मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 31–40
मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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- पाश्चात्य दर्शन २७ चित्रकारके क्षेत्रमें सम्पूर्ण चित्र है । यह सारा यूनानी भाषामें ' टेलिओलौजी ' सिद्धान्त कहलाता है । यान्त्रिक हेतु इससे भिन्न है । वह कार्यका पूर्ववर्ती तथा भावी ( कार्य ) -का निर्णायक होता है । सामग्री सम्पूर्ण रहे तो कार्योत्पत्ति निःसंदिग्ध है । जैसे छोटे - छोटे यन्त्र महान् यन्त्रके चलानेवाले होते हैं । ‘ टेलिओलौजी ' सिद्धान्त बतलाता है कि ' इस बातपर भी ध्यान देना चाहिये कि कारण न हो तो वस्तु क्या हो जाय और किस उद्देश्यसे उसकी प्रवृत्ति होने लगे । सर्वत्र सुकल्पित, सुसंघटित व्यवस्था ही ईश्वरके अस्तित्वको भी सिद्ध करती है । ' ' अचेतन माया प्रकृति ही अन्य सभी चेतनोंका मूल है ' यह भी उनका मत है — कि ‘ अन्तर्निहितशक्तिवाले भूत ही जीव, जन्तु, वनस्पति आदि रूपमें परिणत हो जाते हैं । जिस प्रकार जीर्ण- शीर्ण काष्ठ, सड़े- गले गोबर तथा गीले बालोंसे कीड़े, बिच्छू तथा जूँ आदि उत्पन्न हो जाते हैं । ' पर वास्तवमें ऐसी बात नहीं है । यद्यपि इस मतकी विस्तृत समालोचना आगे चलकर मार्क्सदर्शनकी समीक्षाके अवसरपर की जायगी तथापि यहाँ इतना कह देना आवश्यक है कि गोबर, काष्ठ, लोम, केशादिकोंसे बिच्छू आदिके जड कलेवरकी ही उत्पत्ति होती है, न कि उनके चेतन आत्माकी । वह तो सदाके अनुसार अन्यत्रसे ही आता है, वहाँ उसकी अभिव्यंजनामात्र होती है । जैसे लोहा-लक्कड़, कोयला, पानी आदिपर स्वतः विद्यमान अग्निकी ही अभिव्यक्ति होती है, वैसे ही विद्यमान चेतनकी ही तत्तत् शरीरोंमें अभिव्यक्ति होती है । आधुनिकोंमें बहुतोंका मत यह है कि पहले वस्तुओंको देखनेके साधन यन्त्र ऐसे नहीं थे, इसलिये समष्टि दृष्टिसे विचार- परम्परा चल पड़ी । ' मानसिक विचारोंसे ही तत्त्वबोध हो सकता है ' इस धारणाका भी मूल कारण यही है । अरस्तूने ज्ञानरश्मियुक्त आत्माओंके जन्मान्तर माने हैं । भौतिकवादियोंका कहना है कि यह उनका भ्रम ही था; क्योंकि जीवविज्ञानशास्त्र का निश्चित मत है कि संस्कार एवं अन्तर्बोध इन्द्रियजन्य अनुभवका ही परिणाम है । अरस्तूके मतसे पदार्थोंमें जीवनके बीजाणु सर्वदा ही रहते हैं । संसारमें विशिष्ट श्रेणियाँ विशिष्टगुणयुक्त होती
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२८ मार्क्सवाद और रामराज्य हैं । यह विज्ञानकी विशिष्ट उन्नति है । संसारका स्वरूप बुद्धिप्रसूत है, नियन्त्रित है । इसलिये सभी वस्तुएँ नियमानुवर्ती ( नियमबद्ध ) ही हैं । परिभाषाविज्ञानसे जीवों और जीवात्मक सभी वस्तुओंकी निरुक्ति-व्याख्याकी जा सकती है । पाश्चात्योंकी दृष्टिसे अरस्तूने अपनेसे पहलेके सभी दार्शनिकोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट व्यवस्थाएँ निर्धारित की हैं । अन्य लोग उसमें भी कुछ कमी देखते हैं । वे कहते हैं कि वस्तुओंके गुण निर्धारित मान लेनेपर उनका विकास उपपन्न नहीं होगा; ( क्योंकि ) किसी एक रूपका रूपान्तरमें परिवर्तित हो जाना ही तो विकास है । स्टोइक स्कैपृक, एपिकुरस आदि नीतिके प्रपंचमें पड़े । एपिकुरसके विषयमें रोमके महाकवि ल्युक्रैटियस कैरसने कहा है कि 'जब धर्मने मनुष्योंपर आसमानसे अपना खूंख्वार फौलादी पंजा फैलाया और मनुष्योंने धर्मके भारी हमलेके सामने घुटने टेक दिये, तब यूनानके एक महापुरुषने उसका उठकर सामना किया, जिसे देवताओंका क्रोध भी विमुख न कर सका । ' सर्वाभ्युदय-निःश्रेयसहेतुभूत भगवान् धर्मके परम सुखकर स्वरूपको भी भ्रमवशात् इन लोगोंने उलटा ही समझा । ईश्वर ही संसारका मूल है I धर्म ही उसका तथा संसारके मूल परमपुरुषार्थका एकमात्र साधन है । अभ्युदय-निःश्रेयसार्थ बुद्धिमान् जन उसका सेवन करते हैं । अतः अरस्तू इत्यादिकोंका दर्शन बहुत कुछ भारतीय आस्तिक दर्शनोंसे मिलता है । उनके दर्शनका लक्ष्य सुखप्राप्तिके मार्गका ज्ञान ही है । सुख ही जीवनका लक्ष्य है । विश्वनियमोंको जान लेनेसे वह सुलभ हो जाता है. और उनके न जाननेसे ही मनुष्य ' रहस्यभूत कारण ' की कल्पना कर उससे डरता है । विमुक्ति ही सुख है, मृत्युसे अनुभवशक्ति नष्ट होती है, अतः वह उद्वेगका कारण नहीं । जब मृत्युसे अपनी या आत्माकी सत्ता ही उपलुप्त हो जाती है, तब उसके लिये चिन्ताका अवकाश ही कहाँ रह जाता है? ज्ञानसे प्रसूत होनेके कारण सुख अच्छा है । अज्ञानसे उत्पन्न होनेके कारण दुःख बुरा है । स्टोइकके मतसे गुण ही सुख है । एपिकुरसके मतसे सुखके लिये गुणकी आवश्यकता होती है । स्टोइकके मतसे गुणका
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- पाश्चात्य दर्शन २९ उपयोग गुणहीके लिये है । गुणवृत्तिसे दुःख भी सम्भव है, फिर भी गुणवृत्ति ही सुख है । एपिकुरसके मतसे गुण सुखका साधनमात्र है । यदि वह सुखका साधन न हो तो गुण ही कैसा? ( यदि सुख साधनत्व न हो तो गुणत्व ही न रहे ) । मनुष्य तबतक सुखी नहीं होता, जबतक महत्त्व, बुद्धि, न्यायशीलता आदि गुण उसमें नहीं आते, परंतु बुद्धिमत्त्व आदि गुण शाश्वत नहीं हैं, अपितु आपेक्षिक एवं परिवर्तनशील हैं । डीमोक्रीटसको प्रकृति- परमाण्वादि-सिद्धान्त भी स्वीकृत है । डीमोक्रीटसके मतानुसार ' परमाणु शून्यमें गिरते हैं । ' इस पक्षमें ‘ उन ( परमाणुओं ) -के समान गतियोंसे ही गिरनेसे जटिल गतियोंकी उत्पत्ति नहीं होती, अतः विश्वसृष्टि दुर्लभ ही हो जायगी ' अतः एपिकुरसने उनका वक्रगतिसे पतन माना है, जिससे विश्वसृष्टि उत्पन्न हो जाय । इस प्रकार वह सिद्ध करता है कि मनुष्य स्वतन्त्र इच्छावाला है, किसी अन्यके द्वारा प्रयोज्य नहीं । शून्यसे शून्यकी ही उत्पत्ति हो सकती है, और किसीकी नहीं । अन्यथा किसीसे भी कुछ भी उत्पन्न हो जाय । जो है, वह पिण्ड है, जो नहीं है, वह शून्य है ( अथवा जिसकी सत्ता है, वह पिण्ड है, जिसकी सत्ता नहीं है, वह शून्य है ) । अणु अविभक्त हैं, अपरिवर्तनीय हैं एवं गतिमान् हैं । परस्पर अभिमुख होनेसे उनका संयोग होता है । गतियाँ अनादि हैं । परिमाण और आकारके अतिरिक्त उनका कोई गुण नहीं है । उनके मतमें आत्मा भी अणु- विशेष ही है । वस्तुओंसे पृथक् जीवन- क्रियाको प्रदर्शित करनेके लिये ही आत्माकी सृष्टि हुई ( या की गयी ) है । धर्मका बन्धन छुड़ाकर प्रकृतिका अध्ययन करना ही मुख्य ' दर्शन ' है - ऐसा उन ( डीमोक्रीटस ) -के मतानुयायियोंका कथन है, परंतु ऐसा है नहीं । अणु परिमाण उसे कहना चाहिये, जिससे अन्य कोई अपकृष्ट परिमाण न हो-' यतः अपकृष्टपरिमाणं नास्ति तद् अणुपरिमाणम् । ' सूक्ष्मताकी कल्पना करते - करते वाचस्पतिकी मति भी जहाँ परिश्रान्त हो जाय, उस अविभाज्य निरतिशय सूक्ष्म अवयवको परमाणु कहते हैं । स्वतन्त्र जड परमाणुओंमें प्रपंचारम्भ या विनाशानुकूल व्यापार स्वतः सम्भव नहीं; क्योंकि चेतनानधिष्ठित जड पदार्थोंमें विलक्षण
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३० मार्क्सवाद और रामराज्य व्यवस्थित अभीष्टकार्यकारित्व सम्भव नहीं । अतएव स्वतन्त्र रूपसे वक्र गति या सीधी गतिसे भी सृष्टि निर्माण सम्भव नहीं, अपितु अदृष्ट और ईश्वरसापेक्ष ही परमाणुओंसे कदाचित् सृष्टि और विनाश होता है । मिस्रके ‘ अलेग्जैण्ड्रिया ' नगरमें बहुत-से दार्शनिकोंका आविर्भाव हुआ । पाश्चात्य एवं पौरस्त्य दार्शनिक वहाँ एकत्र हुआ करते थे । वहाँ प्लाटिनसके प्रभावसे धर्म और दर्शनका सम्मिश्रण हुआ । वे मानते थे कि ' अनन्तप्रज्ञारूपिणी रहस्यपूर्ण सत्तासे ही सब वस्तुओंकी उत्पत्ति हुई है और वह सत्ता दुर्ज्ञेय है । उसकी प्रपंचोत्पादिनी शक्तिको ही ईश्वर मानकर व्यवहार चलाया जा सकता है और वह अपने भीतर ही संकल्पसे विश्वात्माकी सृष्टि करता है । विश्वात्मा ही समष्टिजगत् एवं व्यक्तियोंकी आत्मा है । पार्थिव सम्बन्धसे अवनति होती है और उसके विच्छेदद्वारा पूर्ण सत्ताप्राप्ति ही उत्थान है । ' क्रासिस्कन, जान स्टोक्टस, एरिगेना (ई० ८१०–८७० ), रोजिलिनस ( १०५१–११२१ ) इत्यादि दार्शनिक अफलातूनके सिद्धान्तसे प्रभावित रहे और ट्रोपिनिकन, एलबर्ट्स आदि अरस्तूके । एक्विनसकी दृष्टिसे निर्गुण पदार्थ- स्वरूप ही वस्तुएँ हैं । उन्हींसे प्रपंचकी उत्पत्ति होती है । उपलब्ध वस्तुएँ रूप ही हैं । जिन रूपोंसे वस्तुओंका ज्ञान होता है, उन्हींसे मूर्ति मूर्ति हो पाती है अन्यथा निराकार पिण्ड ही रहे । वस्तुहीके समान रूप भी सत्य है । वस्तुसे भी उच्चतर सत्य रूप है । मूर्तिका रूप कृत्रिम नहीं है, न बाह्याकृति है, अपितु वस्तुका तत्त्व भी वही है और बाह्य और आन्तर भी वही है । वस्तुका रूपान्तरण ही विकासवादका सिद्धान्त है । मनुष्य पशुका रूपान्तरण है और पशु अचेतन पदार्थका रूपान्तर । एक ही मूल वस्तुसे अनेक सत्योंका संघटन सम्भव है । जीवित, चिन्तनशील, अनुभवपूर्ण मनुष्य भी वैसा ही सत्य है । ऐक्विनसके मतसे ' वस्तुतत्त्वका अनुभव तो बाह्य इन्द्रियोंसे होता है, परंतु रूपका बुद्धिसे ही होता है । ' स्कौट्स एरिजेनाके मतमें ' प्रकृतिमें विवेक तो पहलेहीसे था । यथासमय शासनशक्ति भी उत्पन्न हो जाती है तथा समय प्रकृतिके साथ उत्पन्न होनेवाला है तथापि प्रारम्भकालमें शासनशक्ति नहीं थी । विवेकसे
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- पाश्चात्य दर्शन ३१ ही शासनशक्ति उत्पन्न होती है, न कि शासनशक्तिसे विवेक । विवेकहीन शासनशक्ति दुर्बल ही रहती है । विवेक तो शासनशक्तिसे निरपेक्ष भी अपने गुणोंसे ही सुरक्षित है । ' अन्य पाश्चात्य-दर्शन रोजेनिलस आदि दार्शनिक धर्मविरोधी थे । रोजर बेकन इत्यादिने विचार- स्वातन्त्र्यमें धर्मको कुछ नहीं गिना । धर्मके विषयमें यूरोपमें उस समय सुधारकी भावना उद्भूत हुई तथापि वे सुधारक भी संकुचित वृत्तिके थे । कैलविनने सुधारक होते हुए भी ' रक्तसंचालन ' के तथ्यके आविष्कारमें लगे हुए सर्विटसको जीवित ही जलवा दिया था । बेकनका कहना है कि ' सर्वत्र श्रेष्ठ उपाय खोजना चाहिये । वस्तुके सभी अंशोंका यथायोग्य अध्ययन करना चाहिये । जिसका प्रथम स्थान हो, उसका अध्ययन प्रारम्भमें तथा दुरूहसे पहले सरलका अध्ययन कर लेना चाहिये । यह सब प्रयोगके बिना सम्भव नहीं हो सकता । आप्तवाक्य, विवेक और प्रयोग-ज्ञानके ये तीन मार्ग हैं । कारणरहित आप्तवाक्य अकिंचित्कर है, कारणके बिना आप्तवाक्यका कोई अर्थ नहीं । आप्तवाक्यपर विचार कर प्रयोगसे प्रमाणित कर विवेकसे ज्ञान एवं प्रदर्शनका भेद जानना चाहिये । उसके मतमें पहले प्राकृतिक ज्ञानसे ही विज्ञानकी उन्नति सम्भव है । इन्द्रियाँ पहले प्रमाण हैं, मन बादमें । ' असलमें ऐसे स्थलोंमें प्रत्यक्षानुमानमूलक जो आप्तवाक्य हैं, उनका प्रत्यक्षानुमानसे भिन्न शब्दप्रमाणसे व्यवहार नहीं किया जा सकता । ये वाक्य भी प्रत्यक्षानुमानमूलक होनेसे प्रत्यक्षानुमानके अन्तर्गत ही समझे जाते हैं । जैसे नैयायिकोंका प्रत्यक्षखण्ड, अनुमानखण्ड या बौद्धोंके आगमग्रन्थ होनेपर भी वे प्रत्यक्षानुमानके अन्तर्गत ही समझे जाते हैं । आप्तवाक्य या शास्त्रप्रमाणके रूपमें उनकी मान्यता नहीं होती । इसी तरह यहाँ बेकनका ' आप्तवाक्य ' भी है, जिसे वह प्रयोग और विवेककी कसौटीपर कसता है, पर वह शब्दप्रमाणमें मान्य नहीं हो सकता । यों प्रत्यक्षानुमानकी शिक्षाके लिये अपेक्षित शिक्षकका जो मूल्य है, वही इनके मतानुसार आप्तोपदेशका मूल्य है । कुछ आधुनिक वेदप्रामाण्यवादी
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३२ मार्क्सवाद और रामराज्य वेदोंका प्रामाण्य इसीलिये मानते हैं कि वेदोक्त अर्थ प्रयोग और विवेककी कसौटीपर खरे उतरते हैं, परंतु वास्तविक वेदप्रामाण्यवादियोंका कहना है कि जिस प्रयोग और विवेकके आधारपर वेदोक्त अर्थका सौष्ठव एवं सत्यता सिद्ध की जाती है, उसी आधारपर वेदोक्त अर्थका परिज्ञान भी सम्पादित किया जा सकता है । फिर उसके लिये वेदप्रामाण्यकी कोई आवश्यकता नहीं ठहरती । जैसे नेत्रसे अवगत रूपके लिये दूसरे प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती । अज्ञातज्ञापकता ही प्रमाणोंका मुख्य प्रामाण्य होता है । प्रयोग और विवेकसे जो वस्तु ज्ञात हो, उसका ज्ञापक वेदवाक्य ज्ञातज्ञापक होनेसे अनुवाद ही ठहरता है । देकार्त्तेने भी बेकनका अनुवर्तन करते हुए ' धर्मबन्धनसे विनिर्मुक्त ' ही दर्शनका प्रवर्तन किया । उसके मतसे ' ईश्वर भी बुद्धिसे अतीत [ परे ] नहीं है । ' विश्वसृष्टिके लिये उसने यान्त्रिक सिद्धान्त स्वीकृत किया है । पृथ्वीकी गतिके दृष्टान्तसे वस्तुओं एवं उनकी गतियोंसे ही विश्वकी सृष्टि उसने सिद्ध की है । उसके मतमें ' विस्तार पदार्थोंका मुख्य गुण है, इसलिये जहाँ विस्तार हो, वहाँ भी पदार्थका अस्तित्व मान लेना चाहिये । इसलिये रिक्त स्थान है ही नहीं । जो स्थान रिक्त समझा जाता है, वह कोणमुक्त कणोंसे भरा हुआ ही है और सभी गतिमान् पदार्थ पारस्परिक संघर्षसे ‘ कोणत्व ' के मिट जानेपर वृत्ताकार और सूक्ष्म हो जाते हैं । उन्हींसे सूर्य तथा अन्य प्रकाशवान् वस्तुएँ होती हैं । कुछ विलक्षण प्रकारके उन्हीं कोणत्वहीन पदार्थोंसे आकाशकी भी उत्पत्ति होती है । तीसरे प्रकारके उन्हीं पदार्थोंसे, जो स्थिरप्राय होते हैं, पृथ्वी उत्पन्न होती है, जिसमें प्रकाशकी किरणोंका प्रवेश नहीं हो पाता । इनकी गतियाँ वृत्ताकार आवर्त -जैसी होती हैं । बड़ी वस्तुएँ भँवरके बीचमें रहती हैं, छोटी उनके चारों ओर । भँवरकी इस गतिसे ही नक्षत्र सूर्यके चारों ओर चक्कर काटते रहते हैं । ' पर चेतनानधिष्ठित किसी भी प्रकारके पदार्थोंसे व्यवस्थित सृष्टिका होना असंगत है; क्योंकि कुलालादिसे अधिष्ठित मृत्तिकादिसे ही घटादिकी उत्पत्ति होती है । सारथिसे अधिष्ठित रथादिकी व्यवस्थित
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- पाश्चात्य दर्शन ३३ प्रवृत्ति होती है । इसलिये ईश्वर आवश्यक है । देकार्त्तेको भी यह मानना पड़ा । वह ईश्वर बुद्ध्यतीत होते हुए भी बुद्धिगम्य हो सकता है । सृष्टिकर्तृत्वादिसे उसका अनुमान होता ही है । जहाँतक आकाशकी उत्पत्तिकी बात है, वहाँ आकाश यदि अवकाशात्मक, आवरणात्मक है, तो उसकी कल्पना निरर्थक है; क्योंकि निरवयव पदार्थकी उत्पत्तिमें कोई प्रमाण नहीं है । शब्दसमवायिकारण आकाश निरवयव एवं व्यापक है । इसलिये नैयायिकों तथा वैशेषिकोके मतानुसार आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । वेदान्त- मतानुसार यद्यपि आकाशकी उत्पत्ति होती है तथापि वह आकाशसे भी सूक्ष्म एवं अमूर्त अहंतत्त्वका ही परिणाम है । परमाणु, अन्य भूतों या किन्हीं कणोंसे आकाशकी उत्पत्ति तो सर्वथा असंगत एवं निराधार है । ' ज्ञान कहाँसे प्राप्त होता है और किस प्रकारका होता है ' यह दार्शनिकोंका मुख्य प्रश्न है । ' मनमें कुछ निश्चित सिद्धान्त सुस्थिर रहते ही हैं, बुद्धि उन्हींका अनुगमन करती है और पदार्थोंके सत्य-ज्ञानके विषयमें सत्य-ज्ञान उत्पन्न होते हैं - यही देकार्त्तेका ' प्रज्ञावाद ' है । ' जिस प्रकार गणितका सारा प्रपंच कुछ निश्चित सिद्धान्तोंके आधारपर चलता है, उसी प्रकार सारा-का- सारा दार्शनिक प्रपंच बुद्धिके आधारपर चलता है, यह कहा जा सकता है । ' दूसरे पक्षका कहना है कि ' यदि विश्वकी सारी समस्या गणितकी ही जैसी हो तो ऐसा कहा जा सकता है, परंतु ऐसा है नहीं । निश्चित घटनाओंके सम्बन्धमें गणितके समान कहा जा सकता है, परंतु इनके साथ विविध प्रकारकी अनिश्चित घटनाएँ भी सम्मिलित हैं । अतः मानना होगा कि गणितसे भिन्न भी अंश है । कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जो अनिवार्य रूपसे किसी घटनाकी फलभूत नहीं होतीं । जैसे किसी पदार्थका पीतवर्णविशिष्ट गुरुत्व होनेपर भी अनुभवके बिना केवल बुद्धिसे नहीं जाना जा सकता । इसलिये विश्वके ज्ञानके लिये विश्वका अनुभव आवश्यक है । ' ' घटनाके अनुभवसे ही सत्य ज्ञान प्राप्त होता है, ' ऐसा कहनेवाले अनुभववादी दार्शनिक हैं । यद्यपि अंशतः यह सत्य है तथापि इससे दर्शनका उद्देश्य पूरा नहीं होता । ' मनुष्य अपने 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_2_1_Front
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३४ मार्क्सवाद और रामराज्य उद्दिष्ट कार्योंमें स्वतन्त्र है अथवा संसार ही किसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये प्रवृत्त होता है ' इस विषयमें अनुभववादी सन्देहमें ही हैं । संसार आध्यात्मिक भी है, उसका ईश्वर भी है - यह अनुभवका विषय नहीं है । इन्द्रियोंसे जिनका अनुभव नहीं होता, उनपर उन्हें विश्वास नहीं । ये आदर्शवादी नहीं, व्यवहारवादी हैं । देकार्त्तके दर्शनमें ' संसार आध्यात्मिक और सेश्वर है । इन्द्रियजन्य अनुभव तो मायामात्र ही है । कुछ सहज (स्वाभाविक ) प्रत्यय होते हैं, उन्हींसे विश्वकी वस्तुएँ जानी जाती हैं । ' अन्य लोग सहज प्रत्ययोंको भी माननेको तैयार नहीं । उनका कहना है कि 'दो और दो मिलकर चार होते हैं, यह सही है, पर यह भी कुछ बार अनुभव करके ही जाना जाता है । ज्ञानदृष्टिकी अभिव्यक्तिके लिये भी दो -तीन अनुभवोंकी आवश्यकता है । यद्यपि सर्वत्र सहज प्रत्ययोंकी सिद्धि इतनी सरल नहीं तथापि सहज प्रत्यय मान लेनेका यह तात्पर्य होगा कि अनेक वस्तुएँ ऐसी हैं, जो सहज प्रत्ययोंसे ही जानी जाती हैं, परंतु प्रमाणोंद्वारा नहीं । वे केवल बुद्धिसे ग्रहण कर ली जाती हैं और वे मनुष्योंको स्वतः सिद्ध हैं, अतः प्रमाण-निरपेक्ष होकर भी सत्य हैं । ' वस्तुतः सत्यताका निर्णायक प्रमाण ही होता है; क्योंकि प्रमाके कारणको प्रमाण कहते हैं और अज्ञात अबाधित असंदिग्धविषयक ज्ञान ही प्रमा शब्दसे कहा जाता है । उस प्रमाके कारणको ही प्रमाण कहा जाता है । सहज प्रत्यय भी तो चक्षुरादि प्रमाणोंसे ही उत्पन्न होंगे । इसीलिये सहज प्रत्ययोंमें भ्रम, प्रमा आदि विभाग होंगे । देकार्त्तेके मतमें जिस वस्तुका बुद्धिमें स्पष्ट अवभासन हो, उसीका सत्य ज्ञान होता है, परंतु यहाँ यह विचारणीय है कि किसीको बुद्धि या मनमें जो भासित होगा, वह दूसरेकी भी बुद्धि या मनमें भासित हो, यह अनिवार्य नहीं । यदि प्रत्येककी बुद्धिमें जो भासित हो, उसीको सत्य मान लें, तो भिन्न-भिन्न बुद्धियोंमें भिन्न भान होनेके कारण वस्तुका रूप ही विकृत हो जायगा । फिर भी अन्य सभी वस्तुओंमें सन्देह करनेवाला भी अपनेमें कोई सन्देह नहीं करता । ' सन्देह करनेवाला कोई मनन करनेवाला है ' यह तो 698Markasvad Aur Ramrajya_ Section_2_1_Back
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- पाश्चात्य दर्शन ३५ असंदिग्ध ही है । यहाँ भी सन्देह आदिका भासक कोई है, यह तो मानना ही पड़ेगा और वह अपरिवर्तनशील ही हो सकता है, अतः चेतनावान् पुरुषको भी देकार्त्तेने माना है । ह्यूमका कहना है कि ' काम, संकल्प, लज्जा, भय इत्यादि मानसिक भावोंकी जिस प्रकार अनुभूति होती है, उस प्रकार उसके भासक पुरुषकी अनुभूति नहीं होती । यदि ऐसी कल्पना की जाय कि ये मानसिक भाव मणितुल्य हैं और आत्मारूपी सूत्रमें निबद्ध हैं, तब भी मणिस्थानीय भावोंके समान सूत्रस्थानीय आत्माकी भी उपलब्धि तो आवश्यक ही रहती है और यह सूत्रस्थानीय आत्मा उपलब्ध होता नहीं, अतः उसका अस्तित्व ही नहीं है । ' साथ ही इस पक्षमें बाह्य वस्तुकी अपेक्षा मनके मननकर्तृत्वसे स्वात्मज्ञान ही अधिक है । इस प्रकार संसारके मानसिक कल्पनामय होनेसे वस्तुत्वकी ही सिद्धि न होगी । तब फिर मनको पूर्णरूपेण शरीरसे भी पृथक् मानना पड़ेगा । ऐसी भ्रान्ति बहुतोंको हुई है । वस्तुतः सर्वभासक साक्षी उपलब्धि अथवा भानस्वरूप होनेसे भानान्तरनिरपेक्ष ही सिद्ध है । वस्तुका प्रकाश दो प्रकारसे होता है । एक प्रकाशस्वरूप होनेसे और दूसरा प्रकाशसे संसर्ग होनेसे । जैसे घटादिमें ' प्रकाशके संसर्गसे प्रकाशित होता है ' ऐसा व्यवहार होता है और प्रकाशमें संसर्गान्तर बिना ही ' स्वतः ही प्रकाशित होता है ' ऐसा व्यवहार होता है । इसी तरहसे प्रकाशान्तर या बोधान्तरका विषय न होनेपर प्रकाशस्वरूप होनेसे ' प्रकाशित होता है '›, ऐसा व्यवहार संगत है और मणियोंके बीच सूत्रोपलब्धिके समान विविध बौद्ध वृत्तियोंकी सन्धियोंमें निर्विकल्प बोधस्वरूप स्वतः भासमान रहता ही है । गतिविज्ञानवादियोंकी दृष्टिमें यन्त्रादिकी अपेक्षा गति ही पहलेसे निर्धारित है । शरीरके वस्तुकण-निर्मित होनेके कारण उसकी भी गति वैसे ही पूर्वनिर्धारित ही है । मन भी यदि शरीरसे अभिन्न वस्तु हो, तो उसकी भी वैसी ही गति सिद्ध हो जाय । पृथक्त्ववादियोंके मतमें मन शरीर- प्रभावसे असंस्पृष्ट ही रहता है । देकार्त्तेके मतसे ' मन और वस्तु दोनों ही ईश्वरनिर्मित हैं । चिन्तन 698 Markasvad Aur Ramrajya_ Section_2_2_Front
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३६ मार्क्सवाद और रामराज्य मनकी विशेषता है और विकास वस्तुकी । ये दोनों परस्पर भिन्न होनेके कारण एक दूसरेसे अत्यन्त अप्रभावित रहते हैं । जिस प्रकार दो घटिकायन्त्र स्वतन्त्ररूपसे नाद करते हैं, अतः एक साथ नाद करनेपर भी उनका सम्बन्ध नहीं माना जा सकता, उसी प्रकार मन एवं शरीरकी घटनाएँ यद्यपि एक दूसरेके अनुरूप होती हैं तथापि उनका कोई पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है । परमेश्वरकी कृपासे ही मन और शरीर दोनोंकी क्रियाओंमें सामंजस्यसे जीवन चलता है । ' इस प्रकार भौतिकवाद तथा आदर्शवाद - ये उस [ देकार्ते ] -के दर्शनकी दो धाराएँ हैं । स्पिनोजा [ १६३२-१६७७ ई० ] भौतिकवादका प्रवर्त्तक हुआ और लाइवनिट्स [१६४६ ई० ] आदर्शवादका । स्पिनोजाके मतसे ' प्रज्ञा ही सबसे उत्कृष्ट है । उसीके द्वारा धर्मग्रन्थके विषयोंकी भी परीक्षा की जानी चाहिये । प्रज्ञासे वस्तुओंके सम्बन्धोंका अन्वेषण करना चाहिये । प्राकृतिक घटनाओंके आन्तरिक सम्बन्धको बतलानेमें अप्राकृतिक शक्तिका हस्तक्षेप अनुचित है । ' इसके मतसे आध्यात्मिक, मानसिक एवं भौतिक ऐश्वर्य आदि सभी भाव प्रकृतिमें ही अन्तर्भूत हो जाते हैं और इस प्रकार ईश्वर अथवा प्रकृति एक ही है । सम्पूर्ण ही ईश्वर है, ईश्वर ही सम्पूर्ण है । घटनाओंका ऐक्य केवल उनके अस्तित्वमात्रका है । जो नियमानुवर्ती हैं । भूतों तथा आत्माओंका पूरा साम्य है । उनमें ईश्वरकी सत्ता है, अतः भूत आत्ममय ही हुए । सीमित वस्तुएँ एवं घटनाएँ अपने अतिरिक्त असंख्य वस्तुओं एवं घटनाओंसे सम्बद्ध हैं । इनके समूहका ज्ञान अत्यन्त दुष्कर है, अतः किसी न किसी स्वात्मनिर्भरकी सत्ता मानना आवश्यक है । इस प्रकार मूल पदार्थका वैविध्य नहीं रह जाता । साथ ही इस पक्षमें शून्यकारणतावादका परिहार बड़ी सरलतासे हो जाता है । पूर्ण अनन्त ईश्वर अथवा पूर्ण अनन्त प्रकृतिसे बहिर्भूत अन्य कुछ नहीं रह जाता— ईश्वर ही सम्पूर्ण है । इसमें अन्तर इतना ही है कि कार्य कारणसे अभिन्न अर्थात् अनन्य हो सकता है; परंतु कारण कार्यसे अभिन्न नहीं होता । जैसे हाटक ( सोना ) -से भिन्न कटक, मुकुट, कुण्डलादि नहीं हैं, पर कटक, मुकुट आदिके बिना भी हाटक रहता है । अतः हाटकको उनसे अभिन्न 698 Markasvad Aur Ramrajya_Section_2_2_Back