मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 641–650

मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ६०१ हिन्दी - तब राजा को चाहिए कि [ पूर्व ( ८।१३५ ) वचन के अनुसार उक्त चोर जिस मुसल को कन्धे पर रखकर लाया है, उस ] मुसल को लेकर उससे चोर को स्वयं मारे, उसे मारने ( या मारने के कारण मृततुल्य होने ) से ( वह चोर ) शुद्ध ( पापहीन ) हो

जाता है और ब्राह्मण आगे ( ११।९९ ) कही हुई तपस्या से ही शुद्ध हो जाता है ॥९९ ॥

विमर्श — ‘ ब्राह्मणस्तपसैव तु ' इस चतुर्थ पाद में ' एव ' पद देने से तथा सब पापों में ब्राह्मण को मारने का पहले ( ८। ३८० ) निषेध करने से उक्त चोर ब्राह्मण हो तो उसको मुसल से मारने का विधान नहीं है । भविष्य पुराण में इसी प्रायश्चित्त को कहते समय ' वा ' शब्द से क्षत्रियादि के लिए भी तप का निषेध नहीं है; किन्तु वैकल्पित पक्ष है यह सब मन्वर्थमुक्तावलीकार ने स्पष्ट लिखा है, अतः जिज्ञासुओं को वहीं देखना चाहिये ।

तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम् ।

चीरवासा द्विजोऽरण्ये चरेद्ब्रह्महणो व्रतम् ॥ १०० ॥

भाष्य — इति च द्वादशवार्षिकधर्मानुवादात्तस्यैववातिदेशो न ब्रह्महत्यायाः, प्राय-श्चित्तान्तरम् । ब्रह्महणि यद्व्रतमुक्तं तच्चरेदिति योजना |

अपनुनुत्सुरपनेतुमिच्छुः । शुद्धिं चिकीर्षतीति यावत् ॥ १०० ॥

हिन्दी— ( ब्राह्मण के ) सुवर्ण को चुराने से उत्पन्न दोष को दूर करने का इच्छुक द्विज ( ब्राह्मण आदि तीनों वर्ण ) पुराने वस्त्र को धारण करता हुआ वन में जाकर ब्रह्म-हत्या के लिए कहे गये ( ११।७१ ) प्रायश्चित्त को करे ॥१०० ॥

विमर्श — यह प्रायश्चित्त ब्राह्मण के पाँच रत्ती या अधिक सुवर्ण को चुराने पर है । भविष्यपुराण में तो गुणहीन तथा पापकर्म में तत्पर क्षत्रिय आदि तीनों वर्णों द्वारा गुणवान् ब्राह्मण के पाँच या ग्यारह निष्क ( असर्फी या तोला ) सुवर्ण को चुराने पर आत्मशुद्धि के लिए अग्नि में प्रवेश करके जलकर मरने से उस चोर की शुद्धि कही गयी है I

एतैर्व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः ।

गुरुस्त्रीगमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ॥ १०१ ॥

भाष्य- ' - " ननु च वधेन शुध्यति स्तेनस्तपसा चेति द्वयस्य प्राक्तनत्वादेतैरिति बहुवचनं न सम्यक् ” । एतदेव ज्ञापकं- एष निःशेषोक्तानप्यनुक्तान् कल्पेतानुबन्धाद्यपेक्षया । गुरुस्त्रीगमनप्रयोजनं गुरुस्त्रीगमनीयम् । निमित्तमपि प्रयोजनमुच्यते, प्रयोजयति प्रवर्तयतीति ॥ १०१ ॥

हिन्दी – भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि ) द्विज इन ( ११।९८-१०० ) व्रतों से ( ब्राह्मण के ) सुवर्ण को चुराने से उत्पन्न पाप को दूर करे और गुरु- स्त्रीसम्भोग से उत्पन्न

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६०२ मनुस्मृतिः पाप को इन ( ११।१०२-१०५ ) व्रतों सेदूर करे ॥१०१ ॥

गुरुस्त्री - गमन का प्रायश्चित्त-गुरुतल्प्यभिभाष्यैनस्तल्पे स्वप्यादयोमये । [ एकादश: सूर्मी ज्वलंतीं वाश्लिष्येन्मृत्युना स विशुध्यति ॥ १०२ ॥

भाष्य – गुरुतल्पगः । गुरुतल्पीति वा पाठ: । तल्पीतिमत्वर्थीयेन विशिष्ट एव स्त्रीपुंसयोः संसर्ग उच्यते । गुरुराचार्यः पिता चेति । तल्पशब्दो दारवचन: । आचार्याणीं गत्वेदं प्रायश्चित्तम् । अपरा मातेव मातोसमानजातीयायां गमने । इमानि त्रीणि प्रायश्चित्तानि कल्प्यते बुद्धिपूर्वं च । अभिभाष्यैनः पापं विख्याप्य । तल्पे शयनेऽग्निस्पर्शेऽयोमये शयीत ।

मृत्युना शुध्यतीति वचनात् ।

सूर्मिः तप्ता स्त्रीप्रकृतिरयोमयी तामाश्लिष्येदालिंग्येत् ॥१०२ ॥।

हिन्दी – गुरु ( २।१४२ ) की स्त्री के साथ सम्भोग करनेवाला मनुष्य अपना पाप कहकर तपाये गये लोहे की शय्या पर सोवे तथा जलती हुई लोहमयी स्त्री - प्रतिमा को आलिङ्गन कर मरने से वह पापी शुद्ध ( पापहीन ) होता है ॥१०२ ॥

स्वयं वा शिश्नवृषणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ । नैर्ऋतीं दिशमातिष्ठेदानिपातादजिह्मगः ॥ १०३ ॥

भाष्य — उत्कर्तनं न कल्पेन शोधनम् । शस्त्राद्याक्षिप्तम् । शक्तिः सर्वत्र सह-कारिणी । येन शक्येत छेत्तुं तत्सामर्थ्याल्लभ्यते । प्रत्यग्दक्षिणा नैर्ऋती दिक् । अजिह्मगोऽकुटिलग: । श्वभ्रकूपादि न परिहरेदित्यर्थः । कुड्यादिषु प्रतिपातनं हि तदापाताद्गच्छेदेव ॥१०३ । हिन्दी – अथवा अपने लिङ्ग तथा अण्डकोष को स्वयं काटकर अञ्जलि में लेकर सीधा होकर ( कुटिल भावना का त्यागकर ) जबतक गिरे अर्थात् मरे नहीं तबतक नैर्ऋत्य दिशा की ओर चले ॥ १०३ ॥

विमर्श- ये दोनों ( ११।१०२-१०३ ) प्रायश्चित्त - वचन सवर्ण ( समान जातीय ) गुरुपत्नी में ज्ञानपूर्वक वीर्यक्षरण तक सम्भोग करने पर है 1 खट्वाङ्गी चीरवासा वा श्मश्रुलो विजने वने ।

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अध्यायः ] प्राजापत्यं ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता चरेत्कृच्छ्रमब्दमेकं समाहितः ॥ १०४ ॥

६०३ भाष्य- -अबुद्धिपूर्वकं स्वभार्याभ्रान्त्या गमन इदं प्रायश्चित्तम् । विजातीयगमने बुद्धिपूर्वकमपि । चीरं वस्त्रखण्डम् । श्मश्रुलो रूढश्मश्रुः । समानजातीयाया अपि व्यभिचारिण्या गमने लघ्वेव प्रायश्चित्तम् ॥ १०४ ॥

हिन्दी – अथवा खट्वाङ्ग धारण करता हुआ पुराना वस्त्र पहने एवं केश तथा नख बढ़ाये हुए उस ( गुरुपत्नी - सम्भोगकर्ता ) को निर्जल वन में सावधान होकर एक वर्ष तक

प्राजापत्य नामक ( ११।२१० ) कृच्छ्र व्रत करना चाहिए ॥१०४ ॥

विमर्श — यह प्रायश्चित्त लघु होने से अपनी स्त्री - आदि के भ्रम से अज्ञानपूर्वक गुरुपत्नी के साथ सम्भोग करने पर है ।

चान्द्रायणं वा त्रीन्मासानभ्यस्येन्नियतेन्द्रियः ।

हविष्येण यवाग्वा वा गुरुतल्पापनुत्तये ॥ १०५ ॥

भाष्य- - अतिदिष्टगुरुभावानां मातुलपितृव्यादीनां या भार्यास्तद्गमन इदं प्राय-श्चित्तम् हविष्यं पयोमूलघृतादि । यवागू द्रवपेयादि ॥१०५ ॥

हिन्दी — अथवा — - गुरुपत्नी - सम्भोगजन्य पाप की निवृत्ति के लिए जितेन्द्रिय होकर हविष्यान्न से या नीवार आदि की यवागू ( लपसी ) से तीन मास तक चान्द्रायण व्रत ( १०।२१६-२२० ) करे ॥ १०५ ॥

विमर्श — यह प्रायश्चित्त पूर्व प्रायश्चित्त की अपेक्षा लघुतम होने से असाध्वी या असवर्णा गुरुपत्नी के साथ सम्भोग करने पर है ।

एतैर्व्रतैरपोहेयुर्महापातकिनो मलम् ।

उपपातकिनस्त्वेवमेभिर्नानाविधैव्रतैः ॥ १०६ ॥

भाष्य — उक्तवक्ष्यमाणसंक्षेपवचनोऽयम् ॥१०६ ॥

हिन्दी — भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि इन ( ११।१०७-११८ ) व्रतों से महापातकी ( ११।५३ ) लोग अपने पापों को नष्ट करें तथा उपपातकी लोग इन ( ११।५८-६५ ) अनेक प्रकार के व्रतों से अपने पाप को दूर करे ॥१०६ ॥

उपपातकसंयुक्तो गोघ्नो मासं यवान्पिबेत् ।

कृतवापो वसेद्गोष्ठे चर्मणा तेन संवृतः ॥ १०७ ॥

भाष्य – गोघ्नो गोघाती । मूलविभुजादिदर्शनात्कः । यवान् पिबेदिति यवसक्तुपानं केचिदाहुः । अन्ये तु प्रकृतिशब्दः कार्ये यवाग्वां प्रयुक्तोऽतो यवान् पिष्ट्वा पाययेदित्युक्तं भवति ।

पृष्ठ 644

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६०४ मनुस्मृतिः [ एकादश: पूर्वस्मिन्पक्षेऽश्रुतोदकादिद्रवकल्पना भवति । न हि यवा उदकादिना विना पातुं शक्यन्ते । इह तु लक्षणामात्रम्, अश्रुतकल्पनायाश्च लघ्वी लक्षणा । कृतवपनः कृतमौण्ड्यः । केशच्छेदवचनो वा ।

गोष्ठे यत्र गाव आसते ।

चर्मणा तेन । या न गौर्हता, अपि त्वन्यस्या अपि ॥ १०७ ॥

हिन्दी — उपपातक से युक्त गोघातक शिखासहित मुण्डन कराकर उस ( मारी हुई ) गाय के चमड़े से शरीर को ढककर एक मास ( पतले ) यव को पीता हुआ गोशाला में निवास करे ॥१०७ ॥

चतुर्थकालमश्नीयादक्षारलवणं मितम् ।

गोमूत्रेणाचरेत्स्नानं द्वौ मासौ नियतेन्द्रियः ॥ १०८ ॥

भाष्य — द्वौ मासावेकैकमाहारं भुक्त्वा द्वितीयेऽहनि सायमश्नीयात् । लवणविशेषेण क्षारग्रहणात्सैन्धवस्याप्रतिषेधः । स्वतन्त्रः क्षारप्रतिषेधो हि द्वन्द्वे सति स्यात् । तत्र वचनप्रवृत्तिः पदद्वयस्य च लक्षणार्था । युगपदधिकरणतायां द्वन्द्वः । स्थिते विशेषणसमासे विशिष्टस्यार्थस्य नानुज्ञासम्बन्धः । न समासादिलाघवम् । मितं स्वल्पमित्यर्थः । न यावता तृप्तिर्भवति शरीरस्थितिश्च जायते । गोमूत्रस्नानं त्रिष्वपि कालेषु । चतुर्थकालं द्वौ मासाविति सम्बन्धः । एवं स्मृत्यन्तरे ' कृतवपनो वसेद्गोष्ठे चर्मणा तेन संवृतः । द्वौ मासौ स्नानमप्यस्य गोमूत्रेण विधीयते ' ॥ ‘ पादशौचक्रियाकार्यमद्भिः कुर्वीत केवलम् । ’ न चास्य द्वौ मासावित्यस्यानेन सम्बन्धः सम्भवति । स्नानग्रहणं पादपूरणार्थम् । स्नानकाले यदि पादाद्यशुद्धिर्भवत्यर्थात्तदुदकेनैव द्रव्यशुद्धिविधिना शोधनीयम् । अत आचमनमपि शुद्ध्यर्थमुदकेनैव स्नानकाले । अन्यदा मृदा शुद्धिः सा मृद्वारिक्रमेणैव कर्तव्या । स्नानविधौ गोमूत्रश्रवणादाचमनादौ कः प्रसङ्गः । स्नानेऽपि प्रायश्चित्ताङ्गेन शुद्ध्यर्थम् ॥ १०८ ॥

हिन्दी — इसके बाद दो मासतक ( द्वितीय तथा तृतीय मास में ) गोमूत्र से स्नान करता हुआ जितेन्द्रिय होकर चौथे काल ( आज प्रातः काल भोजन कर फिर दूसरे दिन सायङ्काल इसी क्रम से सर्वदा ) कृत्रिम नमक से रहित ( सेंधा नमक खाया जा सकता है ) थोड़ा हविष्यान्न भोजन करे ॥ १०८ ॥

दिवानुगच्छेद्गास्तास्तु तिष्ठन्नूर्ध्वं रजः पिबेत् ।

पृष्ठ 645

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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ६०५ शुश्रूषित्वा नमस्कृत्य रात्रौ वीरासनो वसेत् ॥ १० ९ ॥ भाष्य — यासां गवां स्थाने वसति ताश्चरितुं गच्छन्तीः पश्चाद्गच्छेत् । तच्छब्देन प्रत्यवमर्शाद्यासां गृहे स्थितस्तासाम् । अन्यासां गच्छन्तीनां न भवत्यनुगमनम् । ताभिः समुत्थापितं रजो रणेरूर्ध्वं । गच्छन् पिबेत् । एवं तत्रैव ताभिः सह दिवसं विहृत्य ताभिरेव सह पुनर्गोष्ठमागच्छेत् । शुश्रूषयित्वा कण्डूकर्षणरजोपनोदनेनोपगच्छन् ।

नमस्कृत्य जानुशिरसा प्रणामं कृत्वा ।

वीरासनो वसेत् । भित्तिशय्यादावनिषद्य यदुपविष्टस्यावस्थानं त‘द्वीरासनम् ॥१० ९ ॥

हिन्दी — दिन में प्रात: काल ( चरने के लिए वन आदि को जाती हुई ) गायों के पीछे - पीछे जाय और रुककर उनके खुरों के आघात से उड़ती हुई धूलिका पान करे तथा ( मच्छर हांकने आदि से ) उनकी सेवा तथा नमस्कार करके रात्रि में ( उनके रक्षार्थ ) वीरासन से बैठे ॥१०९ ॥

तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वप्यनुव्रजेत् ।

आसीनासु तथासीनो नियतो वीतमत्सरः ॥ ११० ॥

भाष्य- तिष्ठन्तीत्येवमादिको विधिः । यत्र काश्चित्तिष्ठन्ति काश्चिद्व्रजन्ति काश्चिद्वाऽऽसते तत्र भूयसीनां धर्मं समाश्रयेत् । वीतो मत्सरो लोभो यस्येति । प्रदर्शनार्थं चैतत् । त्यक्तरागादिमनोदोष इति यावत् । नियतेन्द्रियवचनात् ॥११० ॥

हिन्दी — पवित्र तथा क्रोधरहित होकर उन गायों के खड़ा होने पर खड़ा होवे, चलने पर चले तथा बैठने पर बैठे ' ॥ ११० ॥

आतुरामभिशस्तां वा चौरव्याघ्रादिभिर्ययैः ।

पतितां पङ्कलग्नां वा सर्वप्राणैर्विमोचयेत् ॥ १११ ॥

भाष्य – आतुरां व्याधिताम् । अभिशस्तां गृहिताम् । भयैर्व्याघ्रादिनिमित्तैः । सर्वेण सामर्थ्येन प्राणशब्दोच्छ्वासपवन एव । ' अल्पप्राणो महाप्राण ' इति स्थूले बलवति च प्रयोगदर्शनात् । तेन स्वयमशक्तेन सहायकोपादानेनाप्युद्धारः कर्तव्यः ॥ १११ ॥

१. तथा च दिलीपकर्त्तृकनन्दिनीसेवाप्रसङ्गे महाकविकालिदासः— स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां निषेदुषीमासनबन्धधीरः । जलाभिलाषी जलमाददानां छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् ॥ इति ( रघु ० २।६ )

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६०६ मनुस्मृतिः [ एकादश: हिन्दी — रोग या चोर अथवा व्याघ्रादि हिंसक जन्तुओं से भयभीत या गिरी हुई या कीचड़ आदि में फँसी हुई गौ की सब उपायों से रक्षा करे ॥ १११ ॥

उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् ।

न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥ ११२ ॥

भाष्य - उष्णेन भृशं तपत्यादित्ये वर्षति पर्जन्ये शीते वा मारुते वाति वायौ भृशमिति ॥ ११२ ॥

हिन्दी — गर्मी, वर्षा या शीत रहने पर या आँधी चलने पर यथाशक्ति गौ की विना रक्षा किये अपनी रक्षा न करे ॥ ११२ ॥

आत्मनो यदि वाऽन्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवा खले ।

भक्षयन्तीं न कथयेत्पिबन्तं चैव वत्सकम् ॥ ११३ ॥

भाष्य- - व्रीह्यादिभक्षयन्तीं गां वा वारयेत् । न चान्यानाचक्षीत निवारणार्थम् । यदि तु बध्नीयात् आशंक्यते बाधेति तृप्त्या तदा पूर्वोक्तकरणे न दोषः । तदनुग्रहो

विधीयते ।

एवं पिबन्तं वत्सकमपि ॥११३ ॥

हिन्दी – अपने या दूसरे घर, खेत या खलिहान में खाती हुई गाय को तथा पीते हुए बछड़े को ( किसी से रोकने के लिए ) न कहे ॥ ११३ ॥

अनेन विधिना यस्तु गोघ्नो गामनुगच्छति ।

स गोहत्याकृतं पापं त्रिभिर्मासैर्व्यपोहति ॥ ११४ ॥

हिन्दी – इस विधि ( ११।१०७-११३ ) से जो गोघातक तीन मास तक गौ का अनुसरण ( सेवन ) करता है, वह गोहत्या से उत्पन्न पाप को नष्ट कर देता है ॥११४ ॥

वृषभैकादशा गाश्च दद्यात्सुचरितव्रतः ।

अविद्यमाने सर्वस्वं वेदविद्भ्यो निवेदयेत् ॥ ११५ ॥

भाष्य - दश गावो देया एको वृषभः । शक्तौ चत्वारि व्रतानि । अविद्यमाने गदितधने ततो न्यूनं सर्वस्वं देयम् । वेदविद्भ्य इति बहुश:, न द्वयोरेकस्मिन् वा । ' वेदविद्'ग्रहणं न बहुवचनार्थमनु-वादो वेदविदामेव पात्रतयोक्तत्वात् । १. नदिन्याः सेवापरायणो दिलीपो मायाकृतसिंहात्तां रक्षितुं स्वशरीरमेवापर्ययामासेति रघुवंश-द्वितीयसर्गकथा ( २।२६-५९ ) द्रष्टव्या ।

पृष्ठ 647

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अध्याय: ] ' मेधातिथि’भाष्य'मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ६०७ यत्तु स्मृत्यन्तरे ‘ दहनवाहनबन्धनदामपाशयोजनतैलौषधादियोगे मृते स्रशिखं वपनं कृत्वा प्राजापत्यं चरेत्ततश्चैलखण्डं दद्यादिति ' यो नातिप्रयत्नेनैतासु क्रियासु प्रवर्तते तस्य प्रमादजेऽपराधे प्रायश्चित्तमेतत् । यतः-‘ यंत्रणे गोश्चिकित्सायां गूढगर्भविमोचने । यत्ने कृते विपत्तिः स्यात्प्रायश्चित्तं न विद्यते ' । ' औषधं स्नेहमाहारं दद्याद्गोब्राह्मणेषु यः । दीयमाने विपत्तिः स्यान्न स पापेन लिप्यते ॥ ' इति सांवर्तम् । तथाऽस्य मासेन शुद्धिरुक्ता ' पंचगव्यं पिबेत् षष्ठे काले पयः समाप्ते ब्राह्मणां-स्तर्पयेत् । तिलधेनुं च दद्यात् ' । तथान्याऽर्द्धमासेन ‘ सक्तुयावकशाकपयोदधि घृतं सकृदिति ' । विकल्पानेतान्व-क्ष्यामि । येन द्रव्येण यः प्रयोग आरब्धः स तेनैव समापनीयो न तु कस्मिंश्चिदह्नि सक्तवः कस्मिंश्चिद्यावकादीनीति । ब्रीहिभिर्यजेत येवैर्वेति विकल्पितेऽपि द्रव्यद्वये न व्रीहिषूपपन्नेष्विच्छया चैतेषां वा विनाशे यवा उपादीयन्ते । प्रतिनिधिनैवं प्रयोगसमाप्तिः । तत्रापि गोदानं विहितम् । तथैतावन्त्येव तपांस्यतो वत्ससहितां गां दद्यादिति । अत्रोक्तं गोतमीये ( २२।१८ ) च ' गां वैश्यवदिति ' । यत्र श्रोत्रियस्य यज्ञविदुषोऽ-ग्न्याहितस्य दोग्ध्रीं बहुक्षीरां बालवत्सां निर्धनस्य गां हत्वा गौतमीयं, क्षेत्रारामादौ व्रीह्यादिषु च प्रविश्य तन्निवारणार्थं प्रद्रुते ' मा मारयाम्येनामिति ' अनया बुद्ध्या कथंचिन्मृतायामिदं मासिकम् । तथाऽश्रोत्रियस्य जरत्या अक्षीरायाश्च बुद्धिपूर्ववधे त्रैमा-सिकम् । सर्वतो निर्गुणाया निर्गुणस्वामिकाया अबुद्धिपूर्ववधे प्राजापत्यम् । तस्या एव बुद्धिपूर्वमृतायां त्रैमासिकमिति ॥११४-११५ ॥ हिन्दी – इस प्रकार ( ११।१०७-११३ ) व्रत को समाप्तकर दश गाय तथा एक बैल ब्राह्मण के लिए दान कर देवे तथा इतनी सम्पत्ति नहीं होने पर अपना सर्वस्व ( सब धन ) वेदज्ञाता ब्राह्मण के लिए दान कर दे ॥ ११५ ॥

एतदेव व्रतं कुर्युरुपपातकिनो द्विजाः ।

अवकीर्णिवर्जं शुद्ध्यर्थं चान्द्रायणमथापि वा ॥ ११६ ॥

भाष्य – एतदेवेति गोघातकप्रायश्चित्तं सर्वेषूपपातकेष्वतिदिशति । वैकल्पिकं चान्द्रायणमपि । उपपातकित्वे विशेषोपदेशान्न गोघ्नस्य चान्द्रायणमिच्छन्ति । तेषामुपपातकित्व-वचने गोघ्नस्य प्रयोजनं मृग्यम् ॥११६ ॥

पृष्ठ 648

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६०८ मनुस्मृतिः [ एकादश: हिन्दी — अवकीर्णी ( ११।११ ९ ) छोड़कर शेष उपपातक ( ११।५८-६५ ) करनेवाला मनुष्य गोहत्या निवारक इसी ( ११।१०७-११४ ) व्रत को करे अथवा चान्द्रायण व्रत ( ११।२१५-२१८ ) को करे ।११६ ॥

अवकीर्णि का प्रायश्चित्त-अवकीर्णी तु काणेन गर्दभेन चतुष्पथे ।

पाकयज्ञविधानेन यजेत निर्ऋतिं निशि ॥ ११७ ॥

भाष्य— ' अवकारो’ऽ ' वकीर्णो ' ब्रह्मचारिणो व्रतानि तस्यातिक्रमः स्त्रीसंप्रयोग-लक्षणः सोऽस्यास्तीत्यवकीर्णी । वक्ष्यति ' कामतो रेतसः सेकमिति ' । काणेन गर्दभेनेति सगुणद्रव्यनिर्देशः । चतुष्पथेनेति देशस्य । निशीति कालस्य । नैर्ऋतमिति देवतायाः । पाकयज्ञविधानेनेतीतिकर्तव्यताविधानम् । “ ननु पशुयागा अग्निष्टोमीयपशुसाध्या अग्निषोमीयपशुप्रकृतयः ” । सत्यम् । स एव पाकयज्ञप्रकृतिः । सत्यधिकारे हि सः । उक्तं च ' पशुरपि द्रवति

पयोऽपि द्रवतीति ’ । ‘ पाकयज्ञा: ' पूर्णमासादयः ॥ ११७ ॥

हिन्दी – ‘ अवकीर्णी ’ ( ११।१ ९ ) पुरुष रात में काने गधे ( की चर्बी ) से चौरास्ते पर पाकयज्ञ की विधि से ' निर्ऋति ' नामक देवता के उद्देश्य से यज्ञ करे ॥ ११७ ॥

हुत्वाऽनौ विधिवद्धोमानंततश्च समेत्यृचा ।

वातेन्द्रगुरुवह्नीनां जुहुयात्सर्पिषाऽऽहुतीः ॥ ११८ ॥

भाष्य — अग्नौ यदा होमम् । अग्निहोमाश्च ' हृदयस्याग्र ' इति । अन्ततः समाप्तेषु होमेषु मरुद्भ्य इन्द्राय बृहस्पतयेऽग्नयेऽप्याहुतीर्जुहुयात् । ‘ सम् ’ इत्य - नया । ‘ सं मा सिञ्चन्तु मरुतः समिन्द्रः सं बृहस्पतिः । संचायमग्निः सिञ्चतु प्रजया च धनेन च । ' ( अथर्ववेद ७ । ३३ । १ ) इत्येतया जुहुयात् ।

मान्त्रवर्णिकत्वात् देवतानां श्लोके ' वातगुरुशब्दौ मरुद्बृहस्पतिशब्दलक्षणौ ।

अतो वातादिषु स्वाहाकारादौ मरुबृहस्पतिशब्दौ प्रयोक्तव्यौ, न वातगुरुशब्दौ ॥११८ ॥।

हिन्दी – ( पूर्व ( ११।११७ ) वचन के अनुसार काने गधे की चर्बी से ) विधिपूर्वक ‘ निर्ऋति ' नामक देवता के उद्देश्य से हवनकर ' समासिञ्चन् मरुतः.. इस मन्त्र से वायु, इन्द्र, गुरु तथा अग्नि के उद्देश्य से घी की आहुति देकर हवन करे ॥ ११ ९ ॥

अवकीर्णी का लक्षण-कामतो रेतसः सेकं व्रतस्थस्य द्विजन्मनः ।

अतिक्रमं व्रतस्याहुर्धर्मज्ञा ब्रह्मवादिनः ॥ ११ ९ ॥

पृष्ठ 649

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अध्याय: ] ' मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता ६० ९ भाष्य- -अवकीर्णिपदार्थनिरूपणम् । अतश्चोपात्तव्रतातिरिक्तविषय एवं विज्ञायते । व्रतस्थस्येति ब्रह्मचर्याश्रमस्थस्येति, स्मृत्यन्तरदर्शनाद्विज्ञेयम् ।

रेत: सेकस्त्वस्यैव विशेषतः प्रतिषिद्धोऽन्तरेणापि स्त्रीसंप्रयोगम् ।

कामतः सेके विधिरयम् ॥११९ ॥

हिन्दी — ब्रह्मचर्यावस्था में रहनेवाला जो द्विज इच्छापूर्वक ( स्त्री ' के साथ सम्भोग करता हुआ ) वीर्यपात कर ( ब्रह्मचर्य व्रत को भंग करता है, उसे ' अवकीर्णी ' कहते हैं ॥ ११ ९ ॥

वायु आदि के उद्देश्य से हवन करने में कारण-मारुतं पुरुहूतं च गुरुं पावकमेव च ।

चतुरो व्रतिनोऽभ्येति ब्राह्मं तेजोऽवकीर्णिनः ॥ १२० ॥

भाष्य- - ' जुहुयादाहुतीरिति ' विधेरर्थवादः । व्रतिनः सत अवकीर्णिनः यत् ब्राह्मं तेजो विविधविज्ञानोपार्जितं पुण्यं तद्देवतां देवतामुपैत्युपसंक्रामति । तत्र लयं

गच्छतीति यावत् । व्रतिनोपैतीति विवक्षितम् ॥ १२० ॥

हिन्दी - व्रती ( ब्रह्मचर्य व्रतवाले ) का नियमानुष्ठान तथा वेदाध्ययन आदि से उत्पन्न तेज वायु, इन्द्र, गुरु तथा अग्नि, इन चारों के पास जाता है ( अतएव इन चारों के उद्देश्य से ‘ अवकीर्णी ’ को आहुति देने का पूर्व ( ११।११८ ) वचन से विधान किया गया है ) ॥१२० ॥

एतस्मिन्नेनसि प्राप्ते वसित्वा गर्दभाजिनम् ।

सप्तागारांश्चरेद्भैक्षं स्वकर्म परिकीर्तयन् ॥ १२१ ॥

भाष्य - वसित्वा आच्छाद्य ।

स्वकर्मावकीर्णोऽस्मीत्येवम् ॥१२१ ॥

हिन्दी— ( इस ( ११ । ११ ९ ) पाप के करने पर पूर्वोक्त ( ११।११७-११८ ) विधि से याग तथा हवन करके वह क्षतव्रत ब्रह्मचारी ) गधे का चमड़ा ओढ़कर अपने पाप को कहता हुआ सात घरों में भिक्षा माँगे ॥ १२१ ॥

तेभ्यो लब्धेन भैक्षेण वर्तयन्नेककालिकम् ।

उपस्पृशंस्त्रिषवणमब्देन स विशुध्यति ॥ १२२ ॥

– प्रातर्मध्याह्नापराह्नेषूपस्पृशन् स्नानं कुर्वन् । संवत्सरेण पूतो भवति ॥१२२ ॥

भाष्य-१. तदुक्तम् — ‘ अवकीर्णी ' भवेद् गत्वा ब्रह्मचारी तु योषितम् ' । इति ।

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६१० मनुस्मृतिः [ एकादश: हिन्दी- - उन सात घरों से मिले हुए भिक्षान्न को एक शाम खाता हुआ तथा त्रिकाल ( प्रात:, मध्याह्न तथा सायंकाल ) स्नान करता हुआ वह ' अवकीर्णी ' एक वर्ष में शुद्ध ( पापरहित ) हो जाता है ॥ १२२ ॥

जातिभ्रंशकर कर्म का प्रायश्चित्त-जातिभ्रंशकरं कर्म कृत्वाऽन्यतममिच्छया ।

चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं प्राजापत्यमनिच्छया ॥ १२३ ॥

भाष्य — समाप्तान्युपपातकानि । अन्यतममित्यनुवादः । न हि निमित्तानां समाहारसम्भवः । समुदायविवक्षायां न च कस्यचित्प्रायश्चित्तमुपदिशति । को हि मनुष्यः सर्वाणि जातिभ्रंशकराण्यकार्याणि कुर्यात् । एक एव शब्दः प्रायश्चित्तानुदेशेऽशास्त्रताप्रसंग: । न च साहित्यविवक्षाऽप्युक्ता, लक्षणत्वेन श्रवणात्पुरुषं प्रति निमित्तानाम् । अतः प्रत्येकं वाक्यपरिसमाप्तिः ‘ यस्य पितामहः सोमं न पिबेदि’त्यन्यतरस्य पितुः पितामहस्य वा सोममपीतवतो भवत्येव पशुः । यथा सत्यप्युभयश्रवणे वद्युभयं हविरार्तिमियादित्यन्यतरहविर्विनाशेऽपि भवत्येव पंचशरावः, एवं सर्वप्रायश्चित्तेषु द्रष्टव्यम् । इच्छयेति विवक्षितम् । अनिच्छ्येति च । प्राजापत्यसान्तपनयोः स्वरूपं वक्ष्यति ॥ १२३ ॥

हिन्दी – जातिभ्रंशकर कर्मों ( ११।६६ ) में से किसी एक को ज्ञानपूर्वक करनेवाला •. मनुष्य सान्तपन कृच्छ्र ( ११।२११ ) तथा अज्ञानपूर्वक करनेवाला प्राजापत्य ( ११।२१० ) व्रत को करे ॥१२३ ॥

सङ्करीकरणादि का प्रायश्चित्त-सङ्करापात्रकृत्यासु मासं शोधनमेन्दवः ।

मलिनीकरणीयेषु तप्तः स्याद्यावकैस्त्र्यहम् ॥ १२४ ॥

भाष्य – सङ्करीकरणमपात्रीकरणं पूर्वमुक्तेनेति । एवं सङ्करापात्रकृत्यास्विति संज्ञिभेदाद्बहुवचनम् । कृत्याशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । ‘ कृत्यं ’ कारणम् । ऐन्दवो मासः चान्द्रायणः ।

यावको यवविकारः पेयलेह्यादिः ।

अत्राविशेषश्रवणेऽपीच्छानिच्छयोर्गुरुलघुभावो विज्ञेयः ॥१२४ ॥

हिन्दी – ( ज्ञानपूर्वक ) सङ्करीकरण ( ११।६७ ) तथा अपात्रीकरण ( ११।६८ ) कर्मों में से किसी एक कर्म को करनेवाला एक मास तक चान्द्रायण ( ११।२१५-२१९ ) व्रत