मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 21–30

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30

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- पाश्चात्य दर्शन १७ ' दर्शन ' कहा जाता है -' दृश्यते वस्तु याथात्म्यं अनेन इति दर्शनम् । ' दूसरे शब्दोंमें प्रमाणद्वारा आत्मानात्माका ज्ञान जिससे होता है, उसका नाम ' दर्शनशास्त्र ' है । प्रमाण अज्ञातज्ञापक होता है, अकृतकारक नहीं । ज्ञान कर्मके समान पुरुषके अधीन नहीं होता । कर्म करने, न करने, उलटा करनेमें पुरुष स्वतन्त्र है, किंतु ज्ञानके सम्बन्धमें यह बात नहीं कही जा सकती । प्रमाण- प्रमेयके परस्पर सम्बन्ध हो जानेपर इच्छा न रहनेपर भी दुर्गन्धादिका ज्ञान होता ही है । दर्शन प्रमाण-परतन्त्र होता है । प्रमाण अनुरोधक- विरोधक सभी प्रकारके होते हैं । उनमें प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम मुख्य हैं, प्रत्यक्षानुमानका भी आगमानुसरण आवश्यक है । इसके बिना कितने ही अनुमानाभास भी अनुभवके रूपमें सामने आते हैं । उदाहरणार्थ कोई नरशिरके कपालकी हड्डीको प्राण्यंग समझकर शंखतुल्य पवित्र मान सकता है । पर यह अनुमानाभास है । अतएव पवित्र बुद्धिके मनुष्य ' नरशिरःकपालं शुचिः प्राण्यङ्गत्वात् शङ्खवत्' इस अनुमानका तिरस्कारकर ' नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं सवासा जलमाविशेत्' इस आगमानुसार जुगुप्सित नरशिरकी अस्थिका स्पर्श हो जानेपर सचैलस्नान कर अपनेको पुनः शुद्ध करते हैं । कुछ लोगोंका ऐसा भी मत है कि ' मैं कौन हूँ, कहाँसे आया हूँ, यह विश्व क्या है ' आदिका चिन्तन तथा विवेचन ' दर्शन ' है । इसी प्रकार कुछ विद्वान् प्रकृति तथा उसके व्यापारका अध्ययन एवं उसके भीतर एकता देखनेको दर्शन कहते हैं । पर इन मतोंमें भी आंशिक सत्यतामात्र है । सभी दर्शन सभी विषयमें आदरणीय भी नहीं हो सकते । जैसे अन्धोंने हाथीके जितने अंग जिस रूपमें अनुभव किये, उसी ढंगसे उनका वर्णन किया । न इसे सम्पूर्ण मिथ्या ही कहा जा सकता है और न पूर्णतया सत्य ही । विशेषतया पाश्चात्य दर्शनोंके सम्बन्धमें तो अत्यन्त वैरूप्य है । भारतीय दर्शनोंमें यद्यपि इतना अधिक वैरूप्य नहीं है; क्योंकि उनके मूल अनादि- अपौरुषेय वेद, तदाधारित शास्त्र, योगज ऋतम्भरा प्रज्ञा तथा लौकिक प्रत्यक्षानुमान हैं तथापि यहाँ भी सभी विषयोंमें सभी ऋषियोंका समान आदर नहीं, अपितु जिस विषयमें जिस ऋषिने धारणा, ध्यान,

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१८ मार्क्सवाद और रामराज्य समाधि आदिद्वारा तत्त्वानुभूति प्राप्त की, उसी विषयमें उसका सार्वभौम आदर है । जैसे शब्दके सम्बन्धमें पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि आदिका एवं वाक्य -विचार आदिमें जैमिनि, व्यास आदिका । पाश्चात्य- दर्शनोंमें अधिकांशका जन्म कुतूहल-बुद्धि एवं ज्ञान-पिपासा-शान्तिकी दृष्टिसे ही हुआ है । अनेक पाश्चात्य दर्शनोंका प्रादुर्भाव राजनीतिक उद्देश्यकी पूर्तिके लिये भी हुआ है; किंतु भारतीय दर्शनोंका अन्तिम उद्देश्य दुःख -निवृत्ति, मृत्यु- विजय तथा मोक्ष-प्राप्ति ही है, अवान्तर उद्देश्य अर्थ-काम - धर्मार्जन भी है । वेदान्तमतमें ज्ञानस्वरूप आत्मा निर्विकार है । मन, अन्तःकरण आत्मासे भिन्न प्राकृतिक है । चित्त, अहंकार आदिके समान ही पंचज्ञानेन्द्रियाँ, पंचकर्मेन्द्रियाँ भी प्राकृतिक सूक्ष्म तत्त्वोंसे ही बनी हैं । स्थूल देहसे भिन्न पंचप्राणसहित उक्त मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार एवं कर्म- ज्ञानेन्द्रियोंको मिलाकर सूक्ष्म या लिंग शरीर कहा जाता है । स्थूल देहके नष्ट होनेपर भी यह सूक्ष्म देह नष्ट नहीं होता । सृष्टिसे लेकर प्रलयकालतक यह सूक्ष्म देह रहता है । इसीके आधारपर व्यापक आत्माका गमनागमनादि बनता है । इससे भिन्न एक रजस्तमोलेशानुविद्ध अतएव अविशुद्ध सत्त्वप्रधान अविद्यारूपी कारण शरीर भी मान्य है, जिसका तत्त्व-साक्षात्कारसे ही बोध होता है । इस तरह वह अनादि, सान्त है । मूल प्रकृति भी अनादि, सान्त है । सम्पूर्ण प्रपंच पंचभूतात्मक है । उन भूतोंकी ग्राहक इन्द्रियाँ भी सूक्ष्म भूतोंका ही परिणाम हैं । भिन्न कारणोंमें स्वकार्यानुकूल शक्ति होती है । इसी तरह ब्रह्ममें भी सर्वप्रपंचोत्पादिनी शक्ति होती है । इसीको मूल प्रकृति कहा जाता है । चेतन ईश्वर सर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान् एवं सर्वव्यापी होता है । कर्मोंके अनुसार जन्म- मरणके समान ही संसारका सृष्टि- प्रलय होता है । संसारका कर्मके साथ असाधारण सम्बन्ध है । मोक्ष या भगवत्प्राप्ति संसारका चरम लक्ष्य है । वस्तुतः इन सभी विषयोंका विवेचन ' दर्शन ' में आ जाता है । यूनानी- दर्शन पाश्चात्य- दर्शन प्रायः मनतक ही पहुँचते हैं । आत्मवादी भी मन

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पाश्चात्य दर्शन १९ और आत्माका अभेद मानते हैं । इस सृष्टिके पहलेकी सृष्टियोंका विचार भी उन लोगोंने नहीं किया । ' मैटर ' या भूतसमुदाय यद्यपि बहुत सूक्ष्म माना जाता है तथापि वह सांख्यीय प्रकृतिसे भिन्न है । यही कारण है कि आत्माका विचार उनके लिये बहुत दूरकी बात हो गयी है । यूनानके दर्शन अति प्राचीन समझे जाते हैं, पर वहाँके प्राचीन दार्शनिकोंने जड़ - चेतनका भेद ही नहीं माना । किस प्रथम द्रव्यसे संसारकी उत्पत्ति हुई, यही उनका विचारणीय विषय था । अन्नसे मनुष्यादि प्राणियोंकी, मिट्टीसे अन्नकी, जल जमते -जमते मिट्टीकी और गर्मीसे जलकी उत्पत्ति उन्होंने मानी है । जीव - शक्ति भी उसीमें मिली थी । फिर कुछ लोगोंने परमाणु, कुछ विद्युत्कण और कुछ लोगोंने बानवे तत्त्व माने । अन्तमें मैटर या अव्यक्त एक द्रव्यसे संसारकी उत्पत्ति मानी । यूनानमें ई० सन्से ६०० वर्ष पूर्व थैलीज, एनैक्सीमैन्डर और ऐनैक्सिमैनीज- ये तीन दार्शनिक हुए हैं । हिप्पो और डायोजिनीज भी इन्हींके अनुयायी थे । ये लोग चेतन-अचेतन मिश्रित मूल कारण द्रव्य समझते थे । अतएव आत्मा या ईश्वर आदिके सम्बन्धमें इन लोगोंने कोई चर्चा नहीं की । यद्यपि सृष्टिके पहले अतिसूक्ष्म दृश्य एवं दृक् दोनों अविकल्पित होकर एकमेव से थे- ' ' आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम् । ( श्रीमद्भा० ११ । २४ । २ ) अर्थात् ज्ञान और अर्थ दोनों ही अविकल्पित होकर ही प्रतीत होते थे तथापि यह अविकल्पकता, एकता, सूक्ष्मताके कारण प्रतीत होती है, अविवेकके कारण नहीं, किंतु थैलीज आदि तो जीव- शक्ति- मिश्रित ही मूल कारण मानते थे । थैलीज जलसे, एनैक्सीमैन्डर किसी अनियत द्रव्यसे और एनैक्सिमैनीज वायुसे विश्वकी सृष्टि मानता था । कहा जाता है कि थैलीज ज्योतिषी था । उसने ५८५ ई० में जो सूर्य ग्रहण हुआ था, उसे पहले ही बतला रखा था । उसके मतानुसार 'जल ही दृढ़ता, द्रवता तथा वायुके रूपमें परिवर्तित होता है । जलसे वनस्पति तथा सभी जीवोंको जीवन मिलता है । ' किसी दृष्टिसे यह मान्यता भारतीयोंमें भी थी । मनुने

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२० मार्क्सवाद और रामराज्य लिखा है कि परमेश्वरने पहले जल ही रचा और उसमें अपनी शक्तिका निक्षेप किया- ' अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ ( १।८ ) जलमें निवासके कारण ही ईश्वरको ' नारायण ' कहा जाता है । ' अनेकात्मक प्रपंचका मूल एक वस्तु है ', यह खोज भी महत्त्वकी ही है । ऐनैक्सिमैन्डर ज्योतिष एवं भूगोलका विद्वान् था । उसने एक अपरिच्छिन्न परिमाणवाले द्रव्यसे ही विश्वकी उत्पत्ति और उसीमें संसारका लीन होना माना है । यदि यह द्रव्य परिमित होता तो सृष्टि होते-होते समाप्त हो जाती । अतः यह द्रव्य अपरिमित अतएव अनश्वर है इसकी गति भी शाश्वत है । यह स्वयं विशेष पदार्थ नहीं है, किंतु सब विशेष पदार्थ इसीसे निकलते हैं । शीत-उष्णका भेद, पृथ्वी, जल, वायु आदि सब इसीसे निकले । यह स्वयं थैलीजका सहवासी था और इसका शिष्य एनैक्सिमैनीज था । इसने ( एनैक्सिमैनीजने ) प्रथम द्रव्य वायु माना है । वायुमें ही शीतलता तथा उष्णतासे घनीभाव और शैथिल्य ये दो गुण प्रकट होते हैं । वायुके शैत्यसे जल एवं उष्णतासे अग्नि प्रकट होती है । जैसे प्राणके आधारपर प्राणीका देह होता है, वैसे ही वायुके आधारपर संसार स्थित है । हिप्पो, थैलीजका ही अनुगामी था । वह आर्द्रतासे अग्नि और अग्नि तथा जलके संघर्षसे संसारका होना मानता था । इडीयस एवं डीयोजेनीज वायुको ही मूल कारण मानते थे; परंतु एनैक्सिगोरस अनेक तत्त्वोंका अस्तित्व मानता था । साथ ही वह ईश्वरकी इच्छासे ही इन तत्त्वोंके द्वारा सृष्टि स्वीकार करता था । पाइथागोरसने संख्याको ही मूल माना है । वह ईश्वरको एक संख्या तथा अन्य अंकोंका उसीसे निकलना मानता था । एकसे बहुतोंकी उत्पत्ति होती है । बहुत सम्भव है कि यह ' एकोऽहं बहु स्याम्' (एक मैं अनेक होकर व्यक्त हो जाऊँ ) इस श्रौतसिद्धान्तका ही रूपान्तर हो । एनैक्सिमैण्डर ( ई० पू० ६४० से ५५० ) -का कथन है कि ' जो कुछ भी जाना जाता है, वह मूल नहीं है । मूलतत्त्व तो कोई और ही है, जिससे

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- पाश्चात्य दर्शन २१ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- इन पाँच तत्त्वोंका जन्म होता है और जिसे ' असीम ' नाम दिया जा सकता है । वही घन -विरलभावसे विश्वरूपमें परिणत और उपरत होता रहता है । ' पाइथागोरस (ई० पू० ५७०-५०० ) तो मूल तत्त्वके सूक्ष्म रूपको ही सब कुछ मानता है । इसके अनुसार ' रूपका एक प्रकार अनुपात है । जैसे पित्त, कफ और वातके उचित अनुपातसे स्वास्थ्य और विपरीत होनेपर अस्वास्थ्य होता है, वैसे ही अन्य विषयोंमें भी । इसलिये विश्वका मूल वस्तु नहीं, पर वस्तुका रूप ही है । ' उधर परामेनीडीजके मतमें विश्व न कभी उत्पन्न हुआ, न नष्ट ही होगा । भारतीय दर्शनोंके लिये यह सब कुछ नया नहीं है । मीमांसकोंने कहा है कि ' न कदाचिदनीदृशं जगत्। ' अर्थात् यह जगत् कभी भी ऐसा नहीं रहा, जैसा आज नहीं है, अर्थात् वह सदा ऐसा ही रहा । सारी गतियाँ बाणकी गतिके समान भ्रमात्मिका ही हैं । बाण किन्हीं विशिष्ट स्थानोंपर ‘ सत्’ होते हुए भी ' असत्' रहता है अर्थात् रहते हुए भी नहीं रहता । वह उस स्थानविशेषसे होकर जाता है, अतः ' सत्' है, परंतु क्षणभर भी नहीं ठहरता, अतः ' असत्' भी है । हेराक्लिटसने वस्तुओंका अनादित्व, अनेकत्व और क्षण- विपरिवर्तित्व माना है । प्राकृत घटनाचक्र जितने भी हैं, वे सब सर्वज्ञकी बुद्धिद्वारा प्रवर्तित हैं और विश्वका मूल भी । अनाक्सागोरस ( ई० पू० ५००-४८८ ) और एम्पीडोल्कीज (ई ० पू० ४६०-३७० ) -का कथन है कि ' वस्तुओंकी अनेकविधताका पर्यवसान परमाणुओंकी अनन्ततामें हो जाता है । सभी वस्तुओंके बीजभूत परमाणुओंके संयुक्त होनेपर ही विश्व उत्पन्न होता है । असत्से कुछ उत्पन्न नहीं हो सकता, न सत्का विनाश ही हो सकता है । अणुओंका संयोग- वियोगात्मक ही परिवर्तन है । कोई भी वस्तु ' आकस्मिक ' नहीं । सब वस्तुएँ कार्य- कारणसम्बद्ध ही हैं । अणु और शून्य इन दोके अतिरिक्त और कुछ नहीं है । अणु अनन्त हैं और उनकी अवस्थाएँ भी अनन्त हैं । नये अणु निःसीम प्रदेशोंमें अनवरत गिरते रहते हैं एवं पारस्परिक संघर्षोंसे ही भिन्न होते रहते हैं । उनके इन पारस्परिक संघर्षोंसे ही ' पार्श्वभ्रमि

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२२ मार्क्सवाद और रामराज्य गतियाँ ' (चारों ओर भँवर - जैसी गतियाँ ) उत्पन्न होती हैं, जिनसे असंख्य विश्वोंकी उत्पत्ति और विनाशकी परम्परा ( शृंखला ) चलती रहती है । ' इनके मतमें ' अणुओंमें आन्तरिक ( भीतरी ) गति नहीं होती । क्रान्ति और संघर्षोंसे ही परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया होती है । सूक्ष्म अणुओंसे सारा शरीर व्याप्त है और उन्हींसे ' जीवन ' और ' आत्मा ' कही जानेवाली वस्तुओंकी उत्पत्ति होती है । ' डीमोक्रीटस (ई० पू० ४६० - ३५७ ) -के मतमें ' इन्द्रियोंसे ही ज्ञान उत्पन्न होता है । जो एक जगह सत्य है, वह दूसरी जगह असत्य भी हो सकता है । ' इनके मतमें मानवानुभूतिका ही सर्वाधिक महत्त्व है, ऐसा सोफिस्टोंका कहना है । भौतिकवादियोंके मतमें ' धार्मिक प्रचारोंसे दर्शनोंमें बड़ा प्रतिरोध उत्पन्न हुआ । चूँकि यहाँ मानव-बुद्धि सीमित ही है, अतः उससे तत्त्वज्ञान दुर्लभ ही है । प्रत्येक मानवके लिये दुर्भेद्य अन्धकार स्वभावसिद्ध है, इसीलिये प्रकृति भी रहस्यभूता ही रह जाती है । ' वस्तुतस्तु भौतिकवादी धार्मिक पक्षको बड़े विकृत रूपमें व्यक्त करते हैं । जो दग्धा ( जलानेवाला ) है, वह दहन (जलाये जाने ) -का विषय नहीं हो सकता, उसी प्रकार जो ज्ञाता ( जाननेवाला ) है, वह ज्ञान (जानने ) -का विषय नहीं हो सकता-यह सिद्धान्त सर्वथा युक्तिसंगत ही है । ठीक वैसे ही, रूप जैसे श्रोत्रेन्द्रियके द्वारा नहीं जाना जा सकता ( केवल चक्षुरिन्द्रियके द्वारा ही जाना जा सकता है ), वैसे ही शब्दस्पर्शादिगुणपंचकसे परेके पदार्थ इन्द्रियागोचर हैं - इन्द्रियोंद्वारा नहीं जाने जा सकते ( अर्थात् प्रत्यक्षके क्षेत्रके बाहर हैं, केवल अनुमान या शब्द- प्रमाणके द्वारा ही जाने जा सकते हैं ) । यह सिद्धान्त भी ठीक ही है - इसमें भी कहीं कोई युक्तिविरुद्ध बात नहीं दिखलायी देती । प्रामाणिक अनुशासन ( शास्त्र या आप्तवाक्य) -को भी न माननेपर ' तर्कनवस्थान' दोष अनिवार्य होगा । अर्थात् तर्कके वस्तुयाथार्थ्यपर अवलम्बित न रहकर व्यक्तिगत बुद्धिपर अवलम्बित रहनेके कारण जब जिस पक्षका व्यक्ति अधिक बुद्धिमान् होगा, तब उसीका मत सिद्धान्तमें

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- पाश्चात्य दर्शन २३ मान लेना पड़ेगा और कब किस पक्षका व्यक्ति अधिक बुद्धिमान् होगा, इसकी कोई व्यवस्था नहीं; अतः कभी सत्यपक्ष सत्य रह सकता है और कभी असत्यपक्ष भी जीत सकता है और ऐसी स्थितिमें ज्ञान भी अस्थिर ही रहेगा- यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ अर्थात् कुशल अनुमाता लोग बड़े प्रयत्नसे जिस अर्थको तर्कसिद्ध करते हैं, उसी अर्थको अन्य अनुमाता तार्किक अपने अनुमान- तर्कोंद्वारा अन्यथा ही सिद्ध कर देते हैं । इस तरह पूर्व अनुमित अर्थका खण्डन कर नवीन अर्थ प्रस्तुत और पुनः उसका खण्डन कर नवीन बात सिद्ध की जा सकती है । इसलिये तर्कमें अप्रतिष्ठितताका आरोप होता है तथापि यह तर्कका अप्रतिष्ठितत्व दूषण नहीं भूषण ही है; क्योंकि तर्कोंके अप्रतिष्ठितत्वकी सिद्धि भी तर्कसे ही होगी । जैसे ' अयं तर्कः अप्रतिष्ठितः तर्कत्वात् तर्कान्तरवत्' यह भी एक तर्क ही है और यदि यह तर्क भी अप्रतिष्ठित है, तो इस अप्रतिष्ठित तर्कके द्वारा तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व भी किस प्रकार सिद्ध होगा? और यदि यह तर्क प्रतिष्ठित है, तो सब तर्क अप्रतिष्ठित हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि यह भी तर्क है, जिसको प्रतिष्ठित मान लिया गया । अतः कदाचित् तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व भूषण है, दूषण नहीं । अतः बड़ी सावधानीसे किसी तत्त्वके निर्णयके लिये कुछ तर्कोंका प्रयोग किया जाना चाहिये । सुकरातका मत था कि ' सदाचारके अनुवर्तनसे ही सम्यग्ज्ञान उत्पन्न होता है और वह ज्ञान प्रत्येक मनुष्यको उत्पन्न होनेवाले सामान्य ज्ञानसे भिन्न ही होता है । इष्ट घटनाओंद्वारा कार्यकारण-सम्बन्धसे सम्यग्ज्ञानकी उत्पत्ति सम्भव है । सम्यग्ज्ञान उत्कृष्ट गुण है । व्यापक विचारोंसे उसकी उत्पत्ति होती है । ' कुछ लोगोंका यह जो मत है कि ' सारा का सारा ज्ञान संशयाक्रान्त ही होता है, कोई भी ज्ञान निश्चयात्मक नहीं होता ' उसका निराकरण करते हुए उनका कहना है कि ' देवता नहीं चाहते कि इस विषयको लोग जानें । इसीलिये संशयाक्रान्ति होती है और सदाचार तथा

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२४ मार्क्सवाद और रामराज्य देवानुग्रहसे सम्यग्ज्ञानकी उत्पत्ति भी सम्भव ही है, असम्भव नहीं । ' भौतिकवादियोंके मतमें सुकरातका दर्शन नीतिविषयक ही है । वैज्ञानिक अन्वेषणकी अपेक्षा उन्होंने आध्यात्मिक कल्पनाका ही अधिक आदर किया है । उनके मतमें ' केवल बाह्य इन्द्रियोंसे ही अनुभूति होती हो सो बात नहीं है, अपितु तत्त्वानुभूति तो अन्तरात्मासे ही उत्पन्न ( प्रत्यगुद्भूत ही ) होती है । न्याय, सदाचार और सुबुद्धि मनुष्योंके आन्तरिक गुण है । ' उनके मतमें जो त्रिकालाबाध्य है, एकरस है, वही सत्य है । उन्होंने अप्रामाणिकप्राय असम्बद्ध ज्ञानोंसे उपप्लुत मस्तिष्कको परिष्कृतकर उनमें सत्य ज्ञानके बीज बोये । उनका दर्शन शब्दार्थज्ञानविषयक ही है । बाह्य ज्ञानकी अपेक्षा आन्तरिक ज्ञानकी ही महत्ता उन्होंने अत्यधिक प्रख्यापित की है । उनके शिष्य अफलातून विशिष्ट दार्शनिक हुए । उन्हींके प्रभावसे अनेक विद्वान् अपूर्ण संसारसे विरक्त हो गये और अनन्त सत्यमें अपना मन लगा दिया । भौतिकवादियोंकी दृष्टिसे लोग ' वस्तु ' से अपना ध्यान हटाकर अमूर्त्त व्यापक सत्यके अन्वेषणमें लग गये । इन्द्रियव्यापारोंसे उपरत होकर उन्होंने विचारशक्तिसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त स्थिर किये । उक्त विरोधाभासको ही तत्त्व मानकर यह मान लेना कि ' गति या परिवर्तन विरोधपूर्ण है, अतः उसकी व्याख्या नहीं हो सकती ' मिथ्या ही है । इसलिये तत्त्व तो अपरिवर्तनीय ही रहा और वही सत्य भी है, वही नित्य भी है । परिवर्तन तो भ्रममात्र है । भौतिकवादकी पद्धतिसे तो इस दर्शनमें अनुभव और प्रयोगकी उपेक्षा ही है । जो तत्त्व है, वह ' कृतबुद्धिग्राह्य ' ही है अर्थात् परमेश्वरके अनुग्रहसे प्राप्त हुई किसी रहस्यमयी आत्मशक्तिद्वारा ही उसका ज्ञान (ग्रहण) हो सकता है । अन्य यूनानियोंका यह मार्ग भी प्रादुर्भूत हुआ कि ' तर्कद्वारा भी तत्त्वान्वेषण हो सकता है ।' अफलातूनके मतसे ' भौतिक वस्तुओंको सत्यपरिचायक समझना चाहिये । घटनाएँ असम्पूर्ण और भ्रामिका होती हैं । इसलिये घटनाओंके मूलमें कोई गम्भीर सत्य रहता है । वही

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- पाश्चात्य दर्शन २५ ' वैज्ञानिक नियम ' कहलाता है । सारी सृष्टि उसीके अनुसार है । उन्हीं नियमोंसे घटनाओंकी व्याख्या भी होती है । साथ ही मूलभूत वैज्ञानिक नियम जाने भी जा सकते हैं । ' अफलातूनके मतमें ' विश्वका घटनाचक्र यन्त्र-सा नहीं है, अपितु जैसे वस्तुओंकी वृद्धिका मूल सूर्य है, वैसे ही सब घटनाचक्र किसी - न-किसी शुभके ही उद्देश्यसे प्रवृत्त होता है । इसका विषयानुरूप विवरण यह हो सकता है कि जितने अंशसे इन्द्रिय जगत्- सम्बद्ध है, उतने अंशसे उसकी सत्ता न्यून है । यदि कोई हिम ( बर्फ ) पर हाथ रखकर कवोष्ण जल ( गुनगुने पानी ) -में हाथ डाले, तो उसे वह जल अनुष्णके समान लगता है और यदि अनुष्ण जलमें पहले हाथ डालकर गुनगुनेमें डाले, तो उसे वह शीतल-जैसा लगेगा, इस प्रकार वही जल उष्ण भी है और शीतल भी । हाथीकी दृष्टिसे चूहा ' लघु जन्तु ' है, परंतु चींटीकी दृष्टिसे वही ' महान्' अनुभूत होने लगता है । इस प्रकार वही मूषक लघु भी है, वही महान् भी । दृष्टिभेदकी दृष्टिसे यही युक्ति अन्य भी अनेक स्थलोंपर प्रयुक्त हो सकती है । कोई भी इन्द्रियानुभूत वस्तु विपरीत गुणयुक्त विदित होने लग सकती है । अतः गुण निश्चित नहीं कहे जा सकते और जो अपरिवर्तनीय गुणयुक्त नहीं है, वह सत्य नहीं है और न वह ज्ञान ही प्रमात्मक है । कोई चित्र किसीको सुन्दर लगता है, किसीको असुन्दर । जो वस्तु नित्य है, उसका गुण निश्चित होता है अथवा गुणाभाव निश्चित होता है । ' उन ( अफलातून ) - के मतसे ' इन्द्रिय- सम्बद्ध जगत् जाना नहीं जा सकता । ' यदि पूछा जाय कि 'जो विज्ञान अनुभूत होता है, वह किसका है? ' तो उनके मतसे उत्तर है— ' रूपजगत्का अथवा धारणाओंका । ' इन्द्रियानुभूत ( वस्तुओं ) -में गुणोंकी उपलब्धिका कारण रूप है । उसीसे उसमें सत्यत्वका आभास होता है । रूपका ही सम्यग्ज्ञान होता है । रूपशब्दसे यहाँ शाश्वतिक रूप लेना चाहते हैं । सारांश यह कि अपूर्ण बाह्य जगत्की अपेक्षा नित्यसिद्ध पूर्णताका ही अन्वेषण करना चाहिये । अरस्तूने बाह्य एवं आन्तर दोनोंकी व्याख्या की है । ' व्यापक विचारोंसे ही तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है ' यह तो उन्हें भी मान्य ही है ।

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२६ मार्क्सवाद और रामराज्य वे रूपको वस्तुसे संश्लिष्ट ही मानते हैं, अत्यन्त पृथक् नहीं । अफलातूनकी रेखागणितमें अभिरुचि थी, इसलिये काल्पनिक वस्तुकी ओर उनका स्वाभाविक झुकाव रहा । अरस्तूकी जीवविज्ञानमें रुचि थी, इसलिये प्रकृतिके विकार, परिवर्द्धन आदि संस्कारोंकी प्रबलताके कारण अपरिवर्तनीय धारणा आदिके सम्बन्धमें इनकी रुचि रही । उनके मतसे आकारमण्डित ही वस्तु विशिष्ट रूप ग्रहण करती है । विभिन्न वस्तुओंका वस्तुतत्त्व और रूप पृथक् - पृथक् होता है । जैसे मूर्तिका वस्तुतत्त्व पाषाण है और शिल्पिकृत रूप ही रूप है । वनस्पति, पशु, मनुष्य आदिका शरीर-संघटन वस्तुतत्त्व है । रूप है; पचन-क्रिया, इन्द्रियानुभूति और बोध । रूपके बिना वस्तु कुछ नहीं है; क्योंकि धरणी, जल, अनल, अनिल आदि भी किसी मूल वस्तुके अवस्थाविशेष ही हैं । विश्वका गतिदायक परमेश्वर है, जो स्वयं गतिहीन है । उसकी सत्तामात्रसे विश्व पूर्णताक ओर अभिमुख होकर विकासोन्मुखी है । जिस वस्तुमें जितने अधिक रूप हैं, उसका उतना ही अधिक महत्त्व है । आम्रका वस्तुभूत वृक्ष है और वृक्षका रूप आम्रफल है, परंतु वृक्ष भी वनका रूप है । उसकी दृष्टिसे वन वस्तु है । यहाँ एक ही पदार्थ किसीकी दृष्टिसे रूप है और किसीकी दृष्टिसे वस्तु । अरस्तूकी दृष्टिसे भी सभी वस्तुएँ बीजरूपसे स्थित हैं ही । सारा-का- सारा वटवृक्ष बीजमें अवस्थित है । उपयुक्त सामग्रीसे उसके आवरणका अपनयन होनेपर उसकी अभिव्यक्ति हो जाती है । विकासोन्मुख वस्तुओंमें विकासानुगुण ( विकासोचित या विकासोपयुक्त) शक्तियोंकी कल्पना कर लेनी चाहिये । वृद्धिशील वस्तुओंकी प्रवृत्ति किसी उद्देश्यसे ही होती है । विश्व कहाँसे और क्यों दृष्टिगोचर होता है, इस प्रश्नका उत्तर वस्तु, रूप, सुप्तशक्ति एवं वास्तविकता- इन चार बातोंसे होता है । बीज वृक्षका भौतिक हेतु है । दूसरा है नियम, जिससे आम्रवृक्षसे आग्रहीका वृक्ष होता है, पनस ( कटहल ) -का नहीं । तीसरा - कर्ता, जिसकी प्रेरणासे क्रिया निर्वृत्त होती है । वास्तविकता चौथा हेतु है, जिसके उद्देश्यसे बीजकी प्रवृत्ति होती है । बीजके क्षेत्रमें यह आम्रफल है,