श्रीगणेशाय नमः।

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 541–550

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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ग्यारहवां अध्याय । ४०

योऽसाधुभ्योर्थमादाय साधुभ्यः संप्रयच्छति ।

सकृत्वा प्रवमात्मानं संतारयति तावुभौ ॥ १६ ॥

यद्धनं यज्ञशीलानां देवस्वं तद्विदुर्बुधाः ।

अयज्वनां तु यद्वित्तमासुरस्वं तदुच्यते ॥ २० ॥

न तस्मिन् धारयेद्दण्डं धार्मिकः पृथिवीपतिः ।

क्षत्रियस्य हि वालिश्याड़ ब्राह्मणः सीदति क्षुधा॥ २१ ॥

तस्य भृत्यजनं ज्ञात्वा स्वकुटुस्वान् सहीपतिः ।

श्रुतशीले च विज्ञाय वृत्तिं धय प्रकल्पयेत् ॥ २२ ॥

कल्पयित्वास्य वृत्तिं च रक्षेदेनं समन्ततः ।

राजा हि धर्मभागं तस्मात्प्राप्नोति रक्षितात् ॥२३॥

न यज्ञार्थं धनं शूद्राद्विप्रो भिक्षेत कर्हिचित् ।

याजमाना हि भिक्षित्वा चण्डालः प्रेत्य जायते ॥ २४ ॥

खल ( खरिहान ) खेत या घर से या कहीं से अन्न लावे और उसका स्वामी पूछे तो उससे सत्य बात कह देवे । क्षत्रिय को ब्रा एका धन कभी न छीनना चाहिए । यदि निर्वाह न होसकेकरनेतो दूसरे कुकर्मियों से धन ले लेय । जो पुरुष यशादि धर्मवह अपनेन को नौकापालों सेबनाकरधन लेकरउन दोनोंधर्माचारीको तारसत्पुरुषोंदेता हैको। देतायज्ञादिन हैकरनेवालोंकरनेवालोंकाके धन को देवधन कहते हैं और यज्ञादि धर्म -कर्मके लिए कोई दोष धन श्रासुरीधन कहलाता है । ब्राह्मण निर्वाहकरे । क्योंकि राजाही के,,भी करे तो भी उसको राजा दण्ड न के परिवार विद्यादोषों से ब्राह्मण भूख से दुःख उठातेहैं । जीविकाब्राह्मण कायम कर देवे । शील श्रादि को जानकर राजा धर्मार्थ उसके धर्म का छठाऔर चोर वगैरह दुष्टों से रक्षा करे लिएक्योंकिशुद्ध से धन कभी न भाग राजा पाता है । ब्राह्मण यक्ष के ५१

पृष्ठ 542

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III मनुस्मृति । मां | क्योंकि शूद्रभिक्षा से यज्ञ करनेवाला सरकर चण्डाल होता है ॥ १७-२४ ॥

यज्ञार्थमर्थं भक्षित्वा यो न सर्व प्रयच्छति ।

स याति भासतां विप्रः काकतां वा शतं समाः ॥२५॥

देवस्वं ब्राह्मणस्वं वा लोभेनोपहिनस्ति यः ।

स पापात्मा परे लोके गृधोच्छिष्टेन जीवति ॥ २६ ॥

इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदव्दपर्यये ।

harti पशुसोमानां निष्कृत्यर्थमसम्भवे ॥ २७ ॥

श्रापत्कल्पेन यो धर्मं कुरुतेऽनापदि द्विजः ।

स नाप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचारितम्॥ २८ ॥

विश्वैश्च देवैः साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।

आपत्सु मरणाद्भीतैर्विधेः प्रतिनिधिः कृतः ॥ २६ ॥

जो ब्राह्मण यज्ञ के लिए धन मांगकर यक्ष में नहीं लगाता वह मरकर सौ वर्ष भास वा कौआ की योनि में रहता है । जो देवा- र्पण या ब्रह्मार्पण किये धन को लोभ से खाजाता है वह पापात्मा परलोक में गीध की जूंठन से जीता है । पशुयाग या सोमयाग न होसके तो उस दोष की शान्ति के लिए ब्राह्मणको शुद्ध से भी धन लेकर वैश्वानरी इष्टि करनी चाहिए । जो द्विज श्रापत्काल के न होते आपत्काल के धर्म से बर्ताव करता है वह परलोक में उसका फल नहीं पाता । विश्वेदेव, साध्यदेव, महर्षि और ब्राह्मणों ने मृत्यु से डरकर, श्रापत्काल में मुख्य विधि के स्थान में प्रतिनिधि

की कल्पना की है । २५-२६ ॥

प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते ।

न साम्परायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम् ॥ ३० ॥

पृष्ठ 543

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ग्यारहवां अध्याय । ४०३

ब्राह्मणोऽवेदयत किञ्चिद्राजनि धर्मवित् ।

स्त्रवीर्येणैव ताञ्छिष्यान् मानवानपकारिणः ॥ ३१ ॥

स्ववीर्याद्राजवीर्याच्च स्ववीर्यं बलवत्तरम् ।

तस्मात्स्वेनैव वीर्येण निगृह्णीयादरीन् द्विजः ॥ ३२ ॥

मुख्य विधि की शक्ति होने पर भी जो पुरुष प्रतिनिधि से कर्म करता है उस दुर्बुद्धि को उस धर्म का फल परलोक में नहीं मि लता । धर्मज्ञ ब्राह्मण अपने थोड़े नुक़सान को राजा से न कहे । उन श्रपकारियों को अपने सामर्थ्य सेही दण्ड देवे । तपशक्ति श्री राजशक्ति इनमें अपनी तपशक्ति अधिक प्रभावशाली है । इसलिए द्विजों को अपनी ही शक्ति से शत्रु दमन करना चाहिए ॥ ३०-३२ ॥

श्रुतीरथर्वाङ्गिरसीः कुर्यादित्यविचारयन् ।

वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्यादरीन् द्विजः ॥ ३३ ॥

क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः ।

धनेन वैश्यशूद्रौ तु जपहोमैर्द्विजोत्तमः ॥ ३४ ॥

विधाता शासिता वक्ता मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ।

तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्क गिरमीरयेत् ॥ ३५ ॥

नवै कन्या न युवतिर्नाल्पविद्यो न बालिशः ।

होता स्यादग्निहोत्रस्य नार्त्तो नासंस्कृतस्तथा ॥ ३६ ॥

नरके हि पतन्त्येते जुह्वन्तः स च यस्य तत् ।

तस्माद्वैतानकुशलो होता स्याद्वेदपारगः ॥ ३७ ॥

। ब्राह्मण अथर्ववेद के श्रङ्गिरस मन्त्रों को पढ़कर अभिचारशत्रुओंकरेका मन्त्रोच्चारण ही ब्राह्मण का शस्त्र है । उसीसे द्विज धन से और नाश करें । क्षत्रिय अपने भुजबल से, वैश्य और शूद्र

पृष्ठ 544

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४०४ F मनुस्मृति । ब्राह्मण मन्त्र जप, हवन से आपत्ति को दूर भगायें । ब्राह्मण विहित कर्मों का अनुष्ठान करनेवाला, पुत्र-शिष्यों का शासन करनेवाला, प्रायश्चित्तादि को बतानेवाला और सब का मित्र कहा गया है । उसको कोई बुरी बात या रूखी बात न कहे । कन्या, युवती, थोड़ा पढ़ा, मूर्ख, रोगी और यज्ञोपवीत संस्काररहित पुरुष अग्निहोत्र न करे | यदि ये सब होता किये जायँ तो खुद और जिसका श्रग्नि- होत्र हो वह दोनों नरकगामी होते हैं । इस कारण श्रौतकर्म में प्रवीण, वेदविशारद ही अग्निहोत्र का होता वन सकताहै॥३३-३७॥ प्राजापत्यसदत्त्वाऽश्वसग्न्याधेयस्य दक्षिणाम् ।: नाहिताग्निर्भवति ब्राह्मणो विभवे सति ॥ ३८ ॥

पुण्यान्यन्यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।

नत्वल्पदक्षिणैर्यज्ञैर्यजन्ते हि कथं च न ॥ ३६ ॥

इन्द्रियाणि यशः स्वर्गमायुः कीर्ति प्रजाः पशून् ।. हन्त्यल्पदक्षिणो यज्ञस्तस्मान्नाल्पधनो यजेत् ॥ ४० ॥

जो ब्राह्मण वैभव होने पर श्रग्न्याधान स्वीकार करके प्रजा- पति देवतावाले अश्व का दान नहीं करता वह अग्न्याधान फल को नहीं पाता । श्रद्धावान्, जितेन्द्रिय पुरुष, पुराय के दूसरे कर्मों को करे | पर न्यून दक्षिणा देकर कोई यज्ञ न करें अर्थात्' विना पूरी दक्षिणा यज्ञ न करना चाहिए । कम दक्षिणा देकर यज्ञ कराने से यह इन्द्रियाँ, यश, स्वर्ग, श्रायु, कीर्ति, प्रजा और पशुओं का नाश करती है । इस कारण थोड़े धनवाला यज्ञ न करे ॥ ३८-४० ॥ अग्निहोत्र्यपविध्याग्नीन् ब्राह्मणः कामकारतः । चान्द्रायणं चरेन मासं वीरहत्यासमं हि तत् ॥ ४१ ॥ 5 ये शूद्रादधिगग्यार्थमग्निहोत्रमुपासते । ऋत्विजस्ते हि शूद्राणां ब्रह्मवादिषु गर्हिताः ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 545

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ग्यारहवां अध्याय । III

तेषां सततमज्ञानां वृपलाग्न्युपसेविनाम् ।

पदा मस्तकमाकस्य दाता दुर्गाणि संतरेत् ॥ ४३ ॥

अकुर्वन् विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन् ।

प्रसनश्चेन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः ॥ ४४ ॥

प्रकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः ।

कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात् ॥ ४५ ॥

अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्धयति ।

कामतस्तु कृतं मोहात्प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः ॥ ४६ ॥

श्रग्निहोत्री ब्राह्मण यदि जान -बूझकर दोनों काल हवन न करे तो एक मासचान्द्रायण करे । क्योंकि अग्निहोत्र का होम लोप के समान है । जो ब्राह्मण शूद्र से धन लेकर करना पुत्रहत्या श्रग्निहोत्र की उपासना करते हैं वे शूद्र ऋत्विज हैं और वेदपा दियों में निंदित होते हैं । शुद्रघन से श्रग्निउपासना करनेवाले मूर्ख ब्राह्मणों के मस्तक पर धनदाता-शूद्र पैर रखकर परलोकदूषित मैं संकटों को तरजाता है । शास्त्रोक्त कर्मों को न करने और कर्मों को करने से और विपयों में श्रासक्ति से मनुष्यने प्रायश्चित्तप्रायश्चित्त लायक होता है । अनजान में पाप करने पर विद्वानोंकरने पर प्रायश्चित्त .कहा है । कोई श्रतिप्रमाण से जानकर पाप वेदाभ्यास से शुद्ध का विधान कहा है । अज्ञान से किया पापप्रायश्चित्तों से शुद्ध होता है । श्री शान से किया पाप विविध होता है ॥ ४१-४६ ॥ प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य दैवात्पूर्वकृतेन वा । ॥न संसगं व्रजेत्सद्भिः प्रायश्चित्ते कृते द्विजः। ॥ ४७ इह दुश्चरितैः केचित्केचित्पूर्वकृतैस्तथा ॥ ४८ ॥

प्राप्नुवन्ति दुरात्मानो नरा रूपविपर्ययम्

पृष्ठ 546

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४०६ मनुस्मृति । विविध-प्रायश्चित्त । दैववश अथवा पूर्वजन्म के पाप से द्विज प्रायश्चित्त योग्य होकर विना उसको किये सजनों के साथ संसर्ग न करे । कोई यहां के कोई पूर्वजन्म के दुराचार से दुष्टात्मा मनुष्य, विविधरूपं- विकारों को पाते हैं ॥ ४७-४८ ॥

सुवर्णचौर: कौनख्यं सुरापः श्यावदन्तताम् ।

ब्रह्महा क्षयरोगित्वं दौश्चर्य्यं गुरुतल्पगः ॥ ४६ ॥

पिशुनः पौतिनासिक्यं सूचकः पूतिवक्रताम् ।

धान्यचौरोऽङ्गहीनत्वमातिरेक्यं तु मिश्रकः ॥ ५० ॥

अन्नहर्त्तामयावित्वं मौक्यं वागपहारकः ।

वस्त्रापहारकः श्वैत्र्यं पङ्गुतामश्वहारकः ॥ ५१ ॥

दीपहर्ता भवेदन्धः काणो निर्वापको भवेत् ।

हिंसया व्याधिभूयस्त्वमरोगित्वमहिंसया ॥ ५२ ॥

एवं कर्मविशेषेण जायन्ते सद्विगर्हिताः ।

जडमूकान्धवधिरा विकृताकृतयस्तथा ॥ ५३ ॥

सोना का चोर चुरे नखोंवाला, शराबी काले दातोंवाला, ब्रह्म- हत्यारा, क्षयरोगी और गुरु स्त्री-गामी चर्मरोगी होता है । चुग़ल की नाक सड़ती है, झूठे निंदक का मुख दुर्गन्धयुक्त होता है । अनचोर श्रङ्गद्दीन और अन में मिलावट करनेवाला अधिकाङ्ग होता है । पकान चोर को मन्दाग्नि, विद्याचार गूंगा, वस्त्रचोर श्वेतकुष्ठी और घोड़े का चोर लूला होता है । दीप चुरानेवाला धा, दीप बुझानेवाला काना, हिंसा से अधिक रोगी और हिंसा से नीरोग होता है । इस प्रकार अनेक पापकर्मों से मनुष्य जड़बुद्धि, गूँगे, अंधे, बहिरे और कुरूप होजाते हैं ॥ ४६-५३ ॥ चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये ।

पृष्ठ 547

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ग्यारहवां अध्याय । ४०७

निन्धैर्हि लक्षणैर्युका जायन्तेऽनिष्कृतैनसः ॥ ५४ ॥

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः ।

महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ॥ ५५ ॥

अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् ।

गुरोश्चालीकनिर्बन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥ ५६ ॥

इसलिए पापशुद्धि के लिये नित्य प्रायश्चित्त करना चाहिए । जो लोग नहीं करते वे दूषित लक्षणयुक्त होजाते हैं । ब्रह्महत्या, मद्यपान, सुवर्ण की चोरी, गुरुत्री से व्यभिचार और इन महा- पापों के करनेवाले का संसर्ग ये सब महापातक कहे हैं । अपनी बड़ाई में झूठ कहना, राजा से किसी की चुराली करना और गुरु कोठा दोष लगाना -ये पाप ब्रह्महत्या के समाज हैं ॥५४-५६॥

ब्रह्मोता वेदनिंदा कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः ।

गर्हितान्नाद्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट् ॥ ५७ ॥

निक्षेपस्यापहरणं नराश्वरजतस्य च ।

भूमिवज्रमणीनां च रुक्मस्तेयसमं स्मृतम् ॥ ५८ ॥

रेतःसेकः स्वयोनीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च ।

॥सख्युः पुत्रस्य चस्त्रीषु गुरुतल्पसमं विदुः ॥ ५६

गोवधोऽयाज्यसंयाज्यपारदार्यात्मविक्रयाः ।

गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्न्योः सुतस्य च ॥ ६० ॥

परिवित्तितानुजेऽनूढे परिवेदनमेव च ।

तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम् ॥ ६१ ॥

कन्याया दूषणं चैव वार्धुष्यं व्रतलोपनम् ।

॥ ६२ ॥

'तडांगारामदाराणामपत्यस्य च विक्रयः

पृष्ठ 548

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४०८ मनुस्मृति |

व्रात्यता बान्धवत्यागो भृत्याध्यापनमेव च ।

भृत्या चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः ॥ ६३ ॥

सर्वाकरेष्वधीकारो महायन्त्रप्रवर्तनम् ।

हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च ॥६४ ॥

वेद को भूलजाना, वेद की निंदा करता, भूंठी गवाही देना, मित्र का वध करना और अभक्ष्य को खाना, ये छः मद्यपान के समान हैं । धरोहर का मारना, मनुष्य, घोड़ा, चांदी, भूमि, हीरा और मणि चुराना सुवर्णचोरी के माफिक है । सहोदर बहन, कुमारी कन्या, चाण्डालिनी, मित्र और पुत्र की स्त्री से समागम करना गुरुपत्नी के साथ समागम के समान हैं । गोहत्या करना, व्रात्य, शूद्रों को यज्ञ कराना, परस्त्री से व्यभिचार, अपने को दाल. रूप से बेंचना, योग्य गुरु को त्यागना, निर्दोष माता-पिता को त्यागना, स्वाध्याय न करना, स्मार्त्ताग्नि को छोड़ना ये सब उप- पातक हैं । छोटा भाई पहले विवाह करके अग्निहोत्र धारण करे तो बड़ा भाई ' परिवित्ति ' कहाता है, उस बड़े और छोटे भाई को कन्या देना, उनको ऋत्विज बनाना, कन्या को दूपरा लगाना, शास्त्रमर्यादा से व्याज अधिक लेना, व्रत को तोड़ना, तालाब, बगीचा, स्त्री और सन्तान को बेचना, समय पर संस्कार न करना, बांधवों का पालन न करना, शिष्यों ले मासिक लेकर पढ़ाना, नौकरी देकर पढ़ना, न बॅचने योग्य घी-दूध आदि चैचना, सोने की खानों पर राजाज्ञा से अधिकारी होना, बड़े यन्त्र-कलों का चलाना, हरी जड़ी बूटियों को काटना, स्त्री से जीविका करना, श्रभिचार करना और वशीकरण करना ये सच उपपातकहैं॥५७-६४॥ इन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम् । आत्मार्थं च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा ॥ ६५ ॥; अनाहिताग्निता स्तेयमृणानामनपक्रिया । असच्छास्त्राधिगमनं कौशीलव्यस्य च क्रिया ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 549

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ग्यारहवां अध्याय । ४०६

धान्यकुप्यपशुस्तेयं मद्यपस्त्रीनिषेवणम् ।

स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधो नास्तिक्यं चोपपातकम् ॥ ६७ ॥

ब्राह्मणस्य रुजःकृत्या घ्रातिरप्रेयमद्ययोः ।

जैह्मं च मैथुनं पुंसि जातिभ्रंशकरं स्मृतम् ॥ ६८ ॥

खराश्वोष्ट्रमृगेभानामजाविकवधस्तथा ।

संकरीकरणं ज्ञेयं मीनाहिमहिषस्य च ॥ ६६ ॥

निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् ।

अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् ॥ ७० ॥

कृमिकीटवयोहत्या सद्यानुगतभोजनम् ।

फलैधःकुसुमस्तेयमधैर्यं च मलावहम् ॥ ७१ ॥

एतान्येनांसि सर्वाणि यथोक्तानि पृथक् पृथक् ।

यैयैतैरपद्यन्ते तानि सम्यङ्निबोधत ॥ ७२ ॥

ईंधन के लिए हरे वृक्षों को काटना, श्रपने ही लिए भोजन चनाना, दूषित श्रन्न को खाना, समर्थ होकर भी अग्निहोत्र न लेना, चोरी करना, ऋणों को न चुकाना, असत् शास्त्रों का पढ़ना, नाच-गान में लगना, धान्य, कुप्य और पशुओं की चोरी, मद्यप स्त्री का संग, स्त्री, शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय का वध और नास्तिकता, ये सब उपपातक हैं । ब्राह्मण को पीड़ा देना, न सूंघने योग्य वस्तु. को और मद्य को सूचना, कुटिलता और पुरुष से मैथुन,,ये बकराजाति, से भ्रष्ट करनेवाले पाप हैं । गधा, घोड़ा, ऊंट, मृग, हाथीको ' संकरी- मेढ़ा, मछली, सांप और भैंस का वध करना, इन कर्मों, शुद्धसेवा करण ' पाप कहते हैं । निन्दितों से धन लेना, व्यापार , कीट और सत्य बोलना ये ' अपात्रीकरण ' पाप हैं । कृमि और फूल पक्षियों का वध, मद्य के साथ भोजन,' पापफल,हैंकाठ। ये सब ब्रह्म- चुराना और अधीरता ये ' मलिनीकरण II

पृष्ठ 550

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४१० मनुस्मृति । हत्यादि पाप जो अलग अलग कहे गये हैं वे जिन जिन व्रतों से नष्ट होते हैं -उनको सावधान होकर सुनो ॥ ६५-७२ ॥

ब्रह्महा द्वादशसमाः कुटीं कृत्वा वने वसेत् ।

भैक्षाश्यात्मविशुद्धयर्थं कृत्वा शवशिरोध्वजम् ॥७३॥।

लक्ष्यं शस्त्रभृतां वा स्याद्विदुषामिच्छयात्मनः ।

प्रास्येदात्मानमग्नौ वा समिद्धे त्रिरवाक्शिराः॥ ७४ ॥

यजेत वाश्वमेधेन स्वर्जिता गोसवेन वा ।

प्रभिजिद्विश्वजिद्भ्यां वा त्रिवृताग्निष्टुतापि वा ॥ ७५ ॥

जपन् वान्यतमं वेदं योजनान्तं शतं व्रजेत् ।

ब्रह्महत्यापनोदाय मितभुङ्नियतेन्द्रियः ॥ ७६ ॥

सर्वस्वं वेदविदुषे ब्रह्मणायोपपादयेत् ।

धनं वा जीवनायालं गृहं वा सपरिच्छदम् ॥ ७७ ॥

हविष्यभुग्वाऽनुसरेत् प्रतिस्रोतः सरस्वतीम् । जपेद्वा नियताहारस्त्रिर्वै वेदस्य संहिताम् ॥ ७८ ॥:

कृतावपनो निवसेद् ग्रामान्ते गोत्रजेऽपि वा ।

श्राश्रमे वृक्षमूले वा गोब्राह्मणहितेरतः ॥ ७६ ॥

ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा सद्यः प्राणान् परित्यजेत् ।

मुच्यते ब्रह्महत्याया गोता गोर्ब्राह्मणस्य च ॥ ८० ॥

ब्रह्महत्या -प्रायश्चिन्त । ब्रह्महत्या -पातक से निवृत्ति के लिए बारह वर्ष तक वन में कुटी बनाकर रहे, भिक्षा मांगकर खावे और झोपड़ी में मुरदे की खोपड़ी टांगे! अथवा शस्त्रधारियों की इच्छानुसार प्रातक जाहिर होने