मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 561–570
मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 561–570
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ग्यारहवां अध्याय । ४२१
वासो दद्याद्धयं हत्वा पञ्च नीलान् वृषान् गजम् ।
अजमेषावनङ्ग्राहं खरं हत्वैकहायनम् ॥ १३७ ॥
क्रव्यादस्तु मृगान् हत्वा धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् ।
कन्यादान् वत्सतरीसुष्ट्रं हत्वा तु कृष्णलम् ॥१३८॥
• घोड़े की हत्या में वस्त्र, हाथी की हत्या में पांच नीले चैल, बकरां मेढ़ा के लिए सांड़ और गर्दभ के वध में एक वर्ष का बछड़ा दान करे । मांसाहारी पशुओं की हत्या में दूध देनेवाली गौ, मांस न खानेवाले पशुओं की हिंसा में बछड़ी और ऊंट की हिंसा में रत्तीभर सोने का दान करना चाहिए ॥ १३७-१३८ ॥ 7 जिनकार्मुकतावीन् पृथग्दद्याद्विशुद्धये । चतुर्णामपि वर्णानां नारीत्वाऽनवस्थिताः ॥ १३६ ॥
दानेन वधनिर्णेकं सर्पादीनामशक्नुवन् ।
एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं द्विजः पापापनुत्तये ॥ १४० ॥
स्थितां तु सत्त्वानां सहस्रस्य प्रमापणे ।. पूर्णे चानस्यनस्थ्नां तु शूद्रहत्याव्रतं चरेत् ॥ १४१ ॥
किञ्चिदेव तु विप्राय दद्यादस्थितां वधे ।
अनस्थनां चैव हिंसायां प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥ १४२॥
फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यसृक्शतम् ।
गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम् ॥ १४३ ॥
अन्नाद्यजानां सत्वानां रसजानां च सर्वशः ।
'फलपुष्पोद्भवानां च घृतप्राशोविशोधनम् ॥ १४४ ॥
से चारों वर्ण की व्यभिचारिणी स्त्रियों की हत्या होनेकहेपरहुएक्रमसर्प मृगचर्म, धनुष, वकरा और मेढ़े का दान करे । पूर्व
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४२२ मनुस्मृति । आदि के प्रायश्चित्तों को न करसके तो एक एक कृच्छु व्रत करे । हजार हड्डीवाले जीवों की हत्या और विना हड्डीवाले गाड़ी भर जीवों की हत्या में शुद्रहत्या का प्रायश्चित करे । अस्थि- हड्डी वाले प्राणियों की हत्या में ब्राह्मण को कुछ दक्षिणा दे और अस्थि- रहितों की हत्या में प्रणायाम से शुद्ध होता है ।' फल देनेवाले वृक्ष, •गुल्म, बेल, लता और फूलवाले पौधों को व्यर्थ काटने पर सौ ऋचाओं का पाठ करे । सब भांति के अन्न, रस, फल-पुष्पादिमें पैदा हुए जीवों के वध में 'घृत -प्राशन' शुद्ध करता है ॥ १३६-१४४ ॥
कृष्टजानामोषधीनां उत्पन्नानां स्वयं वने ।
वृथालम्भेऽनुगच्छेद्रां दिनमेकं पयोव्रतः ॥ १४५ ॥
एतैर्व्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम् । ज्ञानाज्ञानकृतं कृत्स्नं शृणुतानाद्यभक्षणे ॥ १४६ ॥.
खेत में या वन में स्वयं उत्पन्न औषधियों को व्यर्थ काटने पर एक दिन दूध पीकर गौ के पीछे फिरे । जान या अजान में हिंसा से हुए सब पाप इन व्रतों से नए होजाते हैं । श्रव अभक्ष्य भक्षण का प्रायश्चित्त सुनो ॥ १४५-१४६ ॥ 1
अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा संस्कारेणैव शुध्यति ।
. मतिपूर्वमनिर्देश्यं प्राणान्तिकमिति स्थितिः ॥ १४७ ॥
अपः सुराभाजनस्था मद्यभाण्डस्थितास्तथा ।
पञ्चरात्रं पिवेत्पीत्वा शंखपुष्पीस्सृतं पयः ॥ १४८ ॥
स्पृष्ट्वा दत्त्वा च मदिरां विधिवत्प्रतिगृह्य च ।
शूद्रोच्छिष्टाश्च पीत्वापः कुशावारि पिबेत्र्यहम् ॥१४६॥
ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमाघ्राय सोमपः ।
प्राणानप्सु त्रिरायस्य घृतं प्राश्य विशुध्यति ॥ १५० ॥
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ग्यारहवां अध्याय । ४२३
अज्ञानात्प्राश्य विएसूत्रं सुरासंसृष्टमेव च ।
पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ १५१ ॥
पनं लादण्ड भैक्षचर्या व्रतानि च ।
निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कार कर्मणि ॥ १५२ ॥
अभक्ष्य भक्षणप्रायश्चित्त । ज्ञानमें पान से संस्कार से शुद्धि होती है । जानकर पीने काकोई प्रायश्वित नहीं कहा है । मरणान्त में शुद्धि होती है- यही है।जिसने गुरा औरमथ के पात्र का जल पिया हो वह,पांचविधिदिनसे ग्रह करके काऔरकाढ़ाशूद्र कापियेजूंटा। मद्यजलछूकरपीकर,देकरतीन दिनऔर कुनका उपला जन पीये । सोमपान करनेवाला ब्राह्मण, मद्यप के गंधक कर तीन प्राणायाम जलका और घृतप्राशन करने से नामान से विष्ठा, सूत्र और मद्यका स्पर्श हुआ पदार्थ कर द्विजातियों का फिर संस्कार दोना उचितहै । द्वितीयवार संस्कारमें विज्ञानियों को मुण्डन, मेखला, दण्ड, भिक्षा और व्रत भारत नहीं करना होता ॥ १४७-२५२ ॥
प्रभोज्यानां तु भुक्त्वान्नं स्त्रीशूद्रोच्छिष्टमेव च ।
जग्ध्वा मांसमभक्ष्यं च सप्तरात्रं यवान् पिवेत्॥ १५३॥
शुक्रानि च कपायांश्च पीत्वामेध्यान्यपि द्विजः । ॥
तावद्भवत्यप्रयतो यावन्न व्रजत्यधः ॥ १५४।
विड्वराहखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोःचरेत् ॥ १५५ ॥
प्राश्य सूत्रपुरीपाणि द्विजश्चान्द्रायणं कवकानि च ।
शुष्काणि भुक्त्वा मांसानि भौमानि ॥ १५६ ॥
अज्ञातं चैव सूनास्थमेतदेव व्रतं चरेत्
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४.२४ मनुस्मृतिः ।
क्रव्यादकरोष्ट्राणां कुकुटानां च भक्षणे ।
नरकाकखरार्णा च तप्तकृच्छ्रं विशोधनम् ॥ १५७ ॥
मासिकान्नं तु योऽश्नीयादसमावर्तको द्विजः ।
स त्रीण्यहान्युपवसेदेकाहं चोदके वसेत् ॥ १५८ ॥
ब्रह्मचारी तु योऽश्नीयान्मधुमांसं कथंचन ।
सकृत्वा प्राकृतं कृच्छ्रं व्रतशेषं समापयेत् ॥ १५६ ॥
विडालकाकाखूच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्य च ।
केशकीटावपनं च पिवेद् ब्रह्मसुवर्चलाम् ॥ १६० ॥
1. भोज्यों का अन्न, त्री और शूद्रं का जूठन खाकर और श्रमक्ष्य मांस खाकर सात रात जब की लपसी खाये । सिरका आदि.. सड़ी, भोग्य वस्तु और काढ़ा पीकर बिना वमन किये द्विज शुद्ध 'नहीं होता । गांव का सुअर, गधा, ऊंट, सियार, वानर और har का सूत्र, विष्टा खाजाने पर, चान्द्रायण व्रत करे । सूखा मांस, ज़मीन के फूल, अज्ञात और कसाईखाने का मांस खाकर भी चान्द्रायण ही करे । कच्चे मांस खानेवाले, सुअर, ऊंट, मुरगा, मनुष्य, कौश्रा और गधे का मांस खाने में आजायं तो तप्तकृच्छ से शुद्ध होता है । विना समावर्तन के जो ब्रह्मचारी द्विज, मा-सिक श्राद्ध का श्रन्न खाय वह तीन दिन उपवास करें और एक दिन जल में बैठे । जो ब्रह्मचारी किसी प्रकार मांस सेवन करले, वह प्राजापत्य व्रत करे और वाक्क़ी ब्रह्मचर्य को खतम करदे । विल्ली, कौआ, चूहा, कुत्ता और नौला का जूंठा और बाल, कीड़ा पड़ा अन्न खाकर 'ब्रह्मसुवर्चला' का काढ़ा पीवें ॥१५३-१६०॥
अभोज्यमन्नं नान्तव्यमात्मनः शुद्धिमिच्छता ।
अज्ञानभुक्तं तन्तार्य शोध्यं वाऽप्याशु शोधनैः ॥१.६१ ॥
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ग्यारहवां अध्याय । ४२५
पोऽनायादनस्योक्को व्रतानां विविधो विधिः ।
स्तेयदापापहर्तॄणां व्रतानां श्रूयतां विधिः ॥ १६२ ॥
धान्यान्नचनचौर्याणि कृत्वा कामाद्दिजोत्तमः ।
स्वजातीयगृहादेव कृच्छ्राब्देन विशुध्यति ॥ १६३ ॥
मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य च ।
कूपवापीजलानां च शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥१६४॥
द्रव्याणामपसाराणां स्तेयं कृत्वाऽन्यवेश्मतः ।
चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यात्मशुद्धये ॥ १६५ ॥
भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य च ।
पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम् ॥ १६६ ॥
तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च ।
चैलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम् ॥ १६७ ॥
मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च ।
यः कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नता ॥ १६८ ॥
ब्र अपनी शुद्धि चाहनेवाला पुरुष प्रभेोज्य अन्न न खाय और श्रपान से खाया हुआ घमन करदे । यह न करसके तो शीघ्र प्रायचित्त से शुद्धि करे । यह सब अभक्ष्य भक्षण व्रतों की अनेक प्रकार की विधि कही । श्रव चोरी के पाप को नाश करनेवाले अन्न व्रतों, कोपकान्नसुनो । ब्राह्मणर धन यदिचुरावेजानकरतो एकअपनेवर्ष सजातीयप्राजापत्यकेकरनेघरजलसेसे शुद्ध होता है | मनुष्य, स्त्री, खेत, घर, कूप और बावड़ी केकीमत की चोरी करने पर चान्द्रायण व्रत करना चाहिये । कम वह के पदार्थ दूसरे के घर से चुराने पर सान्तपन व्रत करे, औरसवारी, पदार्थ लौटा देवे । लड्डू श्रादि भक्ष्य, खीर वगैरह भोज्य ५४
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४२६ ॥ मनुस्मृति शय्या, आसन, फूल, मूल और फल की चोरी में पञ्चगव्य से,,,,, होतीहैं । वृक्ष सुखा श्रन्न गुड़ वस्त्र मांस चुराने पर तीन दिन उपवास करे | मरिण, मोती चर्म, मूँगाऔर, तांबा, चांदी, लोहा, कांस और पत्थर बुराने पर बारह दिन चावल की कनकी खावे ॥ १६१-१६८ ॥
कार्पासकीटजीनां द्विशफैकशफस्य च ।
पक्षिगन्धौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव त्र्यहं पयः ॥ १६६ ॥
एतैतैरपात पापं स्तेयकृतं द्विजः ।
अगम्यागमनीयं तु तैरेभिरपानुदेत् ॥ १७० ॥
गुरुतल्पतं कुर्याद्रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु ।
सख्नुः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च ॥ १७१ ॥
पैतृस्वत्रेयी भगिनीं स्वस्त्रीयां मातुरेव च ।
मातुश्च नातुस्तनयां गत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥१.७२ ॥
एतास्तिस्रस्तु भार्यार्थे नोपयच्छेत्तु वुद्धिमान् ।
ज्ञालित्वेनानुपेयास्ताः पतति द्युपयन्नधः ॥ १७३ ॥
कपास, रेशम, ऊन दो और एक खुर के पशु, पक्षी, सुगन्ध द्रव्य,श्रौषध, रस्सी की चोरी करने पर तीन दिन पानी पीकर fear | द्विजों को इन व्रतों से चोरी के पाप को दूर करना चा हिए । श्रगस्या स्त्री के गमन का पाप इन व्रतों से दूर करेः सगी वहन, मित्र और पुत्र की स्त्री, कुमारी और चारडाली के साथ गं- मन में, गुरुपत्ती-गमन का प्रायश्चित्त करे । फूफूंकी बेटी, मौसी की बेटी और मामा की बेटी इन तीन बहनों से गमन करके चान्द्रायण व्रत करे | बुद्धिमान पुरुष इन तीनों को स्त्रीरूप से स्वी कार न करे । ये जाति की होने से अगस्या है इनसे गमन करने 'से नरकगामी होता है ॥ १६६-१७३ ॥
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ग्यारहवां अध्याय । ४२७ श्रमानुषीषु पुरुष उदवयायामयोनिषु । रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥१७४ ॥.
मैथुनं तु समासेव्य पुंसि योषिति वा द्विजः ।
गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत्॥ १७५॥
चण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च ।
पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात् साम्यं तु गच्छति॥१७६॥
श्रमानुपी योनि, रजस्वला और जल में वीर्यपात करके सान्त- पन व्रत करे । द्विज को पुरुष, स्त्री, वैलगाड़ी में, जल में और दिन में, मैथुन करके चत्र सहित स्नान करना चाहिए । ब्राह्मण अज्ञान से चाण्डाल, मेलच्छत्री से गमन करके, भोजन करके उनसे दान लेकर पतित होता है । और जानकर ऐसा कर्म करने पर उनके समान होजाता है ॥ १७४-१७६ ॥
विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि ।
यत्पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद्व्रतम् ॥ १७७ ॥
सा चेत्पुनः प्रदुष्येतु सदृशेनोपयन्त्रिता ।
कृच्छ्रंचान्द्रायणं चैव तदस्याः पावनं स्मृतम्॥ १७८॥
यत्करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनाद्विजः । ॥तद्वैभुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वषैर्यपोहति ॥ । १७६ एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः ॥ १८०॥
पतितैः संप्रयुक्तानामिमाः शृणुत निष्कृतीः में बन्द करे और जो दुराचारी स्त्री को उसका पति एकहै.घरवहीं उससे करवावे । पुरुष को परस्त्रीगमन में प्रायश्चित्तपर फिर भी वह बिगड़ जावे तो किसी जातीय पुरुष के बहकाने । एक रात चांडाल के साथ उसको चान्द्रायण व्रत करावे
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४२८ मनुस्मृति । B समागम से जो पाप द्विज करता है वह तीन वर्ष तक भिक्षा अन्न खाकर गायत्री जप से दूर होता है । यह सब पाप करनेवाले चारों. व की शुद्धि कही है । श्रव पतितों के संसर्ग का प्रायश्चित्त सुनो ॥ १७७-१८० ॥.
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनात् ॥ १८१
यो येन पतितेनैषां संसर्ग याति मानवः ।
स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गविशुद्धये ॥ १८२ ॥
पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्वान्धवैर्वहिः ।
निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञात्पृत्विग्गुरुसन्निधौ ॥ १८३ ॥
दासी घटम पूर्ण पर्यस्येत्येतत्पदा । अहोरात्रमुपासीरन् अशौचं बान्धवैः सह ॥ १८४ ॥ ' '
एक वर्ष तक पतितों के साथ एक सवारी वा श्रासन पर बैठने से और एक पंक्ति में भोजन करने से उनको यज्ञकर्म कराने, वेद पढ़ाने और विवाहसम्बन्ध करने से पतित होजाता है । जो मनुष्य इन पतितों के साथ जो संसर्ग करता है वह उस संसर्ग की शुद्धि के लिए वही व्रत करे । पतित प्रायश्चित्त न करे तो उसके सं पिण्ड और ममेरे-फुफेरे भाई आदि निंदित तिथिको सायंकाल गाँव के बाहर जाति -पुरोहित - गुरुजनों के सामने जलदान करें । दासी जल भरे पुराने घड़े को प्रेत के समान पैर से ठोकर देकर" फोड़ दे, और सपिण्ड बान्धवों के साथ एक ' दिन -रात का' प्रायश्चित्तमाने || १८१-१८४ ॥. निवत्तैरंश्च तस्मात्तु संभाषणमहासने ।. दायाद्यस्य प्रदानं च यात्रा चैव हि लौकिकी॥१८५॥
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ग्यारहवां अध्याय । ४२६
ज्येष्ठता च निवर्त्तत ज्येष्ठावाप्यं च यद्धनम् ।
ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्ययवीयान्गुणतोऽधिकः ॥१८६॥
प्रायश्चित्ते तु चरिते पूर्णकुम्भमर्पा नवम् ।
तेनैव सार्धं प्रास्येयुः स्नात्वा पुण्ये जलाशये ॥ १८७॥
सप्तं घटं प्रास्य प्रविश्य भवनं स्वकम् ।
सर्वाणि ज्ञातिकार्याणि यथापूर्वं समाचरेत् ॥ १८८ ॥
एतदेव विधिं कुर्याद्योषित्सु पतितास्वपि ।
वस्त्रान्नपानं देयं तु वसेयुश्च गृहान्तिके ॥ १८६ ॥
सपिण्ड उनके साथ बोल -चाल उठना-बैठना छोड़ दें । पिता के धन में उसको भाग न दें और लौकिक व्यवहार भी न करें । पति की ज्येष्ठता और उसके भाग का धन जाता रहता है इसलिये वह भाग छोटों में जो गुणी हो उसको देना चाहियेपवित्र। परन्तु वह प्रायश्चित्त करे तो सपिएड-बान्धव साथीजलाशय में जलाशय में स्नान करें और जल भरा घड़ा उस डालें । और घर में आकर जाति के सब काम पूर्ववत् करे । पतित स्त्रियों के विषय में भी यही विधि करे । परन्तु उनको अन ॥ १८५ -१८६ ॥ यत्र जल देना चाहिए और घर के पास में रहें
एनस्थिभिरनिर्णिक्लैर्नार्थं.किञ्चित् सहाचरेत् ।
कृतनिर्णेजनांश्चैव न जुगुप्सेत कर्हिचित् ॥ १६०। ॥
बालनांश्च कृतनांश्च विशुद्धानपि धर्मतः॥ १६१ ॥
शरणागतहन्तॄंश्च स्त्रीहन्तॄंश्च न संवसेत् ।
येषां द्विजानां सावित्री नानूच्येत यथाविधि ॥ १६२ ॥
तांश्चारयित्वात्रीकृच्छ्रान्यथाविध्युपनाययेत्
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४३० मनुस्मृति । प्रायश्चित न करनेवाले पातकियों के साथ दान आदि का कोई सम्बन्ध न रक्खे | और प्रायश्चित्त करनेवालों की फिर निन्दा भी न करे । वालहत्यांवाले, कृतघ्न, शरणागत को मारने वाले और स्त्रियों की हत्या करनेवाले, प्रायश्चित्त कर भी लें तोभी उनका संसर्ग न करे । जिन द्विजों का शास्त्रोक्त समय में यज्ञोपवीत न हुआ हो उनको तीन प्राजापत्य व्रत कराकर विधि- पूर्वक यज्ञोपवीत करावे ॥ १६०-१६२ ॥
प्रायश्चित्तं चिकीर्षन्ति विकर्मस्था तु ये द्विजाः ।
ब्राह्मणा च परित्यक्तास्तेषामप्येतदादिशेत् ॥ १६३ ॥
यद्गर्हितेनार्जयन्ति कर्मणा ब्राह्मणा धनम् ।
तस्योत्सर्गेण शुद्ध्यन्ति जप्येन तपसैव च ॥ १६४ ॥
जपित्वा त्रीणि सावित्र्याः सहस्राणि समाहितः ।
- मासं गोष्ठे पयः पीत्वा मुच्यतेऽसत्प्रतिग्रहात् ॥ १६५॥
उपवासकृशं तं तु गोवजान्पुनरागतम् ।
प्रणतं प्रतिपृच्छेयुःसाम्यं सौम्येच्छसीति किम्॥१६६ ॥
सत्यमुक्त्वा तु विप्रेषु विकिरेद्यवसं गवाम् ।
गोभिः प्रवर्तिते तीर्थे कुर्युस्तस्य परिग्रहम् ॥ १६७ ॥
व्रात्यानां याजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च ।
अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छैर्व्यपोहति ॥ १६८ ॥
शरणागतं परित्यज्य वेदं विप्लाव्य च द्विजः ।
संवत्सरं यवाहारस्तत्पापमपसेधति ॥ १६६ ॥
श्वशृगालखरैर्दष्ट ग्राम्यैः क्रव्याद्भिरेव च ।
नराश्वोष्ट्रवराहैश्च प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥ २०० ॥