मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 441–450

मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४०१ भवति तत्र समभागं कन्या हरेत् आसंस्कारात् । परतस्तु स्मृत्यन्तराच्चतुर्भागं गृह्णीयात्स्व-ल्पमपि । कथंतर्हि भरणमात्रं कुर्यादत उक्तं - " परतो बिभृयात्पत्तिः ” इति । भ्रातृग्रहणं सोदर्यार्थं व्याचक्षते । कोऽभिप्रायः भ्रातृशब्दो निरुपपदसोदर्य एव मुख्यया वृत्त्या वर्तते । पृथक्’वचनं च लिङ्गम् । यस्यास्तु हि सोदर्यो नास्ति तस्या आदयः सौदायिकस्य प्राप्नोति । " वैमात्रेयो दास्यतीति ” चेन्नासति वचनान्तरे ददात्ययम् । भ्रातृशब्दा एकात्ममातृकाश्च गृह्यन्ते । पैतृष्वस्रेयादिषु तूपचाराद्वर्तत इति युक्तम् । एवमेकशब्दस्यानेकार्थत्वं नाभ्युपगतं भवति । स्मृत्यन्तरसमाचारश्चेति श्रेयान् । तत्र हि पठ्यते " यच्छिष्टं पितृदायेभ्यः प्रदानिकम् ” इति । नात्र भगिनीशब्दो भ्रातृशब्दो वा श्रूयते यत इयमाशङ्का स्यात् । यत्तु पृथगिति तदेकैकस्यैव समूहः भागः सर्वाभ्य इत्येवमपि युज्यते । इदमप्युव्यते । अददतां प्रत्यवायो न तु हठाद्दाप्यन्ते । यत उच्यते पतिताः स्युर-दित्सव इति । यो हि यत्र यावत्यंशे स्वामी स ' हरेदित्युच्यते । न पुनरनेनास्मै दातव्य-मिति ' । यथा नोच्यते भ्राता मात्रे दद्यादिति । यच्चोच्यते तत् पुनरस्वामिभ्यः ॥११८ ॥

हिन्दी — अपने - अपने भाग का चतुर्थांश भाग ( अविवाहित सोदर्या ) बहनों के लिए ( ब्राह्मणादि चारों वर्ण के ) भाई देवें । यदि वे ( उन बहनों के विवाह - संस्कारार्थ ) चतुर्थांश नहीं देना चाहिते हैं तो वे पतित होते हैं ॥ ११८ ॥

विमर्श - छोटी सोदर्या बहन का विवाह - संस्कार नहीं होने पर बड़े भाइयों को अपने - अपने भाग में से चतुर्थ भाग ( चौथाई हिस्सा ) उसके विवाह - संस्कार के लिए देना ही चाहिए । बहन के सोदर्या नहीं होने पर भी वैमातृज ( विमाता से उत्पन्न ) भाइयों को ही अपने - अपने भाग में से चतुर्थांश देकर उस बहन का विवाह संस्कार करना चाहिये ।

घोड़े आदि के विषम होने पर ज्येष्ठ भाई का भाग-अजाविकं चैकशफं न जातु विषमं भजेत् ।

अजाविकं तु विषमं ज्येष्ठस्यैव विधीयते ॥ ११ ९ ॥

भाष्य — एकशफमश्वातरगर्दभादयः विभागकाले समसंख्यया यद्विभक्तुमजाविकं न शक्यते ज्येष्ठस्यैवस्यान्न तदन्यद्रव्यांशपातेन समतां नयेद्विक्रीतं वा ततस्तन्मूल्यं

दापयेत् ।

अजाविकमिति पशुद्वन्द्वविधावेकवद्भावः ॥११९ ॥

हिन्दी- -बकरा ( खस्सी ), भेंड़ तथा घोड़ा आदि के विषम होने ( भाइयों में समान भाग नहीं विभाजित हो सकने ) पर वह बड़े भाई का ही भाग होता है, उसे विषम नही किया

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४०२ मनुस्मृतिः [ नवमः जाता अर्थात् समान भाग करने के लिए उसे बेचकर या उसके बराबर धन को सब भाइयों में नहीं विभाजित किया जाता ॥ ११ ९ ॥ क्षेत्र के साथ विभाग होने पर -यवीयाञ्ज्येष्ठभार्यायां

पुत्रमुत्पादयेद्यदि ।

समस्तत्र विभागः स्यादिति धर्मे व्यवस्थितः ॥ १२० ॥

भाष्य — ज्येष्ठस्य नियोगधर्मेण पितृवत्सोदरेऽतिदेशे प्राप्ते तन्निवृत्त्यर्थमुच्यते । सम-स्तत्र विभागः स्यात् । न चोद्धारं न चैवाधिकं हरेज्ज्येष्ठ " इति । नापि यत्किञ्चिदेव देयमिति । समः स्यात् । केन । उत्पादकेन पितृव्यकेण कनीयसा । अनियुक्तासुतस्य त्वभा-गार्हतैव वक्ष्यते । इदं च लिङ्गं भ्रातरि सहिते । सत्यपि भ्रातृशब्दे भातृपुत्रेणाप्यसति भ्रातरि सह विभागः कर्तव्यः ॥१२० ॥

हिन्दी - यदि छोटा भाई श्रेष्ठ भाई की स्त्री में ' नियोग ' ( ९ ।५ ९ -६२ ) द्वारा पुत्र उत्पन्न करे तो वह ( क्षेत्रज ) पुत्र अपने चाचाओं के बराबर ही भाग पाने का अधिकारी होता है अर्थात् उसके भाई के पुत्र होने के कारण वह ' उद्धार ' ( ९।११२-११४ ) अर्थात् अतिरिक्त भाग का अधिकारी नहीं होता, ऐसी धर्म की व्यवस्था है ॥ १२० ॥

विमर्श - यद्यपि पहले ( ९ ।१०४ ) सब भाइयों को ही एकत्रित होकर पिता के धन का विभाजन करने के लिए वचन कहा गया है; तथापि इसी वचन में पिता के मरने पर, ज्येष्ठ भाई के पुत्र अर्थात् पौत्र को भी पितामह के धन को पाने का विधान किया गया है ।

उपसर्जनं प्रधानस्य धर्मतो नोपपद्यते ।

पिता प्रधानं प्रजने तस्माद्धर्मेण तं भजेत् ॥ १२१ ॥

भाष्य - उपसर्जनमप्रधानं क्षेत्रजः । प्रधानस्यौरसस्य तुल्य इत्येतदध्याहृत्य । तद्धर्मतः शास्त्रतो न युज्यते । औरसः किल पितृवज्ज्येष्ठांशं कृत्स्नं लभते । अयं तु क्षेत्रजोऽप्रधानम् । तस्माद्धर्मेण तं भजेत् । ' धर्मः ' पूर्वोक्ता भागकल्पना । “ ननु चायमपि ज्येष्ठः पुत्रो भवति किमित्यौरसवन्न लभते ” । अह आह पिता प्रधानं प्रजने । ' पिता ' जनकोऽत्राभिप्रेतः । स प्रधानमपत्यो-त्पादने । अयं चाप्रधानः, कनीयसा जनित: । ' उपसर्जनं प्रधानस्य सम'मित्येवाध्या-हृत्य श्लोको गम्यते । अर्थवादोऽयं पूर्वस्य ज्येष्ठांशनिषेधस्य । अर्थवादत्वाच्च प्रधानोप-सर्जनशब्दयोर्यत्किञ्चिदालम्बनमाश्रित्य व्याख्या कर्त्तव्या ।

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४०३ अन्ये पठन्ति “ तस्माद्धर्मेण तं त्यजेत् ” इति । तदयुक्तं, सर्वत्र समभागस्योक्त-त्वात् । अर्थवादत्वाच्चास्य न विकल्पाशङ्का कार्या ॥ १२१ ॥

हिन्दी — उपसर्जन ( छोटे भाई के द्वारा ज्येष्ठ भाई की स्त्री में ' नियोग ' ( ९ ।५ ९ -६१ ) से उत्पन्न अप्रधान ) पुत्र धर्मानुसार प्रधान ( साक्षात् पिता के द्वारा उत्पन्न पुत्र के भाग । ‘ उद्धार ’ ( ९।११२-११४ ) अर्थात् अतिरिक्त भाग को ) पाने का अधिकारी नहीं होता; क्योंकि अपने क्षेत्र ( स्त्री ) में सन्तान उत्पन्न करने में पिता ही मुख्य है, अतः धर्म से उस पुत्र को पितृव्यों के साथ पूर्व वचन के अनुसार समान भाग लेना चाहिए ॥ १२१ ॥

विमर्श - ' ज्येष्ठ भाई का नियोगज पुत्र पिता के समान ' उद्धार ' ( ९।११२-११४ ) भाग पाने का अधिकारी नहीं होता है, इस पूर्व ( ९ ।१२० ) कथित विषय को इस वचन द्वारा सकारण पुष्ट किया गया है । अनेक माताओं की सन्तान में ज्येष्ठत्व-पुत्रः कनिष्ठो ज्येष्ठायां कनिष्ठायां य पूर्वजः । कथं तत्र विभागः स्यादिति चेत्संशयो भवेत् ॥ १२२ ॥

भाष्य — ज्येष्ठा प्रथमोढा । पश्चादूढा कनिष्ठा । तयोर्जातानां किं मातुरुद्वाहक्रमेण ज्यैष्ठ्यं स्यात्स्वजन्मक्रमेण वेति संशयमुपन्यस्योत्तरत्र निर्णेष्यते सम्प्रतिपत्तुम् ॥१२२ ॥।

हिन्दी – यदि बड़ी ( प्रथम विवाहिता ) स्त्री का पुत्र छोटा हो तथा छोटी ( बाद में विवाहित ) स्त्री का पुत्र बड़ा हो तो वहाँ ( ' माताओं के विवाह क्रम से उन पुत्रों की बड़ाई छोटाई का विचार होगा या पुत्रों के जन्मक्रम से होगा? ' ऐसा सन्देह उपस्थित होने पर ) विभाजन ( धन का बँटवारा ) किस प्रकार किया जाय अर्थात् किस पुत्र को बड़ा तथा किस पुत्र को छोटा मानकर पितृ - धन को भाइयों में बाँटा जाय एवं किस पुत्र का कितना ' उद्धार ’

( ९।११२-११४ ) हो ऐसा सन्देह हो तो -एकं वृषभमुद्धारं संहरेत स पूर्वजः ।

ततोऽपरेऽज्येष्ठवृषास्तदूनानां स्वमातृतः ॥ १२३ ॥

भाष्य – पूर्वस्यां जातः पूर्वजः । कनीयान् वृषभस्योक्तो भागवान् । ततो वृषादन्ये ये वृषभा अज्येष्ठास्ते बहूनामेकशः कृत्वा देयाः । अतश्च ज्यैष्ठिने यस्यैतावदुक्तमधिकं यच्छ्रेष्ठो वृषो गुणमात्रेणाधिक्यं न संख्यया तदूनानां तस्मात्पूर्वजादूनानाम् । कियतामित्याह । स्वमातृतः पुनर्मुख्यतोढत्वात्तेनात्र मातृ-ज्यैष्ठ्यमाश्रितं भवति न जन्मतः ॥१२३ ॥

हिन्दी – पहली ( प्रथम विवाहिता ) स्त्री का छोटा पुत्र ( पितृ - सम्पत्ति में से ) एक श्रेष्ठ बैल ‘ उद्धार ’ ( अतिरिक्त भाग - ९।११२-११४ ) लेवे, इसके बाद उससे बचे जो श्रेष्ठ बैल

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४०४ मनुस्मृतिः हैं उनमें से एक - एक बैल अपनी माता ( विवाह के ) क्रम से उत्पन्न पुत्र ज्येष्ठस्तु जातोऽज्येष्ठायां हरेद्वृषभषोडशाः । [ नवमः लेवें ॥१२३ ॥

ततः स्वमातृतः शेषा भजेरन्निति धारणा ॥ १२४ ॥

भाष्य — उद्धारान्तरं वैकल्पिकमेषामुच्यते । अज्येष्ठायां ज्येष्ठो जातः पञ्चदश गा हरेत् । षोडशो वृषभो वृषभसम्वन्धाद्गावो लभ्यन्ते । यथास्य गोर्द्वितीयेनार्थ इति । अन्ये शेषा गा हरेरन्स्वमातृतः यथैवैषां माता गरीयसी स गरीयसीं यस्य कनीयसी स कनीयसोमाहरेत् । अथवा ज्यैष्ठिने यस्यायमुद्धारोऽधिक उच्यते पूर्वस्तु स्थित एव । नात्रानडुत्प्रश्लेषः । शेषाः कनीयांसः स्वमातृतो हरेरन् । स्वमातृत इति विविच्यते ।

श्लोकद्वयस्यार्थवादत्वान्न विवेके यत्नः । उपक्रममात्रमेतत् । सिद्धान्तस्त्वय-मुच्यते॥१२४ ॥

हिन्दी — ज्येष्ठ ( प्रथम विवाहित ) माता में उत्पन्न ( जन्मकालानुसार भी ) ज्येष्ठ पुत्र प्रन्द्रह गायों के साथ एक बैल ले, तदनन्तर शेष स्त्रियों में उत्पन्न पुत्र माताओं के विवाह-क्रम से बचे हुए धन में से अपना - अपना भाग लें || १२४ ॥ सजातीय माताओं से उत्पन्न पुत्र में जन्म से ज्येष्ठत्व-सदृशस्त्रीपु जातानां पुत्राणामविशेषतः । न मातृतो ज्यैष्ठ्यमस्ति जन्मतो ज्यैष्ठ्यमुच्यते ॥ १२५ ॥

भाष्य – सदृशः समानजातीयः ॥ १२५ ॥

हिन्दी — समान ( एक ) जातिवाली स्त्रियों से उत्पन्न सन्तानों में जाति सम्बन्धी विशेषता नहीं होने से माता के क्रम से ज्येष्ठत्व नहीं होता; किन्तु जन्म ( के क्रम ) से ही ज्येष्ठत्व कहा जाता है ॥१२५ ॥

विशेष – इस वचन में समान जातिवाली स्त्रियों में उत्पन्न सन्तान में जाति सम्बन्धी विशेषता नहीं होने से माता के क्रम से ज्येष्ठत्व का महर्षियों ने निषेध किया है, जन्म से ज्येष्ठ के लिए पहले ( ९ ।११२ ) ही ' उद्धार ' भाग का विधान किया जा चुका है । इस प्रकार निषेध तथा विधान — दोनों ही होने से यहाँ षोडशी ग्रहण के समान विकल्प मानकर गुणवान् तथा गुणहीन भाइयों की श्रेष्ठता तथा हीनता समझनी चाहिये । इसी कारण से बृहस्पति ने भी जन्म, विद्या और गुण की अधिकता से ज्येष्ठ को त्र्यंश ' उद्धार ' दायादों से लेने का विधान किया है माता के क्रम से ज्येष्ठत्व होने पर गुणहीन के लिए एक बैल तथा गुणवान् के लिए पन्द्रह गायों के साथ एक बैल, ‘ उद्धार ’ भाग प्राप्त करने का विधान पहले ( ९।११२-१२४ ) कह चुके हैं 1 । मेधातिथि ने

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अध्यायः ] ' मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४०५ तो; ‘ ज्येष्ठस्तु जातो ज्येष्ठायाम् '.... ( ९ ।१२४ ) इस श्लोक में ' ज्येष्ठायाम् ' पद में ' अज्येष्ठायाम् ' ऐसा सन्धिविच्छेद कर व्याख्यान किया है और गोविन्दराज ने इसे मतान्तर माना है । विशेष जिज्ञासुओं को इस श्लोक की ' श्रीनेने ' शास्त्री द्वारा लिखित टिप्णी देखनी चाहिये । जन्म से ज्येष्ठत्व का अन्य प्रमाण-जन्मज्येष्ठेन चाह्वानं सुब्रह्मण्यास्वपि स्मृतम् । यमयोश्चैव गर्भेषु जन्मतो ज्येष्ठता स्मृता ॥ १२६ ॥

भाष्य — अर्थवादोऽयं जन्मज्येष्ठतामभ्युपगमयति । सुब्रह्मण्या नाम मन्त्रो ज्योति-ष्टोमे छन्दोगैः प्रयुज्यत “ इन्द्राह्मनाय सुब्रह्मण्यो ३३ इन्द्र आगच्छे ” त्यादिप्रयोगे — बहु-त्वाद्बहुवचनम् । तत्रेदमुच्यते । प्रथमपुत्रेण पितरं व्यपदिश्य हूयते । ' देवदत्तस्य पिता यजते ’ । जन्मनो ज्यैष्ठ्यं मुख्यम् I । अन्यत् तु मातृविवाहसम्बंधाद्गौणम् । यमयोर्गर्भ एककालनिषिक्तयोरपि जन्मतो ज्यैष्ठ्यम् ॥१२६ ॥

हिन्दी— ( इन्द्र के आह्वान के लिए प्रयुक्त होने वाले ) ' सुब्रह्मण्या ' नामक मन्त्र में भी जन्म से ही ज्येष्ठत्व कहा गया है तथा गर्भ के एक काल में आधान होने पर भी यमज सन्तानों भी जन्म ही ज्येष्ठत्व कहा गया है ॥१२६ ॥

पुत्रिकाकरण—

अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् ।

यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात्स्वधाकरम् ॥ १२७ ॥

भाष्य — यदपत्यमस्यां जायेत तन्मे मह्यं स्वधाकरम् । और्ध्वदेहिकस्य श्राद्धादि-पुत्रकार्यस्योपलक्षणार्थः स्वधाशब्दो न त्वयमेवोच्चार्य: । तथा च गौतम: - ' पितोत्सृजेत्-पुत्रिकामनपत्योग्निं प्रजापतिं चेष्ट्वास्मदर्थमपत्यमिति सम्वाद्य ' ' अभिसम्बन्धमात्रात्पुत्रिके-त्येषाम् ' ( गौ ० २८-१९ ) इति मन्त्रादियोगेन विनाऽपि भवति पुत्रिका । “ ननु सम्वादाभावेन यद्यप्यभिसम्बन्धो हृदयात्कृत इत्युच्यते पुनर्वचनेन यावन्न-ज्ञापितस्तावज्जामाता विप्रतिपद्येत " । कुर्वीत पुत्रिकामेष तस्या व्यपदेशः ॥१२७ ॥

हिन्दी - पुत्र - हीन पिता कन्या- दान करते समय — ' इस कन्या से जो पुत्र होगा वह मेरी श्राद्धादि पारलौकिक क्रिया करनेवाला होगा ' ऐसा जामाता ( जमाई - दामाद ) से कहकर उस कन्या को ‘ पुत्रिका ' करे ॥१२७ ॥।

[ अभ्रातृकां प्रदास्यामि तुभ्यं कन्यामलंकृताम् । अस्यां यो जायते पुत्रः स मे पुत्रो भवेदिति ॥ ३ ॥ ]

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४०६ मनुस्मृतिः [ नवमः [ हिन्दी — ' भाई से हीन अलङ्कृत इस कन्या को मैं तुम्हारे लिए दे रहा हूँ, इससे जो पुत्र हो मेरा पुत्र हो || ३ || ]

पुत्रिका करने में पुराना इतिहास-अनेन तु विधानेन पुरा चक्रेऽथ पुत्रिकाः ।

विवृद्ध्यर्थं स्ववंशस्य स्वयं दक्षः प्रजापतिः ॥ १२८ ॥

भाष्य — प्रजोत्पादनविधिज्ञः प्रजापतिर्दक्षः स

स एवोदाह्रियते । अर्थवादोऽयं परि-कृतिर्नाम ॥१२८ ॥

हिन्दी — अपने वंश की वृद्धि के लिए दक्ष प्रजापति ने पुरातन काल में इस विधि से ‘ पुत्रिका ' की थी ॥१२८ ॥

ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।

सोमाय राज्ञे सत्कृत्य प्रीतात्मा सप्तविंशतिम् ॥ १२ ९ ॥

भाष्य — सत्कृत्येति । एतदत्र विधीयते । दशेत्यादिलिङ्गादनेकपुत्रिकाकरणम-पीच्छन्ति ॥ १२ ९ ॥ हिन्दी — प्रसन्न आत्मावाले उस ( दक्ष प्रजापति ) ने ( -वस्त्र - अलङ्कार आदि से ) अलंकृत कर धर्मराज के लिए दस, कश्यप के लिए तेरह और सोम ( चन्द्रमा ) के लिए सत्ताईस कन्याओं को दिया था ॥१२९ ॥

विमर्श — दक्ष प्रजापति के द्वारा अलंकृतकर दस, तेरह और सत्ताइस कन्याओं को देने के दृष्टान्त से ‘ पुत्रिका ’ करने से पहले कन्या को वस्त्र - भूषणादि से अलंकृत करके ही दे तथा एक से अधिक ‘ पुत्रिका ' करने का भी विधान सूचित होता है ।

यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा ।

तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत् ॥ १३० ॥

भाष्य- - “ यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात् " इत्युक्तम् । अपत्यं च ऋक्थभाक् । अतः पितरि मृते पुत्रिकाया अनुत्पन्नपुत्राया धनहरत्वमप्राप्तं विधोयतेऽर्थवादेन । तस्या-मात्मनि पुत्रनिमित्ते तिष्ठन्त्यामेव धनं न पुत्रोत्पत्तिस्तदीयाय युज्यते । अथवा तस्या-मात्मभूतायां पितृरूपायामिति । पुत्रेण दुहिता समेति सामान्यवचनो दुहितृशब्दः प्रकरणात्पुत्रिकाविषयो विज्ञेयः ॥१३० ॥

हिन्दी — ( ‘ आत्मा वै पुत्रनामासि ' इत्यादि श्रुतिवचनों से ) पुत्र पिता की आत्मा है जैसा पुत्र है, वैसी ही पुत्री भी है, ( अतएव ) आत्म - स्वरूप उस ( पुत्री ) के वर्तमान रहने पर दूसरा

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- अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४०७ ( ( दायाद आदि, मरे हुए पिता की ) सम्पत्ति को कैसे लेगा ( अतएव ' पुत्रिका ' को ही मरे हुए पिता के धन लेने का अधिकार न्याय प्राप्त है, दूसरे को नहीं ) ॥ १३० ॥

माता का निजी धन कन्या का भाग—

मातुस्तु यौतकं यत्स्यात्कुमारीभाग एव सः ।

दौहित्र एव च हरेदपुत्रस्याखिलं धनम् ॥१३१ ॥

भाष्य — यौतकशब्दः पृथग्भावेन च स्त्रीधने । तत्र हि तस्या एव केवलाया: अन्ये तु सौदायिकमेव न सबन्धस्त्रीधनम् । तत्र हि तस्याः स्वातन्त्र्यम् । “ सौदायिकं धनं प्राप्य स्त्रीणां स्वातन्त्र्यमिष्यते ” । स्स्वाम्यम् । इतर तु भक्तभूषाद्युपयोगिनः आन्वाहिकाद्भर्तृदत्ताद्धनादुपयुक्तशेषमेव । युवत्या स्वी-वृकृतं यौतकमाहुः । कुमारीभाग एव कुमारीग्रहणादूढा नास्ति । एवकारस्य च प्रसिद्धानुवादकत्वा-नप्रकरणबाधकत्वमतश्च पुत्रिकाकुमारीविषयमपि यौतकम् । एवं च गौतमः - ( २८।२४ ) “ स्त्रीधनं तदपत्यानाम् ” इत्युक्त्वाऽऽह “ दुहितृणामप्रत्तानामप्रतिष्ठितानां चेति ” । तत्रा-' प्रप्रतिष्ठिता ' या ऊढा अनपत्या निर्धना भर्तृगृहे याभिः प्रतिष्ठा न लब्धा । दौहित्र एव च हरेदपुत्रस्यानौरसपुत्रस्याखिलं धनं हरेत् । सति त्वौरसे यावानं-शास्तं वक्ष्यति । अत्रापि पुत्रिकापुत्र एव ' दौहित्रो ' न सर्वत्र, पूर्ववत्प्रकरणत्यागस्य यौतक-व्विषयत्व एव प्रमाणसम्भवात् ॥१३१ ॥

हिन्दी – माता का ( विवाहादि - काल में पिता या माता आदि से प्राप्त हुआ ) धन उउसकी कन्या ( अविवाहित पुत्री ) का ही भाग होता है तथा पुत्रहीन नाना के सब धन को दौहित्र ( धंवता, नाती अर्थात् पूर्व ( ९ ।१२७ ) वचनानुसार ' पुत्रिका ' की गयी कन्या का पुत्र ) ही प्राप्त करता है ॥१३१ ॥

' पुत्रिका ' के पुत्र को धन लेने का अधिकार-दौहित्रो ह्यखिलं रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् । स एव दद्याद्द्वौ पिण्डौ पित्रे मातामहाय च ॥ १३२ ॥

भाष्य – अपुत्रमातामहप्रमातामहाय । पूर्वेणैव पौत्रिकेयदौहित्रस्याखिलं रिक्थहरत्वमुक्तम् । अतोऽयं श्लोकस्तदनुवादेन प्पिण्डदानविधानार्थ इति कैश्चिद्व्याख्यातम् । ' हरेद्यदी'ति च ते पठन्ति । यस्मिन्पक्षे सर्वं हरेत्तस्मिन्नेव पक्षे दद्यात् । यदा तु " समस्तत्र विभागः स्यात् ” इति पक्षस्तदा न दद्यात् । अअन्यथा “ यो यत आददीत स तस्मै दद्यात् " इत्यनेनैव पिण्डदाने सिद्धे पुनर्वचनम-ममनु II 28

पृष्ठ 448

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४०८ मनुस्मृतिः नर्थकम् । अखिलरिक्थग्रहणानुवादश्चानर्थक एव । [ नवमः तदयुक्तम् । “ अपुत्रस्य पितृर्हरेत् " इत्ययमेवार्थोऽवगीतश्चिरन्तनपाठः । पितृशब्दश्च जनके प्रसिद्धतरो न मातामहे । अतश्च पुत्रिकाया भर्ता यदि तदन्यभार्यायामपुत्रः पुत्रिका च पुत्रवती । तदाऽनेनैव पुत्रेण जातेन पिता मातामहश्चोभावपि पुत्रवन्तौ वेदितव्यौ । यदा तु बीजीतरासु जातपुत्रस्तदा पुत्रिकापुत्रः समानजातीयायामूढायां जातोऽपि नैव बीजिनो रिक्थं हरेन्नापि पिण्डं दद्यात् । अन्यो हि जन्यजनकभावोऽन्यश्चापत्यापत्यवत्सम्बन्ध:। अजनका अपि क्षेत्र क्षेत्रजादिभिरपत्यवन्तो जनकाश्च विक्रीतापविद्धादिपितरो नैवाजी-गर्तादयः पुत्रवन्तः । तथा चौरसलक्षणे ' स्वक्षेत्र ' ( मनु ० ९ । १६६ ) इति स्वग्रहणम् । क्षेत्रं च पुत्रिकापितुरेव । भर्ता हि तस्य चानुविधेयवर इति मातृकुले स्वामी । तस्मादेवं तद्वक्तव्यम् । यस्मिन्पक्षेऽविद्यमानान्यपुत्रं पुत्रिकाभर्ता पुत्रिकापुत्रश्चाखिलद्रव्यहारी । तस्मिन्पक्षे कार्यमत: पिण्डदानम् । यदा तु बीजी स पुत्रः सम्पद्यत तदा स पुत्रिकापुत्री नैव बीजिने पिण्डं दद्यात् । स तु दौहित्र इत्युच्यते । पौत्रिकेय इत्यर्थः यथा मातामहपक्षे पितुरपि यो हरेत्तत्रापि स च दद्यादिति श्रूयते । न पुनः पक्षान्तरेऽपि पक्षान्तरेषु दद्यात् । न च सर्व-ग्रहणपक्षे दद्यादिति नोदना पक्षान्तरेऽपि निषेधमनुमापयति । पित्रे पितामहाय चेत्युभयोर-प्राप्तत्वात् । द्योतनं । परिसंख्येति अनुद्यमाने द्योतनमन्यस्मा एव दद्यात्तद्युगपदुभाभ्या-मनेनायमनुवादः । यथैव पित्रे मातामहाय च एवं पितामहाय प्रमातामहाय च । तथैव च ततः पराभ्यां द्वाभ्याम् ॥१३२ ॥

हिन्दी — नाती ( ‘ पुत्रिका ' ( ९ ।१२७ ) का पुत्र ) ही दूसरे पुत्र के नहीं रहने पर पिता का भी सब धन प्राप्त करे और वही अपने पिता तथा नाना के लिए दो पिण्ड देवे ॥१३२ ॥

पौत्रदौहित्रयोर्लोके न विशेषोऽस्ति धर्मतः ।

तयोर्हि मातापितरौ सम्भूतौ तस्य देहतः ॥ १३३ ॥

भाष्य – पूर्वशेषोऽयमर्थवादः ।

कथमविशेषस्तयोर्हि मातापितराविति ॥ १३३ ॥

हिन्दी — संसार में पौत्र ( पुत्र का पुत्र = पोता ) तथा दौहित्र ( धेवता, नाती अर्थात् ‘ पुत्रिका ' ( ९ ।१२७ ) से पुत्र ) में कोई भेद नहीं हैं; क्योंकि उन दोनों के माता - पिता उसी के शरीर से उत्पन्न हुए हैं ॥ १३३ ॥

' पुत्रिका ' तथा औरस पुत्र का विभाग-पुत्रिकायां कृतायां तु यदि पुत्रोऽनुजायते ।

समस्तत्र विभागः स्याज्ज्येष्ठता नास्ति हि स्त्रियाः ॥ १३४ ॥

भाष्य- -समस्तत्र तुल्यो विभागो जातेन पुत्रेण ज्येष्ठांशनिषेधः । ज्येष्ठता नास्ति -

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अध्याय: ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता हि स्त्रियाः रिक्थभाग एव ज्येष्ठता निषिध्यते न त्वस्यां गुरुवृत्तौ ॥१३४ ॥

४० ९ हिन्दी — ‘ पुत्रिका ' ( ९ ।१२७ ) करने के बाद यदि किसी को पुत्र उत्पन्न हो जाय तो उन दोनों ( पुत्रिका - पुत्र अर्थात् धेवता तथा पौत्र अर्थात् पोतों ) को समान भाग मिलते हैं; क्योंकि ज्येष्ठ होने पर भी ' उद्धार ' ( ९ - १११-११२ ) अर्थात् अतिरिक्त भाग निकालने में ज्येष्ठत्व नहीं होता ॥ १३४ ॥

पुत्रहीन पुत्रिका के धन का अधिकारी-अपुत्रायां मृतायां तु पुत्रिकायां कथञ्चन ।

धनं तत्पुत्रिकाभर्ता हरेतैवाविचारयन् ॥ १३५ ॥

भाष्य — अस्वामिन्यास्तु पुत्रिकाया भर्तुरप्राप्तधनसम्बन्ध उच्यते । अथ किं पुत्रिकाविवाहेन संस्क्रियते । उताहो न किञ्चन । यदि संस्क्रियते, भार्यै-वासौ भवति । भार्याकरणो हि विवाहः । ततश्च तद्धनं....... न संस्तूयते । कन्यागमनं प्राप्नोति ‘ स्वदारनिरतः सदा ' इति नियमातिक्रमश्च I । यथेच्छसि तथास्तु । ननु चास्मिन्पक्षे श्लोकोऽयमनर्थकः । नैष दोषः । अपरिपूर्णत्वायार्थवत्वस्य । यथैतदयमपत्यं न भर्तुस्तेन वेत्याशङ्का-निवृत्त्यर्थो युक्त एव श्लोकारम्भः । बहवश्चार्थवादिनो मानवाः श्लोकाः । अथवा पुनस्तु न संस्क्रियत इति । न तु चास्मिन्पक्षे कन्यागमनं प्राप्नोति । किं कृतम् । तथाविधायां जातो मातामहस्य पुत्र इतः साध्यं गंतुर्विध्यर्थातिक्रमनिरूपणेन प्रप्राकरणिकम् । न च तानि नामानि न पतनीयानि ।........ किं पुनर्भवां कन्याशब्दार्थं मत्वा चोदयति कन्यागमनं प्राप्नोतीति । त्रिधा हि क्कन्या — एका तावदप्रवृत्तपुंप्रयोगा । यथा देवहिता प्रथमे वयसि वर्तमाना च । तत्र य्यदि तावत्पुंसाऽसंप्रयुक्ता रूढाया अपि प्राथमिकात्संप्रयोगादनपगतमेवानुषज्येत । प्रायेण यत्र शास्त्रे कन्याशब्दः पुंसाऽसंप्रयोगमाचष्टे । अथसंस्कारहीनेति तदपि न । यतः प्रथममेव वचनमेवं स्मरणाभिप्रायेण तत्र संभवि । प्रामाणान्तरवशाल्लक्षणया ' हिता ' इत्यत्र प्रतीयते । यथोक्तं— पाणिग्रहणिकामन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाकन्यासु क्वचिन्नृणां लुप्तधर्मक्रिया हि ताः ॥ ( मनु ० ८।२२६ ) इति । अत्र धर्मलोपनवचनलिङ्गात्पुरुषापभुक्ताऽकन्येत्युच्यते । तद्विपर्ययेणानुपभुक्ता कन्येति सार्वत्रैव मुख्यार्थमनुरुध्य क्रियमाणा धर्मा लक्ष्यन्ते । ते च न सर्वे, किं तर्हि । यावतां प्रम्माणमस्ति । तथा हि कानीन इति पितुः स्वता, संस्काराभावश्च प्रतीयते । केवले हि

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४१० मनुस्मृतिः [ नवमः संस्काराभावे चोढास्वैरिणीपुत्राः कानीनाः । केवलायां च पितृस्वतालक्षणायां पुत्रिकापुत्रो-ऽपि कानीन इति व्यपदिश्यते । यच्चोक्तं “ स्वदारतस्तु नियमातिक्रमः प्राप्नोतीति । न ह्यस्यायमर्थः ' स्वदारेभ्यो-ऽन्या गन्तव्येति । परस्त्रियं च न कामयते न चापरां दाराम् । ' तथा सत्यनेनैव गतत्वा-त्परदारप्रतिषेधोऽनर्थकः स्यात् । किंतर्हि स्वदारेषु रतिर्धारयितव्या रतिभावनयाऽऽभ्या-सात्प्रीत्यतिशयोत्पत्तेः । ' स्त्रियं च न कामयते न चापरान्दारांस्तथा सति धर्मेभ्यो न हीयत ' इत्यनुवादोऽयम् । अथवा स्वदारनिरतोऽपि पर्ववर्जनमेनां व्रजेयुः । असौ सुषुप्त्यैवम-पत्न्यशेष एव । परदाराप्रतिषेधोऽपि नास्ति । अनूढत्वात्केनचिद्दारव्यपदेशाभावात् । कि पुनरपुत्रयुक्तम् । अविवाह्येति । अष्टौ हि विवाहाः । ते च स्वीकारभेदेन ब्राह्मा-दिव्यपदेशभेदं प्रतिपद्यन्ते । न चास्याः स्वकरणं भर्तुरस्ति । पितुरेव स्वत्वानतिवृत्तेः । अभ्रातृकायां च विवाहप्रतिषेधः पुत्रिकामविवाह्यां दर्शयति । यथा ‘ नाभ्रातृकामुपयच्छेत तोकं ह्यस्य तद्भवतीति ' । प्राकरणिकञ्श्चायं प्रतिषेधस्तदतिक्रमे विवाहस्य संस्कारतैव नास्ति शूद्राद्याधानस्येवाहवनीयाद्यर्हता रनिगिन्यादिप्रतिषेधेषूपलभ्यमानमूलत्वात्प्रकरणा-धीनोऽपि न संस्कारत्वमपनुदति । तथा च शिष्टां दर्शनीयकन्याभावे कपिलादिरूपामुप-यच्छन्ति, तया च सहधर्मानुष्ठानमाचरन्ति ( क्षतयोन्यन्यपूर्वाभागोऽत्र ) । समानप्रवरादि-कयोढयापि कथञ्चिन्न पत्नीकार्यं कुर्वन्ति । एतदर्थमेव कैश्चि — न्नोद्वहेत्कपिलामि ’ ( ३-८ ) -त्यत्र दृष्टदोषोपवर्णनं, प्राकरणिकत्वेऽपि सपिण्डादिप्रतिषेधस्य चैकरूप्यं मा विज्ञायीति । “ कथं पुनः स्पृष्टिप्रतिषेधो भ्रातृकामुपयच्छते तस्मिन्नोद्वाहशङ्का ” । उच्यते । अस्य प्रतिषेधस्य वाक्यशेष: श्रूयतेऽपत्यं ह्यस्य तद्भवती'ति अनेन । ततश्चापत्योत्पत्तावेव पुत्रिका न भार्या । धर्मार्थमर्थकामयोस्त्वस्त्वेव सहाधिकार इति । भवत्वयं, परिहारस्तु स्वकरणाभावादविवाहः । ननु तस्मिन्पक्षे कानीन एव पुत्रिकापुत्रः स्यात् । न ह्यसौ पितुः ‘ स्वं ' स्यादसंस्कृत-योश्चापत्यमिति । संस्कारपक्षे तु पितृस्वतासंस्कारभावोभयलक्षणवान् प्रत्यक्षादन्यतरधर्मा-भावे तु कानीनाद्भिद्यत इति युक्तम् । अत्रोच्यते । न वयं पुत्रिकापुत्रस्य कानीनस्य लक्षणं तदस्य नास्तीति ब्रूमः । इदं हि तस्य लक्षणम्— पितृवेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः । तं कानीनं वदेन्नाम्ना वोढुः कन्यासमुद्भवम् ॥ ( मनु ० ९ ।१७२ ) इति । अस्य चार्थः । य एवंलक्षणः स इह शास्त्रे कानीनग्रहणेषु ग्रहीतव्यः । स च कस्या-पत्यमित्यपेक्षायां ‘ वोढुः कन्यासमुद्भवम् ' इति द्वितीयं वाक्यम् । अथवा नेह पदार्थों