श्रीगणेशाय नमः।

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 491–500

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 491–500

पृष्ठ 491

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नवां अध्याय । ३५१ नानीसमानकेचाँटधनलेंमें । सेऔरकुछ उनप्रसन्नतालड़कियोंसे देकी जो॥ अविवाहित१६०- १६३ हो॥ उनको

अध्यग्न्यध्यावाहनिकं दत्तं च प्रीतिकर्मणि ।

भ्रातृमातृपितृप्रातं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम् ॥ १६४ ॥

अन्वाधेयं च यद्दत्तं पत्या प्रीतेन चैव यत् ।

पत्यौ जीवति वृत्तायाः प्रजायास्तद्धनं भवेत् ॥१६५॥

ब्राह्मदेवार्पगान्धर्वप्राजापत्येषु यद्वसु ।

श्रप्रजायामतीतायां भर्त्तुरेव तदिष्यते ॥ १६६ ॥

यत्त्वस्याः स्याद्धनं दत्तं विवाहेष्वासुरादिषु ।

प्रजायामतीतार्या मातापित्रोस्तदिष्यते ॥ १६७ ॥

स्त्रीधन आदि । विवाह में अग्नि समीप में पिता आदि का दिया, ससुराल में पाया हुआ भूषण श्रादि, पति का दिया, पिताका दिया, भाई। का दिया और माता से पाया ये छः प्रकार के स्त्रीधन कहे है विवाह में पति की तरफ़ से मिला धन और खुशी से पति का दिया धन, पति के जीते स्त्री मर जाय तो वह धन उसके पुत्र का होता है । ब्राह्म, देव, श्रार्प, गान्धर्व और प्राजापत्यनामक विवाहों मैं स्त्रियों को जो धन मिलता है वह स्त्री सन्तानहीनस्त्री मरजायको धन तो पति का होता है । और श्रासुरादि विवाहों मेंमाताजो - पिता का मिले वह स्त्री सन्तानहीन मरजाय तो उसके होता है ॥ १६४ - १६७ ॥ यद्भवेद्वित्तं पित्रा दत्तं कथंचन ।..स्त्रिया ब्राह्मणी तद्धरेत्कन्या तदपत्यस्य वा भवेत् ॥ १६८ ॥

ननिहारं स्त्रियः कुर्युः कुटुम्बाद्बहुमध्यगात् ।

स्वकादपि च वित्ताद्धि स्वस्य भर्तुरनाज्ञया ॥ १६६ ॥

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३५२ मनुस्मृति ।

पत्यौ जीवति यः स्त्रीभिरलङ्कारो धृतो भवेत् ।

न तं भजेरन् दायादा भजमानाः पतन्ति ते ॥ २०० ॥

अनंशौ क्लीवपतितौ जात्यन्धबधिरौ तथा ।

उन्मत्तजडमूकाश्च ये च केचिन्निरिन्द्रियाः ॥ २०१ ॥

सर्वेषामपि तु न्याय्यं दातुं शक्त्या मनीषिणा ।

ग्रासाच्छादनमत्यन्तं पतितो ह्यददन् भवेत् ॥ २०२ ॥

स्त्री के पास जो कुछ धन किसी भांति पिता का दिया हो, वह उसकी ब्राह्मणी कन्या ग्रहण करे अथवा उसकी सन्तान का हो जावे | बहुत कुटुम्बवाले परिवार में स्त्री धन संचय ( कोरचा ). न करे और पति की श्राशा बिना अपने धन में से भी आभूषण न बनवावे | पति के जीते स्त्रियों का जो गहना हो, उसको हिस्से-दार न बाँटे - ऐसा करने से पतित होजाते हैं । नपुंसक, पतित जन्मान्ध, वधिर, उन्मत्त, जड़, सूक, और जो जन्म से निरिन्द्रिय हो, ये सब पिता के धन में भांग नहीं पाते । इन सबको जीवनभर यथाशक्ति भोजन वस्त्र दे, न देने से पतित होता है ॥ १६८-२०२॥

यद्यर्थिता तु दारैः स्याक्लीवादीनां कथंचन ।

तेषामुत्पन्नतन्तूनामपत्यं दायमर्हति ॥ २०३ ॥

यत्किञ्चित्पितरि प्रेते धनं ज्येष्ठोऽधिगच्छति ।.. भागो यवीयसां तत्र यदि विद्यानुपालितः ॥ २०४ ॥

अविद्यानां तु सर्वेषामीहातश्चेद्धनं भवेत् ।

समस्तत्र विभागः स्यादापित्र्य इति धारणा ॥२०५ ॥

यदि नपुंसक श्रादि के किसी प्रकार विवाह से क्षेत्रज सन्तान 'पैदा हों तो उनके सन्तान धन के भागी होंगे । पिता की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र जो धन पावें यदि छोटा भाई विद्वान् हो तो उस में भी उसका भाग है । सब भाइयों का यदि व्यापार से

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नवां अध्याय | ३५३ कमाया धन हो तो उसमें पिताका धन छोड़कर समान भाग करना चाहिए । यह धर्मशास्त्र को मर्यादा है ॥ २०३-२०५ ॥

विद्याधनं तु यद्यस्य तत्तस्यैव धनं भवेत् ।

मैत्र्यमौवाहिकं चैव माधुपर्किकमेव च ॥ २०६ ॥

भ्रातॄणां यस्तु नेहेत धनं शक्तः स्वकर्मणा ।

स निर्भाज्यःस्वकादंशात्किञ्चिद्दत्त्वोपजीवनम्॥२०७॥

अनुपन्नन् पितृद्रव्यं श्रमेण यदुपार्जितम् ।

स्वयमीहितलब्धं तन्नाकामो दातुमर्हति ॥ २०८ ॥

पैतृकं तु पिता द्रव्यमनवाप्तं यदाप्नुयात् ।

न तत्पुत्रैर्भजेत्सार्धमकामः स्वयमर्जितम् ॥ २०६ ॥

विभक्ताः सह जीवन्तो विभजेरन् पुनर्यदि ।

समस्तत्र विभागः स्याज्ज्यैष्ठ्यं तत्र न विद्यते ॥२१० ॥

येषां ज्येष्ठः कनिष्ठो वा हीयेत शप्रदानतः ।

म्रियेतान्यतरो वापि तस्य भागो न लुप्यते ॥ २१ ९ ॥

सोदर्या विभजेरंस्ते समेत्यं सहिताः समम् ।

भ्रातरो ये च संसृष्टा भगिन्यश्च सनाभयः ॥ २१२ ॥

यो ज्येष्ठ विनिकुर्वीत लोभाद्रातृन् यवीयसः॥। २१३ ॥

सोऽज्येष्ठःस्यादभागश्च नियन्तव्यश्चराजभिः उसी का है । मित्र से, जिस को जो धन विद्या से पैदा करे वह मिले वह उसीका है । विवाह में और मधुपर्क में जो धनसकताजिसकोहै और भाइयों के साधा- जो अपने पुरुषार्थ से धन कमा निर्वाह योग्यं देकर जुदा कर रण धन को न चाहे उसको कुछपहुँचाकर अपने परिश्रम से जो धनं दे ।पिता के धन को हानि न ४५

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३५४ मनुस्मृति । पावे उसमें इच्छा न हो तो भाइयों को भाग न दे । पिता के पिता का धन जिसको कोई न पालका हो उसको पिता पात्रे और इच्छा न हो तो वाँट कर न दे, क्योंकि वह उसने स्वयं पाया है । भाई एक बार जुदा होकर फिर साथ रहें और फिर बाँट कर रना चाहें तो समभाग करें । उस समय बड़े माई का अधिक भाग नहीं लगता । जिन भाइयों में बड़ा वा छोटा भाई बांड के समय संन्यासी होगया हो या मरगया हो तो भी उसका भाग नष्ट नहीं होता । यादे उसके पुत्र, पुत्री, स्त्री, माता -पिता न हो तो सगे भाई या सहोदर बहने आपस में विभाग कर लें । यदि बड़ा भाई छोटे भाई को लोम से धोखा दे तो उसको बड़ा न माने, अधिक भाग न दे और राजा उसको दण्ड देवे ॥ २०६-२१३ ॥

सर्व एव विकर्मस्था नार्हन्ति भ्रातरो धनम् ।

न चांदत्त्वा कनिष्ठेभ्यो ज्येष्ठः कुर्वीत यौतुकम् ॥ २१४॥

भ्रातृणामविभक्तानां यद्युत्थानं भवेत्सह ।

न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात्कथंचन ॥ २१५ ॥

ऊर्ध्वं विभागाज्जातस्तु पित्र्यमेव हरेद्धनम् ।

संसृष्टास्तेन वा ये स्युर्विभजेत स तैः सह ॥ २१६ ॥

अनपत्यस्य पुत्रस्य मातादायमवाप्नुयात् ।

मातर्यपि च वृत्तायां पितुर्माता हरेद्धनम् ॥ २१७ ॥

चणे धने च सर्वस्मिन् प्रविभक्ते यथाविधि ।

पश्चाद्दृश्येत यत्किञ्चित्तत्सर्वं समतां नयेत् ॥ २.१८ ॥

वस्त्रं पत्रमलङ्कारं कृतान्नमुदकं स्त्रियः ।

योगक्षेमं प्रचारं च न विभाज्यं प्रचक्षते ॥ २ ९ ६ ॥

यसुक्को विभागो वः पुत्राणां च क्रियाविधिः ।

क्रमशः क्षेत्रजादीनां द्यूतधर्मं निवोधत ॥ २२० ॥

पृष्ठ 495

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नवां अध्याय । ३५.५ सब भाई यदि कुकर्म में पड़े हो तो धन नहीं पा सकते | बड़ा. भाई भी छोटे भाई का भाग विना दिये मिलकियत न करे । भाई घांटकर जुदे न हुए हो और सब साथ रहकर व्यापारादि करते हो तो पिता पुत्रों को न्यूनाधिक भाग कभी न दे । विभाग कर देने पर दूसरा पुत्र होजाय तो वह पिता का ही धन लेता है । या जो पिता के साथ रहते हो उनसे विभाग करे । पुत्र का पुत्र मर- जाय और उसकी स्त्री न हो तो माता धन पावे और माता भी न रहे तो पिता की माता लेवे । माता-पिता के धन और ऋण का यथाविधि विभाग करलेने पर यदि कुछ दूसरी सम्पत्ति का पता लगे तो उसको सव समान वांटलें । वस्त्र, सवारी, पहने श्राभूषण, पक्कान्न, जल, दासी, मंत्री, पुरोहित और गौ चरने का स्थान इनका विभाग धर्मशास्त्री नहीं करते । श्रर्थात् जो जिसके काम में वे वही उसको रक्खे । इस प्रकार विभाग और क्षेत्रज यदि पुत्र करने की रीति क्रम से कही गई है । अब धूत- श्रा की व्यवस्था सुनो ॥ २१४-२२० ॥

द्यूतं समाह्वयं चैव राजा राष्ट्रान्निवारयेत् ।

राज्यान्तकरणात दोषौ पृथिवीक्षिताम् ॥ २२१ ॥

प्रकाशमेतत्ताकर्यं यद्देवनसमाहृयौ ।

तयोर्नित्यं प्रतीघाते नृपतिर्यज्ञवान् भवेत् ॥ २२२ ॥

प्राणिभिर्यक्क्रियते तल्लोके द्यूतमुच्यते । " .प्राणिभिः क्रियते यस्तु स विज्ञेयः समाह्वयः ॥ २२३ ॥

द्यूतं समाह्वयं चैव यः कुर्यात् कारयेत वा ।

तान् सर्वान् घातयेद्राजा शूद्रश्चद्विजलिङ्गिनः॥ २२४॥

कितवान्कुशीलवान् क्रूरान्पाखण्डस्थांश्च मानवान् ।

विकर्मस्थान्शौण्डिकांश्चक्षिनिर्वासयेत्पुरात्॥ २२५॥

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३५६ मनुस्मृति ।

एते राष्ट्र वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्न तस्कराः ।

विकर्मक्रिया नित्यं वाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ॥ २२६ ॥

द्यूतमेतत्पुराकल्पे दृष्टं वैरकरं महत्! तस्माद् द्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान् ॥ २२७ ॥

धून-जुना । राजा अपने देश में जुना और समाहृय को दूर करे | क्योंकि ये दोनों दोष राजा के राज्य का नाश कर देते हैं । जुआ और समाह्वय प्रत्यक्ष लूट हैं, इस कारण राजा इन दोनों के नाशका यत्न करे । जो रुपया - पैसा -कौड़ी आदि निर्जीव से खेला जाय उसको जुआ कहते हैं । और तीतर, बढेर आदि जीवों पर जो बाजी -गाई जाती है उसको ' समाह्वय ' कहते हैं । जो पुरुष जुआ और समाह्वय करें या करावें उन सब को और ब्राह्मण वेषधारी शद्रो को राजा खूब पिटवावे । जुनारी, धूर्त, क्रूरकर्मा, पाखण्डी, म-र्यादाके खिलाफ चलनेवाले और शराबी को राजा अपने नगर से निकलवा देय | क्योंकि राजा के राज्य में ये छिपे चोर हैं- अपने कुकर्म से प्रजा को दुःख देते हैं । यह जुश्रा, पहले कल्प में बड़ा वैर बढ़ानेवाला देखा गया है । इस कारण बुद्धिमान हँसी के

लिए भी जुत्रा न खेलें ॥। २२१-२२७ ॥

प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा तन्निषेवेत यो नरः ।

तस्य दण्ड़ार्वकल्पःस्याद्यथेष्टं नृपतेस्तथा ॥ २२८ ॥

क्षत्रविट्शूद्रयोनिस्तु दण्डं दातुमशक्नुवन् । * ऋग्वेद के दशम मण्डल के चौतीस सूक्त में विस्तार से चूत का परिणाम वर्णित है । उस सूक्त में १४ ऋचा हैं, उनमें ऋक्ष और कृषिको प्रशंसा और श्र ferent निंदा भी है क्षयत का निषेध जैसाः - क्षैर्मा] दीव्यः कृत्रिमतकृषस्व ' ' वित्ते रमत्व बहुमन्यमानः । इत्यादि । द्यत से जो हानि होती है वह इतिहासों में.. और प्रत्यक्ष में प्रसिद्ध हैं ।

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नवां अध्याय । ३५७

आनृण्यं कर्मणा गच्छेद्विप्रो दद्याच्छनैः शनैः ॥ २२६ ॥

स्त्रीवालोन्मत्तवृद्धानां दरिद्राणां च रोगिणाम् । शिफाविद्लरज्वाधैर्विदध्यान्नृपतिर्दमम् ॥ २३० ॥:

ये नियुक्तास्तु कार्येषु हन्युः कार्याणि कार्यिणाम् ।

धनोष्मणा पच्यमानास्तान्निःस्वान्कारयेन्नृपः॥२३१ ॥

कूटशासनकर्तश्च प्रकृतीनां च दूषकान् । " स्त्रीवालाह्मणश्च हन्याद्द्विट्सेविनस्तथा॥ २३२ ॥

तीरितं चानुशिष्टं च यत्र वचन यद्भवेत् ।

कृतं तद्धर्मतो विद्यान्नतद्भूयो निवर्त्तयेत् ॥ २३३ ॥

जो कोई छिपकर या प्रकदरीति से जुआ खेले उसको राजा- इच्छानुसार दण्ड देवे | क्षत्रिय, वैश्य और शूद दण्ड न देसकता हो तो मज़दूरी करके दण्ड चुकावे और ब्राह्मण धीरे धीरे देडाले । बूढ़ा, निर्धन और रोगियों को चाबुक, वेत, खीश्रीर चालकरस्सी, सेपागलशिक्षा, देय । जिन कर्मचारियों को राज्यकार्य सौंपा हो, वे यदि धनकी गरमी से लोगों के काम बिगाड़े तो राजाकरनेउन. का सब धन छीन लेय । राजा की तरफ़ से वनावटी आशा वाले, मंत्रियों में बिगाड़ करानेवाले, स्त्री, वालक और ब्राह्मण-मामले घातक और शत्रु से मिलनेवाले को राजा दण्डउसकोदेय । जिसपूरा समझे .का न्यायानुसार दण्ड तक निर्णय होचुका हो फिर न दोहरावे ॥ २२८-२३३ ॥. । अमात्याः प्राविपाको वा यत्कुर्युः कार्यमन्यथा तत्स्वयं नृपतिः कुर्यात्तान्सहस्रं च दण्डयेत् ॥ २३४ ॥

ब्रह्मा च सुरापश्च स्तेयो च गुरुतल्पगः । ॥ एते सर्वे पृथक् ज्ञेया महापातकिनो नराः ॥ २३५

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३५८ मनुस्मृति: चोर-दुष्टों का निग्रह । मन्त्री और न्यायाधीश जिस मुक़द्दमे को अन्यथा कर उसको. राजा खुद देखे और अपराध सावित होनेपर उनपर हज़ारपण. दण्ड करे । ब्रह्मघाती, मद्यप, चोर और गुरुपत्नी से समागम करने वाला इन सबको महापातकी मनुष्य जानना चाहिए ॥२३४-२३शा..

चतुर्णामपि चैतेषां प्रायश्चित्तमकुर्वताम् ।

शरीरं धनसंयुक्तं दण्डं धर्म्यं प्रकल्पयेत् ॥ २३६ ॥

गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने सुराध्वजः ।

स्तेये च श्वपदं कार्यं ब्रह्मण्यशिराः पुमान्॥ २३७॥

असंभोज्या ह्यसंयाज्या असंपाठ्या विवाहिनः ।

चरेयुः पृथिवीं दीनाः सर्वधर्मवहिष्कृताः ॥ २३८ ॥

ज्ञातिसम्बन्धिभिस्त्वेते त्यक्तव्याः कृतलक्षणाः ।

निर्दया निर्नमस्कारास्तन्मनोरनुशासनम् ॥ २३६ ॥

प्रायश्चित्तन्तु कुर्वाणाः सर्ववर्णा यथोदितम् ।. नाया राज्ञा ललाटेस्युर्दाप्यास्तूत्तमसाहसम्॥ २४० ॥

श्रागःसु ब्राह्मणस्यैव कार्यो मध्यमसाहसः ।

विवास्यो वा भवेद्राष्ट्रात्तद्रव्यः सपरिच्छदः ॥ २४१ ॥

इतरे कृतवन्तस्तु पापान्येतान्यकामतः ।

सर्वस्वहारमर्हन्ति कार्यतस्तु प्रवासनम् ॥ २४२ ॥

नाददीत नृपः साधुर्महापातकिनां धनम् ।

श्राददानस्तु तल्लोभात्तेन दोषेण लिप्यते ॥ २४३ ॥

ये चारों यदि प्रायश्चित्त न करें तो राजा धर्मानुसार शारीरिक,

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नवां अध्याय । ३५६ शिक्षा और घन- दण्ड भी करे । गुरुपत्नी-गामी भगचिह्न, शरावो के कलाल के भरडे का चिह्न, चोरके मस्तक में पैर का चिह्न और ब्रह्मघाती के मस्तक में शिरहीन धड़के कुत्ते के करें । ऐसे मनुष्य सहभोजन, यश, वेदाध्ययन और विवाहका -चिह्नस- स्वन्ध के अयोग्य होते हैं । श्रौर श्रौतस्मार्त कर्मों से बहिष्कृत निर्धन पृथिवी पर विचरें | इन चिह्नवाले पातकियों को स- स्वन्धी र जातिवाले त्याग दें । उन पर दया न करें, नमस्कार न करें, यही मनुजी की आशा है । परन्तु जो महापातकी प्राय- चित्त करें उन के मस्तक में चिह्न न करे, केवल उत्तम साहस द करे । इन अपराधों में ब्राह्मण कोही ' मध्यम साहस ' दण्ड करे अथवा धन परिवार के साथ राज्य से निकाल दे । और दूसरे लोग इन पापों को जान कर करें तो उनका सर्वस्व छीन तेय और जानकर करें तो देश से निकाल देय। धार्मिक राजा महापातकी के धन को ग्रहण न करे । यदि लोभ से ग्रहण करे तो उस पाप से लित होजाता है । २३६–२४३ ॥

सुप्रवेश्य तं दण्डं वरुणायोपपादयेत् ।

श्रुतवृत्तोपपन्ने वा ब्राह्मणे प्रतिपादयेत् ॥ २४४ ॥

ईशो दण्डस्य वरुणो. राज्ञां दण्डधरो हि सः ।

ईशः सर्वस्य जगतो ब्राह्मणो वेदपारगः ॥ २४५ ॥

यंत्र वर्जयते राजा पापकृद्भ्यो धनागमम् ।

aa area जायन्ते मानवा दीर्घजीविनः ॥ २४६ ॥

.निष्पद्यन्ते च सस्यानि यथोक्तानि विशां पृथक् ।

वालाच न प्रमीयन्ते विकृतं न च जायते ॥ २४७ ॥

महापातकी के दण्ड-धन को राजा जल में डालकर वरुण के अर्पण करदे या वेदश सदाचारी ब्राह्मण को देदेवे । पातकी के दण्ड का स्वामी वरुण है क्योंकि वह राजाओं को भी दण्ड देनेवाला.•

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३६० मनुस्मृति | है । और वेदश ब्राह्मण सारे जगत् का प्रभु है । जिस देश में राजा पापियों का दण्ड लेकर उस का भोग नहीं करता उस देश में मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं । और प्रजाओं के धान्य ठीक ठीक पैदा, होते हैं, बालक नहीं मरते और कोई विकार नहीं होता ॥ २४४-२४७॥

ब्राह्मणान्बाधमानं तु कामादवरवर्णजम् ।

हन्याच्चित्रैर्वधोपायैरुद्वेजनकरैर्नृपः ॥ २४८ ॥

यावानवध्यस्य वधे तावान्त्रव्यस्य मोक्षणे ।

अधर्मो नृपतेर्दृष्टो धर्मस्तु विनियच्छतः ॥ २४६ ॥

उदितोऽयं विस्तरशोभियो विवदमानयोः ।

अष्टादशसु मार्गेषु व्यवहारस्य निर्णयः ॥ २५० ॥

एवं धर्म्याणि कार्याणि सम्यङ्कुर्वन् महीपतिः ।

देशानलब्धलिप्सेत लब्धश्च परिपालयेत् ॥ २५१ ॥

जानकर ब्राह्मण को कष्ट देनेवाले, नीचजाति के पुरुष को राजा अनेक उपायों से शारीरिक दण्ड़ देवे । श्रदण्ड्य को दण्ड देने से राजा को जितना धर्म होता है उतनाही अपराधी को छोड़ने से होता है । न्यायकारी को धर्म प्राप्त होता है । अठारह प्रकार के दावों में प्रत्येक के परस्पर विवाद का निर्णय विस्तार से कहा गया है । राजा इस प्रकार सव कार्यों का धर्मानुसार निर्णय करे । ' अप्राप्त देशों को लेना और प्राप्त देशों की रक्षा करना, राजा का धर्म है ॥ २४८- २५१ ॥

सम्यंनिविष्टदेशस्तु कृतदुर्गश्व शास्त्रतः ।

कटकोद्धरणे नित्यमातिष्ठेद्यत्वमुत्तमम्॥ २५२ ॥

रक्षणादार्यवृत्तानां कण्टकानां च शोधनात् ।

नरेन्द्रास्त्रिदिवं यान्ति प्रजापालनतत्पराः ॥ २५३ ॥