मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 501–510
मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 501–510
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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता
निर्भय राज्य की समृद्धि-निर्भयं तु भवेद्यस्य राष्ट्रं बाहुबलाश्रितम् ।
तस्य तद्वर्धते नित्यं सिच्यमान इव द्रुमः ॥ २५५ ॥
भाष्य— प्रसिद्धमेवैतच्छ्लोके तस्करधर्मविशेषतयाऽनूद्यते ॥२५५ ॥
४६१ हिन्दी — जिस राजा के बाहुबल के आश्रय से राज्य ( चौर आदि से ) निर्भय होता है, उस राजा का राज्य सींचे गये वृक्ष के समान वृद्धि को पाता है ॥२५५ ॥
प्रत्यक्ष तथा परोक्ष चौर का ज्ञान-द्विविधांस्तस्करान्विद्यात्परद्रव्यापहारकान् ।
प्रकाशांश्चाप्रकाशांश्च चारचक्षुर्महीपतिः ॥ २५६ ॥
भाष्य — चाराः प्रच्छन्ना राष्ट्रे राजकृत्यज्ञानिनः । ते चक्षुषी इव यस्य स चार-चक्षुः । प्रकाशस्तस्कराणां नातितस्करव्यवहारो यथा लोकेऽन्येषामटवीरात्रिचराणाम् । आप्तस्तैः सामान्योपादानं तद्वन्निग्रहार्थं क्रियते ॥ २५६ ॥
हिन्दी – ( गुप्तचरों के द्वारा सब काम देखने से ) चारचक्षुष ( गुप्तचर ही हैं नेत्र जिसके ऐसा ) राजा गुप्त ( छिपकर ) तथा प्रकाश ( प्रकट ) रूप में दूसरों के धन को चुरानेवाले दो प्रकार के चोरों को मालूम करे ॥ २५६ ॥
प्रत्यक्ष तथा परोक्ष चोर के लक्षण-प्रकाशवञ्चकास्तेषां नानापण्योपजीविनः ।
प्रच्छन्नवञ्चकास्त्वेते ये स्तेनाटविकादयः ॥ २५७ ॥
भाष्य - तत्र ये क्रेयार्थं मानतुलाविशेषेण मुष्णन्ति द्रव्याणामागमस्थाननिर्गमना-पेक्षार्थं कुर्वन्ति ते प्रकाशवञ्चका वाणिजका: । प्रच्छन्नास्तु ये रात्रेरनुहरन्ति ते । स्तेना आटविका विजने प्रदेशे वसन्ति । अपरे तु प्रसह्य हारिणी न केवलमेत एव, किंतर्हीमेचान्ये यानूर्ध्वं वक्ष्यामः ॥ २५७ ॥
हिन्दी – उन दो प्रकार के चोरों में से मूल्य तथा तोल या नापने में लोगों के देखते - देखते सोना, कपड़ा आदि बेचते समय ठगनेवाले प्रथम ( प्रत्यक्ष ) चोर हैं तथा सेंध डालकर या जङ्गल आदि में छिपकर रहते हुए दूसरों के धन को चुरानेवाले द्वितीय ( परोक्ष ) चोर हैं ॥२५७ ॥
उत्कोचकाश्चौपधिका वञ्चकाः कितवास्तथा ।
मङ्गलादेशवृत्ताश्च भद्रप्रेक्षणिकैः सह ॥ २५८ ॥
भाष्य — उत्कोचका ये कस्य चित्कार्येण कस्य चिद्राजामात्मयादेः प्रवृत्ता
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४६२ ग्रहणातिकार्यसिद्धौ प्रवर्तन्ते । मनुस्मृतिः [ नवमः औपधिकाः छद्मव्यवहारिणः । अन्यब्रुवन्त्यन्यदाचरन्ति । प्रत्यक्षं प्रीतिं दर्श-यित्वा हठोपकारे वर्तन्ते । विनाप्यर्थग्रहणेन निमित्तान्तरतः अन्यतोऽपरस्य कार्यसिद्धिम-वश्यं विज्ञाय ‘ मया तवैतत्क्रियत ' इति परं गृह्णन्ति । भीषिकाप्रदर्शनं वा ' उपधि: ’ । कितवा धनग्रहणवञ्चका विप्रलम्भकाः । ' इदं कार्यं वयमेव करिष्यामस्तव नान्यत्रो -द्यथा ' इत्युक्त्वा न कुर्वते । उपेत्य नानाकारिणो नानाविधैरुपायैर्ग्रामीणान्मुष्णान्ति । शिवमाधवादयः शिवामादित्यं जीवन्ति । मङ्गलादेशवृत्ता ये ह्युपदेशिका ज्योति-षिकादयः । अथवा ‘ एतां देवतां त्वदर्थेनाहं प्रीणयामि दुर्गां मार्तण्डं चेति ' तथ्यऽ-ऽढ्यानां धनमुपजीवन्ति । अथवा मङ्गलं ' तथाऽस्त्विति ' वादिनः, ' मङ्गलादेशवृत्ताः ' । सर्वस्य करवर्धने भद्रप्रेक्षणिकाः प्रशंसिपुरुषलक्षणाः ॥ २५८ ॥
हिन्दी – ( और ) घूसखोर, डराकर धन ( ९ ।२२३ में वर्णित लेनेवाले ठग, जुआरी द्यूत या समाह्वय से धन लेनेवाले ), धन या पुत्रादि के लाभ होने की असत्य बातें कहकर लोगों से धन लेनेवाले, उत्तम ( साधु, संन्यासी आदि का वेष धारण कर अपने दूषित कर्म को छिपाकर लोगों से धन लेनेवाले, हस्तरेखा आदि को देखकर नहीं जानते हुए भी फल को बतलाकर धन लेनेवाले ॥ २८५ ॥
असम्यक्कारिणश्चैव महामात्राश्चिकित्सकाः ।
शिल्पोपचारयुक्ताश्च निपुणाः पण्ययोषितः ॥ २५ ९ ॥
भाष्य — महामात्रा मन्त्रिपुरोहितादयो राजनिकटिकः । ते चेदसम्यक्कारिणः । चिकित्सका वेद्याः । शिल्पोपचारयुक्ताः चित्रपत्रछेदरूपकारादयः । ' उपचार ' उपायनमनुपयुज्यमानं स्वशिल्पकौशलं दर्शयित्वाऽनुष्ठाय धनं नयन्ति ।
एवं पण्ययोषितो निपुणाश्चोपचारेणासत्प्रीतिदर्शनेन ।
असम्यक्कारिण इति सर्वत्रानुयुज्यते ॥२५९ ॥
हिन्दी - अशिक्षित हाथीवान्, अशिक्षित चिकित्सक ( वैद्य डाक्टर, हकीम ) चित्रकार आदि शिल्पी, परद्रव्यापहरण में चतुर वेश्या ॥ २५ ९ ॥ एवमाद्यान्विजानीयात्प्रकाशांल्लोककण्टकान् । निगूढचारिणश्चान्याननार्यानार्यालिङ्गिनः ॥ २६० ॥
भाष्य- एवमाद्यान् न शक्यन्ते धूर्तानां परद्रव्यापहाराणां प्रकारान्संख्यातु-मित्याद्यग्रहणम् । तथा ह्यशक्यां कथयन्ति अवधारयन्तीमनुरागिणीम् । तथाऽभृत्यो भृत्य-
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अध्यायः ] ' मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४६३ वदात्मानं दर्शयित्वा नयति । हिरण्यमृजुप्रकृतेः न चार्थभृतस्त्वं ब्रह्मा त्वं बृहस्पपि-रि ' त्युक्त्वा मूर्खाढ्यान्नयन्ति । ' देहि प्रसादेन कतिपयैर्वाऽहोभिः, प्रत्यर्पयामीति ’ सिद्धे प्रयोजने तनुतरो भवति प्रियवाद्यप्रियवादी सम्पद्यते ॥ २६० ॥
हिन्दी — इन्हें तथा इस प्रकार के अन्य लोगों को तथा ब्राह्मणादि का वेष धारणकर गुप्तरूप से जनता का उगने वाले शूद्र आदि को प्रत्यक्ष कण्टक ( प्रकटरूप में चोर ) जानना चाहिये ॥२६० ॥
तान्विदित्वा सुचरितैर्गूढैस्तत्कर्मकारिभिः ।
चारैश्वानेकसंस्थानैः प्रोत्साद्य वशमानयेत् ॥ २६१ ॥
भाष्य - निगूढचारिणः । तुल्यकर्मकारिभिर्विद्या । पूर्वं ये तत्कर्म कृतवन्तः । अथवा सम्प्रत्येव तत्कर्म कार्यन्ते अन्तर्भावसिद्ध्यर्थं लब्धान्तरा आगत्य कथयिष्यन्ति तथाद्यैरपि चारैस्तत्कर्मकारिभिरनेकसंस्थानैः ॥ २६१ ॥
हिन्दी - उन्हीं के कर्मों को करनेवाले, गुप्त, सदाचारी एवं विविध वेष धारण किये दूतों ( ७।६३-६४ ) से उन वञ्चकों ( ठगों ) को मालूम करके उनका शासन कर उन्हें वश में करे ॥ २६१ ॥
उन द्विविध चोरों का शासन-तेषां दोषानभिख्याप्य स्वे स्वे कर्मणि तत्त्वतः ।
कुर्वीत शासनं राजा सम्यक् सारापराधतः ॥ २६२ ॥
हिन्दी-- राजा उन वञ्चकों ( प्रत्यक्ष या परोक्ष चोरों ) के जो गुप्त या प्रत्यक्षकृत अपराध हों, उन्हें सबके सामने कहकर उनके अपराध, शरीर एवं धन के अनुसार उनको दण्डित करे ॥२६२ ॥
दण्डाभाव में पापनिवारण की असमर्थता-न हि दण्डादृते शक्यः कर्तुं पापविनिग्रहः ।
स्तेनानां पापबुद्धीनां निभृतं चरतां क्षितौ ॥ २६३ ॥
हिन्दी – इन चोरों, पापबुद्धियों तथा गुप्तरूप से विचरण करनेवालों का पाप बिना दण्डित किये नहीं रोका जा सकता है ( अतएव उन्हें दण्डित करना राजा का धर्म है ॥२६३ ॥
सभा
चोरों का अन्वेषण करना-प्रपापूपशालावेशमद्यान्नविक्रयाः ।
चतुष्पथाश्चैत्यवृक्षाः समाजाः प्रेक्षणानि च ॥ २६४ ॥
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४६४ मनुस्मृतिः [ [ नवमः हिन्दी – सभास्थान, प्याऊ ( पौसरा ), पूआ - पूड़ी आदि वेचने की दूकान ( होटल आदि ), गल्ले की दूकान, चौरास्ता, मन्दिर, बड़े - बड़े प्रसिद्ध वृक्षों की जड़ ( के नीचे का भाग ), अनेक लोगों के एकत्रित होने का स्थान, प्रदर्शनी आदि दर्शनीय स्थान ॥२६४ ॥
जीर्णोद्यानान्यरण्यानि कारुकावेशनानि च ।
शून्यानि चाप्यगाराणि वनान्युपवनानि च ॥ २६५ ॥
हिन्दी – पुराने उद्यान, जङ्गल, शिल्पियों ( विविध प्रकार के कारीगरों - चित्रकार आदि ) के घर, सूने घर, वन, फुलवारी ॥ २६५ ॥
एवंविधान्नृपो देशान्गुल्मैः स्थावरजङ्गमैः । तस्करप्रतिषेधार्थं चौरैश्चाप्यनुचारयेत् ॥ २६६ ॥
हिन्दी – ऐसे गुप्त स्थानों में घूमने - फिरने तथा एक स्थान में रहने वाले चोरों को रोकने के लिए राजा गुप्तचरों ( या पहरेदारों ) को नियुक्त करे ॥ २६६ ॥
तत्सहायैरनुगतैर्नानाकर्मप्रवेदिभिः विद्यादुत्सादयेच्चैव निपुणैः पूर्वतस्करैः ॥ २६७ ॥
हिन्दी- -उन चोरों के सहायक, उनके विविध कार्यों ( सेंध मारना आदि ) के जानकार जो पहले निपुण चोर रहे हों; ऐसे गुप्तचरों से उन चोरों को मालूमकर राजा उनका नाश करे ॥२६७ ॥
उन चोरों को पकड़ने का उपाय-भक्ष्यभोज्योपदेशैश्च ब्राह्मणानां च दर्शनैः ।
शौर्यकर्मापदेशैश्च कुर्युस्तेषां समागमम् ॥ २६८ ॥
हिन्दी – वे गुप्तचर भक्ष्य - भोज्य पदार्थों का लोभ दिखाकर ( तुम लोग मेरे यहाँ या अमुक स्थान पर आवो, हम सब एक साथ अमुक स्थान पर चढ़कर उत्तमोत्तम पदार्थ भोजन करेंगे इत्यादि प्रकार से खाने का लोभ देकर ), ब्राह्मणों के दर्शन ( अमुक स्थान में सब बातों के ज्ञाता एक सिद्धब्राह्मण रहते हैं, उनका दर्शनकर हम लोग अपना मनोरथ पूर्ण करें ) इत्यादि कहने से साहस कर्म के कपट से ( अमुक व्यक्ति के यहाँ एक बड़ा शूरवीर रहता है, वह अकेला ही अनेक आदमियों के साध्य कार्य को कर सकता है आदि कपट वचनों से ), उन चोरों को एकत्रितकर राजा द्वारा नियुक्त शासन पुरुषों ( सैनिक सिपाहियों ) से उनका समागम करा दे अर्थात् उन्हें गिरफ्तार करा दें ॥ २६८ ॥
ये तत्र नोपसर्पेयुर्मूलप्रणिहिताश्च चे ।
तान्प्रसह्य नृपो हन्यात्समित्रज्ञातिबान्धवान् ॥ २६ ९ ॥
हिन्दी — जो चोर उन गुप्तचरों के उस प्रकार ( पूर्व श्लोक में कथित भक्ष्य - भोज्यादि
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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४६५ विषयक कपटयुक्त वचनों से ) अपने पकड़े जाने की शङ्का से वहाँ ( गुप्तचर के सङ्केतित स्थान में ) नहीं आवे तथा उन गुप्तचरों से सावधान ही रहते हों; उन चोरों को राजा अपने गुप्तचरों से मालूम कर मित्र, ज्ञाति तथा बान्धवों के सहित उनपर आक्रमण कर उन्हें दण्डत करे॥२६९ ॥
चुराये गये धन का पता न लगाने पर—
न होढेन विना चौरं घातयेद्धार्मिको नृपः ।
सहोढं सोपकरणं घातयेदविचारयन् ॥ २७० ॥
हिन्दी — धार्मिक राजा चुराये गये धन का सेंध मारने आदि के शस्त्रादि साधनों का पता नहीं लगने से चोर का पूर्णतः निर्णय नहीं होने से उनका वध नहीं करे तथा चुराये गये धन तथा सेंध मारने के शास्त्रादि साधनों के द्वारा चोर का निर्णय हो जाने पर बिना विचारे ( दूसरा विकल्प उठाये ) उस चोर का वध ( अपराधानुसार उन्हें दण्डित ) करे || २७० ॥
चोरों के आश्रयदाताओं को दण्ड-ग्रामेष्वपि च ये केचिच्चौराणां भक्तदायकाः ।
भाण्डावकाशदाश्चैव सर्वांस्तानपि घातयेत् ॥ २७१ ॥
हिन्दी - गाँवों में भी जो काई चोरों के लिए भोजन, चोरी के उपयोगी बर्तन या वस्त्रादि देते हों; राजा उनका भी वध ( या निरन्तर अथवा एकबार किये गये अपराध के अनुसार दण्डित ) करे ॥२७१ ॥
अपराधी सीमारक्षकों को दण्ड-राष्ट्रेषु रक्षाधिकृतान्सामन्तांश्चैव चोदितान् ।
अभ्याघातेषु मध्यस्थान् शिष्याच्चौरानिव द्रुतम् ॥ २७२ ॥
हिन्दी — राज्य की रक्षा में नियुक्त तथा सीमा के रक्षक राजपुरुष भी चोरी करने में मध्यस्थ होकर चोरों के सहायक होते हैं; ( अत एव राजा ) उनको भी चोरों के समान ही शीघ्र दण्डित करे ॥ २७२ ॥
धर्मभ्रष्ट धर्मजीवि ब्राह्मण को दण्ड-यश्चापि धर्मसमयात्प्रच्युतो धर्मजीवनः ।
दण्डेनैव तमप्योषेत्स्वकाद्धर्माद्धि विच्युतम् ॥ २७३ ॥
हिन्दी — धर्मजीवी ( यज्ञ कराने से तथा दान लेकर दूसरों में यज्ञादि धर्मप्रवृत्ति उत्पन्न
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४६६ मनुस्मृतिः [ नवमः कर जीविका करनेवाला ) ब्राह्मण यदि धर्म मर्यादा से भ्रष्ट हो जाय तो राजा उसे भी दण्ड द्वारा शासित करे ॥ २७३ ॥
चौरादि के उपद्रव निवारणादि में सहायक नहीं होने वाले को
ग्रामघाते हिताभङ्गे पथि मोषाभिदर्शने ।
1 दण्ड-शक्तितो नाभिधावन्तो निर्वास्याः सपरिच्छदाः ॥ २७४ ॥
भाष्य — शक्तौ सत्यामालस्यादिना । ते निर्वास्याः । ये तु चौरैः कृतसङ्केतास्तेषां पूर्वत्र वध उक्तो ' घातयेदिति । परिच्छदो गवाश्वादिः । तदपि निर्वास्य नापहर्तव्यम् । नासत्परिच्छदः कर्तव्यो धनं तु हर्तव्यम् ॥२७४ ॥
हिन्दी – चौरादि के द्वारा गाँव के लूटने में, पुल या बाँध के टूटने में ( मेधातिथि के मत से खेत में उत्पन्न अन्न के नष्ट होने में तथा जीविका नाश होने में ) तथा रास्ते में चोर आदि के दिखलाई पड़ने पर यथाशक्ति दोड़कर रक्षा नहीं करनेवाले पार्श्ववर्ती ( समीप में रहने वाले ) लोगों को शय्या, गौ, घोड़ा आदि गृहसाधनों के साथ देश से बाहर निकाल दे ॥२७४ ॥
राजकोष के चोर आदि को दण्ड-राज्ञः कोशापहर्तृश्च प्रातिकूल्येष्ववस्थितान् । घातयेद्विविधैर्दण्डैररीणां चोपजापकान् ॥ २७५ ॥
भाष्य – कोशो राज्ञां धनसञ्चयस्थानं तत्रापहर्तारो द्रव्यजातिपरिमाणानपेक्षमेव वध्याः । ये च प्रातिकूल्येन वर्तन्ते । यद्राज्ञां देशान्तरादानेतुमभिप्रेतं तद्देशदुर्लभमाञ्जनेया-श्वादि प्राच्यानाम् । उद्दीच्यानां कलिङ्गदेशोद्भवहस्त्यादि । तदानयनप्रतिबन्धे ये वर्तन्ते । तथा यानि मित्राणि तानि शत्रून्कुर्वते । कृत्वा शत्रुभिः संयोजयन्ति ।
अरीणामुपजापकाः प्रोत्साहकाः । तान् घातयेत् ।
स्वतन्त्रप्रयोजनत्वान्नावश्यकं घातनमित्युक्तम् ॥२७५ ॥
हिन्दी — राजा के कोष ( खजाने ) से धन चुरानेवाले, राजाज्ञा को मारनेवाले तथा शत्रु पक्षवालों से मिलकर राजकीय लोगों में फूट पैदा करनेवाले लोगों को राजा अनेक प्रकार के ( हाथ - पैर जीभ आदि काटकर ) वध से दण्डित करे ॥२७५ ॥
सेंध मारनेवाले चोर को दण्ड– सन्धिं भित्त्वा तु ये चौर्यं रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः । Pbus तेषां छित्वा नृपो हस्तौ तीक्ष्णे शूले निवेशयेत् ॥ २७६ ॥
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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४६७ हिन्दी — जो चोर रात में सेंध मारकर चोरी करते हैं, राजा उनके हाथों को कटवाकर तेज शूलीपर चढ़ा दे ॥ २७६ ॥
गिरहकट चोर को दण्ड-अङ्गुलीर्ग्रन्थिभेदस्य छेदयेत्प्रथमे ग्रहे ।
द्वितीये हस्तचरणौ तृतीये वधमर्हति ॥ २७७ ॥
भाष्य — ग्रन्थिं भिनत्तीति ग्रन्थिभेदः । ' भेदनं ' मोक्षो ग्रन्थेर्वस्त्रप्रान्तादौ ग्रन्थिः । यद्वा यद्द्रव्यं तत्केनाचिच्छलेन ग्रन्थिमवमोच्य ये निनीषन्ति ते ग्रन्थिभेदाः । तेषां प्रथमायां प्रवृत्तावङ्गुलीनां छेदः । द्वितीयस्यां प्रवृत्तौ हस्तचरणयोः । तृतीयस्यां मारणम् ॥२७७ ॥
हिन्दी – राजा गाँठ काटनेवाले ( गिरहकट या जेबकट ) चोर को पहली बार पकड़े जाने पर उनकी ( अँगूठा तथा तर्जनी ) अङ्गुलियों को कटवा ले, दूसरी बार पकड़े जाने पर उसके हाथ - पैर कटवा ले और तीसरी बार पकड़े जाने पर उसका वध कर दे ॥२७७ ॥
चोरों के सहायक तथा चोरित धन लेने वालों को दण्ड-अग्दिान्भक्तदांश्चचैव तथा शस्त्रावकाशदान् । सन्निधातॄंश्च मोषस्य हन्याच्चौरमिवेश्वरः ॥ २७८ ॥
भाष्य - अग्निदाः शीतापनोदनाद्यर्थं येऽग्निं ददति । शस्त्रं कर्तरिकादि । मोषस्य सन्निधातारः कर्तारः ।
सर्वे चौरवत् ज्ञेयाः ।
शस्त्रावकाशदग्रहणं प्रागुक्तमप्युपसंहारार्थमुच्यते ॥२७८ ॥
हिन्दी – जो लोग ( गिरहकट आदि को जानकर ) अग्नि, अन्न, शस्त्र तथा अवसर ( चोरी का मौका ) देते हों और चुराये हुए धन को रखते हों, राजा उन लोगों को भी चोर के समान दण्डित करे ) ॥२७८ ॥
तडागादि के तोड़ने वालों को दण्ड-तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन वा ।
यद्वाऽपि प्रतिसंस्कुर्याद्दाप्यस्तूत्तमसाहसम् ॥ २७ ९ ॥
भाष्य - तडागग्रहणमुपलक्षणार्थम् । नद्युदकहरणेऽप्ययं दोष इति केचित् ।
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४६८ मनुस्मृतिः ' शिक [ नवमः तदयुक्तम् । महान्हि तडागभेदनेऽपराधः । स्वल्पो नदीभेदने । तडागस्य हि वप्रभे-दनेनोदकेऽप्ययमेव विधिः ॥२७९ ॥
हिन्दी — तडाग ( पोखरा, अहरा आदि सार्वजनीन जलाशय ) के बाँध या पुल तोड़नेवालों को राजा पानी में डुबाकर या दूसरे प्रकार से वध करे अथवा यदि वह उस तोड़े हुए पुल या बाँध को ठीक करा दे तो उसे उत्तम साहस ( ८।१३८ एक सहस्र पण ) से दण्डित करे ॥२७९ ॥
अन्नागारादि तोड़नेवालों को दण्ड-कोष्ठागारायुधागारदेवतागारभेदकान् ।
हस्त्यश्वरथहर्तृश्च हन्यादेवाविचारयन् ॥ २८० ॥
हिन्दी - राजा राज्य के अन्नभाण्डार, शस्त्रागार तथा देवमन्दिर तोड़नेवालों तथा घोड़ा हाथी और रथ आदि चुरानेवालों को बिना विचारे ( दूसरे प्रकार के दण्ड देने का विकल्प छोड़कर शीघ्र ही ) वध करे ॥२८० ॥
विमर्श — आगे ‘ संक्रमध्वजयष्ठीनां ( ९ ।२८५ ) ' वचन से देवप्रतिमा तोड़ने वालों को पाँच सौ पण से दण्डित करने का जो विधान कहा जायेगा, वह वचन इसी वचन से देवमन्दिर तोड़ने वालों को वधरूप दण्ड से दण्डित करने के कारण मिट्टी की बनी हुई पूजाघर त्यक्त प्रतिमा के भेदन करनेवालों के विषय में है, ऐसा समझना चाहिये । व्यक्तिगत तड़ागादि के तोड़ने वाले को दण्ड-यस्तु पूर्वनिविष्टस्य तडागस्योदकं हरेत् । आगमं वाप्यपां भिद्यात्स दाप्यः पूर्वसाहसम् ॥ २८१ ॥
हिन्दी- -पुत्र आदि के लिए बनवाये गये तडाग आदि के पानी को जो कोई चुरावे अर्थात् चोरीकर खेत आदि की सिंचाई करे अथवा उसके पानी जाने के मार्ग को बाँधकर आदि बाँधक रोके या नष्ट कर दे, उस व्यक्ति को राजा प्रथम साहस ( ८।१३८-२५० पण ) से दण्डित करे ॥ २८१ ॥
राजमार्ग को गन्दा करने पर दण्ड-समुत्सृजेद्राजमार्गे
यस्त्वमेध्यमनापदि ।
स द्वौ कार्षापणौ दद्यादमेध्यं चाशु शोधयेत् ॥ २८२ ॥
भाष्य — राजमार्गे ग्रामनगरे रथ्यायाममेध्यं मूत्रपुरीषं समुत्सृजेदन्यतो वाऽऽनीय चण्डालादिभिर्निक्षिपेत् । अनापदि आपद्वेगेनात्यर्थमुक्तं भवति ।
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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ४६ ९ चण्डालादेर्मूल्यं दत्वाऽपासयेत्स्वयं वाऽन्यासम्भवे ॥२८२ ॥
हिन्दी — स्वस्थ रहता हुआ जो व्यक्ति राजमार्ग ( प्रधान सड़क, सार्वजनिक रास्ते ) पर मल - मूत्र कर दे ( या फेंक दे ) राजा उसे दो कार्षापण ( ८।१३६ ) से दण्डित करे तथा उसी से उस मल - मूत्र को शीघ्र साफ करावे ॥ २८२ ॥
आपद्गतोऽथवा वृद्धा गर्भिणी बाल एव वा ।
परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः ॥ २८३ ॥
भाष्य — आपद्गतः पूर्वोक्तः । वृद्धादयो ये बहिर्ग्रामं निर्गन्तुमशक्ताः ते गृह्यन्ते । शोणितमपि कर्तुमित्याशङ्क्य तेऽमेध्यमपि व्यपदेष्टुम् । ‘ न पुनरेवं कर्तव्यम् ’ । पुनःकरणे राजतो महान्प्रत्यवायो भवति क्रोधगर्भमीदृशवचनं परिभाषणम् । तच्च शोध्यमिति राज्ञ उपदेशः । यद्युत्स्रष्टारो न ज्ञायन्ते । तथा च रथ्याचण्डाला-दिभिरपासनीया ॥ २८३ ॥
हिन्दी — रोगी ( या आपत्ति में फँसा हुआ ) बूढ़ा, गर्भिणी अथवा बालक राजमार्गपर मल - मूत्र कर दे ( या कूड़ा - करकट डालकर उसे गन्दा कर दे ) तो ( ' तुमने यह क्या किया, सावधान? फिर कभी ऐसा मत करना ' इत्यादि रूप से ) निषेध कर दे तथा उस स्थान की सफाई करा ले ( उसे आर्थिक दण्ड न दे ) ऐसी शास्त्रमर्यादा है ॥२८३ ॥
I
अज्ञ चिकित्सक को दण्ड-चिकित्सकानां सर्वेषां मिथ्याप्रचरतां दमः ।
अमानुषेषु प्रथमो मानुषेषु तु मध्यमः ॥ २८४ ॥
भाष्य – चिकित्सका भिषजः । तेषां मिथ्याप्रचाराणामौषधदानमुभयथा सम्भ-वति । यदि वाऽविज्ञातशास्त्रप्रयोगतया, शास्त्रे परिचितेऽपि वाऽतत्परतयाऽर्थलिप्सया । अमानुषेषु गवाश्वहस्त्यादिषु । प्रथमः साहसशब्दोनुषक्तव्यः ।
एवं मानुषेषु तु मध्यम इति ।
तथाप्रचारेण यद्याश्वेव विपद्येत तदा महान्दण्डः कल्पनीयः ॥२८४ ॥
हिन्दी — चिकित्सा करनेवाला यदि अज्ञानवश पशुओं की ठीक चिकित्सा न करे तो उसे प्रथम साहस ( २५० पण - ८ । १३८ ) तथा मनुष्यों की ठीक चिकित्सा न करे तो उसे
मध्यम साहस ( ५०० पण - ८ । १३८ ) से राजा दण्डित करे ॥ २८४ ॥
विमर्श - ' चिकित्सक ' शब्द से यहाँ पर दोनों प्रकार के चिकित्सक इष्ट हैं, प्रथम शारीर - चिकित्सक जो औषध देकर शरीर की चिकित्सा करता हो तथा द्वितीय शल्य-
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४७० मनुस्मृतिः [ नवमः चिकित्सक — जो चीर - फार अर्थात् ऑपरेशन करके चिकित्सा करता हो ।
संक्रम तथा प्रतिमादि तोड़ने पर दण्ड-संक्रमध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकः ।
प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पञ्च दद्याच्छतानि च ॥ २८५ ॥
भाष्य — संक्रमः । येन संक्रामन्ति मार्गेणावतरन्ति जलोपस्पर्शादिना निमित्तेन । शुभ्रं वासः । ध्वजः चिह्नं राजामात्यादीनाम् । देवायतनेषु च यष्टिः ।
ईदृशे च प्रतिमानामिति व्याख्यातम् ।
प्रतिकुर्यात्समदधीत प्रत्यापत्तिं नयेत् ॥२८५ ॥
हिन्दी – संक्रम ( नाले या छोटी नहर आदि को पार करने के लिए रखे गये पत्थर या काष्ठ आदि ) ध्वज ( राजचिह्न या देवताकों की ध्वजा ), यष्टि ( जाठ — तालाब, पोखरा, बावली आदि के बीच में गाड़े गये लकड़ी आदि या पत्थर का खम्भा आदि ), प्रतिमा ( मिट्टी आदि की छोटी - छोटी पूजित मूर्तियाँ ) इनको तोड़ने या किसी प्रकार नष्ट करनेवाले से राजा उन्हें ठीक करावे तथा उस व्यक्ति को पाँच सौ पणों ( ८।१३६ ) से दण्डित करे ॥ १८५ ॥
शुद्ध पदार्थ को दूषित करनेवाले को दण्ड–
अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने यथा ।
मणीनामपवेधे च दण्डः प्रथमसाहसः ॥ २८६ ॥
भाष्य — यानि स्वयमदुष्टानि द्रव्याणि लाभार्थी दूषयति । तथा धान्यविक्रयो क्षेत्रे निर्दोषं धान्यमुत्तमं तृणबुसैर्योजयति । कुंकुमादेश्च अकुंकुमादिना द्रव्यान्तरेणैकीकरणम् । मणयो मुक्तास्तेषां भेदनं द्विधाकरणम् । अवेधितव्यप्रदेशेन विध्यते इति अप-वेधः । अनेकार्थत्वाद्धातूनां विध्यते रूपमेतत् । मणयो हीनमध्यमोत्कृष्टतमा भवन्ति । तत्र दण्डकल्पना कर्तव्या । मध्यमेषु मध्यम उत्तमेषूत्तमः ॥२८६ ॥
हिन्दी - शुद्ध पदार्थ में अशुद्ध पदार्थ मिलाकर दूषित करनेवाले, नहीं छेदने योग्य माणिक्य आदि को छेदनेवाले और छेदने के योग्य मोती माणिक्य आदि को ठीक - ठीक योग्य स्थान पर नहीं छेदने वाले व्यक्ति को राजा प्रथम साहस ( ढाई सौ पण ८।१३८ ) से दण्डित करे तथा जिसके उपर्युक्त पदार्थ नष्ट या दूषित हो गये हों उसे उन पदार्थों का मूल्यदेकर वह ( पदार्थ - दूषक मनुष्य ) प्रसन्न करे ॥ २८६ ॥