मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 551–560
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 551–560
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ग्यारहवां अध्याय । -४११ का निशान करे, या जलती श्राग में नीचा शिर करके तीनबार कूदे | अथवा श्रश्वमेध, स्वर्गजित्, अभिजित्, गोसव, विश्वजित्, त्रिवृत् और श्रग्निष्टुत् इन यक्षों में कोईला करे । अथवा मिता- हारी जितेन्द्रिय होकर, किसी वेद का पाठ करता हुआ सौ योजन तक चलाजाय । अथवा वेदश ब्राह्मण को अपना सर्वस्व या जी- विका योग्य धन,वा सब सामग्री सहित घर देदेवे । श्रथवा हविष्य / भोजन करता हुआ सरस्वती नदी के सोते की तरफ़ गमन करे । या नियमित भोजन करके तीनों वेद संहिताओं का पाठ करे । या दाढ़ी, मूंछ मुड़ाकर गांव के बाहर गौगोठ में, श्राश्रम मेंरहे, या। वृक्ष के जड़ में रहकर, गो-ब्राह्मण के हितसाधन में लगा श्रथवा ब्राह्मण और गौ के निमित्त तुरंत प्राण त्याग देने से ब्रह्मः हत्या से मुक्त होजाता है ॥ ७३-८० ॥
त्रिवारं प्रतिरोद्धा वा सर्वस्वमवजित्य वा ।
विप्रस्य तन्निमित्ते वा प्राणालाभे विमुच्यते ॥ ८१ ॥
एवं व्रत नित्यं ब्रह्मचारी समाहितः ।
समाप्ते द्वादशे वर्षे ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ८२ ॥
शिष्ट्वा वा भूमिदेवानां नरदेवसमागमे ।
स्वमेनोऽवभृथस्नातो हयमेधे विमुच्यते ॥ ८३ ॥
धर्मस्य ब्राह्मणो मूलमग्रं राजन्य उच्यते । ८४ ॥
तस्मात्समागमे तेषामेनो विख्याप्य शुध्यति ॥
जाता हो तो उस पर: कोई चोर ब्राह्मण का धन चुराकर लियेया न लावे तो भी ब्रह्म तीन बार चढ़ाई करके धन को लौटालावेधन के लिए वह ब्राह्मण युद्ध हत्या से छूट जाता है । अथवा, तबजबउतना धन देकर उसका प्राण, बचानेकरके मरनेसे भीकोब्रह्महत्यातैयार सेहोछूटजाता है । इस प्रकार ब्रह्मचर्य से में ब्रह्महत्या से छूटजातो तापूर्वक व्रत ठाननेवाला बारह वर्ष
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४१२ मनुस्मृति ।. है । या अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मण और राजा के सामने अपना -पाप कहकर अवभृथ स्नान करने पर ब्रह्महत्या से मुक्त होता है । ब्राह्मण धर्म का मूल और क्षत्रिय प्रभाग कहलाता है, इस लिए उनके सामने पाप कहकर शुद्ध होजाता है ॥ ८१-८४ ॥
ब्राह्मणः संभवेनैव देवानामपि दैवतम् ।
प्रमाणं चैव लोकस्य ब्रह्माचैव हि कारणम् ॥ ८५ ॥
तेषां वेदविद ब्रूयुत्रोऽप्येनः सुनिष्कृतिम् ।
सा ते पावना यस्मात्पवित्रा विदुषां हि वाक् ॥ ८६ ॥
अतोऽन्यतममास्थाय विधिं विप्रः समाहितः ।
ब्रह्महत्याकृतं पापं व्यपोहत्यात्मवत्तया ॥ ८७ ॥
हत्वा गर्भमविज्ञातमेतदेव व्रतं चरेत् ।
राजन्यवैश्यौ चेजानावात्रेयीमेव च स्त्रियम् ॥ ८ ॥
ब्राह्मण जन्म से ही देवों का भी देव है, और उसका उपदेश वेदमूलक होने से लोक में प्रमाण माना जाता है । वेदों में तीन ब्राह्मण जो प्रायश्चित्त पाप का बतलावें, वह पापियों को पवित्र करता है । क्योंकि, ब्राह्मणों की वाणीही प्रावन है । इस लिए सावधान होकर कहे प्रायश्विन्तों में कोई भी करने से ब्राह्मण पाप -मुक्त होजाता है । श्रजान में गर्महत्या, यज्ञ करते क्षत्रिय, वैश्य और गर्भवती स्त्री का वध करके भी यही ब्रह्महत्या का प्रायश्विच करना चाहिए ॥ ८५-मूल ॥
उक्त्वा चैवानृतं साक्ष्ये प्रतिरुध्य गुरुं तथा ।
अपहृत्य च निक्षेपं कृत्वा च स्त्रीसुहृद्वधम् ॥ ८६ ॥
इयं विशुद्धिरुदिता प्रमायाकामतो द्विजम् ।
Treat ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते ॥ ६० ॥
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ग्यारहवां अध्याय । साक्षी में बोलकर, गुरुको झूठा दोप.४१३ कर और स्त्री वा मित्र का वध करके ब्रह्महत्यालगाकरका, धरोहर मार करे । अजान में द्विज का वध किया हो तो ये प्रायश्चितप्रायश्चित्त " हैं । परन्तु जानकर हत्या करने पर कोई प्रायश्चित्त नहींहै ॥८६-६०कहे॥
सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णां सुरां पिबेत् ।
तया सकाये निर्दग्धे सुच्यते किल्बिषात्ततः ॥ ६१ ॥
गोमूत्रमग्निवर्णं वा पिवेदुदकमेव वा ।
पयो घृतं वाऽऽमरणाद्गोशकृद्रसमेव वा, ॥ ६२ ॥
करणान् वा भक्षयेदव्दं पिण्याकं वा सकृन्निशि ।
सुरापानापनुत्यार्थं बालवासा जटी ध्वजी ॥ ६३ ॥
सुरा वै मलमन्नानां पाप्मा च मलमश्नुते ।
तस्माद्ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत् ॥ ६४ ॥
गौडी पैष्टीच माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा ।
यथैा तथा सर्वा न पातव्या द्विजातेः ॥ ६५ ॥
यक्षरक्षः पिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम् ।
तब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हविः ॥ ६६ ॥
मद्यपान-प्रायश्चित्त । हिज ज्ञान से मद्य पीकर आग के मुवाफ़िक तपाकर मध पीवे, उससे शरीर जलजाने पर पाप से छूटता है अथवा गोमूत्र, जल, गौ का दूध, घी, गोवर का रस इनमें किसी पदार्थ कोयाश्रातिलं, मुवाफ़िक लाल करके मरणान्त पिया करेकी खली एक साल तक रात में एक बार खाय । या | अन्नकणकम्बल थोड़करनका चाल रखकर और मद्यपात्र का चिह्न धारण करे । सुरा -क्षत्रिय-मल है और मल को पाप कहते हैं । इस कारण ब्राह्मण
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४१४ मनुस्मृति । वश्य को सुरा-मद्य न पीनी चाहिए । गुड़ की पीठे की, और महुबे की ये तीन प्रकार की मद्य होती हैं । जैसी गुड़ की है. वैसी ही दूसरी भी है । इस लिए द्विजों को न पीनी चाहिए । मद्य यक्षों का मांस राक्षसों का और सुरा श्रासव पिशाचों का भोजन है । देव हवि खानेवाले द्विजों को यह कभी न सेवन करनी चाहिए ॥ ६१-६६ ॥
अमेध्ये वा पतेन्मत्तो वैदिकं वाप्युदाहरेत् ।
अकार्यमन्यत्कुर्याद्वा ब्राह्मणो मदमोहितः ॥ ६७ ॥
यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत् ।
तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वं च स गच्छति ॥ ६८ ॥
एषा विचित्राभिहिता सुरापानस्य निष्कृतिः ।
श्रत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सुवर्णस्तेयनिष्कृतिम् ॥ ६६ ॥
ब्राह्मण मद्यपान करके उसके नशे में अपवित्र स्थान में गिरता है, गोप्य वेदमन्त्र पढ़ता है और कार्य करता है । जिस ब्राह्मण के शरीर में रहनेवाला वेदज्ञान एकवार सी मद्य से मिल जाता है। उसका ब्राह्मणत्व नष्ट होजाता है और शूद्रता को प्राप्त होजाता है । यह सुरापान का प्रायश्चित्त नानाप्रकार का कहा है । अय सोना चुराने का प्रायश्चित्त कहा जायगा ॥ ६७–६६ ॥
सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो राजानमभिगम्यतु।
स्वकर्मख्यापयन् ब्रूयान् मभवाननुशास्त्विति ॥१०० ॥
गृहीत्वा मुसलं राजा सकृवन्यात्तु तं स्वयम् ।
वधेन शुध्यति स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव तु ॥ १०१ ॥
तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम् ।
चीरवासा द्विजोरण्ये चरेद्ब्रह्मणो व्रतम् ॥ १०२ ॥
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ग्यारहवां अध्याय । III
एतैतैरपोत पापं स्तेयकृतं द्विजः ।
गुरुस्त्रीगमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ॥ १०३ ॥
सुवर्ण चोरी का प्रायश्चित्त । सुवर्णचोरी करनेवाला ब्राह्मण राजा के पास जाकर अपना फर्म प्रकट करे और कहे कि मेरे को थप शिक्षा दे - तब राजा उसके कंधे पर से मूसल लेकर उसको एकवार मारे । चोर मारने से शुद्ध होता है और ब्राह्मण तप से शुद्ध होजाता है । जो नप से शुद्ध होना चाहे वह चीर पहन कर वन में ब्रह्महत्या का व्रत करे । इन मतों से चोरी के पाप को दूर करे और गुरुपत्नीगमन के पाप को धागे लिखे व्रतों से दूर करे ॥ १००-१०३ ॥ गुरुतल्यभिभाष्यैनस्तते स्वप्यादयोमये । सूम ज्वलन्तीं स्वाश्लिष्येनमृत्युना स विशुध्यति १०४
स्वयं वा शिश्नवृपणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ ।
नैर्ऋती दिशमातिष्ठेदानिपातादजिह्मगः ॥ १०५ ॥
खट्टी चीरवासा वा श्मश्रुलो विजने वने ।
प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रमब्दमेकं समाहितः ॥ १०६ ॥
चान्द्रायणं वा त्रीन्मासानभ्यस्येन्नियतेन्द्रियः ।
हविष्येण यवाग्वा वा गुरुतल्पापनुत्तये ॥ १०७ ॥
एतैर्वतैरपोहेयुर्महापातकिनो मलम् ।
उपपातकिनस्त्वेवमेभिर्नानाविधैर्व्रतैः ॥ १०८ ॥
गुरुपत्नीगमन-प्रायश्चित्त । गुरुपत्नीगामी अपने पाप को कहकर लोहे की हुईजलतीकोचिंहुई शय्या पर सोवे । या लोह की बनी स्त्री मूर्ति खुदहीजलती अपने लिङ्ग पट कर मरने से पाप शुद्ध होता है । अथवा
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४१६ मनुस्मृति । और ersatil को काटकर अंजलि में रखकर मरण तक: नैर्ऋत्य दिशा में चला जाय । या हाथ में खाद का पाया रक्खे, चीथड़े पहने, दाढ़ी मूंछों को बढ़ाकर निर्जन वन में एक वर्ष तक सावधानी से निवास करे । और प्राजापत्य व्रत करे । अथवा जितेन्द्रिय होकर हविष्यान्न, जौ की लपसी खाकर तीन मास. ae चान्द्रायण व्रत करे । इन व्रतों से महापातकीपुरुष अपने पापों को दूर करें और उपपातकी लोग श्रागे लिखे विविध व्रतों से अपने पापों का नाश करें ॥ १०४-१०८ ॥
उपपातकसंयुको गोनो मासं यवान् पिबेत् ।
कृतवापो वोटे चर्मणा तेन संवृतः ॥ १०६ ॥
चतुर्थकालमश्नीयादक्षारलवणं मितम् ।
गोमूत्रेणाचरेत्स्नानं द्वौ मासौ नियतेन्द्रियः ॥ ११० ॥
दिवानुगच्छेद्वास्तास्तु तिष्ठन्नूर्ध्व रजः पिबेत् ।
शुश्रूषित्वा नमस्कृत्य रात्रौ वीरासनं वसेत् ॥ १११ ॥
तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वप्यनुव्रजेत् ।
आसीनासु तथासीनो नियतो वीतमत्सरः ॥ ११२ ॥
' - उपपातकों का प्रायश्चित्त । गोवध करनेवाला मुण्डन कराकर, गोचर्म श्रोढ़कर एक मास गौगोष्ठमै रहे और जौकी लपसी चाटे । दो मास तक गोमूत्र से ' स्नान करे, जितेन्द्रिय रहे, चौथे काल ( दूसरे दिन सायंकाल ) विना नमक का थोड़ा भोजन करे । दिन में गोत्रों के पीछे फिरे. श्रौर खड़ा होकर उनके खुर से उड़ी धूर को पिये । गो-सेवा करे, उनको प्रणाम करे, रात में वीरासन से बैठा रहे । सदा गौ के बैठने पर बैठे और खड़ी होने पर खड़ा हो, चलने पर चले और
फिर बैठने पर बैठ जाय । यह सब प्रेमभाव से करे ॥ १०६-११२ ॥
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ग्यारहवां अध्याय । ४१७
श्रातुरामभिशस्तां वा चैौरव्याघ्रादिभिर्भयैः ।
पतितां पङ्गलग्नां वा सर्वोपायैर्विमोचयेत् ॥ ११३ ॥
ऊपणे वर्णति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् ।
न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरेकृत्वा तु शक्तितः ॥ ११४ ॥
आत्मनो यदि वान्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवा खले ।
भक्षयन्तीं न कथयेत्पिवन्तं चैव वत्सकम् ॥ ११५ ॥
अनेन विधिना यस्तु गोनो गामनुगच्छति ।
स गोहत्याकृतं पापं त्रिभिर्मासैर्व्यपोहति ॥ ११६ ॥
वृषभैकादशा गाश्च दद्यात्सुचरितत्रतः ।
विद्यमाने सर्वस्वं वेदविद्भयो निवेदयेत् ॥ ११७ ॥
रोगी, चोर, बाघ के भय से व्याकुल गिरीहुई कीचड़ में फँसी हुईगी को सब उपायों से मुक्त करे । धूप में, वर्षा में, शीत में और श्रांधी चलने पर यथाशक्ति गो की रक्षा करे फिर अपनी रक्षा करे । अपने वा दूसरे के घर में, खेत में, खरिहान में चरतीकरनेगौ को और दूध पीत बछड़े को किसी से न कहे । तीनजो गोवधमास में गो-वाला पुरुष इस विधि से गोसेवा करता है वह करनेवाला एक. हत्या के पाप से मुक्त होजाता है । इलभांति व्रततो प्राणको बैल और दश गौ दान करे । यह पास न हो सर्वस्व अर्पण कर देवे ॥ ११३-११७ ॥
एतदेव व्रतं कुर्युरुपपातकिनो द्विजाः ।
श्रवकीर्णिवर्ज्यं शुद्ध्यर्थं चान्द्रायणमथापिवा॥ ११८॥
अवकीर्णी तु काणेन गर्दभेनं चतुष्पथे ।
॥पाकयज्ञविधानेन यजेत निर्ऋतिं निशि ॥ ११६
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४१८ मनुस्मृति ।
हुत्वा विधिवद्धमानन्ततश्च समेत्यृचा ।
वातेन्द्रगुरुवह्नीनां जुहुयात् सर्पिषाहुतीः ॥ १२० ॥
aari को छोड़कर दूसरे उपपातकी द्विज अपनी शुद्धि के लिए इसी व्रत को या चान्द्रायण व्रतको करें । परस्त्री से ब्रह्मचर्य खण्डित करनेवाला श्रवकीर्णी होता है । वह रात को काने गधे पर चढ़कर चौराहा में जाकर पाकयज्ञ के विधान से निर्ऋति देवता का यश करे । श्रग्नि में विधि से होम करके ' सं मा सि श्चन्तु मरुतः - ' * इत्यादि ऋचा से, मरुत, इन्द्र, गुरु और श्रग्नि को घृत की आहुति करे ॥ ११८-१२० ॥
कामतो रेतसः सेकं व्रतस्थस्य द्विजन्मनः ।
प्रतिक्रमं व्रतस्याहुर्धर्मज्ञा ब्रह्मवादिनः ॥ १२१ ॥
मारुतं पुरुहूतं च गुरुं पावकमेव च ।
चतुरो व्रतिनोऽभ्येति ब्राह्म तेजोऽवकीर्णिनः ॥ १२२॥
एतस्मिन्नेनसि प्राप्ते वसित्वा गर्दभाजिनम् ।
सप्तागारांश्चरेद्वैक्षं स्वकर्मपरिकीर्तयन् ॥ १२३ ॥
तेभ्यो लब्धेन भैक्षेण वर्तयन्नेककालिकम् ।
उपस्पृशंस्त्रिषवणं त्वब्देन स विशुध्यति ॥ १२४ ॥
जातिभ्रंशकरं कर्म कृत्वान्यतममिच्छया ।
चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं प्राजापत्यमनिच्छया ॥ १२५ ॥
संकरापात्रकृत्यासु मासं शोधनमैन्दवम् ।
मलिनीकरणीयेषु तृप्तः स्याद्यावकैस्त्र्यहम् ॥ १२६ ॥
* ' सं मा सिञ्चन्तु मरुतः सं पूषा सं बृहस्पतिः । सं मायमग्निः सिञ्चतु प्रजया च धनेन च दीर्घमायुः कृणोतु मे । ' अथर्व० ७ । ३ । ३३ । १.
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ग्यारहवां अध्याय । ४१६
तुरीयो ब्रह्महत्यायाः क्षत्रियस्य वधे स्मृतः ।
मांश वृत्तस्थे शूद्रे ज्ञेयस्तु पोडशः ॥ १२७ ॥
कामतस्तु राजन्यं विनिपात्य द्विजोत्तमः ।
वृषभैकसहस्रा गा दद्यात्सुचरितव्रतः ॥ १२८ ॥
नारी इच्छासे वीर्यपात करे तो उसका व्रत भङ्ग होजाता है । हादियों का मत है । व्रतभङ्ग से उसका तेज वायु, इम्पति और अग्नि इन वार व्रतधारियों को प्राप्त होता है । इसका पाप लगे तो गधे का चमड़ा श्रोढ़कर अपना कर्म करें और सात घरों से भीख मांगे श्रीर उस भिक्षा से एक भरें । और तीन बार स्नान करे । इस प्रकार एक वर्षमें शुरूहोता है । जानकर कोई जातिभ्रंश कर पाप करे ती ' सान्तपन यत और अनजान में करे तो ' प्राजापत्य व्रत ' करें | संकरऔर अपात्र करनेवाले कर्मों में एक मास चान्द्रायण मन शुरू करता है । और मलिनीकरण फर्मों में तीन दिन जो की खानेसेशुरू होता है । सदाचारी क्षत्रिय के वध में ब्रह्म- हत्या का बीधाई वैश्य वध में श्रावां हिस्सा और शुद्रवध में मां हिस्साप्रायश्चित्त जानना चाहिए । यदि श्रेष्ठ द्विज अज्ञानमें क्षत्रिय का वध करे तो विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करके याद में एक हजार गी और एकबैल का दान करे ॥ १२१-१२८ ॥
.त्र्य चरेद्वा नियतो जटी ब्रह्मणो व्रतम् ।
वसन्दूरतरे ग्रामाद्द्रवृक्षमूलनिकेतनः ॥ १२६ ॥
एतदेव च प्रायश्चित्तं द्विजोत्तमः ।
प्रमाप्य वैश्यं वृत्तस्थं दद्याच्चैकशतं गवाम् ॥ १३० ॥
एतदेव व्रतं कृत्स्नं पण्मासान्शूद्रहा चरेत् ।
वृपकादशा वापि दद्याद्विप्राय गाः सिताः ॥ १३१ ॥
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४२० मनुस्मृति ।
मार्जारनकुलौ हत्वा चाषं मण्डूकमेव च ।
श्वगोधोलूककाकांश्च शूद्रहत्या व्रतं चरेत् ॥ १३२ ॥
पयः पिवेत् त्रिरात्रं वा योजनं वाध्वनो व्रजेत् ।
उपस्पृशेत्स्रवन्त्यां वा सूक्तं वाब्दैवतं जपेत् ॥ १३३ ॥
काष्र्णायसीं दद्यात् सर्पं हत्वा द्विजोत्तमः ।
पलालभारकं षण्ढे सैसकञ्चै कमावकम् ॥ १३४ ॥
घृतकुम्भं वराहे तु तिलद्रोणन्तु तित्तिरौ ।
शुके द्विहायनं वत्सं क्रौञ्चं हत्वा त्रिहायनम् ॥ १३५ ॥
हत्वा हंसं वलाकां च वकं बर्हिणमेव च ।
वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेद्ब्राह्मणाय गाम् १३६ ॥
अथवा वह पुरुष ग्राम से दूर वृक्ष के नीचे जटा रखकर एक वर्ष तक ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करे । और यहीं प्रायश्चित्त श्र जान में सदाचारी वैश्य के वध में भी जानना चाहिए । और एकसौ गौ का दान करना चाहिए । शूद्रवध में भी यही सब प्रायश्चित्त छः मास तक करना दश श्वेतगौ और एक बैल दान करना चाहिए । चिलाव, नौला, पपीहा, मैडक, कुत्ता, छिपकली, उल्लू और कौत्रा को अनजान में मारकर शुद्रहत्या का व्रत करे । अथवा तीन रात तक दूध पीकर रहे या एक योजन तक मार्ग चले या तीनवार नदी में स्नान करे या ' आपोहिष्टा ' इत्यादि वरुणसूक्त का पाठ करे । द्विज सर्प का वध करे तो तीखे नोक का-लोह का दण्डा दान करे । नपुंसक का वध करने पर एक भार पयाल वा एक मासा सीसा देय । सुर के वध में घी भरा घड़ा, तीतर मारने .पर एक द्रोण तेल, तोता की हत्या में दो वर्ष का बछड़ा, क्रौञ्च- वध में तीन वर्ष का बछड़ा दान करे । हंस, बगली, वगला, मोर, वानर, वाज और भास इन पक्षियों को मारकर ब्राह्मण को गो- 'दान करे तब पाप से शुद्ध होता है ॥ १२ -- १३६॥