Mundakopanoshad — पृष्ठ 101–110

Mundakopanoshad · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाय्य परावरात्मक ईश्वरीयदेव सत्यनिरूपण यज्ञ है- अग्नि - सोमभूत है । इसका श्राधार प्राणरूपवेद है । श्रग्नि ' अग्नि - यम- श्रादित्य ' तीन हैं । तीनों के आधार क्रमशः ऋक् - यजुः साम हैं । सोम का श्राधार अथर्व है । सोम अग्नि में श्राहुत होकर ही पदार्थों में प्रविष्ट रहता है, अतएव उसका स्वतन्त्र ग्रहण नहीं किया जाता । त्रयीरूप प्रग्निवेद में उसका अन्तर्भाव मान लिया जाता है । इसीलिए ऋषि ने यहाँ वेदत्रयी का ही उल्लेख किया है । इस वेदत्रयी का ऋक्भाग ‘ छन्दोवेद ' कहलाता है । यजुः को ' रसवेद ' कहते हैं एवं साम को ' वितानवेद ' कहते हैं । प्रति वस्तु में तीनों हैं । मूर्ति ऋक् है । महिमा मण्डल साम है । मध्य का सारा गतिशील भाग यजु: है । इसमें ऋक् २१ तक जाता है । ऋक् प्रग्नि है - इसकी दोड़ २१ तक है । इसी विद्या को लक्ष्य में रखकर शब्दवेद के ऋक् की २१ शाखाएं बताई गई हैं । साम हजार हैं । इसीलिए शब्दात्मक सामवेद की भी हजार शाखाएं हैं । साम उस ऋमृति की महिमा है । महिमा की ही विभूति कहते हैं । इसीलिए विभूतियों का वर्णन करते हुए भगवान् ने धात्मा के लिए वेदामा सामवेदोऽस्मि'- कहा है । यजु. १०१ हैं । मथवं ε हैं । इस वेदत्रयी का नाम ब्रह्म है । यह ' ब्रह्म ' ही ' मन्त्र ' हैं । जैसा कि पूर्व के प्रकरणों में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । इस मन्त्र ब्रह्म की उत्पत्ति ' अक्षर से ' होती है । सृष्टिकर्ता अक्षर अपने आत्मक्षर के प्राणभाग से सबसे पहले इसी पुरंजनरूप ब्रह्म को उत्पन्न करता है । अक्षर में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीन प्रधान हैं । ये ही प्रन्तर्य्यामी हैं । भग्नीषोम सूत्रात्मा है । इनमें इन्द्रगर्मित ब्रह्म धमि है । सोममित ब्रह्म विष्णु है । ' ऋक्साम ' इन्द्र से सम्बन्ध रखते हैं । प्रतएव हरुलाने वा इन्द्रस्य हरी यह कहा जाता है । यजुः का विष्णु से सम्बन्ध हैं । यजुः बय है । वय प्रत है । विष्णु हरिर्ज्ञान ( भन शकट ) के प्रधिपति हैं । अथर्व ब्रह्मवेद है । इस प्रकार प्रक्षर से ब्रह्म का यथावत् सम्बन्ध हो जाता है । मुण्डक के १।११८ मन्त्र में कहा गया है कि तप से ' ब्रह्म ' चीयमान होता है । धक्षर का व्यापार तप है । चीयमान ब्रह्म यही वेदत्रयी है । यही उस अक्षर से सबसे पहले उत्पन्न होता है, अतएव तस्मात् यः सामानि यजूंषि कहा है । वेद से यश उत्पन्न होता है । उसी प्रक्षर के प्रापोमुख से प्राणमुख से उत्पन्न वेद के माधार पर यज्ञ होता है । यज्ञ से पहले एक दीक्षातत्त्व उत्पन्न होता है । दीक्षा - तप का जोड़ा है । बिना दोनों के यज्ञ का स्वरूप सर्वथा अनुपपत है । दीक्षा का तत्कम्मंयोग्यस्य तत्कम्मं विशेषेऽधिकार नियुक्तिः यही लक्षण है । हम इस कार्य में नियुक्त होते हैं - इसके लिए जो अधिकार प्राप्त करना है वही दीक्षा है । अधिकारतत्त्व दीक्षा है । उसे प्राप्त होने वाला दीक्षित कहलाता है । पृथिवी दीक्षा है । उससे ग्रग्नि दीक्षित है । पृथिवी कम्मं एक अधिकारविशेष है । उससे भग्नि अधिकृत है । इसी दीक्षातत्त्व का निरूपण करते हुए अभियुक्त कहते हैं-१ - पृथिवी दीक्षा - तयाग्निर्दीक्षितः । २ -- प्रन्तरिक्षादीक्षा - तया वायुर्दीक्षितः । ३- द्योदक्षा - तया प्रादित्यो दीक्षितः । ४- दिशो दीक्षा - तथा चन्द्रमा दीक्षितः । १ गीता १०।२२ । २ ऐ ० ब्रा ० २।२४ । [ ६७ ]

पृष्ठ 102

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facterus ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्य निरूपण ५- श्रापोदीक्षा - तया वरुणो दीक्षितः । ६- प्रौषधयो दीक्षान्तया सोमो दीक्षितः । ७- वाक् दीक्षा - तया प्राणो दीक्षितः । यह दीक्षारूप कम्य पृथिवी भाषि उसी से उत्पन्न हुए हैं । इनका ग्रहरण कर देवता दीक्षित. हो रहे हैं । दीक्षा लेना पहला कम्मं है । उसमें दीक्षित हो यावज्जीवन उसका पालन करना दूसरा कर्म्म है । वही तप है । इस प्रकार प्राथदेवता उस दीक्षा - तपरूप कम्मं से कम्मिष्ठ बनते हुए यज्ञ कर रहे हैं । सब अपने - अपने कम्मं में दीक्षित हैं । सबको उस प्रजापति की ओर से दीक्षा मिली हुई है । दीक्षित सूभ्यं उसी दीक्षा सूत्र से ( धन्यमी द्वारा प्रदत्त अधिकार से ) बद्ध होकर सारा कम्मं यथावत् कर रहा है; करता रहेगा । सब देवता दीक्षित होते हुए महासन कर रहे हैं । दीक्षाकम्मं पोर तपः कम्मं दोनों ब्रह्म द्वारा उत्पन्न होते हैं । वेद से ही दीक्षा - रूपोरूप कम्मं का उद्भव है । मैं सब को दीक्षित करने के लिए दीक्षा - तप उत्पन करूं जिससे सब यज्ञ करने में समर्थ हो सकें - यह व्यापार वेदमय अक्षरब्रह्म से होता है । अक्षर कुर्बाण है । कम्मं का अधिष्ठाता है । वह वेद के बिना प्रप्रतिष्ठित है । प्रप्रतिष्ठित रहकर वह दीक्षा - तपोरूप कर्म्म उत्पन्न करने में असमर्थ है । प्रतः पहले उसे ब्रह्म ( वेद ) उत्पन्न करना पड़ता है । अनन्तर कम्मरूप दीक्षा -सप उत्पन्न होते हैं । दीक्षा तपोरूप कम्मं से यक्ष उत्पन्न होता है । धन्न ही यज्ञ । यह कम्मंसमुद्भव है । इस यज्ञ के यज्ञ कर दो भेद हैं । प्रग्निहोत्रादि प्रदान्तर कम्मं यज्ञ हैं एवं महायज्ञ ऋतु है । इनका वैज्ञानिक - स्वरूप - विश्लेषण अपरा विद्यानिरूपणात्मक प्रथममुण्डक के द्वितीयखण्ड में विस्तार के साथ किया जा चुका है । यक्ष में एक दक्षिणा होती है । वह दक्षिणा गो - तत्त्व है । सूर्यः यजमान है । पाचिय - अग्नि ' होता ' है । इसे ३३३ यौ दक्षिणा में मिलती हैं । वायु अध्वर्यु है । इसे भान्तरिक्ष्य ३३३ गौ दक्षिणा में मिलती हैं । मादित्य उद्गाता है । इसे दिव्य ३३.३ यो दक्षिणा में मिलती हैं । चन्द्रमा ब्रह्मा है । इसे साहबी नाम से प्रसिद्ध कामगवी मिलती है । दक्षिणा से दीक्षित चारों ऋत्विजों ने सूयं को स्वर्ग में प्रतिष्ठित कर रखा है । इस दक्षिणासूत्र के बन्धन में पड़कर ही ये उस यजमान के ऋऋत्विक् बन रहे हैं । इस धग्नीषोमात्मक यज्ञ का आधार संवत्सर- मण्डल है । संवत्सर महावेदि है । इसी में सौर - यज्ञ हो रहा है । प्रग्निवायु - सूय्यं प्रादि सभी यजमान हैं । प्रत्येक का लोक मित्र - भित है । भग्नियजमान का लोक पृथिवी है । वायु का अन्तरिक्ष है । सूय्यं का थी है । यह है-नित्ययज्ञ का प्राकृत - स्वरूप । इस यज्ञ से, यज्ञाग्नि से, पर्ज्जन्य द्वारा सोमाहुति से, पज्जन्यरूप वृष्टि होती है । उससे अन्न उत्पन्न होता है । उससे सारी मूत सृष्टि होती है । इसी क्रमिक सृष्टि का निरूपण करते

हुए गीताचार्य कहते हैं--" अन्नाद् भवन्ति भूतानि पज्जन्यादन्नसंभवः ।

यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म्मसमुद्भवः ॥

कर्म्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ” । ' १ गीता ३।१४-१५ । [ 5 ]

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य परावरात्मक ईश्वरीय देव सत्यनिरूपण अक्षर--१ - ब्रह्म = वेदत्रयी २- कम्मं दीक्षा - तप ३ - यज्ञ ( दक्षिणाय यज्ञ ) - संवत्सरः - लोकाः । ततः-४- पर्जन्य । ततः-५ - अन्न । ततः-६- भूत → सेवा वेवसा यशसृष्टि: इसी मन्त्र से ऋषि को अधिभूत ( मनुष्य ) यश का भी निरूपण करना है । यह सूचित करने के लिए सोमो यत्र पवते यत्र सूय्यं कहा है । १७ से २१ तक यश फल है । यहीं सूम्यं है यहीं सोम है । यज्ञ का सम्बन्ध यहीं तक है । सूय्यं से ऊपर मक्षरलोक है । यह यशकर्त्ता यजमान का लोक नहीं हो सकता । वह यजमानलोक नहीं, किन्तु ब्रह्मलोक है । वहाँ तो धात्मज्ञानी ही जा सकते हैं । अपि च विज्ञान - पक्ष में इसका यही अर्थ है कि यशसृष्टि का सम्बन्ध सूय्यं से नोचे - नीचे है । भग्निहोत्र यशों का प्रादि है - प्रयन ग्रन्त है । प्राकृत चयन की अन्तिम सीमा सूर्य्य है । यशसृष्टि में नियुक्त प्रतएव यजमान नाम से प्रसिद्ध प्राणदेवताओं का लोक यही है । सूय्यं से कपर इनका साम्राज्य नहीं है । दीक्षा - सप-संवत्सर - यजमान - लोक- दक्षिणा, यश के इतने अंग हैं । इतनों के मिलने पर यशस्वरूप सुसम्पष्ठ होता है । वह यश - वेद पर प्रतिष्ठित है । बस, हमारा प्रकृत मन्त्र इसी वेदयशसृष्टि का निरूपण करता है । ॥६ ॥

प्रशासष्टि प्रजापति ने बेद उत्पन्न किया, वेद से यज्ञ उत्पन्न किया एवं बहाः प्रयः सुदा के अनुसार उसके यश से ही सारी प्रजा उत्पन्न हुई । जीं गीता में बहाए मति पर्ज्जनाः परस्थापनासंसथः सम् भवति सूतानि - यह कहा है वहां का सूतानि प्रजा का वाचक है । सूत का अर्थ है उत्पम् । इसी अभिप्राय से प्रजापत के भूतान्युपासीदन् प्रजा वे मुतानि ' - यह कहा है । प्रज्ञास्ति दिव्याग्नि है । इसी के लिए- असो वा लोको गोतमाग्निः - यह कहा जाता है । वह यज्ञाग्नि कैसे प्रजा उत्पन्न करता है? इसका उत्तर पूर्व के ५ वें मन्त्र में दिया जा चुका है । ऋषि- पितर देवता - असुर - गन्पुर्व - मनुष्य - पशु - पक्षिभेद से प्रजाएँ हैं । इनमें स्वयम्मू की प्रजा ऋषि है । यह प्रसंग प्रजा है । मावसृष्टि है । यज्ञसृष्टि से बाहर की वस्तु है । याज्ञिकी सृष्टि मापोमय परमेष्ठी से होती है । ऋषिसृष्टि याज्ञिकी सृष्टि नहीं है अपि भावसृष्टि है - इसी श्रमिप्राय से -१ शत ० ब्रा ० २।४।२।१ । [ ee ]

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण " महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः " ॥ ' - यह कहा जाता है । चूंकि ऋषिसृष्टि यश से बाहर की वस्तु है । यहाँ यज्ञसृष्टि का निरूपण करना है, अतएव ऋषि ने ऋषिसृष्टि को छोड दिया है । परमेष्ठी की सृष्टि पितर हैं । ये ही साध्यदेव हैं । सौरीसृष्टि देवसृष्टि है । मनुष्य पशुसृष्टि पार्थिवी है । श्रद्धा चान्द्रसृष्टि है । सत्यभाव, ब्रह्मचय्यं, विधि- तीनों का सूय्यं से सम्बन्ध है । ब्रह्म वेद है । सूम्यं वेदधन है । सो वा धावित्यः सत्यम् - के अनुसार सूय्यं सत्य है । कम्र्म्मकाण्ड विधि है । यह बेद पर निर्भर है । प्राण सौरीसृष्टि है । प्रपान - श्रीहियव पार्थिवी सृष्टि है । इस प्रकार याशिकीसृष्टि निम्नलिखित क्रम से तत्तल्लोकों में विभक्त है— याज्ञिक प्रजा { १ - स्वयम्भू = ऋषयः [ १ - परमेष्ठी - साध्य ( पितर देवता ), प्रसुर ( भ्राप्य प्रसु र सौम्य साध्य ) - गन्धर्व २ - सूर्य्यं = वसु - रुद्रन्प्रादिस्यादि ३३ देवता, सत्य, तप, प्राण, ब्रह्म । विधि-३ – चन्द्रमा श्रद्धा, गन्धवं, असुर | ४ - पृथिवी = मनुष्य, पशु, पक्षी, मसुर, भपान, बीहि, यव सूर्य्य से ऊपर परमेष्ठीमण्डल है । यहां भृगु और अंगिरा है । भृगु का विकास ब्रह्मणस्पति है । अंगिरा का विकास बृहस्पति है । यह ' बृहस्पति ' ग्रहबृहस्पति एवं लुब्धकबन्धु नाम से प्रसिद्ध दोनों बृहस्पतियों से मित्र तीसरा है । वाजपेय नाम से प्रसिद्ध बृहस्पतिसव का इसी तीसरे बृहस्पति से सम्बन्ध है । सूय्यं के ऊपर पूर्वभाग है । नीचे उत्तरभाग है । सुय्यंरूप इन्द्र उत्तरभाग में पहला है एवं मांगिरस बृहस्पति पूर्वो के अन्त में है । इसी अभिप्राय से बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्समो भवति इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः- यह कहा जाता है । कहना यही है कि बृहस्पति मांगिरस है । ब्रह्मणस्पति सौम्य है । बृहस्पति के सम्बन्ध से ही सौरसाम बृहत्सान कहलाता है । भृगु में पाप:, वायु, सोम तीन भाग हैं । इनमें भ्राप्यप्राण प्रसुर है । वायव्यप्राण गन्धर्व है । सोम्य ब्राह्मणस्पत्यप्राण एवं सोममय प्रांगिरस बार्हस्पत्यप्राण पितर हैं । ये ही साध्य हैं । इस प्रकार परमेष्ठी में असुर - गन्धर्व - पितर ( साध्य ) इतने देवताओंों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन सबका यहाँ साध्य शब्द से ग्रहण है । ये सौरदेवताओं से प्रथमण हैं, अतएव इनके लिए-यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवा: ' - साध्या व नाम वेवेभ्यो देवाः पूर्वमासंस्त एतत् ३ - यह कहा जाता है । सूर्य में ३३ देवता हैं, तप है. ब्रह्मचय्यं है । हमारे में जो ब्रह्मचय्यं है - यह सौरभाग है एवं प्राण भी उसी का भाग है । पार्थिवसाम रथन्तर है - वह प्रपान कहलाता है । सोरसाम बृहत् है - वह प्राण १ गीता १०।६ । २ यजुर्वेद ३१।१६ | ३ ताण्ड्य ब्रा ० २५।८।२ । ( १००!

पृष्ठ 105

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faatenure ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्यं परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपणं कहलाता है । ऐसी अवस्था में प्राणापानी में बृहद्रथन्तरे ' के अनुसार हम प्राण को सोरभाग एवं प्रपान को पार्थिवभाग कहने के लिए तय्यार हैं । विधि वेद है । सत्य भाव भी सौर है । ब्रह्मचयं तपः सत्यं बेदानां चानुपालनम् के लिए यहाँ - सपः सस्यम् - ह्मचर्म्यम् - विधिः - कहा है । पूर्वकथनानुसार इनका सूर्य्य में ( सौरसृष्टि में ) अन्तर्भाव है । इसमें मसुरों का प्रभाव है । सूय्यं के नीचे चन्द्रमा है । चन्द्रमा परमेष्ठी का भाग है, भतएव जो सृष्टि वहाँ है वह यहाँ है । मसुर - पितर साध्य गन्धर्व चारों यहाँ हैं । मन्नों में ब्रीहि का सम्बन्ध चन्द्रमा से है । चावल सोमघन है, प्रतः पार्थिव होने पर भी इनका चान्द्रसृष्टि में भन्तर्भाव मान लिया जाता है । श्रद्धा चन्द्रमा का मनोता है । इसी पर सौरसत्य प्रतिष्ठित है । श्राद्धक का इसी श्रद्धा - सूत्र से सम्बन्ध है एवं मनुष्य, पशु, पक्षी, ब्रीहि, यव, प्रपान पार्थिव प्रजा हैं । प्रजा पशु हैं । पशुओं के हीहि यत्र दो ही प्रधान भन्न हैं और अन्य मत गौण हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर सर्वेषां या एष वर्मा मेघो यद् ब्रीहियवो यह कहा जाता है । प्रजा और प्रजा का जीवनसाधन प्रक्ष, उसी यज्ञात्मक ईश्वर - प्रजापति से उत्पन्न हुधा है - यही तात्पय्यं है ॥।७ ॥ लोकसृष्टि - प्राणसृष्टि भूः भुवः स्वः महः जनः तपः, सत्यम् सात लोक हैं । मध्यात्म में भी सात लोक हैं । सात प्राण हैं । सात प्रथि हैं । सात होम हैं । अधिदेवत में भी हैं । मषिभूत में भी हैं । नीचे लिखी वालिका से सारा मन्त्रार्थं स्फुट हो जाता है-१- प्रविधैवत पक्ष-सत्यम् - १. स्वयम्मू चाकाशात्मक सत्यलोक ] पाकाश मूल १ ऋतम् - २. धन्तरिक्ष = सूत्रवाय्वात्मक ayture सत्यम् -३. परमेष्ठो = वायुरूपावात्मक जनलोक वायुभूत २ ऋतम् -४. प्रन्तरिक्ष = शिववाय्वात्मक महलोंक सप्त इमे लोका: सत्यम् - ५. सूय्यं तेजोमय स्वर्लोक स्वर्लोक ] तेजभूत ३ ऋतम् -६. प्रन्तरिक्ष - मप्रूपवाय्वात्मक मुबलक ] जलभूत ४ भूलोक ] पृथिवीभूत ५ सत्यम् - ७. पृथिवीमृष्मय १ ताण्डय ब्रा ० ७।६।१२ । [ १०१ ]

पृष्ठ 106

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fatnee ( प्रथमखण्डे ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान माध्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण सप्ताचियः सतण: सप्तसमिषः प्रथवा -१ - काली २- कराली } १- वसन्तः गायत्री → दिक्सोमरूपसौम्यप्राणः द्विकलः २- प्रीष्मः उष्णिक् ३- मनोजवा ३ - वर्षा अनुष्टुप् + सौरप्राणः द्विकलः ४- सुलोहिता १४- शरत् बृहत ५- सुधूम्रवर्णा ५ – हेमन्तः पङ्क्तिः + मान्तरिक्ष्यमाणः द्विकलः ६ - स्फुलिंगिनी ६- शिशिरः त्रिष्टुप् ७- विश्वरूपी ७ ] + पार्थिवाग्नेयप्राणः ७- मलिम्लुचः जगती सप्स होमा: -१- पाकयज्ञ = ( गृह्यस्मासं यज्ञ ) -पार्थिव यक्ष = १ २- मग्निहोत्र ३ - दर्शपूर्ण मास - = हवियंज्ञ ४- चातुर्मास्य == सोर यश = ६ ५ -- महायशाः ( एकाह, महीन, रात्रि, प्रयन - भेदमित सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोम ) ६- प्रतियज्ञ ( राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध, चयन ) ७- प्रवग्यं ( यश ) ७ सातों प्राणों का समिन्धन करने वाली सात ऋतुएं हैं । यद्यपि ऋतुएं ६ ही प्रसिद्ध हैं, तथापि सप्तचिति कोऽग्निः सप्तवः संवत्सर: ' के अनुसार मलिम्लुचं मांस को लक्ष्य में रखकर ७ ऋतुएँ मान सी जाती हैं । छन्दोयुक्त सातों ऋतुएं ही चित्सग्निरूप ईश्वर के शरीर के सात अग्नियों ( सात यों ) को समिद्ध करती हैं । इसी से सात होमों का स्वरूप प्रतिष्ठित हो रहा है । ईश्वर के शरीर में चार गुहा हैं । प्रत्येक में वे सातों प्राण हैं । जैसा कि प्रध्यात्म प्रपञ्चे से स्पष्ट हो जाएगा--१ शत ० प्रा ० ६।१।१।२६ । [ १०२ ]

पृष्ठ 107

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाध्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण सप्तलोक--१ - गुहा - ( सत्यम् ) - स्व ० २ प्रन्तरिक्षम् - ( तपः ) -सूत्रम् ३ - माप: ------- - ( जनत् ) - परमेष्ठी ४- अन्तरिक्षम् - ( महः ) - धाप: महः ५ - ज्योति: - - ( स्वः ) -: सूर्य: ६ - प्रमृतम्-७ - रस: ---२ - विभूतप्रपञ्च - ( मुवः ) - प्रन्तरिक्षम् चन्द्रमाः ( भूः ) - पृथिवी इसी प्रतिभूतपिण्ड में सात स्तर हैं । प्रत्येक में सात - सात प्राण हैं । भूत प्रग्निमय है । प्रज्वलित होने पर सातों चित्रों का प्रत्यक्ष हो जाता है, जैसा कि मुण्डक १।२ मन्त्र में बतला दिया गया है । प्रतिभूत सप्तच्छन्दोपेत सातों ऋऋतुषों से सम्बन्ध रखता है । सप्तयज्ञ माग प्रत्येक में है । ३ - मप शरीर में सात प्राण हैं । शिरोगुहा- उरोगुहा उदरगुहा - बस्तिगुहा भेद से ४ जगह वह सप्तक व्याप्त प्रवयव हैं - १ लोमत्वक्, २ रसासुक्, ३ मांस, ४ मेदा, हो रहा है । शरीर चित्याग्नि है । इसमें सात ५ अस्थि, ६ मज्जा, ७ शुक्र । अग्नि की ये सात चितियाँ हैं ये ही सात अधि हैं । इन सातों की समिघा ७ ऋतु हैं । इनसे शारीर सप्तहोमों का संचालन हो रहा है । प्रव्यक्तादिभेद से शरीर में सातों लोक हैं । यही तीसरा प्राध्यात्मिकप्रपञ्च हैं । मागे लिखी तालिकाओं से सारा प्रपञ्च स्पष्ट हो जाता है --पात ( पञ्चावयव ) यशप्रजापति की प्रत्येक प्रजा में १ - प्राण, २ च ३ -समिध, ४- होम, ५ - लोक भेद से पञ्चावयवता है-सप्त प्राणा: - गुहाशया निहिताः सप्त सप्त--ब्रह्मरन्धं मनः mosqpestors Summe ७ २- करणी-२ - चक्षुषी-२- नासिके -चाकू [ १०३ ] - सोमः दिशः -प्रादित्यः = द्यौः - वायुः अन्तरिक्षम् - श्रग्निः पृथिवी शिरोमुहा - १

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथम खण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्यं परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपणे २- हस्ती-२ - स्तनी ---२- फुफ्फुसे--हृदयम्-हृदयम् २- यकृत्प्लीहे -२- क्लोमानो--. - * कण्ठग्रन्थिः -सोमः = दिशः -श्रादित्यः = द्योः - वायुः = अन्तरिक्षम् - श्रग्निः पृथिवी -हृदयन्धिः - सोमः = दिशः - आदित्यः = द्यौः उरोगुहा- २ उदरगुहा- ३ २- दुक्के १ - नाभिः नाभि: -२- श्रोणी-२ - मूत्र रेलसी ७ २ - आण्डे --१ - मूलवार-83 -8 - वायुः = अन्तरिक्षम् - अग्निः = पृथिवी - नाभिग्रन्थिः सोमः -दिशः · मादित्यः = यौः - वायुः मन्तरिक्षम् - अग्निः पृथिवी ब्रह्मस्थि: बस्ति गुहा - ४ ये सातों सप्तक सौरप्राण के विवत्तं हैं- जैसा कि ' प्राणोपनिषत् ' ( प्रश्नोपनिषत् ) में बतला दिया गया है । प्रजापति से उत्पन्न होने वाली प्रजासृष्टिमात्र में ये सातों प्राण हैं-२ - तस्मात् सप्ताचियः १ - लोमत्वक् २- रसासृक् ३- सप्तसमिध: १ – गायत्री छन्दा वसन्तर्तुः २- उष्णिक छन्दा ग्रीष्मर्तुः ३- मनुष्टुप्छन्दा वर्षा ऋतुः ३- मांस → सप्तचितिको भूताग्निः ४- बृहतीछन्दा शरद् ऋतुः ४ - मेदा ५- अस्थि ६ - मज्जा ७- शुक्र [ १०४ ] ५- पङ्क्तिच्छन्दा हेमन्तर्तुः ६- त्रिष्टुप्छन्दा शिशिर ऋतुः ७ - जगतीछन्दा सप्तमी ऋतुः ( मलिम्लुचः ) }

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द्वितीयमुण्डक ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण इन सात ऋतुषों से ही सप्तचितिरूप ऋताग्नि की सातों मनियाँ प्रचिरूप में परिणत रहती हैं । एवमेव इस पुरुष में सातों यश भी हो रहे हैं । भग्निहोत्रादि सातों दिव्ययज्ञ भी हो रहे हैं एवं सप्तान-रूप पार्थिव सप्तयज्ञ भी हो रहे हैं । यह सप्तासानि मेषया तपसा जनयत् पिता के अनुसार ज्ञानक्रिया, शब्द, वायु, प्रकाश तेज, पानी, धन्न - ये मनुष्य के सात मत हैं । इनमें पाँच ईश्वरदत्त हैं । पानी और पत्र के लिए प्रयास करना पड़ता है । इन सातों मतों की प्राहुति से शारीरहोम सप्तहोमा हो जाता है-४- सप्त होता: --१- मानहोम मनः -मनः - + मात्मा होम: २- क्रियाहोम = प्राणः -प्राणः | ३ - शब्दहोम = प्राकाशहोम ( खं ) ४- वायु होम क वायुहोम ( वायुः ) ५- तेजः प्रकाशहोम = तेजोहोम ( ज्योतिः ) ६- प्रप् - होम = जलहोम ( भाप:) ७ - मशहोम ५ - सप्तमे लोका: ---पार्थिवहोम ( grat विश्वस्य धारिणी ) १- बव्यक्तलोक - सत्यम् - सत्यम् + वाक् वाङ्मयः ” भात्मा एष मनोमयः वा " स प्राणमयो २ - सूत्रलोक -- तपः --- तम् ३ – महान्लोक - जनत् सत्यम् ४- शिवलोक--महः -- तम् ५- विज्ञानलोक - स्वः- सत्यम् → स एव सप्तलोकात्मकः श्रासत्यनाम्मा प्रतियो, वैश्वानर - सेवस - प्राशस्वलोकी जीवात्मा तमयं जीवप्रजापतिः ६- प्रज्ञानलोक --- मुवः -- ऋतम् ७- शरीरलोक -- भूः —सत्यम् यह है - इस मन्त्र का वैज्ञानिक धर्थ । मब दोबार शब्दों में दार्शनिक अर्थ का भी निरूपण कर देते हैं - वाक् - प्राण - चक्षु - श्रोत्र - मन ये पाँच इन्द्रियाँ हैं । इनमें मन वेदना - साव से चारों में व्याप्त है । शेष थर रह जाती हैं । इन चारों में वाक् एकाकिनी है । घ्राण दो हैं । चक्षु दो हैं । श्रोत्र दो हैं । इस [ १०४ ]

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द्वितीय yush ( प्रथमखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञान भाष्य परावरात्मक ईश्वरीय वसत्यनिरूपणं प्रकार कुल सात इन्द्रियों हो जाती हैं ये सातों प्राण हैं । ये साठों प्राण उक्थ हैं । इन सातों से ७ प्रकार के अर्क निकलते हैं । वे ही सप्ताचि हैं । इन सातों नचियों में सात विषय माहुत होते रहते हैं - इससे सातों इन्द्रिय - प्राण समिद्ध रहते हैं । सात विषयों की प्राहुति होने से सातों इन्द्रियों के सात होम हो जाते हैं । इन्द्रियाँ उक्थरूप हैं । इन्द्रियाचि प्रकं हैं । विषय प्रशिति हैं । ७ ही इन्द्रिय - प्राण हैं । खातों की सात ही पाया हैं । सात ही प्रशितियाँ हैं । उक्थ- प्रकं प्रणिति की समष्टि प्रजापति है । प्रजापति यज्ञ है । इस प्रकार सात यज्ञ हो जाते हैं । यह सातों यज्ञ सात विभिन्न इन्द्रियलोकों में हो रहे हैं । ऐसे सात लोक, सात होम, सात समिध, सात प्राच, सात प्राण, ' शिरोगुहा, उरोगुहा, उदरगुहा, ' बस्तिगुहा भेद से चार भागों में विभक्त हो जाते हैं । एक गुहा में ३५ भाग हैं । चारों के कुल १७५ विमान हो जाते हैं । ' यह सारा प्रजासृष्टचन्तर प्राणप्रपञ्च है । उदाहरण के लिए शिरोमुहासम्बन्धी एक विभाग को बसला कर इस प्राणसृष्टिप्रकरण को समाप्त किया जाता है-सताण: सप्ताचिवः सप्तसमिधः प्होमाः १- दक्षिणोत्रेन्द्रिय इन्द्रियप्राणार्क शब्द सप्तलोकाः दक्षिणक लोक २- वामश्रोत्रेन्द्रिय शब्द " 7 " ३- दक्षिण चक्षुरिन्द्रिय रूप " } ४ - वामचक्षुरिन्द्रिय रूप 11 23 ५ - दक्षिणनासेन्द्रिय गन्ध 11 " " ६ - वामनासे न्द्रिय गन्ध arani लोक errears वाम लोक दक्षिणनासा लोक वामना सालोक " ७ - वाक् " रस " 1 विवरलोक ७- उपय ७ - प्रकं ७- प्रशितिः ७ - यशः पक्षापारः यह सारा प्रपञ्च भी उसी प्रजापति से उत्पन्न होता है सारे प्रपत्र से ऋषि को यही

बतलाना है ॥। ८ ॥

उपसंहार. प्रत्येक सत्यपिण्ड प्रग्निमय है । उदाहरण के लिए भूपिण्ड को ही लीजिए | यह सत्य है । पिण्ड के बाहर ३३ तक महिमामण्डल है । प्रकारान्तर से महिमा की व्याप्ति ४८ तक भी मानी जाती है । परन्तु उसका यहाँ सम्बन्ध नहीं है । पृथिवी से ऊपर ३३ तक अन्तरिक्ष है । अन्तरिक्ष ऋत है । इस तान्तरिक्ष में प्रापः वायु सोम - ये तीन ऋत पदार्थ रहते हैं । इनमें वायु की सात जाति । ये हो १ इन १७५ विभागों में ३५ विभाग अधिदेवत के भी हैं ( सं ० ) । [ १०६ ]