श्रीगणेशाय नमः।

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी — पृष्ठ 571–580

मनुस्मृति पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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ग्यारहवां अध्याय । ४३१ विरुद्ध कर्म करनेवाले और वेद न पढ़ेहुए द्विज करना चाहें तो उनको भी येही तीन कृच्छु का प्रायश्चित्तप्रायश्चित्त जो ग्रहण निंदित कर्मों से धन कमाते हैं वे उसको छोड़नेबतावेऔर। जप-तप से शुद्ध होते हैं । एकाग्रचित्त से तीन हज़ार गायत्री का जप करके एक महीना गोष्ठ में दुग्धाहार करके, बुरे दान लेने के पाप से छूटता है । उस उपवास से कुश, गोठ से श्राप विनीत ब्राह्मण से पूछे कि हे सौम्य! " क्या तूहमारे समान रहने की प्रतिज्ञा करना चाहता है? " उन ब्राह्मर्षो से ' श्रव असत् दान न लूंगा ' यह सत्यवचन कहे और गौश्रों को चारा देवे फिर ों से पवित्र किए स्थान ( जहां जल पीती हॉ ) में वे ब्राह्मण उसके साथ व्यवहार श्रारम्भ करें । व्रात्यों को यह कराकर माता, पिता और गुरु से अन्य का प्रेतकर्म कराके मारणकर्म और ' अहीन ' नामक यज्ञ करके तीन प्राजापत्य व्रत करने से शुद्ध होता है । शरणागत को छोड़कर अनधिकारी को वेद पढ़ाकर एक वर्ष जो खाय तो पाप से छुटकारा पाता है । गाँव के रहनेवाले कोई जीव कुत्ता, सियार, गदहा, मांसाहारी जीव, मनुष्य, घोड़ा, ॐ और सुरकाट या स्पर्श करलें तो प्राणायाम से शुद्ध होता है ॥ १६३- २०० ॥

पठानकालता मासं संहिताजप एव वा ।

होमाश्च सकला नित्यमपाङ्क्त्यानां विशोधनम्॥ २०१ ॥

उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानं तु कामतः ।

स्नात्वातुविप्रो दिग्वासाः प्राणायामेन शुद्धयति॥२०२ ॥

'विनाद्भिरसु वाप्यार्तः शारीरं सन्निवेश्य च ।

सचैलो बहिराप्लुत्य गामालभ्य विशुद्ध्यति ॥ २०३ ॥

aaaaai नित्यानां कर्मणां समतिक्रमे ।

स्नातकव्रतलोपे च प्रायश्चित्तमभोजनम् ॥ २०४ ॥

पृष्ठ 572

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४३२ मनुस्मृति ।

हुङ्कारें ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः ।

स्नात्वाऽनश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत् ॥ २०५ ॥

'ताडयित्वा ढणेनापि कण्ठे वावध्य वाससा ।

विवादे वा विनिर्जित्य प्रणिपत्य प्रसादयेत् ॥ २०६ ॥

अवगूर्य त्वव्दशतं सहस्रमभिहत्य च ॥

जिवांसया ब्राह्मणस्य नरकं प्रतिपद्यते ॥ २०७ ॥

शोणितं यावतः पांशून् संगृह्णाति महीतले ।

तावन्त्यव्द सहस्राणि तत्कर्ता नरके वशेत् ॥ २०८ ॥

एक मास तक दो दिन के बाद तीसरे दिन सायंकाल को भोजन, वेदसंहिता का पाठ और साकल मन्त्रों से होम, पंक्ति- बाह्य को शुद्ध करता है । ब्राह्मण जानकर ऊंड या गधे की सवारी में बैठे या नंगा होकर स्नान करे तो प्राणायाम से शुद्ध होता है! मल, मूत्र के बेग से श्रातुर पुरुष बिना जलके वा जल में मल-मूत्र करे तो गाँव के बाहर सवस्त्र स्नान करें और गौ का स्पर्श करके शुद्ध होता है । वेदोक्त नित्यक्रमों का और स्नातक का व्रत का लोप होने पर उपवास करना प्रायश्चित है । ब्राह्मण को हुँकार ( चुप रह श्रादि ) और बड़े को ( तु ) कहकर स्नान करके भोजन करें और प्रणाम करके उनको प्रसन्न करे । ब्राह्मणं .को तिनु के से भी मारकर अथवा वस्त्र से बांधकर या विवाद से जीतकर प्रणाम करके उनको प्रसन्न करे । ब्राह्मण को मारने " की इच्छा से दराडा उठाकर सौ वर्ष और मारकर हज़ार वर्ष नरक में पड़ता है "। मारेहुए ब्राह्मण के देह से गिरा रुधिर धूल: के जितने कणों को भिगोता है मारनेवाला उतने हजार वर्षे नरक में पढ़ता है | २०१-२०८ ॥

अवगूर्य चरेत्कृच्छ्रमतिकृच्छ्रं निपातने ।

कृच्छ्रातिकृच्छ्रो कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितम्॥ २०६ ॥

पृष्ठ 573

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ग्यारहवां अध्याय । ४३३

अनुक्तनिष्कृतीनां तु पापानामपनुत्तये ।

शक्तिं चावेक्ष्य पापं च प्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत्॥ २१० ॥

यैरभ्युपायैरेनांसि मानवो व्यपकर्षति ।

तान्वोऽभ्युपायान्वक्ष्याभिदेवर्षिपितृसेवितान् ॥२११ ॥

त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् ।

त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरन् द्विजः ॥ २१२ ॥

गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ।

एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥ २१३ ॥

एकैकं ग्रासमश्नीयात् त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् ।

त्र्यहं चोपवसेदन्त्यमतिकृच्छ्रं चरन् द्विजः ॥ ॥ २१४ ॥

तप्तकृच्छ्रं चरन् विप्रो जलक्षीरघृतानिजान् ।

प्रतित्र्यहं पिवेदुष्णान् सकृत्स्नायी समाहितः ॥ २१५॥

यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम्।

पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः ॥ २१६ ॥

, ब्राह्मण के ऊपर मारने के लिए लकड़ी उठाकर प्राजापत्यव्रत मारने पर प्रतिकृच्छु श्रौर रुधिर निकलने परहै उनकाकृच्छ्रातिकृच्छुशक्ति और करे । जिन दोपों का प्रायश्चित नहीं कहा। मनुष्य जिन उपायों से पाप विचार कर प्रायश्चित्त नियत करेपितरों के सेवित उपायों को पाप नष्ट करता है उन देवर्षिव्रतऔरकरनेवाला द्विज तीन दिन प्रातः- तुम से कहता हूं । प्राजापत्य और तीन दिन विना मांगा काल और तीन दिन सायंकालयो वारह दिनका होता है । एक दिन :खावे और तीन दिन व्रत करेऔर कुशका जल मिलाकर खाय और गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी तब ' कृच्छ सान्तपन ' होता है । एक रात्रिका उपवास करे ५५

पृष्ठ 574

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III मनुस्मृति । दिन प्रातःकाल एक एक ग्रास खाय, दूसरे दिन सायंकाल को एक एक ग्रास खाय, तीसरे दिन विना मांगा एक एक ग्रास खाय और अन्त के तीन दिन उपवास करे यह प्रतिकृच्छ कहलाता है । तप्तकृच्छ करनेवाला द्विज एक बार स्नान करे और तीन दिन गरम जल तीन दिन गरम दूध तीन दिन गरम घी और तीन दिन वायु का पान करे । जितेन्द्रिय होकर बारह दिन भोजन न करना

' पराक' नामक कृच्छुहै । यह सब पापों को दूर करदेताहै॥२०६-२१६॥

एकैकं ह्रासयेत् पिण्डं कृष्णे शुक्ले च वर्धयेत् ।. उपस्पृशंस्त्रिषवणमेतच्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ २१७ ॥

एतमेव विधिं कृत्स्नमाचरेद्यवमध्यमे ।

शुक्लपक्षादिनियतश्चरंश्चान्द्रायणं व्रतम् ॥ ११८ ॥

अष्टाष्टौ समश्नीयात् पिण्डान् मध्यंदिने स्थिते ।

नियतात्मा हविष्याशी यतिश्चान्द्रायणं चरन् ॥२१६॥

चतुरः प्रातरश्नीयात् पिण्डान् विप्रः समाहितः । चतुरोऽस्तमिते सूर्ये शिशुश्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ २२०॥ "

यथाकथञ्चित् पिण्डानां तिस्रोऽशीतीः समाहितः ।

मासेनाश्नन् हविष्यस्य चन्द्रस्यैति सलोकताम्॥२२१ ॥

एतद्रुद्रास्तथादित्या वसवश्चाचरन् व्रतम् ।

सर्वाकुशलमोक्षाय मरुतश्च महर्षिभिः ॥ २२२ ॥

महाव्याहृतिभिर्होमः कर्तव्यः स्वयमन्वहम् ।

अहिंसा सत्यमक्रोधमाजर्व च समाचरेत् ॥ २२३ ॥

त्रिरहनिर्निशायां व सवासा जलमाविशेत् ।

स्त्रीशूद्रपतितांश्चैव नाभिभाषेत कर्हिचित् ॥ २२४ ॥

पृष्ठ 575

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| ग्यारहवां अध्याय ४३५ तीन समय स्नान करे, कृष्णपक्ष में एक एक ग्रास घटावे, शुक्लपक्ष में एक एक ग्रास बढ़ावे यह चान्द्रायण व्रत कहलाता है । ' यवमध्यम ' व्रत में शुक्लपक्ष से नियमपूर्वक चान्द्रायणवत करता हुआ इन्हीं सब विधियों को करे । ' यतिचान्द्रायण ' करनेवाला, नित्य दोपहर में हविष्यान्न के आठ आठ ग्रास खावे और नियमसे रहे । चार प्रास प्रातःकाल और चार ग्रास सूर्यास्त मैं खाय, यह ' शिशुचान्द्रायण ' व्रत है । एक मास में efacerea के दोसौ चालीस २४० ग्रास खाने से चन्द्रलोक प्राप्त होता है । रुद्र, श्रादित्य, वसु, मस्त और महर्षियों ने सब पापों के नाशार्थ इस व्रत को किया था । यह व्रत करनेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वयं महाव्याहृतियों से हवन करे । और श्रहिंसा, सत्यभाषण, क्रोध- त्याग और सरलता का घर्ताव करे । तीन बार दिन में और तीन वार रात में सवत्र स्नान करे । त्रो, शूद्र और पतितों से कभी araata न करे ॥ २१७-२२४ ॥

स्थानासना विहरेदशक्नोऽधः शयीत वा ।

ब्रह्मचारी ती च स्याद्गुरुदेव द्विजार्चकः ॥ २ ९ ५ ॥

सावित्रीं च जपेन्नित्यं पवित्राणि च शक्तितः ।

प्रायश्चित्तार्थमादृतः ॥ २२६ ॥

एतैर्द्विजातयः शोध्या व्रतैराविष्कृतैनसः ।

नाविष्कृतपापस्तु मंत्रमैश्च शोधयेत्। ॥ २२७ ॥

ख्यापनेनानुतापेन तपसाऽध्ययनेन च २२८ ॥पापकृन्मुच्यते पापात् तथा दानेन चापदि। ॥ यथा यथा नरो धर्म स्वयं कृत्वानुभाषते ॥ २२६ ॥

तथा तथा वाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यतेगर्हति । यथा यथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म

पृष्ठ 576

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४३६ मनुस्मृति |. तथा तथा शरीरं तत्तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ २३० ॥

कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात् प्रमुच्यते ।

नैवं कुर्यां पुनरिति निवृत्त्या पूयते तु सः ॥ २३१ ॥

एवं संचिन्त्य मनसा प्रेत्य कर्मफलोदयम् ।

मनोवाङ्मूर्त्तिभिर्नित्यं शुभं कर्म समाचरेत् ॥ २३२ ॥

आसन पर उठा बैठाकरे, अशक्त हो तो भूमि पर सोवे और ब्रह्मचारी, व्रती, गुरु, देवता और द्विजोंका पूजक होवे । नित्य यथाशक्ति गायत्री और घमर्पणादि पवित्र मन्त्रों का जप करे । प्रायश्चित्त के सभी व्रतों में यह विधि मान्य है । पापी द्विजों को इन व्रतों से शुद्ध करे और गुप्त पापियों को ब्राह्मणसभा, मन्त्र जप और होम कराकर शुद्ध करे । पाप करनेवाला पाप प्रकट करने, पश्चात्ताप करने और तप स्वाध्याय करने से और आपत्ति मैदानही करने से पाप से छूटता है । मनुष्य जैसे जैसे अपने अधर्म प्रकट करता है वैसे वैसेही उससे छूटता है जैसे सांप केल से अलग होजाता है । जैसे जैसे उसका मन दुष्कृत कर्म की निंदा करता है वैसे वैसे उसका शरीर अधर्म से छूटता है | पाप करने के बाद संताप करके उससे छूटता है और फिर ऐसा न करूंगाइस संकल्प से पवित्र होता है । परलोक में कर्म- फल मिलता है, ऐसा मन से विचार कर नित्य मन, वाणी और शरीर से शुभकर्म किया करे ॥ २२५-२३२ ॥

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानात्कृत्वा कर्म विगर्हितम् ।

तस्माद्विमुक्रिमन्विच्छन् द्वितीयं न समाचरेत्॥ २३३॥

यस्मिन् कर्मण्यस्य कृते मनसः स्यादलाघवम् ।. तस्मिंस्तावत्तपः कुर्याद्यावत्तुष्टिकरं भवेत् ॥ २३४ ॥

तपोमूलमिदं सर्वं देवं मानुषकं सुखम् ।

पृष्ठ 577

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ग्यारहवां अध्याय । III तपो मध्यं बुधैः प्रोक्तं तपोऽन्तं वेददर्शिभिः ॥ २३५ ॥ „ ब्राह्मणस्य तपो ज्ञानं तपः क्षत्रस्य रक्षणम् । "वैश्यस्य तु तपो वार्त्ता तपः शूद्रस्य सेवनम् २३६ ॥

ऋषयः संयतात्मानः फलमूलानिलाशनाः ।

तपसैव प्रपश्यन्ति त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २३७ ॥

धान्यदो विद्या देवी च विविधा स्थितिः । ava प्रति तपस्तेषां हि साधनम् ॥ २३८॥.

यद्दुस्तरं यद्दुरापं यद्दुर्ग यच्च दुष्करम् । - सर्व तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ २३६ ॥

महापातकिनश्चैव शेषाश्चाकार्यकारिणः ।

तपसैव सुतसेन मुच्यन्ते किल्विषात्ततः ॥ २४० ॥

जानकर वा न जानकर निंदित कर्म करके उससे छुटकारा चाहनेवाला फिर दूसरा पापकर्म न करे । पापी के मन में यदि प्रायश्चित्त से संतोष न हो तो जबतक सन्तोष हो तबतक तप करे । देवलोक और मनुष्यलोक के सब सुख तपोमूलक हैं । • तप से ही मध्य में और अन्त में सुख मिलता है, यह ऋषियों का मतहै । ब्राह्मण का ज्ञान तप है, क्षत्रिय का तप रक्षा है, वैश्य का तप व्यापार है और शूद्र का तप लेवा है । संयमी फल, मूल, पचन का आहार करनेवाले ऋषि तप से ही चराचर विश्व को प्रत्यक्ष देखते हैं । रसायन, औषध, ब्रह्मविद्या और स्वर्गादि लोक मैं निवास ये सब तप से ही सिद्ध होते हैं । उनके साधन तपही हैं ।जो दुस्तर है, दुर्लभ है, दुर्गम है, दुष्कर है, वह सब तप से सिद्ध होजाता है । क्योंकि तप की शक्ति अलक्ष्य है । महापातकी उपपातकी सब तप करने सेही उसपापसे छूटतेहैं ॥ २३३-२४०॥ कीटr चाहि पतङ्गारच पशवश्च वर्यासि च । *

पृष्ठ 578

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४३८ मनुस्मृति ।

स्थावराणि च भूतानि दिवं यान्ति तपोबलात्॥२४१ ॥

यत्किञ्चिदेनः कुर्वन्ति मनोवाङ्मूर्त्तिभिर्जनाः ।

तत्सर्वं निर्दहन्त्याशु तपसैव तपोधनाः ॥ २४२ ॥

तपसैव विशुद्धस्य ब्राह्मणस्य दिवौकसः ।

इज्याश्च प्रतिगृह्णन्ति कामान् संवर्धयन्ति च॥ २४३ ॥

प्रजापतिरिदं शास्त्रं तपसैवासृजत् प्रभुः । तथैव वेदानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ॥ २४४ ॥.

इत्येतत्तपसो देवा महाभाग्यं प्रचक्षते ।

सर्वस्यास्य प्रपश्यन्तस्तपसः पुण्यमुत्तमम् ॥ २४५ ॥

वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा ।

नाशयन्त्याशु पापानि महापातकजान्यपि ॥ २४६ ॥

यथैधस्तेजसा वह्निः प्राप्तं निर्दहति क्षणात् ।

तथा ज्ञानाग्निना पापं सर्वं दहति वेदवित् ॥ २४७ ॥

कीड, सर्प, पतंग, पशु, पक्षी और स्थावर प्राणी भी तपोबल से स्वर्ग को जाते हैं । मनुष्य मन, वाणी और शरीर से जो कुछ पाप करते हैं उन सब को तपोधन ऋषि तप से शीघ्र ही भस्म करदेते हैं । तप से शुद्ध ब्राह्मण के यज्ञवलि को देवता ग्रहण करते हैं और कामनाओं को पूर्ण करते हैं । तपोवल से ही प्रजापति ने - इस शास्त्र को रचाथा और ऋषियों ने वेद भी तप से पाया था । सब प्राणियों का तप से उत्तम योनि में जन्म होता है यह देख कर देवगण तप का माहात्म्य करते हैं । प्रतिदिन वेदाध्ययन, पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान, अपराध सहन ये महापातक के भी पापों का शीघ्र नाश कर देते हैं । जैसे श्रग्नि तेज से ईंधन को जता देता है वैसे वेदविशारद, ज्ञानरूपी अग्नि से सब पाप को जला देता है | २४१-२४७ ॥

पृष्ठ 579

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' ग्यारहवां अध्याय । ४३६

इत्येतदेतसा मुक्कं प्रायश्चित्तं यथाविधि ।

श्रत ऊर्ध्वं रहस्यानां प्रायश्चित्तं निबोधत ॥ २४८ ॥

सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामास्तु षोडश ।

अपि भ्रूणहरां मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः ॥ २४६ ॥

कौत्सं जाप इत्येतद्वाशिष्ठं च प्रतीत्यृचम् ।

माहित्रं शुद्धवत्यश्च सुरापोऽपि विशुद्धयति ॥ २५० ॥

सकृजप्त्वास्य वामीयं शिवसङ्कल्पमेव च ।. अपहृत्य सुवर्ण तु क्षणाद्भवति निर्मलः ॥ २५१ ॥

हविष्यान्तीयमभ्यस्य नतमंह इतीतिच ।

जपित्वा पौरुपं सकं मुच्यते गुरुतल्पगः ॥ २५२ ॥

एनसी स्थूलसूक्ष्माणां चिकीर्षन्नपनोदनम् ।

अवेचं जपेदब्दं यत्किञ्चदेमितीति वा ॥ २५३ ॥

प्रतिगृह्याप्रतिग्राह्यं भुक्त्वा चान्नं विगर्हितम् ।

जपंस्तरत्समन्दीयं पूयते मानवस्त्र्यहात् ॥ २५४ ॥

इस प्रकार पापों का यथाविधि प्रायश्चित्त कहा गया है । गुप्त पापों का प्रायश्चित्त सुनो । एक मास तक ॐकारसे मनुष्यऔर व्याहृति के साथ सोलह प्राणायाम करने से भ्रूणहत्याका कौत्स- छूट जाताहै । ' अपनः शुशोचदघम् ' इत्यादि० ' इत्यादिॠग्वेदवाशिष्ठमंत्र, शुक्ल और ' प्रतिस्तोमे तिरुपसंवशिष्ठा' शुद्धवत्य० ' इत्यादि ऋचा 4 ' ' महित्रीणाम् इत्यादि सूक्त और होजाता हैं का पाठ करने से सुरापान दोष सेऔरमुक्त' शिवसंकल्प ० । ', श्रस्यइत्यादिवा मस्य० ' इत्यादि ऋचा के सूक्त से तुरंत छूट जाता I सूक्त के पाठ से, सुवर्णवोरी के पापऋचा, ' नतमहोन दुरितं० " ' हविष्यामजरं० ' इत्यादि उन्नीस

पृष्ठ 580

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४४०: मनुस्मृति । इत्यादि आठ चा और पुरुषसूक्त का एक मास नित्य पाठ करने से गुरुपत्नी संभोग का पाप दूर होजाता है । महापातक दूर और उपपातकों को करने के लिए ' ते हेष्ट वरुण० 3 इत्यादि ऋer, wear ' यत्किञ्चेदं वरुण दैव्ये जने० ' इत्यादि चाका एक वर्ष तक जप करे । प्रतिग्रह के अयोग्य का लेने और निंदित न के भोजन का पाप, ' तरत्समेरिधावति० ' इत्यादि चार मंत्र का पाठ तीन दिन करने से दूर होता है ॥ २४८ - २५४ ॥

सोमारौद्रं तु बहेना मासमभ्यस्य शुद्धयति ।

स्रवन्त्यामाचरन्स्नानमर्यम्णामिति चत्र्यृचम्॥२५५ ॥

अब्दार्धमिन्द्रमित्येतदेनस्वी सप्तकं जपेत् ।

अप्रशस्तं तु कृत्वाप्सु मासमासीत भैक्षसुक्॥ २५६ ॥

मन्त्रैः शाकलहोमीयैख्वं हुत्वा घृतं द्विजः ।

सुर्वपत्येोजवा वा नम इत्यृचम् ॥ २५७ ॥

महापातकसंयुक्लोऽनुगच्छेद्द्राः समाहितः ।

अभ्यस्याब्दं पावमानीभैक्षाहारो विशुद्ध्यति ॥ २५८॥

अराये वा त्रिरभ्यस्य प्रयतो वेदसंहिताम् ।

• मुच्यते पातकैः सर्वैः पराकैः शोधितात्रैभिः ॥ २५६ ॥

त्र्यहं तूपवसेद्युक्तस्त्रिरह्वोऽभ्युपयन्नपः ।

मुच्यते पातकैः सवैखर्जपित्वाऽघमर्षणम् ॥ २६० ॥

अधिक पाप करनेवाला नदी में स्नान करके ' सोमा रुद्रा धारयेथा० ' इत्यादि और ' श्रर्यमणं वरुणं मित्र० ' इत्यादि तीन ऋचाका एक मास तक नित्य पाठ करे तो शुद्ध होता है । पापी' पुरुष, छःमास तक ' इन्द्रं मित्रं वरुणमग्नि ' इत्यादि सात 'ऋचा का नित्य पाठ करे और जल में मल-मूत्र डालनेवाला एक