मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 481–490
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 481–490
पृष्ठ 481
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवां अध्याय | "३४१
पौत्रदौहित्रयोर्लोके न विशेषोऽस्ति धर्मतः ।
तयोर्हि माता पितरौ संभूतौ तस्य देहतः ॥ १३३ ॥
जैसी श्रात्मा है वैसाही पुत्र है । पुत्र और पुत्री समान हैं । इस लिए पिता की श्रात्मारूप - पुत्री बैठी हो तो दूसरा धन कैसे ले-जाय? जो धन माता को दहेज में मिला हो वह 'कन्या' का ही भाग है । और पुत्रहीन का सब धन दौहित्र का ही है । जिसको पुत्रिका किया हो उसका पुत्र, पुत्र --पिता का धन ले और वह पिता और नाना को पिण्डदान करे । लोक में धर्मानुसार पौन और दौहित्र में कुछ भेद नहीं है । क्योंकि दोनों के माता -पिता
एकही देह से उत्पन्न हुए हैं । १३०-१३३ ॥
पुत्रिकायां कृतायां तु यदि पुत्रोऽनुजायते ।
समस्तत्र विभागः स्याज्ज्येष्ठतानास्तिहिस्त्रियाः॥ १३४ ॥
पुत्रायां सृतायां तु पुत्रिकायां कथंचन ।
धनं तत्पुत्रिकाभर्ता हरेतैवाविचारयन्॥ १३५ ॥
प्रकृता वा कृता वापि यं विन्देत्सदृशात्सुतम् ।. पौत्रीमातामहस्तेन दद्यात्पिण्डं हरेद्धनम् ॥ १३६ ॥
पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । · प्रथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टपम् ॥ १३७ ॥
पुन्नानो नरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं सुतः ।
तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥ १३८ ॥
कायदिसमानपुत्रिकाभागकरनेकरे ।केउसमेंबाद कन्याअपने पुत्रकी होजायश्रेष्ठता तोनहींपुत्रमानीसवऔरधनजातीदौहित्र'ले-। पुत्रिका होनेवाली, कन्या सरजाय तो उसका पतिहो, समान जाति जाय । पुत्रिका विधान किया हो वा न किया नाना पीत्रवाम् वाले जामाता से जिस पुत्र को पावे- उसीसे
पृष्ठ 482
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३४२ मनुस्मृति । होता है, वही पिण्डदान करे और धन ले । पुरुष पुत्र से स्वर्गलोक को जीतता है, पौत्र से श्रनन्त -सुख पाता है और पुत्र के पौत्र से सूर्यलोक को पाता है । पुत्र 6 पुम्. नामक नरकं से पिता को बचाता है इसलिए ब्रह्मा ने स्वयं पुत्र संज्ञा की है ॥ १३४- १३८ ॥
'पौत्रदौहित्रयोर्लोके विशेषो नोपपद्यते ।
दौहित्रोऽपि मुचैनं संतारयति पौत्रवत् ॥ १३६ ॥
मातुः प्रथमतः पिण्डं निर्वपेत्पुत्रिका सुतः ।
द्वितीयं तु पितुस्तस्यास्तृतीयं तत्पितुः पितुः ॥१४० ॥
उपपन्नो गुणैः सर्वैः पुत्रो यस्य तु दत्रिमः ।
स हरेतैव तद्रिक्थं संप्राप्तोप्यन्यगोत्रतः ॥ १४१ ॥
लोक में पौत्र और दौहित्र में कुछ अन्तर नहीं है । दौहित्र भी नाना को पौत्र की भांति स्वर्ग पहुँचाता है । पुत्रिका- पुत्र पहला पिण्ड माता को देवे, दूसरा -माता के पिता को, तीसरा -नाना के पिता को देवे । जिसका दत्तक ( गोद लिया ) पुत्र, सर्वगुणस- कपन हो, वह दूसरे गोत्र से श्राकर भी उसकी सम्पत्ति का अधि- कारी होता है ॥ १३ - १४१ ॥
गोत्ररिक्थे जनयतुर्न हरेद्दत्रिमः क्वचित् ।
गोत्ररिक्थानुगः पिण्डो व्यपैति ददतः स्वधा॥ १४२ ॥
अनियुक्तासुतश्चैव पुत्रियाप्तश्च देवरात् ।
उभौ तौ नार्हतो भागं जारजातककामजौ ॥ १४३
नियुक्तायामपि पुमान्नार्यां जातोऽविधानतः ।
नैवार्हः पैतृकं रिक्थं पतितोत्पादितो हि सः ॥ १४४ ॥
हरेत्तत्र नियुक्तायां जातः पुत्रो यथौरसः ।
क्षेत्रिकस्य तु तद्वीजं धर्मतः प्रसवश्च सः ॥ १४५ ॥
पृष्ठ 483
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवां अध्याय | ३४३ वनं यो विभृयाद्भ्रातुर्नृतस्य स्त्रियमेव च ॥ सोऽपत्यं भ्रातुरुत्पाद्य दद्यात्तस्यैव तद्धनम् ॥ १४६ ॥
range अपने उत्पादक पिता के गोत्र और धन को नहीं पा सकता । जिसका गोत्र और धन पाता है, उसी को पिएडदान दे सकता है । चिना नियोगविधि से पैदा पुत्र और पुत्रवाली के दे-पर से उत्पन्न पुत्र दोनों पिता के धन के अधिकारी नहीं होते । क्योंकि वे जारज और कामज हैं । नियुक्त स्त्री में भी विधान के बिना पेश हुआ पुत्र, पिता का धन नहीं पासकता वह पतित से पैदा है परन्तु विधि से नियुक्त खोम उत्पन्न पुत्र औरस पुत्र के समान है। यह क्षेत्रवाल का बीज है -धर्म से उत्पन्न हुआ है । जो पुरुष मृत भाई की रखी और उस के धन का ग्रहण करे, वह नियोग- विधि से पुत्र पैदा करके उसको भाई का धन दे देय ॥ १४२-१४६ ॥
या नियुक्तान्यतः पुत्रं देवराद्वाप्यवाप्नुयात् ।
तं कामजमरिक्थीयं वृथोत्पन्नं प्रचक्षते ॥ १४७ ॥
एतद्विधानं विज्ञेयं विभागस्यैकयोनिषु ।
वह्नीषु चैकजातानां नानास्त्रीषु निवोधत ॥ १४८ ॥
ब्राह्मणस्यानुपूर्वेण चतस्रस्तु यदि स्त्रियः ।
तासां पुत्रेषु जातेषु विभागोऽयं विधिः स्मृतः ॥ १४६॥
जो नियुक्त -खो दूसरे पुरुष से पुत्र पैदाजातिकरेकीवहस्त्रियोंपुत्र में पैदा है । पिता को सम्पत्ति के प्रयोग्य है । एक एक पुरुष से अनेक पत्र के विभाग की यह रीति है । अब -घांट सुनो । ब्राह्मण जाति की स्त्रियों में उत्पन्न पुत्रों का हिस्सातो उनमें पुत्र पैदा होने के यदि क्रम से चारों वर्ण की॥ स्त्रियाँ१४७ - १४६हो ॥ पर इस प्रकार विभाग करे कीनाश गो वृपो यानमलङ्कारश्च वेश्म च ।१५० ॥ विप्रस्यौद्धारिकं देयमेकांशश्च प्रधानतः ॥
पृष्ठ 484
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३४४ मनुस्मृति । त्र्यंशं दायाद्धरेद्विप्रो द्वावंशी क्षत्रियासुतः । J वैश्याजःसार्धमेवांशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ १५१ ॥.
सर्व वा रिक्थजातं तदशधा परिकल्प्य च ।
धर्म्यं विभागं कुर्वीत विधिनानेन धर्मवित् ॥ १५२ ॥
चतुरोंशान् हरेद्विप्रस्त्रीनंशान् क्षत्रियासुतः ।
वैश्यापुत्रो हरेद्र द्वयंशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ १५३ ॥
यद्यपि स्यात्तु सत्पुत्रोऽप्यसत्पुत्रोऽपि वा भवेत् ।
नाधिकं दशमाद्दद्याच्छूद्रापुत्राय धर्मतः ॥ १५४ ॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्रापुत्रो न रिक्थभाक् ।
यदेवास्य पिता दद्यात्तदेवास्य धनं भवेत् ॥ १५५ ॥
' खेती का बैल, सांड़, सवारी का घोड़ा, गहना, रहने का स्थान और जो कीमती चीज़ हो उनको ब्राह्मणी के पुत्र को देवे । ब्राह्मणी का पुत्र धन में तिहाई ले, क्षत्रिया का दो भाग, वैश्या का डेढ़ भाग और शूद्रा का एक भाग ले । अथवा सब सम्पत्ति का दश भाग करके धर्मज्ञ पुरुष धर्मानुसार यो भाग करे ब्राह्मणीपुत्र कोऔरचारशूद्रापुत्रभाग, कोक्षत्रियापुत्रएक भागकोदे तीन। यद्यपिभाग,संत्पुत्रवैश्यापुत्रहो वाको दो भागपुत्र हो पर धर्म से शूद्रापुत्र को दशभाग से अधिक न दे । ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य के शूद्रा से पुत्र हो तो वह धन का भागी नहीं होता ।
जो कुछ पिता उसको दे वही उसका धन होगा ॥ १५० - १५५ ॥
समवर्णासु ये जाताः सर्वे पुत्रा द्विजन्मनाम् ।
उद्धारं ज्यायसे दत्वा भजेरन्नितरे समम् ॥ १५६ ॥
शूद्रस्य तु सवर्णैव नान्या भार्या विधीयते ।
तस्यां जाताः समांशाः स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत्॥ १५७॥
पृष्ठ 485
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवां अध्याय | ३४५ समान वर्ण की स्त्रियों में जो पुत्र उत्पन्न हों वे बड़े भाई को कुछ अधिक देकर चाक्री सम्पत्ति को समान बाँट लें । शूद्र की समान जाति ही की भार्या होती है, दूसरे वर्ण की विधि नहीं है । उसमें यदि सौ पुत्र भी हों तो भी वे समान भाग के अधिकारी होंगे ॥ १५६-१५७ ॥
पुत्रान् द्वादश यानाह नृणां स्वायम्भुवो मनुः ।
तेषां षड्वन्धुदायादाः षडदायादबान्धवाः ॥ १५८ ॥
औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च ।
गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवाश्च षट्॥ १५६॥
कानीनश्च सहोदरच क्रीतः पौनर्भवस्तथा ।
स्वयं दत्तश्च शौद्रश्च षडदायादबान्धवाः ॥ १६० ॥
यादृशं फलमाप्नोति कुलवैः संतरन् जलम् ।
तादृशं फलमाप्नोति कुपुत्रैः संतरंस्तमः ॥ १६१ ॥
यद्येकरिक्थिनौ स्यातामौरसक्षेत्रजौ सुतौ! यस्य यत्पैतृकं रिक्थं स तद्गृह्णीत नेतरः ॥ १६२ ॥
एक एवौरसः पुत्रः पित्र्यस्य वसुनः प्रभुः ।
शेषाणामानृशंस्यार्थं प्रदद्यात्तु प्रजीवनम् ॥ १६३ ॥
षष्ठं तु क्षेत्रजस्यांशं प्रदद्यात्पैतृकाद्धनात् ।
औरसो विभजन् दायं पित्र्यं पञ्चममेव वा ॥ १६४ ॥
और क्षेत्र पुत्र परिक्थस्य भागिनौ ।
दशापरे तु क्रमशो गोत्ररिक्थंशभागिनः ॥ १६५ ॥
हैं, उनमें छः स्वायम्भुव मनुने मनुष्यों के जो बारहश्रदायादपुत्र कहे- बान्धव हैं । बान्धव और दायाद कहलाते हैं और छः I
पृष्ठ 486
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३४६ मनुस्मृति । 1 रस, क्षेत्र, दत्तक, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और श्रपविद्ध ये छः दा- याद ( सम्पत्ति के भागी ) वान्धव हैं । कानीन, सहोदज, क्रीतक, पौनर्भव, स्वयंदत्त और शौद्र ये छः श्रदायाद -श्रवान्धव हैं । टूटी- फूटी नांव से जल तैरता हुआ जैसा फल पाता है, वैसाही फल कु- पुत्रों से नरकपार होने में पिता आदि को मिलता है । यदि पुत्र क्षेत्र में नियोगविधि से एक पुत्र हो, और किसी प्रकार दूसरा श्रीरस पुत्र'भी हो जाय तो दोनों क्षेत्रज --श्ररस अपने अपने पिताकी सम्पत्ति के भागी हैं । एक औरस पुत्रही पिता के धन का भागी होता है । शेष को दयावश, अन्न-वस्त्र देना चाहिए । औरस पुत्र पिताकी सम्पत्ति का विभाग करे तो क्षेत्र को छठां या पां- चवां भाग देवे । औरस और क्षेत्रज उक्त रीति से पितृधन के अधिकारी हैं । बाक़ी दश पुत्र, क्रम से गोत्रधन के भागी हैं । १५८-१६५ ॥
स्वक्षेत्रे संस्कृतार्यां तु स्वयमुत्पादयेद्धि यम् ।
तमौरसं विजानीयात् पुत्रं प्रथमकल्पितम् ॥ १६६ ॥
यस्तल्पजः प्रमीतस्य क्लीबस्य व्याधितस्य वा ।
स्वधर्मेण नियुक्तायां स पुत्रः क्षेत्रजः स्मृतः ॥ १६७ ॥
माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि ।
सदृशं प्रीतिसंयुक्तं स ज्ञेयो दत्रिमः सुतः ॥ १६८ ॥
सदृशं तु प्रकुर्याद्यं गुणदोषविचक्षणम् ।
पुत्रं पुत्रगुणैर्युकं स विज्ञेयश्च कृत्रिमः ॥ १६६ ॥
उत्पद्यते गृहे यस्य न च ज्ञायेत कस्य सः ।
स गृहे गूढ उत्पन्नस्तस्य स्याद्यस्य तल्पजः ॥ १७० ॥
मातापितृभ्यामुत्सृष्टं तयोरन्यतरेण वा ।
यं पुत्रं परिगृह्णीयादपविद्धः स उच्यते ॥ १७१ ॥
पृष्ठ 487
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवां अध्याय । ३४७
पितृवेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः ।
तं कानीनं वन्नाम्ना वोढुः कन्यासमुद्भवम्॥ १७२
या गर्भिणी संस्क्रियते ज्ञाताज्ञातापि वा सती । ॥
वोढुः स गर्भो भवति सोढ इति चोच्यते ॥ १७३ ॥
पुत्रों की संज्ञा । विवाह -संस्कार से सवर्णा स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है, उसको श्रीरस कहते हैं - वह मुख्य है । मृत, नपुंसक श्रीर रोगी की स्त्री में नियोग से जो पुत्र होता है वह ' क्षेत्रज ' है माता- पिता प्रसन्नतासे जल लेकर श्रापत्ति में जिसको देदें । वह दत्तक पुत्र है । जो सजातीय गुण- दोषज्ञ और पुत्र गुणों से युक्त हो, वह पुत्र करलिया जाय तो ' कृत्रिम ' कहलाता है । जिसके घर पुत्र पैदा हो, पर यह न मालूम हो किसका है? वह घर में गुप्तरीति " से पैदा ' गूढोत्पन्न ' जिसकी स्त्री में हो, उसका है । माता-पिता या एकही ने जिसको त्याग दिया हो उसका जो पालन करे वह उसका ' पविद्ध ' पुत्र कहलाता है । अपने पिता के घर, सजा- तीय पुरुष से, एकान्त में कन्या जो पुत्र पैदा करे उसको 'कानीन' कहते हैं । वह उस कन्या से विवाह करनेवाले का होता है । जो शात अथवा श्रज्ञात गर्भिणीके साथ विवाह किया जाय वह उसी पति का गर्भ है और उसको ' सहोढ ' कहते हैं ॥ १६६-१७३ ॥
क्रीणीयाद्यस्त्वपत्यार्थं मातापित्रोर्यमन्तिकात् ।
स क्रीतः सुतस्तस्य सदृशोऽसदृशोऽपि वा ॥१७४॥
या पत्या वा परित्यक्ता विधवा वा स्वयेच्छया ।
उत्पादयेत्पुनर्भूत्वा स पौनर्भव उच्यते ॥ १७५ "॥
साक्षतयोनिः स्याद्वतप्रत्यागतापि वा ।
पौनर्भवेन भर्त्रा सा पुनः संस्कारमर्हति ॥ १७६ ॥
पृष्ठ 488
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३४८ 'मनुस्मृति मातापितृविहीनो यस्त्यत्रो वा स्यादकारणात् । प्रात्मानं स्पर्शयेद्यस्मै स्वयं दत्तस्तु से
ये ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत्स ।
सं पारयन्नेव शवस्तस्मात्पारशवः स्मृतः ॥ १७८ ॥
दास्यां वा दासदास्यां वा यः शूद्रस्य सुतो भवेत् ।
सोऽनुज्ञातो हरेदशमिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ १७६ ॥
· जो अपनी उत्तर क्रिया के लिए माता-पिता से जिस पुत्र को खरीदता है वह उसका ' क्रीतक पुत्र ' होता है, खरीददार के स मान हो अथवा न हो | पति की त्यागी या विधवा स्त्री दूसरे की स्त्री होकर पुत्र जने उसको ' पौनर्भव ' कहते हैं । वह पति की त्यागी या विधवा स्त्री अक्षतयोनि हो तो, प्रायश्चित्त करके टू- सरे- पुनर्भू पति के पास रह सकती है । जो माता- पितासे हीन हो, विना कारणही जिस पुत्र को माता -पिताने त्याग दिया हो, वह, अपने को जिसे देदे वह स्वयंप्त " पुत्र कहाता है । ब्राह्मण का मना से शुद्रा में जिस पुत्र को पैदा करे, वह जीताही मुर्दा के मु- वाफ़िक़ है इसलिये उसे 'पारशव' कहते हैं । शूद्र का दासी में या दास की दासी में जो पुत्र हो, वह पिता की आज्ञा से अपना भाग -यह धर्ममर्यादा है ॥ १७४-२७६ ॥
क्षेत्रजादीन्सुतानेतानेकादश यथोदितान् ।
पुत्रप्रतिनिधीनाहुः क्रियालोपान् मनीषिणः ॥१८०॥
य एतेऽभिहिताः पुत्राः प्रसङ्गादन्यवीजजाः ।
.. यस्य ते बीजतो जातास्तस्य ते नेतरस्य तु ॥ १८१ ॥
ये क्षेत्रज आदि जो ग्यारह पुत्र कहे हैं, उनको पितर क्रिया का लोप न हो इसकारण पुत्र प्रतिनिधि श्राचार्यों ने कहा है । ये
पृष्ठ 489
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवां अध्याय | ३४६ औरस पुत्र के प्रसङ्ग से जो दूसरे के वीर्य से पुत्र गिनाये, वे जिन के वीर्य से पैदा है उन्होंके हैं - दूसरे के नहीं हैं ॥ १८०-१८१ ॥
भ्रातृणामेकजातानामेकश्चेत्पुत्रवान् भवेत् ।
सर्वास्तस्तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत् ॥ १८२ ॥
सर्वासामेकपत्नीनामेका चेत्पुत्रिणी भवेत् ।
सर्वास्तास्तेन पुत्रेण प्राह पुत्रवतीर्मनुः ॥ १८३ ॥
श्रेयसः श्रेयसोऽलाभे पापीयान् रिक्थमर्हति ।
बहवश्चेत्तु सदृशाः सर्वे रिक्थस्य भागिनः ॥ १८४ ॥
न भ्रातरो न पितरः पुत्रा रिक्थहराः पितुः ।
पिता हरेदपुत्रस्य रिक्थं भ्रातर एव च ॥ १८५ ॥
सहोदर भाइयों में यदि एक भी पुत्रवान् हो तो उस पुत्र से सब भाई पुत्रवान् हैं-ऐसा मनुजी कहते हैं । एक पुरुष की कई स्त्रियों मैं जो एक भी पुत्रवाली हो तो उससे सव पुत्रवाली हैं । औरस आदि पहले पहले पुत्र न हों तो अगले अगले पुत्र, पिताके धन के अधिकारी हैं और यदि बहुतसे पुत्र समानही हो तो, सब धन # के भागी हैं । पिता के धनको लेने वाले पुत्रही हैं, न भाई हैं न चचा श्रादि हैं | परन्तु पुत्रहीन का धन उसका पिता वा भाई ले सकता है ॥ १८२- १८५ ॥
त्रयाणामुदकं कार्यं त्रिषु पिण्डः प्रवर्तते ।
चतुर्थः संप्रदातैषां पञ्चमो नोपपद्यते ॥ १८६ ॥
अनन्तरः सपिण्डाद्यस्तस्य तस्य धनं भवेत् ।
अत ऊर्ध्वंस कुल्यःस्यादाचार्यः शिष्य एव वा॥ १८७॥
सर्वेषामप्यभावे तु ब्राह्मणा रिक्थभागिनः ।
विद्याः शुचयो दान्तास्तथा धर्मोन हीयते ॥ १८८॥
पृष्ठ 490
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३५० मनुस्मृति ।
अहार्यं ब्राह्मणद्रव्यं राज्ञा नित्यमिति स्थितिः ।
इतरेषां तु वर्णानां सर्वाभावे हरेनृपः ॥ १८६ ॥
बाप दादा और परदादा इन तीन को जल और पिण्डदान होता है । देनेवाला चौधा होता है- पाँचवें का सम्बन्ध नहीं है । जो सपिण्डों में अधिक समीप हो, उसका धन होता है । वह न हो तो कुलपुरुष वह भी न हो तो आचार्य, वह भी न हो तो शिष्य अधिकारी होता है । ये सब भी न हो तो धन ब्राह्मण पाते हैं । पर वे तीनों वेद के ज्ञाता, भीतर-बाहर से पवित्र जिते-न्द्रिय हों, जिससे श्राद्धादि कर्मों में हानि न पहुँचे । कोई भी लेने वाला न हो, तो भी ब्राह्मण का धन राजा को न लेना चाहिए --. धर्ममर्यादा है । परन्तु दूसरे वर्णों का धन कोई लेनेवाला न हो तो राजा ले सकता है ॥ १८६-१८६ ॥
संस्थितस्यानपत्यस्य सगोत्रात्पुत्रमाहरेत् ।
तत्र तद्रिक्थजातं स्यात्तत्तस्मिन्प्रतिपादयेत् ॥ १६० ॥
द्वौ तु यौ विवदेयातां द्वाभ्यां जातौ स्त्रिया धने । तयोर्यद्यस्य पित्र्यं स्यात्तत्स गृह्णीत नेतरः ॥ १६१ ॥.
जनन्य संस्थितायां तु समं सर्वे सहोदराः ।
भजेरन् मातृकं रिक्थं भगिन्यश्च सनाभयः ॥१६२॥
यास्तासां स्युर्दुहितरस्तासामपि यथार्हतः ।
मातामह्या धनात्किञ्चित्प्रदेयं प्रीतिपूर्वकम् ॥ १६३ ॥
कोई पुत्रहीन मरजाय तो उसके सगोत्र में से पुत्र लें और उस पुरुष का जो धन हो, उसे सौंप दे । एक स्त्री में दो पुरुषों से पैदा दो पुत्र, औरस-पौनर्भव धन के लिए विवाद करें तो, जिसके पिता का जो धन हो वही उसको ले, दूसरा न लेय । माताके म रने पर सब सहोदर भाई और कुमारी बहनें माता के धन को