Mundakopanoshad — पृष्ठ 111–120
Mundakopanoshad · पृष्ठ 111–120
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faateen ( प्रथमखण्ड ) कहाँ तक कहें-१ शत ० ब्रा ० ६ | ४ | ११८ | शिष्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसस्यनिरूपण F Life it १०७ 1 सात मस्त् हैं । भ्रागे जाकर ये हो इन्द्रवज्य से विभक्त हो कर ४६ रूप धारण कर लेते हैं परन्तु इनमें सात मरुद्गरण ही मुख्य हैं । इन सात वायुद्मों के कारण समुद्रममितः पिन्वमानम् ' - वाला पृथिवीपिण्ड के चारों प्रोर व्याप्त रहने वाला भापोमण्डल भी सात विभागों में परिणत हो जाता है । ये ही सात समुद्र हैं । इसी वायु से मान्तरिक्ष्यसोम मी सप्तधा विभक्त जाते हैं । वे ही सात द्वीप हैं । सातों समुद्र मिन - भिन्न स्वाद रखते हैं । सर्वान्त का समुद्र सौरमण्डल के सन्निकट होने से उसके मधुसम्बन्ध से मृतसमुद्र नाम से प्रसिद्ध होता है एवं पृथिवी - पृष्ठ से संलग्न प्रापोभाग पार्थिव उषा ( और ) भाग के सम्बन्ध से क्षारसमुद्र कहलाता है । मैष्यस्थ अान्तरिक्ष्य घृत सम्बन्ध से घृतसमुद्र कहलाता है । पुराण जिन सात पार्थिव समुद्रों का वर्णन करता है, वे यही हैं । ये पिंण्डपृथिवी पर नहीं हैं - मपि तु महिमा -पृथिवी में है । निदर्शनमात्र है । पिण्डमात्र में ( उसकी महिमा में सात भापस्तर, साक्ष वायुस्तर, सात सोमस्तर होते हैं । ये सभी स्तर उसी से उत्पन्न हुए हैं एवं पृथिवी को गर्भस्थ अग्नि के विशकलन से बचाने-वाले पार्थिव सप्त महापर्वत भी उसी से उत्पन्न हुए हैं । रोदसी को समुद्र प्रणव कहलाता है । क्रन्दसी का सरस्वान् कहलाता है एवं संयंती का नसस्यान् कहलाता है । ये तीनों समुद्र सिन्धु नाम से प्रसिद्ध हैं । वे सात समुद्र थे एवं वे सातों सर्वरूप न ये । किन्तु ये तीन सर्वरूप हैं । तीनों से तीनों त्रैलोक्य ( सातों लोग ) एकड़ में भा जाते हैं, प्रतएव हम इन तीनों को सर्वरूप कहने के लिए तय्यार हैं । ये ही सिन्धु नाम से प्रसिद्ध हैं! इसी से सारी घोषधियां उत्पन्न हुई हैं । उसी से सारे रसपरस, विष - उपविष, धातु- उपधातु पंदा हुए हैं । ऐसा वह सर्वभूतान्तरात्मा पाँच भूतों से संपरिष्वक्त हो कर हमारा अन्तरात्मा बन रहा है । हम वही हैं - यही तात्पय्यं है ।
" पुरुष एवेदं विश्वं कर्म्म तपो ब्रह्म परामृतम् ।
raat वेव निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य " ॥
वही विश्व बना है, वही कम्मं है, वही तप है, वही ब्रह्म ( मात्मक्षर ) है एवं वही अमृत ( प्रक्षर ) है । गुहा निहित इस तत्त्व को जो जान जाता है - हे सोम्य! वही इस विश्व में अविद्याग्रन्थि को तोड़कर परम पद को प्राप्त कर सकता है । अमृताक्षर से प्रात्मक्षर के प्राणभाग से ब्रह्म ( वेद ) उत्पन्न हुधा है । उससे दीक्षा - तप उत्पन्न हुए हैं । उससे यशकम्मं उत्पन्न हुआ है । यज्ञ से विश्व और विश्वप्रजा उत्पन्न हुए हैं । मृत व्यय का विकास है । इस प्रकार सच्चिदानन्दघन अव्यय ही सब कुछ बना हुआ है । जो इसके सञ्चर प्रतिसञ्चर क्रम को जान जाता है - वह भवश्यमेव प्रविद्याग्रन्थिविमोक में समर्थ हो जाता है ।
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द्वितीयमुण्डक ( प्रथम ) पुष्व त्रिपुस्व = एवं-पराध्यय परात्पर धमृत अक्षर मुण्डकोपनिषविज्ञानाध्य परावरात्मक ईश्वरीयदेवसत्यनिरूपण → धारमा ब्रह्मवेद ( शर ) - → प्रजापतिः कर्मश -- → विश्वय जब वही सब है तो पनात्मभावना कैसी? जब अमात्यभावना नहीं तो बन्धन कैसा? -याही सातच है ॥। इति द्वितीयमुण्डके परावरात्मक ईश्वरीयवेवसत्य निरूपणात्मकः प्रथमः वण्यः समाप्तः ॥ ॥१ ॥
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अथ द्वितीयमुण्डके-ईश्वरप्राप्त्युपायात्मको द्वितीयः खण्डः
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are russiafruit-द्वितीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः प्राविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्परमतत्समर्पितम् एजप्राप्ति-मिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥१ ॥
यदचिमद्यदणुभ्योऽणुत यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च । तदेतदक्षरं ब्रह्मस प्रारणास्तव वाङ्मनः । तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि || २ || धनुर्गृहीत्वोपनिषदं महात्रं शरं ह्युपासानिशितं संघयीत । श्रायस्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तवेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ३ ॥
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । प्रप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४ ॥
यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणेश्च सर्वैः ।
जानथ श्रात्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ५ ॥
अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः । स एषोऽन्तश्चरते बहुषा जायमानः । श्रोमित्येवं ध्यायथ श्रात्मानं स्वस्ति वः पराय तमसः परस्तात् ॥६ ॥
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि । दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः । मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽले हृदयं संनिधाय । तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा श्रानन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥७ ॥
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facture ( द्वितीयखण्ड ) कोपनिषद्विज्ञानभाष्य ईश्वरप्राप्त्युपाय भिद्यते हृदयग्रन्थिविद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ८ ॥
हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥६ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥
ब्रह्म वेवममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण । प्रधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्म वेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ ११ ॥
॥ इति द्वितीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ ॥ इति द्वितीयमुण्डकं समाप्तम् ॥ २ [ ११२ ]
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अथ द्वितीयमुण्डके -ईश्वरप्राप्त्युपायात्मको द्वितीयः खण्डः [ विज्ञान भाव्य ] यद्यपि एक ही विषय का पुनः पुनः माने उन करने से पुनरुक्ति दोष होता है । इससे ग्रन्थ का स्वरूप बिगड़ता है । ऐसी अवस्था में उन्हीं विषयों को बार - बार दोहराना धनुचित 1 यह समझते हुए भी हमें बाध्य हो कर बार - बार पुनरुक्ति दोष को अपनाना पड़ता है । बिना इस प्रपञ्च को दोहराए किसी भी प्रकरण की संगति नहीं होती । ऐसी भवस्था में हम पाठकों से यह निवेदन करने कि दे विषय की यहमता को देख कर इस पुनरुक्ति को अपेक्षा - बुद्धि से ही ग्रहण करने की कृपा करें । पूर्व के प्रथमखण्ड में देवसत्य का निरूपण किया गया है । उस देवसत्य के प्रंश ही हम हैं । हमारा देवसत्य उस देवसत्य पर प्रतिष्ठित है एवं हमारा ब्रह्मसत्य उस ईश्वरीय ब्रह्मसत्य पर प्रतिष्ठित है । अध्यात्म की प्रतिष्ठा प्रभिदैवत है । धारमविभाग प्रमृत सस्य - यज्ञ इन तीन भागों में विभक्त है । इन तीनों का पूर्व के उपनिषदों में प्रकारान्तर से निरूपण भा चुका है । परात्पर - श्रव्यय - अक्षर इन तीनों की समष्टि का नाम अमृत है । वस्तुतः प्रमृत शब्द अक्षर के लिए निस्ठ है परन्तु प्रक्षर के ऊपर का अव्यय और परात्पर श्री मृत्युप से प्रतीत है, अतएव प्रमृत शब्द से परात्पर और प्रव्यय का भी ग्रहण कर लिया जाता है । इन तीनों की समष्टि ही पहली प्रमृतात्म संस्था है । इसके बाद है- सत्यात्म संस्था । स्वयम्भू-परमेष्ठी -सूथ्यं चन्द्रमा पृथिवी ये पांचों पिण्ड हैं- सहृदय हैं - सशरीरी हैं, प्रतएव इन पांचों को हम सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । इन सत्यों का उपादान प्रात्सक्षर है । अक्षर द्वारा भारमक्षर ही - विश्वसृट्-पञ्चजन- पुरंजन रूप में परिणत होता हुआ स्वयम्भू प्रादि सत्यरूप में परिणत होता है । जैसे प्रकार अमृत नाम से प्रसिद्ध है एवमेव यह आत्मक्षर ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध है । उपादान कारण कार्य्यं से धमिल होता है, भतएव स्वयम्भू प्रादिरूप सत्यप्रपञ्च को इस बार की घपेक्षा से ब्रह्मसत्य कहने के लिए तम्यार हैं । इस ब्रह्मसत्य के उदर में ब्रह्मसत्य के पृथिवी चन्द्र दोनों के बीच में स्तोम्यत्रिलोकी से देवसत्य प्रकट होता है । इस प्रकार सत्यात्मसंस्था ब्रह्म देव भेद से दो भागों में परिणत हो जाती है । what है - यशसंस्था । यदि ब्रह्मसत्य और देवसत्य को एक मान लिया जाता है तब तो ४ संस्थाएं हो जाती हैं, अन्यथा तीन संस्थाएं हो जाती हैं । इन्हीं तीनों संस्थानों को रूपान्तर से अमृत - सह्य - शुक्र कहा जा सकता है । भ्रमृत श्रमृतात्मा है । ब्रह्म ब्रह्मसत्य है । शुक्र यज्ञात्मा है । असल में शुक्र वह माहुति द्रव्य है जिसकी कि माहुति से यज्ञात्मा का स्वरूप निष्पन्न होने वाला है । परन्तु सात्स्थ्यासान्दन्तम्- इस न्याय से इस शुक्र को भी यज्ञ बतला दिया जाता है । इन्हीं तीनों भ्रात्मसंस्थानों के लिए - तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म सवामृतमुच्यते - यह कहा जाता है । [ ११३ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) १ - प्रमृतात्मा ( परात्पराव्ययाक्षरमयः ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य २ -- ब्रह्मसत्यात्मा ( परात्पराव्ययाक्षर -स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूर्य्य - चन्द्रमा - पृथिवीमयः ) ३ - देवसत्यात्मा ( परात्पराष्ययाक्षरक्षरदेवमयः ) ४ - यशसत्यात्मा ( परात्पराव्ययाक्षरक्षरदेवाग्निसोममयः ) १- ममृतात्मसंस्था ( परात्पर - व्यय - अक्षररूपा ) - रायेवामुतथुच्यते श्रात्मा २ - सत्यात्मसंस्था ( प्रमृतात्मयुक्ता ) - तद्ब्रह्म-.: है -- यज्ञात्मसंस्था ( ममृतसत्यात्मयुक्त ) - तथैव शुक्रम्--ईश्वरप्राप्त्युपाय चतुष्टयं वा इवं सम् -- प्राणाः प्रजापतिः धमृतात्मा घात्या है । सत्यास्मा प्राण है । यज्ञात्मा पशु है । फिर इनमें प्रत्येक में भी प्रवृतात्मा को छोडकर ) मात्मा - प्रारण - पशु सीनों भाव हैं । जैसाकि पूर्व के उपनिषदों में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । यहाँ इस प्रकरण से हमें केवल यही बतलाना है कि पहले अग्नीषोममय शरीररूप चज्ञात्मा • है । इसके ऊपर पञ्च देवमय: देवसत्य है । इसके ऊपर महदादिरूप ब्रह्मसत्य । ब्रह्म सत्य के ऊपर मृतात्मा है । चारों परस्पर सम्बद्ध हैं । देवसत्य का बहह्यसत्य से योग 1 सत्य का प्रमृताक्षर से योग है । इस प्रकार मुक्तिसाक्षी मक्षर के साथ ब्रह्मसत्य के द्वारा हमारे मोक्कात्मारूप देवसत्य का सवा ही सम्बन्ध रहता है, तथापि हम बन्धन से मुक्त नहीं होते । कारण इसका यही है कि जैसे पास में खड़े हुए शेर पर मुंह मोड़ कर बड़ा हुमा व्याध उस पर निशाना नहीं लगा सकता - एवमेव समीपस्थ प्रेक्षर पर यह पराङ्मुख भोकात्मा उस मुक्तिसाक्षी प्रक्षर को निशाना बनाने में असमर्थ रहता है । अक्षर दूर नहीं है । वह बिल्कुल सटा हुआ । | परन्तु रूख दूसरी घोर है । बस, इस आगे के प्रकरण में ऋषि को एकमात्र यही बतलाना है कि तुम विश्वास करो कि अक्षर तुम्हारे पास बैठा है । केवल निशाना बनाने की देर है । तुम स्वयं शामक्रियामय हो । वह स्वयं ज्ञान क्रियामय है । ऐसी अवस्था में तुम ज्ञान के जरिए, क्रियारूप कर्म के जरिए एवं उभयरूप उपासना के जरिए उसे अपना सक्ष्य बना सकते हो । बस, इन तीनों मार्गों में से पहले ज्ञानमार्ग का निरूपण करते हुए ऋऋषि कहते हैं -" साविः संनिहितं गुहाचर नाम महत् पचम् ।
अनैतत् समर्पित मेजत् प्राणत्रिमिवञ्च यदेतज्जानय ।
सदसद् वरेण्यं परं विज्ञानाद्यवरिष्ठं प्रजानाम् ॥१ ॥
प्राविः पद और गुहापद ये सांकेतिक शब्द हैं । वैसे दोनों का अर्थ क्रममः प्रकट मोर गुप्त है । वि: श्रद्धाभाव का वाचक है । गुहा सद्धाभाव का वाचक है । बडा चमत्कार । जो भ्रष्यारमजगत् हमारे पास है- वह हम से अनद्धा है एवं जो श्रधिदैवत जगत् हमसे दूर है - वह अद्धा है- प्रकट है । श्राधिदैविक [ ११४ ]
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facture ( द्वितीयखण्ड ) देवताओं को ( " ग्निवायु सुर्य्यादि को हम प्रत्यक्ष में देख रहे हैं, परन्तु आध्यात्मिक देवता प्रतिनिध्य के कारण अप्रत्यक्ष हैं । इसी माव को लक्ष्य में रखकर ऋषियों ने प्राधिदेवत्तमण्डल को ' प्रादिपद ' माना है एवं अध्यात्म को गुहापक्ष माना है । प्रकृति में प्रमृत सस्यादि सारा प्रपञ्च प्रातिः पद में निहित है एवं अध्यात्म में गुहापद में निहित है । इसी अभिप्राय से आत्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् - यह कहा जाता है । वस्तु एक है । केवल स्थान भेद है । अग्नि चायुपादिव्य दिसोम भारसमये पाँच देवता प्रकृति में हैं । ये पांचों मध्यात्म में प्राते हैं । प्रध्यात्मगत पांचों देवता निरन्तर अघिदेह में जाते है एवं अघिदेवतमण्डत से अध्यात्म में निरन्तर आया करते हैं । इसी माहान विसर्यात्मक यज्ञ को बारण ग्रन्थों में सहचार्य नाम से व्यवहृत किया है । - युहा निहितदेषता स विनिहितदेवताओं के संतिहित है । भाविनिहितदेवताहानिहित देवताभों के संनिहित है । साधारण सनुमा समझते होंगे कि दसरे ( ) में और ईश्वर में बडा अन्तर है । जीवावर ईश्वराशर को कैसे प्राप्त कर सका है कि सेनों के बीच में बडा प्रन्तर है, इस साधारण बुद्धि का खण्डन करते हुए ऋषि कहते हैं कि तुम भूल हो । जीव भौर ईश्वर में जरा भी अन्तर नहीं है । तुम्हारा गुहापद प्राविःपद के बिलकुल संनिहित है । शरीर में शिरा गुहा ठरोगुहा- उदरगुहा - बस्तिगुहा- ये चार गुहा हैं । इन चारों गृहानों में वह महत पद प्रतिष्ठित है । पाँचों देवता प्रतिष्ठित हैं । देवतोपलक्षित महत्पद गुहाश्वर है । यह भाविः संनिहित है । जीव का महदक्षर मौर ईश्वर का महदक्षर प्रविनाभूत है । यद्यपि इस मन्त्र में देवताओंों का उल्लेख नहीं है । केवल ' महत्व ' ही कहा है । तथाहित्यकार से यहाँ देवताओंों का ग्रहण करना भी आवश्यक हो जाता है । ऐतरेय श्रुति कहानी है " मुह गुहाभ्याममित देवताः । मह उ आदि: -ममो, बाक, प्रारणः । ता एताः पञ्चदेवता इमं विष्टाः पुरुषम् । पोह ता देवता प्रयं विष्टः पुरुषः " - इति ॥ ' ' इदम् ' शब्द पध्यात्म का वाचक है एवं ' प्रदर ' शब्द अधिदेवत का वाचक है । ' यह ' और वह दोनों कमा प्रध्यात्म और प्रति के लिए प्रयुक्त होते हैं । बुति कहती है कि इस अध्यात्म ' देवता गुहा निहित हैं । अर्थात् सुप्रसिद्ध वाक् प्राण- चक्षु श्रोत्र - मम इन पांचों गुहांनिहित इन्द्रियों को तुम आमशः पति के अग्नि वायु - प्रादित्य- विक्सोम - मास्वर समझो । ये पांचों मुहानिहित हैं - गुहम्बर हैं एवं अधिदेवत में मी वाक् प्राण - वक्षु श्रोत्र- मन- ये पाँच इन्द्रियाँ समझो । अर्थात् प्रकृति में जो तुम पाँच देवता देस रहे हो वे तुम्हारी इन्द्रियों से अभिन्न हैं । जो इन्द्रियाँ हैं - ये ही ये हैं । जी ये हैं वे हो इन्द्रियाँ हैं । इसी पदमा को बतलाने के लिए प्रध्यात्म के लिए - इमा देवता: - कहा है एवं प्रविदवत के लिए पशुः श्रोत्रं मनः प्राणो वाक् कहा है । श्रागे जाकर ऋषि कहते हैं कि ये पवि देवता इस अध्यात्म पुरुष में प्रविष्ट हैं एवं ये ही पांचों देवता उस प्रधिदेवत पुरुष में विष्ट हैं दोनों समिन हैं । गुहाचर देवता १ ऐत ० आ ० १।३३८ | [ ११५ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) मुण्डकोपनिषद्विज्ञानभाष्य ईश्वरप्राप्त्युपाय श्रविः संनिहित हैं । यहाँ के पांच देवताओंों को चारों गुहा में निहित सप्त सप्त प्राण का उपलक्षण समझना चाहिए । इस प्रकार ऐतरेय श्रुति प्राविः, गुहा के साथ देवताओं का सम्बन्ध बतलाती है । वही पक्ष इस उपनिषत् में है, अतएव यहाँ के महत् पदम् को हम पञ्चदेवता का भी उपलक्षण मानने के लिए तयार हैं । महत् एवम् का अर्थ है महानात्मा । पद, पुन पद, पुर इस प्रकार धात्मा अपनी तीन संस्था रखता है । पद ब्रह्मद है । पुनः पद ब्रह्मपुनः पद है । पुर ब्रह्मपुर है । ब्रह्मपद मात्मा है । ब्रह्मपुनःपद प्राण है एवं ब्रह्मपुर पशु है । तीनों की समष्टि प्रजापति है । ' महद पद ' का अर्थ है - महानात्मा । महानात्मा से यहाँ अक्षर व्यक्त महान तीनों श्रभिप्रेत हैं । पूर्व के उपनिषदों में यह विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि अक्षर की दौड़ महान् तक रहती है, भ्रतएव महान् को महवक्षर कहा जाता है । यह ' महदक्षर घोर ' देवता ' दोनों गुहाचर हैं एवं प्राविः संनिहित है । अर्थात् माध्यात्मिक देवगमितमहदक्षर ईश्वर के महाक्षर से प्रति है । इसी महदक्षर में सारा प्रपश्च प्रतिष्ठित है । एक प्रसंज्ञजीव हैं । प्राखत् भन्तः संज्ञजीव हैं । निमिषत् ससंजीव हैं । ' एजत् ' वैश्वानर भाग है । इसकी ज्वाला ' लेलायते ' है, मतः वैश्वानरात्मक प्रसंज्ञजीवों के लिए ' एजत् ' कहा है । ' प्राणत् ' तैजस है । ' निमिषत् ' प्राज्ञ है । वैश्वानर- तैजस - प्राश तीनों की समष्टि देवसत्य है । देवसत्य के अन्तसंज्ञ - प्रसंश - संसंज्ञ भेद से तीन विभाग हैं । ये तीनों उसी महदक्षर की महिमा में गति है । प्रक्षर के पेट में महान है । महान् के पेट में भोकात्मा है । विज्ञानरूप बुद्धि एवं प्रज्ञानरूप मन दोनों का कठोपनिषद् के अनुसार भोकात्मारूप बेवसत्य में मन्तर्भाव मान लिया जाता है, प्रतएव ऋषि ने महान् के पेट में ' एजत् प्राणत्- निमिषत् ' रूप में भोकात्मा की ही सत्ता बतलाई है । परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर अभी विज्ञान -प्रज्ञान- शरीर तीन भाग बच जाते हैं । इन तीनों के ग्रहण के लिए मागे जाकर ऋषि कहते हैं कि जो ' एजय ' है, ' प्राण ' है, ' निमिषद ' है एवं और जो कुछ तुम जानते हो - वह सब इस ' महदक्षर ' में समर्पित है । सारे क्षरों का प्रसव - प्रतिष्ठा -परायण वही प्रक्षर है-यही निष्कर्ष है । सत् वर्तमानकाल का वाचक है, मसत् भूत - भविष्यत् का वाचक है । भूत - भविष्यत्-वर्तमान, इन तीनों कालों से वह बरेच्य है । तीनों ने उसका संवरण कर रखा है । धर्थात् वह त्रिकाला-बाचित व्यापक नित्यतस्व है । प्रथवा जो संसार में धच्छा है, बुरा है, सबके लिए वह वरेण्य है । मिट सेनिकृष्ट पदार्थ में भी महदक्षर मौजूद है एवं श्रेष्ठ से श्रेष्ठ में भी वही अवस्थित है । बोक्तात्मा के ऊपर प्रज्ञान है । प्रज्ञान के ऊपर विज्ञानात्मा है एवं सुरात्या महान् परः के अनुसार वह महानात्मा विज्ञानात्या से परे है एवं सारी मैथुनी प्रजा का वही महदक्षर वरिष्ठ है- मूलाधार है । महान् परमेष्ठी है । परमेष्ठी प्रापोमय है । जाया- धारा- श्रापः तीनों प्रापोबल हैं । ही प्रजा के मूल हैं । मैथुनीसृष्टि का उपक्रम-स्थान यही प्रापोमय परमेष्ठी है । यह है प्राकृतिक परिस्थिति । इस परिस्थिति से यह भली - भांति ज्ञात हो जाता है कि हमारा जीवाक्षर उस ईश्वराक्षर से प्रभिल है - समीपस्थ है । अपने मकान में गढे हुए धन को न जानने के कारण सम्पत्तिशील मनुष्य जैसे दुःख पाया करता है, इसी प्रकार से अपने महत्पद के समीपस्थ उस भाविःपद को न जानने के कारण यह जीवात्मा दुःख पाया करता है । इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि वह समीपस्थ अक्षर को जानने का प्रयास करे । [ ११६ ]
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द्वितीयमुण्डक ( द्वितीयखण्ड ) विश्वात्मा -- [ १ - पोटशी पुरुष १- अव्यक्तत्राण २- महत्प्राण ३ - विज्ञानप्राण ४- प्रज्ञानप्राण ५ - शारीरप्राण १- प्राणमयपुर विश्वम् २- प्रापोमयपुर ३- वाङ्मयपुर ४- अन्नमयपुर ५ - अन्नादमयपुर ईश्वरप्राप्त्युपाय मुण्डकोपनिषद्विज्ञानमाज्यं ] + धात्मा पदम् === पुरुषः -- → प्राणाः पुनः पवम् - प्रकृतिः - सोऽयं विश्व विशिष्ट ग्रात्मा-प्रजापतिः → पशवः = पुरम् == विकृतिः [ ११७ ] प्राविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत् पदम् - इत्यादि मन्त्र अनुगमानुबन्धी है, घतएव इसके भनेक अर्थं हो सकते हैं । उनमें से एक प्रकार का अर्थ बतला दिया गया । अब दूसरे अर्थ की भोर प्रापका ध्यान माकर्षित करते हैं । पदम्, पुनःपदम्, पुरम् तीनों सांकेतिक शब्द हैं । पद भारमा है । पुनःपद आत्मा की महिमा है! इसी को प्रारण कहते हैं एवं पुर पशु हैं । प्रात्मा, प्राण, पशु के लिए क्रमशः पद, पुनः पद, पुर शब्द भी प्रयुक्त होते हैं । भ्रात्मा हमारे शरीर में यों तो १६ हैं, परन्तु उन सबका यदि स्थूलदृष्टि से विचार किया जाता है तो ६ ही भ्रात्मा रह जाते । पहला मात्मा षोडशी पुरुष है । परास्पर, पञ्चकल भव्यय, पञ्चकल प्रक्षर, पञ्चकल मात्मक्षर की समष्टि ही षोडशी मात्मा । इसे ही भ्रमृतात्मा कहते हैं- इसे ही गूढोत्मा कहते हैं । यह प्रधान दर ( भ्रात्मा ) है एवं इसके प्राधार पर रहने वाले पाँच प्राकृतात्मा हैं । मागे के तृतीय मुण्डक प्रथमखण्ड में इन्हीं पांच प्राकृतात्मानों के लिए - यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश यह कहा है । ये ही पांचों अधिदेवत में स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूम्यं चन्द्रमा पृथिवी इन नामों से प्रसिद्ध हैं एवं अध्यात्म में प्रव्यक्त, महान, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर- इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ये प्राकृत प्राणरूप धात्मा प्राणमय, झापोमय, वाङ्मय, समय, प्रनादमय पुर में रहते हैं । ये ही पशु हैं । इस प्रकार म्रात्मा, प्राण, पशुरूप - पुरुष, प्रकृति, विकृति इन तीनों की एक प्राजापत्य - संस्था बनती है--पाँच प्रकृतियाँ पाँच प्राणात्मा हैं । इनमें भी प्रात्मा - प्राण - पशु विभाग हैं । इसीलिए तो प्राणरूप होने पर भी इनको मात्मा कहा जाता है । भव्यक्त म्रात्मा है । वाक् - प्राण इसके प्राण हैं एवं स्वयम्भू में