मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 431–440

मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ३ ९ १ विन्देत — नात्मन इच्छया । यथान्यद्गोहिरण्याद्यापणभूमौ । लभ्यते तथा नेयं भार्या । अत उच्यते नेच्छयात्मन इति । देवानां प्रियंदेवेभ्यो हितं — त्यक्तायां भार्यायां वैश्वदेवादिक्रियानिमित्तेनास्ति देव-हितम् । अतस्तां द्विषंतोमपि बिभृयात् । पातित्ये तामनधिकारप्राप्तां पतिरधिविन्देत ॥९ ५ ॥ हिन्दी — पति ( सूर्य आदि ) देवों के द्वारा ही दी गयी स्त्री को प्राप्त करता है, अपनी इच्छा से नहीं प्राप्त करता, अतएव ( उन ) देवों का प्रिय करता हुआ ( वह पति ) उस सदाचारिणी स्त्री का अन्न, वस्त्र तथा आभूषण आदि से सर्वदा पोषण करे ॥९ ५ ॥

स्त्री के साथ धर्मकार्य विधान-प्रजनार्थं स्त्रियः सृष्टाः संतानार्थं च मानवाः ।

तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पल्या सहोदितः ॥ ९ ६ ॥

भाष्य – प्रजनं गर्भग्रणम् । सन्तानो गर्भाधानम् । तस्माद्धेतोरपत्योत्पत्तेरुभया-धीनत्वाद्वेदे स्त्रीपुंसयोः साधारणो धर्मः पल्या सह पुंस उक्तः | अतः केवलस्या-धिकाराभावात् स्त्रियो द्वेष्या अपि न त्याज्याः || ९ ६ ॥ हिन्दी - गर्भ - ग्रहण करने के लिए स्त्रियों की तथा गर्भाधान करने के लिए पुरुषों की सृष्टि हुई है, इस कारण वेद में अग्न्याधान आदि साधारण धर्म भी ( गर्भधारण तथा गर्भाधान के समान ) पुरुष का स्त्री के साथ ही कहा गया है ( अत: पुरुष का कर्तव्य है कि वह स्त्री का अन्न - वस्त्र तथा आभूषण आदि से पोषण करे ॥९ ६ ॥ कन्या- शुल्क देने वाले पति के मरने पर —

कन्यायां दत्तशुल्कायां म्रियेत यदि शुल्कदः ।

देवराय प्रदातव्या यदि कन्याऽनुमन्यते ॥ ९ ७ ॥

भाष्य — यस्याः पित्रादिभिर्गृहीतं शुल्कं न च दत्ता, केवलवचनेन देयत्वेन व्यवस्थिता, –अत्रान्तरे स चेन्प्रियेत तदा – “ अन्यद्रव्यवद्देवरेषु प्राप्ता सर्वेषु वा युधिष्ठिरादिवत्, तदभावे सपिण्डेषु ” – अतो विशेषार्थमिदमुच्यते - देवराय प्रदात-व्येति — न सर्वेभ्यो भर्तृभ्रातृभ्यो नापि सपिण्डेभ्यः, किं तर्ह्येकस्मै देवरायैव । तत्रापि ` कन्याया अनुमतौ सत्याम् । “ अथासत्यां कन्यायाः शुल्कस्य च का प्रतिपत्तिः ” यदि कन्यायै रोचते ब्रह्मचर्यं तदा शुल्कं कन्यापितृपक्षाणामेव । अथ पत्यन्तरमर्थयते तदा प्राग्गृहीतं शुल्कं त्यक्त्वाऽन्यस्मादादाय दीयते ॥ ९ ७ ॥ हिन्दी- आदि को ) देकर ( विवाह के पहले ही ) - कन्या का मूल्य ( उसके पिता यदि पति मर जाय तो उस कन्या की अनुमति होने पर उसे ( उसके ) देवर के लिए दे देना चाहिये ॥९ ७ ॥ मनु II 27

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३ ९ २ मनुस्मृतिः कन्यामूल्य लेने का निषेध-आददीत न शूद्रोऽपि शुल्कं दुहितरं ददन् । [ नवमः शुल्कं हि गृह्णन्कुरुते छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ ९ ८ ॥ भाष्य — इच्छातः शुल्कग्रहणे पूर्वेण विधिरुक्तः । कस्यचित्तत एवाशंङ्का स्यात्– ‘ अदोषं शुक्लग्रहणं शास्त्रे गृहीतशुल्काया विशेष उक्तो यत: ' ' - –अत इमामाशङ्कामपनेतु-माह । आददीत न शूद्रोऽपि शुल्कमिति । इच्छातः प्रवृत्तौ शास्त्रीयो नियमो न तु शास्त्रेण पदार्थस्यैव कर्तव्यतोक्ता । यथा मद्यपीतस्य प्रायश्चित्तविधानेन न मद्यपानं शास्त्रणा-नुज्ञातं भवति । शुल्कसंज्ञेन यदेवोक्तं “ गृह्णन्हि शुल्कं लोभेन ” इति । येन तु विशेषेण पुनः पाठोऽसौ प्रदर्शित एव ॥९ ८ ॥ हिन्दी — कन्या - दान करता हुआ ( शास्त्र - ज्ञान हीन ) शूद्र भी ( मूल्य आदि रूप में कोई ) धन पति से न लेवे ( जब शूद्र तक के लिए निषेध है तो द्विज को तो कन्या का मूल्य कदापि नहीं लेना चाहिए ); क्योंकि पति से धन लेता हुआ ( पिता आदि कन्याभिभावक ) छिपकर कन्या को बेचता है ॥ ९ ८ ॥

वाग्दान करके दूसरे को कन्या का दान निषेध-एतत्तु न परे चक्रुर्नापरे जातु साधवः ।

यदन्यस्य प्रतिज्ञाय पुनरन्यस्य दीयते ॥ ९९ ॥

भाष्य – यदुक्तं ' गृहीते शुल्के कन्येच्छायां सत्यां मृते तु शुल्कदेऽस्या अन्यत्र दानमिति ' तन्निषेधति । यदन्यस्य शुल्कदस्य प्रतिज्ञाय पुनरन्यस्मै दीयते पुनः शुल्कं गृहीत्वेति वरं स्वयंवरं तु कारयेत्कन्याम् — एष एवार्थः ॥९९ ॥

हिन्दी — महर्षि भृगुजी मुनियों से कहते हैं कि ) कन्या को दूसरे के लिए देने का वचन देकर पुन: वह किसी दूसरे के लिए दे दी जाय, ऐसा न तो किसी पुराने सज्जन ने किया और न वर्तमान में ही कोई सज्जन करता है ॥९९ ॥

नानुशुश्रुम जात्वेतत्पूर्वेष्वपि हि जन्मसु ।

शुल्कसंज्ञेन मूल्येन छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ १०० ॥

भाष्य — न कुतश्चिदस्माभिः श्रुतम् । पूर्वेषु जन्मसु कल्पान्तरेष्वित्यर्थः ॥१०० ॥

हिन्दी – ( महर्षि भृगुजी मुनियों से पुन: कहते हैं कि ) पूर्वजन्मों में भी यह नहीं सुना कि ' शुल्क ' नामक मूल्य से किसी सज्जन ने कभी भी गुप्तरूप से कन्या को बेचा हो ॥१०० ॥

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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ३ ९ ३

संक्षेपतः स्त्री - पुरुष का धर्म-अन्योन्यस्याव्यभीचारो भवेदामरणान्तिकः ।

एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः ॥ १०१ ॥

भाष्य- अविशेषेण वचनक्रिया सर्वक्रियास्वव्यभिचारः । तथा चापस्तम्बः “ धर्मे चार्थे च कामे च नाभिचरितव्या " इति । एतावच्च श्रेयो धर्मोऽर्थः कामः । तथा चोक्तम्— “ त्रिवर्ग इति तु स्थितिः " इति । यच्चाहुः– “ अपरित्यागोऽव्यभिचारः, इतरथा स्त्रीवत्पुरुषस्यानेकाभार्यापरिणयनं न स्यात् ” –तदयुक्तम् । अस्ति पुरुषे वचनं “ कामतस्तु प्रवृत्तानाम् ” तथा “ वन्ध्याष्टमे-ऽधिवेत्तव्या ’ ” इति । न तु स्त्रियाः । तथा च लिङ्गान्तरं स्यात् “ एकस्य बह्व्यो जाया भवन्ति नैकस्या बहवः सह पतय " इति ( ऐतरेयब्राह्मणे ३।३ ) ।

आमरणान्ते भव आमरणान्तिकः । अन्यतरमरणेऽपि तस्यान्तोऽस्तीत्यर्थः ।

एष संक्षपेण स्त्रीपुंसयोः प्रकृष्टो धर्मो वेदितव्यः ॥१०१ ॥

हिन्दी —- मरण- पर्यन्त स्त्री - पुरुष का परस्पर में व्यभिचार अर्थात् धर्मार्थकाम - विषयक कार्यों में पार्थक्य ( अलगाव ) न होवे, यही संक्षेप में स्त्री - पुरुष का धर्म जानना चाहिये ॥१०१ ॥

स्त्री - पुरुष का कर्तव्य—

तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ ।

यथा नातिचरेतां तौ वियुक्तावितरेतरम् ॥ १०२ ॥

भाष्य — यतेयातां प्रयत्नवन्तौ तथा स्यातां यथेतरेतरं परस्परं नातिचरेताम् । ‘ अतिचारो’ऽतिक्रमः । धर्मार्थकामेष्वसहभावः । कृतक्रियौ कृतविवाहादिसंस्कारौ नियुक्तौ । तत: परोपसंहारश्लोकोऽयं नानुक्तार्थोपदेशकः ॥१०२ ॥

पूर्वोक्तप्रकरणयोः सम्बन्धश्लोकोऽयम् । हिन्दी— ( अतएव ) विवाह किये हुए स्त्री - पुरुष को ऐसा यत्न करना चाहिये कि वे परस्पर में ( धर्मार्थकाम - विषयक कार्यों में ) कभी पृथक् न होवें ॥।१०२ ॥ दायभाग—

एष स्त्रीपुंसयोरुक्तो धर्मो वो रतिसंहितः ।

आपद्यपत्यप्राप्तिश्च दायधर्मं निबोधत ॥ १०३ ॥

भाष्य — उक्तेषु स्त्रीपुंसयोश्चापत्योत्पत्तौ च दायधर्मस्य विभागस्यावसरः ॥१०३ ॥

हिन्दी— ( भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि ) मैंने आप लोगों से रति ( स्नेह — अनुराग ) युक्त स्त्री - पुरुष के धर्म तथा उनके आपत्काल में सन्तान प्राप्ति के विधान को कहा, ( अब

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३ ९ ४ मनुस्मृतिः [ नवमः आप लोग ) दायभाग ( पिता आदि के धन के विभाजन - बँटवारा ) को सुनें ॥। १०३ ॥ दाय विभाजन - काल—

ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।

भजेरन्पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः ॥१०४ ॥

भाष्य - भजेरन्निति प्राप्तकालतायां लिङ् । ( तथा पञ्चमे प्रपञ्चितम् । अथवा यस्मिन् शयने संक्रामति ) ॥१०४ ॥

हिन्दी —– माता - पिता के मरने पर सब भाई एकत्रित होकर पैतृक ( पितृ - सम्बन्धी ) सम्पत्ति को बराबर बाँट लें; क्योंकि ( वे पुत्र ) उन दोनों ( माता - पिता ) के जीवित रहते सम्पत्ति लेने में असमर्थ रह्ते हैं ॥ १०४ ॥

विमर्श — पिता के मरने के बाद पितृ - सम्बन्धी धन तथा माता के मरने के बाद मातृ-सम्बन्धी धन सब भाईयों को बराबर - बराबर बाँट लेना चाहिये । ज्येष्ठ भ्रातृ सम्बन्धी उद्धार को आगे ( ९।१२-१४ ) कहेंगे, अतएव समभाग बाटने का विधान ज्येष्ठ भाई के वक्ष्याण उद्धार नहीं चाहने पर समझना चाहिये । तथा प्रकृत वचन से माता - पिता- दोनों के मरने के बाद विभाजन के कारण को कहा गया है, हाँ ' यदि पिता चाहे तो अपने जीवित रहते ही अपना धन पुत्रों को बाँटकर दे सकता है ' ऐसा महर्षि याज्ञवल्क्य का मत है । ' सम्मिलित रहने पर ज्येष्ठ भाई की प्रधानता-ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात्पित्र्यं धनमशेषतः । शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा ॥ १०५ ॥

हिन्दी – अथवा बड़ा भाई ही पिता के सब धन को प्राप्त करे और अन्य छोटे भाई पिता के समान उन बड़े भाई से भोजन - वस्त्र आदि पाते हुए जीवें अर्थात् उसी के साथ में सम्मिलित होकर रहें । ( ज्येष्ठ भाई के धार्मिक एवं भ्रातृवत्सल होने पर ही ऐसा हो सकता है ॥१०५ ॥

ज्येष्ठ-- प्रशंसा-ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः ।

पितॄणामनृणश्चैव स तस्मात्सर्वमर्हति ॥ १०६ ॥

हिन्दी – मनुष्य ज्येष्ठ पुत्र की उत्पत्ति मात्र से ( उसके संस्कार युक्त नहीं होने पर भी ) पुत्रवान् हो जाता है और पितृऋण से छूट जाता है; अतएव वह ( ज्येष्ठ-सब सम्पत्ति पाने योग्य है ॥१०६ ॥

3- पुत्र ) पिता की १. तदुक्तं याज्ञवल्क्येन महर्षिणा - ' विभागं चेत्पिता कुर्यादिच्छ्या विभजेत्सुतान् । ' इति । ( या ० स्मृ०-२।११४ )

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता

यस्मिन्नृणं सन्नयति येन चानन्त्यमश्नुते ।

स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः ॥ १०७ ॥

३ ९ ५ भाष्य- - इतरानित्यर्थवादोऽयम् । यथाश्रुततात्यर्यग्रहणाद्धि कनीयसामभागार्हतैव स्यात् । ततश्च वक्ष्यमाणविरोधः ॥१०७ ॥

हिन्दी — पिता जिस पुत्र के उत्पन्न होने से पितृ ऋण से छूट जाता है और अमृतत्व को प्राप्त करता है, वही ( ज्येष्ठ पुत्र ) धर्म से उत्पन्न है, अन्य ( शेष - छोटे पुत्र ) कामवासना से उत्पन्न हैं, ऐसा ( मुनि लोग ) मानते हैं ( अतएव वही ज्येष्ठ पुत्र पिता की सम्पूर्ण सम्पत्ति का अधिकारी होने के योग्य है ) ॥ १०७ ॥

बड़े - छोटे भाईयों के परस्पर व्यवहार-पितेव पालयेत्पुत्रान् ज्येष्ठो भ्रातॄन्यवीयसः । पुत्रवच्चापि वर्तेरन् ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः ॥ १०८ ॥

भाष्य- - पुत्रवत्पालनीया न तु बाला इति धनादिना गर्हणीयाः । तैरप्ययं पितेति भावनीयम् । तदाह — पुत्रवच्चापि वर्तेरन्निति ॥ १०८ ॥

अपरा प्रशंसा । हिन्दी — ज्येष्ठ भाई छोटे भाइयों का पालन पिता के समान करे तथा छोटे भाई ज्येष्ठ भाई में धर्म के लिए पुत्र के समान वर्ताव करें अर्थात् ज्येष्ठ भाई को पिता मानें ॥।१०८ ॥

ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः ।

ज्येष्ठः पूज्यतमो लोके ज्येष्ठः सद्धिरगर्हितः ॥ १० ९ ॥

भाष्य - य एवंगुणो ज्येष्ठः स वर्धयति कुलम् । अयमेव निर्गुणस्तत्कुलं विनाश-यति । शीलवति ज्येष्ठे कनीयांसोऽपि तथा वर्तन्ते । तेऽपि गुणहीनेन विवदन्ते ॥ १० ९ ॥ हिन्दी — धर्मात्मा ज्येष्ठ ( भाई ) ही कुल की उन्नति करता है अथवा अधर्मात्मा होकर कुल का ) नाश करता है । गुणवान् ज्येष्ठ भाई संसार में पूज्य तथा सज्जनों से अनिन्दनीय होता है ॥१०९ ॥

ज्येष्ठ भाई के अपने योग्य वर्ताव न करने पर -यो ज्येष्ठो ज्येष्ठवृत्तिः स्यान्मातेव स पितेव सः । अज्येष्ठवृत्तिर्यस्तु स्यात्स सम्पूज्यस्तु बन्धुवत् ॥ ११० ॥

भाष्य- –ज्येष्ठस्य वृत्तिः पुत्रे इव स्नेहः, पालनं, शरीरधनेषु तदीयेषु स्ववदनुपेक्षा, अकार्येभ्यो निवर्तनम् । यस्त्वन्यथा वर्तते तत्र बन्धुवत्प्रत्युत्थानाभिवादनैः मातुलपितृ-व्यवत्संपूजा कर्तव्या । अन्यथाकरणे विधेयतानिवृत्तिः ॥११० ॥

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३ ९ ६ मनुस्मृतिः [ नवमः हिन्दी – यदि ज्येष्ठ भाई ( छोटे भाईयों के साथ ) ज्येष्ठ के अर्थात् पिता आदि के समान ( लालन - पालन आदि उत्तम ) वर्ताव करे तो वह ( छोटे भाइयों के द्वारा ) माता - पिता के समान पूज्य है तथा यदि ( वह ज्येष्ठ भाई छोटे भाइयों के साथ ) ज्येष्ठ के समान वर्ताव न करे तो उसके साथ ( छोटे भाईयों को ) बन्धु ( मामा आदि बन्धुजन ) के तुल्य व्यवहार करना चाहिये ॥११० ॥

सम्पत्ति विभाग में हेतु —

एवं सह वसेयुर्वा पृथग्वा धर्मकाम्यया ।

पृथग्विवर्धते धर्मस्तस्माद्धर्म्या पृथक्क्रिया ॥ १११ ॥

भाष्य- –स्वेच्छानियोज्यत्वाभावान्निरपेक्षस्तद्द्द्रव्यसाध्येषु ज्योतिष्टोमादिष्वसम्भवात्त-त्सिद्ध्यर्थोऽयं न्यायप्राप्तो विभाग उच्यते । पृथग्वा धर्मकाम्येयति — न पुनरविभागादधर्मो विभाग एवाग्निहोत्रादिवद्धर्मः । “ ननु च धर्मानुष्ठानप्रतिबन्धहेतुत्वादधर्मतैवाभागस्य ” । नैष दोषः । अधिकृतस्याननुष्ठाने प्रत्यवायः । न चाविभक्तधनस्याधिकारोऽग्निमत्त्वा-भावात् । विभागकाल एवाग्निपरिग्रहस्य विहितत्वात् । यस्तु जीवत्येव पितरि कृतविवाहस्तदैव च परिगृहीताग्निस्तस्याधिकृतत्वान्नैवाविभागः । सोऽपि यदि विच्युतः परिग्रहादन्यतो वा विहितानुष्ठानपर्याप्तधनस्तदा नैव सह वसन्प्रत्यवेयात् । न हि विभागाविभागयोर्धर्मा-धर्मत्वं स्वरूपेणास्तीत्युक्तम् । “ ननु च ' भ्रातॄणामविभक्तानामेको धर्मः प्रवर्तत ' इति वचना-द्दम्पत्योरिव सहानुष्ठाने प्राग्विभागादस्त्येव धर्मव्यक्तिः– साधारण्याद्द्रव्यस्य सर्वैः सम्भूय कर्तव्यमिति । ’ ” नैतदग्निहोत्रादौ । आहवनीयादिषु ह्यग्निहोत्रादयः । संस्कारनिमित्ताश्चा-हवनीयादय आत्मनेपददर्शनान्यतरस्य सम्बन्धितां न प्रतिपद्यन्ते । परकीयं वाऽग्नौ जुह्वतः प्रतिषेधदर्शनमस्ति — ‘ नान्यस्याग्निषु यजेतेति ' । न स्मार्ते ह्यापि गृह्योऽग्नौ विधानम् । गृहशब्दस्य विशिष्टोपादानादग्निवचनत्वादेष एव न्यायः । अतिथ्यादिभोजनदाने महायज्ञ-मध्ये पाठात् ‘ वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्म यथाविधि ॥ पञ्चयज्ञविधानं च ' इति गृह्यत एवाधिकारः । तेनैद्वचनमेको धर्म इति श्राद्धपूर्तान्नादिमात्रं विज्ञेयम् ॥१११ ॥

हिन्दी – इस प्रकार ( ९ । १०५ - ११० ) वे ( छोटे भाई ) एक साथ रहें अथवा धर्म की इच्छा से अलग - अलग रहें । अलग - अलग रहने से ( पञ्चमहायज्ञादि कार्य सब भाइयों को अलग - अलग ही करने के कारण ' ) धर्मबुद्धि होती है, अतएव भाइयों को अलग - अलग रहना भी धर्मयुक्त है ॥१११ ॥

१. तथाच बृहस्पतिः — ‘ एकपाकेन वसतां पितृदेवद्विजार्चनम् । एकं भवेद्, विभक्तानां तदेव स्याद्गृहे गृहे ॥ - इति ( म ० मु ० ) ।

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अध्यायः ] ' मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता पैतृक धन में से ज्येष्ठादि का ' उद्धार ' द्रव्य- भाग-ज्येष्ठस्य विंश ऊद्वार: सर्वद्रव्याच्च यद्वरम् । ३ ९ ७ ततोऽर्थं मध्यमस्य स्यात्तुरीयं तु यवीयसः ॥ ११२ ॥

भाष्य-- ' “ इयमुद्धारनियोगस्मृतिरतिक्रान्तकालविषया, न त्वद्यत्वेऽनुष्ठेया, नियतकाल-त्वात्स्मृतीनामिति ' केचित् । अनुष्ठेयत्वव्यपदेशो दीर्घसत्रवज्ज्ञानादभ्युदयो यथा स्यादिति । न हि दीर्घसत्रमद्यत्वे केचिदाहरमात्रा दृश्यन्ते । अधीयते तु तदुपदेशं ब्राह्मणाः । तथाच ' अन्ये कलियुगे धर्मा ' इत्युक्तम् । ( १।८५ ) तेन देशनियमवत्कालनियमो ऽपि धर्माणां द्रष्टव्य: । न ह्युपदिष्टो धर्मा सर्वत्र देशेऽनुष्ठीयते । तथाहि देशधर्मा नियतदेशव्यवस्थिता उच्यन्ते । अन्यथा सर्वानुष्ठाने न देशव्यपदेश्यता धर्माणाम् । तथा च पठति ( ९ ।६६ ) ‘ अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः ’ इत्यादि । तस्मादुद्धारनियोगगोवधस्मृतय उपदिष्टा नानुष्ठेयाः । तदेतदपेशलम् । न ह्येवंविधः कालनियमः क्वचिदपि श्रूयते सायंप्रात: पर्वादिनिय-मादन्यत्र । यच्च ‘ अन्ये कृतयुगे धर्मा ' इति तत्प्रथम एव व्याख्यातम् । न हीदं युगभेदेन धर्मव्यवस्थाहेतुः । देशनियमो ऽपि प्राचीनप्रवणादिव्यतिरेकेण मध्यदेशपूर्वदेशकृतो नैवा-स्तीत्युत्तम् – ( ८।४१ ) ‘ जातिजानपदान् धर्मान्सद्भिराचरितान् ' इत्यत्र । दीर्घसत्रेष्वद्य-त्वेऽप्यनुष्ठानसम्भवः । संवत्सरशब्दस्त्वहःसु प्रथम एव दर्शितः । यत्तु नाद्यत्वे केचिद-नुतिष्ठन्तो दृश्यन्त इति — उपदिष्टार्थस्य नित्यवदाम्रातस्यापि बहुभिः प्रकारैरनुष्ठानसाध-नाशक्त्या फलानिच्छया वा नास्तिकतया वा । यत्तु ' वेने राज्यं प्रशासति ' ( ९ ।६६ ) तदाप्रभृतिकं महापौर्वकालिकमनुष्ठानं दर्शयतीत्यर्थवादोऽसौ न कालोपदेशः । ज्येष्ठस्य विंशः । ज्येष्ठस्य सर्वद्रव्याद् विंशतितमो भाग उद्धृत्य दातव्य एव । मध्यमस्य तदर्धं चत्वारिंशत्तमो भागः । एवं कनिष्ठस्य तुरीयो ज्येष्ठापेक्षयाऽशीतितमो भागः । एवमुद्धृते परिशिष्टं त्रिधा कर्तव्यम् । तत्र सर्वेभ्यो द्रव्येभ्यो यद्वरं श्रेष्ठं तज्जेष्ठ-स्यैव । अथवा “ द्रव्येष्वपि परं वरम् ” इति पाठः । उत्तमाधममध्यमानि यानि द्रव्यादीनि सन्ति ततस्तस्माद्यदेकं श्रेष्ठं तत्तस्यैव तदुक्तं भवति । यत्र गावोऽश्वा वा सन्ति एकः श्रेष्ठा ज्येष्ठस्य दातव्यो न द्रव्यान्तरेण मूल्येन वा स्वीकर्तव्याः । त्रयाणां सर्वेषां गुणिनामयमु-द्धारविधिः । गुणवतामुद्धारदर्शनात् ॥११२ ॥

हिन्दी - पिता के सम्पूर्ण धन में से ज्येष्ठ भाई का बीसवाँ भाग तथा श्रेष्ठ पदार्थ ( चाहे वह एक ही हो ) कनिष्ठ ( सबसे छोटे भाई का अस्सीवाँ भाग और मध्यम ( मझिला ) भाई का चालीसवाँ भाग ' उद्धार ' होता है ॥ ११२ ॥

विमर्श - उदाहरण– मान लिया कि पितृ - सम्पत्ति २४० ) रु ० है, उसमें बीसवाँ भाग ( २४० ÷ २० = १२ ) १२ रु ० बड़े भाई का, चालीसवाँ भाग ( २४० ÷ ४० = ६ )

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३ ९ ८ मनुस्मृतिः [ नवमः ६ रु ० मझले भाई का और अस्सीवाँ भाग ( २४०: ८० = ३ ) रु ० छोटे भाई का ' उद्धार ' द्रव्य हुआ । अब शेष ( १२ + ६ + भाइयों को बराबर - बराबर भाग ( २१ ९: ३ = ७३ ) ७३ -३ = २१; २४० - २१ ९ ), २१ ९रु ० में तीनों ७३ रु ० हुए । इस प्रकार बड़े भाई को ( ७३ + १२ = ८५ ) ८५ रु ०, मझले भाई को ( ७३ + ६ = ७ ९ ) ७ ९ रु ० और छोटे भाई को ( ७३ + ३ = ७६ ) ७३ रु ० मिले । तीन से अधिक भाइयों में पितृ - धन विभाजन—

ज्येष्ठश्चैव कनिष्ठश्च संहरेतां यथोदितम् ।

येऽन्ये ज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्यान्मध्यमं धनम् ॥ ११३ ॥

भाष्य- — त्रिभ्योऽधिकपुत्रस्य ज्येष्ठकनिष्ठयोर्गुणवतोर्यथोक्तमुद्धृत्य बहूनामपि मध्य-मानां गुणवतो मध्यमस्य यश्चत्वारिंशत्तमो भाग उक्तोऽनन्तरश्लोके बहुभिरपि मध्यमैः स विजभनीयः । समगुणानां तु मध्यमानां सर्वेषामेकैकस्य पूर्ववचनाच्चत्वारिंशत्तमो भाग उक्त उद्धार्थः । तेषां स्यान्मध्यमं धनमिति उभयथा वचनं व्यज्यते । मध्यमधनं यदन-न्तरश्लोके निर्दिष्टं तत्सर्वेषां समवायेन दातव्यम् । यदि वा प्रत्येकमेव ज्येष्ठकनिष्ठताम-पेक्ष्य । तत्र प्रथमपक्षी निर्गुणेषु युक्तः । ते न बहुधनार्हाः । द्वितीयो गुणवत्स्वेव ॥११३ ॥

हिन्दी – ( यदि तीन से अधिक भाई हो तो ) सबसे बड़े और छोटे भाई का ‘ उद्धार ' क्रमशः बीसवाँ तथा अस्सीवाँ भाग और अन्य मध्यम ( मझिला; सझिला आदि ) भाइयों का चालीसवाँ भाग ' उद्धर ' भागर पितृधन में निकालना चाहिये । पहले ही पूर्ववर्णित क्रम से निकालकर शेष धन का समान समान भाग सब भाइयों को प्राप्तव्य होता है ॥११३ ॥

विमर्श — सबसे बड़े तथा सबसे छोटे भाई के अतिरिक्त शेष अनेक मध्यम ( मझले-सझले आदि ) भाइयों में, फिर अवान्तर भेदकर न्यूनाधिक ( कम - वेशी ) ' उद्धार ' भाग का निषेध करने के लिए यह वचन है । इस प्रकार मध्यम भाइयों के अनेक होने पर सबको ‘ उद्धर ’ भाग कुल धन का चालीसवाँ चालीसवाँ भाग ही प्राप्तव्य होता है ।

एक भी श्रेष्ठ वस्तु ज्येष्ठ भाई का भाग-सर्वेषां धनजातानामाददीताग्र्यमग्रजः ।

यच्च सातिशयं किञ्चिद्दशश्चाप्नुयाद्वरम् ॥ ११४ ॥

भाष्य- –आद्येनार्थश्लोकेन “ सर्वद्रव्याच्च यद्वरम् ” इत्युक्तमनुवदति । जातशब्दो जातिपर्यायः प्रकारवचनो वा । अग्रजोज्येष्ठः । अग्रयं श्रेष्टम् । यच्च सातिशयमेकमपि वस्त्रमलङ्कारं वा । दशतो दशावयवाद्वावरमेकमाददीत । यदि दशगावोऽश्वा वा सन्ति तदा एकं श्रेष्ठमाददीत । अर्वाग्दशावयवाद्वा न लभते । वर्गे दशशब्दः । अन्ये तु स्वार्थे

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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ३ ९९ तसिं चाचक्षते । “ दशैव दशतो वरान् " इति बहुवचनं पठन्ति । दशवरानाददीत । अन्य-स्तद्विशिष्टान्स्मरति “ दशतः पशूनामेकशफद्विपदानाम् ” इति ॥११४ ॥

हिन्दी – सम्पूर्ण सम्पत्तियों से श्रेष्ठ वस्तु ज्येष्ठ भाई को मिलती है, यदि एक ही श्रेष्ठ वस्तु हो तो भी वह उसे ही मिलती है तथा दश दश गाय आदि पशुओं में से एक-एक श्रेष्ठ गाय आदि उस ज्येष्ठ भाई को मिलती है ॥ ११४ ॥

विमर्श - पूर्वोक्त ( ९ ।११२ ११४ ) ' उद्धार ' भाग ज्येष्ठ भाई के गुणवान् तथा अन्य भाइयों के गुणहीन होने पर ही प्राप्त होता है; अन्यथा सब भाइयों को समान ही भाग प्राप्त होता है ।

समान गुणी होने पर उक्तोद्वार का निषेध-उद्धारो न दशस्वस्ति संपन्नानां स्वकर्मसु ।

यत्किञ्चिदेव देयं तु ज्यायसे मानवर्धनम् ॥ ११५ ॥

भाष्य - दशसु पशुषु यः पूर्वत्रोद्धार उक्तः स नास्ति । ये भ्रातरः स्वकर्मसु श्रुताध्ययनादिषु संपन्ना विशेषवंतो दशस्विति चोपलक्षणं व्याख्यानयन्ति । दशसु यत्र

श्लोक उद्धार उक्तः स सर्व एव नास्ति । कर्मसम्बन्धात् । किन्तु तैरपि यत्किञ्चिदेवा-धिकमुपायनविधं मानवर्धनं पूजाकरं ज्येष्ठाय देयम् ॥११५ ॥

हिन्दी — सब छोटे भाइयों के अपने - अपने कर्मों में युक्त रहने पर पूर्वश्लोकोक्त दश-दश गाय आदि पशुओं में से एक - एक गाय आदि पशु ' उद्धार ' रूप में ज्येष्ठ भाई को नहीं प्राप्तव्य होता; किन्तु ज्येष्ठ भाई के मान को बढ़ाने के लिए उसे कुछ भी अधिक भाग देना चाहिये ॥११५ ॥

सम तथा विषम भाग-एवं समुद्धृतोद्धारे समानंशान्प्रकल्पयेत् ।

उद्धारेऽनुद्धृते त्वेषामियं स्यादंशकल्पना ॥ ११६ ॥

भाष्य — समुद्धृते पृथक्कृत उद्धारेऽधिके भागेऽवशिष्टे धने समानंशान्प्रकल्पयेत् ।

अनुद्धृते वक्ष्यमाणा भागकल्पना ॥ ११६ ॥

हिन्दी - इस प्रकार ( ९।११२-११५ ) सबके ' उद्धार ' ( अतिरिक्त भाग विशेष ) को पृथक् कर ( शेष धन - राशि को ) समान भाग कर ले; ' उद्धार ' पृथक् नहीं करने पर भाइयों

के भाग की कल्पना इस ( ९ ।११७ ) प्रकार करे ॥ ११६ ॥

एकाधिकं हरेज्ज्येष्ठः पुत्रोऽध्यर्थं ततोऽनुजः ।

अंशमंशं यवीयांस इति धर्मे व्यवस्थितः ॥ ११७ ॥

पृष्ठ 440

मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री, पृष्ठ 440 का मूल पृष्ठ
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४०० मनुस्मृतिः [ नवमः भाष्य – एकेनांशेनाधिकं स्वांशं हरेत्स्वीकुर्यात् द्वावंशौ प्रतिपद्येतेत्यर्थः । ततोऽनुजस्तदनन्तरमध्यर्धमर्धद्वितीयम् । यवीयांसस्तस्मादर्वाग्जाताः सर्वे सम-मंशं नाधिकं किञ्चिन्नाल्पमित्यर्थः ॥११७ ॥

हिन्दी— ( पितृ - धन - राशि में से ) ज्येष्ठ भाई दो भाग, उससे छोटा भाई डेढ भाग तथा उससे ( या तीन भाई से अधिक होने पर छोटा ) भाई एक भाग ले; यह व्यवस्थित धर्म है ॥११७ ॥

विमर्श- - उक्त पितृ - धन के विभाजन की व्यवस्था ज्येष्ठ तथा उससे छोटे भाई को अधिक भाग देने के कारण उन दोनों भाइयों के अधिक गुणवान् और सबसे छोटा भाई ( या तीन भाई से अधिक होने पर भाइयों ) के गुणहीन होने पर समझनी चाहिये ।

स्वाभ्यः स्वाभ्यस्तु कन्याभ्यः प्रदद्युर्भ्रातरः पृथक् ।

स्वात्स्वादंशाच्चतुर्भागं पतिताः स्युरदित्सवः ॥ ११८ ॥

कन्याशब्दः प्रायोऽनूढासु प्रयुज्यते । ' कानीनपुत्रः ' । स्मृत्यन्तरे चो — पात्तानामि’ति पठ्यते । अतोऽनूढायामयं भाग उच्यते । स्वाभ्यः स्वजात्यपेक्ष्या स्वाभ्यो भ्रातरः कन्याभ्यश्चतुर्भागमंशं दद्युः स्वादंशात् । यत्र बह्वयः कन्याः सन्ति तत्र समानजातीयभ्रात्रपेक्षया चतुर्थांशकल्पना कर्तव्या । तथा चायमर्थः । त्रीनंशान्पुत्र आददीत चतुर्थं कन्येति । यदपि कैश्चिदुक्तं— “ महानुपकारः पितृकरणं कन्यानामदत्तानां, येन जीवति पितरि तदिच्छयाऽमूल्येनापि धनेन संस्क्रियन्ते मृते त्वंशहरा इति ” तत्पुत्रेऽपि तुल्यम् । वाचनिके चार्थे केयं नोदना । अथाभिप्रायः “ समाचार उद्वाहमात्रप्रयोजनं दानमि ’ ” त्याचारो दुर्बलः स्मृतेरिति न चैकान्तिकः । अनैकान्तिकत्वे च स्मृतितोऽयं नियमो युक्तः । यदपोदं केनचिदुक्तं “ मुद्वाहमात्रप्रयोजनं देयं, न चतुर्थो भागो यथाश्रुतमिति । " स इदं वाच्यो नोद्वाहेऽपरिमितधनदानमस्ति । तस्य द्वादशशतं दक्षिणेतिवत् ‘ केवलमाच्छाद्या-लङ्कृतां विवाहयेत् । सौदायिकं वाऽस्या दद्यादिति ' श्रूयते । अलङ्कारस्तु सुवर्णमणिमुक्ता-प्रवालादिरनेकधा भिन्न इति । तत्र न ज्ञायते कियद्दातव्यं धनं कीदृशो वाऽलङ्कार इत्य-तश्च परिमाणार्थमेवेदं युक्तं स्वादंशाच्चतुर्भागमिति । न चास्मिन्नर्थे शास्त्रविरोधो युक्ति-विरोधो वा । स्मृत्यन्तराण्येवमेव पक्षमुपोद्बलयन्ति । " असंस्कृतास्तु संस्कार्या भ्रातृभिः पूर्व-संस्कृतैः । भगिन्यश्च निजादंशाद्दत्वांशं तु तुरीयकम् ” ॥ इति ( या ० व ० स्मु ० २-१२४ ) । तथा “ आ संस्काराद्धरेद्भागं परतो बिभृयात्पत्तिः ” इति । : -यत्र स्वल्पं धनमस्ति भ्रातुर्भगिन्याश्च न चतुर्भागे कन्याया भरणं अस्यायमर्थः-