मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 471–480

मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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अध्याय: ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४३१ भाष्य — बहुप्रजातया भरणासमर्थेनात्यन्तदुर्गत्या केनचिद्वा दोषयोगेन मातापितृ-भक्तिहीनत्वादिना । न पुन: प्रत्यक्षत्वेन, तस्य न क्वचिदेव पुत्रकार्येऽधिकार इति दर्शितं

अन्यत्र । तथैवमप्यन्यतरेणोत्सर्गः ।

‘ परिग्रहः ' पुत्रबुद्ध्या, न तु तज्जीवितेच्छया च ॥ १७१ ॥

हिन्दी – माता - पिता ( दोनों ) या माता या पिता ( किसी एक ) द्वारा त्यक्त जिस पुत्र को मनुष्य स्वीकार कर लेता है, वह ' अविविद्ध ' पुत्र कहा जाता है ॥१७१ ॥

' कानीन ' पुत्र का लक्षण—

पितृवेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः ।

कानीनं वदेन्नाम्ना वोढुः कन्यासमुद्भवम् ॥ १७२ ॥

भाष्य — अयं श्लोकः प्राक् व्याख्यातः । स्वयंदत्तकृत्रिमापविद्धेषु अस्य च भाग-कल्पना प्राक् निरूपिता । प्रतिग्रहभूमिनिषेधश्च सत्यन्यस्मिन्धने न तावत् ॥१७२ ॥

हिन्दी — पितृ - गृह में रहती हुई कन्या ( अविवाहित पुत्री ) गुप्तरूप से जिस पुत्र उत्पन्न करती है, उसे ‘ कानीन ' पुत्र कहते हैं, तथा वह पुत्र कन्या के साथ विवाह करनेवाले पति का होता है ॥१७२ ॥

' सहोढ ' पुत्र का लक्षण–

या गर्भिणी संस्क्रियते ज्ञाताऽज्ञातापि वा सती ।

वोढुः स गर्भो भवति सहोढ इति चोच्यते ॥ १७३ ॥

हिन्दी - ज्ञातावस्था ( जानकारी ) में या अज्ञातावस्था ( अजानकारी ) में जिस गर्भिणी कन्या का विवाह किया जाता है, उस गर्भ से उत्पन्न पुत्र विवाहकर्त्ता पति का होता है तथा उस पुत्र' को ' सहोढ ’ कहते हैं ॥१७३ ॥

पुत्र ' क्रीत ' पुत्र का लक्षण–

क्रीणीयाद्यस्त्वपत्यार्थं मातापित्रोर्यमन्तिकात् ।

स क्रीतकः सुतस्तस्य सदृशोऽसदृशोऽपि वा ॥ १७४ ॥

हिन्दी- माता - पिता को मूल्य देकर समान जातिवाले या असमान जातिवाले जिस पुत्र को अपना पुत्र बनाने के लिए मनुष्य खरीदता है, खरीदे हुए पुत्र को ' क्रित ' पुत्र कहते हैं ॥१७४ ॥

' पौनर्भव ' पुत्र का लक्षण-या पत्या वा परित्यक्ता विधवा वा स्वयेच्छया ।

उत्पादयेत्पुनर्भूत्वा स पौनर्भव उच्यते ॥ १७५ ॥

पृष्ठ 472

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४३२ मनुस्मृतिः [ नवमः हिन्दी – पति से छोड़ी गयी या विधवा स्त्री अपनी इच्छा से दूसरे को पति बनाकर को उत्पन्न करती है, उसे ' पौनर्भव ' पुत्र कहते हैं ॥। १७५ ॥ जिस पुत्र

' पुनर्भू ' स्त्री का लक्षण -सा चेदक्षतयोनिः स्याद्गतप्रत्यागताऽपि वा ।

पौनर्भवेन भर्त्रा सा पुनः संस्कारमर्हति ॥ १७६ ॥

हिन्दी — यदि अक्षतयोनि वह स्त्री दूसरे पति के पास जावे और द्वितीय पति विवाह कर ले, अथवा कुमारावस्थावाले पति को छोड़कर दूसरे पति के पास जाकर पुनः प्रथम पति के पास जाने पर स्त्री के साथ वह प्रथम कुमार पति विवाह कर ले; तो वह उसकी ‘ पुनर्भू ’ स्त्री कहलाती है ॥१७६ ॥

' स्वयंदत्त ' पुत्र का लक्षण–

मातापितृविहीनो यस्त्यक्तो वा स्यादकारणात् ।

आत्मानमर्पयेद्यस्मै स्वयंदत्तस्तु स स्मृतः ॥ १७७ ॥

हिन्दी — माता - पिता से हीन अथवा उनसे निष्कारण त्यक्त ( छोड़ा गया ) पुत्र जिस पुरुष के लिए ( पुत्ररूप होकर ) अपने को समर्पण कर दे, वह उस पुरुष का ' स्वयंदत्त ’ पुत्र कहलाता है ॥१७७ ॥

' पाराशव ' पुत्र का लक्षण-यं ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत्सुतम् ।

स पारयन्नेव शवस्तस्मात्पारशवः स्मृतः ॥ १७८ ॥

भाष्य- - कामादित्यनुवादः “ कामतस्तु प्रवृत्तानाम् " इत्यस्य । पारयन् पिण्डदानादिना उपकुर्वन्नपि शवतुल्यः । अनुपकारकः । असम्पूर्णोपकार-कत्वात् ॥१७३-१७८ ॥ हिन्दी- - ब्राह्मण स्व - विवाहिता शूद्रा में जिस पुत्र को उत्पन्न करता है, वह जीता हुआ भी मरे हुये के समान होने से ' पाराशव ' पुत्र कहलाता है ॥१७८ ॥

दासीपुत्र का समान भाग-दास्यां वा दासदास्यां वा यः शूद्रस्य सुतो भवेत् ।

सोऽनुज्ञातो हरेदंशमिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ १७ ९ ॥

- शूद्रस्यानूढायामनियुक्तायामपि जातः सुत एव । एवं यद्यपि दासस्य दासी-भाष्य-त्यर्थेऽपि वचनात्तस्यां जातो न दासस्य दासस्वामिनः । सोऽनुज्ञातः पित्रा । सममंशमौरसेन हरेत् । जीवितभागे क्रियमाणे, अन्यथा वा

पृष्ठ 473

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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता यदि ब्रूयादेष वः समांश इति । ४३३ यदा तु पितानानुजानाति, तत्स्मृत्यन्तरे पठितं – “ जातोऽपि दास्यां शूद्रेण कामतों-ऽशहरो भवेत् ” ( याज्ञवल्क्य २।१३३ ) । ' कामतो ' यावन्तमंशं पिताऽनुजानाति । “ मृते पितरि कुर्युस्तं भ्रातरस्त्वर्धभागिकम् ” ( याज्ञवल्क्य २।१३४ ) । तं कुर्युः स्वांशापेक्षया, आत्मनो द्वौ द्वौ परिगृह्णीयुर्भागौ तस्यैकं दद्युः । “ अभ्रातृको हरेत्सर्वं दुहितृणां सुतादृते ” ( याज्ञवल्क्य २।१३४ ) । असत्स्वौरसेषु सर्वं रिक्थं स एव हरेद्यदि दौहित्रो न स्यात् । सति तस्मिन्नौरसवत्कल्पना दौहित्रस्य, अन्यस्याश्रुतत्वात्, तस्य च प्रकृतत्वेन बुद्धौ

सन्निवेशात् ।

ब्राह्मणादीनां तु दासीसुताः प्रजीवनमात्रभाजो न रिक्थभाज इति स्थितिः ॥ १७ ९ ॥

हिन्दी — दासी ( ८।४१५ ) में, दासी की दासी में जो पुत्र शूद्र से उत्पन्न होता है, वह पिता से ‘ तुम भी विवाहित स्त्री के पुत्रों के बराबर धन का भाग ( हिस्सा ) लो ’ इस प्रकार आज्ञा पाकर ( पितृ - धन का ) बराबर भाग लेनेवाला होता है, ऐसी धर्म की व्यवस्था है ॥१७९ ॥

' क्षेत्रज ' आदि पुत्र, पुत्र के प्रतिनिधि-क्षेत्रजादीन्सुतानेतानेकादश यथोदितान् । पुत्रप्रतिनिधीनाहुः क्रियालोपान्मनीषिणः ॥ १८० ॥

भाष्य — मुख्याभावे ' प्रतिनिधि: ' । अतोऽसत्यौरस एते कर्तव्या इत्युक्तं भवति । एतेषां स्मृत्यन्तरेऽन्यादृशः क्रम उक्तः । यथा गूढोत्पन्नः कैश्चित्पञ्चमोऽपरैः षष्ठ इति । तत्र पाठक्रमो नात्राङ्गमत एवानियमपाठात् । प्रयोजनं चोत्तरत्रानङ्गत्वे दर्शयिष्यामः । क्रियालोपाद्धेतोः क्रियतेऽपत्यमुत्पादयितव्यमित्यस्य विधिलोपो माभूदिति । नित्यो ह्ययं विधिः । स यथाकथञ्चिद्गृहस्थेन सम्पाद्यः । तत्र मुख्यः कल्प औरसः । तद-सम्पत्तावेतेऽनुकल्पा आश्रयितव्याः ॥१८० ॥

हिन्दी— इन ‘ क्षेत्रज ' आदि ( ' औरस ' पुत्र को छोड़कर शेष ( ९ ।१६ ९ -१७८ ) ग्यारह प्रकार के पुत्रों का ‘ श्राद्ध आदि क्रिया का अभाव न हो ' इसलिए मुनियों ने पुत्र ( ' औरस ’ पुत्र ) का प्रतिनिधि कहा है ॥१८० ॥

' औरस ' पुत्र के रहने का ' दत्तक ' आदि का निषेध-य एतेऽभिहिताः पुत्राः प्रसङ्गादन्यबीजजाः । यस्य ते बीजतो जातास्तस्य ते नेतरस्य तु ॥ १८१ ॥

भाष्य - पूवोक्तस्याभावे विधिप्रतिषेधोऽयमिति व्याचक्षते । य एते औरसाभावे

पृष्ठ 474

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४३४ मनुस्मृतिः [ नवमः प्रतिनिधयः कर्तव्यतया उक्तास्ते न कर्तव्याः । यतस्तेऽन्यबीजजातास्तस्यैव ते पुत्रा नेतरस्य । ये क्रियन्ते तस्य ते न भवन्तीत्यर्थः । अतश्च पूर्वेण विधिरनेन प्रतिषेध इति विकल्पः । स च व्यवस्थितो रिक्थग्रहणे । कानीनसहोढपुनर्भवगूढोत्पन्ना न रिक्थभाजः । दत्तकादयस्तु रिक्थभाजः असत्यौरसे । कानीनादयश्चासत्यप्यौरसे न पितृधनहराः, ग्रासाच्छादनभाजः केवलं सत्यसति चौरसे । यत उक्तं— “ सर्वेषामपि च न्याय्यं दातुं शक्त्या मनीषिणा । ग्रासाच्छादनमत्यन्तं पतितो ह्यद-दद्भवेत् ” ( ९ ।२०२ ) ।१८१ ॥ हिन्दी – ( ' औरस ' पुत्र के वर्णन के ) प्रसङ्ग में ' दूसरे के वीर्य से उत्पन्न जो ये ( क्षेत्रज आदि पुत्र ९ ।१५ ९ -१७८ ) कहे गये हैं, वे जिसके वीर्य से उत्पन्न होते हैं । उसी के हैं, दूसरे ( क्षेत्रिक के ) नहीं; ( अत: ' औरस ' पुत्र ( ९ ।१५८ ) तथा ‘ पुत्रिका ’ ( ९ ।१२ ) के विद्यमान रहने पर उस क्षेत्रजादि पुत्रों को नहीं करना चाहिये ) ॥ एक भाई के पुत्र से सब भाइयों का पुत्रवान् होना-भ्रातॄणामेकजातानामेकश्चेत्पुत्रवान्भवेत् । सर्वांस्तांस्तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत् ॥ १८२ ॥

हिन्दी – एक माता तथा पिता अर्थात् सहोदर भाइयों में से यदि एक भाई को पुत्र हो तो उसी से ( पुत्रहीन भी ) अन्य सभी भाई पुत्रवान् होते हैं ऐसा मनु ने कहा है ॥ १८२ ॥

विमर्श — किसी एक भाई के उत्पन्न पुत्र से सब भाइयों को पुत्रवान् होने से अन्य भाइयों को दूसरे प्रकार के पुत्र प्रतिनिधियों ( दत्तक, क्षेत्रज आदि पुत्रों ) को नहीं करना चाहिये; क्योंकि वही भ्रातृ - पुत्र सब भाइयों के लिए श्राद्धादि करने वाला तथा उनके धन का अधिकारी होता है । एक पत्नी के पुत्र से अन्य पत्तियों का पुत्रवती होना-सर्वासामेकपत्नीनामेका चेत्पुत्रिणी भवेत् । सर्वास्तास्तेन पुत्रेण ग्राह पुत्रवतीर्मनुः ॥ १८३ ॥

हिन्दी — एक पतिवाली स्त्रियों में से यदि एक स्त्री को पुत्र उत्पन्न हो जाय तो ( पुत्रहीन शेष भी सब स्त्रियाँ ) उसी पुत्र से पुत्रवती होती है, ऐसा मनु ने कहा है ॥ १८३ ॥

विशेष – पूर्व ( ९ ।१८८ ) वचने के समान ही एक पत्नी के पुत्र से अन्यान्य पत्नियों के पुत्रवती होने से शेष पुत्रहीना पत्नियों को दत्तक आदि पुत्र को नहीं ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि वही एक सपत्नी - पुत्र सब का श्राद्धकर्त्ता तथा धन - ग्रहीता होता है ।

पृष्ठ 475

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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता श्रेष्ठ क्रम से पुत्रों का पितृ - धन का भागी होना-श्रेयसः श्रेयसोऽलाभे पापीयान्रिक्थमर्हति । बहवश्चेत्तु सदृशाः सर्वे रिक्थस्य भागिनः ॥ १८४ ॥

४३५ हिन्दी– ( पूर्वोक्त ९ ।१४ ९ - १६० ) बारह प्रकार के पुत्रों में से उत्तम - उत्तम पुत्र के अभाव में हीन - हीन पुत्र ( पिता के ) धन का भागी होता है और सबके समान गुणी होने पर समान धन पाने के अधिकारी होते हैं ॥ १८४ ॥

विमर्श — पहले ( ९ ।१५ ९ -१६० ) कहे गये बारह प्रकार के पुत्रों में से पूर्व - पूर्व पुत्र श्रेष्ठ होता है । अतः इस वचनानुसार ' औरस ' पुत्र के अभाव में ' क्षेत्रज ' पुत्र, उसके अभाव में ‘ दत्तक ' पुत्र ( इसी क्रम से आगे भी जानना चाहिये ) पिता के धन का भागी होता है । समान गुण होने पर सभी समान भाग प्राप्त करते हैं और ' औरस ' आदि पूर्व-पूर्व पुत्र विद्यमान हों तो ये ही पितृधन पाते तथा अन्यान्य क्षेत्रादि पुत्रों का पालन - पोषण करते हैं | इस प्रकार ' क्षेत्रज ' आदि पुत्र के विद्यमान रहने पर ' पौनर्भव ' तथा शूद्रापुत्र ( ९।१७५-१७६ ) पितृधन के भागी नहीं होते । समान गुण होने पर सब पुत्र पितृ - धन में भाग पाते हैं । क्षेत्र आदि पुत्रों को पिता के धन का भागी होना-न भ्रातरो न पितरः पुत्रा रिक्थहराः पितुः । पिता हरेदपुत्रस्य रिक्थं भ्रातर एव च ॥ १८५ ॥

हिन्दी — ( पिता के ) धन पाने का अधिकारी सहोदर भाई या पिता नहीं होते; किन्तु ‘ औरस ' पुत्र ( ९ ।१६६ ) के अभाव में ' क्षेत्रज ' आदि पुत्र ( ९।१६६- १७६ ) ही पिता के धन पाने का अधिकारी होता है पुत्र ( मुख्य पुत्र तथा स्त्री और कन्या ) से हीन पुरुष के धन का भागी पिता या भाई होते हैं ॥ १८५ ॥

क्षेत्रजादि पुत्रों को पितामह के धन का भागी होना—

त्रयाणामुदकं कार्यं त्रिषु पिण्डः प्रवर्तते ।

चतुर्थः सम्प्रदातेषा पञ्चमो नोपपद्यते ॥ १८६ ॥

हिन्दी - तीन ( पिता, पितामह और प्रपितामह ) का उदक ( तर्पण, तिलाञ्जलिदान ) करना चाहिये और तीन का ही पिण्डदान ( श्राद्ध ) होता है; चौथा इनको देनेवाला होता है, इनके साथ पाँचवें किसी का कोई सम्बन्ध नहीं होता ॥ १८६ ॥

विमर्श - इसी कारण पुत्रहीन पितामह तथा प्रपितामह के धन का अधिकारी ' क्षेत्रज ' ' आदि ( ९।१६६-१७६ ) ग्यारह प्रकार के गौण ( अप्रधान ) पुत्र भी होते हैं । ' पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पौत्रस्थ पुत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टपम् ॥ ' ( ९ ।१३७ )

पृष्ठ 476

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४३६ मनुस्मृतिः [ नवमः इस वचन से पितामह प्रपितामाह के धन के भागी होने का विधान पौत्र - प्रपौत्र पहले कर ही चुके हैं, इस वचन से गौण ( क्षेत्रज आदि ) पुत्रों को पितामह आदि के धन का भागी होने का विधान किया है । [ असुतास्तु पितुः पल्यः समानांशाः प्रकीर्तिताः । पितामह्यश्च ताः सर्वा मातृकल्पाः प्रकीर्तिताः ॥४ ॥ ]

[ हिन्दी – पुत्रहीना पिता की स्त्रियाँ समान भागवाली कही गयी हैं तथा पितामह की स्त्रियाँ भी मातृतुल्य कही गयी हैं || ४ || ]

सपिण्डादि का धन पाने का भागी होना-अनन्तरः सपिण्डाद्यस्तस्य तस्य धनं भवेत् ।

अत ऊर्ध्वं सकुल्यः स्यादाचार्यः शिष्य एव वा ॥ १८७॥१

हिन्दी — सपिण्डों में निकट सम्बन्धी मृतव्यक्ति के धन का भागी ( हकदार ) होता है तथा इसके बाद ( सपिण्ड के अभाव में ) क्रमशः समानोदक ( सजातीय ), आचार्य तथा शिष्य मृतव्यक्ति के धन का भागी होता है ॥ १८७ ॥

विमर्श - यह वचन औरस आदि सपिण्ड मात्र के विषम में मानने पर व्यर्थ होता है, अतएव स्त्री आदि को दायभाग प्राप्त होने के लिए यह वचन है । इस वचन के पूर्वार्द्ध में निकटतम सपिण्ड को मृतव्यक्ति के धन का भागी कहा गया है, उसमें पूर्व ( ९ ।१६२ ) वचनानुसार ‘ औरस ’ पुत्र ही मृतव्यक्ति के धन का भागी होता है, क्षेत्रज तथा गुणवान् दत्तक पुत्र पञ्चमांश या षष्ठांश धन के भागी होते हैं और कृत्रिम पुत्रों को पालन - पोषण मात्र के लिए धन दिया जाता है । औरस पुत्र ( ९ ।१६६ ) के अभाव में पुत्रिका या उसका पुत्र मृतव्यक्ति के धन का भागी होता है, उसके अभाव में क्रमश: क्षेत्रज आदि एकादशविध ( ९।१६७-१७९ ) पुत्र मृत पिता के धन के भागी होते हैं, उनमें भी विवाहित शूद्रा का पुत्र' नाधिकं... ( ९ ।१५४ ) वचन के अनुसार पितृ - धन में से केवल दशमांश धन का भागी होता है, शेष धन का भागी मृत व्यक्ति का समीपवर्ती सपिण्ड होता है । तेरहवें प्रकार के पुत्र के होने पर स्त्री ही मृत पति के धन को पाने की अधिकारिणी होती है । ऐसा महर्षि याज्ञवल्क्य, बृहस्पति तथा वृद्ध मनु ' का मत है । ' स्त्रिणां तु जीवनं दद्यात् ' अर्थात् ‘ स्त्रियों के भरण - पोषण मात्र के लिए धन दे ' यह वचन दुःशीला, अधार्मिक तथा सविकार युवावस्थावाली स्त्री के विषय में होने से विरुद्ध नहीं पड़ता है । इसी से स्त्रियों को मृतपति के धन की अधिकारिणी होने का निषेध मेधातिथि का वचन सम्बद्ध नहीं है; क्योंकि स्त्री १. श्लोकास्यास्य व्याख्यानं कुर्वता कुल्लूकेन ' अतो यन्मेधातिथिना पत्नीनामंशभागित्वं निषिद्ध-मुक्तं तदसम्बद्ध'मित्यादिना श्लोकस्यास्यापि भाष्यं मेधातिथिविरचितमासीदिति सूचितम् । २. एतत्सर्वं ' यदाह याज्ञवल्क्य लभेत च ॥ ' इति मन्वर्थमुक्तावल्यां द्रष्टव्यम् ।

पृष्ठ 477

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता ४३७ के अभाव में पुत्ररहित पुत्री, उसके अभाव में पिता तथा माता उन दोनों के अभाव में सहोदर भाई, उसके अभाव में उस ( सहोदर भाई ) का पुत्र मृत व्यक्ति के धन का भागी होने का आगे ( ९ ।२१७ ) विधान किया गया है । उनके अभाव में सन्निकट सपिण्ड धन का भागी होता है । जो व्यक्ति मृत व्यक्ति के धन का भागी होता है, वहीं उसका पिण्डदानादि-क्रिया करने वाला होता है । [ हरेरनृत्विजो वापि न्यायवृत्ताश्च याः स्त्रियः ॥५ ॥ ]

[ हिन्दी — अथवा जो ऋत्विक् की स्त्रियाँ धर्मपरायण सती साध्वी हों, वे मृत व्यक्ति के धन को ) ग्रहण करें || ५ || ]

सब के अभाव में ब्राह्मण का अधिकार-सर्वेषामप्यभावे तु ब्राह्मणा रिक्थभागिनः ।

त्रैविद्याः शुचयो दान्तास्तथा धर्मो न हीयते ॥ १८८ ॥

हिन्दी — सब ( औरस पुत्र, पत्नी, सपिण्ड आदि ) के अभाव में वेदत्रय ( ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद ) के पढ़नेवाले, शुद्ध ( शरीर सम्बन्धी ब्राह्य शुद्धि तथा मनः सम्बन्धी आभ्यन्तर शुद्धि से युक्त ), जितेन्द्रिय ब्राह्मण ही मृत व्यक्ति के धन पाने के अधिकारी होते हैं, इस प्रकार धर्म ( मृत व्यक्ति के पिण्डदानादि क्रिया ) की हानि नहीं होती है ॥१८८ ॥

ब्राह्मणेत्तर धन का राजा अधिकारी-अहार्यं ब्राह्मणद्रव्यं राज्ञा नित्यमिति स्थितिः । इतरेषां तु वर्णानां सर्वाभावे हरेन्नृपः ॥ १८ ९ ॥ हिन्दी- - ब्राह्मण के धन को राजा कदापि ( मृत ब्राह्मण के धन लेनेवाले औरस पुत्रादि के किसी के नहीं रहने पर भी ) नहीं लेवे यह शास्त्र मर्यादा है । दूसरे ( क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ) वर्णों के धन को सब ( औरस पुत्रादि उत्तराधिकारी किसी भी व्यक्ति के नहीं रहने पर राजा ग्रहण करे ॥१८ ९ ॥

मृत - पति का नियुक्तपुत्र अधिकारी-संस्थितस्यानपत्यस्य सगोत्रात्पुत्रमाहरेत् ।

तत्र यद्रिक्थजातं स्यात्तत्तस्मिन्प्रतिपादयेत् ॥ १ ९ ० ॥

हिन्दी – सन्तानहीन मृत पति की स्त्री नियोग धर्म ( ९ ।५ ९ -६२ ) के द्वारा सगोत्र से पुत्र उत्पन्न करे तथा मृत पति का जो - जो धन हो, उसे उस पुत्र के लिए दे देवे ॥ १ ९ ० ॥ विमर्श — पहले ( ९ ।५ ९ ) देवर या सपिण्ड से ही नियोग धर्म द्वारा पुत्रोत्पादन करने तथा उसी के पितृ - धन का भागी होने का विधान किया है, इस वचन से सगोत्र से उत्पन्न पुत्र को भी पितृधन को पाने का अधिकारी कहा गया है ।

पृष्ठ 478

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४३८ मनुस्मृतिः [ नवमः औरस तथा पौनर्भव पुत्रों का स्व- स्वपितृधन का अधिकार-द्वौ तु यौ विवदेयातां द्वाभ्यां जातौ स्त्रिया धने । तयोर्यद्यस्य पित्र्यं स्यात्तत्स गृह्णीत नेतरः ॥ १ ९ १ ॥ हिन्दी — दो पिताओं से उत्पन्न दो पुत्र स्त्री ( माता ) के धन के विषय में विवाद करे तो जो पुत्र जिस पिता से उत्पन्न हुआ है, वह पुत्र उसी ( अपने ही पिता के धन पाने का अधिकारी होता है, दूसरा पुत्र नहीं ॥ १ ९ १ ॥ विमर्श — पहले औरस तथा क्षेत्रज पुत्रों के लिए धनविभाजन का निर्णय कर चुके हैं, अब इस वचन से औरस तथा पौनर्भव पुत्रों के लिए धन विभाजन का निर्णय कहते हैं । स्त्री औरस पुत्र के उत्पन्न होने पर पति के मर जाने के बाद उस पुत्र के छोटे होने से अपने मृत पति का धन ले लेवे तथा पुनः दूसरे पति से पौनर्भवसंज्ञक दूसरा पुत्र उत्पन्न करे और उस द्वितीय पति के भी मर जाने पर उसके धन को पाने का दूसरा उत्तराधिकारी नहीं होने पर उस पति का धन ले लेवे, अनन्तर वे दोनों ( औरस तथा पौनर्भव ) पुत्र सयाने होकर उस माता के द्वारा लिए हुए धन को पाने के लिए विवाद करें तब वे अपने - अपने जनक पिता के धन को पाने के अधिकारी होते हैं, ऐसा निर्णय है । माता के धन के अधिकारी—

जनन्यां संस्थितायां तु समं सर्वे सहोदराः ।

भजेरन्मातृकं रिक्थं भगिन्यश्च सनाभयः ॥ १ ९ २ ॥

हिन्दी - माता के मरने पर सब सहोदर भाई तथा अविवाहित सहोदरी बहनें उसके धन को बराबर भाग में पाती हैं ॥१९ २ ॥ विमर्श — विवाहित सहोदरी भी बहनें मृतमाता के धन में से भाग नहीं पातीं किन्तु उसके सम्मानार्थ भाइयों का कर्त्तव्य है कि पितृधन के समान मातृधन में से अपने भाग का चतुर्थांश उनके लिए देवें ।

यास्तासां स्युर्दुहितरस्तासामपि यथार्हतः ।

मातामह्या धनात्किञ्चित्प्रदेयं प्रीतिपूर्वकम् ॥१९ ३ ॥

हिन्दी – उन ( सहोदरी ) पुत्रियों की जो अविवाहित पुत्रियाँ ( पोतियाँ ) हों, उनके सम्मानार्थ भी नानी के धन में से कुछ भाग उनके लिए प्रेमपूर्वक देना चाहिये । स्त्री धन के ६ प्रकार—

अध्यग्न्यध्यावाहनिकं दत्तं च प्रीतिकर्मणि ।

भ्रातृमातृपितृप्राप्तं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम् ॥ १ ९ ४ ॥

पृष्ठ 479

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अअध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४३ ९ हिन्दी – ( १ ) विवाह काल में अग्निसाक्षित्व के समय पिता आदि के द्वारा दिया गाया, ( २ ) पिता के घर से पति के घर लायी जाती हुई कन्या के लिए दिया गया, ( ३ ) प्रेप्रेम - सम्बन्धी किसी सु - अवसर पर पति आदि के द्वारा दिया गया तथा ( ४ ) भाई, ( ५ ) माता और ( ६ ) पिता के द्वारा विविध अवसरों पर दिया गया छः प्रकार का धन ' स्त्री - धन ' क्कहलाता है ॥१९ ४ ॥

सपुत्र - स्त्री धन के अधिकारी-अन्वाधेयं च यद्दत्तं पत्या प्रीतेन चैव यत् ।

पत्यौ जीवति वृत्तायाः प्रजायास्तद्धनं भवेत् ॥ १ ९ ५ ॥

हिन्दी — विवाह के बाद पति कुल में या पितृ कुल में प्राप्त हुए स्त्री के धन को प्पाने का अधिकारी उसके पति के जीवित रहने पर भी पुत्रियों को ही होता है । १ ९ ५ ॥

-सन्तानहीना स्त्री के धन का अधिकारी-ब्राह्मदैवार्षगान्धर्वप्राजापत्येषु यद्वसु ।

अप्रजायामतीतायां भर्तृरेव तदिष्यते ॥ १ ९ ६ ॥

हिन्दी — ब्राह्म, दैव, आर्ष, गान्धर्व और प्राजापत्य संज्ञक ( क्रमश: ३।२७, २८, : २ ९, ३० और ३२ विवाहों से प्राप्त सन्तानहीना स्त्री के पूर्वोक्त ( ९ ।१ ९ ४ ) छ: प्रकार के धन का अधिकारी पति ही होता है ऐसा मनु आदि का मत है ॥१९ ६ ॥ यत्त्वस्याः स्याद्धनं दत्तं विवाहेष्वासुरादिषु । अप्रजायामतीतायां मातापित्रोस्तदिष्यते ॥ १ ९ ७ ॥ हिन्दी — आसुर आदि ( आसुर, राक्षस तथा पैशाच, क्रमश: ३।३१, ३३ और ३४ ) रसंज्ञक विवाहों में स्त्रिी के लिए जो धन दिया गया हो, सन्तानहीन उस स्त्री के मरने ' पर पूर्वोक्त ( ९ ।१ ९ ४ ) ६ प्रकार के स्त्री - धन को पाने के अधिकारी उसके माता - पिता होते हैं ॥१ ९ ७ ॥

स्त्रियान्तु यद्भवेद्वित्तं पित्रा दत्तं कथञ्चन ।

ब्राह्मणी तद्धरेत्कन्या तदपत्यस्य वा भवेत् ॥ १ ९ ८ ॥

हिन्दी- -ब्राह्मण की अनेक जातिवाली सन्तान हीन क्षत्रियादि वर्णोंवाली स्त्रियों के मरने पर उसके पिता आदि के द्वारा दिये गये पूर्वोक्त ( ९ ।१ ९ ४ ) छ: प्रकार के स्त्री - धन को पाने का अधिकार सजातीय या विजातीय सपत्नियों की सन्तान रहने पर भी ब्राह्मण जातीया सपत्नी की कन्या को ही होता है और उसके अभाव में उसकी ( पुत्री ) को अधिकार प्राप्त होता है ॥१९ ८ ॥ मनु II 30

पृष्ठ 480

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४४० मनुस्मृतिः साधारण से स्त्रीधन करने का निषेध - डी ( 9

न निहरिं स्त्रियः कुर्युः कुटुम्बाद्बहुमध्यगात् ।

स्वकादपि च वित्ताद्धि स्वस्य भर्तुरनाज्ञया ॥ १ ९९ ॥

[ नवमः हिन्दी — स्त्री - भाई आदि बहुत परिवारवाले धन में से तथा अपने पति के धन में से भी पति की आज्ञा के बिना अलङ्कार आदि के लिए धन का संग्रह न करे ( अतएव उक्त धन ‘ स्त्री - धन ' नहीं होता है ॥ १ ९९ ॥ स्त्री - भूषणों की अविभाज्यता—

पत्यौ जीवति यः स्त्रीभिरलङ्कारो धृतो भवेत् ।

न तं भजेरन्दायादा भजमानाः पतन्ति ते ॥ २०० ॥

हिन्दी — पति के जीवित रहने पर स्त्रियाँ जिन भूषणों को पहनती हों, उनको भाई आदि हिस्सेदार न लेवें, यदि वे उन्हें लेते हैं तो वे पतित हो जाते हैं ॥ २०० ॥

नपुंसक आदि को भाग का अनधिकार—

अनंशौ क्लीबपतितौ जात्यन्धबधिरौ तथा ।

उन्मत्तजडमूकाश्च ये च केचिन्निरिन्द्रियाः ॥ २०१ ॥

हिन्दी – नपुंशक, पतित, जन्मान्ध, बहरा, पागल, जड़, गूँगा और जो किसी इन्द्रिय से शून्य ( लँगड़ा, लूला आदि ) हों, वे धन के भागी ( हिस्सेदार ) नहीं होते हैं, ( किन्तु भोजन वस्त्रमात्र पाते रहने के अधिकारी होते हैं ॥ २०१ ॥

सर्वेषामपि तु न्याय्यं दातुं शक्तया मनीषिणा ।

ग्रासाच्छादनमत्यन्तं पतितो ह्यददद्भवेत् ॥ २०२ ॥

भाष्य — सर्वेषामपि क्लीबादीनां च प्रकृतत्वेन दर्शितमिति । अत्यन्तं यावज्जीव-मित्यर्थः । शरीरधारणार्थत्वाद्ग्रासाच्छादनस्य, भृत्यादेस्तदुपयोगिनः परिचारकस्यापि वेतन-दानं विज्ञेयम् । न ह्यन्धादेः परिचारकमन्तरेण जीवनसम्भवः । येषां दारकरणं मतं सभार्याणां भरणं दातव्यम् । शक्त्येति धनानुरूपेण भोजनवस्त्रादि देयम् । पतितं इत्यर्थवादः ॥२०२ ॥

हिन्दी- - सब ( पूर्व श्लोकोक्त नपुंसक आदि ) के धन को न्यायपूर्वक लेने वाला शास्त्रज्ञ विद्वान् उन ( नपुंसक - पतित आदि ) के लिए भोजन - वस्त्र यथाशक्ति देवे और नहीं देनेवाला पतित होता है ॥२०२ ॥

नपुंसकादि के क्षेत्रज पुत्र को धन प्राप्ति का अधिकार-यद्यर्थिता तु दारैः स्यात्क्लीबादीनां कथञ्चन । तेषामुत्पन्नतन्तूनामपत्यं दायमर्हति ॥ २०३ ॥