मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 191–200
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200
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विकासवाद १८७ चुनाव एवं योग्यतम रक्षाका सिद्धान्त सिद्ध होता है । ' फिर डार्विनने यह माना कि ' मेरी यह कल्पना तभी सिद्धान्तित होगी, जब चिरकाल बीतने पर भी वैज्ञानिक परीक्षामें इसके विरुद्ध कोई बात न मिले । ' अध्यात्मवादी सिद्धान्तकी दृष्टिसे डार्विनकी इस कल्पनामें कोई अपूर्व बात नहीं । वेदान्तियोंका ब्रह्म, सांख्योंकी प्रकृति अनन्त प्रपंचका भण्डार है । उसमें शक्तिरूपसे सभी वस्तुएँ रहती हैं । प्रथम कारणावस्थामें कार्य- शक्तियाँ अव्यक्त रहती हैं, क्रमेण सहकारी सापेक्ष होकर व्यक्त होती हैं । धरतीमें ही अनगिनत बीज रहते हैं । विशिष्ट जल - वायुके योगसे अंकुरित, पुष्पित, फलित होनेपर उनके भेद दृष्टिगोचर होते हैं । मिट्टीके विभिन्न बर्तनों, सुवर्णके अनेक भूषणोंकी कारणावस्था तो एक-सी होती है । सहकारी मिलनेपर कुलाल एवं सुवर्णकारके इच्छानुसार कार्यावस्थामें उनके अनेक रूप व्यक्त होते हैं । सारूप्य- वैरूप्य ही तो जगत्की विचित्रताका रूप है । नैयायिकोंने भी पदार्थोंके साधर्म्य- वैधर्म्यका विश्लेषण किया है । एक- एक अवान्तर कारणावस्था या मूल कारणावस्थासे भिन्न-भिन्न चेतनाचेतन वस्तुओंका विकास या प्रादुर्भाव हुआ है । ये सब बातें अध्यात्मवादमें हजम हो जाती हैं । संघर्ष भी प्राणियोंमें दृष्ट ही है । कई लोगोंने यह भी दृष्टान्त रखा है कि एक पात्रमें एक सेर किशमिश या मुनक्का रख दें, तो कुछ दिनोंमें इसमें एक ढंगके कीट उत्पन्न हो जाते हैं । पहले उनकी संख्या खूब बढ़ती है, पुनश्च ज्यों- ज्यों वे बढ़ते हैं, एक- दूसरेका भक्षण करते हैं । प्रबल दुर्बलका भक्षण करते हैं । अन्तमें एक मोटा-सा कीड़ा उस पात्रमें दिखायी देता है । पानी एवं जंगलके जानवरोंमें यह भक्ष्य - भक्षक - भाव ' मात्स्यन्याय ' नामसे प्रसिद्ध है ही । भारतीय शास्त्रोंने लिखा है कि हस्तहीनोंको हस्तवाले, अपदोंको पदवाले तथा छोटोंको बड़े जीव खा जाते हैं । इस तरह जीव ही जीवोंका जीवन है—
अहस्तानि सहस्तानामपदानि चतुष्पदाम्। फल्गूनि तत्र महतां जीवो जीवस्य जीवनम्॥
( श्रीमद्भा० १। १३ । ४७) फिर भी यह स्वाभाविक नहीं, किंतु क्षुधाका ही यह सब उपद्रव
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१८८ मार्क्सवाद और रामराज्य है । क्षुधा बिना कोई किसी का भक्षक नहीं बनता । क्षुधा ही मृत्यु है— "'अशनाया वै मृत्युः ' ( उपनिषद्) । स्वभावसे सभी प्राणी ' अमृतस्य पुत्राः ' परमेश्वरके पुत्र हैं । अतः सबमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृता ही स्वाभाविक है । अनादि, अविद्या, काम, कर्मके कारण ही देहादि तादात्म्याध्यासके कारण क्षुधा पिपासा एवं मृत्युका उपद्रव उपस्थित होता है । विकासके सम्बन्धमें आधुनिक लोगोंको भी कई दोष प्रतीत होते हैं । जिन भिन्न प्रकारके व्यक्तियोंमेंसे देशकालोपयुक्त व्यक्तियाँ योग्यतमरूपसे प्रकृतिद्वारा चुनी जाकर रक्षित, परिवर्तित होती हैं और तदनुसार नाना प्रकारके जन्तुओंका विकास होता है, उन व्यक्तियोंमें प्रथम भेद कहाँसे आया? जन्तुओंको जाति- भेदका मूल बतलानेवाली विकास - कल्पना अन्तिम व्यक्तिभेदपर जब पहुँचती है, तब उसे रुकना ही पड़ता है । डार्विनने अवस्थाभेदसे, इन्द्रियों और शक्तियोंके उपयोग- अनुपयोगसे भी व्यक्तियोंमें प्रथम भेद माना है । सर्दी-गर्मी आदि अवस्थाओंके भेदसे व्यक्तियोंमें भेद होता है । जिस शक्ति या इन्द्रियका उपयोग होता है, वह सुरक्षित होती है । जिसका उपयोग नहीं होता, वह नष्ट हो जाती है । इन कारणों या अन्य कारणोंसे होनेवाले भेदोंकी रक्षा और वृद्धि कैसे होती है, यही दिखलाना डार्विनके विकास- सिद्धान्तका लक्ष्य है । अध्यात्मवादमें तत्तत् अनन्त विचित्र कार्योंके अनुगुण उन-उन कारणोंमें शक्तियाँ ही होती हैं । सूक्ष्म वट- बीजमें अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प, फलादि विचित्र रूप, रस एवं गन्धयुक्त विभिन्न पदार्थोंकी शक्ति होती है, वही कार्यरूप फलके बलसे अनुमेय होती है । सर्वथा असत्का विकास कभी भी हो नहीं सकता । इस दृष्टिसे तो प्रथम भेद या अन्तिम भेद, सबका ही मूल कारण शक्तिभेद है । विभिन्न चेतन जीवोंका उनसे सम्पर्क कर्मानुसार है, यह भी स्पष्ट है । डार्विनके मतानुसार-' मनुष्यकी बुद्धि एवं शरीरकी पशुओंकी बुद्धि एवं शरीरमें समानता मिलती है, अतः जैसे मछलियोंसे कछुआ, पक्षी आदि क्रमसे बन्दरोंका आविर्भाव हुआ, वैसे ही बन्दरोंसे मनुष्योंका
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विकासवाद १८ ९ आविर्भाव हुआ । ' डार्विनके मतानुसार ' बन्दर यदि मनुष्यके पूर्वज नहीं तो उनके चचेरे भाई अवश्य हैं अर्थात् दोनोंके पूर्वज अवश्य एक हैं । पशुओंमें स्मृति, सौन्दर्य, ज्ञान, सहानुभूति आदि गुण मनुष्यके समान ही होते हैं । घोड़ों, कुत्तों आदिको शिक्षित किया जाता है । अतः उनमें विवेक भी रहता है । सामान्य कीटोंसे लेकर मनुष्यतक क्रमेण विकास मानना ही उचित है । बीचकी श्रेणियोंको छोड़कर कीड़ों एवं मनुष्योंका भेद बहुत भारी मालूम पड़ता है, किंतु क्रमानुगत रूपसे देखें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं लगती । इसी तरह मनुष्यकृत यन्त्रों एवं ग्रह आदि अन्य पदार्थोंका इतिहास देखें तो अन्तिम और आदिम अवस्थामें आकाश-पातालका अन्तर प्रतीत होता है; परंतु क्रमोन्नति देखनेपर कोई आश्चर्य प्रतीत नहीं होता । ' अध्यात्मवादियोंके मतानुसार मूल कारणसे विभिन्न विचित्र ढंगकी सृष्टि शक्ति- वैचित्र्य, कर्म -वैचित्र्यसे संगत होती है । अवान्तर कार्यों एवं कारणोंकी भी परम्परा ठीक ही है । कुछ कार्य- कारणोंमें प्रकृति-विकृति भाव भी मान्य है । जैसे मूल प्रकृतिसे महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे अहंतत्त्व, अहंसे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे तेज, उससे जल एवं जलसे पृथ्वी और उससे विभिन्न पार्थिव जगत् उत्पन्न हुआ, परंतु जैसे सीधे मुकुटसे कुण्डल, कुण्डलसे कटक उत्पन्न नहीं होता, भले ही किसी अंशमें समानता भी हो, वैसे ही रूप शब्द नहीं बनता, शब्द सीधे गन्ध नहीं बनता । निम्ब, आम्र, पनस, कदम्ब – ये सब एक-दूसरेसे उत्पन्न नहीं होते, ठीक वैसे ही मछलीसे बन्दर एवं बन्दरसे या उसके पूर्वजसे मनुष्यके बननेकी कल्पना भी निराधार ही है । अवश्य देश, काल और जलवायुकी विशेषताओंके कारण उनके गुणों, आकृतियोंमें कुछ ह्रास- विकास होते हैं, परंतु वह एक सीमाके भीतर ही । किसी - न- किसी रूपमें सभी वृक्षों, फलों तथा पुष्पोंमें समानता है, परंतु इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकता कि किसी एक मूलके ही ये क्रमिक विकास हैं । यदि विभिन्नताओं एवं विचित्रताओंकी सूक्ष्म शक्तियाँ कहीं माननीय हैं तो कारणोंमें ही मानना उचित है । बीचसे
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१ ९० मार्क्सवाद और रामराज्य यदि अंकुरका विकास होता है, तो बीजसे दूसरे ढंगका विकास नहीं होता; पुष्पसे फलका विकास होता है तो पुष्पसे पुष्पका विकास नहीं होता । उसी तरह यदि मछलीसे क्रमेण बन्दर आदि बने और बन्दरसे मनुष्य बन गये, तो पुनः मछलीसे मछली ही बननेकी परम्परा क्यों विद्यमान है? ऐसे ही बन्दरसे बन्दर बननेकी परम्परा क्यों कायम है? जैसे प्राचीन कालमें बीजसे अंकुर उत्पन्न होते थे, वैसे ही आज भी हो रहे हैं । इस न्यायसे पहलेके समान आज भी बन्दरोंसे मनुष्योंकी सृष्टि क्यों नहीं हो रही है? इस तरह मनुष्येतरसे मनुष्योंकी उत्पत्तिका न दिखायी देना, मछली एवं बन्दर आदिसे आज भी मछली एवं बन्दरोंकी उत्पत्तिका दिखायी देना विकासके विरुद्ध ही है । डार्विनके मतानुसार ' प्रतिद्वन्द्विता एवं संघर्ष ही शाश्वत और सार्वत्रिक है । सहानुभूति, परोपकार, दया आदि भी स्वार्थके लिये ही हैं । कभी मनुष्य मनुष्यका बर्बर संहारक हो जाता है, कभी बन्दर भी अपने मालिकके लिये प्राणतक दे देता है । प्रशंसा योग्य कर्मोंमें प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है, निन्दित कामोंसे मनुष्यकी निवृत्ति होती है, धीरे- धीरे अभ्यास हो जाता है । परार्थ-प्रवृत्ति एवं सहानुभूतिके कार्योंमें प्रवृत्ति होने लगती है । इससे प्रतिद्वन्द्विता सिद्धान्तमें कोई बाधा नहीं पड़ती ।' अध्यात्मवादी ठीक इसके विपरीत कहते हैं कि स्वाभाविक अभिन्नता, समानता एवं सहानुभूति है । द्वैत, भेद, कलह, प्रतिद्वन्द्विता, क्षुधा, स्वार्थ आदि ही अविद्या, काम, कर्मके अनुसार आदत पड़ जानेसे स्वाभाविकसे प्रतीत होते हैं । ईश्वरके सम्बन्धमें डार्विनने कुछ नहीं कहा, परंतु लोगोंके दुःख देखकर उसे कभी -कभी यह सन्देह अवश्य होता था कि ' यदि कोई परमकारुणिक, सर्वज्ञ जगत्का निर्माता या शासक है तो उसे अपने उत्कृष्ट ज्ञानद्वारा दुःखरहित ही संसार बनाना चाहिये था । ' परंतु ईश्वरवादी तो ईश्वरके समान ही उसके अंशभूत चेतन जीवों एवं अविद्याको भी अनादि मानते हैं और अविद्यावान् जीवोंके कर्मानुसार ही सृष्टि होती है । अतः सुख-दुःख एवं तत्तत्साधनोंसे पूर्ण जगत्की विचित्रता मान्य होती
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विकासवाद है । विवेक, वैराग्य, तत्त्वसाक्षात्कारके लिये सुखकी अपेक्षा दुःख अधिक उपकारक है, अतः संसारमें दुःखका भी अस्तित्व ईश्वरको अभीष्ट है । जैसे लौकिक शासक अपराधीकी आत्मशुद्धिके लिये कभी- कभी दण्ड-विधान आवश्यक समझते हैं, वैसे ही ईश्वर भी । स्पेंसरकी मीमांसा हर्बर्ट स्पेंसर, हेमिल्टन एवं माइन्सेल आदि विकासानुयायियोंने ईश्वर माननेमें कई आपत्तियाँ उपस्थित की हैं, जैसे यदि ' स्वतन्त्र जगत्-कारण ईश्वर जगत् बाह्य है, तो उसका जगत्से कोई सम्बन्ध ही नहीं । बिना सम्बन्धके कोई ज्ञान ही होना कठिन है । यदि जगत्से सम्बन्ध हुआ, तो स्वतन्त्रता कैसे रह सकती है ' इत्यादि । परंतु ईश्वरवादियोंकी दृष्टिमें इन तर्कोंका कोई महत्त्व नहीं है । कारण, ईश्वर जगत् के भीतर रहता हुआ भी कमल - पत्रवत् निर्लेप रहता है, अतः सबको जानता हुआ भी स्वतन्त्र रहता है । शासक भी कारागारमें जाता है, किंतु दण्ड भोगने नहीं अपितु सुव्यवस्थाके लिये । वस्तुतः सर्वद्रष्टा, सर्वशक्तिमान्, स्वतन्त्र परमेश्वरसे ही नियमित विकास भी बन सकता है । अचेतन प्रकृति या अन्य कोई भी जडतत्त्व नियमित क्रमिक विकास करनेमें सर्वथा ही असमर्थ ठहरते हैं । लोकमें विकासकी नियमित योजनाका निर्माण एवं उसका संचालन चेतनोंद्वारा ही होता है । अतः प्राकृतिक विकासके प्रोग्राममें चेतन ईश्वरका हाथ होना अनिवार्य है । अतएव प्रायः संसारका मूल कुछ रहस्यमय या अप्रमेय है । उसका सम्पूर्णरूपसे कोई भी वर्णन नहीं कर सकता, ऐसा विकासवादी भी मानते हैं । इन लोगोंका कहना है ' दिक्, काल, द्रव्य, धृति, शक्ति, चित्त, आत्मा, परमात्मा आदि प्रत्यय हैं । उनका मूल एवं स्वभाव दुर्बोध एवं अनिर्वचनीय है । ' अवश्य ही केवल प्रत्यक्ष प्रामाण्यवादीके लिये उक्त वस्तुओंका निर्णय कठिन है, परंतु अनुमान, आगम आदिद्वारा तो कोई भी वस्तु अज्ञेय नहीं है । हर्बर्ट स्पेन्सर तो सभी मतोंका आधार प्रत्यक्ष ही मानता था । इसलिये उसके मतानुसार ' न कोई मत अत्यन्त सत्य है, न अत्यन्त असत्य ही । अतः सभी मतोंका सामान्यांश ग्रहण करना ठीक
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१ ९ २ मार्क्सवाद और रामराज्य है । ' इसी आधारपर वह उक्त पदार्थोंको ' अज्ञेय' मानता है । उसके मतानुसार विशेष वस्तुओंको सामान्यमें और सामान्यको पुनः उच्च सामान्यमें ले आना चाहिये । अन्तमें उस परासत्तामें ही स्थिरता होनी चाहिये । जिसका किसीमें अन्तर्भाव नहीं होता, उसे ' अनिर्वचनीय ' कहा जाता है । उसके मतानुसार ' ज्ञान सम्बन्ध ग्रहण-स्वरूप होता है, अतः एक वस्तुका वस्त्वन्तरसे भेद सादृश्यादिके बिना नहीं हो सकता । अप्रमेयमें भेद-सादृश्य आदिका ग्रहण होना असम्भव है । ' स्पेंसरके मतानुसार ' ईश्वरका स्वरूप क्या है, यह नहीं जाना जा सकता । किंतु सत्ता मानी जाती है । सम्बन्ध ग्रहण सापेक्षबोध ईश्वरमें नहीं पहुँचता, अतः सम्बन्धातीत अप्रमेय कारणशक्ति मान्य होनी चाहिये । ' वस्तुतः स्पेंसरके इस तर्कसे तो किसी भी वस्तुका बोध नहीं हो सकता; क्योंकि एक वस्तुसे भिन्न सभी वस्तुओंसे उसका किसी -न- किसी ढंगका सम्बन्ध रहता ही है । फिर एक अल्पज्ञ व्यक्तिको सब वस्तुओंका ज्ञान सम्भव नहीं और न सबके साथ उसके सम्बन्धका ही ज्ञान हो सकता है । इस तरह सभी ज्ञान भ्रमात्मक ही ठहरेंगे । अतः ' सप्रकारक, निष्प्रकारक, दोनों ही प्रकारके ज्ञान होते हैं । ' यही सिद्धान्त मानना पड़ेगा । भले ही द्रव्यका गुण क्रिया-समन्वितरूपसे ही ग्रहण हो, फिर भी वस्तु-स्वरूपका भी ग्रहण होता ही है । रूप, सम्बन्ध आदि पदार्थोंका स्वरूप-ज्ञान भी होता है । एतावता ईश्वर, काल आदि भी, अप्रमेय, अज्ञेय नहीं कहे जा सकते । हाँ, सर्वज्ञाता, सर्वद्रष्टा दृश्य या ज्ञेय नहीं हो सकता; क्योंकि एक ही स्वयं ज्ञाता और ज्ञेय दोनों नहीं हो सकता । ऐसा होनेसे कर्म - कर्तृ- विरोध होता है । वही कर्त्ता अपनी क्रियाका कर्म नहीं बन सकता । द्रष्टाका भी द्रष्टा यदि अन्य माना जाय, तो फिर उसका द्रष्टा और फिर उसका भी द्रष्टा ढूँढ़ना पड़ेगा । इस तरह अनवस्था-प्रसंग होगा । सर्वद्रष्टा जिससे दृश्य होगा, उसका द्रष्टा नहीं हो सकेगा; क्योंकि कोई भी दृश्य अपने द्रष्टाका द्रष्टा नहीं हो सकता । ऐसी स्थितिमें उसको सर्वद्रष्टा नहीं कहा जा सकता । अतः प्रमाण व्यापारसे अज्ञाननिवृत्ति तथा स्वप्रकाशरूपसे आत्माका बोध मानना उचित
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विकासवाद १ ९३ है । इसी तरह प्रत्यक्ष, अनुमान, आगमादि प्रमाणोंके आधारपर काल आदिका भी ज्ञान होता ही है । कुछ भी हो, अज्ञेयरूपसे भी तो विद्यमान वस्तुका एक ज्ञान मानना पड़ता है । इसीलिये स्पेंसर आत्मा- अनात्मा, जड - चेतनको शक्तिका ही रूपान्तर मानता है, परंतु विचार करनेपर यह भी सत्य नहीं ठहरता । आत्मा तो मूल पदार्थ है, शक्ति उसका अंश है । जैसे वह्निमें दाहिका शक्ति होती है, वैसे ही आत्मामें प्रपंचोत्पादिनी शक्ति मान्य होती है । सांख्य-मतानुसार भी आत्मा एक स्वतन्त्र पदार्थ माना जाता है । स्पेंसरके मतानुसार ' शक्तिकी सार्वकालिक सत्ता ही मूल परमार्थ है । उसीसे द्रव्यकी अनश्वरता, गतिका सातत्त्य, शक्तियोंके सम्बन्धकी नित्यता अर्थात् नियमोंकी एकरूपता, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, शक्तियोंका परिणाम एवं तुल्यपरिवर्तिता, गतिका दिनियम अर्थात् उसकी अल्पतमावरोध, रेखानुसारिता, गुरुत्वाकर्षणानुसारिता, इन दोनोंका योग और गतिका अविच्छिन्न प्रवाह आदि निकलते हैं । उसी शक्तिके नियम सब प्रमेय पदार्थोंमें लगे हुए हैं । इन नियमोंमें सबसे व्यापी नियम विकासका नियम है । इसके अनुसार द्रव्यका सदा ही आन्तर परिवर्तन होता रहता है । संसारका प्रत्येक अवयव और समस्त संसार सदा ही ' विकास ' एवं ' विच्छेद' इन दो व्यापारोंमें लगा है । विकासावस्थामें द्रव्यका संघीभाव और विच्छेदावस्थामें शिथिलीभाव होता है । ' वस्तुतः यह अंश सांख्योंके मतसे मिलता - जुलता है । वे भी प्रकृतिको ही आत्म- भिन्न सब व्यक्त प्रपंचका मूल मानते हैं । ' चलञ्च गुणवृत्तम्' के अनुसार व्यक्त- अव्यक्त सभीको गतिशील मानते हैं— ' क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः । ' चितिशक्तिको छोड़कर सभी भावोंको वे क्षणपरिणामी मानते हैं । उनके असंगचेतन व्यापक पुरुष स्वतन्त्र माने जाते हैं । सांख्यके सद्वादका ही प्रत्यभिज्ञान इस मतमें भी होता है । सांख्यानुसार सत्का विनाश एवं असत्की उत्पत्ति नहीं होती । केवल अवयवोंके संघीभावसे आविर्भाव या विकास होता है एवं अवयव -विच्छेदसे तिरोभाव होनेसे ही नाशका 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_7_1_Front
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१ ९४ मार्क्सवाद और रामराज्य व्यवहार होता है । प्रकृतिके स्वभावका उसके परिणामोंमें अनुवृत्त होना भी उन्हें मान्य है । प्रकृति सुख-दुःख -मोहात्मक है, अचेतन है । इसीलिये उसका परिणाम प्रपंच भी सुख-दुःख-मोहात्मक एवं अचेतन है । स्पेंसर इस विकासकी तीन श्रेणियाँ मानता है– ( १ ) ' शक्तिका केन्द्रस्थ होना, जैसा कि बादलोंके इकट्ठा होनेमें प्रारम्भिक बदलीका और कीटाणुओंके जीवन - केन्द्रोंमें देखा जाता है । ( २ ) भेदीकरण— मूलका बहिरावेष्टनसे अलग होकर उसमें आन्तरिक भेद होना और ( ३ ) स्पष्टीकरण– अर्थात् भेदोंका निश्चितरूप एवं आपसमें सम्बन्धित होकर एक सुव्यवस्थित पूर्णरूप धारण करना । विकास और विच्छेदका भेद यही है कि विकासमें भेदके साथ संघटन है और विच्छेदमें संघटनका अभाव है । विकासकी गति अनिश्चित सम्बन्ध और व्यवस्थारहित एकरूपतासे निश्चित सम्बन्ध और व्यवस्थापूर्ण अनेकरूपताकी ओर होती है । उदाहरणार्थ निम्नश्रेणीके जीवोंमें विशेष इन्द्रियभेद नहीं होता, कहीं - कहीं लिंगभेद भी नहीं होता । एक ( स्पर्श ) इन्द्रियसे ही सब इन्द्रियोंका कार्य चलता है, परंतु जैसे -जैसे जन्तु विकासकी श्रेणीमें बढ़ते जाते हैं, वैसे - वैसे उनमें इन्द्रियभेद बढ़ता जाता है और साथ ही विभिन्न इन्द्रियोंमें सम्बन्ध भी स्थापित होता जाता है । मनुष्यमें सब इन्द्रियाँ स्पष्ट होती हैं और तभी अपने -अपने सम्बन्धसे मनुष्य - शरीरकी रक्षा एवं वृद्धिमें योग देती हैं! ' स्पेंसरके मतानुसार ' विकासका यह नियम सभी विषयोंमें लगता है । ' सांख्यानुसार कारणगत प्रकाश, हलचल एवं अवष्टम्भ आदि गुणोंके अंगांगीभावरूप वैषम्यके अनन्तर ही तिरोधायक आवरणसे बहिर्भूत होकर कार्यकी स्पष्टता होती है । बीज और मृत्पिण्डके विघटनपूर्वक अंकुर एवं घटादिके आविर्भावानुकूल संघटनक्रियासे ही अंकुर एवं घटकी अभिव्यक्ति होती है । अनेकता एवं व्यवस्था भी सांख्यानुसार घटके समान अभिव्यक्त ही होती है । अपूर्वकी उत्पत्ति नहीं होती । चेतना एवं इन्द्रियाँ भी विद्यमान ही थीं, केवल उनकी अभिव्यक्ति ही होती है । अभिव्यक्तिमें ही क्रम मान्य है । अत्यन्त अविद्यमानका बालूसे तेलके समान कभी 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_7_1_Back
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विकासवाद १ ९५ भी आविर्भाव नहीं होता । उसी तरह सत्का नाश भी नहीं होता । विकासमें ' भूतपदार्थका एकीकरण और गतिका वितरण होता है, विच्छेदमें गतिका तिरोभाव और भूत पदार्थका अनेकीकरण या वितरण होता है । यह विकास और विच्छेदका नियम विश्वके लिये एक साथ ही प्रयुक्त नहीं होता, किंतु एक भागमें विकास तो दूसरे भागमें विच्छेदका आरम्भ होता है । ' सांख्यमतानुसार ' गति तो हर समय ही रहती है, किंतु एक कारणमें अनेक कार्य युगपत् नहीं हो सकते । अतः कार्यान्तरके आविर्भावके लिये प्रथम कार्यका तिरोभाव आवश्यक होता है, जैसा कि घटके आविर्भावके लिये पिण्डावस्थाका तिरोभाव अपेक्षित होता है । ' इसीलिये विकास - विच्छेदका क्रम भी संगत हो जाता है । स्पेंसरने जीवशास्त्रका तत्त्व बतलाते हुए कहा है कि आन्तर सम्बन्धोंके साथ अविच्छिन्न मिलावट ही जीवनतत्त्व है । जैसे-जैसे बाह्य एवं आन्तरिक सम्बन्धोंका साम्य होता है, वैसे - वैसे इन्द्रिय एवं शरीरसम्बन्धी विकासके क्रममें उच्चता होती है । मनस्तत्त्वके सम्बन्धमें उसने कहा है कि ' मनस्तत्त्व विज्ञानगम्य नहीं है । जिन अवस्थाओंमें वह प्रकाशित होता है, केवल उन अवस्थाओंकी अभिव्यक्ति ही विज्ञानाधीन होती है । ' उसके मतानुसार ' स्नायुनिष्ठ आघातसे ही संवित्की अभिव्यक्ति होती है, संवेदन और उसके सम्बन्धोंसे ही चित्त बनता है । संवेदनोंके स्मरण, परस्पर सम्बन्ध और संघीभावसे समस्त संवित्का बनना वह मानता है । इसीलिये चित्तकी भिन्न वृत्तियोंमें परस्पर अत्यन्त भेद नहीं होता । चित्त व्यापारमें प्रतिफलन, स्वाभाविक क्रिया, स्मरण और विवेक ये क्रम हैं । संवित्के जो आकार व्यक्तियोंमें स्वाभाविक और सहज हैं, वे भी जातिमें किसी-न- किसी समय अनुभवसे ही प्राप्त माने जाते हैं । पीछेसे स्नायुजालमें जमकर वे परम्परागत हो जाते हैं । ' स्पेंसरने इसी प्रकार अनुभववाद और सहजज्ञानवादका साम्य स्थापित किया । किंतु यहाँ भी यह प्रश्न बना ही रहता है कि प्रारम्भिक मनुष्योंमें ऐसे ज्ञानकी नींव किस प्रकार पड़ी? प्रारम्भकालमें अनुभव किस प्रकार स्वतन्त्र हो सकता है? वस्तुतः स्नायुके आघात अथवा 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_7_2_Front
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१ ९६ मार्क्सवाद और रामराज्य विषयेन्द्रिय- संनिकर्ष, शब्द-प्रमाण या व्याप्तिज्ञानसे सात्त्विक मनकी ही विषयाकाराकारित वृत्ति उत्पन्न होती है । उसी वृत्तिपर अभिव्यक्त आत्मचैतन्यसे ही वस्तुका प्रकाश होता है । जैसे पार्थिव होनेपर भी सामान्य पाषाणोंपर सूर्यका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता, परंतु स्फटिकपर प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही सामान्य जड पदार्थोंपर आत्मचैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता, परंतु सात्त्विक अन्तःकरण -परिणामरूप वृत्तियोंपर आत्मचैतन्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि एक ही वस्तुके अवस्थाभेद हैं । वेदान्तसिद्धान्तानुसार अन्तःकरण सूक्ष्म पञ्च महाभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशका परिणाम है । ग्राह्य-ग्राहकभाव सजातीयमें ही दृष्ट है । पार्थिव घ्राणेन्द्रियसे पार्थिव गन्धका ग्रहण होता है । तैजस चक्षुरिन्द्रियसे तैजस रूपका ग्रहण होता है । इसी तरह आकाशीय श्रोत्रेन्द्रियसे आकाशीय शब्दका, वायवीय त्वगिन्द्रियसे वायवीय स्पर्शका और जलीय रसनेन्द्रियसे जलीय रसका ग्रहण होता है । मनसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध— इन पाँचों ही विषयोंका ग्रहण होता है । अतः उसे सूक्ष्म पंचमहाभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशका परिणाम मानना प्रामाणिक है । छान्दोग्य उपनिषद्में तो स्पष्ट ही अन्वय- व्यतिरेकसे मनस्तत्त्वको अन्नमय सिद्ध किया गया है । अन्नके अभावमें मनकी कलाएँ घटती हैं और अन्नके अस्तित्वमें उसकी कलाएँ उपोद्बलित होती हैं- ' अन्नमयं हि सौम्य मनः । ' संकल्प, विकल्प, स्मरण, निश्चय, अभिमान आदि सब इस चित्त या मनके ही परिणाम हैं । अभिव्यक्ति चिदंश ही ' संवित्' शब्दसे कहा जाता है और उच्च वेदान्त- सिद्धान्तानुसार तो अखण्ड, अनन्त बोधस्वरूप ब्रह्मात्मा ही मननीशक्तिविशिष्ट होकर मनस्तत्त्वरूपमें विवर्तित होता है । अखण्ड बोध ब्रह्म एवं साक्षीस्वरूप आत्माका अंशभूतसे जो भी ज्ञान होता है, वह प्रमाणके द्वारा प्रमात्मक होता है और सदोष प्रमाणोंसे भ्रमात्मक ज्ञान होते हैं । स्पेंसरके मतानुसार ' बाह्यशरीरके द्वारा स्नायु तन्तुओंपर आघात होता है । उससे ज्ञान उत्पन्न होता है । चित्त एवं शरीर दोनों ही अप्रेमयके रूपान्तर हैं । संवित्के एकीभाव और विभागका प्रवाहरूप चित्त है । इसके 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_7_2_Back