श्रीगणेशाय नमः।

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 421–430

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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आठवां अध्याय । २८१ चीज़ को कुछ खरीद करे और पीछे कोई बखेड़ा उठे तो खरीदार निर्दोष है और उसको वह वस्तु पानी चाहिए । माल का मालिक न होकर बेचनेवाले को यदि खरीदनेवाला न ला सके पर बहुतों के सामने खरीदना साबित करदे तो दण्ड योग्य नहीं है । और उस खोई वस्तु का मालिक वापस ले सकता है । एक वस्तु दूसरी के रूप में मिलती हो तो उसको दूसरे के धोखे चैचना ठीक नहीं है और सड़ी, तौल में कम, विना दिखलाये अच्छी वस्तु के नीचे

खराय ढककर वैचना अनुचित है । २००-२०३ ॥

अन्यां चेद्दर्शयित्वान्यां वोढुः कन्या प्रदीयते ।

उभे ते एकशुल्केन वदित्यब्रवीन्मनुः ॥ २०४ ॥

नोन्मत्ताया न कुष्ठिन्या न च या स्पृष्टमैथुना ।

पूर्वं दोषानभिख्याप्य प्रदाता दण्डमर्हति ॥ २०५ ॥

ऋत्विग् यदि वृतो यज्ञे स्वकर्म परिहापयेत् ।

तस्य कर्मानुरूपेण देयोंऽशः सहकर्तृभिः ॥ २०६ ॥

दक्षिणासु च दत्तासु स्वकर्म परिहापयन् ।

कृत्स्नमेव लभेतांशमन्येनैव च कारयेत् ॥ २०७ ॥

एक कन्या दिखाकर दूसरी किसी का विवाह करदे तो दोनों का एकही मूल्य में विवाह कर लिया जाय मनु की आशा है । पागल, कोदिन, किसी से मुक्त हो तो न बतलाने से कन्यादान वाला दण्ड योग्य होता है ।' यज्ञ में वरण किया हुआ ऋत्विक 2 किसी कारण से अपना कर्म न पूरा करके तो दूसरों के साथ में उसको भी कर्मानुसार दक्षिणा देवे । सब दक्षिणा दी गई हो और रोगादिवश कर्म छोड़ दे तो दूसरे से पूरा कंराले ॥ २०४ -२०७ ॥ "

यस्मिन्कर्मणि यास्तुं स्युरुक्ताः प्रत्यङ्गदक्षिणाः ।

स एव ताददीत भजेरन् सर्व एव वा ॥ २०८ ॥

३६

पृष्ठ 422

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२८२ मनुस्मृति ।

रथं हरेत वाध्वर्युर्ब्रह्माधाने च वाजिनम् ।

होता वापि हरेदश्वसुद्गाता चाप्यनःक्रये ॥ २०६ ॥

सर्वेषामर्थिनो मुख्यास्तदर्धेनार्थिनोऽपरे ।

तृतीयिनस्तृतीयांशाश्चतुर्थांशाश्च पादिनः ॥ २ ९ ० ॥

संभूय स्वानि कर्माणि कुर्वद्भिरिह मानवैः ।

अनेन विधियोगेन कर्तव्यांशप्रकल्पना ॥ २११९ ॥

• प्रधान आदि कर्मों के जिन श्रङ्गों की जो दक्षिणा हों उनको कर्म करानेवाले अलग अलग लें अथवा वाँट लेव । श्राधान में रथ ध्वर्यु, घोड़ा ब्रह्मा या होता लेवे और सोम खरीदकर गाड़ी मैंआया हो तो गाड़ी उद्गाता पावे | यज्ञ के सोलह ऋत्विजों में होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा ये चार मुख्य ऋत्विज पूर्ण दक्षिणा में श्री के अधिकारी हैं- गौ देवे । दूसरे, मैत्रावरुण आदि चार को उसका श्राधा-२४ गौ, तीसरे अच्छावाकू आदि चार को तृतीयांश- १६ गौ और चौथे ग्रावस्तुत आदि को चतु- श्रश- १२गौ देय | इस प्रकार सोलह ऋत्विज मिलकर कर्म करें तो अपना अपना भाग चाँट लेवें ॥ २०८-२११ ॥ '

. धर्मार्थ येन दत्तं स्यात्कस्मैचिद्याचते धनम् ।

पश्चाच्च न तथा तत्स्यान्न देयं तस्य तद्भवेत् ॥ २१२ ॥

यदि संसाधयेत्तत्तु दर्पाल्लोभेन वा पुनः ।

- राज्ञा दाप्यः सुवर्णं स्यात्तस्य स्तेयस्य निष्कृति ॥२१३ ॥

दत्तस्यैषोदिता धर्म्या यथावदनपक्रिया ।

अतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वेतनस्यानपक्रियाम् ॥ २१४ ॥

किसी याचक को धर्मार्थ किसी ने कुछ देना कहा हो पर वह कर्म न करे तो उसको प्रतिज्ञात धन न देते । जो याचक गर्व या /

पृष्ठ 423

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आठवां अध्याय । २८३ लोभ से उस धन का दावा करे तो राजा, चोर मान कर एक सुवर्ण उस पर जुर्माना करे । इस प्रकार दिये धन को लौटाने का निर्णय धर्मानुसार किया है । श्रव नौकर को वेतन न देने का निर्णय कहा जायगा ॥ २१२-२१४ ॥

भूतोनात न कुर्यायो दर्पात्कर्म यथोदितम् ।

स दण्ड्यः कृष्णलान्यष्टौन देयं चास्य वेतनम्॥ २१५ ॥

नौकर का वेतन तनख्वाह । जो नौकर विना बीमारी के घमंड से ठहराव के अनुसार काम न करे तो उसपर आठ कृष्णल जुर्माना करे और वेतन न देय ॥ २१५ ॥

प्रार्त्तस्तु कुर्यात्स्वस्थः सन् यथाभाषितमादितः ।

स दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम् ॥ २१६ ॥

यथोक्तमार्तः सुस्थो वा यस्तत्कर्म न कारयेत् ।

न तस्य वेतनं देयमल्पोनस्यापि कर्मणः ॥ २१७ ॥

एष धर्मोऽखिलेनोक्तो वेतनादानकर्मणः ।

श्रतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धर्मं समयभेदिनाम् ॥ २१८ ॥

परन्तु जो बीमार हो और नीरोग होकर ठहराव के पावेगाअनुसार। काम करे तो अधिक दिन बीमार रहा हो तो भी वेतन रोगी या नीरोग हो ठहरे हुए काम को न करेवेतनया नदूसरेदेयं से। यहन करा दे अथवा कुछ कम काम करे तो उसको धर्मानुसार वेतन न देने का निर्णय कहा है । अब प्रतिज्ञाभङ्ग करनेवालों का निर्णय किया जायगा ॥ २१६-२१८ ॥

यो ग्रामदेशसङ्घानां कृत्वा सत्येन संविदम् ।

. विसंवदेन्नरो लोभात्तं राष्ट्राद्विप्रवासयेत् ॥ २१६ ॥

पृष्ठ 424

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- = मनुस्मृति ।

निगृह्य दापयेचैनं समयव्यभिचारिणम् ।

चतुःसुवर्णान् षरिनष्काञ्छतमानं च राजतम् ॥ २२० ॥

एतद्दण्डविधिं कुर्याद्धार्मिकः पृथिवीपतिः ।

ग्रामजातिसमूहेषु समयव्यभिचारिणाम् ॥ २२१ ॥

•प्रतिज्ञाभङ्ग - इक़रार तोड़ना । जो मनुष्य गाँव या देश के लोगों से किसी काम के लिए सत्य- प्रतिज्ञा करके लोभ से उसको छोड़ देवे तो राजा उसको राज्य से निकाल दे और उस नियमभङ्ग करनेवाले को पकड़कर चार निष्क वा छः सुवर्ण या एक चांदी का शतमान दड करे । धार्मिक राजा गाँव यां जातिमण्डल में प्रतिलाभङ्ग करनेवाले को इस भांति दएड करे ॥ २१६-२२१ ॥

क्रीत्वा विक्रीय वा किञ्चिद्यस्येहानुशयो भवेत् ।

सोऽन्तर्दशाहात्तद्द्रव्यं दद्याच्चैवाददीत च ॥ २२२ ॥

परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नापि दापयेत् ।

आददानो ददचैव राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट् ॥ २२३ ॥

किसी वस्तु को खरीद वा वैचकर जिसको पसंद न हो वह दश दिन के भीतर उसको वापस कर दे या सेवें । परन्तु दश दिन के बाद न वापस करे न करावे । क्योंकि समय भङ्ग करने से ६०० पण दण्ड उस पर किया जायगा || २२२-२२३ ॥

यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति ।

तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं स्वयं पण्णवतिं पणान्॥ २२४ ॥

अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाड् द्वेषेण मानवः ।

स शतं प्राप्नुयाइएडं तस्या दोपमदर्शयन् ॥ २२५ ॥

पृष्ठ 425

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आठवां अध्याय । -२८५

पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः ।

नाकन्यासु कचिनृणां लुप्तधर्मक्रिया हि ताः ॥ २२६ ॥

पाणिग्रहणिका मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् ।

तेषां निष्ठा त विज्ञेया विद्वद्भिः सप्तमे पदे ॥ २२७ ॥

यस्मिन् यस्मिन् कृते कार्ये यस्येहानुशयो भवेत् ।

तमनेन विधानेन धर्म्ये पथि निवेशयेत् ॥ २२८ ॥

जो पुरुष दोषवाली कन्या के दोष विना बतलाए विवाह करदे उसपर राजा ६६ पण दण्ड करे । किसी ईर्षा से कन्या में दोष लगावे, पर उसको न दिखलावे तो उस पर सौ १०० पण दण्ड " करे | विवाहसम्बन्धी वैदिक मन्त्र कन्याओं के लिए ही कहे हैं जो कन्या नहीं हैं उनके लिए नहीं क्योंकि उनका कन्यापन लोप होगया । विवाह के मन्त्र कन्या में स्त्रीत्व लाते हैं और उन मन्त्रों की समाप्ति सप्तपदी हो जाने पर होती है -ऐसा धर्मशास्त्रियों का निर्णय है । इस जगत् में जिस जिस काम के करने पर जिसको अफ़सोस पैदा होउसका निर्णय कही रीति से राजा करे॥ २२४-२२८॥

पशुषु स्वामिनां चैव पालानां च व्यतिक्रमे ।

विवादं संप्रवक्ष्यामि यथावद्धर्मतत्त्वतः ॥ २२६ ॥

दिवा वक्तव्यता पाले रात्रौ स्वामिनि तद्गृहे ।

योगक्षेमेऽन्यथा चेत्तु पालो वक्तव्यतामियात्॥२३० ॥

गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्याद्दशतोऽवराम् ।

गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यात्पालेऽभृते भृतिः ॥२३१ ॥

पशु के मालिक और चरवाह में प्रतिज्ञाभङ्ग होने पर इसऔरप्रकाररात निर्णय करे -पशुओं की रक्षा का भार दिन में चरवाहपर चरवाह उत्तर- मैंउनके मालिक पर है और चारे की कमी

पृष्ठ 426

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२८६. मनुस्मृति । दाता है । जो चरवाह दूध मात्र का वेतन पाता हो वह स्वामी की आज्ञा से दश गौत्रों में जो उत्तम हो उसको दुह लेय । यह विना तनख़्वाह के चरवाह की तनख्वाह है ॥ २२६-२३१ ॥

नष्टं विनष्टं कृमिभिः श्वहतं विषमे मृतम् ।

हीनं पुरुषकारेण प्रदद्यात्पाल एव तु ॥ २३२ ॥

विघुष्य तु हृतं चौरेर्न पालो दातुमर्हति ।

यदि देशे च काले च स्वामिनः स्वस्य शंसति ॥ २३३॥

•कर्णौ चर्म च बालांश्च बस्ति स्नायुं च रोचनाम् ।

पशुषु स्वामिनां दद्यान्मृतेष्वङ्गानि दर्शयेत् ॥ २३४ ॥

अजाविकेतु संरुद्धे वृकैः पाले त्वनायति ।

प्रसह्य वृको हन्यात्पाले तत्किल्बिषं भवेत् ॥ २३५ ॥

तासां चेदवरुद्धानां चरन्तीनां मिथो वने ।

यामुत्नुत्य वृको हन्यान्न पालस्तन्न किल्बिषी ॥२३६ ॥

जो पशुं खो जाय, कीड़े पड़कर मरजाय, कुत्तों से मारा जाय, गढ़े में गिरकर मरजाय, चरवाह की असावधानी से चोर लेजायँ तो उसको चरवाह मालिक को देवे । जो चोर हमला करके कोई पशु लेजायँ तो चरवाह ठीक समय पर मालिक से इत्तिला करे तो चरवाह दण्ड न देय । यदि पशु खुद मरजाय तो उसके कान, चमड़ा, वाल, बस्ति, स्नायु और रोचना वगैरह से कोई अङ्ग ‘ मालिक को दे देय और कोई अङ्ग दिखला दे । बकरी और भेड़ को भेड़िया घेर ले और चरवाह उनको छोड़कर भाग जावे तो (जिसको मारेगा उसका पातक चरवाह को लगेगा और यदि बकरी, भेड़ को चरवाहने घेर रक्खा हो और अचानक भेड़िया 'आकर मारडाले तो चरवाह पातकी न होगा ॥ २३२-२३६ ॥ धनुःशतं परीहारो ग्रामस्य स्यात्समन्ततः ।

पृष्ठ 427

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आठवां अध्याय | २८७ शम्यापातास्त्रयो वापि त्रिगुणो नगरस्य तु ॥ २३७ ॥

तत्रापरीवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि ।

न तत्र प्रणयेद्दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणाम् ॥ २३८ ॥

गाँव के चारों तरफ़ चार सौ हाथ या तीन लकड़ी फेंकने पर जितनी दूर गिरे वहां तक और नगर के आसपास उसकी - तिगुनी भूमि पशुओं के लिए छोड़ रखना उचित है, इस भूमि को ' परिहार ' कहते हैं । उस भूमि में बाढ़ न होने से न कोई पशु खाले तो राजा चरवाह को दण्ड न देय ॥ २३७-२३८ ॥ वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्ट्रो न विलोकयेत् ।: छिद्रं च वारयेत्सर्वं श्वसूकरमुखानुगम् ॥ २३६ ॥.

पाथ क्षेत्रे परिवृते ग्रामान्तीयेऽथवा पुनः ।

·; स पालः शतदण्डार्हो विपालांश्चारयेत्पशून्॥ २४० ॥

क्षेत्रेष्वन्येषु तु पशुः सपादं परणमर्हति । सर्वत्र तु सदो देयः क्षेत्रिकस्येति धारणा ॥ २४ ९ ॥.

अनिर्दशाहांगां सूतां वृषान् देवपशूंस्तथा ।

'सपालान्वाविपालान्वानदण्ड्यान्मनुरब्रवीत्॥२४२ ॥

क्षेत्रियस्यात्यये दण्डो भागाद्दशगुणो भवेत् ।

ततोऽर्धदण्डो भृत्यानामज्ञानात्क्षेत्रियस्य तु ॥ २४३ ॥

एतद्विधानमातिष्ठेद्धार्मिकः पृथिवीपतिः ।

स्वामिनां च पशूनां च पालानां च व्यतिक्रमे ॥ २४४ ॥

उस भूमि के बचाने को इतनी ऊंची बाड़ करे जिसमें ऊंट न देख सके और छोटे छेदों को बंद करदें जिसमें सुंर कुत्ता का मुँह न जाके । गाँव के था रास्ते के पास बाढ़ से धिरे खेतों का .

पृष्ठ 428

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२८८ मनुस्मृति । पशु खालें तो चरवाह को सौ. पण दण्ड करे ओर विना चर वाह के पशुओं को हाँक देवे । दूसरे खेतों में पशु हानि करे तो चरवाह पर सवां परा दण्ड करे । और खेत के स्वामी की हानि तो सब हालत में देनो ही चाहिए । दश दिन के भीतर की वियाई गो, सांड़ और देवार्पण करके छोड़े हुए पशु खेत खालें तो चर- वाह साथ हो या न हो, दण्ड नहीं होसकता-मनुजी फ़रमाते हैं । यदि खेतवालेही के पशु खेत चरें तो राजा हानि से दश- गुणा दण्ड करे और हलवाहों की भूल से हो तो उसका आधा 'दण्ड करे । इसभांति पशुओं के स्वामी, पशु और चरवाह के अपराध होनेपर धार्मिक राजा न्याय करे ॥ २३६-२४४ ॥

सीमां प्रतिसमुत्यन्ने विवादे ग्रामयोर्द्वयोः ।

ज्येष्ठे मासि नयेत्सीमां सुप्रकाशेषु सेतुषु ॥ २४५ ॥

सीमावृक्षांश्च कुर्वीत न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकान् । शाल्मलीन्सालतालांश्च क्षीरिणश्चैव पादपान् ॥ २४६॥ - सीमा -सरहद का निर्णय ।

• यदि दो गाँवों के हद का झगड़ा उठे तो जेठ मास में जय ज़मीन साफ़ हो तब उसका निश्चय करना । हद जानने के लिए बड़, पीपल, ढाक, सैमर, साल, ताल और दूधवाले कोई वृक्ष स्थापित करे ॥ २४५-२४६ ॥

गुल्मान्वेणूंश्च विविधाञ्छमीवल्लीस्थलानिच ।

शरान् कुढंजक गुल्मांश्च तथा सीमान नश्यति॥ २४७॥

तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रलवणानि च ।

सीमासंधिषु कार्याणि देवतायतनानि च ॥ २४८ ॥

उपच्छन्नानि चान्यानि सीमालिङ्गानि कारयेत् ।

सीमाज्ञाने नृणां वीक्ष्य नित्यं लोके विपर्ययम् ॥ २४६ ॥

पृष्ठ 429

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आठवां अध्याय । २८६

मनोऽस्थीनि गोवालांस्तुषान्भस्मकपालिकाः ।

करीपमिष्टकाङ्गाराञ्छर्करा वालुकास्तथा ॥ २५० ॥

यानि चैवंप्रकाराणि कालाद्भूमिर्न भक्षयेत् ।

तानि संधिपु सीमायामप्रकाशानि कारयेत् ॥ २५१ ॥

एतैर्नियेत्सीमां राजा विवदमानयोः ।

पूर्वभुक्त्या च सततमुदकस्यागमेनं च ॥ २५२ ॥

गुल्म, बांस, शर्मा, लता, रामशर, कुव्जक की बेल वगैरह लगावे तो सीमा नहीं बिगड़ती । तालाच, कुत्र, बावली, भरना, देवम- न्दिर सीमा के मेल पर बनवावे । सीमा के लिए लोक में प्रायः झगड़ा हुआ करता है इसलिए उसके जानने के लिए छिपा चिह्न भी कर रक्खे । पत्थर, हड्डी, गौके वाल, भूसी, राख, ठीकरा, सूखा गोवर, ईंट, कोयला, रोड़ा, रेता आदि वस्तुओंको जो बहुत दिनों तक ज़मीन में छपजाने लायक़ न हाँ उनको सीमाके नीचे रखदेवे । राजा इन चिह्नों से पुराने भोग से, नदी श्रादि जल मार्ग से, सीमा निर्णय करे ॥ २४७-२५२ ॥

यदि संशयएव स्याल्लिङ्गानामपि दर्शने ।

साक्षिप्रत्यय एव स्यात्सीमावादविनिर्णयः ॥ २५३ ॥

ग्रामीयककुलानां च समक्षं सीनि साक्षिणः ।

प्रष्टव्याः सीमलिङ्गानि तयोश्चैव विवादिनोः ॥ २५४ ॥

चिह्नों के देखने पर भी अगर कोई संदेह हो तो साक्षी गवाहों के विश्वास पर निर्णय होगा । वादी, प्रतिवादी, गांवके कुलीन पंचों के सामने सब बातें पूंछे और फ़ैसला करे ॥ २५३ - २५४ ॥

ते पृष्टास्तु यथा ब्रूयुः समस्ताः सीनि निश्चयम् ।

raatra सीमां सर्वास्तश्चैव नामतः ॥ २५५ ॥

३७

पृष्ठ 430

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२६० मनुस्मृति |

शिरोभिस्ते गृहirala aग्विणो रक्तवाससः ।

सुकृतैः शापिताः स्त्रैःस्वैर्नयेयुस्ते समञ्जसम् ॥ २५६ ॥

यथोक्तेन नयन्तस्ते पूयन्ते सत्यसाक्षिणः ।

विपरीतं नयन्तस्तु दाप्याः स्युर्दिशतं दमम् ॥ २५७ ॥

साक्ष्यभावे तु चत्वारो ग्रामाः सामन्तवासिनः ।

सीमाविनिर्णयं कुर्युः प्रयता राजसन्निधौ ॥ २५८ ॥

सामन्तानामभावे तु मौलानां सीनि साक्षिणाम् ।

इमानप्यनुयुञ्जीत पुरुषान्वनगोचरान् ॥ २५६ ॥

व्याधान्छाकुनिकान्गोपान्कैवर्तान्मूलखानकान् ।

व्यालग्रहानुञ्छवृत्तीनन्यश्च वनचारिणः ॥ २६० ॥

ते पृष्टास्तु यथा ब्रूयुः सीमां संधिषु लक्षणम् ।

'तत्तथा स्थापयेद्राजा धर्मेण ग्रामयोर्द्वयोः ॥ २६१ ॥

वे लोग पूंछने पर जैसा कहें उसीके मुताबिक़ सीमा बांधे और उन पञ्चों का नाम लिखले । वे साक्षी लाल फूलों की माला, लाल वस्त्र पहनकर शिर पर मिट्टी का ढेला रखकर अपने अपने पुण्य की शपथ खाकर ठीक बात कहें । वे सत्य साक्षी यथार्थ निर्णय करने से निष्पाप होते हैं और असत्य निर्णय करें तो दो लौ पण दण्ड उन पर करे । यदि साक्षियों का अभाव हो तो आसपास के चार ज़मींदार धर्म से राजा के सामने सीमा निर्णय करें | यदि ज़मींदार और गांव के पुराने वाशिन्दा सीमा के साक्षी न मिलें तो वनमें रहनेवाले मनुष्यों से पूंछे । व्याध, चिड़ीमार, ग्वाल, मछुए, जड़ खोदनेवाले, कना वनिकर जीनेवाले श्रादि - मनुष्यों से सब बातें निश्चित करे । वे लोग जैसा बतलावें उसी 'भांति राजा दो गावोंके बीच सीमाका स्थापन करे ॥ २५५-२६१ ॥