मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी — पृष्ठ 41–50

मार्क्सवाद और रामराज्य करपात्री स्वामी · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

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- पाश्चात्य दर्शन ३७ नहीं कहा जा सकता । इसी तरहसे सम्पूर्ण जगत् परमेश्वरसे अभिन्न है । पर जगत्के बिना भी वह परमेश्वर रहता है । अतः वह जगत्से अभिन्न नहीं कहा जा सकता और प्रकृति तथा ईश्वरमें इतना भेद है कि स्वतन्त्र और चेतन ईश्वर है, किंतु अचेतन चेतनाधिष्ठित प्रकृति है । सृष्टिचक्रके बाहर कोई अप्राकृत वस्तु नहीं है और प्रकृतिका स्वभाव चंचल है । सभी शक्तियाँ उसीमें विलीन रहती हैं । सारी की सारी शक्तियाँ परमेश्वरकी अंगभूता हैं । व्यापकता तथा मननशक्ति इन दोका अनुभव लोगोंको होता है । भौतिक पदार्थ तथा घटनाएँ व्यापकताशक्तिमें एवं मन तथा उसकी अनुभूतियाँ मननशक्तिमें अन्तर्भूत हो जाती हैं । एक ही अन्तिम सत्ताके विभिन्न रूप होनेके कारण तथा समानकालिक होनेके कारण मन तथा शरीर परस्पर क्रिया-प्रतिक्रियावान् हैं । पदार्थगतिके अनुरूप ही मनोगति होती है । बाह्य नियमबन्धनका प्रतिबिम्बमात्र ही आन्तरिक- नियमबन्धन है । बुद्धि जिसकी धारणा होती है, बाहर भी उसकी सत्ता होती है । साथ ही, कार्यकारणभाव सर्वत्र है । जैसे लौहका कूट ( निहाई ) आदिके द्वारा ताड़नादि होता है, वैसे ही कूटादिका भी अन्य साधनोंसे ही निर्माण होता है । वैसे ही उन साधनोंका भी निर्माण साधनान्तरोंसे ही होता है -यों कार्यकारणभावकी कहीं समाप्ति नहीं । समान गुण हुए बिना दो वस्तुएँ परस्पर प्रभावोत्पादक नहीं हो सकतीं । इसलिये आत्मा एवं भूतोंके पारस्परिक प्रभावोत्पादनके लिये उनका समानगुणत्व मानना होगा । यों मूलतः दोनों एक ही हैं । आन्तर कारणके सम्बन्धमें स्पिनोजाकी दृष्टिसे ' किसी प्रयोजनके बिना मन्द व्यक्ति भी किसी कार्यमें प्रवृत्त नहीं होता, अतः प्रवृत्ति सोद्देश्य होनी चाहिये । जैसे नेत्र देखनेके लिये बनाये गये हैं, दाँत चबानेके लिये, सूर्य प्रकाशके लिये, ऐसे ही सभी वस्तुएँ मानवीय उपयोगके लिये ही बनी हैं । उपयोग करने योग्य वस्तुएँ अपने प्रयत्नके बिना ही मिल गयीं, इसलिये यह कल्पना की जाती है कि वे किसीके द्वारा बनायी गयी होंगी । निर्माताके बिना ही स्वतः उत्पन्न हो गयी होंगी ऐसा विश्वास जल्दी नहीं होता; क्योंकि वैसा देखा नहीं जाता । जैसे हमलोग अपने उद्योगके लिये

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३८ मार्क्सवाद और रामराज्य वस्तुओंका निर्माण करते हैं, वैसे ही प्रकृतिके अधीश्वरने हमलोगोंपर अनुग्रह कर वस्तुओंका निर्माण कर दिया- ऐसे निरूढ़ संस्कारसे ईश्वर सिद्ध हो जाता है । ' इसपर भौतिकवादियोंका यह कहना है कि ' सब वस्तुएँ परमेश्वरके अनुग्रहसे उत्पन्न हुई हैं ' यह इसलिये नहीं कह सकते कि बहुत -सी ऐसी भी वस्तुएँ मिलती हैं, जो उपयोगार्ह नहीं हैं, प्रत्युत विघातक हैं । यथा — विष, भूकम्प, व्याधि आदि । यदि कहा जाय कि ' ये वस्तुएँ परमेश्वरके कोपमूलक हैं ' तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि वैसा मानने पर धार्मिकों एवं ईश्वरभक्तोंपर इनका कोई प्रभाव न पड़ना चाहिये था । पर देखा यह जाता है कि धार्मिक और अधार्मिक सब उपद्रवग्रस्त होते हैं । दूसरा मार्ग खोजनेकी अपेक्षा अन्धकारमें पड़े रहना ही सुखकर है, ऐसा सोचकर आदर्शवादी वहीं पड़े हैं । यह भौतिकवादियोंका प्रलाप है । वास्तवमें सुख -दुःख धर्माधर्ममूलक हैं ( सुखका मूल धर्म और दुःखका मूल अधर्म है ) । व्यष्टिके पापोंसे व्यष्टिके दुःख और समष्टि पातकोंसे समष्टिदुःखजनक उपद्रवोंकी उत्पत्ति होती है, यह सर्वथा निर्दोष सिद्धान्त है । इस स्थितिमें धार्मिक होनेपर भी दुःख आनेपर कालान्तरीय पातकोंकी कल्पना की जा सकती है, जो फलबलकल्प्य हैं । इस प्रकार कोई दोष नहीं रह जाता । ऐसे प्रलापोंका समाधान बहुत पूर्वसे होता आ रहा है । मनुने पापी पुरुषोंको सुखी और कदाचित् धर्मात्माओंके दुःखी होनेकी शंकापर बतलाया है कि ऐसी बात देखकर भी अधर्मसे बचना चाहिये; क्योंकि पहले अधर्मसे कभी - कभी वृद्धि देखी जाती है, पर उसका कारण व्यक्तिके प्राक्तन सुकृत हैं । उनका फल समाप्त होते ही उसका समूल विनाश हो

जाता है- अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति ।

ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥

नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव । शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥

पृष्ठ 43

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- पाश्चात्य दर्शन ३ ९

न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् ।

अधार्मिकाणां पापानामाशु पश्यन् विपर्ययम् ॥

(मनु० ४ । १७४, १७२, १७१ ) पापीके बड़े - बड़े पुण्योंका फल तनिक सुखमें समाप्त हो जाता है । इसी प्रकार पुण्यात्माके बड़े - बड़े पाप साधारण कष्टभोगोंसे समाप्त हो जाते हैं । पापीको जहाँ साम्राज्यप्राप्तिकी बात थी, वहाँ उसे पाप करते एक अशर्फी मिलकर रह जाती है । यों ही पुण्यात्माको जहाँ मरण-जैसा भयंकर कष्ट आना होता है, वहाँ पुण्य करते काँटा चुभकर रह जाता है । प्रज्ञा ( बुद्धि ) - में भी भ्रम आदि दोष देख पड़ते हैं, अतः उसका भी प्रामाण्य ऐकान्तिक नहीं है । अनुभवके अतिरिक्त भी कोई विचारमार्ग है या नहीं? इस प्रश्नके उत्तरमें अध्यात्मवादी कहते हैं 'है ', भौतिकवादी कहते हैं ' नहीं है । ' हॉब्सने सब वस्तुओंकी व्यवस्था यान्त्रिक सिद्धान्तानुसार बतलायी । उसके मतानुसार ‘ केवल वस्तुएँ और गतियाँ ही सत्यभूत हैं और सब इन्हींका विकार- समुदाय है । ज्ञान भी उसीमें अन्तर्भूत हो जाता है । इन्द्रियानुभूति ही ज्ञान है । वस्तुओंके द्वारा इन्द्रियाक्रान्ति ही अनुभूति है । यह भी गतिविशेष ही है । मन भी भौतिक ही है । सभी वस्तुओंका यह मूलभूत गुण है कि वे अपनी वर्तमान अवस्थामें रहती है । वह अवस्था गतिरहित हो या गतिमती हो यह दूसरी बात है । ' हॉब्सके मतमें ‘ मानव कल्पनाशक्तिके सीमित ही होनेके कारण किसी भी वस्तुकी असीम धारणा सम्भव नहीं है । इसलिये सीमारहित शक्ति या सीमारहित समय नहीं है । कहीं- कहीं असीम शब्दका जो प्रयोग होता है, उसका यही तात्पर्य होता है कि हमें उसकी सीमाका ज्ञान नहीं है । इन्द्रियानुभूतिका विषय न हो ऐसा कोई भी धारणाका विषय ( सम्भव) नहीं हो सकता । ' लाइवमिट्सने भौतिकवादका खण्डन करनेके लिये संशोधित रूपसे परमाणुवादकी प्रतिष्ठापना की । निर्जीव भूतोंसे सृष्टि नहीं हो सकती, यह सिद्ध करनेके लिये उसने ' मोनाड' नामके अनुभवशक्तियुक्त आध्यात्मिक

पृष्ठ 44

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४० मार्क्सवाद और रामराज्य अणुओंको ही सृष्टिका कारण माना । यान्त्रिक नियमोंका अनुवर्त्तन करनेवाले इन असंख्य और असमान अणुओंका अन्योन्य प्रभाव न होनेपर भी परमेश्वरकी महिमासे परस्पर सम्बन्ध अवभासित होता है । जिस प्रकार अनेक घटीयन्त्र ( घड़ियाँ ) समान रूपसे कालनिर्देशन करते हैं, वैसे ही इन अनन्त असंसृष्ट अणुओंके विषयमें भी समझना चाहिये । कार्य - कारणकी परम्परा ईश्वरमें जाकर समाप्त हो जाती है; क्योंकि •मूलका मूल नहीं हुआ करता । इसलिये जो सबका मूल है, उसे स्वयं अमूल ( मूलरहित ) ही होना चाहिये । कार्य-कारणपरम्पराके नियमानुवर्त्ती होनेके कारण सृष्टिमें परमेश्वरका हस्तक्षेप नहीं होता । ये ' मोनाड ' नामके अणु ही अन्तर्निहित शक्तियोंद्वारा जीव, अजीव, पशु, मनुष्य आदिके रूपमें विकसित होते हैं । ' मोनाड ' मन और शरीर तथा पशु और मनुष्यके भेदको दूर कर देता है । बाह्य वस्तुएँ प्रत्यक्ष अनुभूतिके विषय हैं, अतः उनका मनसे पृथक् रूपमें अस्तित्व है और उससे मन प्रभावित होता है । उसीसे बाह्य वस्तुओंका प्रत्यक्षीकरण होता है, परंतु ऐसा माननेपर ' एक मोनाड दूसरे मोनाडोंसे प्रभावित नहीं होता ' यह सिद्धान्त खण्डित हो जाता है । इसलिये वह प्रक्रिया ठीक नहीं । घड़ीके समान परस्पर सम्बन्ध न रहनेपर भी समान क्रिया हो सकती है- यह उपपत्ति तो दी ही जा चुकी है । इसलिये आत्मनिष्ठ घटनाका ही अनुभव होता है । बाह्यानुभूति तो माया ही है । काम, संकल्प आदिके समान बाह्य वस्तु भी मानस ( मानसिक ) ही है । मनुष्य- शरीर असंख्य मोनाडोंसे संघटित है 1। इसका नियामक मन या आत्मा एक ही मोनाडसे बना है । विश्वके सम्बन्धमें मोनाडोंका विचार समानरूपसे स्पष्ट नहीं होता । अग्निसे दो हाथकी दूरीपर स्थित व्यक्तिको उष्णताकी अनुभूति होनेपर प्रतीत होता है कि औष्ण्य अग्निका गुण है । उससे भी अधिक निकट जानेपर औष्ण्यकी अभिवृद्धि हो जानेपर देहमें पीड़ा भी होने लगती है । वह संनिधान या नैकट्यका ही गुण हो सकता है, अग्निका नहीं । पीड़ा तो उष्णताका ही उत्कट रूप है । अतः औष्ण्य अनुभूतिविशेष ही हुआ, अग्निका गुण नहीं । कुछ कीटाणुओंकी टाँगें इतनी सूक्ष्मतम

पृष्ठ 45

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- पाश्चात्य दर्शन ४१ होती हैं कि वे सूक्ष्मवीक्षण - यन्त्रसे ही देखी जा सकती हैं, परंतु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उन [ कीटाणुओं ] -को भी अपनी टाँगें सूक्ष्मवीक्षण- यन्त्रसे ही ज्ञात होती हैं । इसलिये द्रष्टाके मनके गुणोंके अनुसार ही सूक्ष्मता या दीर्घता प्रतीत होती है । इसीलिये कीटाणुके मनके लिये दृश्य कुछ और है, हमारे मनके लिये दृश्य कुछ और है । किंतु इतने मात्रसे उस टाँगकी लम्बाई दो प्रकारकी नहीं हो जाती, परंतु सिद्ध यह होता है कि परिमाण दृष्टिका गुण है, दृश्य वस्तुका गुण नहीं । कारण, वह द्रष्टाके मनमें सापेक्ष है । जो आपाततः गुण प्रतीत होते हैं, विचार करनेपर वे मनकी अनुभूतिके अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाते । दर्शन, श्रवण आदिके स्वरूपका विचार करनेपर भी यही निश्चय होता है । जैसे - वस्तुओंकी आलोककिरणें स्नायुओंके सूक्ष्म दृष्टिस्तरोंपर पड़ती हैं । उससे स्नायुओंमें गति उत्पन्न होती है । उससे मस्तिष्कगत कणोंमें स्पन्दन उत्पन्न होता है । उसीसे किसी प्रकार चेतना उत्पन्न हो जाती है । यही वस्तुदर्शन कहलाती है । इसी प्रकार शब्दका, जो वायुमण्डलीय स्पन्दनविशेष है, कर्णशष्कुलियोंसे सम्बन्ध होता है, जिससे मस्तिष्क प्रभावित होता है । उससे मस्तिष्कस्थित स्नायु - कणोंमें गतिसमूह उत्पन्न होता है, उससे चेतना । इसीको ' श्रवण ' कहते हैं । मस्तिष्क गहरे तमसे आच्छन्न कमरे - सरीखा है । उसमें एक सुदीप्त पट है, जिसका दीपन करनेवाली चेतना है । अनुभूयमान बाह्य विषय इन्द्रियोंको उत्तेजित करते हैं और वे मस्तिष्कगत स्नायुओंको उत्तेजित करती हैं । उससे उत्पन्न चेतनाके द्वारा उद्दीप्त हुए पटपर वस्तुकी प्रतिकृतियाँ अभिव्यक्त हो जाती हैं । ' वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त किया जाता है ', इसका अर्थ यह है कि वस्तुओंके चित्र- प्रतिकृतियाँ - मस्तिष्कस्थ प्रदीप्त पटपर व्यक्त होती हैं । चेतनाके द्वारा उज्ज्वलित पटपर प्रतिफलित वस्तुकी प्रतिकृति ही ज्ञान है । सांख्ययोग तथा वेदान्तके मतानुसार इन्द्रियोंद्वारा प्रत्युपस्थापित शब्दादि - विषयाकाराकारित वृत्तिसे युक्त अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित असंग पुरुषका अपने प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याभिमानके द्वारा विषयोपरागाभिमान उत्पन्न होता है । जैसे जपाकुसुमसे उपरक्त हुआ स्फटिक स्वनिष्ठ

पृष्ठ 46

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४२ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रतिबिम्बमें अपना आकार समर्पित कर देता है तथा च वृत्तियुक्त अन्तःकरणमें स्थित विषयाकारताका प्रतिबिम्बमें भान होता है । इसलिये प्रतिबिम्ब भी रक्त हो जाता है और उसके तादात्म्याभिमानसे बिम्ब भी अपने आपको रक्त मानता है । दर्पणगत मालिन्यके कारण दर्पणान्तर्गत प्रतिबिम्बमें भी मलिनता प्रतीत होती है । प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याभिमानवान् होनेके कारण ' मेरा मुख मलिन है ' यह समझकर बिम्ब भी चिन्तित होता है । उसी प्रकार विषयोपरक्त अन्तःकरणमें पुरुषका प्रतिबिम्ब है, अतः उस प्रतिबिम्बके साथ तादात्म्याध्यास ( अभेदाभ्यास ) - के कारण बिम्बमें भी विषयोपरागका अभिमान होता है । इस तरह असंग स्वप्रकाश चेतनसे विषयोपरागद्वारा विषयका प्रकाश होता है । ज्ञाताका मन प्रथम पदार्थ है, बाह्य वस्तु द्वितीय तथा चेतनोज्ज्वलितपट- प्रतिबिम्बित चित्र या प्रतिकृति तृतीय । मन प्रतिकृतिको तो जानता है, पर बाह्य वस्तुको नहीं; क्योंकि प्रथम एवं तृतीय द्वितीयके बाधकके रूपमें उपस्थित हैं । ऐसी दशामें प्रश्न उठता है कि फिर द्वितीयका अस्तित्व माना जाय या नहीं । यदि द्वितीय जाना ही नहीं जा सकता तो फिर उसीसे तृतीय उत्पन्न कैसे हो जाता है, यह वाचोयुक्ति भी संगत मालूम होती है । अन्य लोगोंका कहना है कि बाह्य वस्तु अनुभूतिके कारणके रूपमें मान लेना चाहिये; क्योंकि उसके बिना अनुभूतियोंमें वैचित्र्य उत्पन्न नहीं होता । औरोंका कहना है कि वासनाओंके वैचित्र्यसे ही उन अनुभूतियोंके वैचित्र्यकी उपपत्ति दी जा सकती है । कुछ लोगोंका कहना है कि यद्यपि विज्ञानके अतिरिक्त और कुछ अनुभवका विषय नहीं होता तथापि विज्ञानके वैचित्र्यकी उपपत्तिके लिये जब उसे मान लेना पड़ता है, तब स्वातन्त्र्येण भी उसकी कहीं सत्ता होगी, ऐसा मान लेना चाहिये । बौद्धोंमें कोई क्षणिक बाह्य और आन्तर दोनों पदार्थ मानते हैं । कुछ लोग अन्तरको प्रत्यक्ष और बाह्यको अनुमेय कहते हुए आन्तर विज्ञानमें विचित्रताकी उपपत्तिके लिये अनुमेय बाह्य पदार्थ मानते हैं । कुछ लोग वासना-वैचित्र्यसे ज्ञान - वैचित्र्य मानते हैं । इसलिये बाह्य पदार्थका अस्तिस्व नहीं स्वीकार करते ।

पृष्ठ 47

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- पाश्चात्य दर्शन ४३ बर्कले ( १६८५-१७५३ ) -का मत है कि ' औष्ण्य ( उष्णता ) -के समान ही रूप- संस्थान, गुरुत्व आदि भी ' मानस ' भाव ही हैं, इसलिये उनमें भी औष्ण्यसे कुछ वैशिष्ट्य न होनेके कारण कोई भेद नहीं । इसी प्रकार वस्तु गुणात्मक ही है । गुणोंके न रह जानेपर वस्तु रह ही नहीं जाती और गुण विज्ञानके अतिरिक्त कुछ नहीं है । ' भारतीय वेदान्तानुसार भी वस्तुस्थिति ऐसी ही है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि गुणोंके अभावसे पृथ्वीतत्त्व कुछ मनोमात्र ही तो रह जाता है । परमेश ज्ञानमय होनेके कारण व्यवहारमें सब वस्तुओंका यथायोग्य उपयोग हो जाता है, परंतु विचारसे उनका बाध हो जाता है; अतः अविचारितरमणीयता भी है । ईश्वरकी कल्पनाके विषय पदार्थ ' व्यावहारिक ' और ' धारणाविषय ' कहे जाते हैं और हमलोगोंके कल्पित पदार्थ ' प्रातिभासिक ' और ‘ कल्पनामात्र ' । यही भेद है । ब्रह्मसे भिन्न सब कुछ दृष्टि -सृष्टिमात्र है । भौतिकवादी न तो परमेश्वरको ही मानते हैं, न चेतनको ही स्वतन्त्र मानते हैं । अतः उनके मतमें तो यह सारा ही दर्शन बाधित हो जाता है । उनके मतमें विज्ञान सिद्ध पदार्थका भी अस्तित्व है ही । मन अथवा चेतना पदार्थोंके गुण ही हैं । काण्ट ( १७२४-१८०४ ई० ) दार्शनिक तथा गणितज्ञ था । उसकी ' प्रकृतिका साधारण इतिवृत्त ' और ' ऊर्ध्वलोक -सिद्धान्त ' नामकी पुस्तकें प्रसिद्ध हैं । उसने ह्यूमके अज्ञेयवादसे विज्ञानका उद्धार किया और धर्मकी भी रक्षा की । उसके मतमें सभी वस्तुएँ दो प्रकारकी होती हैं- पारमार्थिक तथा प्रातिभासिक । इसलिये सामान्य व्यक्तिको वस्तुका यथावत् ज्ञान नहीं होता । उसके मतमें ' मनसे संलग्न कुछ कारण होते हैं, जिनसे युक्त मनके द्वारा वस्तुएँ कुछ दूसरे ही प्रकारकी जानी जाती हैं । जैसे सहज नीले उपनेत्रसे युक्त चक्षुके द्वारा सब वस्तुएँ नील ही प्रतीत होती हैं, वैसे ही कुछ हेतुओंसे युक्त मनके द्वारा देश- कालमें व्याप्त ही वस्तुएँ प्रतीत होती हैं । अनुभूतिमें जिनकी प्रतीति होती है, उससे पहले रूपादिहीन वस्तुएँ ही प्रतीत होती हैं । ' सहज नीले उपनेत्र लगा लेनेके समान स्वतःसिद्ध ज्ञानरूपी साँचेसे वस्तुएँ जब मस्तिष्कमें जाती हैं, तब देश-कालादिसे

पृष्ठ 48

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४४ मार्क्सवाद और रामराज्य सम्बद्ध ही प्रतीत होती हैं - यह हम कह आये हैं । ' यहाँ ', ' वहाँ ' अथवा ' सर्वत्र ' किंवा ' इस समय', ' उस समय ' अथवा ' सर्वदा '-इस प्रकार सभी वस्तुओंका अवबोध देश-कालसे आबद्ध ही होता है । काण्टके अनुसार मनमें यही स्वतः प्राप्त ज्ञानका रूप है । ' ऐसे ही मनः संलग्न सहज उपनेत्रके समान अन्य कारणोंसे ज्ञान होनेका उस ( काण्ट) -का सिद्धान्त भी समझ लेना चाहिये, जिससे गुण, परिणाम, पदार्थ, कार्य और कारणके सम्बन्धोंका भान होता है । ' जो भी वस्तुएँ जानी जाती हैं, उनमेंसे प्रत्येक पदार्थ परिमाणयुक्त है । उनमें कुछ गुणयुक्तोंकी दृष्टिसे कार्य हैं, कुछकी अपेक्षासे कोई कारण है । ज्ञानसिद्धान्तानुसार अनुभूयमान वस्तुओंमें मन साथ मानसिक भाव भी संयुक्त हो जाते हैं । अतः ज्ञात वस्तु सम्मिश्रित ही होती है, शुद्ध नहीं । सहजप्रत्ययरूप रूपहीन पदार्थ ज्ञानसिद्धान्तसे संस्पृष्ट होकर विज्ञात होता है और ' यह मनुष्य है ' ' यह पशु है ' इत्यादि रूपसे प्रत्यभिज्ञात होता ( पहचाना जाता ) है । इसीसे अनुभव विज्ञान बनता है । उसके मतमें प्रतीयमान जगत्का नाम ' फेनोमेना ' है और वस्तुभूत जगत्का ‘ नूमेना ' प्रथम बर्कलेके सिद्धान्तसे सम्मत है, द्वितीय उससे भिन्न । ' समस्त व्यवहार संकल्पमूलक ही हैं । तर्क, गणित आदिके नियम भी संकल्पात्मक ही हैं । जैसे दो और तीन मिलकर पाँच होते हैं - यह गणितका नियम है । कार्य सदा सकारण होता है । आम्र स्वयं भी और स्वयंसे भिन्न भी - यह सम्भव नहीं, यह तर्क भी उसी ढंगका है । ये भाव मानस ही हैं; क्योंकि जिनके मनका संघटन भिन्न प्रकारका होगा, उनके इस विषयमें विचार भी भिन्न प्रकारके हो सकते हैं । इसलिये हमारी धारणाके अनुसार ही हमारा जगत् है, परंतु हमारे विचारोंसे वस्तुव्यवहार भी प्रभावित होता है, इस विश्वासका कोई कारण नहीं है । तर्क और अनुभवके मध्यसे विज्ञान प्रवृत्त होता है । गणितके समान विज्ञानमें भी तर्कका स्थान है । भेद इतना ही है कि विज्ञान अनुभवसे तर्ककी परीक्षा करता है और गणितका परिणाम अपरीक्षणीय ही रहता है; क्योंकि उसकी सत्यता छिपी नहीं रहती । इन्द्रियानुभूतिमें भी वैसी

पृष्ठ 49

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- पाश्चात्य दर्शन ४५ जटिलता नहीं है, किंतु तब गणितके तर्कोंका अनुभूतिके क्षेत्रोंमें प्रयोग कैसे हो, यह समस्या तो है ही । वैज्ञानिकी प्रक्रिया तो यह है । उसमें तर्कसिद्ध ज्ञान वस्तुव्यवहारमें प्रयुक्त होता है । जैसे मध्याकर्षण- नियमके आविष्कारसे वस्तुव्यवहारके सम्बन्धमें भविष्यवाणी की जाती है और वैसा ही घटित भी होता है । तर्कसिद्ध वस्तु प्रयोगमें भी कैसे सत्य होती है । यह समस्या है । जिन वस्तुओंका इन्द्रियानुभूतियोंसे ग्रहण किया जाता है तथा जिनका बुद्धिसे ग्रहण किया जाता है, उनमें अन्तर स्पष्ट है । कुछ वस्तुओंकी दो-दो जोड़ियाँ बालकके द्वारा गिनी जानेवाली बुद्धिसे दो-दो चार होते हैं, यह व्यापक सत्य है । व्यापकधारणा विशिष्ट इन्द्रियानुभूतियोंसे भिन्न पृथक् ही हैं, कारण वह रूप, प्रयोग आदिसे भिन्न हैं । यहाँ प्रज्ञावादी तो इन्द्रियानुभूतिके विषयका ही अपलाप कर देते हैं । कार्यकारण-सम्बन्धमें बँधे होनेके कारण एक वस्तुके विज्ञानसे ही सब विज्ञान हो जाता है; क्योंकि वही अवश्यम्भावी परिणाम है । उनके मतमें कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका अस्तित्व घटनामात्र हो । डार्विन ( १८० ९ -१८८२ ) -का मत है कि ' इन्द्रियोंसे पृथक् विचारशक्ति है ही नहीं, इसलिये इन्द्रियानुभूतिके अतिरिक्त विचार कुछ है ही नहीं । ' उसके मतमें ‘ उन सूक्ष्म तन्तुओंका संकुचन, गतिविशेष अथवा रूपान्तरसे परिवर्तनविशेष ही ज्ञान है, जिनसे इन्द्रियोंका निर्माण होता है । ' विचारका ही दूसरा पर्याय इन्द्रिय- गतिविज्ञान है । स्मृतिशक्ति, कल्पना यदि जीवगति नहीं तो और क्या हो सकती हैं? यदि उसे वस्तुओंका चित्र या प्रतिकृति कहा जाय तो वह कहाँ है, जहाँ सभी वस्तुओंका संग्रह शक्य हो? सामान्यतया इन्द्रियानुभूति- विश्वासियोंके मतमें कोई आत्मा है, जिसके द्वारा बाह्य वस्तुएँ प्रतिकृतिके रूपमें ग्रहण की जाती हैं । डार्विन, हक्सले प्रभृति वैज्ञानिकोंने आत्मवादका खण्डन कर यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया कि ' वस्तुओंके इन्द्रिय- संनिकर्षसे स्नायुओंद्वारा शरीरमें जो क्रियाविशेष उत्पन्न होती है, उसीसे विचारका जन्म होता है । ' इन्द्रियाँ और उनका विषयोंके साथ संनिकर्ष एवं मस्तिष्क-स्नायुओंपर तज्जन्य प्रभाव सभी अचित् ( जड ) होनेसे वे स्वयं अपना ही प्रकाश

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४६ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं कर सकते तो फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या? अचेतनसे चेतनकी उत्पत्ति होती है, यह सिद्धान्त भी असिद्ध है, जैसा कि पहले दिखलाया जा चुका है । कावानी ( १८५२ - १ ९ ३५ ) -का कहना है कि ' मानवेन्द्रियोंमें बाह्य वस्तुओंकी क्रिया- प्रतिक्रिया आदिके द्वारा जो प्रभावोत्पादन होता है, वही ज्ञान है । अनुभव ही जीवन है । घटनावलियोंकी अद्भुत श्रृंखलाओंसे उसका अस्तित्व है । सभी वृत्तियोंके द्वारा अपने विकाससे किसी आवश्यकताकी पूर्ति ही की जाती है और परस्परके अनुसार अभ्यास बढ़ानेवालेके प्रयोजनोंकी निवृत्ति भी हो जाती है । बाह्य वस्तुओंके घात- प्रतिघातका परिणाम ही मानवजीवनका अस्तित्व है । ' हलवांशने ' प्रकृति -प्रथा' नामक पुस्तकमें फ्रांसीसी भौतिकवाद प्रकाशित किया है । उसमें दीदेरो, वफो, दकेसी, हेलवेशियस इत्यादिका मत संगृहीत है । उसके अनुसार ' दुःखका मूल प्रकृतिका अन्यथाज्ञान ही है । रूढ़िपाशमें बँधे हुए प्रकृतिके अध्ययनसे विमुख लोगोंका प्रेत-पिशाचादिमें अन्धविश्वास ही दुःखका मूल है । प्रकृतिके अध्ययनसे उसका उच्छेद ( कर डालना ) आवश्यक है । सत्य एक ही है और वह सुखरूप है । भ्रमवशात् ही उद्घृत पुरोहितों तथा राष्ट्रोंने जातियोंका बन्धन बनाया और भीषण मृगतृष्णामय धर्मोंके शिकार बने । अन्यथा-ज्ञानसे ही लोग घृणा तथा क्रूर दमनके भागी बनते हैं । इसलिये अन्धविश्वासका अपनयन और वस्तुतत्त्वज्ञान नितान्त आवश्यक है । जीव और उसे प्रभावित करनेवाले पूर्ण प्रकृतिके अंश हैं । अप्राकृत पुरुष कल्पनाप्रसूत ही है । मानव भौतिक ही है । विशिष्ट-संघटनका परिणाम होनेके कारण उसकी विशेषता है । वस्तु तथा उसकी गतिके अतिरिक्त और कुछ नहीं है । कार्यकारण- सम्बन्धकी अनन्त श्रृंखला ही संसार है । वस्तुओंमें परस्पर क्रिया-प्रतिक्रियाकी परम्परा चलती ही रहती है । विचित्र गुणों एवं संयोगोंसे वस्तुविशेषकी अभिव्यक्ति होती है । ' सुकरात, अफलातून, अरस्तू, काण्ट आदिके दर्शन ही इस पक्षका खण्डन हैं । सुख अवश्य पुरुषार्थ है, परंतु क्षणभंगुर नहीं, अपितु अनन्त