मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 61–70
मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 61–70
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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ३१ शूरा हि राजानमेकाकिनमुपजप्ता हन्युः । दक्षाः सर्वेऽपि व्युत्थानशीलतया द्वन्द्वोपरिपातमपरिगणय्य स्वामिनः कार्यं काले नातिपातयन्ति ॥६२ ॥
हिन्दी – ( राजा ) उन ( मन्त्रियो ) में से शूरवीर, उत्साही, कुलीन या कुलक्रमागत, शुद्धचित्त ( घूस न लेनेवाले और चोरी अर्थात् गवन नहीं करनेवाले ) मन्त्रियों को धन - धान्य के संग्रह करने में ( सोने आदि के खानों तथा अन्न उत्पादक स्थानों में ) और भीरु ( डरनेवालों ) को महल ( रनिवास, भोजन - गृह, शयन, गृह आदि ) में नियुक्त करे ॥६२ ॥
दूत की नियुक्ति-दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम् ।
इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम् ॥ ६३ ॥
भाष्य — दूतस्यायमधिको गुणः इङ्गिताकारचेष्टज्ञता । परविषये राज्ञो मन्त्रिणां च संधित्सतामिङ्गितानि । दूतस्यादरेण सम्परिग्रहः, विश्वसनम्, मुहुर्मुहुः सम्पूर्णतद्वाक्यस्य तस्य चाभिनन्दनम् । एतानि विपर्यस्तान्युपेक्षेत । आकारः शरीरवैकृत्यं म्लानिर्मुखस्य वर्णवैकृत्यम् । तूष्णींभावो दीर्घोष्णनिःश्वासता । एवमादिविकारैर्दैन्यं सूचयति — ' अस्ति काचिदापदस्य तेनायं विवर्ण ' इति । वाक्यवैशारद्यम्, शारीरसंस्कारः, प्रसन्नमुखता
एवमादि हर्षं सूचयति ।
शुचिः स्त्रीगतेऽर्थे । गमनविशेषैर्यतः स्त्रीसम्बन्धे मन्त्रभेदः परिभवश्च ॥६३ ।
हिन्दी – ( राजा ) सभी शास्त्रों का विद्वान्; इङ्गित ( वचन तथा स्वर अर्थात् काकु आदि अभिप्रायसूचक भाव ), आकार ( क्रमश: प्रेम एवं उदासीनता का सूचक प्रसन्नता एवं उदासीनता ) और चेष्टा ( क्रोधादि का सूचक नेत्रों का लाल होना, भौंह टेढ़ा, करना आदि ) को जाननेवाले, शुद्धहृदय ( राजधन को अधिक व्यय करना स्त्री - आसक्ति, द्यूत, मद्यपान आदि से रहित ); चतुर तथा कुलीन दूत को नियुक्त करे ॥ ६३ ॥
श्रेष्ठ राजदूत का लक्षण-अनुरक्तः शुचिर्दक्षः स्मृतिमान्देशकालवित् ।
वपुष्मान्वीतभीर्वाग्ग्मी दूतो राज्ञः प्रशस्यते ॥ ६४ ॥
भाष्य — अनुरक्तः अहार्यो भवति । दक्षः देशकालौ नातिक्रमति । स्मृतिमान् । अमुषितस्मृतिप्रसङ्गेन स्वामिसंदेशं कथयति । देशकालवित् । देशकालौ ज्ञात्वाऽन्य-दप्यसंदिष्टं तत्कालयोग्यं कथयति । वपुष्मान्स्वीकृतिः । प्रियदर्शनत्वान्निपुणमुचिं वक्ति ।
वीतभीः अनेन निपुणमुच्यते । वाग्ग्मी संदेशस्योत्तरे प्रतिवचनसमर्थो भवति ॥६४ ॥
उक्तानां दूतगुणानां सम्पादनप्रयत्ने प्रयोजनमाह—
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३२ मनुस्मृतिः [ सप्तमः हिन्दी - अनुरक्त, शुद्ध, चतुर, स्मरणशक्ति वाला, देश और काल का जानकार, सुरूप, निर्भय और वाग्मी राजदूत श्रेष्ठ होता है ॥ ६४ ॥
विमर्श - दूत के अनुरक्त होने से शत्रुराजा के लोगों से भी मेल - मिलाप रहने से अधिक कार्यसिद्धि होगी, शुद्ध ( स्त्री तथा धन की आसक्ति से रहित ) होने से धन या स्त्री आदि के लोभ से स्वामिकार्य का नाशक नहीं होगा, चतुर होने से अवसर ( मौका ) पर नहीं चूकेगा, स्मरणशक्तिवाला होने से संदेश को नहीं भूलेगा, देश और काल का जानकार होने से देश - कालानुसार अपने विचार से भी कार्य कर लेगा, सुरूप होने से उनके वचन का प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा, निर्भय होने से अप्रिय तथा कठोर संदेश कहने में भी नहीं चूकेगा और वाग्मी होने से सुन्दर शास्त्र से संस्कृत एवं युक्तियुक्त वचन कहेगा, ऐसे राजदूत से राजकार्य की अवश्य सिद्धि हो जायेगी । [ सन्धिविग्रहकालज्ञान्समर्थानायतिक्षमान् । परैरहार्याञ्छुद्धांश्च धर्मतः कामतोऽर्थतः ॥ १ ॥ ] [
[ हिन्दी— ( राजा ) सन्धि, विग्रह ( आदि षड्गुण – ७।१६० ) तथा समय को जाननेवाले, समर्थ, आयति ( आनेवाला समय ) में समर्थ और धर्म, अर्थ तथा काम से शत्रुओं के द्वारा अपने पक्ष में नहीं किये जानेवाले ( राजदूतों को नियुक्त करे ) || १ ॥ ] [ समाहर्तुं प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविपश्चितः । कुलीनान्वृत्तिसम्पन्नान्निपुणान्कोशवृद्धये ॥ २ ॥ ]
[ हिन्दी — अपना पक्ष प्रबल करने के लिए सब शास्त्रों का ज्ञाता और कोशवृद्धि के लिए कुलीन, अच्छी जीविका ( वेतन ) वाले तथा निपुण ( राजदूतों को नियुक्त करे ) ॥२ ॥ ]
[ आयव्ययस्य कुशलान्गणितज्ञानलोलुपान् । नियोजयेद्धर्मनिष्ठान्सम्यक्कार्यार्थचिन्तकान् ॥ ३ ॥ ]
[ हिन्दी — आय तथा व्यय करने में कुशल ( उचित आय को नहीं छोड़नेवाला तथा अनुचित व्यय को नहीं करनेवाला ), गणितज्ञ, निर्लोभ, धर्मयुक्त और अच्छी तरह कार्य एवं अर्थ का विचार करनेवाले ( राजदूतों को नियुक्त करे ) || ३ || ] [ कर्मणि चातिकुशलान्लिपिज्ञानायतिक्षमान् । सर्वविश्वासिनः सत्यान्सर्वकार्येषु निश्चितान् ॥४ ॥ ]
[ हिन्दी - कार्य ( को करने ) में अत्यन्त चतुर, ( अनेक ) लिपियों को जाननेवाले, भविष्यकाल के लिए समर्थ, सबका विश्वासपात्र, सच्चा, सब कार्यों में निश्चित ( राजदूतों को नियुक्त करे ) || ४ || ]
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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता [ अकृताशाँस्तथा भर्तुः कालज्ञांश्व प्रसङ्गिनः । ३३ कार्य कामोपधाशुद्धान् बाह्यभ्यन्तरचारिणः ॥ ५ ॥ ]
[ हिन्दी — आशा नहीं रखनेवाले स्वामी मुझे कार्य - सिद्धि होने पर कुछ हिस्सा देंगे, या बड़ा पारितोषिक देंगे, ऐसी आशा नहीं रखनेवाले - अन्यथा स्वामी की कार्यसिद्धि होने पर आशानुसार न मिलने से वही राजदूत भारी विरोधी हो सकता है तथा यदि आशा नहीं रखेगा तब सदा अनुकूल ही रहेगा, कालज्ञ ( अवसर नहीं चूकनेवाले ), प्रसङ्गानुसार कार्य करनेवाले; कार्य, काम तथा उपधा ( धरोहर ) में सच्चे और बाहर भीतर आने-जानेवाले दूतों कों नियुक्त करे || ५ || ] [ कुर्यादासन्नकार्येषु गृहसंरक्षणेषु च । ] [ हिन्दी - समीप ( मन्त्री आदि ) के कार्य में तथा अन्त: पुर ( रनिवास ) की यथावत् रक्षा करने में दूतों को नियुक्त करे । ]
सेनापति आदि के कार्य-अमात्ये दण्ड आयत्तो दण्डे वैनयिकी क्रिया ।
नृपतौ कोशराष्ट्रे च दूते संधिविपर्ययौ ॥ ६५ ॥
भाष्य— अमात्ये सेनापतौ दण्डो हस्त्यादिबलमायत्तम्, तदिच्छया कार्येषु प्रवृत्तेः दण्डे वैनयिकी । यो विनेयः स्वपरराष्ट्रगतः स दण्ड्यो यतः । विनयाश्रिता ‘ वैनयिकी ’ । ‘ क्रिया ’ कार्यम् । नृपतौ कोशराष्ट्रे आयत्ते । सञ्चयस्थानं ' कोश: ' ' राष्ट्रं ' जनपदः । द्वे च ते पराधीने न कर्तव्ये । स्वयमेव विलम्भनीयफलग्रासाच्च (? ) । दूते सन्धिविपर्ययौ । प्रियवचनेन स्वामिकार्यप्रदर्शनेन ' सन्धिः ' । तद्वैपरीत्येन
‘ विग्रहः ' । एतदुभयं दूतायत्तम् ॥६५ ॥
एवं दूतार्थानुवादः । एष एवार्थः पुनरुच्यते । हिन्दी — सेनापति के अधीन दण्ड ( हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल सेना ), दण्ड के अधीन विनयकार्य ( सबको विनम्र वश में रखना ), राजा के अधीन कोष तथा राज्य और दूत के अधीन सन्धि और विग्रह होते हैं ॥६५ ॥
दूतप्रशंसा-दूत एव हि संधत्ते भिनत्त्येव च संहतान् ।
दूतस्तत्कुरुते कर्म भिद्यन्ते येन मानवाः ॥ ६६ ॥
भाष्य — दूतः संधत्ते । यथोक्तम् । संहतानेकीभूतान्स एव भिनत्ति । अनुक्त-
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३४ मनुस्मृतिः [ सप्तमः मपि प्रियं संदिशति — प्रतिकूलमनाचरितमित्यादि । सुवर्णादिद्रव्यमप्रतिश्रुतमित्याह, एवं भिनत्ति दूतः । तदेतत्कर्मान्तरमुपदिष्टम्, येन राजानो भिद्यन्ते । वाक्पारुष्यापन्ना एवं सम्भ-वन्ति ॥६६ ॥
अन्यदपि दूतकार्यं दर्शयति । हिन्दी - दूत ही ( शत्रु से ) मेल करा देता है और मिले हुए ( शत्रु ) से विग्रह करा देता है; दूत वह कार्य कर देता है, जिससे ( मिले हुए भी ) मनुष्य ( परस्पर में ) फूट जाते हैं ॥६६ ॥
दूत के अन्य कार्य—
स विद्यादस्य कृत्येषु निगूढेङ्गितचेष्टितैः ।
आकारमिङ्गितं चेष्टां भृत्येषु च चिकीर्षितम् ॥ ६७ ॥
भाष्य — स दूतो यातव्यस्य राज्ञः कृत्येषु कार्येषु ॥ ६७ ॥
हिन्दी - वह ( राजदूत ) इस ( शत्रुराजा ) के कृत्यों ( कर्तव्य अर्थात् धन, स्त्री, पद या राज्य भाग के द्वारा राजदूतों को वश में करना आदि ) में शत्रुराजा के अनुचरों के इङ्गित ( अभिप्रायसूचक बात और स्वर आदि ) तथा चेष्टाओं ( हाथ, मुख, अंगुलि आदि की इशारे वाली ) से ( शत्रुराजा के ) क्षुब्ध या लुब्ध भृत्यों में ( शत्रुराजा के ) आकार ( मुख की प्रसन्नता या उदासीनता आदि ), इङ्गित, चेष्टा और चिकीर्षित ( अभिलषित कार्य ) को मालूम करे ॥६७ ॥
बुध्वा च सर्वं तत्त्वेन परराजचिकीर्षितम् ।
तथा प्रयत्नमातिष्ठेद्यथाऽऽत्मानं न पीडयेत् ॥ ६८ ॥
हिन्दी — शत्रु राजा के चिकीर्षित ( अभिलषित कार्य ) को ठीक - ठीक मालूम कर वैसा प्रयत्न करे जिससे अपने को कष्ट न हो ॥६८ ॥
राजा के निवास योग्य देश-जाङ्गलं सत्यसम्पन्नमार्यप्रायमनाविलम् ।
रम्यमानतसामन्तं स्वाजीव्यं देशमावसेत् ॥ ६ ९ ॥
हिन्दी— ( राजा ) जाङ्गल, धान्य और अधिक धर्मात्माओं से युक्त आकुलतारहित, ( फल - फूल, लता - वृक्षादि से ) रमणीय, जहाँ आस - पास के निवासी नम्र हों, ऐसे अपनी आजीविका ( सुलभ व्यापार, खेती आदि ) वाले देश में निवास करे ॥ ६ ९ ॥ विमर्श -जिस स्थान में बहुत अधिक पानी न हो ( अधिक पानी न बरसता हो या
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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता ३५ अधिक बाढ़ न आती हो ), खुली हवा हो, सूर्य का प्रकाश पर्याप्त रहता हो, धान्य आदि बहुत उत्पन्न होता हो, उसे ' जाङ्गल देश " कहते हैं ।
-राजा के निवास योग्य दुर्गों के नाम-धन्वदुर्गं महीदुर्गमब्दुर्गं वार्क्षमेव वा ।
नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत्पुरम् ॥ ७० ॥
भाष्य — उक्तप्रकारेण द्विगुणोत्सेधेनैष्टकेन शैलेन द्वादशहस्तादूर्ध्वमुद्धतेन ताल-मूलेन कपिशीर्षचिताग्रेण दृढप्रणााल्या परिकृतं धनुर्दुर्गम् । महीदुर्गमगाधेनाश्रयणी-त्येन चोदकेन परिवेष्टितं दुर्गम् । समन्ततोऽर्धयोजनमात्रं घनमहावृक्षान्वितं वार्क्षम् ।
चतुरङ्गबलाधिष्ठितं प्रवरायुधवीरपुरुषप्रायं नृदुर्गम् ।
गिरिपृष्ठे दुरारोहमेवैकमार्गानुगतमन्तर्नदीप्रस्रवणोदकं गिरिदुर्गम् ॥७० ॥
हिन्दी— ( राजा ) धन्वदुर्ग, महीदुर्ग, जलदुर्ग, वृक्षदुर्ग, मनुष्यदुर्ग अथवा गिरिदुर्ग का आश्रयकर नगर ( राजधानी ) में निवास करे ॥७० ॥
विमर्श - धन्वदुर्ग - कम से कम बीसकोस तक पानी ( और हरियाली एवं वृक्ष, घास आदि ) से रहित रेतीली भूमि युक्त स्थान हो । महीदुर्ग — ईंट - पत्थर आदि उभड़ - खाबड़ ( बहुत ऊँचे - नीचे ) होने से विषम, युद्ध के लिए अयोग्य तथा गुप्त गवाक्ष ( छोटे - छोटे छिद्रवाले जँगले ) वाले परकोटा आदि से युक्त भूमि वाला स्थान । जलदुर्ग— चारों तरफ बहुत दूर तक अगाध जल से भरा हुआ स्थान । वृक्षदुर्ग- कम से कम चार कोश तक सघन बड़े वृक्षों, कंटीली झाड़ियों एवं लताओं तथा विषमं नदी - नाले आदि से युक्त देश । मनुष्यदुर्ग — चारों तरफ हाथी, घोड़ा, रथ एवं पैदल सेना एवं दूसरे बहुत मनुष्यों से सुरक्षित स्थान । गिरिदुर्ग — अत्यधिक कठिनाई से चढ़ने योग्य तथा अधिक संकीर्ण मार्ग होने के कारण बहुत कठिनाई से प्रवेश करने योग्य नदियों, झरनों आदि वाले पहाड़ो से युक्त स्थान । इस श्लोक में वर्णित राजनिवासयोग्य स्थानों में यह ' भारतवर्ष ' अत्यन्त सुरक्षित है, जिसके तीन दिशाओं में सुदूर तक अगाधजलपूर्ण हिन्दमहासागर आदि समुद्र तथा शेष उत्तर दिशा में उच्चतम शिखर वाला हिमालय पर्वत - जिसमें खैबर का दर्रा तथा १. तदुक्तम्— ‘ अल्पोदकतृणो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः । स ज्ञेयो जाङ्गलो देशी बहुधान्यादिसंयुतः ॥ ' इति । ( म ० मु ० )
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३६ मनुस्मृतिः [ सप्तमः बोलन अत्यन्त संकीर्ण हैं । किन्तु भारत पाकिस्तान रूप में देश - विभाजन हो जाने से अब वह प्राकृतिक अजय्य सीमा भारत की नहीं रही ।
गिरिदुर्ग की श्रेष्ठता-सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत् ।
एषां हि बाहुगुण्येन गिरिदुर्गं विशिष्यते ॥ ७१ ॥
हिन्दी— ( राजा ) सब प्रयत्न से गिरिदुर्ग का आश्रय करे; क्योंकि इन दुर्गों ( ७।७० ) में से अधिक गुणयुक्त होने से गिरिदुर्ग श्रेष्ठ होता है ॥ ७१ ॥
उक्त दुर्गों के निवासी जीव-त्रीण्याद्यान्याश्रितास्त्वेषां मृगगर्ताश्रयाप्सराः ।
त्रीण्युत्तराणि क्रमशः प्लवङ्गमनरामराः ॥७२ ॥
भाष्य – आद्यानि त्रीणि धनुर्दुर्गादीनि । आश्रिताः आश्रयं कृतवन्तः । मृगाः । गर्ताश्रया गर्गरनकुलादयः । अप्सरा ग्राहकूर्मादयः । एषां दुर्गाणां तदाश्रितानां च
यादृशा गुणदोषास्तादृशा एव राज्ञामपि भवन्तीति प्रदर्शनार्थम् ।
त्रीण्युत्तराणि । प्लवङ्गमाः कपयः ॥ ७२ ॥
हिन्दी — इन दुर्गों ( ७।७० ) में से पहले वाले तीन दुर्गों में ( धन्वदुर्ग, महीदुर्ग और जलदुर्ग में ) मृग, विलों में रहनेवाले ( चूहा, खरगोश आदि ) तथा जलचर ( मगर आदि ) और अन्त वाले तीन दुर्गों में, ( वृक्षदुर्ग, मनुष्यदुर्ग और गिरिदुर्ग में ) वानर, मनुष्य तथा अमर ( देव ) क्रमश: निवास करें ॥७२ ॥
विमर्श - धन्वदुर्ग में मृग, भूमिदुर्ग में चूहा तथा खरगोश आदि बिल में रहनेवाले जीव, जलदुर्ग में मगर, बड़ी - बड़ी मछलियाँ आदि जलचर जीव - वृक्षदुर्ग में वानर ( व्याघ्र, सिंह आदि ), मनुष्यदुर्ग में मनुष्य ( हाथी, घोड़ा रथ एवं पैदल सेना तथा अन्यरक्षक समूह ) और गिरिदुर्ग में देवता ( किन्नर, गन्धर्व आदि ) निवास करें ।
दुर्ग की प्रशंसा-यथा दुर्गाश्रितानेतान्नापहिंसन्ति शत्रवः ।
तथाऽरयो न हिसन्ति नृपं दुर्गसमाश्रितम् ॥ ७३ ॥
भाष्य- - दुर्गविधानप्रयोजनश्लोकोऽयम् । अत्यल्पबला अपि दुर्गाश्रिता महाबलैररिभिर्न सहसा शक्यन्तेऽभिभवितुमतो दुर्गा-श्रयो युक्तः || ७३ || हिन्दी — जिस प्रकार इन ( धन्व आदि ) दुर्गों में रहनेवाले इन ( मृग आदि ) को शत्रु
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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ३७ ( व्याध आदि ) नहीं मार सकते हैं, उसी प्रकार दुर्ग में निवास करनेवाले राजा को शत्रु नहीं मार ( जीत ) सकते हैं ॥७३ ॥
एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः ।
शतं दशसहस्त्राणि तस्माद्दुर्गं विधीयते ॥ ७४ ॥
भाष्य — सुप्रसिद्धमेतद्दुर्गप्रयोजनम् । प्राकारदृष्टान्तेन गिरिदुर्गबलमेतदिति । तदयुक्तम्, महीदुर्गंऽपि प्राकारसम्भवात् । तस्मात्सर्वेषां दुर्गाणां तत्प्रयोजनं स्वबुद्ध्या रूप्यते ॥ ७४ ॥
हिन्दी— ( जिस कारण से ) किले में रहनेवाला एक धनुर्धारी ( योद्धा ) सौ योद्धाओं से और सौ धनुर्धारी योद्धा दस हजार योद्धाओं से लड़ता है, इस कारण राजनीतिज्ञ दुर्ग की प्रशंसा करते हैं ॥ ७४ ॥
[ मन्दरस्यापि शिखरं निर्मानुष्य न शिष्यते । मनुष्यदुर्गं दुर्गाणां तनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥ ]
[ हिन्दी – मनुष्य रहित मन्दर का शिखर भी नहीं बचता ( शत्रुओं से पराजित होता है ), अतएव ब्रह्मा के पुत्र मनु ने मनुष्यदुर्ग को श्रेष्ठ कहा है ॥६ ॥ ]
दुर्ग को अस्त्र - शस्त्रयुक्त बनाना-तत्स्यादायुधसम्पन्नं धनधान्येन वाहनैः ।
ब्राह्मणैः शिल्पिभिर्यन्त्रैर्यवसेनोदकेन च ॥ ७५ ॥
भाष्य- - आयुधैः खङ्गप्रासादिभिः सम्पन्नमुपेतम् । आयुधग्रहणं वर्मशिरस्त्राणो-पस्कारादेरन्यस्यापि युद्धोपकरणस्य प्रदर्शनार्थम् । धनं रूप्यसुवर्णादीनि । वाहनानि रथाश्वादयः । शिल्पिभिर्यन्त्रावाहतक्षप्रभृतिभिः । यवसेन | ब्राह्मणैर्मन्त्रिपुरोहितैरन्यैर्वा । दण्डिकापोतेन (? ) ध्वजशङ्कया कदाचिन्नृपधर्म-साहाय्येन प्रवर्तन्ते ।
प्रदर्शनार्थत्वाच्च भिषगौषधाद्यपेक्षेत । संरोहणाद्युपयोगि संनिधापयितव्यम्॥७५ ॥
हिन्दी – उस ( किला ) को हथियार ( तलवार, धनुष आदि ), धन ( सुवर्ण, चाँदी आदि ), धान्य ( गेहूँ, चावल, चना आदि ), वाहन ( हाथी, घोड़ा, रथ, ऊँट आदि ),
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३८ मनुस्मृतिः [ सप्तमः ब्राह्मणों, कारीगरों, यन्त्रों, चारा ( घास, भूसा, खरी, कराई आदि ) पशुओं के भोज्य पदार्थों ) और जल से संयुक्त रखे ॥७५ ॥
दुर्ग के बीच में राजभवन - निर्माण-तस्य मध्ये सुपर्याप्तं कारयेद्गृहमात्मनः ।
गुप्तं सर्वर्तुकं शुभ्रं जलवृक्षसमन्वितम् ॥ ७६ ॥
सुपर्याप्तम् । यावदात्मनो राज्ञो राजपुत्रकोशायुधाश्वागारादिषूपयुज्यते । गुप्तं बहु-कक्षाकम् । गृहं कारयेत् । सर्वर्तुकं सर्वर्तुमाल्यफलैः शोभितम् । सर्वे ऋतवो यत्रेति । ऋतुशब्देन तत्कार्याणि पुष्पफलादीनि लक्ष्यन्ते । ‘ सर्वर्तुगमिति ’ पाठे सर्वानृतून्गच्छति प्राप्नोतीति व्युत्पत्तिः । अर्थस्तु स एव । यो यत्र भवति स तेन व्याप्त इत्युच्यते ।
शुभ्रं सुधाधवलितम् ।
जलवृक्षसमन्वितं धारागृहोद्यानवनसम्पन्नम् ॥ ७६ ॥
हिन्दी — राजा उस ( किले ) के बीच में ( स्त्री - गृह, देव मन्दिर, अग्निशाला, स्नानागार आदि भवनों के अलग - अलग होने से ) बड़ा, ( खाई, परकोटा अर्थात् चहार-दीवारी, सेना आदि से ) सुरक्षित ( सब ऋतुओं में फलने - फूलनेवाले वृक्ष, गुल्म और लता आदि से युक्त होने से ) सब ऋतुओं के अनुकूल, ( चूना, रंग आदि से उप-लिप्त होने से ) शुभ्र, ( वावली, पोखरा ) जलाशयों तथा पेड़ों से युक्त अपना महल ( राज - भवन ) बनवावे ॥७६ ॥
सवर्णी के साथ में विवाह-तदध्यास्योद्वहेद्भार्यां सर्वणां लक्षणान्विताम् ।
कुले महति सम्भूतां हृद्यां रूपगुणान्विताम् ॥ ७७ ॥
भाष्य- -तद्गृहमाश्रित्य भार्या तत्र सहायार्थं महतः कुलादुद्वोढव्या । एतत्सम्बन्धेन संरक्षणार्थम् । सवर्णामित्यादावुच्यते तत्प्राक् प्रदर्शितम् ।
हृद्यां मनोरमां कान्तिलावण्ययुक्ताम् ।
रूपं संस्थानम् । गुणा वचनाचरणादयः । तैरन्वितां युक्ताम् ॥ ७७ ॥
हिन्दी - ( राजा ) उस महल में निवास कर स्वजातीय, शुभलक्षणोंवाली, श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न, हृदयप्रिय तथा रूप एवं गुण से युक्त स्त्री से विवाह करे ॥ ७७ ॥
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अध्याय: ] ‘ मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता पुरोहित आदि का वरण—
पुरोहितं च कुर्वीत वृणुयादेव चर्त्विजः ।
तेऽस्य गृह्याणिकर्माणि कुर्युर्वैतानिकानि च ॥७८ ॥
३ ९ भाष्य — सत्यपि द्वितीयानिर्देशेन प्राधान्यावगमे विवक्षितमेवैकत्वम्, अन्यत्राप्यु-पादानात् । यूपं छिनत्ति भार्यां विन्देतेतिवत् । ऋत्विजो वृणुयात् । तेषां च सङ्ख्या श्रुतित एवावगन्तव्या । गुणाश्च “ नाति-स्थूलो नातिकृशः नातिदीर्घो नातिह्रस्वः नातिवृद्धो नातिबाल: - — सप्तपुरुषान् विद्यात पोभ्यां पुण्यैश्च कर्मभिः समनुष्ठितोभयभावान् । तान् प्रति नाब्राह्मण्यमाशङ्क्यते— विद्वान्याजयति ' इत्यादि । गृह्याणि कर्माणि शान्तिस्वस्त्ययनादीनि । वैतानिकानि वैहारिकाणि त्रेत्राग्नि-विषयाणि ॥७८ ॥
हिन्दी – ( राजा आथर्वण विधि से ) पुरोहित और यज्ञ कर्म करने के लिए ऋत्विज् को वरण करे तथा वे लोग ( पुरोहित तथा ऋत्विक् ) इस ( राजा ) के शान्तिकर्म तथा यज्ञ कर्म को करते रहें ॥७८ ॥
यज्ञ करना-यजेत राजा क्रतुभिर्विविधैराप्तदक्षिणैः ।
धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद्भोगान्धनानि च ॥७९ ॥
भाष्य — आप्तदक्षिणैर्भूरिदक्षिणैः पौण्डरीकादिभिः । भोगान् धनानि च । वस्त्रगन्धविलेपनादयो भोजनविशेषाश्च ' भोगाः ', ' धनानि ’ सुवर्णादीनि ।
नित्यमेव तद्दानमिच्छन्ति ।
धर्मार्थं तस्योत्पत्त्यर्थमेव ॥७९ ॥
हिन्दी - राजा बहुत दक्षिणा वाले ( अश्वमेध, विश्वजित् आदि ) अनेक यज्ञों को करे और धर्म के लिए ब्राह्मणों को ( स्त्री, गृह, शय्या, वाहन आदि ) भोग — साधक पदार्थ तथा धन देवे ॥७ ९ ॥
भाष्य-कर- ग्रहण-सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारयेहलिम् ।
स्याच्चाम्नायपरो लोके वर्तेत पितृवन्नृषु ॥ ८० ॥
-बलिं करं धान्यादीनां षष्ठाष्टमादिभागमाप्तैरर्थादुपधाशुद्धैः । प मनु II 5
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मनुस्मृतिः ४०
निधिरिव निधिः, उत्तमफलत्वात् ।
ब्रह्मसंनिहितो ब्राह्मः ॥८२ ॥
[ सप्तमः शिण 2. F # यथोक्तमाम्नायपरश्च स्यात् । आगमप्रधानतर्कशास्त्राण्याश्रयेत् ।
अथवा पारम्पर्यागतमेव भागं गृह्णीयान्नाधिकम् ।
वर्तेत पितृवन्नृषु । करदेष्वन्येषु च स्नेहबुद्ध्या वर्तेत ॥८० ॥।
हिन्दी— ( राजा ) विश्वासपात्रों से वार्षिक कर वसूल करावे और लोगों से ( कर लेने ) में न्याययुक्त बर्ताव करे और मनुष्यों में ( राजा ) पिता के समान बर्ताव करे ॥ ८० ॥ TO
अध्यक्षों की नियुक्ति-अध्यक्षान्विविधान्कुर्यात्तत्र तत्र विपश्चितः ।
तेऽस्य सर्वाण्यवेक्षेरन्नृणां कार्याणि कुर्वताम् ॥ ८१ ॥
भाष्य — अध्यक्षा अधिकृताः प्रत्यवेक्षितारस्तान्कुर्यात् । विविधान् बहुप्रकारान् मृदूनुग्रान् धार्मिकान् अर्थार्जनपरांश्च । तत्र तत्र सुवर्णकोष्ठागारे पण्यकुप्यकर्मस्वधिकृताः प्रत्यवेक्षितारस्तान् शुल्क-नौहस्त्यश्वरथपदात्यादीन् विपश्चितः स्थापयेत् । सर्व एते अमात्यगुणसम्पद्युक्ता विज्ञेयाः । यथोक्तमध्यक्षप्रचारे “ तेऽध्यक्षाः सर्वाणि कार्याण्यवेक्षेरन्नन्येषां नृणां तत्स्थानोपयोगिनां कार्याणि कुर्वताम्, हस्त्यध्यक्षेण हस्ति-पकाः अश्वाध्यक्षेण तुरङ्गमाद्याः, गवाध्यक्षेण कर्षणादयः ” ॥८१ ॥
हिन्दी— ( राजा ) उन - उन कार्यों ( सेना, कोष संग्रह, दूतकार्य आदि ) में अनेक प्रकार के अध्यक्षों को नियुक्त करे तथा वे अध्यक्ष इस राजा के सब कार्यों को देखा करे || ८२ ॥ ब्राह्मणों की वृत्तिदान—
आवृत्तानां गुरुकुलाद्विप्राणां पूजको भवेत् ।
नृपाणामक्षयो ह्येष निधिर्ब्राह्मोऽभिधीयते ॥ ८२ ॥
भाष्य — गुरुकुलेऽधीतावगतवेदार्था गार्हस्थ्यं प्रतिपित्सवो धनेन पूजयितव्याः । इदमपि नैय्यमिकदानम् । अत एवाह नृपाणामक्षय इति । नित्यत्वादक्षयो यावज्जीविकः । काम्यत्वे चाफलभावि निवर्तते । यदुक्तं ‘ सांतानिकं यक्ष्यमाणमिति ’ ( ११-१ ), तदेवेदम् । अन्ये त्वाहुः । तत्रार्थिभ्यो दानं विहितम् । इह त्वनर्थिनामधिकारात् विधानमात्रया वस्त्रयुगादिदानेन च नराणां पूजा कर्तव्या । तथा चाह विप्राणां पूजको भवेदिति ।