मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 101–110

मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 101–110

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अध्याय: ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ७१ दुष्टत्यागः । अर्थाधिकृतानां मतिप्रवृत्तिनिरोधो ' निषेध: ' । असत्प्रवृत्तिनिषेधश्च'अनु-वचनम् ' । वर्णाश्रमाणां स्वकर्मसंशये ' व्यवहारावेक्षणम् ' । परस्पराभियोगे दण्डनिपातनं पराजितानां च । प्रमादस्खलिते तु प्रायश्चित्तमित्येतदष्टविधं कर्म । पञ्चवर्गः कापटिकोदास्थितगृहपतिवैदेहिकतापसव्यञ्जनाः । ( १ ) परमधर्मज्ञाः प्रगल्भच्छात्रा: ‘ कापटिका: ' । तानर्थमानाभ्यामुपसंगृह्य मन्त्री ब्रूयात्— ' राजानं मां च प्रमाणं कृत्वा यत्र यदकुशलं तत्तदानीमेवाश्राव्यं त्वयेति ' । ( २ ) प्रव्रज्यायाः प्रत्यवसित ‘ उदास्थित: ’ । स च प्रज्ञाशौचयुक्तः सर्वान्नप्रदानसमर्थायां भूमौ प्रभूतहिरण्यायां दास-कर्म कारयेत् । कृषिकर्मफलं तच्च सर्वप्रव्रजितानां ग्रासाच्छादनावसथान्प्रति विदध्यात् । तेषां ये वृत्तिकामास्तानुपजपेदेवमेतेनैव वृत्तेन राजार्थश्चरितव्य: । भक्तवेतनकाले चोप-स्थातव्यमिति । सर्वप्रव्रजिताः स्वं स्वं कर्मोपजपेयुः । ( ३ ) कर्षको वृत्तिक्षीण: प्रज्ञा-शौचयुक्तो ‘ गृहपतिव्यञ्जनः ’ । स कृषिकर्म कुर्याद्यथोक्तायां भूमाविति । ( ४ ) वाणिजिको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तो ‘ वैदेहिकव्यञ्जनः ' । स वणिक्कर्म कुर्यात्प्रदिष्टायां भूमाविति समानम् । ( ५ ) मुण्डो जटिलो वा वृत्तिकामः ' तापसव्यञ्जन: ' स नगराभ्याशे प्रभूत-जटिलमुण्डान्ते— वासी शाकं यवमुष्टिं वा मासान्तरितं प्रकाशमश्नीयाद्धर्मव्याजेन गूढं यथेष्टमाहारम् । तापसव्यञ्जनान्तेवासिनश्चैनं प्रसिद्धयोगैरर्थलाभमग्रे शिष्याश्चादिशेयुः । दाहं चौरभयं दुष्टवधं च विदेशप्रवृत्तमिदमद्य श्वो वा भविष्यतीदं वा राजा करिष्यतीति तस्य गूढमन्त्रिणस्तत्प्रयुक्ताः सम्पादयेयुः । ये चास्य राज्ञो वंशलक्षणविद्यां संगविद्यां जम्भकविद्यां मायागतमाश्रमधर्मं निमित्त-ज्ञानं चाधीयाना मन्त्रिणस्तत्र राजा एतत्पञ्चसंस्थायतैर्मन्त्रिभिः स्वविषयेऽवस्थापयेत् । मन्त्रिपुरोहितमेनयतियुवराजदौवारिकान्तर्वेशिकादिषु सद्व्यपदेशवेषशिल्पभाषाविदो जनपदापदेशेनामन्त्रिणः संधारयेत् । तथा कुब्जवामनकिरातमूकजडबधिरान्धनटनर्त्तक-गायनादयः स्त्रियश्चाभ्यन्तरचारिण्योटव्यां वनेचराः कार्याः, ग्रामे ग्रामीणकादयः, पुरुष-व्यापारार्थाः स्वव्यापारम्पराः । परस्परं चैते बोद्धव्यास्तादृशैरेव तादृशाः, वारिसंचा-रिणस्था गूढाश्च गूढसंज्ञिताः । एवं पञ्चवर्गं प्रकल्प्य परस्यात्मनश्चात्मीयादेव पञ्चवर्गान्मन्त्रिपुरोहितादीनामनु-रागापरागौ विद्यात् प्रवर्त्तेत । तथा राजमण्डलप्रचारको माण्डलिकः संधिविग्रहादौ कस्मिन्प्रचारे इति ॥१५४ ॥

हिन्दी— ( राजा ) आठ प्रकार के सब कर्म, पञ्चवर्ग, अनुराग, अपराग और राजमण्डल के प्रचार का वास्तविक रूप से— ( चिन्तन करे ) ॥ १५४ ॥

विमर्श - ( १ ) आठ प्रकार के सब कर्म कई प्रकार के शास्त्रों में आचार्यों ने बतलाये हैं, उनमें तीन प्रकार के यहाँ लिखते हैं । मनु II 7

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७२ मनुस्मृतिः [ सप्तमः ( क ) १- • आदान ( कर लेना ), २. विसर्ग ( नौकर आदि की वेतनादि के रूप में द्रव्य देना ), ३- - प्रेषण ( मन्त्री या दूत आदि को शास्त्रादि के अनुकूल कार्य करने के लिए यथोचित स्थानों में भेजना ), ४— • निषेध ( शास्त्र एवं राजनीति से विरुद्ध कर्म का त्याग करना ), ५– अर्थ - वचन ( किसी विषय में बहुमत होने पर राजाज्ञा के ही अनुसार उस कार्य का निर्णय करना ), ६ – व्यवहार ( प्रजाओं के ऋण आदि लेने या देने के विवाद को देखना ), ७ – दण्डग्रहण ( हारे या आत्मसमर्पण किये से शत्रु शास्त्रोक्त मर्यादा एवं अपनी हानि तथा उसके अपराध के अनुसार दण्डस्वरूप धनराशि लेना ) और ८- शुद्धि ( पाप करने पर पापियों से प्रायश्चित कराना ) ' । ( ख ) मेधातिथि ने इन आठ प्रकार के कर्मों को इस प्रकार से कहा है-नहीं, आरम्भ किये हुए कर्म को आरम्भ करना, २— आरम्भ किये हुए कर्म को पूरा करना, ३ – पूरा किये हुए कर्म को बढ़ाना, ४– • कर्म के फलों का संग्रह करना, ५– साम, ६.-दान, ७– दण्ड और ८- भेद । ( ग ) १ - व्यापार मार्ग, २ – पानी ( नदी आदि ) में पुल बनवाना, ३– • किला बनवाना, ४– किये हुए संस्कार का निर्णय करना, ५– हाथी ( घोड़ा आदि ) का बन्धन, ६ खानों को खोदवाकर धातु आदि को निकलवाना, ७ – शून्य ( सून - सान अर्थात् निर्जन या बीहड़ ) स्थान में प्रवेश करना और ८- - लकड़ी के वन को कटवाना । ( २ ) पञ्च वर्ग ये हैं- १ - कापटिक, २ – उदास्थित, ३- गृहपति ( किसान, गृहस्थ ), ४— वैदेहक ( व्यापारी ), और ५ - तापस के वेषवाला । इनका स्पष्ट वर्णन निम्न है— १. कापटिक — परामर्श का ज्ञाता, ढीठ छात्रवाला, कपट व्यवहार में निपुण तथा जीविकाभिलाषी को धन देकर और आदर - सत्कार कर राजा एकान्त में उससे कहे कि- ' तुम जिसका दुराचार आदि देखो उसको मुझसे शीघ्र कहो । ' २. उदास्थित— पतित संन्यासी, लोक में प्रसिद्ध दोषवाला, बुद्धिमान् और शुद्ध अन्तःकरणवाले तथा जीविका के इच्छुक व्यक्ति से राजा एकान्त में पूर्ववत् १. तथा चोशनसोक्तम्— ४ ९ रनक

' आदाने च विसर्गे च तथा प्रेषनिषेधयोः ।

पञ्चमे चार्थवचने व्यवहारस्य चेक्षणे ॥

दण्डशुद्ध्योः सदा युक्तस्तेनाष्टगतिको नृपः । अष्टकर्मा दिवं याति राजा शक्राभिपूजितः ॥ ' इति । एतस्य विशदाशयो म ० मुक्तावल्यां द्रष्टव्यः ।

पृष्ठ 103

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अध्यायः ] ' मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ७३ ( कापटिक के समान ) कहे और जिस मठ में अधिक आय हो, उसमें रखे तथा अधिक उपजाऊ भूमि उसे दे और वह व्यक्ति राजा के गुप्तचरों का काम करनेवाले दूसरे संन्यासियों को भी अन्न - वस्त्र देकर राजा का कार्य करावे । ३. गृहपति— ( किसान या गृहस्थ ) — जीविकाहीन, बुद्धिमान् शुद्धहृदय के रूप में रहनेवाला ( परन्तु वास्तविक किसान न होकर राजा का गुप्तचर हो ), उससे भी राजा का पटिक के समान कहकर खेती का काम करावे । ४. व्यापारी- जो जीविका से रहित एवं व्यापारी के रूप में रहनेवाला ( परन्तु वास्तविक में व्यापारी न होकर राजदूत के योग्य हो, उससे भी कापटिक के समान कहकर राजा धन - मानादि से अपना आत्मीय बनाकर व्यापार करावे ) । ५. तापस- जो मूंड मुंडाया हो या जटादि बढ़ाया हो, जीविकाभिलाषी हो, तपस्वी ( सन्यासी या साधु आदि ) के वेष में हो ( परन्तु वास्तविक तपस्वी न होकर राजदूत का कार्य करता हो ), उससे भी कापटिक के समान एकान्त में कहकर राजा किसी आश्रम, मठ या मन्दिर आदि में नियुक्त करे । वह मुण्डित या जटाधारी व्यक्ति साधु आदि के बीच में रहता हुआ, कपटी ( कपटवेषधारी - प्रत्यक्ष — में शिष्य, किन्तु वास्तविक में उसकी आज्ञा से राजदूत का काम करनेवाले ) शिष्यों से युक्त, राजा के गुप्तरूप में वृत्ति लेता हुआ तपस्या करे— सबके प्रत्यक्ष में तो कई दिनों, सप्ताहों या महीनों पर दो मुट्ठी बेर या अन्य सामान्य फल मूलादि खाय तथा एकान्त में राजा के द्वारा प्राप्त सुन्दर स्वादिष्ट भोजन करे, उसके पूर्वोक्त शिष्य ' मेरे गुरुदेव त्रिकाल के ज्ञाता हैं, सबको सिद्धि देनेवाले हैं ' उसकी प्रसिद्धि जनता में करें तथा जनता उसकी सिद्धता पर विश्वास कर अपने अभिलषितं कार्य की सिद्धि के लिए उससे भला या बुरा सब कुछ अपना मनोभिलषित कहेंगे तथा दूसरे के भले या बुरे कार्यों को बतलावेंगे; इस प्रकार राजा को वह सर्वदा खबर पहुँचाता हुआ राजदूत का काम करता रहेगा । इस प्रकार पञ्चवर्ग का चिन्तन राजा करे । ( ६ ) अनुराग तथा अपराग - मन्त्री, सेनापति आदि निजप्रकृतियों में; भाई बान्धव, राजकुमार आदि सम्बन्धियों में और गुप्तचर तथा प्रजाओं में अपने प्रति अनुराग या अपराग ( स्नेह का अभाव ) को मालूम कर उसका उपाय करे । ( ७ ) राज्यमण्डल का प्रचार - शत्रुभूत राजाओं में कौन मुझसे सन्धि करना चाहता है तथा कौन युद्ध करना चाहता है और इसी प्रकार मित्र, उदासीन, पार्श्ववर्ती आदि राजाओं के विषय में भी चिन्तनकर तदनुसार कार्य करे । [ वने वनेचराः कार्याः श्रवणाटविकादयः । परप्रवृत्तिज्ञानार्थं शीघ्राचारपरम्पराः ॥ ११ ॥ ]

( Reg

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७४ मनुस्मृतिः [ सप्तमः [ हिन्दी – राजा वन में वनेचर, भिक्षुक या फटे पुराने कपड़े पहननेवाले एवं शीघ्र कार्य करनेवाले जङ्गली मनुष्यों को कार्य को मालूम करने के लिए शत्रु नियुक्ति करे ॥११ ॥ ]

[ परस्य चैते बोद्धव्यास्तादृशैरेव तादृशाः । चारसंचारिणः संस्थाः शठाश्चागूढसंज्ञिताः ॥१२ ॥ ]

[ हिन्दी — वैसे ही गुप्तचरों के द्वारा शत्रुओं के वैसे गुप्तचरों से व्याप्त स्थानों तथा नाम छिपाकर कार्य करनेवाले धूर्त गुप्तचरों को मालूम करे || १२ || ]

मध्यमादि राजाओं के प्रचार का चिन्तन-मध्यमस्य प्रचारं च विजिगीषोश्च चेष्टितम् ।

उदासीनप्रचारं च शत्रोश्चैव प्रयत्नतः ॥ १५५ ॥

भाष्य — एतस्मिन्राजमण्डल इमाश्चतस्त्रो राजप्रकृतयो मुख्या भवन्ति । विजिगीषु-ररिर्मध्यम उदासीन इति । तत्र च यो राजा प्रकृतिसम्पन्नोऽहमेवंविधां पृथिवीं विजेष्येऽभ्युत्थितः स विजि-गीषुः उत्साहशक्तियोगात् । 3 शत्रु स्त्रिविधः, सहजः प्राकृतः कृत्रिमः । स्वभूम्यनन्तर इति मध्यमः । अनयोररिविजिगीष्वोरसंहतयोर्निग्रहसमर्थः न संहतयोरुदासीनः, अरिविजिगीषु-मध्यमानामसंहतानां निग्रहसमर्थः, न तु संहतानाम् ॥१५५ ॥

हिन्दी – राजा मध्यम, उदासीन और शत्रु के प्रचार तथा विजिगीषुकी चेष्टा का चिन्तन ( परिज्ञान एवं प्रतिकार ) करे ॥१५५ ॥

य - सीमा विमर्श - १. मध्यम - जो राजा विजिगीषु ( लक्षण आगे कहेंगे ) राजा की सीमा के पास रहता हो अर्थात् ( मध्यम तथा विजिगीषु ) राजाओं की राज्य - स् मिली हुई हो, दोनों विरोधियों में सन्धि होने पर अनुग्रह करने में तथा विरोध होने पर दण्डित करने में समर्थ हो; वह राजा ' मध्यम ' है । २. उदासीन — जो विजिगीषु तथा मध्यम राजाओं के एकमत होने पर अनुग्रह करने में और विरोध होने पर निग्रह ( दण्डित ) करने में समर्थ हो, वह राजा ' उदासीन ' है । ३. शत्रु — इसके तीन भेद हैं-( क ) सहज शत्रु ( चचेरा भाई आदि ), ( ख ) कृत्रिम ( बुराई आदि के कारण बना पार्श्ववर्ती शत्रु । और ४. विजिगीषु -हुआ ) शत्रु और ( ग ) राज्य की भूमि ( सीमा ) का जो राजा अधिक उत्साह, गुण एवं प्रकृति ( स्वभाव या मंत्री सेनापति आदि ) से समर्थ तथा विजयाभिलाषी हो, वह राजा ' विजिगीषु ' है ।

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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता राजमण्डल की बारह प्रकृतियाँ-एताः प्रकृतयो मूलं मण्डलस्य

समासतः ।

अष्टौ चान्याः समाख्याता द्वादशैव तु ताः स्मृताः ॥ १५६ ॥

७५ भाष्य – एताः स्मृताः । एता मूलप्रकृतयो मण्डलस्य व्याख्याताः । अष्टौ-चान्याः । आसां चतसृणां प्रकृतीनामेकैकस्याः प्रकृतेर्मित्रममित्रं चेति द्वे द्वे प्रकृता एता अष्टौ आद्याश्चतस्र एवमुभयतो द्वादश भवन्ति ॥ १५६ ॥

हिन्दी- — राजमण्डल की ये चार ( मध्यम, विजिगीषु, उदासीन और शत्रु ) मूल प्रकृतियाँ है । इस प्रकार कुल मिलाकर राजमण्डल की बारह प्रकृतियाँ हुईं ॥ विमर्श – ‘ शाखाप्रकृतियाँ ' आठ हैं - १. मित्र, २. अरिमित्र, ३. मित्र - मित्र, ४. अरि - मित्र - मित्र, ये चारों शत्रु की भूमि से आगे की ओर तथा ५. पाष्णिग्राह, ६. आक्रन्द, ७. पाष्णिग्राहासार और ८. आक्रन्दासार — ये चारों शत्रु की भूमि से पीछे की ओर । इस प्रकार ये आठ शाखाप्रकृतियाँ तथा पूर्व कथित चार मूल प्रकृतियाँ मिलकर राजमण्डल की बारह प्रकृतियाँ होती हैं ।

राजमण्डल की ७२ प्रकृतियाँ-अमात्यराष्ट्रदुर्गार्थदण्डाख्याः पञ्च चापराः ।

प्रत्येकं कथिता ह्येताः संक्षेपेण द्विसप्ततिः ॥ १५७ ॥

भाष्य — अमात्यादयः पंचप्रकृतयः द्वादशानां प्रकृतीनां एकैकस्या भवन्ति ।

अतः षट्वादशका द्विसप्ततिः ॥ १५७ ॥

हिन्दी – राजमण्डल की पूर्वोक्त ( ७।१५६ ) १२ प्रकृतियों में से प्रत्येक की— १. अमात्य ( प्रधान मन्त्री ), २. राष्ट्र, ३. दुर्ग ( किला ), ४. अर्थ ( धनकोष ) और ५. दण्ड-ये ५ द्रव्यप्रकृतियाँ हैं ( अतः १२ × ५ = ६० द्रव्य प्रकृतियाँ होती हैं ) तथा पूर्वोक्त ( ७।१५६ ) १२ प्रकृतियों को सम्मिलित कर ( ६० + १२ = ७२ ) राजमण्डल की कुल ७२ प्रकृतियाँ मुनियों ने कही हैं ।

अरि आदि के लक्षण-अनन्तरमरिं विद्यादरिसेविनमेव च ।

अरेरनन्तरं मित्रमुदासीनं तयोः परम् ॥ १५८ ॥

भाष्य — विजिगीषुभूम्यनन्तरमरिं विद्यात्तथाऽरिमित्रं मित्रं त्वेवमरिं भूम्यनन्तरं

विजिगीषोर्मित्रं भवति ।

उदासीनस्तयोः परः । अरिमित्रलक्षणं च सहजकृत्रिमयोरपि द्रष्टव्यम् ॥ १५८ ॥।

पृष्ठ 106

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७६ मनुस्मृतिः ' श्री ' [ सप्तमः हिन्दी - विजिगीषु ( अपने राज्य के पार्श्ववर्ती ) तथा शत्रु की सेवा करनेवाला राजा ' अरि ' अरि के बाद में रहनेवाला ' मित्र ' और उन दोनों से भिन्न राजा ' उदासीन ' होता है ॥ १५८ ॥

विमर्श — इन्हीं प्रकृतियों के आगे और पीछे की ओर का भेद है, इनमें ये चार पहले कहे गये ' अरि ' आदि ' व्यपदेश ' तथा अन्त में कहे गये ' पाणिग्राह ' आदि ‘ व्यपदेशभागी ’ हैं । _____ [ विप्रकृष्टेऽध्वनो यत्र उदासीनो बलान्वितः । स खिलो मण्डलार्थस्तु यस्मिज्ञेयः स मध्यमः ॥ १३ ॥ ]

[ हिन्दी - जिस दूर मार्ग में सेनासहित उदासीन राजा हो, वह खिल मण्डलार्थ जिसमें हो उसे मध्यम जानना चाहिये || १३ || ] सामादि से वशीकरण—

तान्सर्वानभिसन्दध्यात्सामादिभिरुपक्रमैः ।

व्यस्तैश्चैव समस्तैश्च पौरुषेण नयेन च ॥ १५ ९ ॥

भाष्य — संदध्याद्वशीकुर्यात् ।

पौरुषनयौ सामदण्डावेव । तत्र चोक्तं ' सामदण्डौ प्रशंसंतीति ' ॥१५ ९ ॥

हिन्दी- - राजा अलग - अलग या मिले हुए सामादि ( साम, दाम, भेद और दण्ड ) उपायों से, पुरुषार्थ से और नीति से उन सबको अपने वश में करे ॥१५९ ॥

षड्गुणों का चिन्तन–

सन्धिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च ।

द्वैधीभावं संश्रयं च षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा ॥ १६० ॥

ए. भाष्य — तत्र हिरण्यादिदानोभयानुग्रहार्थः सन्धिस्तद्विपरीतो विग्रहः । एकान्तता-गमनं यानम् - उपेक्षायामासनम् । सन्धिविग्रहोपादानं द्वैधीभावः । परस्यात्मार्पणं संश्रयः । एते षड्गुणाः । एतेषां यस्मिन् गुणेऽवस्थितो मन्येताहं शक्ष्यामि दुर्गं कारयितुं, हस्तिनीर्बन्धयितुं खनीः खनयितुं, वणिक्पथं प्रयोजयितुं, जतुवनं छेदयितुं, अदेवमातृकदेशे क्षेत्राणि बन्धयितुमित्येवमादीनि, परस्य वित्तानि व्याहर्तुं, बुद्धिविघातार्थं गुणमुपेयात् ॥ १६० ॥

एवं च सति— हिन्दी — सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय — इन छः गुणों का सर्वदा विचार करे ॥ १६० ॥

पृष्ठ 107

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ७७ विमर्श – ( १ ) सन्धि– दोनों के सुख - चैन के लिए हाथी, घोड़ा आदि सैनिक शक्ति तथा सुवर्ण आदि धन के द्वारा परस्पर में एक दूसरे की सहायता करने का निश्चय करना । ( १ ) विग्रह— युद्ध आदि द्वारा विरोध करना । ( २ ) यान - शत्रु के ऊपर चढ़ाई करने के लिए आगे बढ़ना । ( ३ ) आसन शत्रु की उपेक्षा कर चुप मारकर किले आदि सुरक्षित स्थान में बैठ जाना ( ४ ) द्वैधीभाव अपने कार्य की सिद्धि के लिए सेना को दो हिस्सों में करके कार्य करना । और ( ५ ) संश्रय शत्रु से दबाये जाने पर उससे बलवान् दूसरे राजा का आश्रय लेना । इन ६ गुणों में से जिसके ग्रहण करने से शत्रु की हानि एवं अपनी वृद्धि हो उसका विचार करना चाहिये । इन्हीं को ‘ षड्गुण ’ कहते हैं ।

आसनं चैव यानं च सन्धिं विग्रहमेव च ।

कार्यं वीक्ष्य प्रयुञ्जीत द्वैधं संश्रयमेव च ॥ १६१ ॥

भाष्य — एकेन संधायापरस्मिन्याने शक्तं मृषा विगृह्णीयात् । एवमासनमपि संधाय विगृह्य च सर्वमेतत्कार्यं वीक्ष्य प्रयुञ्जीत । नात्र नियतः कालः । यदैव यद्युक्तं मन्येत तदैव तदाचरेत् । “ यदि कालनियमो लक्षयितुं न शक्यते, उपदेशः किमर्थम् ” । एवमाह न शक्यते । विशेषो दुर्लक्षः, सामान्यं तु सुलक्षणमेतदप्यबुधानामु-पयुज्यते ॥१६१ ॥

हिन्दी —- राजा अपनी हानि एवं लाभ को विचारकर आसन, यान, सन्धि, विग्रह तथा द्वैध एवं संश्रय करे ॥१६१ ॥

विमर्श - पूर्व दो ( ७।१६० - १६१ ) श्लोक में परस्पर निरपेक्ष सन्धि आदि षड्गुणों का चिन्तन कार्य बतलाकर इस इस श्लोक में उनके उचित पालन के लिए बतलाते हैं— किसी राजा के साथ सन्धि कर आसन ( युद्धादि का उद्योग छोड़ चुपचाप बैठ जाना ) या किसी से विग्रह करके यान ( चढ़ाई ) कर देना अथवा द्वैधीभाव और बली राजा का आश्रय करना आदि कार्य राजा को करना चाहिए ।

सन्ध्यादि के २-२ भेद-संधिं तु द्विविधं विद्याद्राजा विग्रहमेव च ।

उभे यानासने चैव द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६२ ॥

हिन्दी - राजा सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय ( तथा द्वैत ) इनमें प्रत्येक को

दो प्रकार का जाने । ( उनके प्रकार आगे कह रहे हैं ) ॥ १६२ ॥

पृष्ठ 108

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७६ मनुस्मृतिः [ सप्तमः हिन्दी – विजिगीषु ( अपने राज्य के पार्श्ववर्ती ) तथा शत्रु की सेवा करनेवाला राजा ‘ अरि ’ अरि के बाद में रहनेवाला ' मित्र ' और उन दोनों से भिन्न राजा ‘ उदासीन ’ होता है ॥१५८ ॥

विमर्श— इन्हीं प्रकृतियों के आगे और पीछे की ओर का भेद है, इनमें ये चार पहले कहे गये ‘ अरि ' आदि ' व्यपदेश ' तथा अन्त में कहे गये ' पाष्णिग्राह ' आदि ‘ व्यपदेशभागी ’ हैं । ____ [ विप्रकृष्टेऽध्वनो यत्र उदासीनो बलान्वितः । स खिलो मण्डलार्थस्तु यस्मिज्ञेयः स मध्यमः ॥ १३ ॥ ]

[ हिन्दी — जिस दूर मार्ग में सेनासहित उदासीन राजा हो, वह खिल मण्डलार्थ जिसमें हो उसे मध्यम जानना चाहिये || १३ || ] सामादि से वशीकरण—

तान्सर्वानभिसन्दध्यात्सामादिभिरुपक्रमैः ।

व्यस्तैश्चैव समस्तैश्च पौरुषेण नयेन च ॥ १५ ९ ॥

II IIII II I I I

भाष्य — संदध्याद्वशीकुर्यात् ।

पौरुषनयौ सामदण्डावेव । तत्र चोक्तं ' सामदण्डौ प्रशंसंतीति ' ॥ १५ ९ ॥

हिन्दी- -राजा अलग - अलग या मिले हुए सामादि ( साम, दाम, भेद और दण्ड ) उपायों से, पुरुषार्थ से और नीति से उन सबको अपने षड्गुणों का चिन्तन-शमें करे ॥१५ ९ ॥ क

सन्धिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च ।

द्वैधीभावं संश्रयं च षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा ॥ १६० ॥

जागर भाष्य — तत्र हिरण्यादिदानोभयानुग्रहार्थः सन्धिस्तद्विपरीतो विग्रहः । एकान्तता-गमनं यानम् - उपेक्षायामासनम् । सन्धिविग्रहोपादानं द्वैधीभावः । परस्यात्मार्पणं संश्रयः । एते षड्गुणा: । एतेषां यस्मिन् गुणेऽवस्थितो मन्येताहं शक्ष्यामि दुर्गं कारयितुं, हस्तिनीर्बन्धयितुं खनीः खनयितुं, वणिक्पथं प्रयोजयितुं, जतुवनं छेदयितुं, अदेवमातृकदेशे क्षेत्राणि बन्धयितुमित्येवमादीनि, परस्य वित्तानि व्याहर्तुं, बुद्धिविघातार्थं गुणमुपेयात् ॥ १६० ॥

एवं च सति— हिन्दी – सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय — इन छः गुणों का सर्वदा विचार करे ॥ १६० ॥

पृष्ठ 109

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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ७७ विमर्श - ( १ ) सन्धि — दोनों के सुख - चैन के लिए हाथी, घोड़ा आदि सैनिक शक्ति तथा सुवर्ण आदि धन के द्वारा परस्पर में एक दूसरे की सहायता करने का निश्चय करना । ( १ ) विग्रह— युद्ध आदि द्वारा विरोध करना । ( २ ) यान – शत्रु के ऊपर चढ़ाई करने के लिए आगे बढ़ना । ( ३ ) आसन शत्रु की उपेक्षा कर चुप मारकर किले आदि सुरक्षित स्थान में बैठ जाना ( ४ ) द्वैधीभाव अपने कार्य की सिद्धि के लिए सेना को दो हिस्सों में करके कार्य करना । और ( ५ ) संश्रय शत्रु से दबाये जाने पर उससे बलवान् दूसरे राजा का आश्रय लेना । इन ६ गुणों में से जिसके ग्रहण करने से शत्रु की हानि एवं अपनी वृद्धि हो उसका विचार करना चाहिये । इन्हीं को ‘ षड्गुण ’ कहते हैं ।

आसनं चैव यानं च सन्धिं विग्रहमेव च ।

कार्यं वीक्ष्य प्रयुञ्जीत द्वैधं संश्रयमेव च ॥ १६१ ॥

-भाष्य — एकेन संधायापरस्मिन्याने शक्तं मृषा विगृह्णीयात् । एवमासनमपि संधाय विगृह्य च सर्वमेतत्कार्यं वीक्ष्य प्रयुञ्जीत । नात्र नियतः कालः । यदैव यद्युक्तं मन्येत तदैव तदाचरेत् । “ यदि कालनियमो लक्षयितुं न शक्यते, उपदेशः किमर्थम् ” । एवमाह न शक्यते । विशेषो दुर्लक्षः, सामान्यं तु सुलक्षणमेतदप्यबुधानामु-पयुज्यते ॥१६१ ॥

हिन्दी- - राजा अपनी हानि एवं लाभ को विचारकर आसन, यान, सन्धि, विग्रह तथा द्वैध एवं संश्रय करे ॥ १६१ ॥

विमर्श - पूर्व दो ( ७।१६० - १६१ ) श्लोक में परस्पर निरपेक्ष सन्धि आदि षड्गुणों का चिन्तन कार्य बतलाकर इस इस श्लोक में उनके उचित पालन के लिए बतलाते हैं— किसी राजा के साथ सन्धि कर आसन ( युद्धादि का उद्योग छोड़ चुपचाप बैठ जाना ) या किसी से विग्रह करके यान ( चढ़ाई ) कर देना अथवा द्वैधीभाव और बली राजा का आश्रय करना आदि कार्य राजा को करना चाहिए ।

सन्ध्यादि के २-२ भेद-संधिं तु द्विविधं विद्याद्राजा विग्रहमेव च ।

उभे यानासने चैव द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६२ ॥

हिन्दी - राजा सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय ( तथा द्वैत ) इनमें प्रत्येक को

दो प्रकार का जाने । ( उनके प्रकार आगे कह रहे हैं ) ॥ १६२ ॥

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७८ मनुस्मृतिः

सन्धि के २ भेद-समानयानकर्मा च विपरीतस्तथैव च ।

तदा त्वायतिसंयुक्तः संधिर्ज्ञेयो द्विलक्षणः ॥ १६३ ॥

[ सप्तमः भाष्य — समानयानकर्मा । ' यानफलं सहितौ तुल्यौ गच्छावः । समानफलभागि-तया, न च त्वयाऽहमुल्लङ्घनीयः । यत्ततो लप्स्यते तत्तव मम च भविष्यति ' । अथवा ‘ त्वमन्यतो याह्यहमन्यत्र यास्यामीत्येवमसमानयानकर्मा विपरीतः ॥ १६२-१६३ ॥ हिन्दी — सन्धि के दो भेद – ( १ ) समानकर्मा सन्धि और असमानकर्मा सन्धि । तात्कालिक या भविष्य के लाभ की इच्छा से किसी दूसरे राजा से मिलकर यान ( शत्रु पर चढ़ाई ) करना ‘ समानधर्मा ' नामक सन्धि है, तथा ( २ ) तात्कालिक या भविष्य में लाभ की इच्छा से किसी राजा से ' आप इधर जाइये, मैं इधर जाता हूँ ' ऐसा कहकर पृथक्-पृथक् यान ( शत्रु पर चढ़ाई ) करना, ' असमानधर्मा ' नामक सन्धि है ॥ १६३ ॥

विग्रह के २ भेद-स्वयंकृतश्च कार्यार्थमकाले काल एव वा ।

मित्रस्य चैवापकृते द्विविधो विग्रहः स्मृतः ॥१६४ ॥

भाष्य — स्वयं विग्रहस्य कालः यदावश्यं स्वबलेनोत्सहते परं कर्षयितुमुत्साह-युक्त:, प्रकृतयः संहता विवृद्धाश्च स्वकर्मकृष्यादिफलसम्पन्नाः परस्यैतान्यपहरिष्यन्ति कर्माणि क्षीणलब्धप्रकृतिः परः, शक्यास्तत्प्रकृतय उपजापेनात्मीयाः कर्तुं, स स्वयं विग्रहस्य काल । अकाल एतद्विपरीतः । तत्रापि विग्रहो मित्रस्यापकृते । यदि शत्रुणा तदीयं मित्रमपकृतं तदा तद्विचिन्त्या-कालेऽपि विग्रहः कर्त्तव्यः । यद्यपि स्वयमपि शत्रोरनन्तरं मित्रं भवति, तथापि तेन मित्रेण सहायेन शक्यः शत्रुरपबाधितुम् । शत्रोरनन्तरं मित्रं भवति शत्रोस्तु शत्रुर्विषया-नन्तरम् । पाठान्तरं ‘ मित्रेण चैवापकृते ' ॥ तेन यद्यसौ बाधितो भवति, विग्रहः कार्यः । तदाऽकालेऽपि एतद्विग्रहस्य द्वैविध्यं स्वकार्यार्थं मित्रकार्यार्थं च । अथवाऽऽत्मनोऽभ्युच्छ्रयादेकः प्रकारो मित्रेणापकृते व्यसनिनि तत्रैव द्वितीयः ॥ १६४ ॥

हिन्दी - विग्रह के दो भेद हैं- ( १ ) शत्रु पर विजय पाने के लिए शत्रुव्यसन ( मन्त्री या सेनापति आदि से विरोध ) मालूम कर समय ( ७।१८० में कथित अगहन