मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री — पृष्ठ 741–750
मनुस्मृति २ हरगोविन्द शास्त्री · पृष्ठ 741–750
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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासंहिता ७०१ धारी संवत्सर ), पितर ( सोमप आदि ) और साध्य ( देवयोनि - विशेष ) - ये मध्यम सात्त्विकी गतियाँ हैं ॥४९ ॥
उत्तम सात्त्विकी गति—
ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च ।
उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः ॥ ५० ॥
भाष्य- विश्वसृजो मरीच्यादयः प्रजापतयः । धर्मो वेदार्थः । पूर्वं वेदस्वरूपमुक्तमिदानीं तदर्थः । स्वरूपादर्थः प्रधानतर इत्युक्तं भवति । अथवा धर्माः सत्यादयश्च । विग्रहवत्वं पूर्ववद्द्रष्टव्यम् । महानिति संज्ञान्तरम् । अव्यक्तं प्रधानं प्रकृतिरित्येकोऽर्थः । " ननु च सत्त्वाधिक्ये प्रधानस्य तद्विकारत्वाज्जगतः सर्वेषां विकाराणां सत्त्वाधिक्यं प्राप्तम् । ततश्च रजस्तमसोः कुतोऽतिरेकः । अतो यदुक्तं ' यो यदेषां गुणो देहे साक-ल्येनातिरिच्यत ' इति तदनुपपन्नम् ” । उच्यते । नैतदेवं परं प्रधानरूपता प्राप्या । किं तर्हि? त्रयः प्रकाराः सम्भवन्ति । यदि वा प्राप्योऽव्यक्तभावो, यदि वादृष्टविधिः, यदि वा नैवायं सांख्ये यः प्रधानेऽव्यक्त-शब्दो वर्तते । क्रियानिमित्तो ह्ययम् । नास्य व्यक्तिर्विद्यत इति अस्फुटप्रकाशत्वादव्यक्तम् ' । तथा च परमात्मनि वृत्तिर्भवति । महत्त्वं च तस्य विभुत्वादुपपद्यत एव । “ ननु च नैवास्य सात्त्विकी गतिः ” । अगुणत्यागाच्चाप्येवम् । यदा हि ' नाहं न मम किंचिदिति ' मुक्ताहंकारममकारो भवति तदा ब्रह्मता भवतीति विज्ञायते । निदिध्यासनयैव ब्रह्मप्राप्तिः । किन्तु सत्त्वप्रधाना एव ज्ञानादितत्परा भवन्ति । न तामसा राजसा वेति । एवं कृत्वोच्यत ' उत्तमा सात्त्विकी गतिः ' । अन्यौ पक्षावनुपपन्नौ । न हि प्रधानभावं प्राप्य काचित्पुरुषार्थसिद्धिः । अचेतनं हि तद्व्यपदिशन्ति । अचैतन्यं स्थावरेभ्योऽपि निकृष्टतरं यदधीना हि मदमूर्च्छावस्थाः केचिदर्थयन्ते । दृष्टविधिस्तु नैव सम्भवत्यश्रुतत्वात् ‘ आत्मा वारे द्रष्टव्य ' इति ( बृहदारण्यक अ ०२ ब्रा ०५ ) श्रुतिः न प्रधानं द्रष्टव्यमिति । तस्मात्परमात्मविषयावेव महानव्यक्त इत्येतौ शब्दौ ॥५० ॥
हिन्दी- - ब्रह्मा ( चतुर्मुख ) विश्वस्रष्टा ( मरीच आदि ), ( शरीरधारी ) धर्म, महान्, अव्यक्त ( साङ्ख्यप्रसिद्ध दो तत्त्व - विशेष ) - इनको विद्वान् उत्तम सात्त्विक गतियाँ कहते हैं ॥५० ॥
एष सर्वः समुद्दिष्टस्त्रिः प्रकारस्य कर्मणः ।
त्रिविधस्त्रिविधः कृत्स्नः संसारः सार्वभौतिकः ॥ ५१ ॥
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७०२ मनुस्मृतिः [ द्वादश: भाष्य — त्रिःप्रकारस्य वाङ्मन: कायसाधनस्य । त्रिविधः सत्त्वादिगुणभेदेन । पुन-स्त्रिविधः उत्तमादिविशेषतः । या अप्यत्र गतयो विशेषतोऽनुक्तास्ता अप्युक्तसादृश्यादन्तर्भावनीयाः । गुणप्रकर-णोपसंहारः । उत्तरोऽपि श्लोको वक्ष्यमाणसूचकः ॥५१ ॥
हिन्दी - ( भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि ) मन, वचन तथा शरीर के भेद से तीन प्रकार के कर्मों को, ( सत्त्व, रज और तम रूप ) तीन प्रकार के गुणों को और उनके भी सब प्राणी - सम्बन्धी ( जघन्य, मध्यम तथा उत्तम भेद से ) तीन - तीन प्रकार की सब गतियों को ( मैंने ) कहा ॥५१ ॥
पाप से निन्दित गति पाना-इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन धर्मस्यासेवनेन च ।
पापान्सयान्ति संसारानविद्वांसो नराधमाः ॥ ५२ ॥
भाष्य — इंद्रियप्रसंग ः प्रतिषिद्धसेवनप्रदर्शनार्थः । असेवनं धर्मस्य शिष्टाकरणम् । एतच्चाविदुषां भवत्यत आहाविद्वांसः । अत एव नराधमाः ।
अतश्च पापान् संसारान् कुत्सितानि जन्मस्थानानि । संयान्ति प्राप्नुवन्ति ।
अत प्रसिद्ध एव तावत्कर्मविपाकः प्रचक्ष्यते ॥ ५२ ॥
हिन्दी – इन्द्रियों की ( अपने - अपने विषयों में ) अत्यधिक आसक्ति होने से, ( निषिद्ध कर्म करने पर भी उसकी निवृत्ति के लिए विवाहित प्रायश्चित्त आदि ) धर्मकार्य नहीं करने से मूर्ख तथा अधम मनुष्य निन्दित गतियों को पाते हैं ॥५२ ॥
यां यां योनिं तु जीवोऽयं येन येनेह कर्मणा ।
क्रमशो याति लोकेऽस्मिंस्तत्तत्सर्वं निबोधत ॥ ५३ ॥
हिन्दी - ( भृगुजी महर्षियों से पुनः कहते हैं कि यह जीव इस लोक में जिस - जिस कर्म ( के करने ) से जिस - जिस योनि को प्राप्त करता है, उन सबको ( आप लोग ) सुनें ॥५३ ॥
पापविशेष से गतिविशेष की प्राप्ति-बहून्वर्षगणान्घोरान्नरकान्प्राप्य तत्क्षयात् ।
संसारान्प्रतिपद्यन्ते महापातकिनस्त्विमान् ॥ ५४ ॥
भाष्य — घोरान्नरकान् । दुःखप्रसहनव्यथया ' घोरान् ' । यातनास्थानानि ‘ नरकान् संसार- ’ । तत्क्षयादुद्भूतरूपस्य कर्मणः फलोपभोगेन क्षयः । तत ईषदवशिष्टे कर्मणि
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अध्यायः ] ' मेधातिथि’भाष्य ' मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता ७०३ प्रतिपत्तिः । “ कथं पुनः सर्वकर्म तत्रैव न भुज्यते ” । उक्तम् । इन्द्रियस्य कर्मणो नरकं फलं, नापशान्तस्य । कार्यविरोधित्वाच्च कर्मणां फलेनोपशमः । तत्र यथैव च ज्वलितस्याग्नेरुदर्चिषो दाहो विनियोगस्तपश्चादम्भ एव स्थितस्यैवं नरकेष्वपि द्रष्टव्यम् । “ अग्नेस्तु द्वे अवस्थे भवतः प्रशान्तता ज्वाला च । नरकस्तु एकरूप एव सर्वदा ” । उदर्चिष इवाग्नयः कर्माणि चोपचयापचयवन्ति । अत उपचितस्य कर्मणो नरको-ऽपचीयमानस्य ततोऽन्यत्रोपभुक्तिः । तत्र युक्तं ततः शेषेणेति ॥५४ ॥
हिन्दी — महापातकी ( ब्रह्महत्या आदि ( ११।५४ ) करनेवाले ) बहुत वर्ष समूहों तक भयङ्कर नरकों को पाकर उनके उपभोग क्षय से इन ( आगे ( १२।५५-८० ) कही जाने वाली गतियों को प्राप्त करते हैं ॥ ५४ ॥
ब्रह्मघाती को कुत्ते आदि की योनि -मिलना-श्वसूकरखरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम् ।
चण्डालपुक्कसानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति ॥ ५५ ॥
हिन्दी - ब्रह्मघाती मनुष्य कुत्ता, सूअर, गधा, ऊँट, गौ, बगरी, भेंड़, मृग, पक्षी,
चण्डाल ( १०।१६ ) तथा पुक्कस ( १०।१८ ) की योनि को प्राप्त करता है ॥५५ ॥
मद्यप ब्राह्मण को कृमि आदि की योनि मिलना-कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजां चैव पक्षिणाम् । हिंस्राणां चैव सत्त्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥ ५६ ॥
भाष्य - विड्भुजा वायसादयः ।
हिंस्राणां व्याघ्रादीनाम् ॥ ५६ ॥
हिन्दी - सुरा पीनेवाला ब्राह्मण कृमि ( बहुत सूक्ष्म कीड़े ), कीट ( कृमियों से कुछ बड़े कीड़े ), पतङ्ग ( उड़नेवाले फतिङ्गे यथा - शलभ, टिड्डी आदि ), विष्ठा खाने वाले ( कौआ आदि ) तथा हिंसक ( बाघ, सिंह, भेंड़िया आदि ) जीवों की योनि को प्राप्त करता है ॥५६ ॥
चोर ब्राह्मण को मकड़ी आदि की योनि मिलना-लूताहिसरटानां च तिरश्चां चाम्बुचारिणाम् । हिंस्राणां च पिशाचानां स्तेनो विप्रः सहस्रशः ॥५७ ॥
हिन्दी - सोने को चुरानेवाला ब्राह्मण मकड़ी, साँप, गिरगिट, जलचर जीव ( मगर आदि ), हिंसाशील तथा प्रेतों की योनि को हजारों बार प्राप्त करता है ॥५७ ॥
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७०४ मनुस्मृतिः
गुरुतल्पग को तृणादि योनि मिलना-तृणगुल्मलतानां च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि ।
क्रूरकर्मकृतां चैव शतशो गुरुतल्पगः ॥ ५८ ॥
भाष्य – क्रूरकर्मकृतः परवधशीलाः ॥५८ ॥
[ द्वादश: हिन्दी — गुरुतल्पग ( गुरु ( २।१४२ ) की स्त्री के साथ सम्भोग करनेवाला ) मनुष्य तृण, गुल्म, लता, कच्चे मांस को खानेवाले ( गीध आदि ) तथा दंष्ट्री ( बाघ, सिंह कुत्ता आदि ) जीव और क्रूर कर्म करनेवाले ( बाघ, सिंह या जल्लाद आदि ) की योनि को सैकड़ों बार प्राप्त करते हैं ॥५८ ॥
हिंसावृत्तिका आदि को मार्जारादि योनि मिलना-हिस्त्रां भवन्ति क्रव्यादाः कृमयोऽमेध्यभक्षिणः । परस्परादिनः स्तेनाः प्रेताऽन्त्यस्त्रीनिषेविणः ॥ ५ ९ ॥ भाष्य — क्रव्यादा गृघ्रादयः । श्रमेध्यभक्षिणः कृमयः । परस्परमदन्ति, यथा महामार्जारो मार्जारं, महामत्स्यः सूक्ष्मं मस्त्यं, अनेकभेदमिव अन्त्यस्त्रीनिषेविणो ऽन्त्याः बर्बरादयः ॥ ५ ९ ॥ हिन्दी — हिंसक ( सदा हिंसा करनेवाले बहेलिया, शिकारी आदि ) मनुष्य क्रव्याद ( कच्चे मांस खानेवाले बिलाव आदि ) होते हैं, अभक्ष्य पदार्थों को खानेवाले मनुष्य कृमि ( विष्ठादि के बहुत छोटे - छोटे कीड़े ) होते हैं, ( महापातक से भिन्न ) चोर परस्पर में एक दूसरे को खानेवाले होते हैं और चण्डाल आदि हीनतम जातियों की स्त्रियों के साथ सम्भोग करनेवाले प्रेत होते हैं ॥५९ ॥
विमर्श — इस श्लोक के चतुर्थ पाद में ' प्रेताः + अन्त्यस्त्री..... ऐसी सन्धि-विच्छेद कर स्मृतियों के वेदतुल्य होने से ' सर्वे विधयश्छन्दसि विकल्प्यन्ते ' अर्थात् वेद में सूत्रविहित सब कार्य वैकल्पिक होते हैं इस नियमानुसार विसर्ग का वैकल्पिक लोप करके, अथवा ‘ प्रेतास् + अन्त्यस्त्री ....... ' ऐसी स्थिति में ' ससजुषो रुः ' ( पा ० सू ० ८।२।६६ ) से सकार का रु आदेशकर उसका ' भोभगो अघोअपूर्वस्य योऽशि ' ( पा ० सू ० ८।३।१७ ) से य् आदेश करके ' लोपः शाकल्यस्य ' ( पा ० सू ० ८।३।१ ९ ) इस सूत्र से उस ‘ य् ’ का लोपकर ‘ अकः सवर्णे दीर्घः ( पा ० सू ० ६ । १ । १०१ ) इस सूत्र से सवर्णदीर्घ एकादेश करने पर उक्त प्रयोग की सिद्धि मन्वर्थमुक्तावलीकार ने की है, परन्तु यह सवर्ण दीर्घ कार्य भी छान्दस् प्रयोग मानकर ही होगा अन्यथा ' य ' लोप विधायकसूत्र में त्रिपादी तथा सवर्ण - दीर्घविषयक सूत्र के सपादसप्ताध्यायीस्थ होने से ' पूर्वत्रासिद्धम् ’ ( पा ० सू ० ८।२।१ ) की प्रवृत्ति होकर यलोप के प्रसिद्ध होने से सवर्ण - दीर्घ नहीं हो सकेगा ।
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अध्यायः ] ' मेधातिथि ' भाष्य ' मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता पतितसंसर्गी आदि के ब्रह्मराक्षस - योनि मिलना-संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम् । अपहृत्य च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः ॥ ६० ॥
७०५ हिन्दी - पतितों के साथ संसर्ग ( ११।१८० ) कर, परस्त्री के साथ सम्भोग कर और ब्राह्मण के ( सुवर्ण - भिन्न ) धन का अपहरण कर मनुष्य ब्रह्मराक्षस होता है || ६० ॥ भाष्य-मणि आदि के चोर को हेमकार की योनि मिलना-मणिमुक्ताप्रवालानि हत्वा लोभेन मानवः । विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु ॥ ६१ ॥
- हेमकर्तारः पक्षिणः ॥६१ ॥
हिन्दी - मनुष्य मणि, मूँगा और अनेक प्रकार के रत्नों के लोभ से ( आत्मीय होने के भ्रम से नहीं ) हरणकर सुनार ( या ' हेमकार ' पक्षी ) की योनि में उत्पन्न होता है ॥६१ ॥
धान्यादि चोर को चूहे आदि की योनि मिलना-धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कांस्यं हंसो जलं पल्वः । मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम् ॥ ६२ ॥
भाष्य - आखुः मूषकः ॥ ६२ ॥
हिन्दी - मनुष्य धान्य चुराकर चूहा, कांसा चुराकर हंस, जल चुराकर प्लव नामक पक्षी, शहद चुराकर दंश ( डांस ), दूध चुराकर कौवा, ( विशिष्ट रूप से कथित गुड नमक आदि के अतिरिक्त ) गन्ने आदि का रस चुराकर कुत्ता और घी चुराकर नेवला होता है ॥ ६२ ॥
मांसादि चोर को गीध आदि की योनि मिलना-मांसं गृध्रो वपां मद्गुस्तैलं तैलपकः खगः ।
चीरीवाकस्तु लवणं बलाकाशकुनिर्दधि ॥ ६३ ॥
हिन्दी - मांस चुराकर गीध, चर्बी चुराकर मद्गु नामक जलचर, तैल चुराकर तैलपक नामक पक्षी ( या ‘ तेलचवटा ' नामक उड़नेवाला कीड़ा ), नमक चुराकर झीङ्गुर और दही चुराकर बलाका पक्षी होता है ॥६३ ॥
रेशमी वस्त्रादि के चोर को तित्तिर आदि की योनि मिलना-कौशेयं तित्तिरिर्हृत्वा क्षौमं हृत्वा तु दर्दुरः । कार्पासतान्तवं क्रौञ्चो गोधा गां वाग्गुदो गुडम् ॥६४ ॥
भाष्य--दर्दुर: मंडूकस्तोकः ॥ ६४ ॥
हिन्दी – रेशमी वस्त्र ( या सूत ) चुराकर तीतर पक्षी, क्षौम ( तोसी आदि के छाल से
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७०६ मनुस्मृतिः [ द्वादश: बना ) वत्र चुराकर मण्डूक ( मेढ़क ), रुई से बना अर्थात् सूती वस्त्र चुराकर क्रौञ्च पक्षी, गौ को चुराकर गोह औ गुड़ चुराकर वाग्गुद पक्षी होता है ॥६४ ॥
कस्तूरी आदि के चोर को छुछुन्दरी आदि की योनि मिलना-छुच्छुन्दरीः शुभान्गन्धान्पत्रशाकं तु बर्हिणः । श्वावित्कृतान्नं विविधमकृतान्नं तु शल्यकः ॥ ६५ ॥
भाष्य – बर्हिणो मयूराः ॥६५ ॥
हिन्दी – उत्तम गन्ध ( कस्तूरी, कर्पूर आदि ) चुराकर छुछुन्दरी, पत्तों वाला ( बथुआ, पालक आदि ) शाक चुराकर मोर, सिद्धान्न ( मोदक, लड्डू, सत्तू, भात आदि ) चुराकर शाही ( काँटेदार सम्पूर्ण शरीर वाला छोटे कुत्तों के बराबर ऊँचा पशु- विशेष ), कच्चा अन्न ( चावल, धान गेहूँ, जौ, चना, दाल आदि ) चुराकर, शल्यक होता है ॥ ६५ ॥।
अग्नि आदि के चोर को बगुला आदि की योनि मिलना-बको भवति हृत्वाऽग्निं गृहकारी ह्युपस्करम् । रक्तानि हत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः ॥ ६६ ॥
हिन्दी - अग्नि चुराकर बगुला, गृहोपयोगी ( सूप, चलनी, ओखली, आदि ) मूसल साधन चुराकर लोहनी नामक कीड़ा ( जो मिट्टी से लम्बा या गोल आकारवाले अपने घर को दिवालों या धरन आदि काष्ठों पर बनाता है ) और कुसुम्भ आदि से ) रङ्गा गया वस्त्र चुराकर चकोर पक्षी होता है ॥ ६६ ॥
मृग आदि के चोर को भेड़िया आदि की योनि मिलना-वृको मृगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूलं तु मर्कटः । स्त्रीमृक्षः स्तोकको चारि यानान्युष्ट्रः पशूनजः ॥६७ ॥
भाष्य — जलं पल्व इत्यत्र पानार्थमुदकं ज्ञेयम् । स्तोकको वारीत्यत्र धान्यसेका-द्यर्थम् । रसश्चाद्यं रसमाहुर्यदि वाऽतिरिक्तौषधादि द्रष्टव्यम् || ६७ ॥ हिन्दी - मृग ( हरिण ) या हाथी चुराकर भेड़िया, घोड़ा चुराकर बाघ, फल तथा मूल चुराकर बानर, स्त्री चुराकर भालू, ( पीने के लिए ) पानी चुराकर चातक पक्षी, ( एक्का, तांगा, रेक्सा गाड़ी आदि ) सवारी चुराकर ऊँट और ( इस प्रकरण में अकथित ) पशुओं को चुराकर छाग होता है ॥ ६७ ॥
बलपूर्वक साधारण वस्तु लेने पर भी तिर्यक् योनि मिलना-यद्वा तद्वा परद्रव्यमपहृत्य बलान्नरः । अवश्यं याति तिर्यक्त्वं जग्ध्वा चैवाहुतं हविः ॥ ६८ ॥
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अध्यायः ] भाष्य--‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा ' हिन्दीटीकासहिता - नात्र तिरोहितमिव किंचिदस्ति ॥६८ ॥
७०७ हिन्दी – मनुष्य दूसरे की नि: सार ( साधारणतम ) भी वस्तु को बलात्कार से लेकर तथा बिन हवन किये ( पुरोडाश आदि ) हविष्य को खाकर अवश्य ही तिर्यग्योनि को पाता है ॥६८ ॥
उक्त वस्तु चुरानेवाली स्त्रियों को स्त्रीरूप में उक्त योनि मिलना-स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन हृत्वा दोषमवाप्नुयुः । एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताः ॥ ६ ९ ॥ हिन्दी- - इस प्रकार स्त्रियाँ भी इच्छापूर्वक ( इन वस्तुओं को ) चुराकर दोषभागिनी
होती हैं और वे इन्हीं ( १२।६२-६८ ) जीवों की स्त्रियाँ होती हैं ॥६ ९ ॥
नित्यकर्म के त्याग से शत्रुओं का दास होना—
स्वेभ्यः स्वेभ्यस्तु कर्मभ्यश्युता वर्णा ह्यनापदि ।
पापान्संसृत्य संसारान्प्रेष्यतां यान्ति दस्युषु ॥ ७० ॥
भाष्य – ब्राह्मणोऽध्यापनादिजीविकाकर्मत्यागेन यदि क्षत्रियादिवृत्तिमुपजीवेत् एवं क्षत्रियादयः स्वकर्मच्युताः पापान् संसारान् तिर्यग्योनीरनुभूय मनुष्यत्वे जाता दस्युषु
चौरादिहिंस्रादिषु भृत्यभावं प्राप्नुवन्ति ।
अनापदीत्यनुवादः । आपदि विहितत्वाद्दोषाभावः ॥७० ॥
हिन्दी - ( इस प्रकार शास्त्रनिषिद्ध कर्मों के आचरण करने पर फलों को कहकर अब शास्त्रविहित कर्मों के नहीं करने पर होनेवाले फलों को कहते हैं ) वर्ण ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र ) आपत्तिकाल नहीं होने पर भी अपने - अपने कर्मों से भ्रष्ट होकर ( शास्त्र-विहित पञ्चमहायज्ञ आदि कर्मों को छोड़कर ) निन्दित योनियों को पाकर जन्मान्तर में शत्रुओं के यहाँ दास होते हैं ॥७० ॥
स्वकर्मभ्रष्ट ब्राह्मणादि का प्रेत होना-वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः । अमेध्यकुणपाशी च क्षत्रियः कूटपूतनः ॥७१ ॥
भाष्य - स्वकर्मच्युतानां पापगतयः प्रदर्श्यन्ते । वान्तमश्नाति । उल्कया चास्यमुखं दह्यते । कुणपः शवशरीरम् । कूटपूतनः कुत्सितगंधा नासिकाऽस्य भवति ।
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७०८ मनुस्मृतिः [ द्वादश: कटपूतन इति वा पाठ: । कटपूतनो नाम पिशाचादिः स तु कश्चिददृश्यो भूत-विशेषः श्मशानिकभूमिसेवी ॥७१ ॥
हिन्दी — अपने धर्म से भ्रष्ट ब्राह्मण वान्तभोजी ( वसन् किये हुए अन्नादि को खानेवाला ) तथा ज्वालायुक्त ( ज्वलनशील - जलते हुए ) मूखवाला प्रेत होता है और ( अपने धर्म से भ्रष्ट ) क्षत्रिय अपवित्र ( विष्ठा ) तथा शव को खानेवाला ' कटपूतन ' नामक प्रेत होता है ॥७१ ॥
मैत्राक्षिज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक् ।
चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ॥७२ ॥
भाष्य — मैत्राक्षिज्योतिक इति शब्दान्तरं पिशाचवचनं पूर्ववत् । अथवा मैत्राक्षे ज्योतिर्दृष्टावपीति । ‘ मैत्र’मंगं पायुः तदक्षिविवरं छिद्रम् । अन्ये तूलूकमाहुः । ‘ मैत्र’मादित्यालोकः । ‘ अक्षज्योतिः ' ऐन्द्रियकं दर्शनम् । स ह्यादित्यालोके न पश्यति ॥७२ ॥
हिन्दी – अपने कर्म से भ्रष्ट हुआ वैश्य पीब खानेवाला ' मैत्राक्षज्योतिष्क ' नामक प्रेत होता है ( इसका गुद ही कर्मेन्द्रिय होता है ) और अपने धर्म में भ्रष्ट शूद्र ‘ चैलाशक ’ ( वस्त्रों की ‘ जूँ ’ को खानेवाला ) नामक प्रेत होता है ॥७२ । विमर्श — गोविन्दराज ने वस्त्र खानेवाला कीड़ा होना स्वधर्मभ्रष्ट शूद्र को कहा है, किन्तु प्रेतयोनि में जन्म लेने का प्रकरण होने से वह कथन ठीक नहीं है ।
विषयसेवन से नरक प्राप्ति-यथा यथा निषेवन्ते विषयान् विषयात्मकाः ।
तथा तथा कुशलता तेषां तेषूपजायते ॥७३ ॥
भाष्य - भेदग्रहगृहीतानां पुत्रदाराभिष्वगन्धनादिलोभे विषयसुखगन्धमात्मैकत्व-परिपन्थिविद्याप्रतिपक्षभूतं निवर्तयितुं संसारस्वरूपं मानुष्यकं जन्म यथास्थितमनूद्यते सर्वस्य प्रसिद्धम् । यथा यथा विषयेष्वभ्यासेन प्रवर्तन्ते । विषयात्मका विषयलालसाः । ‘ आत्म-शब्देन ' ‘ प्रवृत्तस्य तत्स्वभावतैव भवतीत्याहुः । यस्तु कथंचित्सहितं भुंक्ते तस्य भोगा-दिना न तत्स्मृत्युपपत्तावभिलाषो जायते । यस्त्वत्यन्तमेवाधरः स तद्भावनया तदात्मत्वेन सम्पद्यते । तदिदमाह तथा तथा कुशलतेति । ' कुशलता'पदं चैकरसीभावः । अतश्च स न शक्नोति विषयान्परिहर्तुम् । ईदृश्येव प्रवृत्तिः । शिष्टाप्रतिषिद्धेष्वपि स्वदारगमनादिष्वागमार्जितद्रव्योपपादकेन भोज्याविशेषेष्वपि प्रतिषिद्धा ॥७३ ॥
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अध्यायः ] ‘ मेधातिथि’भाष्य‘मणिप्रभा’हिन्दीटीकासहिता ७० ९ हिन्दी - विषयी मनुष्य विषयों को जैसे - जैसे जितनी ( अधिक मात्रा में ) सेवन करते हैं, उन ( विषयों ) में वैसे - वैसे ( उतनी अधिक मात्रा में ) कुशलता प्रवीणता ( अर्थात् वृद्धि ' आसक्ति ) होती जाती है ॥७३ ॥
तेऽभ्यासात्कर्मणां तेषां पापानामल्पबुद्धयः ।
संप्राप्नुवन्ति दुःखानि तासु तास्विह योनिषु ॥ ७४ ॥
भाष्य - ततश्च तेषां पापानां प्रतिषिद्धानां कर्मणामभ्यासात् । ' निन्दितकर्माभ्यासे पतनमिति ' तद्भवतु । दुःखानि पश्यन्ति, तासु तासु कृमिकीटादियोनिषु ॥ ७४ ॥
हिन्दी – ( अत:) वे मन्दबुद्धि उन पाप कर्मों के अभ्यास ( निरन्तर सेवन ) से उन - उन योनियों में दुःखों को प्राप्त करते हैं ॥ ७४ ॥
तामिस्त्रादिषु चोग्रेषु नरकेषु विवर्तनम् ।
असिपत्रवनादीनि बन्धनच्छेदनानि च ॥ ७५ ॥
भाष्य - ' तामिस्त्रमन्धतामिस्रम् ' इत्याद्याः प्रागुक्ता नरकाः । तत्र विवर्तनमेकेन पार्श्वेनासित्वा पार्श्वान्तरेणावर्तनं अबद्धस्योत्तानस्य वा खड्गधारानिशितपत्रैर्वृक्षैर्बन्धनम् । भूमिष्ठैर्वा पत्रैरेव कदलीदलखंडवत् तथाविधैर्मैत्री दुष्कृतिनामंगच्छेदप्राप्तिः ॥७५ ॥
हिन्दी – ( वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य ) ( ४।८८ - ९ ० ) तामिस्र आदि घोर नरकों में दुःख पाते हैं तथा असिपत्रवन आदि नरकों का और बन्धन, छेदन आदि दुःखों को पाते हैं ॥७५ ॥
विविधाश्चैव संपीडाः काकोलूकश्च भक्षणम् ।
करम्भवालुकातापान्कुंभीपाकाश्च दारुणान् ॥ ७६ ॥
भाष्य — करंभः कर्दमः । कुंभीषु प्रक्षिप्तास्ते पच्यन्ते ॥७६ ॥
तापेनाऽऽग्नेयेनान्नादिवत्-हिन्दी— ( वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य ) अनेक प्रकार की पीड़ाओं को भोगते हैं, उन्हें कौवे और उल्लू खाते हैं, वे सन्तप्त बालू ( रेत ) में सन्ताप को पाते हैं और कुम्भीपाक आदि दारुण नरकों को भोगते हैं ॥७६ ॥
सम्भवांश्च वियोनीषु दुःखप्रायासु नित्यशः ।
शीतातपाभिघातांश्च विविधानि भयानि च ॥७७ ॥
भाष्य - वियोनयः तिर्यक्प्रेतपिशाचादयः । तत्र सम्भवो जन्म दुःखबहु-लासु ॥७७ ॥
हिन्दी – ( वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य ) अधिक दुःखदायी ( तिर्यक् आदि ) निषिद्ध
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७१० मनुस्मृतिः [ द्वादश: योनियों में उत्पत्ति ( जन्म ) को और शीत तथा आतप ( ठंडक तथा धूप ) की भयङ्कर विविध पीड़ाओं को प्राप्त करते हैं ॥ ७७ ॥
असकृद्गर्भवासेषु वासं जन्म च दारुणम् ।
बन्धनानि च कष्टानि परप्रेष्यत्वमेव च ॥७८ ॥
भाष्य – स्पष्टार्थः ॥७८ ॥
हिन्दी— ( वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य ) अनेक बार गर्भ में निवास, जन्मग्रहण, अनेक प्रकार के कष्टकारक बन्धन ( जन्य पीड़ाओं ) को पाते हैं तथा दूसरों के दास बनते हैं ॥७८ ॥
बन्धुप्रियवियोगांश्च संवासं चैव दुर्जनैः ।
द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम् ॥ ७ ९ ॥
जरां चैवाप्रतीकारां व्याधिभिश्चोपपीडनम् ।
क्लेशांश्च विविधांस्तांस्तान्मृत्युमेव च दुर्जयम् ॥८० ॥
भाष्य — एतावप्युक्तार्थौ ॥ ७ ९ -८० ॥
हिन्दी— ( वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य ) प्रियबन्धुओं के वियोग, दुष्टों के सहवास, धनोपार्जन का प्रयास, नाश, कष्ट से मित्रों का लाभ और शत्रुओं का प्रादुर्भाव ( नये - नये शत्रुओं का होना ) को प्राप्त करते हैं । ( वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य ) प्रतिकार रहित बुढ़ापा, व्याधियों से उपपीडन ( भूख - प्यास आदि से ) अनेक प्रकार के क्लेश और दुर्जय मृत्यु को पाते हैं ॥८० ॥
भावानुसार फलयोग—
यादृशेन तु भावेन यद्यत्कर्म निषेवते ।
तादृशेन शरीरेण तत्तत्फलमुपाश्नुते ॥ ८१ ॥
भाष्य - सात्त्विकेन राजसेन तामसेन वा भावेन यद्यत्कर्म निषेवते सात्त्विकं राजसं तामसं वा । शरीरेण तादृशेन सत्त्वबहुलेन रजोबहुलेन तमोबहुलेन वा । तत्त-त्फलमुपाश्नुते, सात्त्विकं राजसं तामसं वा । यतश्चैतदेवं रजस्तमोबहुलात् कर्मणोऽकुशलसंकल्पहेतोरनिष्टफलप्राप्तिः, अत-स्तत्परिवर्जनेन कुशलसंकल्पकर्मणा भवितव्यम् ॥ ८१ ॥
हिन्दी - मनुष्य जिस प्रकार के ( भले या बुरे ) भावों से जिन - जिन ( भले या बुरे कर्मों का सेवन करता है, वह वैसे ( भले या बुरे ) शरीर से उन - उन ( भले या बुरे ) कर्मफलों को प्राप्त करता है ॥८१ ॥