहीं रहता । भोगनेवाला पाजाता है । गिरवी वस्तु, सीमा, वालक कां धन, धरोहर, प्रसन्नता से भोगार्थ दिया धन, स्त्री और राजा का धन,
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२७२ मनुस्मृति । श्रोत्रिय का धन इनको दूसरा भोगे तो भी स्वामी का अधिकार ' नहीं जाता । जो चालाक मनुष्य श्राधि को बिना स्वामी के कहे भोगता है उसको श्रधा व्याज छोड़ देना चाहिए क्योंकि उसका
श्रधा भोग से पट गया । १४८-१५० ॥
कुसीद वृद्धिद्वैगुण्यं नात्येति सकृदाहृता ।
धान्ये सदे लवे वाह्ये नातिक्रामति पञ्चताम् ॥ १५.१ ॥
कृतानुसारादधिका व्यतिरिक्ता न सिध्यति ।
कुसीदपथमाहुस्तं पञ्चकं शतमर्हति ॥ १५२ ॥
नातिसांवत्सरीं वृद्धिं न चादृष्टां पुनर्हरेत् ।
चक्रवृद्धिः कालवृद्धिः कारिता कायिका च या ॥१५३॥
ऋणं दातुमशक्नो यः कर्त्तुमिच्छेत्पुनः क्रियाम् ।
स दत्त्वा निर्जितां वृद्धिं करणं परिवर्तयेत् ॥ १५४ ॥
दर्शयित्वा तत्रैव हिरण्यं परिवर्तयेत् ।
यावती संभवेद्वृद्धिस्तावतीं दातुमर्हति ॥ १५५ ॥
क़र्ज़ा के रुपयों का सूद एकबार लेने पर ऋण का धन दूने से अधिक नहीं लिया जा सकता । और धान्य, वृक्ष के मूल, फल, ऊन और वाहन पांचने से अधिक नहीं लिये जाते हैं । जो सूद का ठहराव हो चुका है उससे अधिक शास्त्र के खिलाफ़ नहीं मिल सकता है । व्याज का क़ायदा यही है कि-अधिक से अधिक पांच रुपये सैकड़ा लिया जा सकता है । एक वर्ष नै व्याज मिला- कर, सूल धन दूना हो जाय तो उतना व्याज न लेय ' व्याज का व्याज न लेय ' नियतकाल बीतने पर दूना तिगुना आदि लेने का ठहराव न करे और उससे कोई काम धोखा देकर न करावे । जो कर्ज़दार पुराना क़र्ज़ा अदा न करसके और नया व्यवहार चलाना चाहे तो पुराने कागज़ को वदलाकर नया करा लेवे । लेकिन
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आठवां अध्याय । २७३ ब्याज भी न देसके तो उसको मूलधन में जोड़ देय । जो रक्रम हो उसका खुद दिया करे ॥ १५१-१५५ ॥
चक्रवृद्धिं समारूढो देशकालव्यवस्थितः ।
अतिक्रामन् देशकालौ न तत्फलमवाप्नुयात् ॥ १५६ ॥
समुद्रयानकुशला देशकालार्थदर्शिनः ।
.स्थापयन्ति तु यां वृद्धिं सा तत्राधिगमं प्रति ॥ १५७॥
यो यस्य प्रतिभूस्तिष्ठेद्दर्शनायेह मानवः ।
प्रदर्शयन् स तं तस्य प्रयच्छेत्स्वधनादृणम् ॥ १५८ ॥
चक्रवृद्धि का श्राश्रय करनेवाला महाजन देश-काल के नियम से ही ब्याज आदि पावे, मियाद गुज़रने पर पाने योग्य नहीं है । समुद्र आदि के रास्ते देश- विदेश में व्यापार चतुर महाजन 'जो श्राय-व्यय के अनुसार भाड़ा व्याज श्रादि तै करे वही प्रमाण है । जो मनुष्य जिसको हाज़िर करने के लिए प्रतिभू- जामिन हो वह उसे हाज़िर न कर सके तो अपने पास से उसका ऋण चुकावे ॥ १५६-१५८ ॥
प्रातिभाव्यं वृथादानमाक्षिकं सौरिकं च यत् ।
दण्डशुल्कावशेषं च न पुत्रो दातुमर्हति ॥ १५६ ॥
'दर्शनप्रातिभाव्ये तु विधिः स्यात्पूर्वचोदितः ।
दानप्रतिभुवि प्रेते दायादानपि दापयेत् ॥ १६० ॥
दातरि पुनर्दाता विज्ञातप्रकृतावृणम् । पश्चात्प्रतिभुवि प्रेते परीप्सेत्केन हेतुना ॥ १६ ९ ॥ *
निरादिष्टधनश्चेत्तु प्रतिभूः स्यादलंघनः ।
स्वधनादेव तद्दद्यान्निरादिष्ट इतिस्थितिः ॥ १६२ ॥
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III मनुस्मृति ।
सत्तन्मत्ताध्यधीनैर्वालेन स्थविरेण वा ।
असंबद्धकृतश्चैव व्यवहारो न सिध्यति ॥ १६३ ॥
सत्या न भाषा भवति यद्यपि स्यात्प्रतिष्ठितां ।
'वहिश्चेद्भाष्यते धर्मान्नियताद्व्यावहारिकात्॥ १६४ ॥
ज़मानत का धन, फ़िज़ूल दान, जुये का रुपया, मद्य का रुपया और जुर्माना का रुपया पिता के मरने पर उसके वंदले, पुनः नहीं दे सकता । सिर्फ हाज़िर करने की ज़मानत में पहली बात जाने । परन्तु ऋणी के बदले में क़र्ज़ श्रदा करने की ज़मानत वाला मर 'जाय तो उसके वारिसों से भी दिलावे । कर्ज़दार क़र्ज़ न दे और जामिन मरजाय तो महाजन कैसे अपना रुपया वसूल करे? किसी से नहीं । यदि जामिन को ॠणी रुपया सौंप गया हो और उसके पास भी खूब धन हो तो ज़मानती के मरने पर उसका पुत्र ऋण चुकाचे -यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है । नशावाज़, पागल, दुखी, पराधीन, वालक, बुड्ढा और सामर्थ्य के बाहर प्रतिज्ञा' करनेवाले का व्यवहार ठीक नहीं माना आतां । श्रपस की लिखा: पढ़ी या जबानी ठहरी भी कोई बात यदि धर्म - क़ानून और रिवाज़ के खिलाफ़ हो तो सच्ची नहीं मानी जाती ॥ १५६- १६४ ॥
योगाधमनविक्रीतं योगदानप्रतिग्रहम् ।
यत्र वाप्युपधिं पश्येत्तत्सर्वं विनिवर्तयेत् ॥ १६५ ॥
ग्रहीता यदि नष्टः स्यात्कुटुम्वार्थे कृतो व्ययः ।
दातव्यं बान्धवैस्तत्स्यात्प्रविभक्तैरपि स्वतः ॥ १६६ ॥
कुटुम्बार्थेऽध्यधीनोऽपि व्यवहारं यमाचरेत् ।
स्वदेशे वा विदेशे वा तं ज्यायान्न विचालयेत् ॥ १६७ ॥
कपट से किया हुआ वन्धक ( गिरवी ) विक्रय, दान, प्रतिग्रह और निक्षेप- धरोहर कोभी लौटा देना चाहिए । यदि ऋणी मॅर
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आठवां अध्याय । २७५ गया हो और ऋण का द्रव्य कुटुम्ब में लगाया हो तो उसके बान्धव मिले या जुड़े हों पर अपने धन से ऋण देवें प्रधीन पुरुष भी स्वामी के कुटुम्ब के लिए देश या परदेश। कोई - लेन देन करले तो स्वामी उसको क़बूल करलेवे में न करे ॥ १६५- १६७ ॥, इन्कार
चलाद्दत्तं बलाद्भुक्तं बलाद्यञ्चापि लेखितम् ।
सर्वान् बलकृतानर्थानकृतान् मनुरब्रवीत् ॥ १६८ ॥
त्रयः परार्थे क्लिश्यन्ति साक्षिणः प्रतिभूः कुलम् ।
चत्वारस्तूपचीयन्ते विप्र प्राढ्यो वणिनृपः ॥ १६६ ॥
श्रनादेयं नाददीत परिक्षीणोऽपि पार्थिवः } न चादेयं सम्रुद्धोऽपि सूक्ष्ममप्यर्थमुत्सृजेत् ॥ १७० ॥
नादेयस्य चादानादादेयस्य च वर्जनात् ।
दौर्बल्यं ख्याप्यते राज्ञः स प्रेत्येह च नश्यति ॥ १७१ ॥
स्वादानाद्वर्णसंसर्गात्वबलानां च रक्षणात् ।
बलं संजायते राज्ञः स प्रेत्येह च वर्धते ॥ १७२ ॥
बलात्कार से दिया, बलात्कार से भोग किया, कुछ लिखाया या कुछ किसी से कराया न किये के समान मनुजी ने कहा है । तीन दूसरे के लिए दुःख पाते हैं-साक्षी, जामिन और ऋणी के कुटुम्बी । ' और चार दूसरे के कारण बढ़ते हैं - ब्राह्मण, धनी, बनिया और राजा । राजा निर्धन होकर भी अनुचित धन आदि न लेवे और धनी होकर भी लेने योग्य धन थोड़ा भी न छोड़े । नने लायक यस्तु को लेने और लेने लायक़ को छोड़ने से राजा का ढीलापन ज़ाहिर होता है । और अपयश पाकर नष्ट होजाता है । उचित धन लेने से प्रजाओं को वर्णसंकर न होने देने से रक्षा करने से राजा को बल प्राप्त होता है । और लोक -परलोक में सुख भोगता है ॥ १६८-१७२ ॥
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२७६ मनुस्मृति ।: तस्माद्यम इव स्वामी स्वयं हित्वा प्रियाप्रिये ।
वर्तेत याम्यया वृत्त्या जितक्रोधोजितेन्द्रियः ॥ १७३ ॥
यस्वधर्मेण कार्याणि मोहात्कुर्यान्नराधिपः ।
अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ॥ ९ ७४ ॥
कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति ।
प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ १७५ ॥
इसलिए राजा यमराज के समान अपना प्रिय और प्रिय छोड़कर क्रोध और इन्द्रियों को वश में करके, समभाव प्रजापर रक्खे । जो राजा मूर्खता से अधर्म के कार्य करता है, उस दुष्ट को शत्रु शीघ्रही वश में कर लेते हैं । परन्तु जो काम, क्रोध को वश में करके, धर्म से कार्यों को देखता है, उसकी प्रजा समुद्र के नदियों की भांति अनुगामिनी होती हैं ॥ १७३-१७५ ॥
यः साधयन्तं छन्देन वेदयेद्धनिकं नृपे ।
स राज्ञा तच्चतुर्भागं दाप्यस्तस्य च तद्धनम्॥ १७६ ॥
कर्मणापि समं कुर्याद्धनिकायाधमर्णिकः ।
समोऽवकृष्टजातिस्तु दद्याच्छ्रेयांस्तु तच्छनैः ॥ १७७ ॥
अनेन विधिना राजा मिथो विवदतां नृणाम् ।
साक्षिप्रत्ययसिद्धानि कार्याणि समंतां नयेत् ॥ १७८ ॥
यदि ऋणी (अपने को राजप्रिय मानकर ) राजा से कहे कि धनी जबरदस्ती ऋण वसूल करता है तोभी राजा उसका धन दिलावे और ऋणीपर ऋण का चौथाई दण्ड करे । समानजाति वा हीनजाति क़र्ज़दार, महाजन का धन उसके यहां काम करके चुका दे और महाजन से ऊंची जाति का ऋणी धीरे धीरे श्रदा करदेवे! इसभांति राजा आपस में झगड़ा करनेवालों का निर्णय साक्षी, लेख आदि के आधार से करे ॥ १७६-१७८ ॥
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आठवां अध्याय । २७७
कुलजे वृत्तपत्रे धर्मज्ञे सत्यवादिनि ॥
महापक्षे धनिन्यार्थे निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ १७६ ॥
यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः ।
स तथैव गृहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः ॥ १८० ॥
यो निक्षेपं याच्यमानो निक्षेसुर्न प्रयच्छति ।
स याच्यः प्राड्विवाकेन तन्निक्षेतुरसन्निधौ ॥ १८१ ॥
साक्ष्यरूपे प्रणिधिभिर्वयोरूपसमन्वितैः ।
अपदेशैश्च संन्यस्य हिरण्यं तस्य तत्त्वतः ॥ १८२ ॥
स यदि प्रतिपद्येत यथान्यस्तं यथाकृतम् ।
न तत्र विद्यते किंचिद्यत्परैरभियुज्यते ॥ ९ ८३ ॥
निक्षेप - धरोहर -अमानत रखना । कुलीन, सदाचार, धर्मज्ञ, सत्यवादी, कुटुम्बी, घनी और प्रति-ष्ठितपुरुष' के पास निक्षेप-धरोहर रखना चाहिए । जो मनुष्य, जिसके यहां जो द्रव्य जिसप्रकार रक्खे, उसको उसीप्रकार लेना उचित है । क्योंकि जैसा देना, वैसा लेना । जो धरोहर रखनेवाले की वस्तु मांगने पर नहीं देता, उससे न्यायकर्त्ता राज-पुरुष रखनेवाले के पीछे मांगे । धरोहर के समय साक्षी न हो, तो राजा किसी वृद्ध -प्रामाणिक कर्मचारी से कुछ वस्तु किसी बहाने से उसके यहां रखवावे और थोड़ेही दिनों में मँगवाले । यदि वह राजकर्मचारी अपनी रक्खी वस्तु ठीक ठीक मांगने पर पा जावे तो जो धरोहर न पाने की नालिश करे उसको. डा समझे ॥ १७६-१८३ ॥ तेषां न दद्याद्यदि तु तद्धिरण्यं यथाविधि । तु उभौ निगृह्य दाप्यः स्यादिति धर्मस्य धारणा ॥ १८४ ॥
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२७८ मनुस्मृति ।
निक्षेपोपनिधी नित्यं न देयौ प्रत्यनन्तरे ।
नश्यन्ते विनिपाते तावनिपाते त्वनाशिनौ ॥ १८५ ॥
स्वयमेव तु यो दान्तस्य प्रत्यनन्तरे । ' न स राज्ञा नियोक्तव्यो न निक्षेतुश्च बन्धुभिः ॥१८६॥
अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम् ।
विचार्य तस्य वा वृत्तं साचैव परिसाधयेत् ॥ १८७ ॥
निक्षेपेष्वेषु सर्वेषु विधिः स्यात्परिसाधने ।.. समुद्रे नानुयात्किञ्चिद्यदि तस्मान्न संहरेत् ॥ १८८ ॥
चौरैर्हृतं जलेनोदमग्निना दग्धमेव वा ।
न दद्याद्यदि तस्मात्स न संहरति किंचन ॥ ९ ८६ ॥
निक्षेपस्यापहर्त्तारंमनिक्षेप्तारमेव च ।
सर्वैरुपायैरन्विच्छेच्छपथैश्चैव वैदिकैः ॥ १६० ॥
यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते ।
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ वा तत्समं दमम् ॥ १६ ९ ॥
और वह ठीक ठीक न देवे तो राजा पकड़कर दोनों की धरोहर दिलवावे | खुली या मुहर लगी धरोहर या मांगी वस्तु रखमेवाले की वस्तु उसके वारिसों को न देवे, क्योंकि रखनेवाले की मृत्यु होजाने से धरोहरं नम्र हो जाती है । जीता हो तो मिल सकती है । परन्तु धरोहर रखनेवाले की मृत्यु होजाने पर, यदि साहूकार खुशी से उसके वारिसों को दे देय, तो कम देने का दावा वारिस या राजा न चलावे । उस धन को प्रसन्नता से कम ज्यादा का कपड़ छोड़कर, स्वीकार करले । यही सब धरोहरों का नियम है जोकि विना मुहर रक्खी गई है और मुहरवाली में कोई शक नहीं होती । अमानत की वस्तु को चोर ले जाय, जल में
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आठवां अध्याय | २७६ • वह जाय, आग में जल जाय तो यदि साहूकार ने उसमें से कुछ नलिया हो, तो देनी नहीं पड़ती । जो धरोहर न लौटावे या जो विना रक्खेही जाल से मांगे उन दोनों का साम श्रादि उपाय और वैदिक शपथ ( हलफ़ ) से राजा निर्णय करे । जो धरोहर नहीं देता, या जो विना रक्खे ही मांगता है, उन दोनों को रांजा चोर के समान दण्ड देवे और धरोहरं के बराबर जुर्माना करे || १८४ - १६१ ॥
निक्षेपस्यापहर्त्तारं तत्समं दापयेद्दमम् ।
तयोपनिधिहर्त्तारमविशेषेण पार्थिवः ॥ १६२ ॥
उपदाभिश्च यःकश्चित्परद्रव्यं हरेन्नरः ।
स सहायः स हन्तव्यः प्रकाशं विविधैर्वधैः ॥ १६३ ॥
.निःक्षेपो यः कृतो येन यावांश्च कुलसन्निधौ ।
तावानेव स विज्ञेयो विब्रुवन् दण्डमर्हति ॥ १६४ ॥
मिथोदायः कृतो येन गृहीतो मिथ एव वा ।- मिथ एव प्रदातव्यो यथादायस्तथा ग्रहः ॥ १६५ ॥
निक्षितस्य धनस्यैवं प्रीत्योपनिहितस्य च ।
राजा विनिर्णयं कुर्यादक्षिण्वन्न्यासधारिणम्॥१६६ ॥
धरोहर और उपनिधि मारलेनेवालों को भी राजा यही दण्ड देवे | छल, कपट करके पराया धन हरनेवालों को उनके मदद- गारों के साथ सबके सामने अनेक पीड़ा दण्ड देवे । गवाहों के सामने जितना धरोहर हो उतना स्वीकार करने से पांव, बखेड़ा करनेवाला दण्डनीय होता है । जिसने एकान्त में धरोहर रक्खी और एकान्त मेंली हो, वह एकान्त में ही देना चाहिए । जैसे लेवे, वैसे देवे । धरोहर श्रार प्रेमसे भोगार्थ दिए धन का फ़ैसला ऐसा करना चाहिए, जिसमें धरोहर करनेवाले को कोई दुःख न पहुँचे ॥ १६२-१६६ ॥
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२८० मनुस्मृति ।
विक्रीणीते परस्य स्वं योऽस्वामी स्वाम्यसंमतः ।
न तं नयेत साक्ष्यं तु स्तेनमस्तेनमानिनम् ॥ १६७ ॥
'अवहार्यो भवेच्चैव सान्वयः षट्शतं दमम् ।
- निरन्वयोऽनपसरः प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम् ॥ १६८॥
अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एव वा ।
अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथास्थितिः ॥ १६६ ॥
दूसरे की वस्तु विना सालिक की श्राज्ञा जिसने बेंची हो उस वो व साहूकार को बिना गवाह चोर की भांति दण्ड देवें । दूसरे की वस्तु म्रनेवाला यदि उस धन के मालिक के वंश में हो तो छः सौ पण दर देवे और सम्बन्धी या बेचने का अधिकार न रखता हो तो चोर के मुवाफ़िक दण्ड योग्य है । इस प्रकार विना
मास्तिक की श्राज्ञा, बेंचा या दियाहुआ कोई पदार्थ नाजायज़ है ।
यही धर्मशास्त्र ( क़ानून ) की मर्यादा है ॥ १६७-१६६ ॥
सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित् ।
श्रागमः कारणं तत्र न सम्भोग इति स्थितिः ॥ २०० ॥
विक्रियाद्यो धनं किञ्चिद् गृह्णीयात्कुलसन्निधौ ।
क्रयेण स विशुद्धं हि न्यायतो लभते धनम् ॥ २०१ ॥
अथ मूलमनाहार्य प्रकाशक्रयशोधितः ।
प्रदण्ड्यो मुच्यते राज्ञा नाष्टिको लभते धनम् ॥ २०२ ॥
नान्यदन्येन संस्टष्टरूपं विक्रयमर्हति ।
न चासारं न च न्यूनं न दूरेण तिरोहितम् ॥ २०३ ॥
जिसको कोई वस्तु भोगते देखे पर खरीदते न देखा हो तो दूसरे का खरीद का लेख आदि प्रमाण होगा । भोग प्रमाण न होगा । यह व्यवहार की मर्यादा है । जो जाहिर तौर से विकती