मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 581–590

मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ५४१ अन्यद्वा धनं गोहिरण्यादि यज्ञोपयोग्यन्यद् वा । विप्रैः पृथिवीपतिर्याच्यो देशे-· श्वरोऽभ्यर्थयितव्यः । अत्र यदुक्तं ‘ न राज्ञः प्रतिगृह्णीयात् ' इति स दुष्टराजविषयः प्रतिषेधो द्रष्टव्यः । तथा चोक्तं “ लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिन ” इति । अदित्सन् याचितः सन् दातुं यो नेच्छति । स त्यागमर्हति । तस्य विषये न ` वस्तव्यम् । अथवा त्यागो हानि: । अन्यस्य चानिर्देशोद्धर्महानिं प्राप्नोति ॥११३ ॥

हिन्दी — धन - धान्य के अभाव से दुःखित परिवारवाले अतएव भोजन, वस्त्र तथा यज्ञादि कार्य के लिए सोना - चाँदी आदि धन चाहनेवाले स्नातक को राजा ( क्षत्रिय ) से भी याचना करनी चाहिये और यदि वह ( कृपणता आदि से ) नहीं देना चाहे तो उससे ( याचना करने ) का त्याग कर देना चाहिये ॥ ११३ ॥

भूमि गौ आदि में पूर्व - पूर्व अल्पदोषता-अकृतं च कृतात्क्षेत्राद्गौरजाविकमेव च ।

हिरण्यं धान्यमन्नं च पूर्वं पूर्वमदोषवत् ॥ ११४ ॥

-भाष्य – अकृतमकृष्टं क्षेत्रं प्रशस्यम् । अजाविकं च भवति । परस्परविशेष उक्तार्थः श्लोको गम्यते ॥११४ ॥

हिन्दी – जोती हुई भूमि की अपेक्षा बिना जोती हुई भूमि, गौ, बकरी, भेंड, सोना, धान्य ( कच्चा - विना सिद्ध हुआ - अन्न ) और पकाया ( सिद्ध ) हुआ अन्न, इनमें से पूर्व-पूर्व निर्दोष अर्थात् कम दोषवाला है ॥११४ ॥

विमर्श - अतएव पूर्व - पूर्व की वस्तु को दान में मिलना सम्भव न हो तभी आगे-आगेवाली वस्तु को दान में ग्रहण करना चाहिये । उदाहरणार्थ- बिना जोती हुई भूमि के नहीं मिल सकने पर जोती हुई भूमि को दान में ग्रहण करना चाहिये, इसी प्रकार बिना जोती हुई भूमि को नहीं मिल सकने पर गौ को दान में ग्रहण करना चाहिये । इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये । सप्तविध धर्मयुक्त धनागम—

सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः ।

प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ ११५ ॥

भाष्य — दायोऽन्वयागतं धनम् । लाभो निध्यादेः । पित्राद्यर्जिताद्वा बन्धात्संविभागः । यद्यपि तत्पित्रादिक्रमायातं तथापि न तद्दायशब्देन शक्यमभिधातुं, बहुसाधारण्यात् । तथा च ' निबन्धो द्रव्यमिति ’

पृष्ठ 582

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५४२ मनुस्मृतिः [ दशम: ( याज्ञ ० २।१२१ ) स्मृत्यन्तरे पठितम् । अथवा मित्राच्छ्वशुरगृहाद्वा यल्लब्धं प्रीत्या स ‘ लाभ: ’ । क्रयः प्रसिद्धः । जयः संग्रामे | प्रयोगकर्मयोगौ कुसीदकृषिवाणिज्यानि । अतश्च वर्णभेदेनैतेषां धर्म्यत्वम् । तत्राद्यास्त्रयः सर्वसाधारणाः । ' जय: ' क्षत्रियस्य । ‘ प्रयोगकर्मयोगौ ’ वैश्यस्य । ' सत्प्रतिग्रहो ' ब्राह्मणस्य विशेषः । सर्ववर्णेऽपि प्राग्दर्शन-न्यायो विभागः । केचित्क्रये विवदन्ते । तन्न युक्तम् । सर्वव्यवहारोच्छेदप्रसङ्गात् । जयं यानबन्धेनापि केचिदिच्छन्ति सर्वविषयम् । तदयुक्तम् । द्यूतधनसय स्मृत्यन्तरेष्वशुद्धित्ववचनात् पाशुकद्यूतेत्यत्र । तथा परे प्रयोगमव्यापारमाहुः । तथा हि प्रयोगो दृश्यते ' ज्ञानपूर्वप्रयोग ' इति । तत्र

शब्दस्य प्रयोग इति गम्यते ।

तथा ‘ कर्मयोगः ’ कर्मप्रचारः ॥११५ ॥

हिन्दी – ( १ ) दाय ( धर्मयुक्त पितृ - सम्पत्ति का भाग ) ( २ ) लाभ ( मूलधन या मित्रादि से प्राप्त ) ( ३ ) खरीदा हुआ, ( ४ ) जय ( धर्मपूर्वक किये गये युद्ध में विजय से प्राप्त ) ( ५ ) प्रयोग ( व्याज अर्थात् सूद आदि के द्वारा प्राप्त ), ( ६ ) कर्मयोग ( खेती तथा व्यापार आदि उद्योग करने से प्राप्त ) ( ७ ) सत्प्रतिग्रह ( शास्त्रोक्त दान से प्राप्त ), ये सात धन के लाभ होने के स्थान धर्मयुक्त कहे गये हैं ॥११५ ॥

विमर्श - इनमें से प्रथम तीन चारों वर्णों के लिए, चतुर्थ केवल क्षत्रियों के लिए, पञ्चम षष्ठ वैश्यों के लिए और अन्तिम ( सातवाँ ) केवल ब्राह्मणों के लिए विहित है । इन सात धनागमों को धर्मयुक्त कहने से अपने लिए विहित धनागम के अभाव में दूसरे के लिए विहित धनागम करने में प्रवृत्त होना चाहिए । जीवन के दस हेतु —

विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्य विपणिः कृषिः ।

धृतिर्भैक्षं कुसीदं च दश जीवनहेतवः ॥ ११६ ॥

भाष्य — सर्वपुरुषाणामापदि वृत्तिरियमनुज्ञायते । तत्र विद्या वेदविद्याव्यतिरेकेण वैद्यकतर्कभूतविषासनविद्या सर्वेषां जीवनार्था न दुष्यति ।

पृष्ठ 583

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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ५४३ शिल्पं व्याख्यातम् । भृतिः प्रेष्यकत्वम् । सेवा परवृत्तानुवृत्तित्वम् । धृतिः संतोषः । दृष्टान्तार्थं चैतत् । अतो यथाविहितवृत्त्यभावेनैते जीवनोपायाः संकीर्यन्ते । पुरुषमात्रविषय-त्वात् ॥ ११६ ॥

हिन्दी - ( १ ) विद्या ( वेद - वेदाङ्गादि का तथा वैद्यक, तर्क, विष - निराकरण आदि की विद्या ) ( २ ) शिल्प ( वस्त्र- तैलादि को सुगन्धित करना ), ( ३ ) भृति ( दूतादि बनकर वेतन लेना ) ( ४ ) सेवा ( दूसरे की दासता नौकरी करना ), ( ५ ) गोरक्षण ( गौ तथा अन्य पशुओं का पालन - संवर्धन आदि ), ( ६ ) व्यापार, ( ७ ) खेती, ( ८ ) धैर्य ( थोड़े धन से भी सन्तोष से निर्वाह करना ), ( ९ ) भिक्षा - समूह और ( १० ) सूद, ये दस जीवन - निर्वाह के हेतु हैं ॥ ११६ ॥

विमर्श - इन जीवन - निर्वाहक कारणों को इस आपद्धर्म के प्रकरण में रहने से जिसके लिए जिस जाति का विधान किया गया है, यदि उससे जीवन - निर्वाह नहीं होता हो तो दूसरे वर्ण के लिए विहित जीवन - निर्वाह साधक कार्य से भी द्विज को जीवन-निर्वाह करना चाहिये । उदाहरणार्थ -- आपद्गत ब्राह्मण को भृतिसेवादि, इसी प्रकार भिन्न वर्ण को भी उक्त व्यावसायान्तर से जीवन - निर्वाह करना चाहिये । ब्राह्मण - क्षत्रिय को सूद लेने का निषेध-ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि वृद्धिं नैव प्रयोजयेत् । कामं तु खलु धर्मार्थं दद्यात्पापीयसेऽल्पिकाम् ॥ ११७ ॥

भाष्य — धर्मार्थमिति पूर्वोक्तैवाऽऽपत्तिवृत्तिर्वेदितव्या । पापीयस इति वचनाद्धार्मिकादल्पाऽपि न ग्रहीतव्या । यदुक्तं ' अध्यापनतुल्यानि कृषिवाणिज्यकुसीदानि ' तदापद्गतेन ॥११७ ॥

हिन्दी— ब्राह्मण तथा क्षत्रिय सूद के लिए धन को कभी भी नहीं देवे, किन्तु इस निकृष्ट कर्म से धर्म के लिए थोड़ी सूद पर ऋण रूप में धन को देवे ॥ ११७ ॥

राजाओं के आपद्धर्म-चतुर्थमाददानोऽपि क्षत्रियो भागमापदि ।

प्रजा रक्षन्परं शक्त्या किल्बिषात्प्रतिमुच्यते ॥ ११८ ॥

भाष्य — राज्ञः क्षीणकोशस्य षड्भागग्रहणापवादश्चतुर्थभागोऽभ्यनुज्ञायते । परिशिष्टोऽर्थवादः ।

पृष्ठ 584

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५४४ मनुस्मृतिः [ दशम: परमिति क्रियाविशेषणं परया रक्षयेत्यर्थः ॥ ११८ ॥

हिन्दी – ( राजा को प्रजा के धान्य का पष्ठांश या अष्टमांश या द्वादशांश लेने का शास्त्रसम्मत ( ७।१३० ) विधान होने पर भी ) आपत्ति काल में ( उतना कर लेने से राज्य-कार्य चलना असम्भव होने पर ) प्रजा के धान्य का चतुर्थांश लेता हुआ और यथाशक्ति प्रजाओं की रक्षा करता हुआ राजा अधिक कर लेने के पाप से छूट जाता ( दूषित नहीं होता ) है ॥११८ ॥

स्वधर्मो विजयस्तस्य नाहवे स्यात्पराङ्मुखः ।

शस्त्रेण वैश्याद् रक्षित्वा धर्म्यमाहारयेद्वलिम् ॥ ११ ९ ॥

भाष्य - विजयशब्देन विजयफलं युक्तं स्वधर्मतया विधीयते । तथा चाहवे न स्यात्पराङ्मुखः । भये उपस्थिते पराङ्मुखो युद्धे न स्यादित्यर्थः ।

अनेन प्रकारेण प्रजा रक्षित्वा वैश्याद्बलिर्हारयितव्यः । वैश्या महाधना भवन्ति ।

ततस्थाहरणे नियुक्ताः कृतापराधा न हन्यन्ते ॥११ ९ ॥

हिन्दी — विजय पाना राजाओं का अपना धर्म है ( प्रजा की रक्षा करते हुए भी यदि राजा को कहीं से भय कारक उपस्थित हो जावे तो उसे ) युद्ध से ( डरकर ) विमुख नहीं होना चाहिये और शस्त्रों से वैश्यों की रक्षाकर उनसे आगे ( १०।१२० ) कहे हुए धर्मयुक्त कर को ( आप्त पुरुषों के द्वारा ) ग्रहण करना चाहिये ॥११९ ॥

आपत्ति में वैश्यों से ग्राह्य राजकर-धान्येऽष्टमं विशां शुल्कं विंशं कार्षापणावरम् । कर्मोपकरणाः शूद्राः कारवः शिल्पिनस्तथा ॥ १२० ॥

भाष्य— धान्यव्यवहारिणां लाभादष्टमो भागो ग्रहीतव्यः । विटशब्दः प्रजावचन: । हिरण्यव्यवहारिणां विंशतितमः । शूद्राः कर्मोपकरणाः कर्म उपकरणमुपकारो येषाम् न ते किंचिद्दापयितव्याः । एवं शिल्पिनः कारवस्तदेवमुक्तं प्राक् ‘ शिल्पिनो मासि-मासि ' इत्यादि । अधिकभागग्रहणार्थोऽयं श्लोकः ॥१२० ॥

हिन्दी - राजा को आपत्तिकाल में वैश्य के धान्य में से आठवाँ भाग ( विशेष आपत्तिकाल में पूर्व ( १०।११८ ) वचन के अनुसार चौथा भाग ) और सोने - चाँदी आदि में से बीसवाँ भाग ( आपत्तिकाल नहीं होने पर पूर्व ( ७।१३० ) वचन के अनुसार पचासवाँ भाग ) कर लेना चाहिये और शूद्र, बढ़ई तथा अन्य कारीगरों से कोई कर नहीं लेना चाहिये; क्योंकि वे तो काम ( बेगार ) के द्वारा ही राजा का उपकार करते हैं ॥ १२० ॥

पृष्ठ 585

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अध्याय: ] शूद्रस्तु ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता

शूद्र के आपद्धर्म-वृत्तिमाकांक्षन्क्षत्रमाराधयेदिति ।

धनिनं वाऽप्युपाराध्य वैश्यं शूद्रो जिजीविषेत् ॥ १२१ ॥

५४५ भाष्य - शूद्रस्तु वृत्तिमाकांक्षेत्तदा क्षत्रमाराधयेत् । वृत्तिग्रहणाज्जीविकार्थमेव

क्षत्राराधनम्, न धर्मार्थम् । ब्राह्मणाराधनं तूभयार्थमपीत्युक्तं भवति ।

एवं धनिनं वैश्यमाराध्य जीवेत् ॥१२१ ॥।

हिन्दी - ब्राह्मण की सेवा द्वारा जीवन निर्वाह नहीं होने से जीविका को चाहनेवाला शूद्र क्षत्रिय अथवा धनिक वैश्य की सेवा करता हुआ जीवन निर्वाह करे ॥ १२१ ॥

शूद्र के लिए ब्राह्मणसेवा श्रेष्ठ—

स्वर्गार्थमुभयार्थं वा विप्रानाराधयेत्तु सः ।

जातब्राह्मशब्दस्य सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ १२२ ॥

भाष्य- : - आराधयेदित्युक्तं भवति । तदाह । जातब्राह्मणशब्दस्य ' ब्राह्मणोऽयमिति ' यदाऽस्य एष शब्दो भवति, तदासौ कृतकृत्यः कृतार्थो वेदितव्यः । अथवा जातब्राह्मणव्यपदेशस्येति व्याख्येयम् । ब्राह्मणाश्रितोऽयमिति यदाऽस्य व्य-पदेशो जायते ॥१२२ ॥

हिन्दी - वह ( शूद्र ) स्वर्ग अथवा स्वर्ग तथा जीविका दोनों के लिए ब्राह्मण की सेवा करे । ‘ यह ब्राह्मणाश्रित है ' इतने से ही शूद्र कृतकृत्य हो जाता है । १२२ ॥

विप्रसेवैव शूद्रस्य विशिष्टं कर्म कीर्त्यते ।

यदतोऽन्यद्धि कुरुते तद्भवत्यस्य निष्फलम् ॥ १२३ ॥

भाष्य – ब्राह्मणशुश्रूषैव मुख्यः शूद्रस्य धर्मः । ततो यदन्यद्व्रतोपवासादि कुरुते तदस्य निष्फलम् ।

न तु दानपाकयज्ञादीनामस्य प्रतिषेधः, प्रत्यक्षविधानात् ।

इतरप्रतिषेधो ब्राह्मणशुश्रूषास्तुत्यर्थः ॥१२३ ॥

हिन्दी — ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है; इसके अतिरिक्त वह शूद्र जो कुछ करता है उसका कर्म निष्फल होता है ॥१२३ ॥

शूद्र की वृत्ति नियत करना—

प्रकल्प्या तस्य तैर्वृत्तिः स्वकुटुम्बाद्यथार्हतः ।

शक्तिं चावेक्ष्य दाक्ष्यं च भृत्यानां च परिग्रहम् ॥ १२४ ॥

पृष्ठ 586

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५४६ मनुस्मृतिः [ दशमः भाष्य— द्विजातीनामयं धर्मः । तस्यवृत्तिः कल्पनीया शुश्रूषमाणस्य । स्व-कुटुम्बादिति पुत्रवदसौ पालनीयः । आत्मीयां शक्तिमवेक्ष्य । दाक्ष्यं च तस्य कार्येषु योगम् । भृत्यानां च पुत्रदाराणां तदीयानां परिग्रहं कियंतोऽस्य भर्तव्या इत्येतदपेक्ष्य सर्वेषां भरणं कर्तव्यम् || १२४ ॥ हिन्दी — ब्राह्मणों को चाहिये कि वे अपनी सेवा करनेवाले शूद्र के लिए उसके काल करने की शक्ति, उत्साह और परिवार के निर्वाह के प्रमाण को ( विचारकर तदनुसार ) उसकी जीविका निश्चित कर दे ॥ १२४ ॥

सेवक शूद्रके लिए उच्छिष्ट अन्नादि देना-उच्छिष्टमन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च ।

पुलाकाश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदाः ॥ १२५ ॥

भाष्य— उच्छिष्टशब्दो व्याख्यातार्थः । अतिथ्यादिभुक्तशिष्टमाश्रिताय शूद्राय दातव्यम् । एवं वासांसि जीर्णानि धौतानि शुक्लानि । पुलाका असारधान्यानि । एवं परिच्छदाः शय्यासनादयः ॥१२५ ॥

हिन्दी — सेवक शूद्र के लिए जूठा अन्न, पुराने वस्त्र, अन्नों के पुआल तथा पुराने खाट, बर्तन आदि ब्राह्मण देवें ॥१२५ ॥

विमर्श — पहले ( ४।८० ) जो शूद्र के लिए इष्टार्थक उपदेश तथा जूठा अन्नादि देने का निषेध किया गया है वह असेवक शूद्र के लिए है, ऐसा समझना चाहिये । शूद्र का मन्त्रहीन धर्मकार्य—

न शूद्रे पातकं किंचिन्न च संस्कारमर्हति ।

नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति न धर्मात्प्रतिषेधनम् ॥ १२६ ॥

भाष्य — सर्वोऽयमनुवादश्लोकः । यदस्याहत्यशृङ्गग्राहिकया न प्रतिषिद्धं, यथा हिंसास्तेयाद्यनादृतवर्णविशेषं सामान्य-शास्त्रप्रतिषिद्धं, न तद्व्यतिक्रमादस्य पापमुत्पद्यते । श्रुतमेवास्य शब्देन यथा हिंसास्ते-यादिस्तत्रास्य भवत्येव दोषः न च संस्कारमुपनयनलक्षणमर्हति । तदुक्तं " त्रयो वर्णा द्विजातय ” इति । एवं नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति स्नानोपवासदेवतार्चनादौ नास्य नित्योऽधिकारो-ऽस्ति । अकरणे न प्रत्यवैति । न धर्मात्प्रतिषेधनम् । येषु स्नानोपवासव्रतादिषु नित्याधिकारो नास्त्यकरणे प्रत्यवायाभावोऽथ निषेधो नास्ति तादृशेभ्यो धर्मेभ्यो न प्रतिषेधः । न चेदृशादस्य प्रति-

पृष्ठ 587

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अध्याय: ] ' मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ५४७ षेधः । अतः शिष्टाप्रतिषिद्धत्वादभ्युदयकामस्य तदनुष्ठानं युज्यते । एवं लशुनादि-भक्षणनिवृत्तिरप्यभ्युदयायास्य वेदितव्या । सामान्यशास्त्रविहितं ' निवृत्तिस्तु महाफलेति ' । अतो न धर्मात्प्रतिषेधनमिति यत्रारम्भः ॥ १२६ ॥

हिन्दी - ( लहसुन, प्याज आदि अभक्ष्य पदार्थ खाने पर भी ) शूद्र को कोई पातक ( दोष ) नहीं होता; क्योंकि इसका ( यज्ञोपवीत आदि ) संस्कार नहीं होता, इसे ( अग्निहोत्र आदि ) धर्मकार्य करने का अधिकार नहीं है और ( पाकयज्ञ आदि ) धर्मकार्य करने का निषेध भी नहीं है ॥१२६ ॥

धर्मेऽप्सवस्तु धर्मज्ञाः सतां धर्ममनुष्ठिताः ।

मन्त्रवर्जं न दुष्यन्ति प्रशंसां प्राप्नुवन्ति च ॥ १२७ ॥

भाष्य — एतदेवाह । धर्ममाप्तुमिच्छन्तोऽभ्युदयकामाः । सतां साधूनां धर्ममनु-ष्ठिताः समाश्रिताः । मन्त्रवर्जं न दुष्यन्ति । अतस्ते अनेकाहोपवासदेवतार्चनगुरु-ब्राह्मणनमस्कारादि सतां वृत्तमाचरन्तो न दुष्यन्ति । प्रशंसां फलं च प्राप्नुवन्ति । न पुनरेतन्मन्तव्यं “ यानि समन्त्रकाणि ब्राह्मणादीनां कर्माणि दर्शपौर्णमासादीनि तानि मन्त्रवर्जं शूद्रस्य न दुष्यन्तीति ” । यतः समन्त्रेषूत्पन्नेषु मन्त्ररहितेनानुष्ठानमशाब्दं स्यात् । मन्त्रवर्जमित्येतस्य दर्शितो विषयः । तथा च भगवान् व्यासः— “ न चेह शूद्रः पततीति निश्चयो न चापि संस्कारमिहार्हतीति । स्मृतिप्रयुक्तं तु न धर्ममश्नुते न चास्य धर्मे प्रतिषेधनं स्मृतम् ” ॥ इति एतदपि यथाविहितानुवाद्येव । लशुनसुरापानादेर्न पतति । संस्कारानर्हतोक्तैव । उक्तं चानुपनीतत्वाच्छ्रुतिविहितधर्माभावे स्मृतिविषये सामान्यविहिता धर्मा यथोक्तप्रकारास्ते नास्य प्रतिषिध्यन्ते । तथा च स्मृत्यंतरं — “ पाकयज्ञैः स्वयं यजेत, अनुज्ञातोऽस्य नम-स्कारो मन्त्र इति ” ( गौतम १०।६४-६५ ) । ये पुनराहुः— “ आवसथ्याधानपार्वणवैश्वदेवान्नपाकयज्ञादिषु शूद्राणां पाक्षिको-ऽधिकारः ” तेषामभिप्रायं न विद्मः । आवसथ्याधानं तावद्गृह्यकारैराम्नातं त्रैवर्णिको-द्देशेनैव । मन्वादिभिश्चनैवमाम्नातम् । तथा केवलं “ वैवाहिकाग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्मेति ” ( ३।६७ ) तत्र नैवाम्नातम् । कुतः शूद्रस्याधानम् । अथ पाकयज्ञविधानादग्न्याधाना-क्षेपस्तदपि न, लौकिकाग्नौ वैश्वदेवो भविष्यति । यावद्वचनं वाचनिकं नान्यदाक्षेप्तु-मलम् । विवाहाग्नावित्यत्रैव प्रदर्शितम् । पार्वणशब्देन च यद्यामावास्यं श्राद्धमुच्यते तद-भ्यनुजानीमः, अष्टकापार्वणश्राद्धवैश्वदेवानां विहितत्वात् । अथ दर्शपौर्णमासौ, तद-पाकृतम् ॥१२७ ॥

हिन्दी – ( अतएव ) धर्म के इच्छुक और जाननेवाले तथा द्विजों के अविरुद्ध

पृष्ठ 588

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५४८ मनुस्मृतिः [ दशमः आचरण करनेवाले शूद्र मन्त्रहीन ( नमस्कारमात्र करके ) पञ्चमहायज्ञों को करते हुए निन्दित ' नहीं होते, अपितु प्रशंसा को प्राप्त करते हैं ॥१२७ ॥

यथा यथा हि सद्वृत्तमातिष्ठत्यनसूयकः ।

तथा तथेमं चामुं च लोकं प्राप्नोत्यनिन्दितः ॥ १२८ ॥

भाष्य — उक्तार्थः श्लोकः ॥१२८ ॥

हिन्दी — परगुणों की निन्दा नहीं करनेवाला शूद्र जैसे - जैसे शास्त्रानुकूल द्विजाचरण को करता है, वैसे - वैसे लोक में प्रशंसित होकर परलोक ( स्वर्ग ) को प्राप्त करता है ।

शूद्र को धनसंग्रह करने का निषेध-शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसञ्चयः ।

शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते ॥ १२ ९ ॥

भाष्य — शक्तेनापि कृष्यादिकर्मणा धनसञ्चयः शूद्रेण न कर्तव्य: । तत्र हेतुस्वरूपमर्थवादमाह । शूद्रो धनं बह्वासाद्य स्वीकृत्य ब्राह्मणानेव बाधते । “ का पुनर्ब्राह्मणानां बाधा ’ ” । महाधनत्वादत्यर्थं ब्राह्मणान्प्रतिग्राहयेत् । शूद्रप्रतिग्रहश्च तेषां प्रतिषिद्धः । तत्र नमित्तभावमापद्यमानो दुष्येत् । एतच्च न विहितं कुर्वतः कर्मदोषाशङ्का । तस्माद्ब्राह्मणान्न परिचरेदित्येषैव बाधा ॥ १२ ९ ॥ हिन्दी— ( धनोपार्जन में ) समर्थ भी शूद्र को धनसंग्रह नहीं करना चाहिये; क्योंकि धन को प्राप्तकर ( शास्त्र का वास्तविक ज्ञान नहीं होने के कारण धनमद से शास्त्र-विरुद्धाचरण तथा ब्राह्मण - सेवा के त्याग करने से ) वह ब्राह्मणों को ही पीड़ित करने लगता है ॥१२ ९ ॥

अध्याय का उपसंहार-एते चतुर्णां वर्णानामपद्धर्माः प्रकीर्तिताः ।

यान्सम्यगनुतिष्ठंतो व्रजन्ति परमां गतिम् ॥ १३० ॥

भाष्य - सम्यगापद्धर्मानुष्ठानात्परमा गतिः प्राप्यते । शरीररक्षणाद्विहितातिक्रमो न भवतीति, युक्ता शुभफलप्राप्तिः । नापगतेनासत्प्रतिग्रहादौ विचिकित्सितव्यमिति शास्त्र-न्यायानुवादः ॥ १३० ॥

१. इदं ‘ नमस्कारेण मन्त्रेण पञ्चयज्ञान्न हापयेत् ' इति याज्ञ ० स्मृ ० ( १।१२१ ) वचनानु-सारेण बोद्धव्यम् ।

पृष्ठ 589

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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ५४ ९ हिन्दी – ( भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि- मैंने ) चारों वर्णों के लिए आपत्ति काल के इस ( १०।८१-१२९ ) धर्म को कहा, इसका यथायोग्य पालन करते हुए वे ( ब्राह्मणादि चारों वर्ण ) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करते हैं ॥१३० ॥

एष धर्मविधिः कृत्स्नश्चातुर्वर्ण्यस्य कीर्तितः ।

अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिं शुभम् ॥ १३१ ॥

इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

भाष्य-- -पाठादेव सिद्धार्थोऽयमिति ॥१३१ ॥

इति श्रीभट्टवीरस्वामिसूनुमेधातिथिविरचिते मनुभाष्ये दशमोऽध्यायः ॥

हिन्दी – ( भृगुजी महर्षियों से पुन: कहते हैं कि मैंने ) चारों वर्णों के सम्पूर्ण धर्म को कहा, इसके बाद ( एकादश अध्याय में ) शुभ प्रायश्चित्त - विधान को कहूँगा ॥

मानवे धर्मशास्त्रेऽस्मिन् वर्णधर्मा हि सर्वशः ।

सिद्धेश्वर्य्याः प्रसादेन दशमे पूर्णतां गता ॥ १० ॥

C

पृष्ठ 590

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॥ अथ एकादशोऽध्यायः ॥

नवविध स्नातक के लिए दान देना-सान्तानिकं यक्ष्यमाणमध्वगं सार्ववेदसम् ।

गुर्वर्थं पितृमात्रर्थं स्वाध्यायार्य्युपतापिनः ॥ १ ॥

न वै तान्स्नातकान्विद्याद्ब्राह्मणान्धर्मभिक्षुकान् ।

निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्याविशेषतः ॥ २ ॥

भाष्य - श्लोकद्वयेन च वाक्यार्थसमाप्तिः । अनेकविशेषणविशिष्टो दानार्थी विधी-यते । सान्तानिकादिभ्यो धर्मार्थं भिक्ष्यमाणेभ्यो निःस्वेभ्यो विद्याविशेषेण दातव्यमिति । संप्रति संप्रदानविशेषणत्वे धर्मभिक्षुकशब्दस्याधिकारसंपादनमपि प्रतीयते । एवं नैवं विशिष्टायाश्चैव निमित्तमिति नैमित्तिको दानाधिकारश्चोच्यते । संतानं प्रजा प्रयोजनमस्येति सान्तानिको विवाहार्थी भण्यते । तत्र हि धनमुप-युज्यते । भवति च पारम्पर्येण संतानप्रयोजनः । धर्मग्रहणात् ‘ कामतस्तु प्रवृत्तानाम् ’ इति द्वितीयादिविवाहप्रवृत्तौ न नियमतो देयमिति । एवं यक्ष्यमाणो नित्ययज्ञाग्निष्टोमाद्यर्थं वृत्तिवचनं यः करोति स वेदितव्यः । अध्वगः क्षीणपथ्योदनः सार्ववेदसो विश्वजिति सर्वस्वं दक्षिणात्वेन दत्तवान्न तु प्रायश्चित्ताद्यर्थम् । स्वाध्यायार्थी । यद्यपि ब्रह्मचारिणोऽध्ययनं विहितं भिक्षाभोजनं च तथापि वस्त्रार्थो-पयोगि धनं दातव्यम् । अथवा गृहीतवेदस्य तदर्थजिज्ञासा भैक्षभुजोऽपि । उपतापी रोगी | स्नातकग्रहणं प्रशंसार्थम् । गुर्वर्थं स्वाध्यायार्थत्वं प्रायः स्नातकविषये विद्यते । ब्रह्मचारिणो गुर्वर्थं कर्तव्य-मिति विहितम् । निःस्वेभ्यो निर्धनेभ्यः । विद्याविशेषतो बहुविद्याय बहु स्वल्पविद्यायाल्पमिति । “ ननु च सर्वमेवेदमप्रकृतं प्रक्रियते । एवं हि प्रतिज्ञातम्, ‘ अत: परं प्रवक्ष्यामि