मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 91–100
मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 91–100
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अध्याय: ] ' मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ६१ जोड़ा वस्त्र, प्रतिमास एक द्रोण ' ( ४ आढक = ८ सेर ) धान्य और उत्तम दास या दासी के लिए प्रतिदिन ६ पण ( पैसा ) वेतन दे ॥ १२६ ॥
विमर्श- - उत्तम दास - दासियों के लिए प्रतिदिन ६ पैसा वेतन, प्रति छमाही ६ जोड़ा वस्त्र और प्रतिमास ६ द्रोण अन्न दे; इसी प्रकार मध्यम दास - दासियों के लिए प्रतिदिन ३ पैसा वेतन, प्रतिछमाही ३ जोड़ा वस्त्र और प्रतिमास ३ द्रोण अन्न दे तथा साधारण दास - दासियों के लिए प्रतिदिन १ पैसा वेतन, प्रति छमाही १ जोड़ा वस्त्र और प्रतिमास १ द्रोण ( ८ सेर ) अन्न दे । व्यापारियों का कर—
क्रयविक्रयमध्वानं भक्तं च सपरिव्ययम् ।
योगक्षेमं च सम्प्रेक्ष्य वणिजो दापयेत्करान् ॥ १२७ ॥
भाष्य — करग्रहणविधिः । कियता मूल्येन क्रीतमेतत्कियच्च विक्रीयमाणं लभते कियता च कालेन विक्रीयते कियत्प्रतिभावेन नश्यत्यथ नेत्येवमादिरूपक्रयविक्रयपरीक्षा । अध्वानं चिराचिरगमनप्राप्यताम् । भक्तं सक्त्वोदनादिमूल्यम् । परिव्ययस्तदुपकरणं सर्पिः सूपशाकादि धनादि च । योगक्षेममरण्ये कान्तारे वा गच्छतो राजभयं चौरभयं निश्चौरता वेत्यादि । एतदपेक्ष्य वणिग्भ्यः करा आदातव्याः । “ वणिग्भिर्दापयेत्करान् ” इति पाठो युक्तः 1 । गत्यादिनियमेन कर्मसंज्ञाया अभावात् । दण्डवचनो वा धातुस्तदा दण्डिवद्विकर्मकत्वम् ॥ १२७ ॥
हिन्दी— ( राजा ) खरीद - बिक्री, मार्ग, भोजन, मार्गादि में चोर आदि के रक्षा का व्यय, और लाभ को देख ( सम्यक् प्रकार से विचार ) कर व्यापारी से कर लेवे ॥ १२७ ॥
थोड़ा - थोड़ा कर लेने में दृष्टान्त-यथाल्पाल्पमदन्त्याद्यं वार्योकोवत्सषट्पदाः ।
तथाल्पाल्पो ग्रहीतव्यो राष्टाद्राज्ञाब्दिकः करः ॥ १२८ ॥
१. अष्टमुष्टिर्भवेत्कुञ्ची कुञ्यष्टौ च पुष्कलम् ।
पुष्कलानि तु चत्वारि आढकः परिकीर्तितः ॥
चतुराढको भवेद् द्रोण....... ' इति । ( म ० मु ० )
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६२ मनुस्मृतिः भाष्य — क्षीणकृषेर्न्यूनः करो ग्रहीतव्य इत्येवमर्थमेतत् । [ सप्तमः वार्योकसो जलौकसः । षट्पदा भ्रमराः । यथा ते स्वल्पमाददानाः परिपुष्टा भवन्ति तथा राज्ञा मूलोच्छेदो न कर्तव्यः ॥ १२८ ॥।
हिन्दी — जिस प्रकार जोंक, बछड़ा और भ्रमर थोड़े - थोड़े अपने - अपने खाद्य ( क्रमश: रक्त, दूध और मधु ) को ग्रहण करता है; उसी प्रकार राजा को प्रजा से थोड़ा-थोड़ा वार्षिक कर ग्रहण करना चाहिये ॥ १२ ९ ॥
यथा फलेन युज्येत राजा कर्त्ता च कर्मणाम् ।
तथावेक्ष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत्सततं करान् ॥ १२ ९ ॥
भाष्य— एतदेवाह । कर्मणां कर्त्ता वाणिजकः राजा च फलेन युज्येत । तथा करान्कल्पयेन्न परिमाणनियमकारणमस्ति । यत्र महान्लाभस्तत्राधिकमप्युक्तपरिमाणाति-क्रमेणं ग्रहीतव्यम् ॥१२९ ॥
हिन्दी — जिस प्रकार राजा देखभाल आदि के और व्यापारी व्यापार आदि के फल से युक्त रहे ( दोनों को अपने - अपने उद्योग के अनुसार उचित फल मिले ) वैसा देख ( अच्छी तरह विचार ) कर राजा सर्वदा निश्चयकर राज्य में कर लगावे ॥ १२८ ॥
पशु, सुवर्ण तथा धान्य का ग्राह्य कर—
पञ्चाशभाग आदेयो राज्ञा पशुहिरण्ययोः ।
धान्यानामष्टमो भागः षष्ठो द्वादश एव वा ॥ १३० ॥
भाष्य — मूल्याधिकयोः पशुहिरण्ययोः पञ्चाशद्भागो ग्राह्य: । धान्यानां भागविशेषः सुकरदुष्करापेक्षया मन्तव्यः ।
पंचाशत्पूरणः पञ्चाशः । विंशत्यादिभ्य इति पक्षे तमट् ।
पञ्चाशद्भाग इति पाठे द्विभागादिवत्संख्यान्तरम् ॥१३० ॥
हिन्दी — राजा को पशु तथा सुवर्ण का कर ( मूल धन से अधिक ) का पचासवाँ भाग और धान्य का छठा, आठवाँ या बारहवाँ भाग ( भूमि की श्रेष्ठता अर्थात् उपजाऊपन एवं परिश्रम आदि का विचारकर ) ग्रहण करना चाहिये ॥१३० ॥
वृक्ष, मांस आदि का ग्राह्यकर—
आददीताथ षड्भागं द्रमांसमधुसर्पिषाम् ।
गन्धौषधिरसानां च पुष्पमूलफलस्य च ॥ १३१ ॥
पत्रशाकतृणानां च कर्मणां वैदलस्य च ।
मृण्मयानां च भाण्डानां सर्वस्याश्ममयस्य च ॥ १३२ ॥
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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता
भाष्य- द्रुशब्देन वृक्षा उच्यन्ते । शेषं प्रसिद्धम् ।
एतेषां षष्ठो भागो लाभाद्ग्रहीतव्यः ॥ १३१-१३२ ॥
६३ हिन्दी - वृक्ष, मांस, शहद, घी, गन्ध, औषधि, रस ( नमक आदि ) फूल, मूल, फल, पत्ता, शाक, घास, चमड़ा, बाँस तथा मिट्टी के बर्तन और पत्थर की बनी सभी वस्तुओं का छठा भागकर रूप में ग्रहण करे ॥ १३१-१३२ ॥
श्रोत्रियो से ग्रहण का निषेध-म्रियमाणोऽप्याददीत न राजा श्रोत्रियात्करम् ।
न च क्षुधाऽस्य संसीदेच्छ्रोत्रियो विषये वसन् ॥ १३३ ॥
भाष्य- - तथा कुर्याद्यथा क्षुधाऽस्य विषये श्रोत्रियो नावसीदति ॥१३३ ॥
हिन्दी – मरता हुआ ( अतिनिर्धन ) भी राजा श्रोत्रिय ( वेदपाठी ब्राह्मण ) से कर न ले, इस ( राजा ) के देश में रहता हुआ श्रोत्रिय ( जीविका न मिलने से ) भूख से पीड़ित न हो ( ऐसा प्रबन्ध रखे ) ॥ १३३ ॥
श्रोत्रिय के क्षुधापीड़ित होने से राज्य में पीडा-यस्य राज्ञस्तु विषये श्रोत्रियः सीदति क्षुधा । तस्यापि तत्क्षुधा राष्ट्रमचिरेणैव सीदति ॥ १३४ ॥
भाष्य — अनन्तरविधेरतिक्रमफलमेतत् ॥१३४ ॥
हिन्दी — जिस राजा के देश में श्रोत्रिय भूख से पीड़ित होता है, उस राजा का वह राज्य भी शीघ्र ही भूख से पीड़ित होता है ( राज्य में अकाल पड़ता है ) ॥ १३४ ॥
श्रोत्रिय के लिए वृत्ति- कल्पना-श्रुतवृत्ते विदित्वाऽस्य वृत्तिं धर्म्यं प्रकल्पयेत् । संरक्षेत्सर्वतश्चैनं पिता पुत्रमिवौरसम् ॥ १३५ ॥
भाष्य — धर्म्यं वृत्तिम् । यया कुटुम्बधर्मस्यावसादनं न भवति । वृत्तिं प्रकल्प्य
सर्वतो रक्षेच्चौरादिभ्यः । स्वयमधिकव्ययाच्च ॥ १३५ ॥
हिन्दी – राजा इस ( श्रोत्रिय ) के शास्त्र ( शास्त्र - ज्ञान ) और आचरण का विचार कर धर्मयुक्त वृत्ति ( जीविका ) कल्पित करे और पिता जिस प्रकार अपने औरस करता है, उसी प्रकार इस ( श्रोत्रिय ) की रक्षा करे ॥१३५ ॥
श्रोत्रिय - रक्षा से राजा की आयु आदि की वृद्धि-संरक्ष्यमाणो राज्ञोऽयं कुरुते धर्ममन्वहम् । आरस पुत्र की रक्षा तेनायुर्वर्धते राज्ञो द्रविणं राष्ट्रमेव च ॥ १३६ ॥
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६४ मनुस्मृतिः [ सप्तमः भाष्य— धार्म्मिकश्रोत्रियरक्षायाः फलमेतदायुर्द्रविणराष्ट्रवृद्धिः ॥१३६ ॥
हिन्दी — राजा द्वारा सुरक्षित होता हुआ श्रोत्रिय प्रतिदिन जिस धर्म को करता है, उससे राजा की आयु, धन और राज्य की वृद्धि होती है ॥१३६ ॥
शाक आदि के विक्रेताओं से स्वल्पतम कर—
यत्किञ्चिदपि वर्षस्य दापयेत्करसंज्ञितम् ।
व्यवहारेण जीवन्तं राजा राष्ट्रे पृथग्जनम् ॥ १३७ ॥
भाष्य — कृषिधनप्रयोगक्रयविक्रयादिव्यवहारेण जीवन्तं पृथग्जनं ब्राह्मणाच्छ्रो-त्रियादन्यं करं दापयेत् । करसंज्ञा सञ्जाताऽस्य करसंज्ञितम् ॥ १३७ ॥
हिन्दी- - राजा अपने देश में व्यवहार ( शाक आदि सामान्यता वस्तुओं की खरीद - विक्री ) से जीनेवाले साधारण श्रेणी के लोगों से कुछ ( बहुत थोड़ा ) वार्षिक कर ग्रहण करे ॥१३७ ॥
शिल्पी आदि से कार्य करवाना-कारुकान् शिल्पिनश्चैव शूद्रांश्चात्मोपजीविनः ।
एकैकं कारयेत्कर्म मासि मासि महीपतिः ॥ १३८ ॥
भाष्य – शिल्पमात्रोपजीविनस्तान्मासं मासमेकमहः कर्म कारयेत् ।
आत्मोपजीविनश्च शूद्रा वेशभारवाहादयः ॥ १३८ ॥
हिन्दी – कारीगर, बढ़ई, लोहार आदि, बोझ आदि ढोनेवाले ( मजदूर आदि ) से राजा प्रति महीने में एक दिन काम करवावे ( इनसे दूसरा कोई कर न लेवे ) ॥१३८ ॥
कर त्याग तथा अधिक कर लेने का निषेध-नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां चातितृष्णया ।
उच्छिन्दन् ह्यात्मनो मूलमात्मानं तांश्च पीडयेत् ॥ १३ ९ ॥
भाष्य — करशुल्कादेरग्रहणमात्मनो ' मूलछेदः ', अतिबहुग्रहणं परेषाम् । तच्च तृष्णया भवतीत्यनुवादः । आत्मनो मूलच्छेदेनात्मपीडा भवति, कोशक्षयात् । अतस्तेऽपि पीड्यन्ते । उपस्थिते विग्रहे क्षीणकोशशक्तिररिभिरपरुद्धोद्धरणेऽवश्यं भवेत् । सा च तेषां महती पीडा । यत्तु सार्वकालिकं करग्रहणं तत्सम्पादयतो न खेदिता भवन्ति ॥१३ ९ || हिन्दी – राजा ( स्नेहादि से ) अपनी जड़ को और अधिक लोभ से प्रजा की जड़ को नष्ट न करे; क्योंकि अपनी जड़ को नष्ट करता हुआ अपने को और प्रजाओं की जड़ को नष्ट करता हुआ ( राजा ) प्रजाओं को पीड़ित करता है ॥१३ ९ ॥
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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ६५ विमर्श- - राजा प्रजाओं पर अधिक स्नेह आदि के कारण उनसे कर नहीं लेकर अपनी जड़ को नष्ट ( कोष आदि को क्षीण ) करता हुआ स्वयं पीड़ित होता है तथा अधिक लोभ के कारण प्रजा से बहुत कर लेता हुआ राजा प्रजा को पीड़ित करता है, अतएव राजा सर्वथा कर का त्याग भी न करे तथा अतिलोभ से बहुत कर लेकर प्रजा को पीड़ित भी न करे । कार्यानुसार तीक्ष्ण या मृदु होना-तीक्ष्णश्चैव मृदुश्च स्यात्कार्यं वीक्ष्य महीपतिः । तीक्ष्णश्चैव मृदुश्चैव राजा भवति सम्मतः ॥ १४० ॥
भाष्य - तीक्ष्णमृदुता नित्यमभ्यसनीया । तादृशो राजा प्रजानां सम्मतो भवत्य-भिप्रेतः ॥१४० ॥
हिन्दी — राजा कार्य को देखकर कठोर या मृदु ( सरल, दयालु ) होवे; ( क्योंकि समयानुसार ) कठोर और मृदु राजा सबका प्रिय होता है ॥१४० ॥
श्रान्त होने पर प्रधानमन्त्री की नियुक्ति-अमात्यमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्गतम् । स्थापयेदासने तस्मिन्खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम् ॥ १४१ ॥
भाष्य – प्रजानां सम्बन्धिनि कार्यदर्शने खिन्नः श्रान्तः । धर्मज्ञादिगुणयुक्तं सर्व-सहममात्यं तस्मिन् कार्येक्षणे नियुञ्जीत । न पुनस्तस्मिन्नेव सिंहासने ॥१४१ ॥
हिन्दी - ( राजा कार्य की अधिकता आदि के कारण उसे देखने में ) असमर्थ या थका हुआ राजा धर्मज्ञाता, विद्वान्, जितेन्द्रिय और कुलीन प्रधानमंत्री को प्रजाओं के कार्य को देखने के लिए नियुक्त करे ॥ १४१ ॥
एवं सर्वं विधायेदमितिकर्त्तव्यमात्मनः ।
युक्तश्चैवाप्रमत्तश्च परिरक्षेदिमाः प्रजाः ॥ १४२ ॥
भाष्य — सहायसंग्रहप्रभृत्युक्तस्यार्थस्यैवमिति परामर्शनम् । विधाय कृत्वा इति-कर्तव्यमुपकारकमितिकर्त्तव्यमुच्यते । युक्तस्तत्परः । अत एवाप्रमत्तः । अथवा बुद्ध्य-स्खलनमप्रमत्तता सर्वकाले । एवं प्रजाः परिरक्षेत् ॥१४२ ॥
हिन्दी — इस प्रकार अपना सम्पूर्ण कर्तव्य करके उद्योगयुक्त और सावधान रहता हुआ ( राजा ) इन प्रजाओं की रक्षा करे ॥ १४२ ॥
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६६ मनुस्मृतिः चोर आदि से प्रजाओं की रक्षा-विक्रोशन्त्यो ग्रस्य राष्ट्राद् ह्रियन्ते दस्युभिः प्रजाः । [ सप्तमः सम्पश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति ॥ १४३ ॥
- पूर्वोक्तयोरप्रमादयोरन्यथात्वे दोषमाह । भाष्य-यदि सभ्यग्गुल्मस्थानानि प्रति न जागर्ति तदा छिद्रान्वेषिभिर्दस्युभिः चौरैः प्रजा ह्रियन्ते । तासु किं करिष्यति । अतस्तादृशो राजा मृत एव । जीवितं मरणमेव । अतोऽ-प्रमत्तेन भवितव्यम् । विक्रोशन्त्यः आक्रन्दन्त्यः । ह्रियन्ते । सम्पश्यतः सभृत्यस्य निर्दिष्टं द्रक्ष्यते । केवलं च भृत्यास्तदीयाः
पश्यन्ति नानुधावन्ति मोक्षयन्ति । सर्वे तु मृतकल्पाः ॥१४३ ॥
हिन्दी – मन्त्री सहित जिस राजा के देखते अर्थात् राज्य करते रहने पर राज्य में चोरों ( डाकू आदि ) से प्रजा अपहृत होती है वह राजा मरा हुआ है, जीता नहीं है ( क्योंकि प्रजारक्षणरूप जीवित राजा का कार्य वह नहीं करता, अतः मरा हुआ है ) ॥ १४३ ॥
प्रजापालन की श्रेष्ठता-क्षत्रियस्य परो धर्मः प्रजानामेव पालनम् ।
निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ १४४ ॥
भाष्य – प्राप्तं फलं भुङ्क्ते राजा । स धर्मेण युज्यते । अन्यथाऽनुग्राहकाणामेव पालनं कुर्वन्प्रत्यवैति ॥१४४ ॥
हिन्दी – प्रजाओं का पालन ही क्षत्रियों का श्रेष्ठ धर्म है; क्योंकि ( प्रजापालन द्वारा ) शास्त्रोक्त फल को भोगनेवाला राजा धर्म से युक्त होता है ॥१४४ ॥
मन्त्रणा का समय-उत्थाय पश्चिमे यामे कृतशौचः समाहितः ।
हुताग्निर्ब्राह्मणांश्चार्च्य प्रविशेत्स शुभां सभाम् ॥ १४५ ॥
भाष्य — ‘ पश्चिमो यामो ’ ब्राह्मो मुहूर्त्तः । अत आह कृतशौचः समाहितः । हुताग्निरिति । न च ब्राह्मे मुहूर्त्ते होमविधानमस्ति । तदा हि चतुर्मुहूर्त्तशेषा रात्रिर्भवति ।
होमश्च व्युष्टायां रात्रौ समाप्य कार्यं उष: कल्पत्यागेन ।
आर्च्य ब्राह्मणान्पूजयित्वा । सभां शुभां मङ्गलवतीं प्रविशेत् ॥१४५ ॥
हिन्दी - ( राजा ) रात्रि के अन्तिम पहर में उठकर शौच ( शौच, दन्तधावन एवं
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अध्याय: ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ६७ स्नानादि नित्यकर्म ) करके अग्नि में हवन और ब्राह्मणों की पूजाकर शुभ ( वास्तुलक्षण से युक्त ) सभा ( मंत्रणा - गृह ) में प्रवेश करे ॥ १४५ ॥
मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा-तत्र स्थितः प्रजाः सर्वाः प्रतिनन्द्य विसर्जयेत् ।
विसृज्य च प्रजाः सर्वा मन्त्रयेत्सह मन्त्रिभिः ॥ १४६ ॥
भाष्य - तत्र तस्यां सभायां स्थितः प्रजा दर्शनार्थमागताः प्रतिनन्द्य यथार्हसम्भा-षणेक्षणाभ्युत्थानाभिवादनैर्हर्षयित्वा विसर्जयेत् यथागतमनुजानीयात् । ततो विसर्जितेषु तेषु मन्त्रयेत्सह मन्त्रिभिः । किं कर्त्तव्यमिति स्वपरराष्ट्रगत-कर्त्तव्यतानिरूपणम् । मन्त्रपञ्चाङ्गं दर्शयिष्यते ॥ १४६ ॥
हिन्दी - वहाँ पर ( सभाभवन में दर्शनार्थ ) स्थित प्रजाओं को ( यथायोग्य किसी को भाषण से, किसी को प्रियदर्शन से ) संतुष्ट कर विसर्जित करे । सब प्रजाओं को विसर्जित ( भेज ) कर मंत्रियों के साथ मन्त्रणा ( गुप्त - परामर्श ) करे ॥१४६ ॥
एकान्त में गुप्त मन्त्रणा—
गिरिपृष्ठं समारुह्य प्रासादं वा रहोगतः ।
अरण्ये निःशलाके वा मन्त्रयेदविभावितः ॥१४७ ॥
भाष्य — मन्त्रदेशविधिः । रहोगतः विविक्ते निर्जने देशे स्थितः । अविभावितः अनुमानेनापि यथा न जना जानन्तीदं वस्तु विद्यत इति, तथा कुर्यात् । निःशलाकम् । ‘ शलाका ' इषीकाः । यत्र तृणमपि नास्ति, येन न कश्चित्तिष्ठतीति सम्भावनाऽस्ति, तन्निःशलाकम् ॥१४७ ॥
हिन्दी – राजा पहाड़ पर चढ़कर, या एकान्त प्रासाद महल में या निर्जन वन में दूसरे से अज्ञात होते हुए ( मन्त्री के साथ ) मन्त्रणा ( पञ्चाङ्ग ' मन्त्र का विचार ) करे ॥ विमर्श - मन्त्रणा को जानने के लिए शत्रु के गुप्तचर अनेक उपाय करते हैं । अतः उनसे लक्षित न होकर पर्वत की चोटी आदि एकान्त स्थानों में विचार करना चाहिये । इस मन्त्रणा के पाँच अङ्ग हैं; यथा - १- कर्मों के आरम्भ करने का उपाय, २- पुरुष द्रव्य - सम्पत्ति, ३- देशकाल का विभाग, ४- विनिपात का प्रतीकार और ५- कार्यसिद्धि । १. तदुक्तम् — सहायाः साधनोपायाः विभागो देशकालयोः । विनिपातप्रतीकारः सिद्धिः पचाङ्गमिष्यते ॥ ' इति ।
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६८ मनुस्मृतिः मन्त्रगुप्ति का उत्तम फल-यस्य मन्त्रं न जानन्ति समागम्य पृथग्जनाः । काकी स कृत्स्नां पृथिवीं भुंक्ते कोशहीनोऽपि पार्थिवः ॥ १४८ ॥
भाष्य — मन्त्रप्रकाशनिवारणार्थः श्लोकः ।
पृथग्जना अमन्त्रिणो मन्त्रविद्वाह्याः ॥१४८ ॥
[ सप्तम: हिन्दी — जिस ( राजा ) के मन्त्र को दूसरे लोग आकर नहीं जानते हैं; कोश से हीन भी वह राजा सम्पूर्ण पृथ्वी का भोग करता है ॥ १४८ ॥
मन्त्र समय में जड़, मूकादि को हटाना-जडमूकान्धबधिरांस्तैर्यग्योनान्वयोतिगान् I स्त्रीम्लेच्छव्याधितव्यङ्गान्मन्त्रकालेऽपसारयेत् ॥ १४ ९ ॥ भाष्य — यत्किंचित्प्राणिजातं तन्मन्त्रयमाणो विशोधयेत् । ततः प्रदेशादपशोध-येत् । मन्त्रभेदाशङ्कया । तिर्यग्योनिषु च शुकसारिकादयोऽपि मन्त्रं भिन्दन्ति । गवाश्वादयोऽपि योगा-रूढाः परिवर्तितनिकायाः सदसद्वार्त्ताहरा भवन्ति । तथान्तर्धानादयोऽपि नरेन्द्रविद्याः श्रूयन्ते । ” व्यङ्गत्वादेव ग्रहणे सिद्धे गोबलीवर्द्दवदितरेषां ग्रहणम् । “ व्यंगस्य हस्तपादादि-छेदने न मन्त्रनियमास्था कर्त्तव्या – नायं कुत्रचित् गन्तुं शक्नोति — इहैवावरुद्ध आस्ते— कथं मन्त्रान् भेत्स्यतीति ” । अथवा एवंविधा मन्त्रिणो न कर्त्तव्या बुद्धिविभ्रमसम्भवात्, अतो नाप्ता अपि, ततोऽपसर्पः ॥१४९ ॥
हिन्दी - मन्त्र के समय में ( राजा ) जड़, मूक ( गूंगे ), बहरे, तिर्यग् योनि में उत्पन्न ( सुग्गा - तोता, मैना आदि ), अत्यन्त वृद्ध, स्त्री, म्लेच्छ, रोगी, व्यङ्ग ( कम या अधिक अङ्गवालों ) को हटा दे ॥१४९ ॥
जड़ादि से मंत्र भेद की शङ्का-भिन्दन्त्यवमता मन्त्रं तैर्यग्योनास्तथैव च ।
स्त्रियश्चैव विशेषेण तस्मात्तत्रादृतो भवेत् ॥ १५० ॥
भाष्य - मानादपेता अवमताः । क्षुद्रादयोऽपमानासत्वे कदाचित्किंचिच्छृणुयुः । कदाचिद्वाऽक्षराण्युच्चारयितुं शक्नुयु-
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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता
स्ततो मन्त्रभेदः स्यात् । शक्नुवन्ति निपुणाः किंचिदागमेष्वनुमातुम् ॥१५० ॥
६ ९ हिन्दी — क्योंकि अपमानित, जड़, मूक और बहरे तथा तिर्यग्योनि में उत्पन्न तोता मैंना आदि और विशेष कर स्त्रियाँ ( अस्थिर बुद्धि होने के कारण ) मन्त्र का भेदन ( अन्यत्र प्रकाशन ) कर देती हैं, इस कारण उसमें ( उन्हें हटाने में ) यत्नयुक्त होवे || १५० ॥
धर्मार्थकाम का चिन्तन-मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे वा विश्रान्तो विगतक्लमः ।
चिन्तयेद्धर्मकामार्थान्सार्थं तैरेक एव वा ॥ १५१ ॥
भाष्य — धर्मादीनां परस्परविरोधं चिन्तयेत् । अन्यतमवृद्धौ सर्वोत्थितिर्जयेत् ॥१५१ ॥
हिन्दी - मध्याह्न में या आधीरात को मानसिक खेद तथा शारीरिक खिन्नता से हीन होकर ( राजा ) उन ( मन्त्रियों ) के साथ में या अकेला ही धर्म, अर्थ और काम का चिन्तन करे ॥१५१ ॥
परस्परविरुद्धानां तेषां च समुपार्जनम् ।
कन्यानां सम्प्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् ॥ १५२ ॥
भाष्य — धर्मार्थकामानां वा मन्त्रिणां वा समुपार्जनं संग्रहणम् । कन्यानां सम्प्रदानं स्वकार्यसिद्धिवशेन चिन्त्यम् । कुमाराणां राजपुत्राणां रक्षणम् । तव वयमित्येवमादिभिर्धर्ममर्थं च ते ग्राहयितव्याः । नवं हि द्रव्यं येनार्थजातेनोपदिश्यते तत्तदा दूषयति । एवमसंस्कृतबुद्धयो यद्य-दुच्यते तत्तत्प्रथमं गृह्णन्ति । यद्यसद्भिः संसृज्यन्ते तदा तत्स्वभावस्तेषां प्राप्नोति । ते च दुःसंस्कारोपदिग्धाः न शक्यन्ते व्यसनेभ्यो निवर्तयितुम् । उक्तं च— ' नीलीरक्ते वाससि कुङ्कुमाङ्गरागो दुराधेयः ' । तस्मात्ते नित्यमनुशासनीयाः । तत्रापि ये गुणवन्तस्तान्व-र्श्वयेत् । इतरानीषत्संविभजेत् । ज्येष्ठं महागुणममत्सरं यौवराज्येऽभिषिंचेत् । एवं राज-पुत्ररक्षणे नित्यं यत्नवता भवितव्यम् ॥१५२ ॥
हिन्दी — प्रायशः परस्परविरुद्ध धर्म, अर्थ और काम में से विरोध को बचाता हुआ राजा उनकी प्राप्ति के उपाय का ( अपने धर्म की वृद्धि के लिए ) कन्या के दान का और अपने पुत्रों की राजनीति, विनयी बनाना आदि की शिक्षा का ( चिन्तन ) करे ॥ १५२ ॥
दूत भेजने आदि का चिन्तन-दूतसम्प्रेषणं चैव कार्यशेषं तथैव च ।
अन्तःपुरप्रचारं च प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥ १५३ ॥
भाष्य - येन संधानं विग्रहो वाऽपि कार्यस्तेन च दूतसम्प्रेक्षणं चिन्त्यम् ।
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७० मनुस्मृति: आरब्धकार्यसम्बन्धं चिन्तयेत्, अवस्थापनाय । [ सप्तमः कक्षान्तरेष्वन्तर्वंशिकसैन्याधिष्ठितोऽन्तःपुरं प्रविशेत् । तत्र स्थविरस्त्रीमतिशुद्धां देवीं परिपश्येन्नापरिशुद्धां देवीम् । गृहलीनो हि भ्राता भद्रसेनो मातुः शयनान्तर्गत: राजानं जघान । कुपुरुषशङ्खविषदिग्धेन नूपुरेणावन्त्यं देवी जघान मेखलया । सौवीरं वेण्यां गूढेन शस्त्रेण विदूरथम् । तस्मादेतानि विस्रंभस्थानानि यत्नतः परीक्षेत । मुण्ड-जटिलकुहकप्रतिसंसर्गं बाह्यदासीभिरन्तःपुरदासीनां प्रतिषेधयेत् । प्रणिधीनां च कार्पटिकादीनां वा परस्पराभिचेष्टितं चिन्तयेत् ॥१५३ ॥
हिन्दी — दूत भेजने का, बचे हुए कार्य का, अन्तःपुर ( रनिवास ) के प्रचार का और गुप्तचरों की चेष्टा का ( चिन्तन करे ) ॥१५३ ॥
विमर्श - गुप्त लेख आदि को लेकर अन्य राज्यों में दूत भेजने आदि का चिंतन करे । स्त्रियों की चेष्टाओं के विषम होने से अन्त: पुर में ' कौन कब और क्यों आता या जाता है ' यह विचार करे । चोटी में छिपाये हुए शस्त्र से रानी से विदूरथ को यथा काशीराज की विरक्त पटरानी ने विष में बुझे हुए नूपूर से काशीराज को मार दिया था, ' अतः अन्तःपुर के विषय में राजा को विशेष चिन्तन करना चाहिये ।
अष्टविध कर्मादि का चिन्तन-कृत्स्नं चाष्टविधं कर्म पञ्चवर्गं च तत्त्वतः ।
अनुरागापरागौ च प्रचार मण्डलस्य च ॥ १५४ ॥
भाष्य — अकृतारम्भः, कृतानुष्ठानम्, अनुष्ठितविशेषणम्, कर्मफलसंग्रहः, तथा सामभेददानदण्डमेतदष्टविधं कर्म । अथवा वणिक्पथः उदकसेतुबन्धनं दुर्गकरणं कृतस्य वा तत्संस्कारनियमः हस्तिबन्धनं खनिखननं शून्यनिवेशनं दारुवनच्छेदनं चेति ।
अपरे त्वाहु-" आदाने च विसर्गे च तथा प्रैषनिषेधयोः ।
पञ्चमे चानुवचने व्यवहारस्य चेक्षणे ॥
दण्डशुद्धयोः सदा युक्तस्तेनाष्टगतिको नृपः । अष्टकर्मा दिवं याति राजा शत्रुभिरर्चितः ॥ ” – इत्यौशनसौ श्लोकौ । तत्र स्वीकरणम् ‘ आदानम् ' बलीनाम् । भृत्येभ्यो धनदानं ‘ विसर्गः ’ । ‘ प्रैषो ’ १. तदुक्तम्— ‘ शस्त्रेण वेणीविनिगूहितेन विदूरथं वै महिषी जघान । विषप्रदिग्धेन च नूपुरेण देवी विरक्ता किल काशिराजम् ॥ ' इति ।