श्रीगणेशाय नमः।
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 471–480
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 471–480
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नवां अध्याय | ३३१- श्वेत वस्त्र पहने मन, वाणी, शरीर से शुद्ध उस कन्या के साथ उसका देवर गमन करे और सन्तान होने तक ऋतुकाल में उक्तरीति से एक एक वार गमन करे । चतुर पुरुष एक बार " कन्या देकर फिर दूसरे को न दें, क्योंकि एक बार वाग्दान करके दूसरे को देने से चोरी का पाप लगता है । जो कन्या रोगी, दुष्ट श्रीर छल से दी गई हो, उसको विधिपूर्वक ग्रहण करके भी त्याग देवे | जो दोपवाली कन्या का विना दोष कहे विवाह कर दे उस दुरात्मा पुरुष के दानको त्याग दे । कार्यवश विदेश जाने वाला मनुष्य स्त्री के भरण पोषण का प्रवन्ध करके जाय । क्योंकि सदाचारी स्त्री भी अन्न- वस्त्र के लिए दुखी होकर बिगड़ जाती हैं । प्रबन्ध करके पति के विदेश जाने पर स्त्री नियम से रहे, शृङ्गार आदि न करे । और प्रवन्ध विना किए चला गया हो तो सीना फातना आदि उद्यम से निर्वाह करे । पति, धर्मकार्य के लिए विदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या, यश के लिए गया हो 'तो छः वर्ष और सुख के लिए गया हो तो तीन वर्ष वाट' देखकर पति के पास चली जाय । दुःखदायी स्त्री की पति एक वर्ष प्रतीक्षा करे । उसके बाद श्रभूषणादि छीनकर उसके साथ न रहे ॥ ७०-७७ ॥
श्रतिक्रामेत्प्रमत्तं या मतं रोगार्तमेव वा ।
सा त्रीन् मासान् परित्याज्या विभूषणपरिच्छदा॥ ७८॥
उन्मत्तं पतितं क्लीवमवीजं पापरोगिणम् ।
न त्यागोऽस्ति द्विषन्त्याश्वं न च दायापवर्तनम्॥७६॥
*. * कुहस्विद्दोषा कुहवस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतंः कुद्दोषतुः । कोवांशयुत्रा विधिवेवदेवरंमर्थन योषा कृणुते सधस्थथा । ऋ० मं० १० सू०.४० मं०२ । 1 इसी श्रुति के अभिप्राय से, वाग्दान के बाद मर जाने पर देवर के साथ विवाह । इसका नियोग नहीं है । यह मत सर्वदेशी है । 1. लिखा है
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मनुस्मृति ।३३२
मद्यपाऽसाधुवृत्ता च प्रतिकूला च या भवेत् ।
व्याधिता वाधिवेत्तव्या हिंस्रार्थनी च सर्वदा ॥ ८० ॥
वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्यादे दशमे तु मृतप्रजा ।
एकादशे स्त्री जननी सवस्त्वप्रियवादिनी ॥ ८१ ॥
या रोगिणी स्यात्तु हिता संपन्ना चैव शीलतः ।
सानुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कर्हिचित् ॥ ८२॥
अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेदुषिता गृहात् ।
सा सद्यः सन्निरोद्धव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ॥ ८३॥
प्रतिषिद्धापि चेद्यातु मद्यमभ्युदयेष्वपि ।
प्रेक्षासमाजं गच्छेद्वा सा दण्ड्या कृष्णलानि षट् ॥ ८४ ॥
यदि स्वाश्चापराश्चैव विन्देरन योषितो द्विजाः ।
तासां वर्णक्रमेण स्याज्ज्यैष्ठयं पूजा च वेश्म च ॥८५॥
जो स्त्री अपने जुआरी, मद्यप और रोगातुर पति की सेवा न करे उसके भूषण आदि लेकर तीन महीने के लिए त्याग दे । परन्तु जो पाराल, पतित, नपुंसक, वीजहीन, पापरोगी भी अपने पति की सेवा करे उसको न त्यागे, न कोई चीज़ छीने । जो स्त्री मद्यप, दुराचारिणी, उलटा वर्ताव करनेवाली, रोगिणी मार पीट करनेवाली, फ़िज़ूम खर्च करनेवाली हो उसके जीतेही दूसरा विवाह करलेवे । ऋतुकाल से आठ वर्ष तक वंध्या रहे, दशवर्ष तक बालक होकर मरते जायँ, कन्या उत्पन्न होते ग्यारह वर्ष होजायें और स्त्री कटुभाषी हो तो दूसरा विवाह करलेवे | परन्तु जो रोगी, होकर भी पति का हित करे, सुशीला हो तो उसकी संमति से दूसरा विवाह करे और उसका अपमान कभी न करे । दूसरी स्त्री के आने पर पूर्व स्त्री रूठकर घरसे निकल जाती हो तो उस को रोके या सब के समक्ष त्याग दे । उत्सवों के
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नवां अध्याय | ३३३ समय मना करने पर भी जो स्त्री मद्यपान करे, गान श्रदि मैं शरीक हो, उस पर छः कृष्णल दण्ड राजा करे । कोई. द्विज अपनी या दूसरी जाति की स्त्री से विवाह करे तो उस कीप्रबन्धजातिकरे मर्यादा॥ ७८-८५के॥ अनुसार श्रादर, आभूषण, घर का.
भर्तुः शरीरशुश्रूषां धर्मकार्यं च नैत्यकम् ।
स्वा चैव कुर्यात्सर्वेषां नास्वजातिः कथञ्चन ॥ ८६ ॥
यस्तु तत्कारयेन्मोहात्सजात्या स्थितयान्यया ।
यथा ब्राह्मणचाण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ॥ ८७ ॥
उन स्त्रियों में जो अपनी जाति की हों वे पतिसेवा और धर्मकर्म करें; दूसरे जाति की कभी न करें । पर जो मूर्खता से अपनी जाति की स्त्री रहते दूसरी से कर्म कराता है उसको चाण्डाल समान जाने--यह ऋषियों ने कहा ॥ ८६-८७ ॥
उत्कृष्टायाभिरूपाय वराय सदृशाय च ।
प्राप्तापि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधि ॥ ८८ ॥
काममामरणात्तिष्ठेत् गृहे कन्यर्तुमत्यपि ।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥ ८६ ॥
श्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यतुमती सती ।
ऊर्ध्व तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥ ६० ॥
अदीयमाना भर्तारमधिगच्छेद्यदि स्वयम् ।
नैनः किञ्चिदवाप्नोति न च यं साधिगच्छति ॥ ६१ ॥
अलङ्कारं नाददीत पित्र्यं कन्या स्वयंवरा । मातृकं भ्रातृदत्तं वा स्तेना स्याद्यदि तं हरेत् ॥ ६२ ॥ ·
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३३४ मनुस्मृति ।
पित्रे न दद्याच्छुल्कं तु कन्यामृतुमतीं हरन् ।
स हि स्वाम्यादतिक्रामेतूनां प्रतिरोधनात् ॥ ६३ ॥
कन्या- विवाह | कुलीन, सुंदर और समान जाति का वर मिले तो पिता विवाह- योग्य अवस्था न होने पर भी शालरीति से कन्यादान कर दे । कन्या को ऋतुमती होने पर भी मरणपर्यन्त बैठी रक्खे पर गुणहीनवर को कभी दान न करे । यदि पिता गुणी वर मिलने पर विवाह न करे और कन्या ऋतुमती होती हो तो वह तीनवर्ष तक प्रतीक्षा करके अपनी इच्छानुसार पति से विवाह कर ले । जिस कन्या का विवाह पिता न करता हो वह यदि स्वयं विवाह कर ले तो कन्या पुरुष को कोई दोष नहीं लगता । स्वयं वर को स्वीकार करनेवाली कन्या पिता-माता या भाई का दिया आभूषण न ले अगर ले तो चोर है । ऋतुमती कन्या का विवाह करनेवाला उसके पिता को धन न दे । क्योंकि ऋतुकाल में सन्तान का रोक पिता के कारण होने से उसका हक़ जाता रहा ॥ ८८-६३ ॥
त्रिंशद्वर्षो वहेत्कन्या हृद्य द्वादशवार्षिकीम् ।
वर्षोऽष्टवर्षा वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥ ६४ ॥
देवदत्ता पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छयात्मनः ।
·. तो साध्वीं विभृयान्नित्यं देवानां प्रियमाचरन् ॥ ६५ ॥।
प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः संतानार्थं च मानवाः ।
तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पल्या सहोदितः ॥ ६६ ॥
कन्यायां दत्तशुल्कायां म्रियेत यदि शुल्कदः ।
देवराय प्रदातव्या यदि कन्याऽनुमन्यते ॥ ६७ ॥
तीस वर्ष का पुरुष वारह वर्ष की सुन्दरी कन्या से विवाह करें । या चौबीस वर्ष का आठवर्ष की कन्या से करे । और श्रग्निहोत्रादि
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नवां अध्याय | ३३५ धर्म का नाश होता हो तो शीघ्रही करले । पति देवताओं की दी हुई स्त्री को पाता है अपनी इच्छा से नहीं । इसलिए देवताओं के प्रीत्यर्थ उस सती का पालन पोषण नित्य करे । ईश्वर ने गर्भ- धारणार्थ स्त्रियों को रचा और सन्तान पैदा करने को पुरुष रचा इसलिए स्त्री-पुरुष साथ में धर्माचरण करें - यह वेद में कहा है । आसुरविवाह के लिए कन्या का मूल्य दिया हो और उसका पति मर जाय तो कन्या की इच्छा से देवर का विवाह कर दे ॥ ६४-६७ ॥
आददीत न शूद्रोऽपि शुल्कं दुहितरं ददत् ।
'शुल्कं हि न कुरुते नं दुहितृविक्रयम् ॥ ६८ ॥
एततु न परे चक्रुर्नापरे जातु साधवः ।
यदन्यस्य प्रतिज्ञाय पुनरन्यस्य दीयते ॥ ६६ ॥
नानुशुश्रुम जावेतत् पूर्वेष्वपि हि जन्मसु ।
शुल्कसंज्ञेन मूल्येन नं दुहितृविक्रयम्॥ १०० ॥
अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिकः ।
एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः ॥ १०१ ॥
कन्यादान में शूद्र भी धन न ले । जो लेता है यह छिपा हुआ कन्या वेचता है | यह कर्म पहले सत्पुरुषों ने नहीं किया और न इस समय करते हैं जोकि एक को कन्यादान करके दूसरे को दोजावे । पूर्व कल्पों में भी कन्या- विक्रय नहीं सुना गया । स्त्री- पुरुष मरण पर्यन्त आपस में प्रेमपूर्वक रहकर धर्म आदि चतुर्वर्ग फल को प्राप्त करें । इस प्रकार स्त्री-पुरुषों का परम-धर्म संक्षेप से कहा गया है. ॥ ८-१०१ ॥
तथा नित्यं यतेयातां खीपुंसौ तु कृतकियो ।
यथा नाभिचरेतां तौ वियुक्तावितरेतरम् ॥ १०२ ॥
" * मन्त्र है:- ' भगो अर्थमा सविता पुरभित्यं त्वाहुर्गार्हपत्याय देवाः । ' इत्यादि । '
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३३६ मनुस्मृति |
एष स्त्रीपुंसयोरुको धर्मो वो रतिसंहितः ।
आपद्यपत्यप्राप्तिश्व दायभागं निबोधत ॥ १०३ ॥
स्त्री- पुरुष विवाह करके ऐसा व्यवहार करें, जिसमें धर्माचरण में अलग न हो । यह स्त्री-पुरुषों का धर्म और श्रापत्काल में सन्तान- विधि कही गई है । अव दायभाग की व्यवस्था सुनो ॥१०२-१०३ ॥
ऊर्ध्व पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।
भजेरन् पैत्रिकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः ॥ १०४ ॥
ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात्पत्र्यं धनमशेषतः ।
शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा ॥ १०५ ॥
ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः ।
पितॄणामनृणश्चैव स तस्मात् सर्वमर्हति ॥ १०६ ॥
यस्मिन्नृणं सन्नयति येन चानन्त्यमश्नुते ।
स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान् विदुः ॥ १०७ ॥
पितेव पालयेत्पुत्राष्ठो भ्रातृन् यवीयसः ।
पुत्रवच्चापि वर्तेरज्ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः ॥ १०८ ॥
ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः ।
ज्येष्ठः पूज्यतमो लोके ज्येष्ठः सद्भिरगर्हितः ॥ १०६ ॥
दायभाग- व्यवस्था । पिता और माता की मृत्यु के बाद, भाई श्रापस में पिता की सम्पत्ति बाँट ले पर उनके जीते नहीं बाँट सकते । बड़ा भाई पिता का सब धन, ग्रहण करे और शेष भाई जैसे पिता की आशा में जी- विका करते थे, वैसेही भाई के वश में रहकर करें । बड़े पुत्र का जन्म होने से मनुष्य पुत्रवान् होता है और पितृऋण से छूटता है,
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नवां अध्याय । ३३७ इसलिए वह सब धन का स्वामी हो सकता होने से, पितृऋण दूर होता है । और मोक्ष प्राप्तहै ।होताजिस के उत्पन्न पुत्र है । दूसरों को काम से उत्पन्न जाने । बड़ा भाई, छोटेहै वहीभाइयोंधर्म- का पालन पिता के समान करे । और छोटे भाई, बड़े भाई के साथ पिता के समान धर्मानुसार बर्ताव करें । ज्येष्ठ कुलं को बढ़ाता है और ज्येष्ठ ही नाश करता है, ज्येष्ठ गुणवान् जगत् में पूज्य है और सत्पुरुषों में निंदा नहीं पाता ॥ १०४-१०६ ॥
यो ज्येष्ठो ज्येष्ठवृत्तिः स्यान्मातेव स पितेव सः ।
अज्येष्ठवृत्तिर्यस्तु स्यात्स संपूज्यस्तु बन्धुवत् ॥११०॥
एवं सह वसेयुर्वा पृथग्वा धर्मकाम्यया ।
पृथग् विवर्द्धते धर्मस्तस्माद्ध पृथक् क्रिया ॥ १११ ॥
ज्येष्टस्य विंश उद्धारः सर्वद्रव्याच्च यद्दरम् ।
ततोऽर्थं मध्यमस्य स्यात्तुरीयं तु यवीयसः ॥ ११२ ॥
ज्येष्ठश्चैव कनिष्ट संहरेतां यथोदितम् ।
येऽन्ये ज्येष्ठकनिष्टाभ्यां तेषां स्यान्मध्यमं धनम्॥११३॥
जो बड़ा भाई बडप्पन का बर्ताव करे वह माता -पिता के स- मान है । और वैसा बर्ताव न करे तो बन्धुवत् पूज्य है । भाइयों ने यदि वादन किया हो तो साथ रहे और बांट कर लिया हो तो -लग अलग रहे 1 अलग रहने से धर्म - कर्म अधिक होता है इसे लिए अलग रहना धर्मानुकूल है । बड़े भाई कॉ. वीसवां भाग -fre भांग हैं और संघ पदार्थों में जो उत्तम हो वह भी देना चा-हिए । मध्यम भाई को इसका आधा चालीसवां भाग अधिक दे और बाकी धन को सब भाई समान बांट लें । बड़ा और सब से * बृहस्पति का भी वचन है- एकपाकेन वसती पितृदेवद्विजार्चनम् । एकम्भवेदिभक्तानां तदेव स्याद गृहे गृहे ॥ " अर्थात् अलग रहने से पचमहायज्ञादि भी अलंग होते हैं । यः धर्मवृद्धि होती है ।. ४३
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३३८ मनुस्मृति । छोटा भाई इस प्रकार अपना भाग लें और दूसरे भाइयों का
मध्यम भाग होना चाहिए ॥। ११०-११३ ॥
सर्वेषां धनजातानामाददीताय्थमग्रजः ।
यच्च सातिशयं किंचिद्दशतश्चाप्नुयाद्वरम् ॥ ११४ ॥
उद्धारो न दशस्वस्ति संपन्नानां स्वकर्मसु ।
यत्किञ्चिदेव देयं तु ज्यायसे मानवर्धनम् ॥ ११५ ॥
एवं समुद्धृतोद्धारे समानंशान् प्रकल्पयेत् ।
उद्वारेऽनुद्धृते त्वेषामियं स्यादंशकल्पना ॥ ११६ ॥
एकाधिकं हरेज्ज्येष्ठः पुत्रोप्यर्थं ततोऽनुजः । 7
अंशमंशं यवीयांसइति धर्मों व्यवस्थितः ॥ ११७ ॥
घड़ाभाई गुणवान् हो और दूसरे गुणहीन हों तो सय सम्पति मैं जो श्रेष्ठ वस्तु हैं उनको बड़ाभाई पावे और गौ वगैरह दश -प- शुत्रों में जो श्रेष्ठ हो उसको भी पावे । यदि सब भाई गुणी हों तो बड़े भाई को देश से श्रेष्ठ वस्तु न देकर उसके सन्मानार्थ कुछ वस्तु अधिक देवे | इस प्रकार वीसवां भाग निकालकर बाक़ी का चरावर भाग करे । और वीसवां अलग न किया हो तो इसभांति करे --बड़ाभाई दो भाग उससे छोटा ड्योढ़ा और उससे छोटे भाई सब एक एक भाग ले यह मर्यादा है ॥ ११४-११७ ॥
स्वेभ्योंऽशेभ्यस्तु कन्याभ्यः प्रदद्युर्भ्रातरः पृथक् ।
स्वात्स्वाद्वंशाच्चतुर्भागं पतिताः स्युरदित्सवः ॥११८ ॥
प्रजाविकं सैकशफं न जातु विषमं भजेत् ।
अजाविकं तु विषमं ज्येष्टस्यैव विधीयते ॥ ११६ ॥
यवीयाज्ज्येष्ठभार्यायां पुत्रमुत्यादयेदिति ।
समस्तत्र विभागः- स्यादिति धर्मो व्यवस्थितः ॥१२० ॥
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नवां अध्याय | ३३६ उपसर्जनं प्रधानस्य धर्मतो नोपपद्यते । पिताप्रधानं प्रजने तस्माद्धर्मेण तं भजेत् ॥ १२१ ॥ '
पुत्रः कनिष्ठो ज्येष्ठायां कनिष्ठायां च पूर्वजः ।
कथं तत्र विभागः स्यादिति चेत्संशयो भवेत्॥ १२२ ॥
एकं वृषभमुद्धारं संहरेत स पूर्वजः ।
ततोऽपरे ज्येष्टवृषास्तदूनानां स्वमातृतः ॥ १२३ ॥
ज्येष्ठस्तु जातो ज्येष्टायां हरेवृषभ षोडशाः ।
ततः स्वमातृतः शेषा भजेरन्निति धारणा ॥ १२४ ॥
सदृशस्त्रीषु जातानां पुत्राणामविशेषतः ।
न मातृतो ज्यैष्ठयमस्ति जन्मतो ज्यैष्ठयमुच्यते ॥ १.२५॥
प्रत्येक भाई अपने भाग में से चौथा को । जो न देवें पतित होते हैं । वकरी भाग, भेड़अपनी, घोड़ाकुमारीआदिबहनएक खुवाले पशुओं का समान भाग करे और कम हो तो न वांटे, क्योंकि वे बड़े भाई के ही होते हैं । छोटा भाई बड़े की स्त्री में नियोग विधि से पुत्र पैदा करे तो उस पुत्र और चचा का समान भाग करे - यह धर्म है । क्षेत्रज पुत्र गौण होता है, इसलिए वह पिता का सब भाग धर्मानुसार नहीं ले सकता । पुत्र पैदा करने में पिता मुख्य है, इस कारण क्षेत्रज पुत्र का भाग पूर्वरीति से करे. प्रथम स्त्री में पुत्र पीछे और द्वितीय स्त्री में प्रथम हो तो, उनका भाग कैसे होना चाहिए? प्रथम स्त्री का पुत्र एक बैल अधिक ले और उसी माता से पैदा हुए छोटे भाई मामूली बैल लेवें । यदि ज्येष्ठ पुत्र दूसरी स्त्री का हो तो एक बैल और पन्द्रहं गौ ले और दूसरे भाई अपनी माता के अधिकारीनुसार बाँट ले परन्तु एक जाति की स्त्रियों में पुत्र पैदा हो तो उनको समान गिने, माता के बड़ी होने से पुत्र बड़े नहीं होते, किन्तु जन्म से बड़ाई ' होती है ॥ ११८-१२५ ॥
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३४० ' मनुस्मृति ।
जन्मज्येष्ठेन चाहानं स्वब्राह्मण्यास्वपि स्मृतम्।
यमयोश्चैव गर्भेषु जन्मतो ज्येष्ठता स्मृता ॥ १२६ ॥
पुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् ।
यदपत्यं भवेदस्य तन्मम स्यात्स्वधाकरम् ॥ १२७ ॥
विधान पुरा चक्रेऽथ पुत्रिकाः ।
विवृद्धयर्थं स्ववंशस्य स्वयं दक्षः प्रजापतिः ॥ १२८ ॥
aat दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
सोमाय राज्ञे सत्कृत्य प्रीतात्मा सप्तविंशतिम्॥ १२६॥
जिसकाजन्म पहले हुआ हो उस पुत्र का नाम लेकर, अमुक ' का पिता यंजन करता है - ऐसा ज्योतिष्टोम से: सुब्रह्मण्य, मन्त्र बोलकर इन्द्रका श्रावाहन होता है । और दो साथ ही पैदा हुए, हो, ता भी पहला ज्येष्ठ कहलाता है । जिसके पुत्र न हो, वह कन्या- दान के समय जामाता से नियम करे इस कन्या से जो पुत्र होगा वह मेरा श्राद्ध आदि करेगा । पहले दक्षप्रजापति ने अपने वंश की वृद्धि के लिए इसी विधि से कन्या को पुत्रिका की थी । 'दक्ष ने प्रसन्न होकर धर्म को दश, कश्यप को तेरह और राजा सोम को सत्ताईस पुत्री दी थीं ॥ १२६-१२६ ॥
यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा ।
तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत् ॥१-३० ॥
मातुस्तु यौतकं यत्स्यात्कुमारीभाग एव सः ।
दौहित्र एव च हरे दपुत्रस्याखिलं धन ॥ १.३.१ ॥
दौहित्रो हाखिलं रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् ।
स एव दद्याद्दौ पिण्डौ पित्रे मातामहाय च ॥ १३२॥